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हकीकत : मुनाफे की हवस में मरते मजदूर

दिल्ली देश की राजधानी है जहां पर देश के नियमकानून बनाने वाले और उन को लागू कराने वाले रहते हैं. देश के दूसरे हिस्सों में यह समझा जाता है कि दिल्ली में कानून व्यवस्था के हालात बेहतर हैं. पर कुछ घटनाओं पर हम नजर डालें तो यह सब खयाली पुलाव ही लगता है.

दिल्ली में आएदिन होती लूट और बलात्कार की घटनाएं तो रोजमर्रा की बात बन चुकी हैं, मुनाफे की हवस के चलते मजदूरों की आग में जल कर मरने की घटनाएं भी तेजी से बढ़ती जा रही हैं.

इन दोनों घटनाओं में यह भी एक फर्क है कि जहां पर लूट (सड़क पर छीन लेना या घर में घुस कर डकैती करना) पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गई समस्या है, वहीं बलात्कार पूंजीवादी व बाजारवादी संस्कृति की देन है. मजदूरों का फैक्टरी में आग में जल कर मर जाना पूंजीवादी मुनाफे की हवस का नतीजा है.

9 अप्रैल, 2018 को सुलतानपुरी के राज पार्क में 4 मजदूर जल कर मर गए. सुलतानपुरी का यह इलाका एक मिडिल क्लास रिहाइशी इलाका है जहां पर तकरीबन 500 घर हैं. इन में से 100 से भी ज्यादा घरों में जूतेचप्पल, सिलाई और दूसरे कामों की फैक्टरियां चलती

हैं. इन में से ज्यादातर फैक्टरियों में जूतेचप्पल का काम होता है जिन में पेस्टिंग से ले कर सिलाई तक का काम होता है.

यहां पर काम करने वाले मजदूरों से न्यूनतम मजदूरी के आधे में 10 से 12 घंटे काम कराया जाता है. यहां पर ज्यादातर मजदूर पीस रेट या 5-7 हजार रुपए प्रति महीने पर काम करते हैं. मजदूरों को लालच दिया जाता है कि उन्हें रहने की जगह दी जाएगी.

शहर में रहने की समस्या से जूझ रहे मजदूरों के लिए रहने की जगह मिलना बहुत बड़ी राहत जैसी होती है जिस के चलते वे कम पैसे में भी काम करने को राजी हो जाते हैं.

मालिकों के लिए यह सोने पे सुहागा जैसे हो जाता है. उन को 24 घंटे का मुफ्त में मजदूर मिल जाता है जो किसी भी समय फैक्टरी में लोडिंग, अनलोडिंग, चौकीदार का काम करता है. इस के बदले इन को छत पर एक कमरा मिल जाता है जिस में 8 से 10 लोग रहते हैं और बनातेखाते हैं.

मालिक घर जाते समय फैक्टरी में बाहर से ताला लगा देते हैं. इस की 2 वजहें हैं. एक तो यह कि नए मजदूर कहीं काम अच्छा नहीं लगने के चलते भाग न जाएं, दूसरा यह कि मजदूर रात में चोरी न कर लें.

10 अप्रैल को सुलतानपुरी के राज पार्क में बने ए-197 मकान, जहां पर एक दिन पहले आग लगी थी की गली में सन्नाटा था. ए-197 के बगल वाले घर के सामने प्लास्टिक की 3-4 कुरसियां रखी थीं और गली के एक मुहाने पर कुछ लोग आपस में बातचीत कर रहे थे.

ए-197 मकान को देख कर पूछने की जरूरत नहीं थी कि इसी फैक्टरी ने एक दिन पहले 4 जिंदगियों को निगल लिया था. यह मकान चारमंजिला था. नीचे वाली मंजिल पर एक 4 फुट का गेट था. इस के अलावा ऊपर 2 रोशनदान लगे थे जो आग लगने से काले हो चुके थे.

लोगों ने बताया कि यह फैक्टरी बृजेश गुप्ता की है जो ए-83 में रहते हैं. ए-197 में चप्पल बनाने का काम होता है जिस में तकरीबन 30-35 मजदूर काम किया करते थे.

इस इलाके में रविवार को छुट्टी का दिन होता है लेकिन बहुत सी कंपनियों में काम होता है.

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एक बड़े अखबार में छपी खबर के मुताबिक कारखाने में काम करने वाले मोहम्मद अली ने बताया कि यह फैक्टरी 15 सालों से चल रही थी और 8-9 अप्रैल की रात 2 बजे तक मजदूरों ने काम किया था. 9 तारीख की सुबह उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के अस्मदा गांव के मजदूर परिवारों के लिए बुरी खबर ले कर आई.

अस्मदा गांव के रहने वाले 18 साला मोहम्मद वारिस, 17 साला मोहम्मद अय्यूब, 20 साला मोहम्मद राजी व 17 साला मोहम्मद शान 10 तारीख की सुबह नहीं देख पाए और जल कर फैक्टरी के अंदर ही मर गए. कई लोग जान बचाने के लिए छत से कूदे जिस में उन को चोटें लगीं.

मोहम्मद वारिस और मोहम्मद अय्यूब दोनों सगे भाई थे जबकि मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान चचेरे भाई थे.

सुलतानपुरी में आग लगने की यह कोई पहली घटना नहीं है. इस से पहले भी कई फैक्टरियों में आग लग चुकी है लेकिन कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हो पाने के चलते खबर नहीं बन सकी.

आसपास के लोगों के मुताबिक, इस फैक्टरी में सुबह के 6.30 बजे आग लगी. दमकल महकमे और पुलिस को सूचना 6.35 पर मिल चुकी थी.

लोगों का कहना है कि महल्ले के काफी लोग इकट्ठा हो गए थे, लेकिन बिजली कटी नहीं थी इसलिए लोगों ने आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं की.

दमकल की दर्जनों गाडि़यों ने मिल कर तकरीबन 2 घंटे में आग पर काबू पा लिया. आग की चपेट में आए लोगों को संजय गांधी अस्पताल पहुंचाया गया, जिस में से 4 लोगों को डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया.

जनवरी, 2018 में ही बवाना के सैक्टर 5 में आग लगने से 17 मजदूरों की जान चली गई थी. इस घटना में भी कहा जाता है कि काफी तादाद में मजदूरों की मौत हुई, लेकिन फैक्टरी में जो मजदूर रहते थे उन का पता नहीं चल पाया.

इस से पहले पीरागढ़ी, मंडोली, शादीपुर, शाहपुर जाट वगैरह जगहों पर दर्जनों मजदूरों की जानें जा चुकी हैं.

बवाना, सुलतानपुरी, नरेला के बाद नवादा की क्रौकरी फैक्टरी में लगी आग ने 3 मजदूरों को निगल लिया है और 4 मजदूर लापता हैं. मालिक बाहर से ताला लगा कर काम करा रहे थे और दिल्ली व केंद्र सरकार सो रही थी.

सुलतानपुरी जैसे रिहायशी इलाके में इस तरह की घटना होती है तो किसी भी तरह के मजदूर से मिल कर कुछ पता करना तकरीबन नामुमकिन बात होती है.

राज पार्क में जाने पर वही लोग मिलते हैं जो आसपास फैक्टरियों के मालिक हैं. ये मालिक हर आनेजाने वाले बाहरी शख्स पर निगाह रख रहे होते हैं और अपनी बात सुनाते हैं कि मालिक की किस्मत खराब थी, जो वे फंस गए.

मीडिया वाले गलत बयान छाप देते हैं जैसे लड़के तो काम ही नहीं करते थे, वे तो घूमने आए थे, बाहर से कोई ताला बंद नहीं रहता था वगैरह. जब तक कोई बाहरी शख्स उस इलाके में रहता है ये लोग नजर बनाए रखते हैं कि वह कहां जा रहा है, किस से बात कर रहा है.

पास में खड़े एक आदमी ने इस मुद्दे को अलग रूप देने के लिए कहा कि हिंदुस्तान एक नहीं हो रहा है लेकिन सऊदी अरब एक करना चाहता है. उस आदमी का इशारा हिंदूमुसलिम मुद्दा उठाने का था.

इस से हम जान सकते हैं कि इस तरह की सोच रखने वाले शख्स मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान की मौत पर किस तरह सोचते होंगे?

गांधी नगर रेडीमेड कपड़ों का जानामाना बाजार है. इस बाजार में खबरें एक कोने से दूसरे कोने तक नहीं पहुंच पाती हैं. 22-23 अप्रैल, 2018 की रात में लगी आग और 2 लोगों की मौत का पता तो बहुत लोगों को नहीं था कि यहां  पर आग भी लगी है.

