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जब गाना नहीं आया याद, तो सहवाग ने रुकवाया मैच

क्या आपने कभी सुना है कि कोई खिलाड़ी मैच रोक दे क्योंकि उसे कोई गीत याद नहीं आ रहा? जी, सिर्फ विरेंद्र सहवाग ही ऐसा कर सकते हैं. मामला अप्रैल 2008 का है, जब उन्होंने चेन्नै में साउथ अफ्रीका के खिलाफ तिहरा शतक बनाया.

सहवाग ने कहा, ‘मैं चेन्नई में 300 पर बल्लेबाजी कर रहा था. मैं गीत के बोल भूल गया. तब मैंने 12वें खिलाड़ी इशांत शर्मा को मैदान पर बुलाकर कहा कि मेरे आईपॉड से गीत के बोल निकालकर लाए और उसने ऐसा किया. सबने सोचा कि मैंने इशांत को ड्रिंक्स के लिए बुलाया है लेकिन कई बार 12वें खिलाड़ी को ऐसे भी इस्तेमाल किया जा सकता है. वह गीत था, ‘तू जाने ना.’ सहवाग ने यह बात गोरेगांव स्पोर्ट्स क्लब प्रीमियर लीग के दूसरे सीजन के उद्घाटन के मौके पर कही.

और ‘रावलपिंडी एक्सप्रेस’ शोएब अख्तर को खेलते हुए आप कौन सा गीत गाएंगे? ‘आ देखें जरा, किसमें कितना है दम’ उन्होंने फौरन जवाब दिया. सहवाग से जब पूछा गया कि बल्लेबाजी करते हुए आप हमेशा गीत क्यों गाते रहते हैं? उन्होंने कहा, ‘गेंद खेलने से पहले मैं यही सोचता रहता हूं कि इस पर मुझे चौका मारना है या छक्का. ज्यादा सोचने से बचने और अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए मैंने गीत गाना शुरू कर दिया.’

सहवाग अब मैदान पर तो नजर नहीं आते लेकिन 38 वर्षीय यह पूर्व ओपनर अब टि्वटर पर अपने वन लाइनर्स के लिए फेमस हो रहे हैं. टेस्ट क्रिकेट को रोमांचक बनाने वाले सहवाग अब हिन्दी कॉमेंट्री में भी अपनी खास जगह बना रहे हैं.

सहवाग ने बताया, एक बार मुंबई में इंग्लैंड के खिलाफ मैच के दौरान ऐंड्रू फ्लिंटॉफ मुझे लगातार बाउंसर्स फेंक रहे थे. मैंने उनके पास जाकर कहा, अगर तुम बाउंसर्स नहीं फेंकोगे तो मैं शाम को तुम्हें ऐसी जगह ले चलूंगा जहां बहुत अच्छी कढ़ी मिलती है. और तरकीब काम कर गई.’

नोटबंदी पर सहवाग ने कहा, ‘मेरा मानना है कि कुंवारे आदमी बदलाव लाते हैं और शादीशुदा आदमी या तो घर के लिए सब्जी लाता है या फिर कुत्ते को घुमाने ले जाता है.’

अपने शादीशुदा जीवन पर उन्होंने कहा कि यहां मैं वही नियम अपनाता हूं जो बल्लेबाज के तौर पर अपनाता था, ‘अंपयार से कभी बहस मत करो, क्योंकि वह मुझे कभी भी आउट दे सकता है. इसी तरह मैं अपनी पत्नी से भी बहस नहीं करता. अंपायर फिर भूल सकता है, लेकिन आपकी पत्नी को लड़ाई के दौरान हुई सारी बातें पूरी तरह याद होंगी.’

टेस्ट क्रिकेट में दो तिहरे शतक लगाने वाले इकलौते भारतीय बल्लेबाज ने साफ किया कि आज कॉमेंट्री उनका नया पैशन है. उन्होंने कहा, ‘मुझे माइक पर बोलना पसंद आ रहा है. यह एक जुनून बन गया है. कॉमेंट्री के दौरान चुटकुले और वन-लाइनर्स सुनाना मुझे पसंद है.’

फेसबुक बन गया सैक्सबुक, अश्लील सामग्रियों की है भरमार

देश में महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं. दरिंदे तो अब मासूम बच्चियों तक को नहीं छोड़ते. खुफिया एजेंसी का दावा है कि इंटरनैट का प्रयोग करने वाले 60 फीसदी लोग अश्लील साइटों का इस्तेमाल करते हैं. खुफिया विभाग ने 546 साइटों को ब्लौक करने की सिफारिश भी सरकार से की है. मनोचिकित्सक भी मानते हैं कि बारबार अश्लील साइटों को देख कर अपराधी के मन में विकार आ जाता है. वह कई बार उसी तरह से सैक्स करना चाहता है. हालांकि देखने वाली बात यह है कि बलात्कार की घटनाएं वहां होती हैं जहां इंटरनैट या फेसबुक जैसी चीजें नहीं हैं. ऐसे में केवल इंटरनैट को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता. यह भी सच है कि बीते कुछ समय में इंटरनैट और फेसबुक में अश्लील सामग्री परोसने का काम तेजी से बढ़ा है.

एक दौर ऐसा था जब सड़कों पर किताबों की दुकान लगाने वाले पीली पन्नी में बंद सैक्स की कुछ किताबें बेचते थे. ऊपर से रंगीन दिखने वाली इन किताबों के अंदर सबकुछ ब्लैक ऐंड ह्वाइट होता था. चित्रों के नाम पर खजुराहो की मूर्तियों के फोटो होते थे. सैक्स के नाम पर वात्स्यायन के 84 आसनों का जिक्र होता था. इसी दौर में मस्तराम टाइप के कुछ लेखकों की सैक्सी कहानियों वाली किताबें आने लगीं जिन के अंदर भी फोटो नहीं होते थे. कवर पर रंगीन फोटो विदेशी महिलाओं की होती थीं. 64 पन्नों की इस किताब को लोग ‘चौंसठिया किताब’ के नाम से भी जानते थे. इस तरह की किताबों में जो कहानियां होती थीं उन में फूहड़ता ज्यादा होती थी. दिल्ली के बाजार में सैकड़े के भाव में बिकने वाली ये किताबें उत्तर प्रदेश और बिहार के बाजार में 10 रुपए से ले कर 35-40 रुपए तक में बेची जाती थीं. इन किताबों में अनबिकी किताबों का कोई चक्कर नहीं होता था. सब से ज्यादा मुनाफा फुटकर बेचने वालों को होता था.

लोग इन किताबों को चुपचाप खरीद लेते थे और जेब में डाल कर चलते बनते थे. 90 के दशक की शुरुआत में किताबों की छपाई की क्वालिटी अच्छी हुई तो इन किताबों के रंग भी बदल गए. अब किताबों में अच्छे सैक्सी रंगीन फोटो छापे जाने लगे.

स्वास्थ्य समस्याओं की आड़ में हर तरह की कहानियां इन में प्रकाशित होने लगीं. इन की कीमत 40 से 100 रुपए के बीच हो गई. इन की बढ़ती बिक्री को देख कर अपराध कथाओं की पत्रिकाएं प्रकाशित करने वाले दिल्ली के कुछ बड़े प्रकाशक भी इस धंधे में कूद पड़े. कुछ सस्ते प्रकाशकों ने तो इन की डुप्लीकेट पत्रिकाएं सस्ते में छापनी शुरू कर दीं. वक्त के साथ सबकुछ बदला पर सैक्स की घटिया कहानियों का तौरतरीका वही मस्तराम टाइप ही रहा.

