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जाह्नवी की बहन पर चढ़ा ‘धड़क’ का खुमार, वीडियो हुआ वायरल

आज श्रीदेवी की बेटी जाह्नवी कपूर की डेब्यू बौलीवुड फिल्म ‘धड़क’ रिलीज हो गई है. फिल्म को लेकर दर्शकों में खासा एक्साइटमेंट हैं. इस फिल्म के बौक्स औफिस पर पहले ही दिन 7-10 करोड़ के बीच कमाई करने की उम्मीद जताई जा रही है. फिल्म ‘धड़क’ की रिलीज के समय जाह्नवी की छोटी बहन खुशी काफी उत्साहित नजर आईं. वो अपनी खुशी को अपनी बहन की फिल्म के गाने पर डांस कर व्यक्त कर रही हैं. सोशल मीडिया पर उनका एक वीडियो खूब शेयर किया गया जिसमें खुशी गाड़ी के अंदर धड़क के गाने पर झूम रही हैं.

वीडियो में खुशी बड़ी बहन जाह्नवी की फिल्म धड़क के गाने झिंगाट पर झूम रही हैं. जाह्नवी कपूर के बौलीवुड डेब्यू के बाद फैन्स अब खुशी कपूर के बौलीवुड डेब्यू को लेकर उत्साहित हैं. हालांकि श्रीदेवी की छोटी बेटी खुशी ने अब तक अपने बौलीवुड डेब्यू को लेकर कोई ऐसी इच्छा नहीं जताई है.

मालूम हो कि एक अखबार ने जब जाह्नवी से बातचीत के दौरान पूछा कि खुशी कब बौलीवुड डेब्यू कर रही हैं तो जाह्नवी ने कहा, “मुझे लगता है कि इस सवाल का जवाब खुशी को ही देना चाहिए.” बता दें कि जाह्नवी कपूर और उनके भाई ईशान खट्टर की फिल्म धड़क आज 20 जुलाई को रिलीज हो रही है. जिसका निर्देशन शशांक खेतान कर रहे हैं.

धड़कः मराठी फिल्म ‘सैराट’ की औनर कीलिंग

2016 की मराठी भाषा की सुपरहिट फिल्म ‘‘सैराट’’ का शशांक खेतान ने हिंदी रीमेक ‘‘धड़क’’ बनाया है, जिसे देखकर अहसास होता है कि फिल्मकार ने ‘सैराट’ की ही औनर कीलिंग कर डाली. ‘धड़क’ से ‘सैराट’ की रूह गायब है. कहा जाता है कि ‘समरथ को नहीं दोष गोसांई’.. इसीलिए ‘धड़क’ के फिल्मसर्जक ने अपने धन बल का भरपूर उपयोग करते हुए क्षेत्रीय भाषा की अति संवेदनशील व औनर कीलिंग के साथ राजनीतिक व सामाजिक परिवेश पर कुठाराघात करने वाली फिल्म ‘‘सैराट’’ को ‘धड़क’ में तहस नहस कर दिया. फिल्मकार नागराज मंजुले ने जिस कौशल व गहराई के साथ ‘सैराट’ में जातिगत व क्लास के चलते भेदभाव व औनर कीलिंग को पेशकर लोगों को सोचने पर मजबूर किया था, उसमें शशांक खेतान बुरी तरह से पस्त नजर आते हैं. ‘सैराट’ की तरह‘धड़क’ में प्रेमी जोड़े में डर व निराशा का अहसास उभरता ही नही है.

फिल्म की कहानी झीलों की नगरी उदयपुर में रहने वाले मधुकर बागला (इशान खट्टर) और राजशाही परिवार के तथा राजनेता रतन सिंह (आशुतोष राणा) की बेटी पार्थवी (जान्हवी कपूर) के इर्द गिर्द घूमती है. मधुकर के पिता का रेस्टोरेंट है. मधुकर अच्छा कुक और टूर गाइड है. फिल्म की शुरुआत मधुकर के घर से होती है, वह सुबह सुबह सपना देख रहा है कि एक लड़की ने उसके पास आकर कहा कि इसबगोल पी लो, आज जीत उसी की होगी और उसे पुरस्कार वही देगी. खैर, प्रतियोगिता स्थल पर पहुंचने में देर होने के बावजूद जीत मधुकर बागला की होती है. पुरस्कार देने के लिए रतन सिंह अपने पूरे परिवार के साथ आए हैं. रतन सिंह अपनी बेटी पार्थवी से कहते हैं कि वह मधुकर को पुरस्कार दे. यहीं पर दोनों एक नजर में ही एक दूसरे को अपना दिल दे बैठते हैं.

बाद में रतन सिंह अपने भाषण में अपनी प्रतिद्वंदी सुलेखा पर तीखे हमले करते हैं. इधर मधुकर और पार्थवी की मुलाकातें बढ़ती हैं. पता चलता है कालेज में दोनों को एक ही कक्षा में प्रवेश मिला है. जब मधुकर के पिता को इस प्रेम संबंध के बारे में पता चलता है, तो वह मधुकर से कहते हैं कि पार्थवी का परिवार उंची जाति का है, इसलिए उससे दूर रहो. यहां तक कि मधुकर के पिता मधुकर से अपने सिर की कसम ले लेते हैं कि वह अब पार्थवी से बात नहीं करेगा. उधर पार्थवी को मधुकर का साथ चाहिए. उसे अपनी बात मनवानी आती है. अंततः मधुकर और पार्थवी की मुलाकातें, प्यार की तीखी नोकझोक चलती रहती है. इसकी भनक पार्थवी के भाई व रतन सिंह के बेटे रूप (आदित्य कुमार) को चलती है, तो वह मधुकर को सबक सिखाना चाहता है. पर चुनाव नजदीक होने के कारण मामला ठंडा हो जाता है.

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इधर रूप की जन्मदिन पर कोठी में आयोजित पार्टी में मधुकर के आने पर मधुकर को ‘किस’ देने की शर्त पार्थवी रखती है. अपने दोस्तों के साथ पहुंचकर मधुकर गाना भी गाता है. अब पार्थवी अपना वादा पूरा करने के लिए मधुकर को लेकर कोठी के एक कोने में जाती है. वह ‘किस’ दे इससे पहले ही रतन सिंह व रूप सिंह पहुंचकर पार्थवी को पकड़कर ले जाते हैं और कमरे में बंद कर देते हैं. इधर मधुकर व उसके दोस्त भागकर अपने घर पहुंच जाते हैं. चुनाव जीतने के बाद रतन सिंह पुलिस पर दबाव डालकर मधुकर और उसके दोनों दोस्तों को पुलिस थाने मे खुब पिटवाते हैं. इसकी खबर जब पार्थवी को मिलती है, तो वह विद्रोही हो जाती है.

