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स्पाइसी ट्रीट : सहजन करी

सहजन करी

सामग्री

– 2 मध्यम आकार के प्याज

– 3 बड़े चम्मच औयल

– 3-4 सहजन की फलियां

– 2 हरीमिर्चें

– थोड़ा सा अदरक

– 3-4 कलियां लहसुन

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– 1/2 कप मूंगफली भुनी और दरदरी पिसी

– 1 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच हलदी

– 2 छोटे चम्मच धनिया पाउडर

– 1 छोटा चम्मच गरममसाला

– सजाने के लिए थोड़ी सी धनियापत्ती कटी

– नमक स्वादानुसार

विधि

अदरक, लहसुन, प्याज, हरीमिर्चें और जीरे को पीस लें. फिर एक पैन में औयल गरम कर के उस में प्याज का पेस्ट डाल कर हलका भुनने पर सभी सूखे मसाले डाल कर तब तक भूनें जब तक मसाले औयल न छोड़ दें. फिर उस में सहजन की फलियां और मूंगफली डाल कर अच्छी तरह मिक्स कर 1-2 कप पानी डाल कर तब तक पकाएं जब तक सहजन की फलियां नरम न पड़ जाएं. अब धनिया पत्ती डाल कर गरमगरम सर्व करें.

4 घंटे में खुला अपहरण का रहस्य

संतोष तुम्हारे पास पैसे तो बहुत होते हैं, फिर भी तुम पैसों की चिंता में रहते हो, क्यों भाई? तुम्हारा मालिक भी तुम पर कितना भरोसा करता है. पैसा, गाड़ी सब तुम्हारे भरोसे पर रखा है.’’ प्रिंटिंग प्रैस में काम करने वाले अजय ने अपने दोस्त संतोष को समझाते हुए कहा.

‘‘यार तुम लोगों को लगता है कि जो पैसा, गाड़ी है, वह मेरे लिए है. तुम लोग बहुत भोले और नासमझ हो. तुम्हें पता होना चाहिए कि हर मालिक अपने काम से काम रखता है. जब तक उस का काम रहता है, तब तक गाड़ी और पैसा सब देगा. काम निकलने के बाद न गाड़ी देगा और न पैसा. हम जैसों को कुत्ता समझते हैं. एक गलती करो तो 10 गाली मिलती हैं और नौकरी से निकालने की धमकी अलग.’’ संतोष पर शराब का नशा चढ़ चुका था. वह अपने मन की भड़ास निकालते हुए बोला.

‘‘संतोष, तुम अजय भाई की बात को समझो कि वह कहना क्या चाहते हैं? हम तीनों में सब से ज्यादा खुशहाल तुम्हारा ही मालिक है. तुम ही कुछ कर सकते हो.’’ संतोष और अजय के तीसरे दोस्त सर्वेश ने दोनों के बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा.

‘‘बात तो हम समझते हैं अजय भाई, पर करें क्या. यह नहीं समझ आ रहा है. हम उस से कैसे पैसे निकालें. तुम लोग बताओ, हम हर काम करने को तैयार हैं.’’ संतोष ने कहा.

‘‘संतोष भाई, तुम्हारा मालिक मोटी मुरगी है. बस तुम उस की कमजोर नस दबा दो, वह खुद मुंहमांगी रकम दे देगा. फिल्में नहीं देखते, मालिकों से कैसे पैसा लिया जाता है.’’ अजय ने संतोष को समझाया.

‘‘बात समझ में आ गई अजय भाई, हम रोजाना उस के बेटे को स्कूल छोड़ने जाते हैं. एक दिन हम यही तोता अपने पिंजरे में पाल लेंगे और तभी आजाद करेंगे, जब पैसा मिलेगा नहीं तो तोते को दुनिया से आजाद कर देंगे.’’

शराब के नशे में संतोष यह सोच ही नहीं पा रहा था कि उस के कदम अपराध की तरफ बढ़ रहे हैं. बातों में उस के दोस्त अजय और सर्वेश उसे उकसा रहे थे. बातोंबातों में तीनों ने एक ही झटके में मोटा पैसा कमाने की योजना बना ली.