कुछ साल तक तो यह धंधा ठीक चला पर भेड़चाल में यह भी बंदी के कगार पर आ गया. धीरेधीरे किताबों को पढ़ने वाले इंटरनैट की सजीव दुनिया के मायाजाल में फंसने लगे. लैपटौप और कंप्यूटर की बड़ी स्क्रीन पर वह सबकुछ दिखने लगा जो कभी सादी या रंगीन सैक्सी किताबों में चोरीछिपे देखा जाता था.

महंगे बड़े स्क्रीन वाले मोबाइल फोन के दौर तक यह सबकुछ बड़े और पैसे वालों के लिए सुलभ रहा पर चाइनीज सस्ते मोबाइल फोन और मोबाइल कंपनियों में ग्राहक बनाने की होड़ में सस्ते से सस्ते ‘इंटरनैटपैक’ का चलन हो गया. ऐसे में पूरी दुनिया सिमट कर मुट्ठी में आ गई. ऐसे में ‘फेसबुक अकाउंट’ रखने वाले स्टेटस  वाला माना जाने लगा.

गरम भाभी से देशी जवानी तक

वैसे तो ऊपर से देखने में फेसबुक एक अच्छी सोशल नैटवर्किंग साइट लगती है पर कुछ ही दिनों में फेसबुक में भी सैक्सी चैटिंग करने वालों ने एक नई दुनिया बना ली. फेसबुक पर केवल रंगीन व सजीव चित्र ही नहीं दिखते बल्कि सैक्सी फिल्में तक अपलोड की जाने लगी हैं. यहां मनचाहे ढंग से न केवल ऐसे लोगों से बिना उन का चेहरा देखे बात कर सकते हैं बल्कि उन को अपने हिसाब से फ्रैंडलिस्ट से हटाया और जोड़ा भी जा सकता है. अपनी इसी खासीयत के चलते फेसबुक अब सैक्स बुक का नया रूप बन कर समाज में उतर आई है.

चौंसठिया किताबों, मनमंथन और असमंजस टाइप किताबों की तरह फेसबुक पर भी हौट सैक्सी गर्ल, देशी भाभी और सिस्टर, लड़कियों की टाइट पैंट, 16 प्लस इंडियन सैक्सी गर्ल, भाभी की कहानियां, हाय रे यह जवानी, गरम भाभी, सैक्सी आंटी, रचना भाभी, नैना भाभी, सैक्सी हाउसवाइफ, जीजा की मस्त साली जैसी तमाम साइटें खुल गई हैं. बहुतों के नाम यहां लिखे नहीं जा सकते.

इन सभी पेजों को लाइक करने वाले बहुत से लोग होते हैं. इंटरनैट पर किसी भी साइट की लोकप्रियता का अंदाजा उस के लाइक करने और उस के विषय में पूछताछ करने वालों की संख्या से लगाया जा सकता है.

कुछ ऐसे ही अकाउंटों के पेज पर जा कर इस को देखने की कोशिश की गई तो यह संख्या हजारोंलाखों में मिली. अंजलि भाभी की सैक्सी पाठशाला को पसंद करने वाले 42 हजार से अधिक लोग हैं तो उस के बारे में पूछताछ करने वालों की संख्या 10 हजार से अधिक थी

इसी तरह नेपाली माल 1,11,436 लाइक, 18 प्लस सैक्सी गर्ल को 2,23,278 पसंद करने वाले मिले. हो सकता है अब यह संख्या बढ़ गई हो. सविता भाभी और उस की बहनों को पसंद करने वाले लोगों की संख्या 3 लाख के ऊपर थी. बड़ी संख्या में लोग इन के बारे में जानकारी लेना भी चाहते हैं. ऐसे ही जिस को देखा गया उस के पसंद करने वाले और उस के बारे में पूछताछ करने वालों की संख्या हजारों में मिली. इस से यह पता चलता है कि बड़ी संख्या में लोग फेसबुक को पसंद करते हैं.

कैसेकैसे लोग

इन साइटों को देखने, पसंद करने और चैटिंग करने वालों में हर वर्ग के लोग हैं. इस में छिबरामऊ की नेहा पाल है जिस की उम्र 20 साल है. वह पढ़ाई करती है. वह लड़के और लड़कियों दोनों से दोस्ती करना चाहती है. 32 साल की गीता कानपुर की रहने वाली है, दिल्ली में रहती है. वह नौकरी करती है. किसी लड़के के साथ उस की रिलेशनशिप भी है. वह केवल लड़कियों से सैक्सी चैटिंग पसंद करती है. उस की सब से अच्छी दोस्त प्रीथी रमेश है जो केरल की रहने वाली है. वह दुबई में अपने पति के साथ रहती है. अपने पति के साथ शारीरिक संबंधों पर वह खुल कर गीता से बात करती है. ऐसे ही तमाम नामों की लंबीचौड़ी लिस्ट है. इन में से कुछ लड़कियां अपने को खुल कर लैस्बियन मानती हैं और लड़कियों से दोस्ती और सैक्सी बातों की चैटिंग करती हैं. कुछ हाउसवाइफ भी इस में शामिल हैं जो अपने खाली समय में चैटिंग कर के मन बहलाती हैं. कुछ लड़केलड़कियां या मर्द और औरत भी आपस में सैक्सी बातें व चैटिंग करते हैं.

कई लड़केलड़कियां तो अपने मनपसंद फोटो भी एकदूसरे को भेजते हैं. फेसबुक एक जैसी रुचियां रखने वाले लोगों को आपस में दोस्त बनाने का काम भी करती है. एक दोस्त दूसरे दोस्त को अपनी फ्रैंडशिप रिक्वैस्ट भेजता है. इस के बाद दूसरी ओर से फ्रैंडशिप कनफर्म होते ही चैटिंग का यह खेल शुरू हो जाता है. हर कोई अपनी पसंद के अनुसार चैटिंग करता है. कुछ लड़कियां तो ऐसी चैटिंग करने के लिए पैसे तक वसूलने लगी हैं

वाराणसी के रहने वाले राजेश सिंह कहते हैं, ‘‘मुझ से चैटिंग करते समय एक लड़की ने अपना फोन नंबर दिया और कहा कि उस में 500 रुपए का रिचार्ज करा दो. मैं ने नहीं किया तो उस ने सैक्सी चैटिंग करना बंद कर दिया.’’ इसी तरह से लखनऊ के रहने वाले रामनाथ बताते हैं, ‘‘मेरी फ्रैंडलिस्ट में 4-5 लड़कियां हैं जो मुझे अपनी सैक्सी फोटो भेजती हैं. मेरे फोटो वे देखना पसंद करती हैं. कभीकभी हम उन का नैट पैक रिचार्ज करा देते हैं. इन लोगों से बात कर मैं बहुत राहत महसूस करता हूं. मुझे यह अच्छा लगता है, इसलिए मैं कुछ खर्च भी करने को तैयार रहता हूं.’’