पुलिस स्टेशन पहुंचकर अपनी कनपटी पर बंदूक रखकर अपने पिता रतन सिंह, भाई रूप सिंह व पुलिस वालों को दूर रहने के लिए कह कर मधुकर के साथ भागती है. मधुकर व पार्थवी पहले मुंबई, फिर नागपुर होते हुए कोलकता पहुंचते है. वहां पर दोनों एक होस्टल में किराए पर कमरा लेकर रहना शुरू करते हैं. मधुकर को एक होटल में तथा पार्थवी को भी एक कंपनी में नौकरी मिल जाती है. उसके बाद दोनो शादी कर लेते हैं. उनका बेटा आदित्य दो साल का हो गया है. उधर पांच साल बाद हुए चुनाव में रतन सिंह चुनाव हार चुके हैं. बीच बीच में पार्थवी अपनी मां से बातें करती रहती है. इधर पार्थवी व मधुकर ने नया मकान खरीदा है और गृहप्रवेश की पूजा है. पार्थवी मां से फोन पर बात करती है, अचानक रतन सिंह फोन छीनकर पार्थवी की बातें सुनते हैं और फिर पार्थवी को जीती रहने का आशीर्वाद दे देते हैं. पर कुछ देर में पार्थवी का भाई रूप सिंह चार पांच लोगों के साथ पार्थवी के घर उपहार लेकर पहुंचते हैं. पार्थवी व मधुकर उनकी आवभगत करते हैं. फिर पूजा के लिए पार्थवी मिठाई लेने जाती है और जब वापस आती है, तो उसके सामने इमारत के नीचे उसके मकान से उसके पति मधुकर व बेटे आदित्य की लाश नीचे गिरती है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ के प्रमोशन के दौरान निर्देशक शशांक खेतान सीना ठोककर दावा कर रहे थे कि यह फिल्म उनकी अपनी व उनकी आवाज वाली फिल्म है. अपनी इसी बात को साबित करने तथा वर्तमान सरकार की ‘बेटी बचाओ’ मुहीम की वकालत करते हुए शशांक खेतान ने ‘धड़क’ में हीरेो व उसके बेटे को मारकर हीरोईन को जिंदा रखा? पर क्या एक इमानदार फिल्मकार के तौर पर उन्हें यह जायज लगा? ज्ञातव्य है कि फिल्म ‘सैराट’ में हीरो व हीरोईन दोनों को हीरोइन का भाई मार देता है और उनका बेटा अनाथ हो जाता है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ न तो संवेदनशील फिल्म बन सकी और न ही इसमें इंसानी भावनाएं ही उभर सकी. कम से कम ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ और ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ जैसी फिल्मों के निर्देशक से इस तरह की उम्मीद नहीं थी. ‘धड़क’ देखकर अहसास होता है कि शशांक खेतान के अंदर की रचनात्मकता खत्म हो चुकी है. परिणामतः दो किरदारों के बीच का प्रेम भी दर्शकों के दिलों तक नही पहुंचता. हां! फिल्म के परदे पर सिर्फ जोधपुर की सुंदर व खूबसूरत लोकेशन की चमक जरुर है, जिसके लिए शशांक खेतान की बजाय फिल्म के कैमरामैन विष्णु राव बधाई के पात्र हैं. पटकथा के स्तर पर भी कुछ किरदारों को सही ढंग से तवज्जो नहीं दी गयी. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी तो फिल्म का अंत ही है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ की शुरुआत बहुत ही धीमी व बोझिल गति से होती है. शायद ‘सैराट’ से अलग ‘धड़क’ लगे इस प्रयास में शशांक खेतान फिल्म व विषय वस्तु के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाए. इंटरवल तक यह फिल्म ‘सैराट’ की तुलना में शून्य साबित होती है. दर्शकों पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं डालती. इंटरवल के बाद फिल्म काफी नाटकीय हो जाती है. फिर भी मानवीय संवेदनाएं व भावनाएं अपना आकार लेती नजर नहीं आती हैं. रोमांस व औनर कीलिंग के साथ क्लास का अंतर, जातिगत भेदभाव, राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के चलते लिए जाने वाले निर्णय जैसे मुद्दे भी ठीक से उभर नहीं पाए. फिल्मकार ने जाति के अंतर को महज एक संवाद में कह कर अपना दायित्व निभा लिया है. समसामयिक भारत के सामाजिक परिवेश में जाति का मुद्दा किस तरह गर्म है, इसे दृष्यों के माध्यम से चित्रित करना भी निर्देशक ने उचित नहीं समझा.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो बेहतर काम करते हुए जान्हवी कपूर काफी खूबसूरत लगी हैं. मगर कई दृश्यों में उन्हें काफी मेहनत करने की जरुरत थी.

मधुकर बागला के किरदार में ईशान खट्टर का अभिनय उनकी पिछली फिल्म ‘बियांड द क्लाउड्स’ के मुकाबले कमजोर ही नजर आता है. मधुकर के दोस्तों के किरदार में दोनों कलाकारों ने बेहतर काम किया है.

जहां तक फिल्म के संगीत का सवाल है, तो फिल्म का पार्श्व संगीत ठीक है. मगर फिल्म के गाने प्रभावित नहीं करते. यहां तक ‘सैराट’ के मूल गाने ‘झिंगाट’ का भी ‘धड़क’ में बंटाधार हो गया. यह गाना ‘धड़क’ में परदे पर भी पसंद नहीं आता.

कुल मिलाकर ‘‘सैराट’’ संग तुलना किए जाने पर ‘धड़क’ कहीं नहीं ठहरती. ‘सैराट’ देख चुके दर्शकों की उम्मीदों पर ‘धड़क’ खरी नहीं उतरती है.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘धड़क’’ का निर्माण ‘धर्मा प्रोडक्शन’ और जी स्टूडियो ने किया है. फिल्म के निर्देशक शशांक खेतान, कहानीकार नागराज मंजुले, फिल्म ‘सैराट’ पर आधारित, पटकथा लेखक शशांक खेतान, संगीतकार अजय अतुल, कैमरामैन विष्णु राव तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं- ईशान खट्टर, जान्हवी कपूर, आशुतोष राणा, अंकित बिस्ट, श्रीधर वाटसर, आदित्य कुमार, ऐश्वर्या नारकर, खरज मुखर्जी व अन्य.

बच्चों को क्रिकेट के पैंतरे सिखाएंगे सचिन तेंदुलकर

भारत के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर से क्रिकेट सीखने वालों की कमी नहीं है. टीम इंडिया से रिटायर होने के बाद अभी तक सचिन ने औपचारिक तौर पर अपनी खुद की कोई कोचिंग एकेडमी नहीं खोली है. लेकिन अब सचिन खुद की ही एक एकेडमी खोलने जा रहे हैं. सचिन ने बुधवार को खुद के मिडिलसेक्स क्रिकेट से जुड़ने की घोषणा की है. सचिन मिडिलसेक्स क्रिकेट के साथ मिलकर अब तेंदुलकर मिडिलसेक्स ग्लोबल एकेडमी (टीएमजीए) खोलने जा रहे हैं.

टीएमजीए एसआरटी स्पोर्ट्स मैनेजमैंट लिमि़टेड और मिडिलसेक्स क्रिकेट के बीच एक संयुक्त उपक्रम होगा. एकेडमी की शुरुआत इंग्लैंड के नार्थवुड मके मर्चेंट टेलर्स स्कूल में आगामी 6 से 9 अगस्त तक होगी. इसके बाद सचिन मुंबई और लंदन में अलग अलग जगहों पर भी बच्चों को अपने अनुभवों का लाभ देंगें. एकेडमी में 9 से 14 साल के बच्चों को प्रशिक्षण किया जाएगा. इस एकेडमी का कोर्स दिग्गज कोचों के साथ सचिन ने खुद तैयार किया है. एकेडमी प्रतिभाशाली गरीब बच्चों को सौ प्रतिशत स्कौलरशिप भी देगी.

उल्लेखनीय है कि मि़डिलसेक्स क्रिकेट से एंड्रयू स्ट्रौस, माइक गैटिंग, डेनिस कामप्टन, जौन एंबुरी, माइक ब्रेयर्ले जैसे दिग्गज खिलाड़ी निकले हैं. सचिन ने इस मौके पर कहा, “मुझे मिडिलसेक्स के साथ इस नए उपक्रम के लिए साझेदारी करने पर खुशी है. एकेडमी का उद्देश्य केवल अच्छे क्रिकेटर ही नहीं बल्कि बढ़िया वैश्विक नागरिक बनाना भी है. अपने छात्रों के लिए हम अपना ध्यान श्रेष्ठ क्रिकेटीय शिक्षा देने पर केंद्रित कर रहे हैं.”

मिडिलसेक्स के सीईओ रिचर्ड गोटले ने कहा, “ यह हमारा सौभाग्य है कि पिछले छह महीने में हमें सचिन तेंदुलकर के साथ काम करने का मौका मिला जिससे हम दुनिया का सबसे बेहतरीन कोचिंग प्रोग्राम तैयार कर सके. हमारा प्रतिष्ठित एकेडमी प्रोग्राम, जिसमें सचिन के अनुभव,ज्ञान और क्षमताओं का खास समावेश है, बच्चों का ऐसा प्रशिक्षण देंगे जिसे वे कभी भूल नहीं पाएंगे.”

शानदार रिकौर्ड का फायदा मिलेगा बच्चों को

तेंदुलकर ने 463 वनडे मैचों की 452 पारियों में कुल 18426 रन बनाए हैं, जिसमें नाबाद 200 रन उनका सर्वोच्च स्कोर है. सचिन ने वनडे में कुल 49 शतक लगाए हैं. वहीं 200 टेस्ट मैचों में सचिन ने 15921 रन बनाए हैं. जिसमें 51 शतक शामिल हैं. सचिन के नाम बहुत से रिकौर्ड हैं लेकिन उनमें सबसे खास यह है कि उन्होंने संन्यास लेने से पहले तक टेस्ट खेलने वाले सभी देशों के खिलाफ उन्हीं की धरती पर 40 से ज्यादा की औसत से रन बनाए हैं. दुनिया का कोई भी खिलाड़ी सभी टेस्ट खेलने वाले देशों में जाकर उनके ही खिलाफ इस रफ्तार से रन नहीं बना पाया है.