कुछ लोगों को मीडिया से पता भी चला तो उन को यह मालूम नहीं था कि आग किधर लगी है और कितना नुकसान हुआ है. काफी लोगों से पूछने के बाद एक नौजवान ने बताया कि गुरुद्वारे वाली गली की तरफ आग लगी है.

गुरुद्वारे वाली गली में जाने के बाद एक जूस विक्रेता ने एक गली की तरफ इशारा करते हुए बताया कि उस घर में आग लगी है.

मकान नंबर 2490 का तो माहौल देख कर लग ही नहीं रहा था कि इसी मकान में 2 दिन पहले 2 लोगों की जिंदगी खत्म हो चुकी है. उस घर को देखने पर आग लगने का पता जरूर चल रहा था. बाकी सबकुछ सामान्य सा लग रहा था.

इस मकान के बगल में एक औरत ने बताया कि यहां पर 2-4 घर छोड़ कर हर घर में फैक्टरी व गोदाम हैं. 2490 नंबर मकान भी एक संकरी गली में है, जिस में चारपहिया वाहन भी मुश्किल से जा सकता है. यह मकान चारमंजिला है, जिस की 3 मंजिलों में फैक्टरी चलती है. सब से ऊपर वाली मंजिल पर मकान मालिक खुद रहते हैं.

इन इलाकों में श्रम कानून का पालन नहीं हो रहा है. मजदूरों को 8-10 हजार रुपए प्रति महीने दे कर काम कराया जाता है.

साप्ताहिक छुट्टी के अलावा और कोई छुट्टी नहीं दी जाती है. यहां तक कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी इस मकान को जांच के लिए सीलबंद करना उचित नहीं समझा गया. इस इलाके में चलने वाली हर फैक्टरी में रिहायश भी है, जो कभी भी दुर्घटना की एक बड़ी वजह बन सकती है.

किसी भी फैक्टरी में सुरक्षा मानकों का ध्यान नहीं रखा गया है. यहां तक कि इन मकानों के अंदर एक ही दरवाजा होता है और आग से बचाव के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है.

दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर रिहायशी इलाकों में फैक्टरियां चल रही हैं जहां पर मालिक मनमाने तरीके से काम करते हैं और किसी तरह के श्रम कानून को लागू नहीं करते हैं.

दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार, दिल्ली नगरनिगम, प्रशासन चुप बैठे हुए हैं. क्या इस तरह की घटना प्रशासन और सरकार की मिलीभगत के बिना हो सकती है? इस तरह की घटना होने के बाद केवल मुआवजा दे कर सरकार अपनी जिम्मेदारी को पूरा होना मान लेती है.

क्या मुआवजा देने से ही मोहम्मद वारिस, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद राजी व मोहम्मद शान जैसे लाखों मजदूरों को इंसाफ मिल पाएगा? सरकारें कब तक ऐसी फैक्टरियों को चलते रहने देंगी, जो श्रम कानूनों को ताक पर रख कर चल रही हैं? कब तक मजदूरों की आवास की मांग को श्रम कानून में एक अधिकार

के रूप में जोड़ा जाएगा? क्या इसी तरह मजदूर मरते रहेंगे और मजदूर, कर्मचारी यूनियनें हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेंगी?

इतनी पेचीदगी भरी क्यों है तलाक की प्रक्रिया, आइए जानते हैं

चिलचिलाती गरमी में 28 वर्षीय अध्यापिका मल्लिका अदालत के बाहर बैठी अपने केस की सुनवाई का इंतजार कर रही थी. पिछले कुछ महीनों में यह उस की 13वीं सुनवाई थी. वह अपने पति से तलाक, मासिक खर्च और अपने 3 वर्षीय बेटे की कस्टडी चाहती है.

मल्लिका जानती है कि अंतिम निर्णय आने में अभी कई महीनों या फिर साल भी लग सकते हैं. इस दीर्घकालिक प्रक्रिया में स्कूल से अवकाश लेना समय व धन दोनों का खर्च है. यों तो यह केस लंबा नहीं खिंचता, लेकिन कभी जज नहीं आता, तो कभी उस का पति.

मल्लिका का कहना है, ‘‘एक दिन ऐसा आया जब मेरे सब्र का बांध टूट गया और हम अदालत में खड़े हो गए. अदालत ने मुझ से सौम्य व्यवहार रखने को कहा और फिर हमें काउंसलिंग के लिए भेज दिया, क्योंकि फैमिली कोर्ट का यह आवश्यक भाग है. काउंसलर ने मंगलसूत्र न पहनने पर मुझ से कहा कि मैं अभी भी विवाहिता हूं और मंगलसूत्र न पहन कर भारतीय संस्कृति का अनादर कर रही हूं. काउंसलर ने मेरे पति से पूछा कि क्या वह मुझे प्रेम करता है, तो उन्होंने हां में जवाब दिया. काउंसलर ने फिर मुझ से पूछा कि फिर तुम्हें क्या चाहिए? तब मैं ने कहा कि मुझे सम्मान चाहिए. जब भी मैं सम्मान की बात करती हूं तो कोई कुछ नहीं बोलता, सब कुछ एकतरफा है.’’

2011 में वैलेंटाइन डे पर मुंबई निवासी 40 वर्षीय सिमरन ने भी मुंबई की परिवार अदालत में अपना वाद दाखिल किया है. वे अपने पति से तलाक तथा अपनी बेटियों की कस्टडी चाहती हैं. लेकिन वहां के न्यायाधीश ने भी पितृसत्तात्मक सलाह देते हुए उन से कहा कि तुम्हें किसी रेस्तरां में अपने पति के साथ बैठ कर भोजन करना चाहिए. तभी आपसी वार्त्तालाप के जरीए अपनी समस्या का समाधान निकालें. ऐसा करना बच्चों के भविष्य के लिए जरूरी है.

सिमरन ने घरेलू और यौन हिंसा का आरोप लगाया है. इन का कहना है कि काउंसलिंग के लिए भी हम कई चक्कर लगा चुके हैं. यह केवल समय की बरबादी है.

सितंबर, 2017 में उच्चतम न्यायालय ने आदेश पारित किया है कि एक बार जब किसी युगल के बीच तलाक अनिवार्य हो जाए और पतिपत्नी दोनों ही उस के लिए तैयार हों तो उन के लिए 6 माह की प्रतीक्षा अवधि जरूरी नहीं है. हमारे देश में इसे न्याय प्रणाली में बड़ी प्रगति के रूप में देखा गया है, क्योंकि यहां तलाक लेने में ही 2 से 12 वर्ष तक लग सकते हैं जोकि तलाक चाहने वाले व्यक्ति के लिए एक दु:स्वप्न बन जाता है.

3 दशक पहले वैवाहिक मामलों को सिविल कोर्ट से अलग कर फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया था, जिस में मध्यस्थता और सलाह से मामलों को सुलझाया जाता था. लेकिन फैमिली कोर्ट की प्रणाली में भी विलंब होने लगा, जिस का मुख्य कारण न्यायाधीशों से ले कर टाइपिस्ट व अन्य कर्मचारियों तक की कमी थी, जिस कारण से विवादियों को अगली तारीख दे दी जाती है. चेन्नई की प्रत्येक अदालत में औसतन 70-80 मामले सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होते हैं, जिन में से कुछ ही मामलों की सुनवाई हो पाती है. शेष को स्थगित कर दिया जाता है.

बैंगलुरू निवासी अधिवक्ता रमेश कोठारी का कहना है कि फैमिली कोर्र्टों में सुधार की आवश्यकता है ताकि मामले ज्यादा लंबे न खिंचें. हमें जरूरत है समय सीमा निर्धारित करने की जो वादी के पक्ष में हो. उचित समय में मामलों का निबटारा हो जाना चाहिए विशेषकर घर खर्च और शिशु के आधिपत्य का. इन मामलों में युगलों का काफी अधिक समय बरबाद होता है.

रमेश कोठारी की बात का समर्थन करते हुए चेन्नई के एक वरिष्ठ आईटी अधिकारी रवि प्रसाद का कहना है, ‘‘मैं 5 सालों से अपने किशोर बच्चे के आधिपत्य के लिए लड़ रहा हूं, जो अपनी मरजी से मेरे साथ रहना चाहता है. लेकिन तारीख और कोर्ट मुलतवी के चक्कर में 2012 से अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हुआ है. जबकि इस मामले में अपहरण और घरेलू हिंसा शामिल नहीं है. यों तो मैं ने अदालत के बाहर भी मामला सुलझाना चाहा, लेकिन मुझे लगता है कि मेरी पत्नी का वकील ऐसा नहीं कराना चाहता.’’