असल में संतोष राणा प्रताप मार्ग स्थित सूर्योदय कालोनी में रहने वाले अनूप अग्रवाल के घर में गाड़ी चलाने का काम करता था. अनूप अग्रवाल लखनऊ के बड़े बिजनैसमैन थे. उन की बेटी मुंबई में पढ़ रही थी. बेटा अर्णव लामार्टीनियर कालेज में पढ़ता था.

लामार्टीनियर कालेज लखनऊ का सब से मशहूर कालेज है और सब से सुरिक्षत इलाके में बना है. जहां से कुछ ही दूरी पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का आवास है. सूर्योदय कालोनी से लामार्टीनियर कालेज की दूरी बामुश्किल 3 किलोमीटर है.  अनूप रोज अपने ड्राइवर संतोष के साथ अपनी कार से उसे स्कूल भेजते थे, वही दोपहर में अर्णव को लेने भी जाता था.

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अनूप ने 10 माह पहले ही संतोष को अपने यहां ड्राइवर रखा था. संतोष मूलरूप से सीतापुर जिले के खैराबाद का रहने वाला था. वह अनूप के बिजनैस से जुड़े लेनदेन के काम भी करता था. उसे पूरे व्यापार के बारे में पता था. संतोष अनूप के घर से कुछ ही दूरी पर किराए का कमरा ले कर रहता था.

ऐसे में जरूरत पड़ने पर वह जल्दी ही अनूप के घर आ जाता था. अपने दोस्तों के साथ नशे में हुई बातचीत के बाद संतोष अब कुछ ऐसा करना चाहता था, जिस से उसे बहुत सारा पैसा मिल जाए. अनूप की अच्छी कमाई देख कर उसे लालच आ चुका था.

19 मार्च, 2018 की सुबह करीब 9 बजे  थे. संतोष अर्णव को एसयूवी कार से स्कूल के लिए घर से निकला. साढ़े 9 बजे से उस की परीक्षा थी. वह जल्दी से जल्दी स्कूल पहुंचना चाहता था. रोजाना वह अपने घर से हजरतगंज होते स्कूल जाता था. लेकिन उस दिन संतोष ने कार 1090 चौराहे से गोमती नगर की तरफ मोड़ दी.

अर्णव ने कारण पूछा तो संतोष बोला, ‘‘हजरतगंज में जाम है. स्कूल के लिए देर हो जाएगी.’’ अर्णव कक्षा 9 में पढ़ता था. उसे परीक्षा की टेंशन थी, इसलिए वह चुपचाप अपनी बुक्स देखने लगा.

अर्णव को ले कर कार 1090 चौराहे पहुंची तो संतोष का दोस्त अजय गाड़ी के सामने आ गया. संतोष दरवाजा खोल कर गाड़ी के नीचे उतरा तो उसे डांटने लगा. जब तक अर्णव कुछ समझ पाता, तब तक संतोष अपनी सीट पर बैठ गया और  अजय अर्णव की बगल बैठ गया.

अजय ने बैठते ही उस की कमर से तमंचा लगा कर उसे चुप रहने के लिए कहा. गाड़ी वापस मुड़ कर सीतापुर रोड की तरफ जाने लगी. इस बीच अर्णव को नशे का इंजेक्शन दे कर बेहोश कर दिया गया था. अर्णव को इन लोगों ने बोरे में भर कर पिछली सीट पर डाल दिया. गाड़ी अब सीतापुर रोड से होते हुए आगे निकल गई थी.

अर्णव को स्कूल छोड़ कर जब संतोष घर नहीं आया तो पहले घर वालों को लगा कि वह कहीं किसी काम से चला गया होगा. लेकिन स्कूल से फोन आ गया कि अर्णव की आज परीक्षा थी, वह स्कूल नहीं आया. इस पर घर वालों से संतोष के मोबाइल नंबर पर फोन करना शुरू किया तो वह बंद मिला.

