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इन 8 तरीकों को अपनाकर बढ़ाएं अपना बैट्री बैकअप

स्मार्टफोन यूजर्स की हमेशा से सबसे ज्यादा शिकायत बैटरी बैकअप को लेकर होती है. ज्यादातर यूजर्स स्मार्टफोन में इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं जिसकी वजह से उनके बैटरी की खपत दोगुनी तक बढ़ जाती है. आज हम आपको कुछ आसान उपाय बताने जा रहे हैं, जिसकी मदद से आप अपने स्मार्टफोन की बैटरी 40 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं.

  • स्मार्टफोन में बैटरी की सबसे ज्यादा खपत इंटरनेट चलाने से होता है, अगर आप अपने फोन में इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो अपने फोन का सेल्युलर डाटा औफ कर दें. इससे करीब 20 प्रतिशत बैटरी की क्षमता बढ़ जाती है.
  • इंटरनेट के लिए मोबाइल डाटा की जगह वाई-फाई का इस्तेमाल करें. वाई-फाई से इंटरनेट चलाने पर 5 प्रतिशत तक बैटरी की खपत कम की जा सकती है.
  • जब आप यात्रा कर रहे हैं तो अपने फोन को एयरप्लेन मोड पर डाल दें. क्योंकि यात्रा के दौरान नेटवर्क के बार-बार सर्च करने पर बैटरी की खपत बढ़ जाती है. एयरप्लेन मोड में फोन रखने की वजह से आपका स्मार्टफोन बार-बार नेटवर्क सर्च नहीं करेगा, जिससे इसकी क्षमता 5 फीसद तक बढ़ जाती है.

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  • अपने फोन में सोशल मीडिया एप्स जैसे कि फेसबुक, व्हाट्सऐप, यू-ट्यूब आदि पर वीडियो या मीडिया औटो-प्ले और औटो डाउनलोड को औफ रखें. ऐसा करने से आपके फोन के बैटरी की क्षमता 5 फीसद तक बढ़ जाएगी.
  • रात के समय फोन इस्तेमाल करते समय अपने फोन के ब्राइटनेस को कम कर लें. ज्यादा ब्राइटनेस की वजह से भी फोन के बैटरी के खपत होने की संभावना ज्यादा होती है.
  • कोशिश करें कि आपका स्मार्टफोन धूप या अन्य किसी वजह से गर्म न हो. फोन गर्म होने की वजह से बैटरी खपत होने की संभावना बढ़ जाती है.
  • अपने स्मार्टफोन को कभी भी फुल चार्ज नहीं करें. फुल चार्ज करने पर बैटरी जल्दी डिस्चार्ज होता है. फोन को 80 प्रतिशत से ज्यादा चार्ज न करें. ज्यादा चार्ज होने की वजह से फोन ओवरहीट हो सकता है, जिसकी वजह से डिस्चार्ज होने की संभावना और बढ़ जाती है.
  • उम्मीद है कि आप इन सुझावों का पालन करके अपने स्मार्टफोन के बैटरी की क्षमता 40 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं.

एटीएम ना हो हैक, इसके लिये आरबीआई ने उठाया बड़ा कदम

भारतीय रिजर्व बैंक ने देशभर के सभी बैंको को Windows XP वाले ATM मशीन हटाने के निर्देश जारी किए हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सभी बैंकों को सितंबर 2019 तक अपने ATM से Windows XP वाले कंप्यूटर हटाने का समय मिला है. इसकी मुख्य वजह साइबर अटैक माना जा रहा है. पिछले साल पुराने औपरेटिंग सिस्टम में वाइरस अटैक की घटना के बाद कई संस्थानों ने अपने पुराने कंप्यूटर बदल लिए हैं और अपने सिस्टम को अपग्रेड कर रहे हैं.

2014 में बंद किया Windows XP का सपोर्ट

Windows XP औपरेटिंग सिस्टम बनाने वाली कंपनी माइक्रोसौफ्ट ने 8 अप्रैल 2014 से ही इसके औफिशियल सपोर्ट और अपडेट बंद कर दिए थे. आपको बता दें कि Windows XP, पर्सनल कंप्यूटर में अब तक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला औपरेटिंग सिस्टम है. आपको यह जानकर हैरानी होगी की यह आउटडेटेड औपरेटिंग सिस्टम देशभर के लगभग सभी ATM में इस्तेमाल होता है.

RBI ने लिया संज्ञान

RBI ने बैंकिंग प्रणाली को किसी भी तरह के साइबर अटैक से बचाने के लिए संज्ञान लेते हुए सभी बैंकों को इस आउटडेटेड औपरेटिंग सिस्टम को अपग्रेड करने का दिशा-निर्देश जारी किया है. RBI ने बैंकों के ढीले रवैये पर आपत्ति जताते हुए नोटिफिकेशन में लिखा कि ATM में पुराने औपरेटिंग सिस्टम की वजह से साइबर हमले का खतरा उत्पन्न हो सकता है, इसलिए सभी बैंक जल्द से जल्द बैंकों और ATM को अपग्रेड करें.

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बैंक और ATM सर्वर को बड़ा खतरा

RBI ने साफ कहा कि, बैंकों और ATM में विंडोज XP के इस्तेमाल से ग्राहकों को अकाउंट हैक होने से लेकर ATM सर्वर हैक होने का खतरा है. यह बैंकों की बड़ी लापरवाही का उदाहरण है. जो औपरेटिंग सिस्टम 4 साल पहले ही बंद हो चुका है, बैंक उसका इस्तेमाल अभी तक कर रहे हैं. इसकी वजह से ग्राहकों के अकाउंट के साथ ही बैंक पर भी साइबर हमले की तलवार लटक रही है. 2014 में ही हमें सूचना मिली थी कि देशभर के 95 फीसद ATM कभी भी हैक हो सकते हैं, क्योंकि वे पुराने विंडोज XP औपरेटिंग सिस्टम पर रन करते हैं, जिसका सपोर्ट और अपडेट माइक्रोसौफ्ट ने बंद कर दिया है.

बैंकों पर हो सकती है कारवाई

RBI ने साफ किया है कि बैंकों की यह बड़ी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी. सभी बैंक सितंबर 2019 तक अपने ATM सिस्टम को अपग्रेड कर लें. अगर कोई बैंक तय समय-सीमा में ATM को अपग्रेड नहीं करता है तो उसके खिलाफ बैंकिंग रेग्युलेशन एक्ट 1949 या पेमेंट और सेटलमेंट सिस्टम एक्ट 2007 के तहत कारवाई की जाएगी. इस नोटिस पर RBI के मुख्य जनरल मैनेजर आर रविकुमार के हस्ताक्षर हैं.

तो इस तरह ‘रेस 3’ ने हिला दी सलमान खान की नींव

अंततः अति खराब फिल्म ‘‘रेस 3’’ बाक्स औफिस पर बुरी तरह से डूब गयी. इसे डूबने से सलमान खान के समर्पित प्रशंसक और ‘ईद’ का अवसर भी न बचा पाया. जब फिल्म ‘रेस 3’ ईद के मौके पर सिनेमा घरों में पहुंची थी, तभी फिल्म आलोचकों ने एक सुर से इस फिल्म के घटिया और बेकार होने की बात कही थी. लेकिन सलमान खान ने ईद के मौके पर अपनी छोली भर लेने की सारी कोशिशें की. यहां तक कि उन्होंने मीडिया में यह खबर भी फैलायी कि उनकी फिल्म बाक्स आफिस पर बहुत अच्छा कमा रही है और सफलता के कई रिकार्ड तोड़ते हुए 300 करोड़ से भी अधिक कमाने वाली है.