इस तरह से माना जाता है कि सचिन को दुनिया के लगभग हर मैदान और हर देश की परिस्थितियों का खासा अनुभव है और इसका लाभ बच्चों को जरूर मिलेगा.

अमर हो गए मशहूर गीतकार गोपालदास नीरज

अपनी काव्य रचनाओं से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाले मशहूर गीतकार गोपालदास नीरज का 93 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. उन्होंने कल शाम 7 बजकर 35 मिनट पर दिल्‍ली के एम्‍स अस्पताल में आखिरी सांस ली.  गोपालदास नीरज के पुत्र शशांक प्रभाकर ने बताया कि वो पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे. बुधवार की शाम को तबियत ज्यादा बिगड़ने पर उन्हें आगरा से दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था. लेकिन डाक्टरों के अथक प्रयासों के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका.

शशांक ने बताया कि उनकी पार्थिव देह को पहले आगरा में लोगों के अंतिम दर्शनार्थ रखा जाएगा. शशांक ने कहा कि उनके पिता नीरज ने अलीगढ़ के एक मेडिकल कालेज को देहदान कर दिया था. इसलिए बौडी कालेज को दी जाएगी. अगर कालेज ने किसी तकनीकी या मेडिकल वजह से नहीं ली तो दाह संस्कार अलीगढ़ में ही होगा.

गौरतलब है कि उनका पूरा नाम गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ था. वह एक मशहूर हिन्दी साहित्यकार ही नहीं बल्कि फिल्मों के गीत लेखक के लिए भी पहचाने जाते थे. 93 वर्षीय नीरज पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें भारत सरकार ने शिक्षा और साहित्य क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर दो-दो बार पद्मश्री और पद्मभूषण नवाजा. उन्हें फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला.

उन्होंने बौलीवुड की कई फिल्मों के लिए गाने भी लिखे. उनके लिखे हुए गाने ‘लिखे जो खत तुझे…’, ‘आज मदहोश हुआ जाए…’, ‘ए भाई जरा देखके चलो…’, ‘दिल आज शायर है, गम आज नगमा है…’, ‘शोखियों में घोला जाये, फूलों का शबाब..’ जैसे तमाम गाने आज भी लोग गुनगुनाते हैं. नीरज द्वारा लिखे गए गीत आज भी काफी लोकप्रिय हैं. उनके निधन से साहित्य जगत को जो हानि हुई है, उसकी भरपाई कर पाना बेहद कठिन है.

कोहली पर दिये अपने बयान से पलटा ये औस्ट्रेलियाई दिग्गज खिलाड़ी

औस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाज पैट कमिंस ने भारतीय कप्तान विराट कोहली को लेकर दिए गए बयान पर सफाई दी है. उन्होंने कहा है कि उनके बयान को दूसरे तरीके से लिया गया. कमिंस ने बीते दिनों कहा था कि कोहली औस्ट्रेलियाई दौरे पर एक भी शतक नहीं बना पाएंगे. उनके इस बयान ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं.

अब कमिंस ने कहा है कि कोहली के खिलाफ उन्होंने जो बयान दिया उस पर जो प्रतिक्रियाएं मिलीं, उससे वह बेहद हैरान हैं.

क्रिकेट डौट कौम डौट एयू ने कमिंस के हवाले से लिखा है, ‘जिस तरह मेरे बयान को लिया गया, मैं उससे उलट कहना चाहता था. मैं कोहली की तारीफ करना चाहता था और कहना चाहता था कि मेरी ख्वाहिश है कि कोहली औस्ट्रेलिया में शतक नहीं बनाएं. वह टीम के अहम खिलाड़ी हैं और रन बनाने वाले बल्लेबाज हैं. इसलिए अगर वह रन नहीं बना पाते हैं, तो इससे हमें जीतने में मदद मिलेगी.’

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कमिंस ने की थी ये भविष्यवाणी

आपको बता दें कि इसके पहले औस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज ने भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली के बारे में भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि इस साल औस्ट्रेलियाई दौरे पर शतक नहीं बना पाएंगे भारतीय कप्तान विराट कोहली. 10 जुलाई को एक कार्यक्रम के में शिरकत करते हुए पैट कमिंस ने मीडिया से बातचीत के दौरान यह बात कही थी कि मुझे लगता है कि इस बार औस्ट्रेलियाई दौरे पर भारतीय कप्तान विराट कोहली शतक नहीं जमा पाएंगे और हम उन्हें यहां आसानी से शिकस्त दे देंगे.

ब्रेट ली ने की थी कोहली की तारीफ

औस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज कमिंस के बयान के बाद औस्ट्रेलिया के पूर्व तेज गेंदबाज ब्रेट ली ने कोहली की तारीफ की थी. उन्होंने कोहली की तारीफ करते हुए कहा था कि कोहली इस बार भी औस्ट्रेलिया में रनों का अंबार लगाएंगे. ली ने कहा कि कोहली की तारीफ करते हुए साल 2014-15 वाले दौरे की याद दिलाते हुए कहा कि औस्ट्रेलिया में कोहली अपना पिछला प्रदर्शन एक बार फिर से दोहराएंगे. साल 2014-15 के औस्ट्रेलिया दौरे पर कोहली ने 4 टेस्ट में 4 शतक लगाए थे. पूरी सीरीज में विराट ने 692 रन बनाए थे.

31 जुलाई से पहले इनकम टैक्स फाइल करने वालों को मिलेंगे ये फायदे

इनकम टैक्स रिटर्न यानी ITR फाइल करने की अंतिम तिथि धीरे-धीरे नजदीक आ रही है. आप 31 जुलाई तक आईटीआर फाइल कर सकते हैं. अगर आप 31 जुलाई को आईटीआर फाइल करने में चूक जाते हैं और 1 अगस्त से 31 दिसंबर के बीच फाइल करते तो आपको 5000 रुपये का जुर्माना देना होगा. लेकिन अगर आपकी कुल आमदनी 5 लाख से कम है तो जुर्माने की रकम 1 हजार ही रह जाती है. लेकिन किसी भी प्रकार के जुर्माने से बचने के लिए जरूरी है कि आप समय से आईटीआर फाइल करें.

हर साल कुछ नौकरीपेशा और बिजनेस करने वाले ऐसे भी लोग होते हैं जो पहली बार आईटीआर फाइल करने वाले हैं. ऐसे लोग और जो आईटीआर फाइल नहीं करते उनके मन में हमेशा यही सवाल उठता रहता है कि आखिर आईटीआर भरने का क्या फायदा होता है. अगर आपके मन भी यही सवाल हैं तो आगे लिखे प्वाइंट में आपकी यह दुविधा दूर हो जाएगी. आईटीआर फाइल करने के एक नहीं बल्कि कई फायदें हैं. जानिए ऐसे ही 5 फायदों के बारे में.

ज्यादा बीमा कवर मिलने में आसानी

समय से और नियमित रूप से आईटीआर फाइल करने वाले अगर एक करोड़ रुपये का इंश्योरेंस कवर (टर्म प्लान) लेना चाहते हैं तो इंश्योरेंस कंपनियां आपसे आईटीआर प्रूफ मांग सकती हैं. आईटीआर प्रूफ दिखाने से आपको आसानी से टर्म प्लान मिल जाता है.

बैंक से लोन और क्रेडिट कार्ड लेना

नियमित तौर पर आईटीआर फाइल करने वाले लोगों को बैंक से किसी प्रकार का लोन या क्रेडिट कार्ड लेने में परेशानी नहीं होती. आजकल तेजी से बढ़ती धोखाधड़ी के बीच बैंकों की तरफ से पूरी जांच पड़ताल के बाद ही लोन दिया जाता है. अगर आप आईटीआर फाइल करते हैं तो आपको कार या होम लोन आसानी से मिल जाता है.

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वीजा पाने में सुविधा

अगर आप कारोबार या नौकरी के लिए विदेश जाना चाहते हैं तो आपके लिए आईटीआर जरूरी है. बहुत से विदेशी दूतावास वीजा एप्लिकेशन के साथ पिछले दो साल का आईटीआर मांगते हैं. अगर आप नियमित आईटीआर फाइल नहीं करते हैं तो आपकी विदेश जाने की प्लानिंग अधर में लटक सकती है.