हकीकत यह है कि नई तारीख लगना, कोर्ट का मुलतवी हो जाना तथा सुनवाई में देरी, ये सब कुछ वकील के पक्ष में जाता है. अगली सुनवाई का मतलब है और फीस. इसी वजह से वकील मामलों को लंबा खींचते हैं, जो वादियों के लिए एक दुष्चक्र बन जाता है. जैसेजैसे मामला लंबा खिंचता है वैसेवैसे न्यायाधीश भी बदलते रहते हैं. इस से हर बार मामले को दोबारा पढ़ा जाता है, जिस में समय लगता है.

कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया

जहां तक न्याय में देरी की बात है तो कहीं न कहीं इस में हमारे समाज के आदर्श भी जिम्मेदार हैं, जिन में तलाक को बुरा समझा जाता है. फैमिली कोर्ट भी पहली शादी को बचाए रखने के लिए आपसी सुलह को बढ़ावा देती है, जोकि भारतीय संस्कारों पर आधारित है. वरिष्ठ अधिवक्ता सुधा राम लिंगम का कहना है कि सलाहकार और न्यायाधीश शादी को तोड़ने से पहले बचाने की कोशिश करते हैं, क्योंकि न्यायशीलता आखिरकार समाज का दर्पण है जहां विवाह अटूट बंधन है न कि कानूनी अनुबंध.

मल्लिका और सिमरन जैसी वादी कभी न खत्म होने वाली सलाहकारी और मध्यस्थता से गुजर रही हैं भले ही वे इसे मानें या न मानें. अधिवक्ता सुधा का कहना है कि काउंसलिंग अगर व्यावसायिकों द्वारा दी जाए तो बेहतर है, क्योंकि कभीकभी युगल पुनर्मिलन या समझौते तक पहुंचना नहीं चाहते. उन्हें ऐसी स्थिति असमंजस में डाल देती है.

तमिलनाडु फैडरेशन औफ वूमन लौयर्स की अध्यक्ष सांता कुमारी ने अपने एक केस के बारे में बताया, ‘‘मेरी मुवक्किल 55 वर्षीय एक घरेलू महिला थी, जिस ने अपने पति से तलाक लिया. यह मामला अदालत में 10 साल चला. सभी का यही सवाल था कि इस उम्र में तलाक क्यों लेना चाहती हो? महिला का एक ही जवाब था कि वह अपने बच्चों को सुरक्षित देखना चाहती है तथा अब अपने तरीके से जीवन जीना चाहती है.’’

आज की कानूनी प्रक्रिया में अलग होना आसान नहीं है. यदि विवाह एक कर्म है और आप का संगी आप से अलग नहीं होना चाहता तब आप के पास व्यभिचार, क्रूरता, परित्याग और पागलपन के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं, लेकिन इन्हें साबित होने में लंबा समय लगता है.

चेन्नई निवासी अधिवक्ता पूंगखुलाली बी. का कहना है कि 2013 में मद्रास विवाह कानून सुधार बिल तलाक के धरातल पर असाध्य माना गया. बिल का विरोध विभिन्न संगठनों द्वारा इसलिए किया गया कि इसे पारिवारिक मूल्यों और शादी की परंपरा के खिलाफ माना गया और फिर संस्कार आ कर खड़े हो गए.

यदि यह बिल पास हो जाता तो सैकड़ों युगलों के लिए तलाक लेना आसान हो जाता. चिंता की बात केवल एक थी कि यदि व्यक्ति एकतरफा निर्णय लेता तो महिला और बच्चों को खर्चा मिलना मुश्किल था.

समय के साथ चलें

अक्तूबर, 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि तलाक चाहने वालों को वीडियो कौन्फ्रैंसिंग की सुविधा मिलनी चाहिए तथा कोर्ट ने अपने अधीनस्थ कोर्टों को निर्देश दिए थे कि वे तलाक की सुनवाई के लिए युगलों को वीडियों कौन्फ्रैंसिंग की सुविधा उपलब्ध कराएं ताकि युगलों को शहर दर शहर धक्के न खाने पड़ें. कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के अधिनियम 1984 में समकालीन सामाजिक प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट किया था. लेकिन एक अन्य बैंच ने प्रश्न उठाया कि इस से तो मामले की आत्मा ही मर जाएगी, क्योंकि फैमिली कोर्ट युगलों को आपसी सामंजस्य बैठाने की बात करता है.

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने व्याख्यान देते हुए कहा था कि नई तकनीक के प्रयोग से मामलों की विलंबता को कम किया जा सकता है और उन लोगों को मदद मिल सकती है, जिन्हें कोर्ट आने में दिक्कत होती है. खंडपीठ में यह बात कहने वाले चंद्रचूड़ अकेले थे, किंतु कोर्ट के लिए महत्त्वपूर्ण संदेश था. उन का कहना था कि युगलों के सुखी जीवन व्यतीत करने वाली बात स्कूल में परियों की सुनी हुई कहानियों जैसी है. लेकिन हम जानते हैं कि जीवन इतना आसान नहीं होता तथा सभी के वैवाहिक संबंध इतने अच्छे नहीं होते खासकर आज के समय में.

पारिवारिक न्यायालय जैसी संस्थाओं का उद्देश्य यह होना चाहिए कि वे संकट में परिवारों को सेवा प्रदान करें तथा समाज की समस्याओं के निराकरण के लिए खुद को क्रियान्वित करें. वे अपनी बात इन शब्दों के साथ खत्म करते हैं कि न्यायालय को नृशंस का खात्मा कर देना चाहिए. अगर नहीं कर पाते हैं तो कालांतर में इस डिजिटल युग में यह हमारा पिछड़ापन है.

सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ध्वनिमत के साथ चंद्रचूड़ की भावनाओं से सहमति जताते हुए कहती हैं कि लोगों को उदार होना चाहिए. लोग तलाक के लिए जीवन भर इंतजार नहीं कर सकते. समय बदल जाता है. हम सब जानते हैं कि जीवन की शुरुआत या अंत केवल विवाह नहीं है.

राज्य अनुसार तलाक का प्रतिशत

भारत में बढ़ती तलाक दर खतरे की घंटी है. अधिवक्ताओं का कहना है कि बीते दशक में तलाक के मामलों में काफी वृद्धि हुई है. ‘भारत में विवाह विघटन’ नामक एक अध्ययन 2016 में इकौनोमिस्ट सूरज जैकब और मानव विज्ञानी श्रीपरणा चट्टोपाध्याय ने प्रस्तुत किया. इन्होंने 2011 की जनगणना के आंकड़ों को देखा और आश्चर्यजनक बात यह पाई कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में तलाक के प्रतिशत में कोई भिन्नता नहीं है.

ग्रामीण क्षेत्रों में तलाक की दर 0.82 % और शहरी क्षेत्रों में 0.89 % थी, जबकि राज्य में तलाक प्रतिशत में काफी अंदर है. दक्षिण और उत्तरी क्षेत्रों में तलाक की दर अधिक है. संपूर्ण भारत में तलाक की दर 0.24% है. सब से अधिक तलाक दर 4.08% मिजोरम में है, त्रिपुरा में 0.44% और केरल में 0.32% है. अनुसूचित जाति क्षेत्र छत्तीसगढ़ में 0.34% और गुजरात में 0.63% है.

निराला है यह स्वाद : स्पाइसी ऐप्पल

स्पाइसी ऐप्पल पकौड़ा

सामग्री

– 1 कप ओट्स आटा

– 2 बड़े चम्मच कौर्नफ्लोर

– 1 सेब कटा

– 1-2 हरीमिर्चें कटी

– 1/4 छोटा चम्मच दालचीनी पाउडर

– 1/4 छोटा चम्मच गरम मसाला

– तलने के लिए तेल.

विधि

ओट्स आटे में कौर्नफ्लोर, नमक, दालचीनी पाउडर, गरममसाला व हरीमिर्च मिलाएं. पानी के साथ गाढ़ा घोल बनाएं. इस में सेब डालें व अच्छी तरह मिलाएं. कड़ाही में तेल गरम कर चम्मच से घोल तेल में डाल कर पकौड़े तल लें.