चलता है सैक्सवर्कर का खेल

फेसबुक में कुछ ऐसे अकाउंट भी हैं जो अपने को खुलेआम सैक्सवर्कर कहती हैं. इन को लोग अपने मोबाइल नंबर तक दे देते हैं. इस के बाद इन की सीधी बातचीत होने लगती है. कोलकाता की रहने वाली नेहा राय ने अपने अकाउंट में लिखा है कि वह सैक्सवर्कर है. उस का नैटवर्क पूरे देश में है. आप जरूरत के हिसाब से बात कर सकते हैं. नेहा राय के अकाउंट में ऐसे बहुत से नाम जुड़े हैं जिन्होंने उसे अपने नंबर दे रखे हैं.

हैदराबाद की रहने वाली शैलजा ओएनजी भी ऐसी ही सैक्सवर्कर की बात करती है. केरल के रहने वाले सेल्वा कुमार ने सैक्स सेवाओं के लिए अपना नंबर दे रखा है. सेलम, तमिलनाडु की रहने वाली सुजाता लव अपने को लैस्बियन हाउसवाइफ बताती है.

मुंबई में रहने वाली कुछ लड़कियां, जो डांस बार से जुड़ी हैं, अपने अलग फेसबुक अकाउंट चलाती हैं. चैटिंग करने के दौरान वे यह जाननेसमझने की कोशिश करती हैं कि सामने वाला कैसा आदमी है. अगर उन को अपना काम हल होता दिखता है तो वे बातें बढ़ाती हैं. पहले ईमेल और फिर पैसे लेनेदेने की बात शुरू हो जाती है. दिल्ली और विदेशों में रहने वाली बहुत सी औरतों के अकाउंट भी बने हैं.

रमेशनाथ बताते हैं, ‘‘एक बार मुस्कान नाम की लड़की ने सैक्सी चैटिंग शुरू की. लंबे समय तक हर तरह की बातें होती रहीं. 20-25 मिनट की चैटिंग के बाद उस ने कहा कि वह लड़की नहीं, लड़का है. एक बार किसी ने उसे ऐसे ही बेवकूफ बनाया था तब से वह भी लड़कों को लड़की बन कर चैटिंग करता है. बाद में सचाई बता कर निकल जाता है.’’

मानसिक रोगों की निशानी

अपने देश और समाज में सैक्स को बहुत खराब माना जाता है. खुलेआम इस की चर्चा तक नहीं की जाती. ऐसे में जब जहां जिस को जैसा मौका मिलता है, लोग इस को जानने और समझने में लग जाते हैं. कभी मस्तराम की किताबें इस का जरिया होती हैं तो कभी फेसबुक.

डा. अनिल कुमार राय इसे मनोरोग मानते हैं. उन का कहना है कि बहुत लोग सामान्य से दिखते हैं पर वे इस रोग के शिकार होते हैं. वे कभी सैक्स की बात कर के कभी  गंदीगंदी कहानियां पढ़ कर, चित्र देख कर अपने को संतुष्ट करते हैं. ऐसे लोगों को फेसबुक के रूप में नया जरिया मिल गया है. जहां यह भी नहीं पता होता है कि सामने वाला असली है या नकली. मानसिक संतोष के लिए भी लोग इस का सहारा लेते हैं.

51 साल के परशुराम ने अपने अकाउंट में 20 साल के किसी जवान, सुंदर, स्मार्ट लड़के का चित्र इसलिए लगा रखा है ताकि कम उम्र की लड़कियों से चैटिंग कर सके. वे कहते हैं कि मैं एक कारोबारी हूं. घर और दुकान में जब मस्ती करने का मन होता है तो अपने अकाउंट में जा कर चैटिंग कर अपने को रिचार्ज कर लेता हूं. डा. अनिल कुमार राय, जिसे मानसिक बीमारी बता रहे हैं, परशुराम उसे रिचार्ज होना मानते हैं.

कोवर्किंग हब : नए जमाने का नया वर्क कल्चर

स्टीव जौब्स ने अपना काम गैरेज से क्यों शुरू किया, इस का एक कारण यह था कि उन के पास शुरुआती निवेश के लिए बहुत सा धन नहीं था और दूसरा, तब कोवर्किंग हब विकसित नहीं थे. नव उद्यमियों के नए कारोबार या स्टार्ट्सअप को साधारण सा औफिस नहीं, बल्कि चाहिए अपने लिए एक उत्पादक ख्वाबगाह जहां वे जागते हुए अपने सपने पूरे कर सकें. यही जरूरत कोवर्किंग केंद्र नामक इस कामकाजी नवाचार की जननी है.

4-5 साल पहले शुरू हुआ कोवर्किंग हब का चलन उफान पर है. कोवर्किंग मतलब खुद का औफिस बनाने के झंझट के बजाय किसी कार्यालय समूह में अपनी जरूरत के मुताबिक बनाबनाया औफिस किराए पर ले कर काम करना. आप अपना काम शुरू करना चाहते हैं, पर ऐसी कोई जगह नजर नहीं आती जहां आप और आप के साथीसहयोगी बैठ कर कामकाज के शानदार माहौल में उत्पादक कार्य कर सकें. आप के पास ज्यादा पूंजी भी नहीं है या फिर शुरुआती दौर में ही महज कार्यालय स्थापित करने के चक्कर में अपनी पूंजी का ज्यादा हिस्सा नहीं लगाना चाहते. बहुत से ऐसे संसाधन हैं जिन की जरूरत कभीकभी ही पड़ेगी पर पास में होने चाहिए, आप उस में अभी पैसा नहीं लगाना चाहते. कई बार ऐसा भी होता है कि संबंधित काम के लिए किसी बड़े तामझाम वाले औफिस के बजाय किसी एक ऐसे कोने की ही जरूरत होती है जो सुविधासंपन्न हो और निजता तथा एकांत के साथ कामकाजी माहौल भी देता हो. ऐसी दशा में कोवर्किंग हब आप के लिए बेहतर विकल्प है.

अब मारजित को ही लीजिए, ये महाशय 3 विदेशी प्रकाशकों से जुड़े हुए हैं. उन की किताबों का संपादन करते हैं, साथ ही, लेखन व संपादन से जुड़े कुछ और काम भी इन के पास हैं. मारजित यह काम घर से भी कर सकते हैं पर उन्होंने एक सीट वाला औफिस केबिन किराए पर ले रखा है, वह भी हफ्ते में 4 दिनों के लिए, रोज 5-6 घंटे वे यहीं काम करते हैं.

4 साल देश और 2 साल विदेश में काम कर चुके सौफ्टवेयर इंजीनियर रवि ने देश लौट कर अपनी कंपनी बनाई. रवि के पास आइडिया था. सौफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी के असाइनमैंट के साथ 3 समर्पित साथी भी थे. जोड़जमा कर थोड़ी पूंजी भी थी. समस्या यह थी कि कामकाज किया कहां से जाए. घर से संभव न था. कई वजहें थीं, स्थान, एकांत, निजता, पार्किंग, लोकेशन वगैरा. बेहतर इलाकों में छोटे से भी औफिस का किराया बहुत था, और फिर काफी पूंजी उस औफिस को काम लायक बनाने में खर्च हो जाती. मसलन, जरूरी फर्नीचर और दूसरी तकनीकी आवश्यकताओं को जुटातेजुटाते समय और धन दोनों स्वाहा हो जाते और किराए के औफिस को जब छोड़ कर दूसरी जगह जाते तब ये सामान किस हद तक इस्तेमाल हो पाता, यह कहना भी मुश्किल था.