मगर अफसोस की बात है कि पहले तीन दिन के बाद ‘ईद’ का खुमार खत्म होते ही ‘रेस 3’ बाक्स आफिस पर औंधे मुंह गिरी. हालात यह रहे कि ‘ईद’ व बासी ईद के दिन जो दर्शक ‘‘रेस 3’’ देखने गए, उन्होंने भी सिनेमाघरों से बाहर निकलते ही अपना दुःख प्रकट किया था.

खैर, सलमान खान की फिल्म ‘‘रेस 3’’ को लोगों ने इस बुरी तरह से नकारा कि पिछले ग्यारह दिन के अंदर यह फिल्म 150 करोड़ का भी आंकड़ा नहीं छू पायी. हालात यह हैं कि सलमान खान के समर्पित प्रशंसकों ने भी फिल्म ‘रेस 3’ देखने के बाद सिर पीटते हुए कहा कि सलमान खान ने उन्हें जरूरत से ज्यादा निराश किया है.

उधर सलमान खान ने अपनी तरफ से तमाम कोशिशें कर मीडिया के कुछ हलकों में इस फिल्म के आंकड़ों को बढ़ा चढ़ा कर पेश कराया. पर वह सच को ज्यादा समय तक दबा नहीं पाए. अब सूत्र बता रहे हैं कि फिल्म ‘‘रेस 3’’ के तमाम वितरकों ने मांग की है कि सलमान खान उनके नुकसान की भरपायी करें. यानी कि जिस तरह से सलमान खान ने फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट’’ के असफल होने पर फिल्म वितरकों को उनके पैसे लौटाए थे, उसी तरह से अब ‘रेस 3’ के असफल होने पर भी उन्हें वितरकों के पैसे लौटाने चाहिए और यदि ऐसा हुआ तो हर वितरक को 18 करोड़ रूपए वापस देने पड़ेंगे.

यदि हम सलमान खान व फिल्म ‘रेस 3’ से जुड़े निर्माता ‘टिप्स’ कंपनी की बात को सच मान लें, तो सलमान खान और टिप्स कंपनी ने तो अपनी जेबें भर ली हैं. क्योंकि इन्होंने अपनी फिल्म की पूरी लागत सेटेलाइट राइट्स बेच कर ही कमा लिए थे. उसके बाद आबू धाबी में शूटिंग करने की वजह से आबू धाबी सरकार की तरफ से उन्हें सब्सिडी के तौर पर 40 करोड़ रूपए मिले. इतना ही नहीं फिल्म ‘रेस 3’ ने मुंबई-महाराष्ट्र, दिल्ली-यूपी में ही ज्यादा कमायी की है, पर इन सभी जगहों पर सलमान खान ने खुद ही वितरक बनकर फिल्म प्रदर्शित की. इस तरह सलमान खान और टिप्स कंपनी ने तो अपने नुकसान की भरपायी कर ली.

पर गुजरात, राजस्थान, बिहार, बंगाल सहित दूसरे क्षेत्रों के वितरकों का क्या होगा? सूत्रों के अनुसार सलमान खान ने फिल्म ‘रेस 3’ को 63 करोड़ रूपए में बेचा है और यह फिल्म अब ज्यादा से ज्यादा हर वितरक को 45 करोड़ ही कमा कर दे सकती है. तो हर वितरक को जो 18 करोड़ का नुकसान हो रहा है, उसकी भरपायी कौन करेगा? यदि सलमान खान ने वितरकों के नुकसान की भरपायी नहीं की, तो उनकी अगली फिल्मों के लिए वितरक मिलने मुश्किल हो जाएंगे.

फिल्म ‘‘रेस 3’’ को सिर्फ बाक्स आफिस पर ही नुकसान नहीं हुआ है. बल्कि इससे सलमान खान की अपनी इमेज को भी धक्का लगा है. पूरे विश्व में सर्वाधिक खराब फिल्मों की सूची में ‘रेस 3’ को रखा जा रहा है. जी हां! ‘इंटरनेट मूवी डेटा बेस’ में फिल्म ‘रेस 3’ सर्वाधिक कम रेटेड फिल्म की सूची में 79 नंबर पर पहुंच गयी है. यानी कि ‘रेस 3’ को ‘हमशकल्स’ व ‘हिम्मतवाला’ से भी बदतर माना जा रहा है.

इतना ही नहीं सलमान खान के जो अब तक समर्पित प्रशंसक रहे हैं, वह भी अब सलमान खान से दूरी बना रहे हैं. इन सलमान खान के प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर मुहिम चलायी है कि अब उन्हें सलमान खान की फिल्म ‘दबंग 3’ नहीं देखनी है. इसके मायने यह हुए कि सलमान खान के प्रशंसकों ने सलमान खान से कह दिया है कि अब वह ‘दबंग 3’ भी ना बनाए. इतना ही नहीं तमाम प्रशंसक सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि वह एक बार रोते धोते ‘ट्यूबलाइट’ देख सकते हैं. पर ‘रेस 3’ नहीं.

सलमान खान के तमाम प्रशंसक तो ‘रेस 3’ जैसी फिल्म के निर्माण से जुड़ने, फिल्म के लिए 3 गीत लखने व गाने के लिए भी सलमान खान की आलोचना कर रहे हैं. सलमान खान के कुछ प्रशंसक सोशल मीडिया पर उन्हें सलाह देते हुए लिख रहे हैं कि सलमान खान को गीत लिखने या गीत गाने से दूरी बनाकर रखनी चाहिए व अपने अभिनय पर ध्यान देना चाहिए.

बौलीवुड के हलकों में भी कई तरह की चर्चाएं गर्म हैं. तमाम लोगों की राय में फिल्म ‘रेस 3’ की असफलता के लिए सिर्फ इसके निर्माता ही नहीं बल्कि सभी कलाकार, लेखक, निर्देशक व पीआर एजेंसी सहित कई लोग दोषी हैं. फिल्म ‘‘रेस 3’’ को प्रमोट करने का जो तरीका अपनाया गया, वह भी गलत रहा.

हाल ही में तमाम असफल फिल्मों को गलत ढंग से प्रचारित करने का आरोप जिस पी आर एजेंसी पर लगता रहा है, उसी ने ही ‘रेस 3’ का भी पी आर किया. अब सूत्र भी कह रहे हैं कि इस पी आर एजेंसी ने फिल्म को प्रमोट करने की कोई सही योजना नहीं बनायी. हालात यह थे कि फिल्म ‘रेस 3’ के सिनेमा घरों में पहुंचने के दस दिन पहले ‘रेस 3’ के सभी कलाकारों को मुंबई के एक स्टूडियो में बुलाकर 25-30 पत्रकारों के ग्रुप में एक के बाद एक इंटरव्यू करवाए गए.

सूत्र बताते हैं कि एक ही दिन में सलमान खान, बौबी देओल, जैकलीन फर्नाडिज, डेजी शाह और निर्देशक रेमोमी डिसूजा के इंटरव्यू हुए थे. सुबह से देर रात तक इंटरव्यू का सिलसिला चला था, पर उसके बाद क्या छपा? इसे जानने का प्रयास निर्माता की तरफ से नहीं हुआ.

बौलीवुड में चर्चा यह भी है कि ‘रेस 3’ के डूबने के साथ ही अब सलमान खान का रेमो डिसूजा पर यकीन उठ गया. अब उन्होंने रेमो डिसूजा के निर्देशन मे उस नृत्य प्रधान फिल्म को न करने का फैसला कर लिया है, जिसका निर्माण भी वह खुद करने वाले थे. अब वह अपनी इस फिल्म के लिए नए निर्देशक की तलाश कर हैं. रेमो डिसूजा मूलतः नृत्य निर्देशक हैं. उनके निर्देशन में बनी नृत्य प्रधान फिल्म ‘एबीसीडी’ ने जरूर सफलता दर्ज करायी थी, लेकिन उसके बाद रेमो ने जितनी फिल्में निर्देशित की, वह सभी बाक्स आफिस पर औंधे मुंह ही गिरती आयी हैं.