कुछ देर में यह बात साफ हो गई कि ड्राइवर संतोष अर्णव को ले कर गायब हो गया है. इस के बाद घर, परिवार के लोग और रिश्तेदार एकत्र हो गए. मोहल्ले में कोहराम मच गया. तत्काल लखनऊ पुलिस को सूचना दी गई.

उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक के अग्रवाल परिवार से करीबी रिश्ते थे, उन से यह बात बताई गई. उन्होंने लखनऊ के एसएसपी से कहा. लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार ने तुरंत पुलिस की एक टीम बना कर एएसपी (पूर्वी) सर्वेश कुमार मिश्रा को इस मामले को संभालने को कहा.

लामार्टिनियर कालेज लखनऊ का प्रतिष्ठित कालेज है. वहां के बच्चे के अपहरण की सूचना से उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अफसर भी चौकन्ने हो गए. डीजीपी ओ.पी. सिंह ने आईजी सुजीत पांडे को मामले में त्वरित काररवाई करने के लिए कहा. स्थानीय पुलिस के साथ उत्तर प्रदेश की स्पैशल टास्क फोर्स को भी इस में लगा दिया गया.

एसटीएफ के आईजी अमिताभ यश छुट्टी पर थे. उन की छुट्टी रद्द कर के उन्हें भी मामले में लगा दिया गया. अनूप अग्रवाल का घर हजरतगंज थाना क्षेत्र में आता है. वहां के इंसपेक्टर आनंद शाही भी छुट्टी पर थे. उन्हें भी तुरंत बुलाया गया. पूरे लखनऊ की पुलिस एक घंटे में अलर्ट हो गई. गाड़ी नंबर सभी थानों को भेज दिया गया. टोल प्लाजा पर कार का नंबर चेक किया गया तो यह बात साफ हो गई कि कार सीतापुर जिले की तरफ गई है.

इंटौला थाने के इंसपेक्टर शिवशंकर सिंह ने बताया कि अनूप की गाड़ी टोल प्लाजा से 9 बज कर 29 मिनट 52 सेकेंड पर गुजरी है. इस में 3 लोग दिख रहे थे. सीसीटीवी फुटेज में ड्राइवर का चेहरा साफ नहीं दिखा, पर पुलिस को यह पता चल चुका था कि कार अर्णव को ले कर सीतापुर की तरफ गई है. यह सूचना मिलते ही लखनऊ पुलिस ने सीतापुर पुलिस से संपर्क किया. उन्होंने एसपी आनंद कुलकर्णी को इस घटना की सूचना दे दी.

इस के बाद सीतापुर पुलिस ने घेराबंदी तेज कर दी. लखनऊ पुलिस ने संतोष का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा रखा था. सीओ हजरतगंज अभय कुमार मिश्रा, इंसपेक्टर आनंद शाही और इंसपेक्टर कृष्णानगर अंजनी पांडेय ड्राइवर संतोष की काल डिटेल्स खंगाल रहे थे.

इस में 3 फोन नंबर ऐसे मिले, जिन की सुबह 10 बजे से आपस में बातचीत हुई थी. इन में एक नंबर बंद हो गया था, जबकि बाकी के 2 नंबरों की लोकेशन सीतापुर के मानपुर गांव में दिख रही थी. मानपुर गांव खैराबाद पुलिस थाना क्षेत्र में आता है. वहां की पुलिस को एलर्ट किया गया.

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खैराबाद की पुलिस जब मानपुर पहुंची तो पुलिस को मोड़ पर ही कुछ लोग मिल गए उन्होंने बताया कि एक लाल रंग की कार खेत की तरफ गई है. पुलिस वहां गई तो ड्राइवर संतोष और अर्णव खेत में ही मिल गए. सीतापुर पुलिस ने जब इन लोगों को पकड़ा, तब तक अर्णव के पिता अनूप को ले कर लखनऊ पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी.

पूछताछ में संतोष ने बताया कि अपहरण की साजिश उस ने अपने मौसेरे भाई कासिमपुर सीतापुर निवासी सर्वेश यादव और पारा रोड निवासी दोस्त अजय के साथ मिल कर रची थी. लखनऊ से अर्णव को अगवा करने में संतोष और अजय शामिल थे.