निराला है यह स्वाद : क्रीम चीज वोंटोन्स

क्रीम चीज वोंटोन्स

सामग्री

– 4-5 स्प्रिंग रोल शीट्स

– 150 ग्राम पनीर

– 1 प्याज कटा

– 1 हरीमिर्च कटी

– 2 बड़े चम्मच थिक क्रीम

– 2 बड़े चम्मच मक्खन

– नमक स्वादानुसार

विधि

पनीर, क्रीम, नमक, प्याज व हरीमिर्च को अच्छी तरह मिला लें. स्प्रिंग रोल शीट्स में पनीर की फिलिंग भर कर रोल कर लें. ऊपर से बटर की लेयर लगाएं व 1800 पर गरम ओवन में 7-8 मिनट तक बेक करें. पलट कर बटर लगा कर फिर 3-4 मिनट बेक करें.

भाजपा की दुखती रग युवा दलित सावित्री बाई फूले

उत्तर प्रदेश की बहराइच लोकसभा सीट से 2014 में सांसद चुनी गईं सावित्री बाई फूले भाजपा की दुखती रग बन चुकी हैं. भाजपा को सावित्री बाई फूले पहले बहुत पसंद थीं. भाजपा के ही टिकट पर वे साल 2012 में विधायक चुनी गई थीं. सावित्री बाई फूले धर्म से तो प्रभावित थीं ही, उस के प्रभाव में वे भगवा कपड़े भी पहनने लगीं. उन का पूरा नाम साध्वी सावित्री बाई फूले है.

37 साल की सावित्री बाई फूले भगवा कपड़े भले ही पहनती हों पर वे दलित विचारधारा में पूरा यकीन रखती हैं. यही विचारधारा भाजपा और सावित्री बाई फूले के बीच टकराव का कारण बन रही है. भाजपा का एक वर्ग आरक्षण और दलित कानून को ले कर संविधान में बदलाव की बात कर रहा है वहीं दूसरी ओर सावित्री बाई फूले संविधान में इस संबंध में बदलाव को गैरजरूरी मानती हैं. वे इस के खिलाफ संसद से ले कर सड़क तक मुखर हैं.

सावित्री बाई फूले भारतीय संविधान और आरक्षण बचाओ महारैली कर के दलित मुद्दों पर अपनी आवाज मुखर कर रही हैं. दलित वर्ग से आने वाली सावित्री बाई फूले कहती हैं, ‘‘बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर और संविधान ने हमें राजनीति में आने व चुनाव लड़ने लायक माहौल और ताकत दी. हम सुरक्षित सीट से चुनाव इसलिए लड़ सकते हैं क्योंकि यह संविधान ने अधिकार दिया है. हम दलित समाज और बाबासाहेब की नीतियों से समझौता नहीं कर सकते. हम ने विधानसभा से ले कर संसद तक में अपनी बात रखी. आज सड़कों पर जनता के बीच भी अपनी बात रख रही हूं. हम किसी भी तरह के डर से चुप नहीं रह सकते. मेरी लड़ाई दलित, आरक्षण और संविधान को ले कर है. इस को मैं जारी रखूंगी.’’

रूढि़वादी सोच के खिलाफ

सावित्री बाई फूले का जन्म 1 जनवरी, 1981 को बहराइच जिले के नानपारा में हुआ था. दलित परिवार में जन्म लेने की वजह से बचपन से ही उन को कई तरह की कुरीतियों का सामना  करना पड़ा. जब वे 6 साल की थीं, उन का विवाह तय कर दिया गया. उन को बचपन में तो इस बात का पता ही नहीं चला. जब गौना और विदाई की बात आई तो उन्होंने इस का विरोध किया और अपनी बहन की शादी अपने पति से करा दी व खुद संन्यास ले कर समाज के काम में लग गईं.

10 साल की उम्र में ही सावित्री बाई फूले ने संन्यास ले लिया. वे भजन और धार्मिक गीत गाने लगीं तथा एक साध्वी की तरह रहने लगीं. सावित्री बाई फूले जो भगवा कपड़े पहनती हैं उन्हें वे अब हिंदू धर्म से न जोड़ कर, बौद्ध धर्म की विचारधारा से जोड़ती हैं.

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सावित्री बाई फूले बसपा प्रमुख मायावती को अपना रोलमौडल मानती हैं. इस की एक प्रमुख वजह भी है. सावित्री बाई फूले बताती हैं, ‘‘उस समय मैं कक्षा 8 में पढ़ रही थी. अच्छे नंबरों से पास होने के चलते मुझे 480 रुपए की छात्रवृत्ति मिली थी. स्कूलटीचर ने मुझे छात्रवृत्ति न देने के लिए कक्षा 9 में प्रवेश नहीं लेने दिया. उस समय उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार थी और मायावती मुख्यमंत्री थीं. मैं उन से एक सभा में मिली. अपनी परेशानी उन्हें बताई. मायावती ने शिक्षा विभाग के अधिकारी से कह कर न केवल मुझे पैसे दिलवाए, बल्कि स्कूल में प्रवेश भी दिलाया. इस के बाद मैं मायावती के कार्यक्रमों में आनेजाने लगी. यहीं से मेरी रुचि राजनीति में शुरू हो गई. मैं अपनी पढ़ाई के साथसाथ महिलाओं को साक्षर व मजबूत बनाने में लग गई.’’ सावित्री बाई फूले की राजनीति बहुजन समाज पार्टी के साथ शुरू हुई थी.

राजनीति के जरिए समाजसेवा

सावित्री बाई फूले गरीब औरतों की तरक्की के लिए बहराइच जिले के नानपारा में जनसेवा आश्रम चलाती हैं. इस के साथसाथ वे सखी समाज उत्थान सेवा समिति भी चलाती हैं. सावित्री बाई

ने बलहा, नानपारा और बहराइच जैसे अभावग्रस्त और पिछड़े इलाकों में काम करना शुरू किया. औरतों को वहां किसी तरह का अधिकार प्राप्त नहीं था. महिलाओं के समूह को तैयार करने के बाद सावित्री बाई फूले को लगा कि उन को समाजसेवा के साथ राजनीति भी करनी चाहिए. इस की वजह बताते हुए वे कहती हैं, ‘‘महिलाओं की मदद के लिए जब मैं सरकारी अफसरों और अन्य लोगों से मिलती थी तो वे बात को गंभीरता से नहीं लेते थे. मैं ने साल 2000 में भाजपा जौइन कर ली. इस के बाद 2001 में मैं ने जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा और जीती. मैं ने लगातार साल 2012 तक जिला पंचायत की सदस्या के रूप में काम किया.’’

अपने काम के बल पर सावित्री बाई फूले ने साल 2012 में बलहा विधानसभा क्षेत्र से विधायक का चुनाव लड़ा. पहली बार भाजपा के टिकट पर ही विधायक बनीं. वे अपने विधानसभा क्षेत्र की पहली महिला विधायक बनीं. साल 2014 में लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने जब जीतने वाले सदस्यों को लोकसभा चुनाव लड़ाने का फैसला किया तो सावित्री बाई फूले को बहराइच लोकसभा क्षेत्र से टिकट दिया गया. विधायक बनने के बाद भी सावित्री बाई फूले औरतों व लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करती रही थीं.

वे कहती हैं, ‘‘मैं विधानसभा सदन के बाद अपना पूरा समय इन लोगों के बीच ही बिताती थी. कोई भी, कभी भी मुझ से संपर्क कर मिल सकता है. मैं गांव के विकास पर पूरा ध्यान देती रही. मेरा मानना था कि गांव, गरीब और किसान का भला जिस दिन हो जाएगा, उस दिन समाज खुशहाल हो जाएगा. यही वजह थी कि मैं सांसद का चुनाव भी जीत गई.’’

विचारों में द्वंद्व

सांसद बनने के बाद सावित्री बाईफूले संसद में सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण कमेटी की सदस्य बनाई गईं. इस के साथ मानवाधिकार और महिला सशक्तीकरण की अलगअलग कमेटियों में भी वे सदस्य बनीं. सावित्री बाई फूले को सामाजिक कार्य और महिला सशक्तीकरण पर काम करना पसंद है.

अपने जनसेवा आश्रम के जरिए वे महिलाओं को अलगअलग तरह के रोजगार उपलब्ध कराने का काम करती हैं, जो हस्तशिल्प जैसे काम से जुड़ा होता है.

सावित्री बाई फूले कहती हैं, ‘‘मेरे लिए पार्टी के विचारों के साथ संविधान और आरक्षण को बचाए रखना भी जरूरी है.’’ यहीं से भाजपा और सावित्री बाई फूले के बीच विचारों का मतभेद खुल गया.