बेटे की बीवी पर हुक्म नहीं

‘बेटी और बहू में कोई फर्क नहीं होता. शादी के बाद बेटी घर से विदा होती है तो घर में बहू के रूप में बेटी आ जाती है.’ यह एक आदर्श परिवार की आदर्श सोच है. पर ऐसा कितने घरों में होता है, यह देखने की बात है, क्योंकि जब कोई लड़की किसी घर में बहू बन कर जाती है तो यह पाया गया है कि वहां सासससुर, ननददेवर, जेठजेठानी उस पर हुक्म बजाते नजर आते हैं. गीता के साथ भी ऐसा हुआ. उस की शादी मुकेश के साथ कुछ दिन पहले ही हुई थी. एक शाम को जब मुकेश घर लौटा तो देखा कि गीता का मूड उखड़ा हुआ था.

वजह पूछी तो गीता सुबकने लगी और बताया, ‘‘आज सुबह आप के छोटे भाई को चाय देने में थोड़ी देर हो गई तो सासू मां मुझ पर बरस पड़ीं. उन की देखादेखी देवरजी भी मुझ पर राशनपानी ले कर चढ़ गए. अब बताओ इस में मेरी क्या गलती है?’’ महेश कुढ़ कर रह गया. उस ने गीता को ही समझाने की कोशिश की कि इतनी छोटीछोटी बातों को दिल से मत लगाया करो लेकिन उस ने गीता के इस सवाल को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि घर की बहू पर हर छोटेबड़े का हुक्म चलाना कहां तक जायज है?

महेश का फर्ज बनता था कि देवर के चाय मांगने को ले कर अपनी मां की नाराजगी को उसे हलके में नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यही छोटीछोटी बातें बाद में बड़ी तकरार की वजह बन जाती हैं. अजीब सा लगता है पर बेटे की बीवी पर ससुराल वालों खासकर सास का हुक्म चलने की एक अहम वजह रसोई होती है. यहां वास्तुदोष की बात नहीं हो रही है कि रसोई को किस दिशा में करने से इस तरह के झगड़े नहीं होंगे, बल्कि जब कोई लड़की ब्याह कर अपनी ससुराल आती है तो वह रसोई को अपने तरीके से चलाना चाहती है. अगर कहीं गलती से वह लजीज खाना बनाना जानती है तो सास को लगता है कि गई रसोई हाथ से. इस से वह बहू के खाने में कमी निकालने की कोशिश करती है ताकि उस का मनोबल टूट जाए. जब कभी कोई दूसरा बहू के खाने में कमी बताता है तो सास की पौबारह हो जाती है. वह हुक्म भी ताने देदे कर सुनाती है जिस से शह पा कर देवरननद या कभीकभी तो ससुर भी इस तकरार में शामिल हो जाते हैं.

रसोई से ही एक और चीज जुड़ी होती है, घर का बजट. बजट यानी पैसे का लेनदेन. बेटे की कमाई, जो कल तक मां के हाथ में जा रही होती है, वे बंट जाती है. बहू के हाथ में बेटे की आधी कमाई का जाना सास को अपनी हार लगती है. लिहाजा, वह छोटीछोटी बातों को मुद्दा बनाने लगती है. खुद का बस नहीं चलता तो अपने पति या बेटे के कान भरने लगती है. चूंकि कई घरों में बहू भी कमाती है तो सास को वह अपने से अमीर लगने लगती है. प्रिया एक कंप्यूटर इंजीनियर है. उस का पति राजन भी एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करता है. चूंकि उन की लव मैरिज हुई थी इसलिए राजन ने बिना दहेज के शादी की थी जो उस के मांबाप को रास नहीं आई.

कुछ दिन तो घर का माहौल ठीक रहा पर बाद में प्रिया को लगने लगा कि उस के सासससुर उस पर बेवजह के हुक्म चलाते हैं. एक बार तो हद हो गई. प्रिया दफ्तर से लेट हो गई थी. सास ने ताना दे मारा, ‘‘अगर तुम ही घर देर से लौटोगी तो राजन की शादी से मुझे क्या फायदा हुआ. इस बुढ़ापे में घर का सारा कामकाज मुझे ही देखना पड़ता है. तुम नौकरी छोड़ कर घर बैठो और मुझे मुक्ति दो.’’

प्रिया ने झुंझलाते हुए कहा, ‘‘मांजी, आज मैं पहली बार लेट हुई हूं और आप ने यह तुगलकी फरमान सुना दिया. अगर आप से घर का काम नहीं होता तो मैं एक नौकरानी लगा देती हूं जो आप का हाथ बंटा दिया करेगी.’’ इतना सुनते ही सास बिफर पड़ी, ‘‘अब कल की आई लड़की हमें समझाएगी कि इस घर में कौन क्या काम करेगा. घर में बैठ नहीं तो अपनी रसोई अलग कर ले.’’

बात आगे न बढ़े इसलिए प्रिया चुप्पी साध गई. राजन के आने पर उन दोनों ने मां से फिर बात की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा. इस के बाद वे दोनों उसी कालोनी में किराए के एक घर में रहने लगे. आज के जमाने में बहू अगर नौकरी नहीं करती है तो इस का मतलब यह कतई नहीं है कि वह पढ़ीलिखी नहीं है या वह अपने मांबाप के घर से कुछ भी सीख कर नहीं आई है. अगर कोई सास या ससुर अपने बच्चों पर हुक्म नहीं चलाते हैं तो उन्हें बेटे की बीवी पर हुक्म चलाने का भी कोई हक नहीं है. इस से परिवार में कलह बढ़ती है जो उसे तोड़ने का काम करती है.

नहीं चाहिए नशेड़ी बालम : देविका ने दिखाई हिम्मत

उत्तर प्रदेश में लखीमपुर के एक गांव में रहने वाली देविका की शादी देवेश से तय हो गई. देवेश सरकारी नौकरी करता था. ऐसे में देविका के घर वालों ने उस की तकरीबन हर डिमांड पूरी की थी. दोनों ने एकदूसरे को देखा था और पसंद भी किया था. सभी को जोड़ी अच्छी लग रही थी.

देविका अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर रही थी. अपने भविष्य को ले कर उस ने सपने देखे थे. शादी के दिन जब फेरे हो रहे थे, उस समय देवेश नशे की हालत में था. उस के पैर लड़खड़ा रहे थे और मुंह से बदबू आ रही थी.

देविका को अच्छा नहीं लगा. उस ने आगे के फेरे लेने बंद कर दिए और अपने परिवार को बुला कर फैसला सुना दिया कि वह नशा करने वाले लड़के के साथ शादी नहीं करेगी.

देविका के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था. घरपरिवार, नातेरिश्तेदार सभी उस को समझाने में लग गए. हर तरह से समझाया पर देविका ने अपने फैसले को बदलना ठीक नहीं समझा.

देविका ने कहा, ‘‘अगर आप लोग नहीं माने तो मैं मुकदमा दर्ज करा दूंगी.’’ देविका के दबाव के आगे सभी को झुकना पड़ा. देवेश को शादी किए बिना ही अपने घर वापस आना पड़ा.

यह घटना एक उदाहरण भर है. ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां लड़की ने शादी करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उस का होने वाला पति नशा करता था.

नशे की लत

गांव में खेतीकिसानी ही अहम पेशा होता है. हाल के कुछ सालों में खेतीकिसानी बेहाल होती जा रही है. गांव के आसपास शहरों का विकास होने लगा है. गांव की जमीन महंगी होती जा रही है. गांव के आसपास सड़क बनने से सरकार गांव से जमीन खरीद कर अच्छाखासा मुआवजा देने लगी है. घर और रिसोर्ट बनाने वाले भी गांवों की जमीन की खरीदारी कर रहे हैं. शहरों में रहने वाले लोग भी गांव की जमीनें खरीदने लगे हैं. ऐसे में गांव के लोगों के पास जमीन बेचने के बाद पैसा आने लगा है. पैसा आने के बाद ये लोग उस का इस्तेमाल ऐशोआराम में करने लगे हैं. ऐेसे में नशे की आदत सब से ज्यादा बढ़ती है.