सर्वेश ने उन के छिपने की व्यवस्था की थी. कार को खेत में खड़ा कर के संतोष और अर्णव को वहीं छोड़ कर सर्वेश और अजय टोह लेने लखनऊ चले गए थे.

पुलिस ने जब अर्णव को बरामद किया तो उस ने बताया कि ड्राइवर संतोष ने उसे बताया था कि बदमाशों ने दोनों को अगवा कर लिया है. उस ने मुझे भी चुपचाप खेत में छिपे रहने को कहा था. अगवा करने वाले कुछ भी कर सकते हैं,इसलिए हम ने शोर नहीं मचाया. कार में ही अर्णव का बैग मिला. पुलिस संतोष और अर्णव को ले कर लखनऊ चली आई जिस ने भी अपहरण की घटना में  ड्राइवर संतोष का नाम सुना हैरान था कि वह ऐसा कैसे कर सकता है.

पुलिस के साथ पिता को देख कर अर्णव उन से लिपट कर रोने लगा था. उसे पिता ने बताया कि संतोष ने ही यह सारा काम किया है. तब अर्णव को भरोसा हुआ कि संतोष कितना बुरा आदमी है. अर्णव को सकुशल बरामद कर के पुलिस ने राहत की सांस ली.

लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार का अगला प्रयास 2 अपहर्त्ताओं अजय और सर्वेश को गिरफ्तार करना था. पुलिस ने उन की तलाश शुरू कर दी. 20 मार्च की शाम को पुलिस को पता चला कि दोनों फरार अभियुक्त बैकुंठ धाम के पास गोमती नदी के किनारे हैं.पुलिस ने वहां पर घेराबंदी की तो खुद को फंसता देख अभियुक्तों ने पुलिस टीम पर फायर कर दिया.

इस के जवाब में पुलिस ने भी फायरिंग की तो अजय के पैर में गोली लग गई. वह घायल हो गया. दूसरा अभियुक्त फरार हो गया. अजय के पिता सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं. उन के साथ ही वह रहता था. पिता को यह पता भी नहीं था कि बेटा अपहरण में लिप्त है.

मुठभेड़ में शामिल पुलिस टीम के सीओ (हजरतगंज) अभय कुमार मिश्रा, इंसपेक्टर आनंद कुमार शाही, अंजनी कुमार पांडेय, शिवशंकर सिंह, एसआई आशीष द्विवेदी, कांस्टेबल सुदीप, राम निवास, अनीस, यशकांत, सुधीर, वीर सिंह के कार्य की एसएसपी ने भी सराहना करते हुए उन्हें पुरस्कृत किया. डीजी ओ.पी. सिंह ने पुलिस टीम को चाय पार्टी दी.

डीजीपी ने आईजी सुजीत पांडेय, एसएसपी दीपक कुमार, सीतापुर के एसपी आनंद कुलकर्णी की भी तारीफ की. जिस तरह से पुलिस ने केवल 4 घंटे में बच्चे को बरामद कर बदमाशों को पकड़ा उस से लगता है कि अगर पुलिस सही तरह से तालमेल मिला कर काम करे तो अपराधियों के हौसले पस्त होते देर नहीं लगेगी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा में कुछ पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.

शिकारी खुद बन गया शिकार : अवैद्य संबंधों के चक्कर में हत्या

सुबह का वक्त था. उत्तरपूर्वी दिल्ली की दिलशाद कालोनी में रहने वाले संजीव शर्मा चाय की चुस्कियां लेते हुए अखबार पढ़ रहे थे, तभी उन के पड़ोसी नदीम ने उन्हें खबर दी कि उन के स्कूल का गेट खुला हुआ है और अंदर पुकारने पर गार्ड देवीलाल भी जवाब नहीं दे रहा है.