आसान व सुलभ उपाय

रवि का दोस्त चंदेल ऐप डैवलप करने का काम करता है और वह दिल्ली के मयूर विहार फेज वन स्थित एक कोवर्किंग स्पेस से ही अपना सारा कामकाज करता है. चंदेल ने रवि को बताया कि उस की जानकारी सीमित है पर इतना पता है कि पुणे, बेंगलुरु, मुंबई, नोएडा, गुड़गांव, दिल्ली में तो कामकाज के लिए सस्ता कार्यालय ढूंढ़ने में कहीं कोई दिक्कत नहीं. गोआ, अहमदाबाद, अर्नाकुलम, कोच्चि, चेन्नई, जहां कहीं भी कामकाज बढ़ रहा है, इस चलन का असर दिखाई दे रहा है. अगले 3 दिनों में ही रवि ने चंदेल की मदद से दक्षिणी दिल्ली में एक पांचसितारा सुविधा वाले कोवर्किंग हब में जगह ढूंढ़ ली. कामकाज के क्षेत्र में बेहद अनूठी और व्यावहारिक सुविधा का नाम है कोवर्किंग हब. दिल्ली के पहले से ही कुछ सघन बाजारों में एक ही भवन में नीचे दुकानें और ऊपर छोटेबड़े तमाम कार्यालय चला करते हैं. बाजार होने के नाते, क्लाइंट का आना और उन का स्वागतसत्कार आसान व सुलभ होता, साथ ही कामकाज भी. ये अब भी चलते हैं. अब इन का सुधरा और पांचसितारा रूप सामने आया है और किराया भी कुछ खास ज्यादा नहीं है. भले ही ये ठीक बीच बाजार में न हों पर मैट्रो स्टेशन, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन, होटल, मौल जैसी जगहों के नजदीक होते हैं और फिर कामकाज का सारा बाजार व वातावरण तो ये अपने भीतर ही समेटे होते हैं.

चूंकि इस व्यवसाय को बहुत सोचसमझ कर विकसित किया गया है इसलिए कोवर्किंग हब पहले से ज्यादा सुव्यवस्थित और सुविधाजनक हैं. इन कोवर्किंग हब में कार्यालय आप मासिक ही नहीं, साप्ताहिक भी ले सकते हैं. इतना ही नहीं, दिनों के आधार पर भी आप चाहें तो एक कुरसीमेज की जगह खरीद सकते हैं या विशाल कार्यालय. कर्मचारी बढ़ गए तो अतिरिक्त जगह खरीद लीजिए, कुछ कंप्यूटर अतिरिक्त चाहिए तो मामूली सी मासिक फीस दे कर ले सकते हैं. इस हब के सदस्य बन गए तो तमाम ऐसी सुविधाएं जिन पर आप को बहुत खर्चा करना पड़ता, बेहद सस्ते में उपलब्ध हो जाती हैं.

छोटी पूंजी से धंधे की शुरुआत में इस तरह के औफिस की कल्पना नहीं कर सकते जहां वातानुकूलित, धीमे प्रकाश वाली साफसुथरी और सजीधजी गैलरी से निकलने के बाद शानदार लौबी और उस में हर तरफ चमचमाता फर्नीचर, काउच, सोफे हों, लौबी जिस के एक तरफ आप का केबिन और उस के साथ लगा आप के स्टाफ के क्यूबिकल्स हैं तो दूसरी तरफ चंद कदमों पर बढि़या रेस्तरां और कौफी हाउस. बोर्डरूम और मीटिंग हौल के क्या कहने. एक नहीं, कई हैं. बड़े पैनल पर प्रेजे?ंटेशन दें या फिल्म चलाएं अथवा केवल औडियो, सब की बढि़या सुविधा. कामकाज की पेशेवराना सुविधाओं के अलावा कुछ वर्किंग हब ने तो इस तरह का जीवंत माहौल बना कर रखा है कि जैसे यह आप का अपार्टमैंट ही हो और आप अपने घर पर ही बिलकुल रिलैक्स हो कर काम कर रहे हैं. किसीकिसी ने टेबल टैनिस या बिलियर्ड की टेबल भी लगा रखी है. काम के साथ कुछ तफरीह भी तो होनी चाहिए.

काम के साथ आराम भी

कामकाज में भी रिलैक्स होने के कई अवसर हैं यहां. आप चाहें तो अपना अकाउंटैंट न रखें, न ही कोई प्रशासकीय या एडमिन विभाग, एचआर डिपार्टमैंट, न लीगल मसलों के लिए किसी खास सलाहकार अथवा स्टाफ की कोई जरूरत. ये सब सामूहिक तौर पर या पैनल के रूप में उपलब्ध हैं और आप इन की साझा सेवाएं आसानी से उठा सकते हैं. आप का औफिस यहां बस 2 कमरों का है पर आप चाहते हैं कि आप के हर फोन को बड़े दफ्तरों की तरह रिसैप्शन पर रिसीव कर महज जरूरी कौल आप को दी जाए या आप की अनुपस्थिति में संदेश लिए जाएं, उन का उचित जवाब दिया जाए तो यह सुविधा भी आप बिना रिसैप्शनिस्ट रखे हासिल कर सकते हैं. आप के मेल भी नियत मेलबौक्स में जमा हो कर आप को मिलेंगे. आप के अतिथियों को चाय, कौफी या पानी सर्व कराने का बढि़या इंतजाम रहता है. रोज महंगे रेस्तरां में नहीं जाना चाहते तो टिफिन के कई विकल्प मौजूद हैं. देर रात काम करना चाहें तो भी सुविधाएं हैं.

कुछ वर्किंग हब इतने बड़े और विकसित हैं कि वहां तमाम नव उद्यमी एकसाथ काम कर रहे होते हैं. उन में से कई एकदूसरे के पूरक बन जाते हैं, समुदाय और समूह बना कर सामूहिकता का लाभ उठाते हैं. बिजली कभी नहीं जाती, नैटवर्किंग और नैट अबाध रहता है, इंटरनैट की स्पीड 50 एमबीपीएस से कभी कम नहीं होती वहां. आप को अपने कंप्यूटरों, पिं्रटरों, लैपटौप या ऐसी चीजों की तकनीकी रखरखाव के लिए किसी आईटी स्टाफ या विभाग नियुक्त करने अथवा बाहर से बुलाने के लिए समय या धन नहीं खर्च करना है. पार्किंग का झमेला नहीं, यहां सुरक्षाकर्मी लगे हुए हैं और पार्किंग की यह सुविधा मुफ्त है. हमेशा उपलब्ध फैक्स, फोटोकौपी कागज और स्टेशनरी जैसी छोटीमोटी साधारण सुविधाएं हों या फिर आर्ट, डिजाइन अथवा विज्ञापन, पीआर, इवैंट मैनेजमैंट, यहां तक कि अगर विपणन या मार्केटिंग रणनीति बनाने में कोई सहायता चाहिए तो उस के विशेषज्ञों की सेवा के साथ ही संबंधित व्यवसाय के बाजार पर रिसर्च तथा उस के नैटवर्कों की बढि़या सेवा यहां आप को अपने कार्यालय के इर्दगिर्द आसानी से उपलब्ध है. आप को व्यवसाय के लिए ज्यादा समय मिलेगा और तनाव कम रहेगा. जाहिर है धन भी कम लगेगा. निसंदेह कुछ सुविधाएं पैकेज डील के तहत मुफ्त हैं तो कुछ के लिए पैसे देने होंगे. पर हर सुविधा के लिए न समय खर्च करना है, न भटकना है.