बिजनेस के लिए जरूरी

अगर आप नौकरी करते हैं और बिजनेस शुरू करने का प्लान कर रहे हैं तो आईटीआर फाइल करना आपके लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है. आप कारोबार शुरू करने जा रहे हैं या आप कोई कौन्ट्रैक्ट हासिल करना चाहते हैं तो आपको आईटीआर दिखाना पड़ेगा. किसी सरकारी विभाग में ठेका हासिल करने के लिए भी पिछले पांच साल का इनकम टैक्स रिटर्न मांगा जाता है.

पते का सबूत

ऊपर बताए गए फायदों के अलावा आईटीआर की कौपी आपके लिए रेजिडेंशन या पते के प्रूफ के रूप में काम करती है. अगर आपके पास अभी भी कोई रेसिडेंशल प्रूफ नहीं है तो आप इसका उपयोग सभी सरकारी कामों में कर सकते हैं.

सड़कों के गड्ढे

सरकारी कर्मचारियों के बढ़ते बोझ और उन की बढ़ती गैरजिम्मेदारी व रिश्वतखोरी से भारत ही नहीं, अमेरिका भी परेशान है. अमेरिका की केंद्र, राज्य व लोकल सरकारों का बजट का खासा हिस्सा उन के कर्मचारियों की देखरेख में लग जाता है. जिस काम के लिए उन्हें रखा गया वह पूरा ही नहीं हो पाता. अमेरिका में अब पिज्जा बनाने वाली डौमिनो कंपनी ने शहरों की दशकों से ठीक नहीं हुई सड़कों को ठीक करने का जिम्मा उठाने की पेशकश की है.

डौमिनो का कहना है कि वह नहीं चाहती कि सड़कों पर हुए गड्ढों के चलते उस का पिज्जा उस के ग्राहकों तक पहुंचने से पहले एक तरफ लुढ़क जाए और उस की टौपिंग पिज्जा के बौटम में चली जाए. इसलिए वह अपने मुनाफे में से सड़कों को ठीक कराएगी. उस की इस पेशकश को अमेरिका के 4 शहर मान भी गए हैं. अमेरिका के शहर अपनेआप में खासे स्वतंत्र होते हैं और पुलिस भी उन की अपनी होती है.

डौमिनो, अमेजौन, डिज्नी, गूगल, फेसबुक जैसी कंपनियां अब धन्ना सेठ बन गई हैं और वे शहरों की सरकारों को तो क्या, कई बड़े देशों की केंद्र सरकार तक को खरीद सकने की हैसियत रखती हैं, ऐसा लगता है. उन्होंने लाखों कर्मचारियों को रखना शुरू कर दिया है.

20-25 वर्षों पहले ऐसी कंपनियां कमाती थीं. वे जो कुछ नया खोज कर पाती थीं, उस का उत्पादन करती थीं, जीवन को सुधारती थीं, बस. अब डौमिनो, मैक्डोनल्ड, नैटफ्लिक्स, गूगल, फेसबुक जैसी कंपनियां तो आर्थिकतौर पर सरकारों का मुकाबला कर रही हैं जबकि कुल मिला कर वे नागरिकों को बहलाफुसला कर ही पैसा कमा रही हैं, कुछ ठोस दे कर नहीं. इन के चलते लोगों की मेहनत का पैसा बरबाद हो रहा है. वे कुछ नया नहीं कमा पा रहे हैं.

डौमिनो तेल और चीनी से भरा सेहत को नुकसान देने वाला पिज्जा या खाने की दूसरी चीजें बना रही है जिस का घर में बहुत सस्ता विकल्प मौजूद है. प्रचार के बल पर इन फूड डिलिवरी कंपनियों ने लोगों को आलसी बना दिया है कि उन्हें किचन में घुसना ही न पड़े और बरतन भी साफ न करने पड़ें. ये लोगों को मोटा व बीमार बना कर लूट रही हैं.

फेसबुक, गूगल निरर्थक गपों से पैसा बना रही हैं. इन कंपनियों ने अपने सदस्यों को लत डलवा दी है कि हर समय मोबाइल पर लगे रहो, कल्याण हो जाएगा.

नतीजा यह है कि लोग आत्मकेंद्रित हो गए हैं. बाहर निकलने से कतराते हैं और सड़कों, गाडि़यों, हवाई जहाजों, रेलों में उन की आंखें मोबाइलों पर जमी रहती हैं. लोग पर्यटनस्थल पर जाते हैं तो वहां का प्राकृतिक सौंदर्य उन की आंखें नहीं देखतीं, मोबाइल कैमरे देखते हैं. और फिर वहां की तसवीरें उन के मित्रों को जबरन देखनी पड़ती हैं.

इसी सब से उत्पादकता कम हो रही है और अमेरिका जैसा देश भी न पुराने शहरों का विकास कर पा रहा है और न नए शहरों का निर्माण. इंफ्रास्ट्रक्चर अगर कमजोर हो रहा है तो डौमिनो, मैक्डोनल्ड और गूगल, फेसबुक की वजह से. वे अपना धंधा चोखा बनाए रखने के लिए शहरों को और आलसी बनाने का लौलीपौप दे रही हैं.

सामने आ गई 100 रूपये के नोट की पहली झलक, आप भी देखें

रिजर्व बैंक औफ इंडिया (RBI) की तरफ से जल्द ही 100 रुपये का नया नोट जारी किया जाएगा. 100 रुपये के नए नोट के पीछे की तरफ गुजरात की ऐतिहासिक रानी की बाव का चित्र दिया गया है. 8 नवंबर 2016 को हुई नोटबंदी के बाद आरबीआई की तरफ से 10, 50, 200, 500 और 2000 के नए नोट जारी करने के बाद अब 100 रुपये का नया नोट जल्द बाजार में आ जाएगा. एक समाचार एजेंसी की तरफ से मुहैया कराई गई नए नोट की तस्वीर में दिखाई दे रहा है कि यह हल्के बैगनी कलर का होगा.

चलन में रहेगा पुराना नोट

इस सबके बीच अगर आपके मन भी यह सवाल उठ रहा है कि पुराने नोट का क्या होगा. रिजर्व बैंक की तरफ से साफ कर दिया गया है कि नया नोट बाजार में आने के बाद पुराना नोट भी चलन में रहेगा. सूत्रों के अनुसार 100 रुपये के नए नोट के डिजाइन को अंतिम रूप मैसूर की उसी प्रिंटिंग प्रेस में दिया गया, जहां 2000 के नोट की छपाई होती है.

50 के नोट से बड़ा होगा साइज

इस नोट के साइज की बात करें तो यह 50 रुपये के नए नोट से बड़ा और मौजूदा 100 रुपये के नोट से छोटा होगा. हाल ही में एक हिंदी अखबार में छपी खबर के मुताबिक 100 रुपये के नए नोट की छपाई बैंक नोट प्रेस देवास में चल रही है. अखबार के अनुसार मैसूर में जो शुरुआती नमूने छापे गए थे, उनमें विदेशी स्याही का उपयोग हुआ था. देवास में देशी स्याही का उपयोग के चलते नमूने से रंग मिलान में आई परेशानी को भी हल कर लिया गया है.

गौरतलब है कि 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने देश में 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने का ऐलान किया था. इसके बाद आरबीआई ने 2000 और 500 रुपये का नया नोट जारी किया था. इससे पहले आरबीआई ने अगस्त 2017 में 200 रुपये का नया नोट जारी किया था.

बेटी ने दी बाप के कत्ल की सुपारी

अप्रैल के महीने में यूं तो इतनी गरमी नहीं पड़ती, लेकिन 2018 का अप्रैल महीना इस बार शुरू से ही कुछ ज्यादा गरमाने लगा था. इसीलिए जल्दी बंद होने वाले बाजार भी देर तक खुलने लगे थे. दिल्ली से मात्र 60 किलोमीटर दूर बसे उत्तर प्रदेश के शामली जिले में एक मोहल्ला है दयानंद नगर, जो शहर के सब से बड़े नाले के किनारे तंग गलियों वाला मोहल्ला है. इसी मोहल्ले में राकेश रूहेला अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कृष्णा के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था.

राकेश दिल्ली के शाहदरा के भोलानाथ नगर स्थित बाबूराम टैक्नीकल इंस्टीट्यूट में लैब टेक्नीशियन की नौकरी करते थे. वह सुबह 7 बजे अपने घर से निकल कर करीब डेढ़ किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन तक पैदल जाते थे. वहां से दिल्ली जाने वाली ट्रेन में सवार हो कर वह शाहदरा रेलवे स्टेशन पर उतरते और अपने इंस्टीट्यूट पहुंचते थे. शाम को भी वह इसी तरह ड्यूटी पूरी कर घर पहुंचते थे. ये उन का लगभग रोज का रूटीन था.