भाजपा डा. भीमराव अंबेडकर के भगवाकरण के प्रयास में है, जबकि उस की ही सांसद सावित्री बाई फूले इस के खिलाफ हैं. उन का कहना है कि डा. अंबेडकर सदा से ही मूर्तिपूजा और आडंबर के खिलाफ रहे हैं. ऐसे में उन की मूर्ति का रंग बदलना, नहलाना उन

के विचारों का अपमान करना है. अंबेडकर का सपना था कि दलित देश में अपने अधिकार और रोजगार के साथ सम्मानपूर्वक रहे. इस के लिए उसे आरक्षण का अधिकार दिया गया.

संविधान के तहत दलित और पिछड़ा समाज को जो अधिकार दिए गए, आजादी के बाद की सरकारों ने उन्हें यह हक देने में न्याय नहीं किया. फलस्वरूप, यह समाज आज भी गरीब है. आज दलित के साथसाथ अंबेडकर को भी राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. अंबेडकर के स्वाभिमान से किसी भी तरह की छेड़छाड़ समाज स्वीकार नहीं करेगा.

भाजपा के साथ अपने विचारों के मतभेद पर सावित्री बाई फूले कहती हैं, ‘‘मैं भाजपा के ही टिकट पर पहले विधायक बनी, फिर सांसद चुनी गई. हमारा पार्टी से कोई मतभेद नहीं है. हमें बाबासाहेब द्वारा संविधान में दिलाए गए अधिकार के तहत सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का मौका मिला.

‘‘हम भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत कर आए हैं और चुनाव जीतने वालों को अपनी बात रखने का पूरा हक होता है. पार्टी से कहीं अधिक हमारी जवाबदेही क्षेत्र की जनता के साथ है. हम सुरक्षित सीट से चुनाव जीते. वहां के लोगों की बात तो करेंगे ही. सरकार से हम उम्मीद करते हैं कि वह हमारी बात सुनेगी और न्याय करेगी.’’

नहीं बदला काम का तरीका

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नमो बुद्धाय जन सेवा समिति के तत्त्वावधान में आयोजित भारतीय संविधान और आरक्षण बचाओ महारैली में सावित्री बाई फूले शामिल हुईं. उन्होंने साफ किया कि वे पार्टी से अधिक अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हैं. वे इस के पहले भी दलित और संविधान पर अपनी राय सब के सामने रखती रही हैं.

विधायक और फिर सांसद बनने के बाद भी सावित्री बाई फूले में कोई बदलाव नहीं आया है. वे अभी भी भगवा कपड़े पहनती हैं और बेबाकी से दलित व संविधान के मुद्दे पर बोलती हैं. आज भी वे सादा भोजन करती हैं. उन के आवास पर आज भी मसाला और चटनी पीसने के लिए सिल व बट्टे का प्रयोग होता है. अपने मिलने वालों को वे पूरा समय दे कर उन की बातें सुनती हैं जिस से लोग उन से जुड़ने का प्रयास करते हैं.

भाजपा में दलित नेताओं की संख्या कम नहीं है. सावित्री बाई फूले के अलावा दूसरा कोई दलित नेता खुल कर नहीं बोल रहा है. सावित्री बाई आरक्षण में भी आरक्षण के खिलाफ हैं. वे कहती हैं, ‘‘दूसरों की बातें वे जानें. जो आज दलित एक्ट और आरक्षण पर चुप हैं, उन को भी जनता देख रही है. हम अपनी बात कर सकते हैं. मेरा कहना है कि पहले आरक्षण को ठीक से लागू कर दो, फिर उस की समीक्षा करो या जातीय आधार पर जनगणना कर के कोई बदलाव करो. आजादी के इतने सालों बाद भी सही तौर पर आरक्षण लागू नहीं किया गया. इस की जिम्मेदारी दलित समाज की नहीं है. सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी करे, फिर आगे बदलाव की बात हो.

वे कहती हैं, ‘‘संविधान ने दलित और पिछड़ों को अलगअलग अधिकार दे रखे हैं. ऐसे में आरक्षण के अंदर आरक्षण की बात उचित नहीं है. यह आपस में लड़ाने जैसी बात है. जब तक आरक्षण सही से लागू नहीं होता तब तक आरक्षण वैसे ही जारी रहना चाहिए जैसे संविधान ने अधिकार दिए हैं. इस में किसी भी तरह के बदलाव को हमारा समाज स्वीकार नहीं करेगा.’’

मंत्री पद की भूख नहीं

सावित्री बाई फूले के खिलाफ विरोधी पक्ष एक प्रचार अभियान चला रहा है. इस में उन की पार्टी के लोग भी शामिल हैं. ऐसे लोगों का आरोप है कि सावित्री बाई फूले केंद्र सरकार में मंत्री पद न मिलने से नाराज हैं.

वे कहती हैं, ‘‘ऐसा नहीं है. मैं साल 2012 से इन बातों को ले कर मुखर हूं. हर फोरम पर अपनी बात रखती हूं. विधानसभा और संसद में दिए गए मेरे भाषण इस के प्रमाण हैं. किसी भी तरह के पद का मुझे कभी कोई लोभ नहीं रहा. लोभ को छोड़ कर ही मैं ने समाज की सेवा करने का प्रण लिया. पद का लोभ करने वाले नेता अलग होते हैं. हम जनता के लिए काम करते हैं. यही हमारी सब से बड़ी पूंजी है.’’

सावित्री बाई फूले के मुखर विचारों से भाजपा में बेचैनी बढ़ गई है. वे भाजपा की ऐसी दुखती रग बन गई हैं कि जिसे भाजपा सहन नहीं कर पा रही है. भाजपा के लिए मुसीबत वाली बात यह है कि सावित्री बाई फूले की तरह दूसरे दलित नेता भी बगावत कर सकते हैं. ऐसे नेताओं में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर का नाम प्रमुख है. जिस तरह से भाजपा का उत्तर प्रदेश में जनाधार घट रहा है उस से भाजपा के नाराज नेताओं को अपनी राह तलाश करना सरल हो जाएगा. भाजपा में रहते हुए भी सावित्री बाई फूले ने जिस तरह से दलित, आरक्षण और संविधान को ले कर अपनी राय मुखर हो कर रखी है, उस से प्रदेश में वे एक अलग दलित नेता के रूप में स्थापित हो रही हैं.

बेवफाई- भाग 3: प्रेमलता ने क्यों की आशा की हत्या

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आशा और प्रेमलता न सिर्फ शहर की मशहूर हस्तियां थीं, आपस में पक्की सहेलियां भी थीं. अचानक एक दिन प्रेमलता ने अपनी रिवाल्वर से आशा की गोली मार कर हत्या कर दी और पुलिस के सामने अपना जुर्म भी कबूल कर लिया. इस हाईप्रोफाइल हत्या से पूरा शहर सन्न था. हर किसी की जबान पर एक ही बात थी कि दिनरात साथ रहने वाली इन सहेलियों के बीच आखिर ऐसा क्या विवाद हुआ जो प्रेमलता ने आशा की हत्या कर दी? लेकिन जब पुलिस तफतीश में जुटी तो मामले पर से धीरेधीरे परदा उठने लगा…

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सामने की दीवार पर आशा का बहुत बड़ा आकर्षक चित्र लगा था. बैडरूम की साइड टेबल पर दोनों सहेलियों की कालेज के दिनों की एकदूसरे के गले में बांहें डाले खड़ी तसवीर थी.

‘‘प्रेमलता की अलमारियां खोलने के लिए तो आप महिला कांस्टेबल की मौजूदगी चाहेंगी?’’ देव ने स्नेहा की ओर देखा.

‘‘जी हां, जब तक महिला कांस्टेबल आए तब तक मैं प्रेमलता का फेसबुक अकाउंट चैक कर के, उन की और आशा मैडम की किसी कालेज फ्रैंड से संपर्क करना चाहूंगी.’’

देव ने सराहना से उस की ओर देखा.

‘‘ठीक है. मैं नौकरों से पूछताछ कर रहा हूं, आप भी सुनना चाहेंगी?’’

‘‘यहां भी वही दया वाले जवाब होंगे. असलियत जानने के लिए तो कोई कौमन फ्रैंड ही खोजनी होगी,’’ कह कर स्नेहा आई पैड पर फेसबुक खोलने लगी.

स्नेहा का कहना ठीक था, प्रेमलता की नौकरानी भगवती ने भी वही कहा जो दया ने कहा था.