गांवों में रहने वाले नौजवान उम्र के 90 फीसदी लोग नशे के शिकार हैं. वे शराब, भांग और गांजा समेत तंबाकू का सेवन करने लगे हैं. पढ़नेलिखने से दूर ऐसे बेराजगार नौजवानों से लोग अपनी लड़की की शादी नहीं करना चाहते हैं.

नशे के आदी इन नौजवानों की इमेज बेहद खराब है. लड़कियों को लगता है कि ये लोग शादी के बाद मारपीट और गालीगलौज ज्यादा करते है. ऐसे में इन के पास जमीनजायदाद होते हुए भी लड़कियां शादी के लिए तैयार नहीं होती हैं. कई बार अगर मातापिता के दबाव में लड़की शादी करने को राजी हो भी जाए तो शादी टूट जाती है. नशे और स्वभाव के चलते गंवई लड़के लड़कियों को पसंद नहीं आते. गांव के माहौल में पली लड़कियां तो किसी तरह से अपने को ढाल भी लें पर शहर की रहने वाली लड़की तो कभी भी ऐसा नहीं कर पाती है.

बेरोजगारी से बड़ा दाग

अब लड़कियां लड़कों से ज्यादा पढ़ीलिखी होने लगी हैं. ऐसे में वे लड़कों की बेरोजगारी से तो समझौता कर भी लेती हैं पर नशेड़ी होने की हालत में समझौता करने को तैयार नहीं होती हैं.

कविता नामक लड़की कहती है, ‘‘रोजगार नहीं होगा तो कोई भी धंधा किया जा सकता है. आज गांवों में हर तरह की सुविधा और साधन हो गए हैं पर अगर पति में नशे की लत होगी तो वह हमेशा परेशान करेगा. नशे के लिए पैसा चाहिए. पैसे का इंतजाम करने के लिए वह जमीनजायदाद और गहने तक बेचने की कोशिश करता है. नशे के हावी होने से शादी के बाद की खुशनुमा जिंदगी बरबाद हो जाती है.’’

नशे के शिकार नौजवान उम्र से पहले ही बूढ़े हो जाते हैं. तमाम बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. एक तरफ गरीबी होती है तो दूसरी तरफ पैसा जो पहले नशे पर खर्च होता है और बाद में नशेड़ी के इलाज में. ऐसे में अगर पहले से नशेड़ी लोगों को सबक मिले तो भविष्य में गांव के नौजवान नशे से दूर रहेंगे.

ज्यादातर नौजवानों को नशे की लत आपस के लोगों से ही लगती है. कई बार यह भी होता है कि अगर आप का कोई दुश्मन है तो वह आप के लड़के को नशे की लत लगा देगा, जिस से पूरी पीढ़ी बरबाद हो जाती है.

कई बार नशा करने वाला यह स्वीकार ही नहीं करता कि वह नशा करता है. ऐसे में समस्या को हल करने का कोई जरीया ही नहीं बचता है. गांव में रहने वालों को खुद का भविष्य सुधारना है तो नशे के खिलाफ खड़ा होना होगा.

नशे से बढ़ते हैं घरेलू झगड़े

नौजवान पीढ़ी नशे की सब से ज्यादा शिकार बनती जा रही है. नशे की लत और मात्रा बढ़ती जा रही है. पहले गांव में गिनेचुने लोग ही नशा करते थे, अब आप गिन नहीं सकते कि कितने लोग नशा कर रहे हैं. अपनी मेहनत से कमाया गया पैसा नशे में उड़ा रहे हैं. इस से पैसा और शरीर दोनों खराब हो रहे हैं. गांव में स्कूल के बच्चों से बात करने पर पता चलता है कि पिता बच्चे के स्कूल से ज्यादा अहमियत अपने नशे को देता

है. जिस घर में नशा करने वाले लोग होते हैं वहां लड़ाई जरूर होती है. नशे के खिलाफ सामाजिक जागरूकता बढ़नी चाहिए.

– आईपी सिंह, समाजसेवी टीचर.

बीमारियों की वजह है नशा

पिछले कुछ सालों में कैंसर, टीबी जैसी बीमारियों ने गांवों में तेजी से पैर पसार लिए हैं. हम लखनऊ के मैडिकल कालेज में कैंसर पीडि़त परिवारों की मदद करते समय यह समझ पाते हैं कि हालात बहुत खराब हैं. ऐसी बीमारियां केवल नशा करने वाले को ही नहीं होतीं, बल्कि उस के परिवार में दूसरों को भी होती हैं. परिवार में कोई एक बीमारी का शिकार हो गया तो पूरा परिवार बरबाद हो जाता है.

अगर नशे का विरोध हो और इस को बंद किया जा सके तो समाज और परिवार का बहुत भला हो सकता है. बीमारी के बाद इलाज में लगने वाला पैसा घरपरिवार की खुशहाली में लग सकता है.

– सपना उपाध्याय, ईश्वर चाइल्ड केयर फाउंडेशन

सरकार बनी पंडापुजारी, करवा रही है शादियां

अब तक पंडेपुजारी शादी की तारीख निकालने से ले कर शादी कराने तक का काम करते थे पर अब उत्तर प्रदेश सरकार यह काम कर रही है. शादी की तारीख सरकार के हिसाब से निकलेगी. अगर आप ने अपने पंडित द्वारा निकाले गए मुहूर्त के मुताबिक शादी कर ली तो ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ का लाभ आप को नहीं मिलेगा. आप की अर्जी रद्द कर दी जाएगी. उत्तर प्रदेश सरकार ने हर जिले में तकरीबन 10 हजार शादियां कराने का टारगेट रखा है. पूरे प्रदेश में 75 हजार शादियों के हिसाब से बजट बनाया गया है. ये शादियां नगरनिगम और ब्लौक लैवल पर होंगी.

सामूहिक शादी में सब से पहले आप को समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में जा कर अपने आधारकार्ड और आय प्रमाणपत्र के जरीए अर्जी देनी होगी. अर्जी के बाद अनुदान की प्रक्रिया शुरू होगी. लखनऊ नगरनिगम के पास 28 जोड़ों ने सामूहिक विवाह के लिए अर्जी दी थी. पहले जनवरी महीने में सामूहिक विवाह की तारीख तय हुई. शादी में भी सरकारी लेटलतीफी चलने लगी. सरकार ने बाद में 9 मार्च को सामूहिक विवाह की तरीख तय की. शादी के लिए अर्जी देने वाले 11 जोड़ों ने 9 मार्च का इंतजार नहीं किया. उन सब ने पहले ही शादी कर ली. इन लोगों ने शादी के सरकारी मुहूर्त का इंतजार नहीं किया.

नगर निगम ने ऐसे जोड़ों का नाम ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ से बाहर कर दिया. ऐसे में ये लोग सरकारी विवाह योजना का लाभ नहीं ले पाए.

सरकारी मुहूर्त

‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ में लाभ लेने के लिए शादी करने वाले को अपने पंडित के बताए मुहूर्त पर नहीं सरकारी मुहूर्त के हिसाब से शादी करनी होगी. इस योजना में उन लोगों को ही शामिल किया जा सकेगा, जिस के शहरी परिवार की सालाना आमदनी 54,460 रुपए और गांवदेहात के परिवारों की आमदनी 46,080 रुपए सालाना होगी. आवेदक का खाता नैशनल लैवल के बैंक में होना चाहिए. ‘सामूहिक विवाह योजना’ में रिश्ता घर वालों को खुद तय करना होता है. उस के बाद शादी के लिए अर्जी देनी होगी. सरकार एक तय तारीख पर शादी की योजना तैयार करती है.