7 अप्रैल, 2018 की रात भी राकेश रूहेला रोजमर्रा की तरह करीब साढ़े 9 बजे दिल्ली से अपनी ड्यूटी खत्म कर के ट्रेन से शामली पहुंचे और वहां से नाला पट्टी रोड से पैदल घर की तरफ जा रहे थे.

रात करीब पौने 10 बजे वह अपने घर की गली के मोड़ के करीब पहुंचे ही थे कि उन के पास अचानक 2 युवक तेजी से आए, उन में से एक ने उन के पास जा कर गोली चला दी.

फायर की आवाज सुन कर आसपास खुली इक्कादुक्का दुकानों पर खड़े लोगों ने जब तक पलट कर देखा तब तक राकेश लहरा कर जमीन पर गिर चुके थे और उन्हें गोली मारने वाले दोनों युवक तेजी से विपरीत दिशा की तरफ भाग रहे थे.

लोगों ने देखते ही पहचान लिया कि गोली लगने के बाद जमीन पर खून से लथपथ पड़ा व्यक्ति राकेश रूहेला है. गली के नुक्कड़ पर ही किराने की दुकान चलाने वाला शैलेंद्र कुछ लोगों की मदद से जख्मी राकेश को एक टैंपो में लाद कर जिला अस्पताल ले गया. कुछ लोगों ने तब तक राकेश के घर जा कर इस बात की सूचना दे दी कि किसी ने राकेश पर गोली चलाई है.

मौत पर पत्नी और बेटी का नाटक

इस के बाद उन के घर में कोहराम मच गया. राकेश की पत्नी कृष्णा और बेटा तत्काल आसपड़ोस के लोगों को साथ ले कर सरकारी अस्पताल पहुंच गए. कृष्णा ने 3 नंबर गली में रहने वाले अपने देवर मुकेश को फोन कर के सारी बात बताई और जल्दी से सरकारी अस्पताल पहुंचने के लिए कहा. सरकारी अस्पताल पहुंचने के बाद घर वालों को डाक्टरों ने बताया कि राकेश की रास्ते में ही मौत हो चुकी थी.

पति की मौत की खबर सुनते ही कृष्णा का विलाप शुरू हो गया. मुकेश कुछ लोगों को साथ ले कर शामली कोतवाली पहुंचा, उस वक्त तक रात के करीब 11 बज चुके थे. थाने में मौजूद एसएसआई रफी परवेज को उस ने भाई की हत्या की जानकारी दी.

उस वक्त थानाप्रभारी अवनीश गौतम क्षेत्र की गश्त पर निकले हुए थे. जैसे ही थानाप्रभारी को इस घटना की खबर मिली तो उन्होंने एसएसआई को शिकायत की तहरीर ले कर मुकदमा दर्ज कराने और पुलिस दल के साथ सरकारी अस्पताल पहुंचने के निर्देश दिए.

राकेश का शव अस्पताल में ही रखा हुआ था. एसएसआई रफी परवेज ने मुकेश से ली गई तहरीर के आधार पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

इस के बाद वह एसआई सत्यनारायण दहिया, महिला एसआई नीमा गौतम, कांस्टेबल प्रताप व अन्य स्टाफ को साथ ले कर सरकारी अस्पताल पहुंच गए. तब तक थानाप्रभारी अवनीश गौतम भी वहां पहुंच गए.

घटना की सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी गई थी. इसलिए सूचना मिलने के बाद सीओ (सिटी) अशोक कुमार सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस के सभी अधिकारियों ने मृतक के परिवार वालों के अलावा राकेश को अस्पताल लाने वाले शैलेंद्र से राकेश पर हमला करने वालों और घटनाक्रम के बारे में पूछताछ की. लेकिन न तो किसी ने ये बताया कि वे हमलावरों को पहचानते हैं, न ही परिजनों ने किसी पर हत्या का शक जताया.

हां, इतना जरूर पता चला कि मृतक अपने औफिस के लोगों और जानपहचान वालों के साथ मिल कर महीने की कमेटी डालने का काम करता था. अकसर उस के पास कमेटी की रकम होती थी.

परिजनों ने आशंका जताई कि कहीं राकेश को किसी ने लूटपाट के उद्देश्य से तो गोली नहीं मार दी. मगर घटनास्थल पर बतौर चश्मदीद शैलेंद्र व अन्य लोगों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि गोली चलने के तुरंत बाद हमलावर तेजी से भाग गए थे. उन्होंने राकेश से किसी तरह की छीनाझपटी होते नहीं देखी.

पुलिस को भी चश्मदीदों की बात में सच्चाई दिखी, क्योंकि राकेश की जेब में रुपयों से भरा पर्स, अंगुली में सोने की अंगूठी, कलाई में घड़ी और हाथ में लिया बैग एकदम सहीसलामत थे. रात बहुत अधिक हो चुकी थी, इसलिए पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

अगले दिन सीओ (सिटी) और थानाप्रभारी ने जांच अधिकारी रफी परवेज के साथ बैठ कर जब पूरे घटनाक्रम पर विचार करना शुरू किया तो उन्हें लगा कि मामला उतना सीधा नहीं है, जितना दिखाई पड़ रहा है.

क्योंकि अगर बदमाशों को लूटपाट या छीनाझपटी करने के लिए राकेश को गोली मारनी होती तो वे किसी सुनसान जगह को चुनते न कि उस के घर के पास ऐसी जगह को, जहां लोगों की काफी आवाजाही थी.

पुलिस को बेलने पड़े पापड़

पुलिस को लगा कि या तो हत्या किसी रंजिश के कारण की गई है या फिर किसी ऐसे कारण से जो फिलहाल पुलिस की नजरों से छिपा है. थानाप्रभारी एक बार फिर राकेश रूहेला के घर पहुंचे. उन्होंने राकेश की पत्नी, उन की दोनों बेटियों, बेटे और भाई मुकेश से पूछताछ की.

किसी ने भी राकेश की हत्या के लिए न तो किसी पर शक जाहिर किया और न ही किसी से रंजिश की बात बताई. सीओ (सिटी) अशोक कुमार सिंह ने क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर धर्मेंद्र पंवार को भी बुला कर अपराध की इस गुत्थी को सुलझाने के काम पर लगा दिया.

राकेश की हत्या के अगले दिन पुलिस का सारा वक्त घर वालों और जानपहचान वालों से पूछताछ में लग गया. दोपहर बाद पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद राकेश का शव घर वालों को सौंप दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि राकेश की मौत सिर में गोली लगने से हुई थी और गोली करीब डेढ़ फुट की दूरी से मारी गई थी, जिस का मतलब था कि हत्यारे राकेश की हत्या करना चाहते थे.

अगले दिन राकेश की हत्या की जांच का काम तेजी से शुरू हो गया. कातिल तक पहुंचने के लिए पुलिस के पास बस अब एक ही रास्ता था कि वह इलाके में लगे सीसीटीवी की फुटेज का सहारा ले कर पता लगाए कि राकेश को गोली मारने वाले कौन लोग थे.

हांलाकि इस दौरान क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर धर्मेंद्र पंवार ने अपनी टीम के साथ इलाके में सक्रिय लूटपाट गिरोह से जुड़े कई बदमाशों को हिरासत में ले कर पूछताछ कर ली थी. सत्यता की जांच के लिए तमाम बदमाशों के मोबाइल नंबरों की लोकेशन भी देखी गई, मगर इस वारदात में किसी के भी शामिल होने की पुष्टि नहीं हो सकी.

सीसीटीवी से खुलना शुरू हुआ राज

इधर थानाप्रभारी अवनीश गौतम ने स्टेशन से घटनास्थल तक लगे 6 सीसीटीवी कैमरों की जांच की, तो पता चला कि उन में से एक खराब था. कुल बचे 5 सीसीटीवी कैमरे बाकायदा काम कर रहे थे. पुलिस को पूरी उम्मीद थी कि अगर हत्यारे काफी दूर से राकेश रूहेला का पीछा कर रहे थे तो कहीं न कहीं वे सीसीटीवी फुटेज में जरूर कैद हुए होंगे.