संजीव शर्मा का एच-432, ओल्ड सीमापुरी में बाल कौन्वेंट स्कूल था. देवीलाल उन के स्कूल में रात का सुरक्षागार्ड था. शर्माजी ने रहने के लिए उसे स्कूल में ही एक कमरा दे दिया था.

नदीम की बात सुन कर संजीव कुमार शर्मा उस के साथ अपने स्कूल की तरफ निकल गए. संजीव शर्मा जब अपने स्कूल में देवीलाल के कमरे में गए तो वहां लहूलुहान हालत में देवीलाल की लाश पड़ी थी. उस के सिर तथा दोनों हाथों से खून निकल रहा था.

यह खौफनाक मंजर देख कर संजीव कुमार शर्मा और नदीम के होश फाख्ता हो गए. संजीव शर्मा ने उसी समय 100 नंबर पर फोन कर के वारदात की सूचना पुलिस को दे दी. यह इलाका चूंकि सीमापुरी थानाक्षेत्र में आता है, इसलिए थाना सीमापुरी के एसआई आनंद कुमार और एसआई सौरभ घटनास्थल एच-432, ओल्ड सीमापुरी पहुंच गए. तब तक वहां आसपास रहने वाले कई लोग पहुंच चुके थे.

पुलिस ने एक फोल्डिंग पलंग पर पड़ी सिक्योरिटी गार्ड देवीलाल की लाश का निरीक्षण किया तो उस के सिर पर चोट थी. ऐसा लग रहा था जैसे उस के सिर पर कोई भारी चीज मारी गई हो. इस के अलावा उस की दोनों कलाइयां कटी मिलीं.

बिस्तर के अलावा फर्श पर भी खून ही खून फैला हुआ था. कमरे में रखी दोनों अलमारियां खुली हुई थीं. काफी सामान फर्श पर बिखरा हुआ था. हालात देख कर लूट की संभावना भी नजर आ रही थी.

इसी कमरे की मेज पर शराब की एक बोतल व 2 गिलास तथा बचा हुआ खाना भी मौजूद था. एसआई सौरभ ने यह सूचना थानाप्रभारी संजीव गौतम को दे दी. हत्याकांड की सूचना पा कर थानाप्रभारी संजीव गौतम पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे.

घटनास्थल का मौकामुआयना करने के बाद थानाप्रभारी इस नतीजे पर पहुंचे कि हत्यारा स्कूल में मित्रवत दाखिल हुआ था और उस ने मृतक के साथ शराब भी पी थी. इसलिए उस की हत्या में उस का कोई नजदीकी ही शामिल हो सकता है. खुली अलमारी और बिखरा सामान लूट की तरफ इशारा कर रहा था.

स्कूल मालिक संजीव शर्मा ने बताया कि देवीलाल जम्मू का रहने वाला था. पिछले 2 साल से वह उन के स्कूल में रात को सिक्योरिटी गार्ड के रूप में काम कर रहा था. थानाप्रभारी ने मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम बुला कर गिलास तथा शराब की खाली बोतल से फिंगरप्रिंट्स उठवा लिए.

मौके की काररवाई निपटाने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया. फिर स्कूल मालिक संजीव शर्मा की तहरीर पर गार्ड देवीलाल उर्फ दीनदयाल की हत्या का मामला दर्ज करवा दिया.

थानाप्रभारी संजीव गौतम ने इस केस की तफ्तीश इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) जे.के. सिंह को सौंप दी. उन्होंने डीसीपी नूपुर प्रसाद, एसीपी रामसिंह को भी घटना के बारे में अवगत करा दिया.

डीसीपी नूपुर प्रसाद ने इस हत्याकांड का खुलासा करने के लिए एसीपी रामसिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में आईपीएस हर्ष इंदोरा, थानाप्रभारी संजीव गौतम, अतिरिक्त थानाप्रभारी अरुण कुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) जे.के. सिंह, स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर हीरालाल, एसआई मीना चौहान, एएसआई आनंद, कांस्टेबल प्रियंका, वीरेंद्र, संजीव आदि शामिल थे.