लगातार विकसित हो रहे बाजार, बढ़ती शिक्षा व तकनीक संबंधी नए विचारों और इन नए विचारों को समाज व व्यावसायिक समुदाय के मिलते सार्थक सहयोग ने ढेरों नव उद्यमियों को आगे आने का अवसर दिया है. बैंक लोन के सरलीकरण के साथ क्राउडफंडिंग एक नई उम्मीद बन कर उभरी है. ऐसे में स्टार्टअप्स या कहें नए उद्यमियों की देश में भरमार सी हो गई है. बेंगलुरु, पुणे, दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों के तमाम नौजवानों ने अपना काम शुरू कर सफलता और कमाई की जो नई कहानी लिखी है वह सब के लिए प्रेरक व बहुतों को ईर्ष्या से भर देने वाली है. आज इन प्रेरित नव उद्यमियों को चाहिए अपने लिए कम खर्च में सुविधासंपन्न उत्पादक ख्वाबगाह जहां वे जागते हुए अपने सपने पूरे कर सकें. यही जरूरत ही इस नवाचार यानी कोवर्किंग हब की जननी है.

कम चुकाएं ज्यादा पाएं

अपने शहर में कोवर्किंग स्पेस या हब इंटरनैट पर खोजेंगे तो कई विकल्प मिलेंगे. इन की वैबसाइट पर जाएं, आप को किस इलाके में कितनी जगह और सुविधा चाहिए और क्या खर्च कर सकते हैं, उस के अनुरूप अपना औफिस चुनिए. ध्यान रखिए, मोलभाव की गुंजाइश है और औफर भी आते रहते हैं. मोटेतौर पर एक सामान्य से बेहतर कोवर्किंग स्पेस का व्यय इस प्रकार है-

महीने भर का   —     5,300 से 8,000 रुपए.

अंशकालिक     —     महीने में 10 दिन — 2,200 से 3,000 रुपए.

7 दिनों का     —     1,500 रुपए प्रति व्यक्ति.

एक दिन का    —     300-500 रुपए.

1    अगर 3 सदस्यों से ज्यादा का समूह है तो हर अतिरिक्त सदस्य के लिए 4,000 रुपए मासिक देने होंगे.

2    अगर अपनी सीट पर नया कंप्यूटर लगवाना हो तो 75 रुपए प्रतिदिन दीजिए.

3    मीटिंग के लिए बोर्डरूम या हौल बुक कराना है तो पहले बताइए और 400 से 800 रुपए हर 7 घंटे के हिसाब से चुका दीजिए.

4    मूनलाइटर्स पैकेज भी उन लोगों के लिए उपलब्ध हैं जो केवल रात में काम करने वाले हैं.

इसी तरह खेल हो या खाना, पार्किंग अथवा इंटरटेनमैंट, थोड़े से अतिरिक्त भुगतान पर आप बेहतरीन सुविधाएं पा सकते हैं.

स्टार्टअप्स की लाइफलाइन कोवर्किंग हब

भारत में स्टार्टअप सालाना 270 फीसदी के रेट से बढ़ रहे हैं. हर महीने 500 से 800 नए स्टार्टअप शुरू होते हैं. और इस स्टार्टअप के खेल में सब से आगे जो शहर है उस का नाम है बेंगलुरु. यह शहर अब ऐसा स्टार्टअप हब बन कर उभरा है कि इस ने स्टार्टअप के ट्रैंड में एक नए बिजनैस मौडल को भी खड़ा कर दिया है, यह मौडल है कोवर्किंग स्पेस का. यह स्टार्टअप्स की लाइफलाइन बन चुका है.

मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में कई ऐसे कोवर्किंग हब हैं जहां एक ही औफिस या बिल्ंिडग में ढेरों छोटीबड़ी कंपनियां एक ही डैस्क को दूसरी कंपनी की डैस्क से साझा कर के अपना काम कर रही हैं. न रैंटल औफिस के लिए भागदौड़ और न ही रखरखाव, न बिजलीपानी के बिल से ले कर इंटरनैट का चक्कर, सबकुछ कोवर्किंग स्पेस चलाने वाले की जिम्मेदारी होती है. और इस कल्चर का प्लसपौइंट यह है कि आप को कई रचनात्मक सोच वाले व्यक्तियों का साथ मिलता है. बेंगलुरु में कोबाल्ट, कोवर्क इंडिया, कोवर्क कैफे जैसे ढेरों कोवर्किंग स्पेस देने वाली कंपनियां हैं, जो कोवर्किंग हब को रोजगार का जरिया बना चुकी हैं और स्टार्टअप्स को लुभा रही हैं. अमूमन कोवर्किंग स्पेस में 5 से 6 हजार रुपए प्रतिमाह में आप को डैस्क स्पेस उपलब्ध रहता है. यह रेट लोकेशन और शहर के आधार पर बढ़ व घट सकता है. बहरहाल, यह हमेशा ही फायदे की डील होती है. आप को उतना ही खर्च करना पड़ता है जितना आप को स्पेस या सुविधा चाहिए. इस के अलावा सब से खास बात यह है कि ज्यादातर कोवर्किंग स्पेस 24 घंटे खुले रहते हैं.

कोवर्किंग हब ने बनाया आन्ट्रप्रनर

एक आइडिया ही होता है जो किसी को सफल बिजनेसमैन या अगर आजकल की स्टार्टअप की भाषा में कहें तो आन्ट्रप्रनर बना सकता है. ‘आइडिया मिल’ की संस्थापक व निदेशक कृतिका नाडिग की भी यही कहानी है. एक दिन कृतिका ने कोवर्किंग स्पेस विषय पर औनलाइन लेख पढ़ा. उन्हें यह विचार काफी रोचक लगा और मार्केट में इस बारे में उन्होंने काफी रिसर्च की और सारी बचत को इस काम में निवेश करने का फैसला किया. इस तरह कृतिका को आइडिया मिल शुरू करने का आइडिया मिला. इस स्टार्टअप में 16 सदस्यों के लिए कोवर्किंग स्पेस है.

कृतिका का ‘आइडिया मिल’ पुणे के एक घर से चलता है जो उन के परिवार का ही है. बस, वह घर औफिस के तौर पर इस्तेमाल होता है. ‘आइडिया मिल’ की खासीयत यह है कि यह सभी सदस्यों के लिए सातों दिन सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक खुला रहता है.