थाना पुलिस ने क्राइम ब्रांच की मदद से इन सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखनी शुरू कर दीं. इसी बीच 12 अप्रैल को कोतवाली प्रभारी अवनीश गौतम का तबादला हो गया. उन की जगह जितेंद्र सिंह कालरा आए.

जितेंद्र सिंह कालरा को यूपी पुलिस में सुपरकौप के नाम से जाना जाता है. कार्यभार संभालते ही नए थानाप्रभारी का सामना सब से पहले राकेश रूहेला के पेचीदा केस से हुआ. उन्होंने इस मामले में अब तक की गई जांच पर नजर डाली.

राकेश हत्याकांड के हर पहलू को बारीकी से समझने के बाद कालरा को लगा कि जांच आगे बढ़ने से पहले उन्हें उन सीसीटीवी फुटेज को जरूर देखना चाहिए.

कालरा ने क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर धर्मेंद्र पंवार और उन की टीम के साथ बैठ कर फुटेज देखने का काम शुरू किया. 5 घंटे तक फोरैंसिक एक्सपर्ट के साथ सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद आखिर पुलिस को एक बड़ी कामयाबी मिली.

पता चला कि जिस जगह राकेश रूहेला को गोली मारी गई थी, उस से 50 कदम की दूरी पर एक इलैक्ट्रौनिक शौप से राकेश ने कुछ सामान खरीदा था. उसी समय 2 युवक राकेश का पीछा करते हुए दिखे. इन में से एक के हाथ में तमंचे जैसा हथियार दिखाई दे रहा था.

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हालांकि उन के चेहरे पूरी तरह तो नहीं दिख रहे थे, लेकिन आकृति देख कर ऐसा कोई भी व्यक्ति जिस ने उन लोगों को पहले कभी देखा हो, पहचान कर बता सकता था कि वे कौन हैं. सब से पहले थानाप्रभारी ने उस रात घटनास्थल के चश्मदीदों, इस के बाद मुकेश को थाने बुला कर उन से फुटेज देख कर कातिल की पहचान करने को कहा.

राकेश रूहेला की पत्नी कृष्णा व दोनों बेटियों तथा कृष्णा के देवर मुकेश ने सीसीटीवी में दिखे उन 2 लोगों को पहचानने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन पुलिस को 2 ऐसे व्यक्ति मिल गए, जिन्होंने जांच को एक नई दिशा दे दी.

जिस किराने की दुकान के सामने राकेश को गोली मारी गई थी, उस समय उस दुकान के पास शैलेंद्र सिंह और राकेश का बेटा विशाल खड़े थे, उन्होंने सीसीटीवी में दिख रहे संदिग्धों की पहचान कर ली. शैलेंद्र ने फुटेज में दिख रहे दोनों युवकों की पहचान कर बताया कि राकेश को गोली मार कर जो युवक भागे थे, उन की आकृति बिलकुल सीसीटीवी फुटेज में दिखाई पड़ रहे युवकों जैसी ही थी.

संदेह गहराता गया, दायरा छोटा होता गया

शैलेंद्र ने बताया कि इन में से एक युवक को उस ने कई बार उसी गली में आतेजाते देखा था, जहां राकेश का घर था. कालरा ने गली के नुक्कड़ पर खड़े रहने वाले कुछ दूसरे लोगों से कुरेद कर पूछा तो उन्होंने भी दबी जुबान से बताया कि उन्होंने उस युवक को कई बार दिन में राकेश के घर आतेजाते देखा था.

इस के बाद थानाप्रभारी कालरा ने मृतक के परिजनों को भी सीसीटीवी फुटेज दिखाई. परिवार के सभी सदस्यों में से सिर्फ राकेश के 20 वर्षीय बेटे विशाल ने बताया कि सीसीटीवी में दिख रहे युवक का नाम समीर है, जो उस की बहन वैष्णवी उर्फ काव्या का पूर्व सहपाठी है और अकसर काव्या से मिलने के लिए भी आता था.

यह बात चौंकाने वाली थी. क्योंकि जब सीसीटीवी में दिख रहे युवक को राकेश की पत्नी व बेटियां जानतीपहचानती थीं तो उन्होंने उसे पहचानने से इनकार क्यों किया.

थानाप्रभारी कालरा को साफ लगने लगा कि दाल में कुछ काला है. क्योंकि जबजब उन्होंने कृष्णा और उस की दोनों बेटियों से पूछताछ की, तबतब वो रोनेबिलखने के साथ पूछताछ के मकसद को भटका देती थीं.

कालरा ने मृतक की पत्नी कृष्णा और उस के बच्चों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि कृष्णा की छोटी बेटी काव्या और समीर के बीच घटना के 2 दिन पहले से दिन और रात में कई बार बातचीत हुई थी. इतना ही नहीं जिस वक्त वारदात को अंजाम दिया गया, उस के कुछ देर बाद भी 3-4 बार दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई थी. समीर के मोबाइल नंबर की लोकेशन भी घटनास्थल के पास की मिली.

अब पूरी तरह साफ हो चुका था कि राकेश रूहेला की हत्या में कहीं न कहीं समीर शामिल है. पुलिस को यह भी पता चल गया कि समीर मोहल्ला हाजीपुरा नाला पटरी में रहने वाले डा. जरीफ का बेटा है.

समीर आया पुलिस की पकड़ में

थानाप्रभारी कालरा के पास अब समीर को पूछताछ के लिए हिरासत में लेने के लिए तमाम सबूत थे. उन्होंने टीम के सदस्यों को उस का सुराग लगाने को कहा. आखिर एक कांस्टेबल की सूचना पर उन्होंने 17 अप्रैल को नाला पटरी के पास खेड़ी करमू के रेस्तरां से उसे हिरासत में ले लिया. उस समय उस के साथ मृतक राकेश की बेटी काव्या के अलावा समीर का चचेरा भाई शादाब भी था.

थानाप्रभारी ने समीर को थाने ले जा कर पूछताछ की तो उसे टूटने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. समीर ने कबूल कर लिया कि राकेश रूहेला की हत्या उस ने ही अपने चचेरे भाई शादाब के साथ मिल कर की थी और हत्या करने के लिए काव्या ने ही उसे मजबूर किया था. समीर से पूछताछ के बाद हत्या की जो हैरतअंगेज कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी.

काव्या की समीर के साथ पिछले 3 सालों से दोस्ती थी. वे दोनों हाईस्कूल में साथ पढ़ते थे. इंटरमीडिएट तक पढ़ाई के बाद काव्या कैराना स्थित एक कालेज से बीएससी करने लगी, जबकि समीर को उस के घर वालों ने एमबीबीएस की कोचिंग करने के लिए राजस्थान के कोटा में अपने एक रिश्तेदार के पास भेज दिया.

दरअसल, समीर के पिता जरीफ बीएएमएस डाक्टर थे और शामली में अपना क्लीनिक चलाते थे. उन की चाहत थी कि समीर बड़ा हो कर डाक्टर बने. इसीलिए उन्होंने डाक्टरी की कोचिंग के लिए उसे कोटा भेज दिया था. उन के रिश्तेदार का बेटा भी समीर के साथ ही एमबीबीएस की तैयारी कर रहा था.

काव्या से शुरू हुई समीर की दोस्ती गुजरते वक्त के साथ प्यार में बदल गई थी. काव्या के प्रति समीर की चाहत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि एक दिन उस ने अपने हाथ पर उस का नाम भी गुदवा लिया. काव्या को यह तो पता था कि समीर उस पर मरता है लेकिन उसे ये नहीं मालूम था कि उस की दीवानगी में वह उस का नाम अपने हाथ पर भी गुदवा लेगा.

इधर इंटरमीडिएट के बाद दोनों चोरीछिपे पढ़ाई के बहाने कभी घर में तो कभी घर के बाहर मिलतेजुलते थे. धीरेधीरे यह बात राकेश के कानों तक जा पहुंची. राकेश की पत्नी कृष्णा के संबध भी अपने पति से ठीक नहीं थे.

दरअसल, तेजतर्रार और चंचल स्वभाव वाली कृष्णा के चरित्र पर राकेश को पहले से ही शक था. राकेश को भनक थी कि कृष्णा उस के ड्यूटी जाने के बाद घर से बाहर अपने चाहने वालों से मिलती रहती है. राकेश को तो इस बात का भी शक था कि कृष्णा के चाहने वाले उस से मिलने के लिए घर में भी आते हैं.