टीम ने जांच शुरू की और स्कूल के प्रिंसिपल तथा मालिक संजीव कुमार शर्मा से मृतक गार्ड देवीलाल की गतिविधियों के बारे में विस्तार से पूछताछ की तो उन्होंने बता दिया कि गार्ड देवीलाल सीमापुरी की ही एक ट्रैवल एजेंसी में पिछले 20 सालों से गार्ड की नौकरी कर रहा था.

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इस के बीवीबच्चे जम्मू के गांव गुडि़याल में रहते हैं. पिछले 2 सालों से वह उन के स्कूल में नौकरी कर रहा था. चूंकि उस की ड्यूटी रात की थी, इसलिए उन्होंने रहने के लिए स्कूल में ही उसे एक कमरा दे दिया था.

संजीव शर्मा से बात करने के बाद पुलिस ने स्कूल के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को भी खंगाला. मगर उस से पुलिस को कोई भी सुराग नहीं मिला. क्योंकि स्कूल में लगे सीसीटीवी कैमरे केवल दिन के वक्त चालू रहते थे. शाम होने पर उन्हें बंद कर दिया जाता था.

कहीं से कोई सुराग न मिलने पर पुलिस ने मृतक के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन किया गया तो पुलिस की निगाहें मृतक के फोन पर आई अंतिम काल पर अटक गईं. उस नंबर पर गार्ड की पहले भी बातें हुई थीं और 3 मार्च, 2018 की रात साढ़े 10 बजे लोकेशन उस फोन नंबर की घटनास्थल पर ही थी.

जांच में वह फोन नंबर सीमापुरी की ही रहने वाली महिला अंजलि का निकला. पुलिस ने अंजलि के फोन नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में भी एक फोन नंबर ऐसा मिला, जिस की लोकेशन घटना वाली रात को अंजलि के साथ घटनास्थल की थी. इतनी जांच के बाद पुलिस टीम को केस के खुलासे के आसार नजर आने लगे.

पुलिस टीम सीमापुरी में स्थित अंजलि के घर पहुंच गई. पुलिस को देख कर अंजलि एकदम से घबरा गई. इंसपेक्टर जे.के. सिंह ने अंजलि से पूछा, ‘‘तुम गार्ड देवीलाल को कैसे जानती हो?’’

‘‘मेरा बेटा उसी स्कूल में पढ़ता है, जहां देवीलाल गार्ड था, इसलिए कभीकभी उस से मुलाकात होती रहती थी. इस से ज्यादा मैं देवीलाल के बारे में कुछ नहीं जानती.’’ अंजलि ने बताया.

इंसपेक्टर जे.के. सिंह को लगा कि अंजलि सच्चाई को छिपाने की कोशिश कर रही है, क्योंकि उन के पास अंजलि और देवीलाल के बीच अकसर होने वाली बातचीत का सबूत मौजूद था. इसलिए वह पूछताछ के लिए उसे थाने ले आए. थाने में उन्होंने अंजलि से पूछा, ‘‘3 मार्च की रात साढे़ 10 बजे तुम देवीलाल के कमरे में क्या करने गई थी?’’

यह सवाल सुनते ही अंजलि की बोलती बंद हो गई. कुछ देर की चुप्पी के बाद उस ने जो कुछ बताया, उस से देवीलाल की हत्या की गुत्थी परतदरपरत खुलती चली गई. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने अपने दूसरे प्रेमी साजिद उर्फ शेरू के साथ मिल कर देवीलाल की हत्या की थी. देवीलाल की हत्या क्यों की गई, इसे जानने के लिए 2 साल पीछे के घटनाक्रम पर नजर दौड़ानी होगी, जो इस प्रकार है—

40 वर्षीय देवीलाल पिछले 20 सालों से पुरानी सीमापुरी में जयवीर ट्रैवल एजेंसी में नौकरी करता था. लेकिन वहां पगार कम होने के कारण उस के घर की आर्थिक जरूरतें पूरी नहीं हो पाती थीं. चूंकि ट्रैवल एजेंसी में उस का काम दिन में होता था, इसलिए रात के समय खाली होने के कारण वह संजीव कुमार शर्मा के स्कूल में गार्ड के रूप में नौकरी करने लगा. संजीव शर्मा ने उसे रहने के लिए स्कूल में ही एक कमरा भी दे दिया था.