कृतिका आगे चल कर इस तरह का सिस्टम बना रही हैं कि एक ही डैस्क पर 2 दोस्त शिफ्ट सैट कर के एक ही दिन में काम कर सकें. ‘आइडिया मिल’ में औफिस कल्चर बड़ा दिलचस्प है. यहां पर सदस्य बाहर घूमने जा सकते हैं, बातचीत कर सकते हैं, वर्कशौप और फिल्म देख सकते हैं और ये सब वे तब कर सकते हैं जब वे कोई काम नहीं कर रहे होते. यहां पढ़ने के लिए पुस्तकालय भी है. अगर आप को नौवेल भी लिखना  है तो यहां की आरामदायक बालकनी में कौफी की चुस्कियां लेते हुए आराम से लिख सकते हैं.

-साथ में राजेश कुमार

जब बदल जाए आप का स्कूल

विशाल के पिता रेलवे में हैं. उन की जौब ट्रांसफरेबल है. विशाल जब 10वीं कक्षा में पढ़ रहा था तब उस के पिता का ट्रांसफर हो गया. परिणामस्वरूप न केवल उसे अपना स्कूल छोड़ना पड़ा बल्कि अपने दोस्तों को भी अलविदा कहना पड़ा. अब उस के सामने सब से बड़ी समस्या नए शहर और नए स्कूल में नए दोस्तों के साथ सामंजस्य बैठाने की थी. शुरू में उसे नया स्कूल और वहां का माहौल अटपटा लगा, क्योंकि उसे तो अपने पुराने स्कूल की आदत थी. यहां न वह किसी को जानता था और न ही कोई उसे. उस ने आगे आ कर दोस्ती का हाथ बढ़ाया और कुछ ही दिनों में यहां नए मित्र बना लिए और उन से इस कदर घुलमिल गया जैसे बरसों पुरानी दोस्ती हो.

सच भी है, नई जगह, नए स्कूल में दोस्त बनाने की पहल तो आप को ही करनी पड़ेगी. किसी से भी दोस्ती करने में कोई झिझक नहीं करनी चाहिए. इस के लिए पहले सामने वाले से हाथ मिलाएं और उसे अपना परिचय दें तथा उस का परिचय प्राप्त करें. उस पर अपनी यह मनशा जाहिर करें कि आप उस से दोस्ती करने के इच्छुक हैं और उसे दोस्त बना कर आप को खुशी होगी. नए स्कूल में अपने सहपाठियों से दोस्ती करने के लिए उन के साथ खेलेंकूदें, कार्यक्रमों में हिस्सा लें, किताबकौपियों और नोट्स का आदानप्रदान करें. जब आप उन से बात करेंगे तभी आप को एकदूसरे को जानने का मौका मिलेगा. इस से दोस्ती की राह आसान हो जाएगी.

अपने जन्मदिन या खास अवसरों पर उन्हें अपने यहां आमंत्रित करें. ईद, होली, दीपावली, क्रिसमस आदि त्योहारों पर उन्हें बधाई दें. नए स्कूल में दोस्त बनाने के लिए जरूरी है कि आप विभिन्न ऐक्टिविटीज में हिस्सा लें. इस से आप को एकदूसरे के साथ ज्यादा समय बिताने का मौका मिलेगा. एनसीसी और एनएसएस ऐसे माध्यम हैं जिन से जुड़ने पर नए स्कूल में नए दोस्त बनाना आसान हो जाता है, क्योंकि ये दोनों ही संगठन सामूहिक भावना पर आधारित होते हैं. इन में एकसाथ काम करने का अवसर मिलता है. जब कभी इन के शिविर आयोजित हों, उन में अवश्य भाग लें. इन शिविरों में साथ समय बिताने से दोस्ती में मजबूती आती है. इसी प्रकार स्कूल की खेल गतिविधियों में भाग लें. इस से आप को नए दोस्त बनाने के भरपूर अवसर मिलेंगे.

यदि आप में कोई विशेष हुनर है तो उस के बलबूते पर आप अपने सहपाठियों को अपनी तरफ आकर्षित कर सकते हैं. यह हुनर किसी भी तरह का हो सकता है. इस से अन्य छात्र आप से दोस्ती करने को आतुर रहेंगे. अच्छे व होशियार बच्चों से हर कोई दोस्ती करना चाहता है. यदि आप पढ़ाकू हैं, कक्षा में प्रश्नों के उत्तर देते हैं तथा टीचर्स की शाबाशी पाते हैं तो अन्य सहपाठी आप से दोस्ती के लिए अपना हाथ बढ़ाएंगे. ऐसे में आप के लिए दोस्तों की कमी नहीं रहेगी. जब आप नए स्कूल में प्रवेश करते हैं तो पुराने स्कूल से उस की तुलना कदापि न करें. नया स्कूल पुराने स्कूल से अच्छा हो सकता है और नहीं भी. यदि आप अपनी सोच को सकारात्मक रखेंगे तो वहां भी आप को अच्छे दोस्त मिल ही जाएंगे. अपने सहपाठियों की अच्छाइयों को ग्रहण करें, उन में व्याप्त बुराइयों की ओर ध्यान न दें. यदि आप को नए दोस्त बनाने में कठिनाई आ रही है, तो अपनी यह समस्या टीचर्स को बताएं. वे कुछ अच्छे लड़केलड़कियों से आप का परिचय करा देंगे, जिस से आप को उन से दोस्ती करने में आसानी होगी.

जब भी आप किसी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाएं, वह निस्वार्थ होना चाहिए, क्योंकि स्वार्थ पर आधारित दोस्ती अधिक दिन तक नहीं चलती और असलियत सामने आते ही वह टूट जाती है. इसी प्रकार दोस्ती का नाजायज फायदा न उठाएं. यदि किसी से दोस्ती करें तो उसे निभाएं भी, खासतौर पर तब, जब सामने वाला संकट में हो. किसी भी सहपाठी से बात करने में शर्माना नहीं चाहिए बल्कि उस से खुल कर बात करनी चाहिए. हो सकता है कि उस की रुचि और आप की रुचि एक जैसी हों. ऐसे में घुलनेमिलने के अवसर बढ़ जाते हैं. यदि स्कूल की तरफ से कोई पिकनिक या पार्टी आयोजित हो तो उस में अवश्य जाना चाहिए. इस से नए दोस्त बनाने में आसानी रहती है.

यदि आप स्कूल की कैंटीन में जाते हैं तो अपने दोस्तों के साथ जाएं. अगर फिल्म देखने जाने का प्रोग्राम हो तो अपने दोस्तों को साथ ले कर जाएं. अपने नए दोस्त के सुखदुख के साथी बनें. दोस्ती में जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग आदि का भेद न पालें, तभी दोस्ती निभ पाएगी.

भारत में जुलाई से शुरू होने जा रही है बिकिनी एयरलाइन्स

वियतनाम की VietJet एयरलाइन अपने नाम से ज्यादा ‘बिकिनी एयरलाइन’ के नाम से जानी जाती है. ये एयरलाइन जल्द ही अपनी सेवा भारत से शुरू करने जा रही है. एयरलाइन ने ऐलान किया है कि उनकी फ्लाइट्स नई दिल्ली से वियतनाम के Chi Minh City तक शुरू होगी. इस सेवा की इसी साल जुलाई या अगस्त के बीच शुरू होने की उम्मीद है. इसकी फ्लाइट्स नई दिल्ली से हफ्ते में 4 दिन उड़ान भरेगी. आपको बता दें कि ये एयरलाइन सेक्सीएस्ट मार्केटिंग तिकड़म के लिए जानी जाती है. इसे वुमन एंटरप्रेन्योर Nguyen Thi Phuong Thao चलाती हैं.