‘‘हमें तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि बीबीजी आशा बीबी की जान लेंगी. वे तो जान छिड़कती थी उन पर. रात को जब तक आशा बीबी का फोन नहीं आ जाता था कि वे घर आ गई हैं, बीबीजी खाना नहीं खाती थीं. सोने से पहले भी फोन पर दोनों घंटों बतियाती थीं और करतीं भी क्या साहब, दोनों ही तो अकेली थीं. हमारी बीबीजी ने तो ओहदे के चक्कर में शादी नहीं की और आशा बीबी कर के भी ओहदे के पीछे पति के साथ न गईं. दिन तो काम में कट जाता था पर रात एकदूसरे से बतिया कर कटती थी.’’

‘‘यह तुम्हें कैसे पता?’’ देव ने पूछा.

‘‘कई बार देखा, कभी पानी की बोतल रखना भूलने पर कमरे में जाना पड़ता था या दूध के पैसे मांगने या और कोई जरूरी बात पूछने तो बीबीजी कान पर फोन लगाए होती थीं और कहती थीं कि एक पल रुक आशी फिर जल्दी से हमें निबटा कर बतियाने लगती थीं.’’

‘‘फेसबुक या लिंक्डइन में मैडम का अकाउंट नहीं है और न ही मैडम के मोबाइल पर रूपम का नंबर है,’’ स्नेहा मायूसी से बोली.

‘‘यह रूपम कौन है?’’

‘‘1 सप्ताह पहले मैं मैडम के साथ इंटरनैशनल बुक फेयर में गई थी. वहां मैडम को एक पुरानी सहपाठिन रूपम मिली थीं. उन के पति प्रणव कुछ रोज पहले ही किसी कंपनी के वाइस प्रैसिडैंट बन कर यहां आए हैं. रूपम से मिलना बहुत जरूरी है, लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा कि उन्होंने अपने पति की कंपनी का क्या नाम बताया था.’’

‘‘वसंत, तुरंत पता लगाओ कि किस कंपनी में प्रणव नाम का नया वाइस प्रैसिडैंट आया है और कहां रहता है?’’ देव ने स्नेहा की बात काट कर वसंत को आदेश दिया, ‘‘रूपम का पता तो आप को मिल जाएगा, लेकिन उन से मिलने के चक्कर में आप एअरपोर्ट जाना तो नहीं टालेंगी?’’

‘‘वह कैसे टाल सकती हूं, सर ने कहा है मुझे आने को. फोन नंबर मिल जाए तो रूपम से मिलने का समय ले लूंगी. मुझे लगता है उन से जरूर कुछ मदद मिलेगी.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘क्योंकि वह मैडम को प्रेमलता का नाम ले कर छेड़ रही थीं. हो सकता है उन्हें उस रिश्ते के बारे में मालूम हो जिस पर हम शक कर रहे हैं,’’ कहते हुए स्नेहा सकपका गई.

देव भी झिझका.

‘‘अगर रूपम हमारे शक की पुष्टि कर देती हैं तो फिर तो यह मामला कुछ हद तक सुलझ जाएगा, लेकिन अभी दिलीप से इस बारे में कुछ पूछना जल्दबाजी होगी.’’

‘‘जी हां, क्योंकि दया के अनुसार तो प्रेमलता दिलीप सर की उपस्थिति में उन के घर नहीं आती थी.’’

तभी महिला कांस्टेबल रैचेल आ गई.

अलमारियों में कपड़ों के अलावा कुछ जेवर थे, कुछ हजार रुपए, चैकबुक और कुछ अन्य दस्तावेज. लेकिन कुछ भी संदिग्ध नहीं था सिवा महंगे विदेशी इत्र और पारदर्शी नाइटियों के.

‘‘हर हसबैंड हैज स्पैंट ए फौरच्युन औन दीज,’’ रैचेल कहे बगैर न रह सकी.

‘‘शी इज अनमैरिड, ए स्पिनिस्टर टू बी ऐग्जैक्ट,’’ स्नेहा के कड़वे व्यंग्य पर देव ने मुश्किल से हंसी रोकी.

‘‘कविताओं से तो नहीं लगता कि महापौर अवसादग्रस्त थीं या किसी मानसिक विकृति का शिकार, लेकिन उन्होंने जो कुछ भी किया है किसी मानसिक व्याधि के कारण ही किया है,’’ देव बोला, ‘‘उन की दवाओं की अलमारी की बारीकी से छानबीन करनी होगी.’’

अलमारी में मामूली खांसीजुकाम, आंखों की दवा और विटामिन की गोलियों के अलावा कुछ नहीं था. तभी वसंत ने बताया कि प्रणव एक विदेशी बैंक का वाइस प्रैसिडैंट है और गोल्फ लिंक्स में बैंक के गैस्ट हाउस में रह रहा है.

‘‘गैस्ट हाउस में तो बगैर फोन किए यानी अपौइंटमैंट लिए भी जा सकती हूं,’’ स्नेहा बोली.

‘‘मगर अभी तो आप एअरपोर्ट चलिए. प्लेन लैंड करने वाला होगा,’’ देव ने कहा और फिर स्नेहा को पार्किंग में रुकने को कह देव अंदर चला गया. फिर कुछ देर बात ही अस्तव्यस्त से व्यथित दिलीप के साथ आ गया. स्नेहा गाड़ी से उतर कर दिलीप के पास गई. उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे. बस इतना ही पूछा, ‘‘आप का सामान सर?’’

‘‘सामान मेरे आदमी घर पर ले आएंगे स्नेहाजी, गाड़ी मैं चलाऊंगा, आप पीछे दिलीपजी के साथ बैठ कर बातें करिए,’’ देव ने कहा, ‘‘बेफिक्र रहिए, तेज चला कर आप की गाड़ी कहीं ठोकूंगा नहीं.’’

‘‘गाड़ी मेरी अपनी नहीं औफिस की है. अब गाड़ी तो क्या, शायद नौकरी भी नहीं रहेगी,’’ स्नेहा का स्वर रुंध गया.

‘‘आशा ने तुम्हें बताया नहीं था कि तुम्हारा नाम आशा की गैरहाजिरी में ऐसोसिएट ऐडिटर के लिए मंजूर हो गया है?’’ दिलीप ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैडम कहीं जाने वाली थीं?’’ स्नेहा ने चौंक कर पूछा.

‘‘मेरे पास दुबई आ रही थी. मैं ने टूअरिंग जौब के बजाय दुबई में डैस्क जौब ले ली है और आशा को वहां भी ऐडिटर की…’’

‘‘ओह आई सी,’’ देव ने बात काटी, ‘‘तो आज शाम पार्टी इसी खुशी में थी?’’

‘‘कैसी पार्टी इंस्पैक्टर?’’ दिलीप ने चौंक कर पूछा.

स्नेहा ने दया की कही हुई बात दोहरा दी.

दिलीप ने एक उसांस ली, ‘‘दावत वाली पार्टी नहीं थी. जिस एजेंट ने मुझे दुबई में घर दिलवाया था वही हमें यहां के घर के लिए भी किराएदार दिलवा रहा था. उसी पार्टी को घर दिखाने की बात मैं और आशा कर रहे थे. आशा का पोस्टमार्टम तो हो चुका होगा, इंस्पैक्टर? चलिए, बौडी को ले कर ही घर चलेंगे.’’

‘‘दाहसंस्कार आज ही कर देंगे?’’

‘‘कल सब के आने पर. बौडी आज घर पर ही रखूंगा.’’

‘‘आप प्रेमलता से मिलना चाहेंगे?’’

‘‘क्या फायदा? उस से तो जो उगलवाना है आप ही उगलवाएंगे.’’

‘‘आप की उस से दोस्ती थी?’’

‘‘हालांकि आशा और प्रेम बचपन की सहेलियां थीं, लेकिन उन्होंने अपनी दोस्ती मुझ पर कभी नहीं थोपी यानी आशा न तो प्रेम को जबतब घर बुलाती थी और न ही मुझे उस के घर चलने को कहती थी. वह एक निहायत सौम्य, शालीन महिला हैं, मेरे साथ उन का व्यवहार अपने पद की गरिमा और मर्यादा के अनुकूल था. उस ने आशा की हत्या क्यों की यह मेरी समझ से बाहर है.’’

‘‘दया के अनुसार प्रेमलता अकसर रात को आप के यहां रहती थी और आशाजी उसके. दोनों रोज देर रात तक फोन पर भी बातें भी करती थीं.’’

‘‘मुझे मालूम है आशा अकसर बताती थी कि आज प्रेम आ रही है या वह प्रेम के घर जा रही है. दिन में तो दोनों व्यस्त रहती थीं, रात को ही मिल या बात कर सकती थीं,’’ दिलीप ने कहा और फिर कुछ सोच कर जोड़ा, ‘‘वैसे आशा अकेले रहतेरहते परेशान हो चुकी थी. उसी के कहने पर मैं ने फील्ड जौब छोड़ कर डैस्क जौब ली है. वह अब बच्चा चाहती थी यानी भरीपूरी गृहस्थी.’’