यही कारण था कि अकसर राकेश और कृष्णा के बीच झगड़ा होता रहता था. अपनी इसी झल्लाहट में राकेश कृष्णा पर अकसर हाथ भी छोड़ देता था. जब राकेश शराब पी लेता तो वह कृष्णा को न सिर्फ गालियां देता, बल्कि मारपीट करने के दौरान यहां तक तंज कस देता कि उसे शक है कि उस की तीनों औलाद असल में उस की हैं या किसी और की.

पिता का विरोध करने के लिए जब उस की दोनों बेटियां वैशाली और वैष्णवी उर्फ काव्या कोशिश करतीं तो उन्हें भी राकेश की मार का शिकार होना पड़ता.

इस दौरान जब एक दिन राकेश को पता चला कि काव्या का चक्कर समीर नाम के एक मुसलिम युवक से चल रहा है तो उन का गुस्सा और बढ़ गया. उस ने पत्नी के साथ अब दोनों बेटियों पर भी लगाम कसनी शुरू कर दी. हालांकि समीर एमबीबीएस की तैयारी करने के लिए कोटा जरूर चला गया था, लेकिन वह हर हफ्ते चोरीछिपे अपने परिवार को बताए बिना शामली आता और काव्या से मिल कर चला जाता था.

काव्या और समीर की दोस्ती और परवान चढ़ रहे प्यार की कहानी की खबर काव्या की मां कृष्णा और उस की बड़ी बहन वैशाली को थी. इस की जानकारी राकेश को जब मोहल्ले के कुछ लोगों से मिली तो उस ने काव्या के साथ सख्ती से पेश आना शुरू कर दिया.

राकेश थक गया था लोगों के ताने सुन कर

शक की आग में जल रहे राकेश के गुस्से में एक दिन उस समय घी पड़ गया, जब वह अपनी ड्यूटी से घर लौट रहा था. मोहल्ले के ही एक व्यक्ति ने उसे रोक कर कहा, ‘‘राकेश भाई, आंखों पर ऐसी कौन से पट्टी बांध रखी है आप ने, जो दूसरे मजहब का एक लड़का सरेआम आप की बेटी को ले कर घूमता है. आप के घर आताजाता है. लेकिन न तो आप उसे रोक रहे हैं और न ही आप की धर्मपत्नी. अरे भाई अगर कोई डर या कोई दूसरी वजह है तो हमें बताओ, हम रोक देंगे उस लड़के को.’’

उस दिन कालोनी के व्यक्ति का ताना सुन कर राकेश के तनबदन में आग लग गई. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. इस से पहले भी अलगअलग लोगों ने दबी जुबान में इस बात की शिकायत की थी, लेकिन अब काव्या की शिकायतें खुल कर होने लगीं. खुद राकेश ने भी एकदो बार समीर को अपने घर आते देखा था.

राकेश ने पहले समीर को समझा कर कह दिया कि वह उस के घर न आया करे, क्योंकि काव्या से उस का मिलनाजुलना उन्हें पसंद नहीं है. बाद में जब समझाने पर भी समीर नहीं माना तो उस ने समीर को एक बार 2-3 थप्पड़ भी जड़ दिए. साथ ही धमकी भी दी कि अगर फिर कभी काव्या से मिलने की कोशिश की तो वह उसे पुलिस को सौंप देंगे.

इस के बाद से समीर ने काव्या से मिलने में सावधानी बरतनी शुरू कर दी. अब या तो वह काव्या से सिर्फ उस के घर पर ही मिलता था या फिर दोनों शहर से बाहर कहीं दूर जा कर मिलते थे.

राकेश के ड्यूटी पर निकल जाने के बाद घर में क्याक्या होता, यह खबर रखने के लिए राकेश ने अपने घर में सीसीटीवी कैमरे लगवा लिए. इन सीसीटीवी कैमरों का मौनीटर उस ने अपने मोबाइल फोन में इंस्टाल करवा लिया. इसी सीसीटीवी के जरिए वह राज खुल गया, जिस का राकेश को शक था. उस ने मौनीटर पर खुद देखा कि किस तरह उस की गैरमौजूदगी में उस की पत्नी और बेटी से मिलने के लिए उन के आशिक उसी के घर में आते हैं.

पहले पत्नी उतरी विरोध पर

पत्नी और बेटी के चरित्र के इस खुलासे के बाद राकेश का मन बेटियों और पत्नी के प्रति खट्टा हो गया. राकेश के लिए पत्नी और बेटियों के साथ मारपीट करना अब आए दिए की बात हो गई.

रोजरोज की मारपीट और बंधनों से परेशान कृष्णा ने एक दिन अपनी दोनों बेटियों के सामने खीझते हुए बस यूं ही कह दिया कि जिंदा रहने से तो अच्छा है कि ये इंसान मर जाए, पता नहीं वो कौन सा दिन होगा जब हमें इस आदमी से छुटकारा मिलेगा.

बस उसी दिन काव्या के दिलोदिमाग में ये बात बैठ गई कि जब तक उस का पिता जिंदा है, वह और उस की मांबहनें आजादी की सांस नहीं ले सकतीं, न ही अपनी मरजी से जिंदगी जी सकती हैं.

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काव्या के दिमाग में उसी दिन से उधेड़बुन चलने लगी कि आखिर ऐसा क्या किया जाए कि उस का पिता उन के रास्ते से हट जाए. अचानक उस की सोच समीर पर आ कर ठहर गई. उसे लगने लगा कि समीर उस से जिस कदर प्यार करता है, बस एक वही है, जो उस की खातिर ये काम कर सकता है.

लेकिन इस के लिए जरूरी था कि समीर को भावनात्मक रूप से और लालच दे कर इस काम के लिए तैयार किया जाए. इस बात का जिक्र काव्या ने अपनी मां से किया तो उस ने भी हामी भर दी. बस फिर क्या था काव्या मौके का इंतजार करने लगी.

एक दिन मौका मिल गया. समीर ने रोजरोज चोरीछिपे मिलने से परेशान हो कर काव्या से कहा कि वह इस तरह मिलनेजुलने से परेशान हो चुका है, क्यों न वे दोनों भाग जाएं और शादी कर लें.

पिता को बताया जल्लाद

काव्या ने कहा कि वह उस से भाग कर नहीं बल्कि पूरे जमाने के सामने ही शादी करेगी लेकिन इस के लिए एक समस्या है. काव्या ने समीर से कहा कि उस के पिता उन के प्रेम में बाधा बने हैं. उन के जीते जी कभी वे दोनों एक नहीं हो सकते. उन के मेलजोल के कारण ही पिता आए दिन पूरे परिवार के साथ मारपीट करते है.

यदि वह उन्हें रास्ते से हटा दे तो वह उस के साथ शादी कर लेगी. काव्या ने समीर को ये भी लालच दिया कि सहारनपुर में उन का एक 100 वर्गगज का प्लौट है. अगर वो उस के पिता की हत्या कर देगा तो वह प्लौट वह उस के नाम कर देगी.

‘‘काव्या, ये तुम कैसी बात कर रही हो. ठीक है वो तुम लोगों के साथ सख्ती करते हैं, लेकिन इस का मतलब ये तो नहीं कि तुम उन की हत्या करने की बात सोचो.’’ समीर बोला.

‘‘समीर, तुम मेरी बात समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे हो. तुम्हें पता नहीं मेरा बाप इंसान नहीं है जानवर है, जानवर. वो सिर्फ मुझे ही नहीं मेरी बहन और मां को भी छोटीछोटी बात पर पीटता है.’’

काव्या ने समीर के सामने अपने पिता को ऐसे जल्लाद इंसान के रूप में पेश किया कि समीर को यकीन हो गया कि राकेश की हत्या के बाद ही काव्या और उस के घर वालों को चैन की सांस मिल सकेगी. लिहाजा उस ने काव्या से वादा किया कि वह किसी भी तरह उस के पिता की हत्या कर के रहेगा.

काव्या ने एक और बात कही, जिस से समीर का मनोबल और बढ़ गया. उस ने समीर को बताया कि उस के पिता कमेटी डालने का धंधा भी करते हैं, जिस की वजह से रोज उन के पास हजारों रुपए रहते हैं. काव्या ने उसे समझाया कि जब तुम उन्हें गोली मारो तो उन का बैग छीन कर भाग जाना, इस से लगेगा कि उन की हत्या लूट के लिए हुई है. और हां, बैग में जो भी रकम हो वो तुम्हारी.