किसने चुना एयरलाइन का ड्रेस कोड

एयरलाइन की एयरहोस्टेस का ड्रेस कोड CEO ‘Nguyen Thi Phuong Thao’ ने चुना है. बता दें कि वे वियतनाम की पहली बिलियन एयर महिला हैं. हाल ही में ये एयरलाइन फुटबौल टीम के वेलकम में एयरहोस्टेस को Lingerie पहनाने के लिए चर्चा में रही थी.

विवादित एयरलाइन में से एक

एयरलाइन दुनिया की सबसे विवादास्पद एयरलाइनों में से एक है. क्योंकि, कुछ देश बिकनी होस्टेस की अवधारणा के खिलाफ हैं और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इसका संचालन निश्चित रूप से हंगामा खड़ा कर देगा.

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VietJet वियतनाम की पहली प्राइवेट एयरलाइन

आपको बता दें, VietJet वियतनाम से औपरेट होने वाली पहली प्राइवेट एयरलाइन है. 2017 में कपंनी ने 1.7 करोड़ यात्रियों को सफर कराया था. इससे एयरलाइन को कुल 986 मिलियन डौलर यानी 64 अरब रुपए से ज्यादा की आय हुई थी. जो कि 2016 के मुकाबले 41.8 फीसदी ज्यादा थी.

60 रूट्स पर है औपरेशंस

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, VietJet के विमान अभी घरेलू और विदेश में करीब 60 रूट पर औपरेट होता है. 2023 तक कंपनी का लक्ष्य 200 एयरक्राफ्ट अपने बड़े में शामिल करने का है. एयरलाइंस ने अपनी पहले कमर्शियल फ्लाइट दिसंबर 2011 में शुरू की थी. लेकिन, अपने बिकनी कन्सेप्ट और एयर होस्टेसेस के ड्रेस कोड के कारण कम समय में ज्यादा उपलब्धि हासिल की और देश की दूसरी सबसे बड़ी एयरलाइन बन गई.

सोशल मीडिया पर हुई थी किरकिरी

साल के शुरुआत में Vietjet की ओछी मार्केटिंग के लिए सोशल मीडिया पर जमकर किरकिरी हुई थी. एयरलाइन ने फुटबौल टीम के वेलकम के लिए एयरहोस्टेस को स्वीमिंग कौस्ट्यूम्स में भेजा था. हालांकि, एयरलाइन ने एयर होस्टेस को बिकनी पहनाकर शुरुआत में सुर्खियां बटोरी थीं. लेकिन, ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर उसके इस तरीके को गलत बताया गया था.

स्नैपड्रैगन बनाएगा विंडोज 10 के सबसे पावरफुल प्रोसेसर

एंड्रौयड स्मार्टफोन और टैबलेट के लिए प्रोसेसर बनाने वाली कंपनी क्वालकौम अब माइक्रोसौफ्ट विंडोज 10 के लिए प्रोसेसर बनाएगी. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो स्नैपड्रैगन 835 एसओसी के लौन्च होने के बाद माइक्रोसौफ्ट ने क्वालकौम से साझेदारी करके विंडोज 10 एआरएम डिवाइस बनाने का ऐलान किया था.

माना जा रहा है कि इस साल के अंत तक स्नैपड्रैगन एक नया प्रोसेसर 850 एसओसी (जो स्नैपड्रैगन 845 एसओसी प्रोसेसर पर आधारित है) विंडोज 10 औपरेटिंग सिस्टम के लिए पेश कर सकता है. कुछ मीडिया रिपोर्ट की मानें तो इसके बाद स्नैपड्रैगन विंडोज पीसी के लिए 1000 एसओसी एडवांस्ड प्रोसेसर बनाएगा, जो ARM मशीन पर रन करेगा.

हो सकता है सबसे पावरफुल प्रोसेसर

मीडिया रिपोर्ट की मानें तो 1000 एसओसी प्रोसेसर स्नैपड्रैगन का अब तक का सबसे पावरफुल प्रोसेसर हो सकता है, जिसका इस्तेमाल लैपटौप के लिए किया जाएगा. इन चिपसेट प्रोसेसर को इंटेल के Y और U सीरिज कोर प्रोसेसर के साथ लौन्च किया जा सकता है.

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ऐसा माना जा रहा है कि 4.5W और 15W पावर के टैबलेट और अल्ट्राबुक में इस प्रोसेसर का इस्तेमाल किया जाएगा. रिपोर्ट के मुताबिक इन लैपटौप और टैब्स में 16GB रैम और 128GB की यूएसबी फ्लैश ड्राइव दी जा सकती है तो लेटेस्ट वाई-फाई, एलटीई तकनीक पर काम करेगा।

कम्पूटैक्स 2018 में स्नैपड्रैगन 835 प्रोसेसर की घोषणा

आपको बता दें कि चिपसेट बनाने वाली कंपनी क्वालकौम ने कम्पूटैक्स 2018 में विंडोज 10 पीसी के लिए स्नैपड्रैगन 850 प्रोसेसर बनाने की घोषणा की है. कंपनी फिलहाल स्मार्टफोन के लिए प्रोसेसर बनाती है.

कंपनी का दावा है कि इस प्रोसेसर की मदद से पीसी की कनेक्टिविटी और बैटरी लाइफ को बढ़ाया जा सकता है. इतना ही नहीं यह प्रोसेसर पीसी के परफार्मेंस को बढ़ाएगा. माइक्रोसौफ्ट और क्वालकौम मिलकर इस प्रोसेसर की मदद से आइपैड प्रो को चुनौती दे सकता है.

इस प्रोसेसर की मदद से विंडोज के पीसी में हाइबरनेशन फीचर को अपग्रेड करके इंस्टेंट औन रिज्यूम बनाया गया है. कंपनी के दावे के मुताबिक इस प्रोसेसर की मदद से कम्प्यूटर के परफार्मेंस को 30 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है.

बड़े ही अनोखे रिकौर्ड बना रहा है इंग्लैड

क्रिकेट की दुनिया में शायद ऐसा पहली बार ही हो रहा है कि एक के बाद एक कई रिकौर्ड एक ही देश से बन रहे हों, जी हां यह हो रहा है इंग्लैंड में पहले एक ही दिन में पुरुषों के क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने के दो रिकौर्ड बना इंग्लैंड की टीम ने अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने का अपना ही रिकौर्ड तोड़ते हुए औस्ट्रेलिया के खिलाफ 481 रन बना डाले इसी दिन इंडिया ए टीम ने भी एक पारी में 458 रनों की रिकौर्ड पारी खेल डाली.

इसके बाद इंग्लैंड में ही महिलाओं ने टी20 मैचों में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकौर्ड बनाया और उसके कुछ ही घंटों में तोड़ भी दिया. इस बार भी एक अनोखा रिकौर्ड इंग्लैंड में ही बना है लेकिन सबसे ज्यादा रन बनाने का नहीं .