‘‘प्रेमलता ने शादी क्यों नहीं की यह कभी पूछा नहीं आप ने?’’

‘‘प्रेम का अफेयर है किसी ऐसे के साथ जिस से शादी नहीं कर सकती. इस से ज्यादा मुझे नहीं मालूम, क्योंकि आशा के साथ जो भी समय मिलता था उसे मैं दूसरों के बारे में बात करने में नहीं गंवाता था.’’

‘‘यह जो प्रेमलता ने बेवफाई वाली बात कही है उस से आप को भी लगता है कि आशाजी प्रेमलता की कोई गोपनीय बात प्रकाशित करने जा रही थीं?’’

‘‘यह तो स्नेहा या प्रेमलता के औफिस वाले बेहतर बता सकते हैं. एक बात बता दूं, आशा किसी बात को ले कर परेशान नहीं थी और न ही प्रेमलता से डर कर यहां से भाग रही थी. वह तो चाहती थी कि मैं यहीं वापस आ कर कोई बिजनैस करूं. अभी भी इसी शर्त पर मानी थी कि चंद वर्ष विदेश में पैसा कमा कर फिर यहां आ कर कोई काम करेंगे.’’

आशा की बौडी लेने जब दिलीप अंदर गया तो देव ने स्नेहा से कहा, ‘‘इस ने तो मामला और भी उलझा दिया है.’’

‘‘आप को नहीं लगता कि प्रेमलता ने आशा के अपने पति के पास जाने के फैसले को खुद से बेवफाई समझा था?’’

देव चौंक पड़ा, ‘‘यह तो तभी हो सकता है जब हमारा शक उन दोनों के रिश्तों के बारे में सही हो और दिलीप की यह बात सुन कर कि आशा अब बच्चा चाहती थी हमारा शक तो बेबुनियाद लगता है.’’

‘‘हो सकता है आशा हैट्रो सैक्सुअल हो. हालांकि मेरा दिलीप सर के साथ रहना जरूरी है, लेकिन उस से भी जरूरी है रूपम से मिलना और वह भी उस के पति के औफिस से लौटने से पहले, क्योंकि उस के सामने रूपम ये सब बातें शायद न करे.’’

देव कुछ बोलता उस से पहले ही दिलीप आ गया, ‘‘मैं तो आशा के साथ ऐंबुलैंस में आऊंगा, आप लोग जाइए. स्नेहा, तुम सुबह से अपने घर से निकली हो सो अब घर जा फ्रैश हो आओ. मेरे घर पर आशा के बहनभाई पहुंच गए हैं और मेरे परिवार वाले भी पहुंचने वाले हैं. मैं ने यश को फोन किया था. उसी ने बताया सब.’’

‘‘ठीक है सर, मैं कुछ देर बाद आती हूं. टेक केयर,’’ स्नेहा का स्वर रुंध गया.

‘‘आप चलिए, मैं दिलीप के साथ रुकता हूं,’’ देव ने कहा, ‘‘मेरा नंबर ले लीजिए, अगर रूपम से कुछ सुराग मिले तो फोन करिएगा.’’

‘‘जरूर.’’

घर जा कर फ्रैश होने के बाद स्नेहा रूपम से मिलने गई. गैस्ट हाउस में रिसैप्शनिस्ट से मैसेज मिलते ही रूपम ने उसे अपने कमरे में बुला लिया.

‘‘मैं ने टीवी पर न्यूज सुनते ही आप के औफिस में फोन किया था पर आप मिली नहीं…’’

‘‘जी हां, मैं भी सीआईडी इंस्पैक्टर के साथ तफतीश में लगी हुई हूं. प्रेमलताजी ने यह कह कर कि आशा बेवफाई पर उतर आई थी, अटकलों का पिटारा तो खोल दिया और फिर यह कह कर कि यह व्यक्तिगत बात है चुप्पी साध ली. अब इतनी बड़ी शख्सीयत का मुंह खुलवाने का रास्ता पुलिस के आला अधिकारियों की समझ में नहीं आ रहा सो मामला आननफानन में सीआईडी के सुपुर्द कर दिया है,’’ स्नेहा सांस लेने को रुकी, ‘‘फिलहाल प्रेमलता के घर पर जो देखा उस से सीआईडी का सब से माहिर इंस्पैक्टर देव भी चकरा गया है और मैं इसी सिलसिले में आप की मदद लेने आई हूं.’’

‘‘मेरी मदद?’’ रूपम ने भौंहें चढ़ा कर पूछा, ‘‘मैं भला क्या मदद कर सकती हूं? कई वर्षों बाद मैं पिछले सप्ताह आशा से मिली थी. प्रेम से तो अभी मुलाकात ही नहीं हुई. सो उस के घर में आप ने जो देखा उस के बारे में मुझे क्या पता होगा?’’

‘‘मैं बताती हूं, प्रेमलता के बैडरूम में आशा का लाइफसाइज पोट्रैट लगा था…’’

‘‘ओह नो,’’ और रूपम हंसी से लोटपोट हो गई. फिर अपने को संयत करते हुए बोली, ‘‘क्षमा करिएगा, मैं खुद पर काबू नहीं रख सकी.’’

‘‘यानी इस रिश्ते के बारे में आप को मालूम था?’’

फर्जीवाड़े में फंसा इंजीनियर

उत्तर प्रदेश में एक इंजीनियर पकड़ा गया है जिस के पास 200 करोड़ की दौलत है जो उस ने दिल्लीनोएडा के पास जेवर के इलाके में इंजीनियर के पद पर रहते हुए कमाई थी. उस ने 2 शादियां कर रखी थीं पर दोनों से हुए बच्चों के एकजैसे नाम रखे हुए थे ताकि हेराफेरी में आसानी रहे. उस ने बीसियों कंपनियां खोल रखी थीं जबकि वह सरकारी पद पर है.

सरकार में इतनी भयंकर रिश्वत लेने के बाद कोई पकड़ा जाए, यह सरकार का सब से बड़ा निकम्मापन है. यह साफ करता है कि हमारी सरकार को अपनी नाक तले अपराधों का कुछ पता नहीं होता, वह नागरिकों को जुर्म होने से पहले कैसे बचा सकती है? इतनी बड़ी संपत्ति जिस में आलीशान मकान, विदेशी गाडि़यां, ठाठ की जिंदगी जीता अफसर हो और सरकार को दिखे ही न, ऐसा कैसे हो सकता है और हो सकता है तो समझ लें कि सरकार पर भरोसा ही नहीं करा जा सकता है.

सरकार बड़ी शान से इनकम टैक्स की इस रेड के बारे में बताती है जिस में यह पैसा निकला पर सवाल है कि क्या यह नोटबंदी के बाद ही जमा किया गया पैसा है? यदि नहीं तो नोटबंदी का क्या फायदा हुआ जिस पर नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इस से काला धन खत्म हो जाएगा? क्या सरकारी अफसरों के हाथों में काला धन काला नहीं है?

जिस देश में आम जनता पैसेपैसे को तरस रही हो वहां महज 50-60 हजार मासिक वेतन पाने वाला इंजीनियर 200 करोड़ का मालिक बन जाए और वर्षों तक किसी को खबर न हो, यह अगर हो रहा है तो साफ है कि इस में मिलीभगत 5-7 की नहीं सैकड़ों अफसरों और बाबुओं की है जिस में हरेक ने मोटा पैसा बनाया होगा. इस पोस्ट पर कहीं से पैसा लगातार बरसता होगा वरना 200 करोड़ रुपए कमाना आसान तो नहीं है. यह तो सभी के साथ मिल कर कमाने होते हैं और यह बात दूसरी है कि यह इंजीनियर पकड़ा गया है.

कुछ साल पहले यादव सिंह नाम का इंजीनियर भी पकड़ा गया था पर पूरे मुकदमे के फैसले का इंतजार किए बिना सुप्रीम कोर्ट ने न जाने किस कारण उसे हाल में जमानत पर भी रिहा कर दिया. यह ब्रजपाल चौधरी सहायक इंजीनियर भी जल्दी ही छूट जाएगा, यह इस देश के साथ वादा है. कोई काला धनपति नहीं बच पाएगा यह मंचों पर बोलने वाले बोलते रहें पर उन्हें शायद मालूम रहता है कि जिस ने मंच बनवाया था वह पक्का रिश्वतखोर ही था और जनता को बहलाफुसला या धमका कर वसूलता है.