इस के बाद समीर के सामने समस्या यह थी कि वह राकेश की हत्या करने के लिए हथियार कहां से लाए. लिहाजा उस ने काव्या से सवाल किया, ‘‘यार, तुम्हारे बाप को तो मैं मार दूंगा लेकिन समस्या ये है कि मेरे पास कोई पिस्तौल वगैरह तो है नहीं फिर मारूंगा कैसे?’’

‘‘तुम उस की फिक्र मत करो. कैराना में हुए दंगों के वक्त पापा ने अपनी हिफाजत के लिए एक तमंचा खरीदा था, साथ में कुछ कारतूस भी हैं. मैं 1-2 दिन में तुम्हें ला कर दे दूंगी. उसी से गोली मार देना उन को.’’

समीर न तो पेशेवर अपराधी था और न ही उस में अपराध करने की हिम्मत थी. इसलिए उस ने अपने चाचा अनीस के बड़े बेटे शादाब से बात की. वह समीर का ही हमउम्र था. दोनों की खूब पटती थी.

जब समीर ने अपनी मोहब्बत की मजबूरी शादाब के सामने बयां की तो वह भी पशोपेश में पड़ गया. समीर ने शादाब को ये भी बता दिया था कि इस काम को करने के बाद उसे न सिर्फ उस की मोहब्बत मिल जाएगी बल्कि सहारनपुर में 100 वर्गगज का एक प्लौट तथा वारदात के बाद कुछ नकदी भी मिलेगी, जिस में से वह उसे भी बराबर का हिस्सा देगा.

शादाब भी लड़कपन की उम्र से गुजर रहा था. लालच ने उस के मन में भी घर कर लिया. इसलिए उस ने समीर से कह दिया, ‘‘चल भाई, तेरी मोहब्बत के लिए मैं तेरा साथ दूंगा.’’

वारदात से 3 दिन पहले किसी बात पर राकेश ने फिर से अपनी पत्नी कृष्णा और बेटी काव्या की पिटाई कर दी. जिस के बाद काव्या को लगा कि अब पिता को रास्ते से हटाने में देर नहीं करनी चाहिए.

उस ने अगली सुबह ही समीर को फोन कर उसे एक जगह मिलने के बुलाया और वहां उसे घर में रखा पिता का तमंचा और 2 कारतूस ले जा कर सौंप दिए.

खेला मौत का खेल

उसी दिन उस ने अपने पिता की हत्या के लिए 7 अप्रैल की तारीख भी मुकर्रर कर दी. काव्या ने समीर से साफ कह दिया कि अब वह उस से उसी दिन मिलेगी जब वह उस के पिता की हत्या को अंजाम दे देगा. मोहब्बत से मिलने की आस में समीर ने भी अब देर करना उचित नहीं समझा.

7 अप्रैल को जब राकेश अपनी ड्यूटी पर गया तो उस दिन सुबह से ही समीर काव्या से लगातार फोन पर संपर्क में रहा. और दिन भर ये जानकारी लेता रहा कि उस के पिता दिल्ली से कब चलेंगे. काव्या वैसे तो अपने पिता को फोन नहीं करती थी, लेकिन उस दिन उस ने दिन में 2 बार उन्हें किसी न किसी बहाने फोन किया.

शाम को भी करीब साढे़ 8 बजे काव्या ने पिता को फोन कर के पूछा कि वह कहां हैं. राकेश ने बेटी को बताया कि वह ट्रेन में हैं. काव्या ने फोन करने की वजह छिपाने के लिए कहा कि इलैक्ट्रिक प्रेस का प्लग खराब हो गया है, जब वह घर आएं तो बिजली वाले की दुकान से एक प्लग लेते आएं.

बस ये जानकारी मिलते ही काव्या ने समीर को फोन कर के बता दिया कि उस के पिता रोज की तरह 9, सवा 9 बजे तक शामली स्टेशन पहुंच जाएंगे. जिस के बाद समीर भी शादाब को लेकर स्टेशन पहुंच गया.

रात को करीब साढ़े 9 बजे राकेश जब स्टेशन से बाहर आया तो समीर व शादाब उस का पीछा करने लगे. रास्ते में कई जगह ऐसा मौका आया कि एकांत पा कर वे राकेश पर गोली चलाने ही वाले थे कि अचानक किसी गाड़ी या राहगीर के आने पर वे राकेश को गोली न मार सके. इसी तरह पीछा करतेकरते दोनों राकेश के घर के करीब पहुंच गए.

इस दौरान राकेश ने बिजली की दुकान से इलैक्ट्रिक प्रेस का प्लग खरीदा और फिर घर की तरफ चल दिया. समीर को लगा कि अगर वह अब भी राकेश का काम तमाम नहीं कर सका तो मौका हाथ से निकल जाएगा और काव्या कभी उसे नहीं मिल सकेगी. उस ने तमंचा झट से शादाब के हाथ में थमा दिया और बोला, ‘‘ले भाई, मार दे इसे गोली.’’

सब कुछ अप्रत्याशित ढंग से हुआ. शादाब ने तमंचा हाथ में लिया और भागते हुए बराबर में पहुंच कर राकेश पर गोली चला दी. गोली मारने के बाद समीर और शादाब ने पलट कर यह भी नहीं देखा कि गोली राकेश को कहां लगी है और वो जिंदा है या मर गया.

बस उन्हें डर था कि वो कहीं पकड़े न जाएं, इसलिए वे तुरंत घटनास्थल से भाग गए. समीर ने सुरक्षित स्थान पर पहुंचते ही काव्या को फोन कर के सूचना दे दी कि उस ने उस के पिता को गोली मार दी है.

इस के बाद रात भर में काव्या और समीर के बीच कई बार बातचीत हुई. समीर को ये जान कर सुकून मिला कि गोली सही निशाने पर लगी और उस ने राकेश का काम तमाम कर दिया है.

समीर ने तमंचा और बचा हुआ एक कारतूस उसी रात घर के पास नाले के किनारे एक झाड़ी में छिपा कर रख दिया था, जिसे पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद उस की निशानदेही पर बरामद कर लिया. पुलिस ने इस मामले में हत्या के अभियोग के अलावा समीर और शादाब के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला भी दर्ज कर लिया.

एक गोली ने खत्म की लव स्टोरी

विस्तृत पूछताछ के बाद थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह कालरा ने समीर और शादाब के साथ काव्या को भी हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया.

लिहाजा 3 दिन तक जांच और कुछ अन्य साक्ष्य जुटाने के बाद थानाप्रभारी कालरा के निर्देश पर पुलिस टीम ने कृष्णा और वैशाली को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने पुलिस पूछताछ में राकेश की हत्या की साजिश में शामिल होने का अपराध कबूल कर लिया. पुलिस ने 17 अप्रैल को दोनों को जेल भेज दिया.

अनैतिक रिश्तों का विरोध करने वाले पति और पिता की हत्या की सुपारी देने वाली मां और बेटियां तो जेल में अपने किए की सजा भुगत ही रही हैं, लेकिन समीर ने प्रेम में अंधे हो कर अपने डाक्टर बनने के सपने को खुद ही तोड़ दिया.

– कथा पुलिस की जांच और काररवाई पर आधारित

भैया मोरे…

अजय सिंह उर्फ राहुल भैया कोई ऐरेगैरे नेता नहीं हैं बल्कि अपने दौर के दिग्गज कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह के बेटे हैं जो मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. पिछले दिनों उन की अति बुजुर्ग मां सरोज सिंह व्हीलचेयर पर बैठ कर भोपाल की एक अदालत में यह फरियाद ले कर पहुंचीं कि अजय ने उन्हें पति की जायदाद से नाजायज तरीके से बेदखल सा कर रखा है, लिहाजा, उन्हें इंसाफ दिलाया जाए. मामला चूंकि हाईप्रोफाइल था, इसलिए इस के खूब चर्चे रहे.

मामले का पहाड़ जब खुदा तो उस में से निकली अर्जुन सिंह की बेटी वीणा सिंह, जो कभी कांग्रेस के खिलाफ निर्दलीय लोकसभा चुनाव लड़ी थीं. समझने वालों को इतनाभर समझ आया कि असल लड़ाई जायदाद को ले कर भाईबहन के बीच है और ‘दीवार’ फिल्म के शशि कपूर की तर्ज पर ‘मां’ वीणा सिंह के पास है. कुछ नुकसान राजनीतिक और कुछ आर्थिक अजय सिंह का होना तय है जो मां को अपने पास न रखने की सजा ही भुगतेंगे.

 

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