‘सामूहिक विवाह योजना’ में सरकार 35 हजार रुपए खर्च करेगी. इस में से 20 हजार रुपए लड़की के खाते में जाते हैं. 10 हजार रुपए का घरेलू सामान और 5 हजार रुपए का टैंट व भोजन में हुए खर्च के लिए दिया जाता है. इस का भुगतान शादी कराने वाली संस्था को किया जाता है. एक बार में जब 10 जोड़ों की एकसाथ शादी होगी, तब उस को ही ‘सामूहिक विवाह योजना’ ही माना जाएगा. उत्तर प्रदेश समाज कल्याण विभाग के डायरैक्टर जगदीश प्रसाद ने कहा, ‘‘हर जिले में 10,000 शादियां कराने का टारगेट रखा गया है. इस की तादाद ज्यादा होने पर भी सरकार मदद करेगी. इस सामूहिक विवाह योजना का मकसद माली तौर से कमजोर परिवारों की लड़कियों की शादी कराना है.’’

इस योजना में सभी धर्मों के लोगों को शामिल किया गया है. लखनऊ में 9 मार्च को ‘सामूहिक विवाह योजना’ के तहत 8 मुसलिम जोड़ों ने भी अपने जीवनसाथी को चुना था.

पूरे उत्तर प्रदेश में चली ‘सामूहिक विवाह योजना’ में भ्रष्टाचार की शिकायतें भी आईं. शादी में दिए जाने वाले गहनों और बरतनों में क्वालिटी का खयाल नहीं रखा गया. ऐसे में घटिया किस्म के बरतन और जेवर दिए गए.

विधवा विवाह में…

विवाह की इस योजना में जहां 35 हजार रुपए खर्च करने हैं, वहीं विधवा और तलाकशुदा मामले में यह खर्च 25 हजार खर्च का ही बजट रखा गया है. विवाह संस्कार के लिए पहली बार वाली शादी में 10,000 रुपए का जरूरी सामान, जिस में कपड़े, बिछिया, चांदी की पायल और 7 बरतन दिए जाते हैं. विधवा और तलाकशुदा में यह सामान 5 हजार का रखा गया है.

इस योजना में शामिल हुए लोगों के लिए जरूरी है कि वे गरीब हों. कन्या के मातापिता उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हों. अभिभावक निराश्रित, निर्धन और जरूरतमंद हों. विवाह का पंजीकरण और विवाह प्रमाणपत्र जारी करने का काम सहायक महानिबंधक स्टांप को करना है. सरकार की योजना में सब से बड़ी खामी यह है कि जहां तलाकशुदा और विधवा विवाह को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है वहीं दूसरी ओर इन को कम मदद दी जा रही है.

शादी में मुहूर्त की अपनी अलग अहमियत होती है. ‘सामूहिक विवाह योजना’ में सरकार एक दिन शादी के लिए तय करती है. ऐसे में कम लोग ही सरकारी मुहूर्त पर शादी करने को तैयार होते हैं. सरकारी सहायता लेने के लिए लोग अपने मुहूर्त के हिसाब से पहले शादी कर लेते हैं. इस के बाद सरकारी सामूहिक शादी योजना में शादी करने चले जाते हैं.

बिचौलियों की चांदी

सरकार का काम शादी कराना नहीं होना चाहिए. शादी योजना के जरीए सरकार पंडों वाला काम कर रही है. सरकार अब अपना दखल परिवारों के अंदर तक बढ़ाना चाहती है जिस से शादी, बच्चे, जन्म, मृत्यु सब पर सरकार का दखल रहे. परोक्ष रूप से पैसा पंडों को मिलता रहे.

इस योजना के जरीए शादी में बिचौलियों का रोल बढ़ रहा है जिस से सरकारी अमले और बिचौलियों की आमदनी शुरू हो रही है.

‘सामूहिक विवाह योजना’ में नाम शामिल कराने के लिए आय प्रमाणपत्र बनवाने से ही सरकारी अमले का शोषण शुरू हो जाता है. आय प्रमाणपत्र बनवाने के लिए तहसील जाना पड़ता है. वहां लेखपाल की रिपोर्ट के बाद आय प्रमाणपत्र मिलता है. इस के लिए पैसा देना पड़ता है. हर जिले में एक सीमित तादाद में शादी के लिए जोड़ों का चयन किया जाता है. ऐसे में अर्जी देने के बाद अपना नाम लिस्ट में शामिल कराना मुश्किल काम होता है. सरकारी अमले के दखल में एक भी काम बिना किसी चढ़ावे के नहीं होता है.

‘सामूहिक विवाह योजना’ में धार्मिक रीतिरिवाजों के मुताबिक शादी होती है. ऐसे में बिना दहेज के होने वाली कोर्ट मैरिज को दरकिनार किया जा रहा है. बेहतर होता कि बिना दहेज और आडंबर के शादी करने वालों को मदद दी जाती. वैसे, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ के जरीए पंडावाद को बढ़ावा दे रही है.

कानून जब गले का फंदा बन जाए

आयरलैंड ने जनमत संग्रह करा कर कैथोलिक कट्टर धार्मिक कानून, जिस के अनुसार गर्भपात कराना पाप है, बदल डाला है. दरअसल, 6 साल पहले सविता हलप्पनवार को अस्पताल में गर्भ के दौरान दाखिल होना पड़ा था और डाक्टरों की राय थी कि केवल गर्भपात के सहारे ही सविता की जान बचाई जा सकती है, पर कानून के कारण उन के हाथ बंधे थे. अदालत ने भी हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कर्नाटक निवासी सविता की धर्म की गला घोट नीति के कारण मौत हो गई. गनीमत है कि उस के बाद वहां मुहिम शुरू हो गई कि कानून बदला जाए और अब जनमत करा कर जनता की राय ली गई. कैथोलिक कट्टरवादियों के विरोध के बावजूद आयरलैंड की जनता ने सविता को सच्ची श्रद्धांजलि दी.

सरकार, समाज और धर्म लोगों के निजी फैसलों में आज भी निरर्थक दखलंदाजी ज्यादा कर रहे हैं. गर्भपात वैसा ही निजी फैसला है जैसा सैक्स करना. विवाह के बाद या बिना विवाह सैक्स संबंध भी पहले धर्म की वजह से कानूनी दायरे में आते थे पर धीरेधीरे स्वतंत्रता के रक्षकों ने उन्हें व्यक्ति की अपनी इच्छा मान लिया है. कोई रात के 4 बजे सोता है या 8 बजे इस पर किसी का नियंत्रण नहीं हो सकता. उस की जो जिम्मेदारियां दूसरों के प्रति हैं, वे अगर पूरी हो रही हैं तो इस पर न किसी को आपत्ति होती है न होनी चाहिए. कुछ आश्रमों व होस्टलों

में इस पर भी आपत्ति होती है, क्योंकि वे अनुशासन के नाम पर असल में व्यक्ति को विवेकशून्य बनाने की कोशिश करते हैं. नाइट आउट का सिद्धांत इसी पर है. यह कहना कि सोने का समय नियत करना जरूरी है ताकि आप स्वस्थ रहें गलत है, क्योंकि यह निर्णय व्यक्ति का अपना है. गर्भपात का निर्णय भी इसी तरह गर्भवती व डाक्टर के बीच का है. इस में कितने सप्ताह बीत गए हैं जैसा कानून भी गलत है जो भारत में आज भी चल रहा है और विशेष अनुमति लेने के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं. इन के पीछे मूल भावना वही है जो आयरलैंड के चर्च ने सरकार के सहारे जनता पर थोप रखी थी कि व्यक्ति नहीं जानता कि उस के हित में क्या है.