यह तो देश का दस्तूर है. यहां पैसा मेहनत से नहीं पद से बनता है और इसीलिए सरकारी नौकरी या सरकारी नेतागीरी के पीछे सब भागते हैं. यहां काम की पूजा नहीं होती पद की होती है.

यह है सोशल मीडिया पर आ रहे फेक फोटो को पहचानने का सही तरीका

आप भी फेसबुक, व्हाट्सऐप, गूगल का इस्तेमाल जरूर करते होंगे. अगर आपके पास भी किसी ने ऐसी फोटो पोस्ट की है जिसमें डोनाल्ड ट्रंप के साथ दुनिया भर के कई बड़े नेता पीएम मोदी की बात सुन रहे हैं. तो सावधान हो जाइए, क्योंकि ये फोटो फेक हो सकते हैं. क्योंकि कुछ समय पहले भी ऐसी ही कई फोटो सोशल मीडिया में वायरल हो रही थी. इस तरह की फोटो ठीक है या नहीं पता लगाने के कई तरीके होते हैं.

इसका सबसे पहला और आसान तरीका होता है रिवर्स फोटो सर्च का. इस तरह का विकल्प कई वेबसाइट और सर्च इंजन देते हैं. गूगल भी ऐसा ही विकल्प देता है. गूगल इमेज में जाकर आप किसी फोटो को ड्रेग करके ले जाएं और सर्च करें. इसके अलावा तस्वीर को अपलोड कर सकते हैं.

इसके अलावा कई वेब ब्राउजर भी ऐसे हैं जहां फोटो पर राइट की क्लिक करके उसे सर्च किया जा सकता है. इसके बाद इस फोटो की पूरी जानकारी आपके सामने आ जाएगी. आप देख पाएंगे कि यह फोटो कबकी है और कहां इस्तेमाल हुई थी. कई बार पुरानी फोटो को भी लोग फौर्वर्ड कर देते हैं, लेकिन जो असली फोटो होती है वह अच्छी क्वालिटी की होती है. असली फोटो को देखकर आप पहचान सकते हैं कि क्या किसी ने उस फोटो के साथ छेड़छाड़ की है.

आपके पास भी कोई फेक फोटो भेज सकता है अगर आप इसका पता लगाना चाहते हैं तो आप फोटो को हर डिटेल को बहुत ध्यान से देखें. अगर तस्वीर फर्जी होती तो परछाई आदि से भी पता लग सकेगा. क्या फोटो में दिखाई दे रही हर चीज की परछाई ठीक है. क्या समय और मौसम दोनों मेल खा रहे हैं. इसका पता लगाने का एक और तरीका है कि आप फोटो में दिख रही जगह के मौसम की रिपोर्ट देख सकते हैं. फोटो में अगर इमारतें और गाड़ियां हैं तो ध्यान से देखें क्या गाड़ियों के नाम और इमारतें मेल खा रही हैं.

अगर किसी इंसान की फोटो आप देख रहे हैं और उसके फेस पर कोई भी निशान, पिंपल या रिंकल आदि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है तो हो सकता है कि वह फोटो फोटोशाप की गई हो. उसमें कलर करेक्शन किया गया हो और उस फोटो को अच्छा बनाया गया हो. अगर आपके पास फूल के बगीचे या पहाड़ों आदि कि कोई फोटो आती है और आपको लग रहा है कि यह फोटो असली नहीं हो सकती तो उस फोटो को बहुत ध्यान से देखें, उसमें देखें कि किसी एक ही चीज को तो कौपी पेस्ट करके नहीं लगा रखा है.

अगर आप किसी पिक्चर को देख रहे हैं और उस फोटो में मौजूद हर चीज बिलकुल साफ दिखाई दे रही है. इसका मतलब है कि यह फोटो फेक है. क्योंकि एक फोटो में सभी चीजें एक समान फोकस में नहीं हो सकती हैं, मतलब एक फोटो में शुरुआत से लेकर आखिर तक का सबकुछ साफ दिखाई नहीं दे सकता है.

अगले साल तक 5वी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा भारत : अरुण जेटली

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने विश्वास जताया है कि अगर अर्थव्यवस्था की विकास दर अनुमान के अनुरूप रही तो भारत अगले साल ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. हालांकि उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत और ग्लोबल ट्रेड वार चुनौतियां पैदा कर सकता है.

‘ग्रामीण भारत को कांग्रेस ने दिए नारे, प्रधानमंत्री मोदी ने दिए संसाधन’ शीर्षक वाले अपने फेसबुक पोस्ट में जेटली ने कहा है कि अगर अनुमान के अनुसार देश की विकास दर रही तो अगले साल हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएंगे. अभी ब्रिटेन पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. उन्होंने कहा कि पिछले चार साल से भारत दुनिया की सबसे तेज अर्थव्यवस्था बना हुआ है. अगले एक दशक तक देश की तेज विकास दर बनी रहने की संभावना है.

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विश्व बाजार में अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. उसने फ्रांस को पछाड़कर यह स्थान हासिल किया है. अब फ्रांस सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है. इस सूची में अमेरिका शीर्ष पर है. इसके बाद चीन, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन का स्थान आता है. भारतीय अर्थव्यवस्था के 2017 में प्रदर्शन के आधार पर उसे छठा स्थान मिला है. भारत का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) 2017 के अंत में 2.59 ट्रिलियन डौलर रहा था, जबकि फ्रांस की जीडीपी 2.58 टिलियन डौलर थी.

जेटली ने कहा कि ईज औफ डूइंग बिजनेस और पसंदीदा निवेश गंतव्य के रूप में भारत की रैंकिंग में काफी सुधार हो चुका है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत और ट्रेड वार की चुनौतियों के बीच भारत कारोबार के लिए उपयुक्त देश बनकर उभरा है. चालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर फीसद के बीच रहने का अनुमान है. जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में विकास दर 6.7 फीसद रही थी.

जेटली ने कहा कि विश्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार फ्रांस को पीछे छोड़कर भारत छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है. लेकिन आबादी में भारी अंतर होने के कारण प्रति व्यक्ति आय में अभी दोनों देशों के बीच बहुत अंतर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि ग्रामीण भारत और वंचित वर्गो को संसाधनों पर पहला अधिकार मिले. इन वर्गो के विकास और सरकारी खर्च में वृद्धि से अगले दशक के दौरान देश के ग्रामीण गरीब को सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा.

खुशखबरी: ट्रूकौलर में आया कौल रिकौर्ड फीचर

अगर आप अपने स्मार्टफोन में ट्रूकौलर ऐप का इस्तेमाल करते हैं, तो आपके लिए खुशखबरी है. ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रूकौलर अपने ऐप में एक नया फीचर ऐड किया है. यह फीचर बहुत ही खास है. इस ऐप का इस्तेमाल करने वाले अब कौल को रिकौर्ड भी कर सकेंगे. कंपनी ने इस फीचर के बारे में अपने सपोर्ट पेज पर सारी जानकारी दी है. इस पेज पर दी गई जानकारी के मुताबिक इस फीचर को यूजर्स की मांग पर दिया गया है.

कंपनी का कहना है कि रिकौर्ड की गई कौल डिवाइस में सेव हो जाएगी और यह ट्रूकौलर के सर्वर पर अपलोड नहीं होगी. कंपनी ने यह भी कहा है कि ट्रूकौलर यूजर्स की कौल रिकौर्डिंग को रीड या उसकी प्रोसेसिंग नहीं करती है क्योंकि कंपनी यूजर्स की प्राइवेसी का सम्मान करती है. इस फीचर के लिए ट्रूकौलर स्टोरेज का ऐक्सेस मांगेगा ताकि रिकौर्डिंग को वहां सेव किया जा सके. इस फीचर को इनेबल करने के लिए आपको मेन्यू में से सेटिंग में जाना होगा इसके बाद Truecaller call recording को ओपन करना होगा और इसके बाद इसे आप इनेबल कर सकते हैं.

कंपनी इस फीचर का 14 दिन का फ्री ट्रायल दे रही है. इसके बाद आपको इसके लिए पैसे देने पड़ेंगे. कंपनी का कहना है कि जो यूजर्स ऐंड्रायड 5.0 या उसके बाद के वर्जन का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे ही इस फीचर का इस्तेमाल कर सकेंगे. सबसे अजीब बात यह है कि यह फीचर एंड्रायड .7.1.1 नूगा पर रन करने वाली डिवाइस को सपोर्ट नहीं कर रहा है. इन डिवाइसेज में नेक्सस, पिक्सल और मोटो जी4 जैसी डिवाइस शामिल हैं.

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