इंग्लैंड में ही इस बार सिर्फ एक रन के भीतर सात विकेट गिरा दिए गए. इंग्लैंड के कैम्ब्रिजशायर के पीटरबोरो के क्लब मैच में पीटरबोरो क्लब ने हाई वायकोम्ब क्रिकेट क्लब को जीत की स्थिति से हार के लिए मजबूर कर दिया. एक जगह जहां पूरे क्रिकेट जगत में रनों के पहाड़ खड़ा करने पर चिंतन हो रहा है तो वहीं दूसरी तरफ एक ही रन के भीतर सात विकेट गिराने का अजूबा हो गया.

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वेबसाइट ईएसपीएनक्रिकइंफो की रिपोर्ट के मुताबिक, 189 के लक्ष्य का पीछा करने उतरी हाई वायकोम्ब की टीम जीत से महज तीन रन दूर थी और उसके पास सात विकेट बचे हुए थे. यहां से मैच का रोमांच शुरू हुआ. तेज गेंदबाजे केरन जोंस ने चार गेंद में चार विकेट चटका दिए और इस ओवर में एक भी रन नहीं दिया.

आखिरी ओवर डालने की जिम्मेदारी 16 साल के औफ स्पिनर डेनयल मलिक को दी गई. 57 रन बनाने वाले नाथन हौक्स ने पहली गेंद पर एक रन लिया और फिर मलिक ने बाकी के तीन विकेट लेकर पीटरबोरो क्लब को न भूलने वाली जीत दिला दी. इसी के साथ पीटरबोरो ने ईसीबी नेशनल क्लब चैम्पियनशिप का खिताब अपने नाम कर लिया.

ऐसे रिकौर्ड चिंता का विषय है क्रिकेट पंडितों के लिए

उल्लेखनीय है कि इंग्लैड में ही अगले साल जून में आईसीसी का वनडे वर्ल्डकप होने जा रहा है और आगामी जुलाई से सितंबर तक के लिए टीम इंडिया भी इंग्लैंड से तीन तीन मैचों की टी20 और वनडे सीरीज और साथ में पांच मैचों की टेस्ट सीरीज के लिए टीम इंडिया इंग्लैंड पहुंच चुकी है. अगले साल होने वाले वर्ल्डकप को ध्यान में रखते हुए टीम इंडिया के इस दौरे को काफी महत्व दिया जा रहा है.

लेकिन इंग्लैंड में जिस तरह से रिकौर्ड बन रहे हैं वह क्रिकेट जगत को काफी हैरान करने वाला है. इंग्लैंड की पिचें बड़े स्कोर के लिए नहीं जानी जाती हैं ऐसे में जब वहां उम्मीद की जाने लगे कि वनडे में 500 रनों का स्कोर भी नामुमकिन नहीं है तो फिर क्रिकेट में जिंता स्वाभाविक ही है.

श्रीदेवी की फिल्म के रीमेक में नजर आ सकती हैं दीपिका पादुकोण

फिल्म ‘ओम शांति ओम’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाली बौलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण अभी तक कई हिट फिल्में दे चुकी हैं. उनकी फिल्म ‘पद्मावत’ इस साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म है. फिल्म ने बौक्स-औफिस पर 300.26 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया था.

इस फिल्म के बाद दीपिका डायरेक्टर विशाल भारद्वाज की एक फिल्म साइन करने वाली थीं. फिल्म में दीपिका के को-स्टार इरफान खान थे. लेकिन अचानक इरफान को पता चला कि उन्हें कैंसर है, जिसके बाद इलाज के लिए वह लंदन चले गए, जिसके कारण फिल्म की शूटिंग शुरु नहीं हो सकी. अब फिल्म के डायरेक्टर विशाल भारद्वाज ने कहा है कि जब तक इरफान स्वस्थ हो कर वापस नहीं लौट आते तब तक फिल्म की शूटिंग शुरू नहीं होगी.

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दीपिका को लेकर अभी सबसे ताजा खबर यह है कि वह दिवंगत बौलीवुड अभिनेत्री श्रीदेवी की 40 साल पुरानी फिल्म के रीमेक का हिस्सा बन सकती हैं. एक खबर के मुताबिक श्रीदेवी की इस फिल्म के निर्माता दक्षिण भारतीय थे, जबकि फिल्म का निर्देशन बौलीवुड के डायरेक्टर ने किया था.

फिल्म की रीमेक के लिए अधिकार खरीदने पर अभी बात चल रही है. फिल्म के लिए दीपिका मेकर्स की पहली पसंद हैं. हालांकि अभी कोई इस फिल्म पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है. लेकिन यह बात सच है कि दीपिका को फिल्म के लिए फाइनल कर लिया गया है.

आपको यह भी बता दें कि ‘पद्मावत’ के बाद से दीपिका फिलहाल कोई फिल्म नहीं कर रही हैं. जिसके कारण दीपिका को लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही है. जिसमें सबसे बड़ी चर्चा यह है कि दीपिका अपने कथित ब्वौयफ्रेंड रणवीर सिंह के साथ नवंबर में डेस्टीनेशन वेडिंग कर सकती हैं. इसके अलावा दीपिका को लेकर एक और बड़ी खबर सामने आई थी कि वह ‘वंडर वुमेन’ से इंस्पायर्ड एक सुपरहीरो फिल्म की तैयारी कर रही हैं. खबरों के मुताबिक फिल्म के लिए वह जम कर मेहनत कर रही हैं.

ब्रेकफास्ट रैसिपीज : दलिया स्ट्राबैरी पुडिंग

दलिया स्ट्राबैरी पुडिंग

सामग्री

– 1/4 कप दलिया

– 250 ग्राम दूध

– 2 बड़े चम्मच मिल्क पाउडर

– 1 बड़ा चम्मच चीनी

– 2 एमएल स्ट्राबैरी

– 2 बड़े चम्मच इच्छानुसार बारीक कटे मौसमी फल.

विधि

दलिया को सूखा भून कर ठंडा होने दें. फिर साफ पानी से धो लें. 1/2 कप पानी में दलिया डाल कर प्रैशरकुकर में 1 सीटी लगाएं. जब प्रैशर निकल जाए तो दलिए में दूध व चीनी डालें. मिश्रण गाढ़ा होने लगे तो मिल्क पाउडर मिला दें. 1 उबाल आने के बाद मिश्रण ठंडा करें. स्ट्राबैरी के छोटे टुकड़े करें. थोड़ी स्ट्राबैरी व आधे कटे फल एक सर्विंग गिलास बाउल में डालें. फिर दलिया डालें. ऊपर से थोड़े फल पुन: डालें. ठंडा कर के सर्व करें.

ब्रेकफास्ट रैसिपीज : ड्राईफ्रूट बनाना शेक

ड्राईफ्रूट बनाना शेक

सामग्री

– 2 पके केले

– 10-12 बादाम ब्लांच्ड किए

– 2 कप ठंडा दूध

– 1 बड़ा चम्मच शुगर सिरप

– 6-7 केसर के धागे

– 1/4 छोेटा चम्मच इलायची चूर्ण

– 1 बड़ा चम्मच बादाम पिस्ता फ्लैक्स.

विधि

केलों को छील कर छोटे टुकड़ों में काट लें. मिक्सर में केले, शुगर सीरप, बादाम और 1 कप दूध डाल कर चर्न करें. फिर बचा दूध डाल कर पुन: चर्न करें. 2 गिलासों में डालें. ऊपर से बादाम पिस्ता फ्लैकस, इलायची चूर्ण और केसर के धागे बुरक कर सर्व करें.

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