यह गुलाम मनोवृत्ति बनाए रखना सरकारों के लिए लाभदायक होता है और वे तरहतरह के नियंत्रण थोपना चाहती हैं. आयरलैंड की जनता ने जनमत संग्रह से एक बात से छुटकारा पाया है पर न जाने अमीर, शिक्षित, समृद्ध देश में और कितने नियंत्रण हैं, जिन्हें लोग आंख मूंद कर मानते चले जा रहे हैं. शायद यह शुरुआत हो कि आम व्यक्ति को अपनी सरकार से आजादी मिलना उतना ही जरूरी है जितना कि दूसरे, विदेशियों की सरकारों से.

अंधविश्वास करे शर्मसार : बाबाओं के फेर में फंसे लोगों की सच्ची कहानियां

शनिवार का दिन था. दोपहर के तकरीबन 2 बजे थे. उत्तर प्रदेश में जौनपुर जिले के शाहगंज कसबे की रहने वाली शीला खरीदारी करने बाजार जा रही थीं. वे अभी घर से कुछ ही दूर गई थीं कि तभी रास्ते में उन्हें 14-15 साल का एक लड़का मिला जिस ने उन्हें ‘माताजी’ कहते हुए पूछा, ‘‘आप लंगड़ा कर क्यों चल रही हैं? क्या आप घुटनों के दर्द से परेशान हैं?’’

उस लड़के के मुंह से इतना सुनना था कि शीला ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा, ‘‘हां बेटा, मैं काफी समय से घुटनों के दर्द से परेशान हूं. मेरे पति को भी इसी मर्ज ने जकड़ रखा है. वे तो खाट पर पड़े हुए हैं. उन को कहांकहां नहीं दिखाया लेकिन तमाम इलाज कराने के बाद भी मर्ज बढ़ता ही जा रहा है. समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे ठीक होगा…’’

शीला की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी कि वह लड़का बोल पड़ा, ‘‘माताजी, मेरे मातापिता भी इसी तरह परेशान हुआ करते थे जिन्हें एक बाबाजी ने चंद दिनों में ही भलाचंगा कर दिया…’’

उस लड़के की बात अभी खत्म भी नहीं हो पाई थी कि एक आदमी उन्हीं की ओर आता दिखाई दिया. उस की ओर इशारा करते हुए वह लड़का बोला, ‘‘लीजिए, बाबाजी भी आ गए. मैं आप से इन्हीं की बातें कर रहा था.’’

तब तक वह आदमी भी उन के करीब आ चुका था. उस लड़के ने हाथ जोड़ कर उसे प्रणाम किया और देखते ही देखते वहां से गायब हो गया.

ऐसे फंसती चली गईं शीला

शीला ने उस आदमी की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘हमें भी कुछ उपाय बताएं, ताकि मैं और मेरे पति इस दर्द से छुटकारा पा लें.’’

शीला की बात सुन कर वह आदमी तपाक से बोला, ‘‘यह दर्द कोई मर्ज नहीं बल्कि शनिदेव का प्रकोप है जिस ने आप के पूरे परिवार को जकड़ रखा है. इस पर दवा और डाक्टर का कोई असर नहीं होने वाला है. इस से छुटकारा पाने का एक ही रास्ता है कि सोने के गहनों से शनिदेव की पूजा कर के इस बला से बचो.’’

उस आदमी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अगर आप इस बाधा से अभी और हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती हैं तो सिर्फ सोने के जेवर ले कर आएं…’’

उस आदमी ने जेवर लाने की विधि बताई और बोला, ‘‘यह काम सूरज डूबने से पहले करना होगा. और हां, इस बात का खयाल रखना कि इस बीच कोई आप को टोके नहीं, वरना आप का बुरा हो जाएगा.’’

अपने शब्दों के जरीए उस आदमी ने शीला को इस कदर भरमजाल में जकड़ लिया था कि वे उस पर यकीन करती चली गईं. वे बाजार जाने के बजाय सीधे घर गईं और अपने गहनों के साथ तीनों बेटियों के भी गहनों को एक पोटली में ले कर उस आदमी द्वारा बताई गई जगह पर पहुंच गईं.

वहां वह आदमी पहले से ही बैठा हुआ था. उस के आसपास 2-4 और लोग भी बैठे हुए थे. 2 औरतें भी बैठी हुई थीं. बगल में हवन वगैरह का सामान रखा हुआ था.

वहां पहुंच कर शीला ने अपने साथ लाए जेवर, जिन में सोने का एक हार, सोने की 4 चेन, सोने की  6 अंगूठियां, 2 झाले, 2 मांग टीके, 2 कंगन, 2 झुमके, एक नैकलैस वगैरह जिन की कीमत तकरीबन 7 लाख रुपए थी, उस आदमी को सौंप कर उसी के बगल में बैठ गईं.

शीला के हाथों से पोटली अपने हाथों में लेने के बाद वह आदमी उन्हें सामने बैठने के साथ आंखों को बंद कर ध्यान लगाने की बोल गया.

आंखें मूंद कर बैठने के बाद शीला को एक मंत्र भी पढ़ने के लिए कह गया और वह आदमी खुद भी मंत्र पढ़ने लगा.

मंत्र पढ़ने के साथ उस आदमी ने शीला की पोटली से गहने निकाल कर अपनी झोली में डाल दिए और एक डब्बे में मिट्टी वगैरह भर कर उसे धागे से बांध दिया और शीला को आंखें खोलने की बोल कर उन्हें वह डब्बा पकड़ाते हुए बोला, ‘‘अब आप घर जाएं और इस डब्बे को सोमवार की सुबह सूरज की किरणें निकलने से पहले थाली में फूल रख कर मेरे बताए सिद्ध मंत्र को पढ़ने के साथ खोलिएगा.’’

उस आदमी ने अगले हफ्ते उन के घर आने की कहते हुए अपनी बात पूरी की. शीला को पूरी तरह से भरोसा हो चला था कि अब उन को दर्द से छुटकारा मिलने वाला है.

हासिल हुआ पछतावा

यह अंधविश्वास शीला के लिए घातक साबित होने के लिए काफी था. उस आदमी ने उन्हें चेता रखा था कि उस के द्वारा बताए गए पूजापाठ में वे किसी को हमराज नहीं बनाएंगी वरना दुखों से छुटकारा नहीं मिलेगा.

डरीसहमी शीला ने भी कुछ ऐसा ही किया. सोमवार की सुबह उन्होंने गहनों से भरा डब्बा खोला तो उन के पैरों तले जमीन खिसक गई. डब्बे में गहनों की जगह मिट्टी वगैरह थी.

लाखों रुपए के गहनों को लुटा बैठने के बाद शीला को दर्द से छुटकारा तो क्या मिला उन की परेशानियां और बढ़ गईं. मारे शर्म के वे किसी से कुछ कह भी नहीं पा रही थीं.

देश में आज भी ऐसे लोगों की भरमार है जो अंधविश्वास जैसी अधकचरी बातों पर भरोसा करते चले आ रहे हैं. शीला जिस लड़के और उस के द्वारा बताए गए शख्स को जानती तक नहीं थीं, उन की बातों में आ कर वे परिवार वालों को बताए बगैर घर के 7 लाख रुपए के जेवरात को लुटा बैठीं.

औरतों को जागरूक कर रही बांदा की समाजसेविका छाया सिंह कहती हैं,

‘‘जब तक औरतें अधकचरी जानकारी से बाहर निकलते हुए खुद जागरूक होने और परिवार को जागरूक करने का काम नहीं करेंगी तब तक समाज में उन्हें बराबरी का हिस्सा मिलने वाला नहीं है.

‘‘बाबाओं के अलावा सड़कछाप चोलाधारियों की शरण में जाने और उन की अधकचरी बातों में आने से नुकसान ही होता है. ऐसे में लोगों को बेखौफ हो कर ऐसे मामलों की पुलिस को सूचना देनी चाहिए.’’

* ऐसे लोगों के चक्कर में पड़े ही नहीं.

परिवार के लोगों को पूरी बात बताएं.

* ऐसे मामलों में बिना देर किए पुलिस को सूचना दें, ताकि कार्यवाही हो सके.

* परेशानी, बीमारी की हालत में माहिर डाक्टर की सलाह लें न कि ऐसे बाबाओं और फकीरों की जो आप को लूट कर चलते बनें.

* एक डाक्टर के बताए इलाज से आराम न मिले तो दूसरे को दिखाएं. देश में माहिर डाक्टरों की कमी नहीं है.

पुराने हथियारों को मौडर्न बनाने का खेल

बिहार में हथियारों के शौकीनों का एक नया गैरकानूनी शौक सामने आया है. वे लाइसैंसी हथियारों के डिजाइन में फेरबदल कर उसे नया रूप देने लगे हैं. यह एक महज शौक नहीं बल्कि रुपए कमाने का नया तरीका भी बन चुका है.

गृह विभाग का मानना है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान जब्त हथियारों को देखने के बाद यह पता चला है कि हथियारों में फेरबदल करने का शौक खतरनाक हद तक बढ़ चुका है.

30 मार्च, 2018 को पटना के ऐक्जीबिशन रोड चौराहे के पास पकड़े गए लोगों के पास से 10 हथियार बरामद किए गए. इन में से 3 हथियारों के मूल डिजाइन को बदल दिया गया था.

तड़के सुबह साढ़े 3 बजे गाडि़यों की चैकिंग के दौरान पुलिस ने एक गाड़ी से इन हथियारों को बरामद किया. इन में .315 की 5 राइफलें, 12 बोर की 2 एसबीबीएल राइफलें और 12 बोर की 3 डीबीबीएल राइफलें थीं.

मामले की छानबीन करने वाले डीएसपी एसए हाशिमी ने बताया कि लाइसैंसी हथियारों के डिजाइन में किसी भी तरह का बदलाव करना गैरकानूनी है जबकि कई लोग पुराने हथियारों को नया रंगरूप दे कर रोब गांठते हैं.

सब से ज्यादा .315 बोर की राइफल के मूल डिजाइन में बदलाव करने का मामला देखने को मिला है. यह राइफल मूल रूप से और्डिनैंस फैक्टरी में बनाई जाती है और इस की एक ही डिजाइन मार्केट में है.

इस मौडल की राइफल में पूरा बट लकड़ी का होता है. कुछ लोग लकड़ी के बट को हटा कर छोटा बट लगा देते हैं. इस से राइफल का साइज छोटा हो कर एके-47 जैसा लगने लगता है. बट को बदलवाने में ढाई हजार रुपए और उस में दूरबीन लगवाने के लिए 15 हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं.

आर्म्स ऐक्ट-1959 कहता है कि किसी भी हथियार के मूल डिजाइन में किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता है. इस से हथियार गैरकानूनी हो जाता है. ऐसे हथियारों को पुलिस जब्त कर सकती है और आरोपी को 7 साल की कैद हो सकती है.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक कानपुर के स्टैंड रोड पर पुराने हथियारों को नया डिजाइन और लुक देने का काम धड़ल्ले से होता है. इस के अलावा बिहार की राजधानी पटना के अलावा मुंगेर, गया, भागलपुर, बेतिया, मुजफ्फरपुर वगैरह जिलों में भी हथियारों को नया रंगरूप देने का धंधा खूब फलफूल रहा है.

इस मामले में गिरफ्तार किए गए 13 लोगों से जब पुलिस ने पूछताछ की तो हथियारों और सिक्योरिटी एजेंसी चलाने वालों के एक नए ही खेल का खुलासा हुआ है. बाजार में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ एजेंसियां कई तरह के गैरकानूनी काम करती हैं. इन में पुराने हथियारों के मूल डिजाइन में बदलाव कर उन्हें मौडर्न लुक देने का खेल धड़ल्ले से चलाया जाता है.

मौडर्न हथियारों के नाम पर कंपनी के गार्ड को अच्छीखासी रकम मिलने लगती है. साधारण राइफल वाले गार्ड मुहैया कराने के लिए जहां एजेंसी 12 से 15 हजार रुपए वसूलती है, वहीं मौडर्न हथियारों से लैस गार्ड मुहैया कराने के नाम पर 20 से 30 हजार रुपए तक की वसूली की जाती है.

वैसे, एजेंसी संचालक गार्ड को तनख्वाह के नाम पर महज 8 से 10 हजार रुपए ही देती है, बाकी रकम एजेंसी की जेब में जाती है.

गांधी मैदान थानाध्यक्ष दीपक कुमार ने बताया कि गिरफ्तार गार्डों से पूछताछ के बाद यह भी खुलासा हुआ कि सिक्योरिटी एजेंसियां जमीन विवाद को निबटाने का भी ठेका लेती हैं. किसी जमीन पर विवाद के निबटारे के लिए कोई जमीन मालिक किसी सिक्योरिटी एजेंसी से संपर्क करता है तो संचालक उस से मोटी रकम ले कर 15-20 हथियारबंद गार्डों को मौके पर भेज देता है और ताबड़तोड़ आसमानी फायर कर के जमीन पर दावा करने वालों को डराधमका कर भगा देता है, जबकि ऐसा करना पूरी तरह से गैरकानूनी है.

इस के अलावा बड़ी शादियों या बड़ी पार्टियों में मौडर्न हथियारों से लैस गार्डों को बुलाना हाईप्रोफाइल लोगों का शगल बन गया है. पार्टियों में गार्डों से अंधाधुंध आसमानी फायर करवा कर आसपास के लोगों और अपने परिवार वालों के बीच रोब गांठने का काम किया जाता है. इस के लिए भी सिक्योरिटी एजेंसियां मोटी रकम वसूलती हैं.

सरकारी बंदूक का गैरकानूनी इस्तेमाल

प्रदेश के कई इलाकों में सरकारी हथियारों को भाड़े पर अपराधियों को दे कर मोटी कमाई की जाती है. पटना से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर मनेर के दियारा इलाके की एक बड़ी खासीयत यह है कि वहां के तकरीबन हर घर में एक फौजी है. फौज में रहने के दौरान उन की पोस्टिंग जब जम्मूकश्मीर में होती है तो वे वहां अपने नाम से राइफल या बंदूक का लाइसैंस जारी करवा लेते हैं. हथियार ले कर वे बड़ी आसानी से अपने गांव आ जाते हैं और इस की सूचना वे लोकल थाने में नहीं देते हैं.

बालू के गैरकानूनी खनन में लगे अपराधी गिरोहों को वे 3 हजार के मासिक किराए पर हथियार दे देते हैं. बालू घाटों पर कब्जा करने में ज्यादातर ऐसे ही हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है. पुलिस का कहना है कि जम्मूकश्मीर में जारी हथियारों के लाइसैंस का बगैर बिहार में ऐंट्री कराए इस्तेमाल करना गैरकानूनी है. इस के बाद भी पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाती है.

वाचमैन के लिए घूस 5,00,000 … यह तो बेकारी की हद है

अपनी लच्छेदार बातों और जुमलेबाजी से लोगों को सब्जबाग दिखाते रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोजगार के मोरचे पर कितने नाकाम साबित हुए हैं, यह बात अब किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई है. उन के 4 साल के राज में बेरोजगारों की फौज में नौजवानों की तादाद 15 करोड़ का आंकड़ा छू रही है.

बढ़ती बेरोजगारी और बेकारी के इस दौर ने एक और नई बीमारी को जन्म दिया है कि जिस दाम पर भी मिले नौकरी खरीद लो. इस की एक मिसाल 31 मार्च, 2018 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में दिखी थी. इस दिन मुखबिरी की बिना पर ग्वालियर पुलिस ने शहर के पड़ाव इलाके के एक नामी होटल सिद्धार्थ पैलेस पर छापा मारते हुए तकरीबन 50 लड़कों को गिरफ्तार किया था. इन सभी की उम्र 25 साल से कम थी.

1 अप्रैल, 2018 को एफसीआई यानी फूड कारपोरेशन औफ इंडिया के वाचमैन पदों के लिए लिखित परीक्षा होनी थी. 271 पदों के लिए एक लाख से भी ज्यादा बेरोजगार नौजवानों ने इस पद के लिए फार्म भरे थे. यह परीक्षा अलगअलग राज्यों में अलगअलग तारीखों पर हो रही थी.

इतनी ज्यादा तादाद में अगर नौजवान वाचमैन जैसी छोटी नौकरी के लिए लाइन में लगे थे तो साफ दिख रहा है कि बेरोजगारी की जमीनी हकीकत क्या है. एक वक्त में वाचमैन के इसी पद के लिए न केवल एफसीआई बल्कि केंद्र सरकार की दूसरी एजेंसियां भी उम्मीदवारों के लिए तरस जाती थीं.

एक पद के मुकाबले 3 उम्मीदवारों का आना भी बड़ी बात समझी जाती थी. लिहाजा, मुंहजबानी इंटरव्यू, तालीम और कदकाठी देख कर ही उम्मीदवारों को नौकरी पर रख लिया जाता था.

पर अब हालात उलट हैं. उम्मीदवारों के हुजूम में से काबिल उम्मीदवारों को छांटने के लिए लिखित परीक्षा ली जाने लगी है जो कतई हर्ज की बात नहीं है. हर्ज की बात है इस परीक्षा के पेपरों की बिक्री और सौदेबाजी होना जिस से वे लोग नौकरी झटक ले जाते हैं जिन की जेब में पैसा होता है.

ग्वालियर शहर में पुलिस ने 48 उम्मीदवारों और 2 दलालों को दबोचा था जो दूसरे दिन होने वाली परीक्षा के प्रश्नपत्र हल करवा रहे थे. पकड़े गए उम्मीदवारों ने यह खुलासा किया था कि उन्होंने पेपर के लिए 5-5 लाख रुपए में सौदा किया था और बेचने वालों को 50-50 हजार रुपए एडवांस में भी दे दिए थे. बाकी बची रकम नौकरी मिलने के बाद देना तय हुई थी.

उम्मीदवार इस से मुकर न जाएं इसलिए दलालों ने उन के आधारकार्ड और मार्कशीटों की मूल प्रतियां अपने पास रख ली थीं.

हरीश और अभिषेक कुमार नामक जो दलाल पकड़े गए उन्हें प्रश्नपत्र मुहैया कराने वाले दिल्ली के मास्टरमाइंड किशोर कुमार ने 30-30 हजार रुपए दिए थे. धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के इस एक और उजागर मामले में गिरोह ने सौदा तो 135 लोगों से किया था.

पकड़े गए महज 48 लोग तो सहज समझा जा सकता है कि दूसरे शहरों में कइयों ने यह पेपर खरीदा था पर कानून के बहुत लंबे हाथों की पकड़ से वे बाहर हैं. एफसीआई भी इस घोटाले पर लीपापोती करने में जुटी हुई है.

बदला कुछ खास नहीं

48 उम्मीदवारों में से 35 अकेले बिहार के और 13 दूसरे राज्यों के थे. जब उन्हें होटल से पकड़ा गया तो उन के पास कुछ खास सामान नहीं था. मसलन, न सूटकेस, न ब्रांडेड कपड़े और न ही वे नाइट डै्रस पहने हुए थे. नकल की सहूलियत के लिए गिरोह ने पूरा होटल ही बुक करा रखा था.

दरअसल, उन में से ज्यादातर उम्मीदवार छोटी जाति के और मामूली खातेपीते घरों के थे जिन्होंने पक्की सरकारी नौकरी के लालच में 5 लाख रुपए का दांव खेलना घाटे का सौदा नहीं समझा था. पहले भी छोटी जाति और गरीब तबके के ही लोग वाचमैन यानी चौकीदार की नौकरी करते थे और आज भी करते हैं. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब उन्हें भी लाखों रुपए की घूस देनी पड़ रही है.

जिंदगी का गुणाभाग

ऐसा भी नहीं है कि इन 48 या इन जैसे लाखों उम्मीदवारों के पास 5 लाख रुपए जैसी गैरमामूली रकम जमा होती है, बल्कि नौकरी के लालच में इस पैसे का जुगाड़ इन्हें तरहतरह से करना पड़ता है. कोई घर की औरतों के गहने बेचता है तो कई जमीन तक बेच देते हैं.

वाचमैन पद का पे स्केल 8100 रुपए  है यानी शुरुआत में ही उसे महंगाई और दूसरे भत्तों समेत तकरीबन 20 हजार रुपए महीने मिलते हैं.

लालच या सुकून देने वाली बात यह भी रहती है कि हर 6 महीने में महंगाई भत्ता बढ़ता है यानी एक साल में पगार में तकरीबन 900 रुपए का इजाफा होता है.

वक्त गुजरते 5-6 साल में 30 हजार रुपए महीना तक हो जाती है. इतमीनान की एक और बात सरकारी नौकरियों में दूसरी सहूलियतों का मिलना भी रहती है.

मिसाल एफसीआई की ही लें तो वाचमैन को भी रहने के लिए घर या इस का भत्ता मिलता है और इलाज के लिए भी पैसा मिलता है.

एफसीआई भोपाल के एमपी नगर जोन 2 के दफ्तर में काम कर रही 56 साला एक वाचमैन का कहना है कि उसे 28 साल पहले महज 4 हजार रुपए पगार मिलती थी जो अब बढ़तेबढ़ते 56 हजार रुपए हो गई है. इतनी तगड़ी पगार नए क्लर्कों और अफसरों को भी शुरू में नहीं मिलती.

इस वाचमैन के मुताबिक, हर साल पगार इन्क्रीमैंट के जरीए भी बढ़ती है और बोनस भी मिलता है. तकरीबन 30 छुट्टियां सीएल और ईएल की शक्ल में भी मिलती हैं.

इस वाचमैन के भविष्य निधि खाते में 18 लाख रुपए जमा हो चुके हैं जो रिटायरमैंट होतेहोते 20 लाख रुपए से भी ज्यादा हो जाएंगे. इस के बाद पैंशन मिलेगी सो अलग.

सरकारी नौकरी के फायदे गिनाते हुए इस वाचमैन ने एक दिलचस्प दलील यह भी दी कि अगर वह प्राइवेट नौकरी में होता तो पगार किसी भी सूरत में 15 हजार रुपए से ज्यादा नहीं होती. उस पर भी कभी भी नौकरी से हटाए जाने का डर बना रहता और बुढ़ापा फाका करते काटना पड़ता.

इस लिहाज से 48 उम्मीदवारों ने गलत हिसाबकिताब नहीं लगाया था कि नौकरी खरीदने के लिए दिया गया पैसा 2 साल में ही वसूल हो जाएगा इसलिए सरकारी नौकरी जो एक बेफिक्र व महफूज जिंदगी की गारंटी होती है जिस को हासिल करने के लिए अगर खुद को भी बेचना पड़े तो भी सौदा घाटे का नहीं.

इन्हीं वजहों के चलते अब सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी बढ़ रही है तो बात महज इस लिहाज से चिंता की है कि ये बिकने लगी हैं यानी बेरोजगारी के साथसाथ भ्रष्टाचार भी बढ़ रहा है.

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