देवीलाल का साल में एक बार ही घर जाना होता था. बाकी समय उस का समय दिल्ली में गुजरता था. चूंकि उस की पत्नी प्रमिला जम्मू में ही रहती थी, इसलिए वह बाजारू औरतों के संपर्क में रहता था.

2 जगहों पर काम करने के कारण थोड़े ही समय में उस के पास काफी रुपए इकट्ठे हो गए थे. वह अपने सभी रुपए अपने अंडरवियर में बनी जेब में रखता था.

अंजलि की शादी करीब 8 साल पहले सुरेंद्र के साथ हुई थी. शादी की शुरुआत में तो अंजलि सुरेंद्र के साथ बहुत खुश थी. बाद में वह एक बेटे की मां बनी, जिस का नाम कपिल रखा. सुरेंद्र प्राइवेट नौकरी करता था. उसी से वह अपने परिवार का पालनपोषण कर रहा था.

अंजलि की यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकी. बीमारी की वजह से सुरेंद्र की नौकरी छूट गई. इस से परिवार में आर्थिक समस्या खड़ी हो गई.

अंजलि के पास जो थोड़ेबहुत पैसे जमा थे, वह भी सुरेंद्र की बीमारी पर खर्च हो गए थे. अंजलि ने सुरेंद्र को बचाने की जीतोड़ कोशिश की लेकिन एक दिन उस की मौत हो गई.

पति की मौत से अंजलि की आंखों में अंधेरा छा गया. जैसेतैसे कर उस ने पति का दाहसंस्कार किया, फिर जीविका चलाने के लिए सीमापुरी की एक कैटरिंग शौप में नौकरी करने लगी. वहां से उसे जितनी पगार मिलती थी, उस से बड़ी मुश्किल से मांबेटे का गुजारा होता था.

2 साल पहले उस ने बेटे कपिल का एडमिशन ओल्ड सीमापुरी में स्थित बाल कौनवेंट स्कूल में नर्सरी कक्षा में करवाया. यह स्कूल ओल्ड सीमापुरी का एक नामचीन प्राइवेट स्कूल है. वह रोजाना सुबह बेटे को स्कूल छोड़ने जाती थी और छुट्टी के समय उसे स्कूल से लेने पहुंच जाती थी. बच्चे की छुट्टी होने तक वह अन्य मांओं की तरह गेट पर खड़ी हो कर बेटे का इंतजार करती थी.

हालांकि अंजलि एक विधवा थी, लेकिन उस के सौंदर्य में आज भी कशिश बरकरार थी. गरीबी का अभिशाप भी उस के खूबसूरत चेहरे का रंग फीका नहीं कर पाया था. उस के हुस्न का आलम यह था कि वह जिधर भी निकलती, युवकों की प्यासी निगाहें चोरीचोरी उस के रूप का रसपान करने, उस के हसीन चेहरे पर टिक जातीं.

एक दिन शाम के समय जब स्कूल का गार्ड देवीलाल गेट पर ड्यूटी दे रहा था, तभी अचानक उस की निगाह अंजलि पर पड़ी. अंजलि को देख कर उस की आंखें चमक उठीं. वह उस पर डोरे डालने की योजनाएं बनाने लगा.

गार्ड देवीलाल उस के बेटे कपिल का विशेष ध्यान रखने लगा. वह कपिल को चौकलेट, टौफी आदि दे कर उस का करीबी बन गया. अंजलि ने देखा कि देवीलाल कपिल को खूब प्यार करता है तो वह घर से उस के लिए कुछ न कुछ खाने की चीज बना कर लाने लगी.

इस तरह दोनों ही एकदूसरे को चाहने लगे. अंजलि को जब कभी पैसों की जरूरत होती तो वह उस की मदद भी कर देता. गार्ड की सहानुभूति पा कर अंजलि उस की दोस्त बन गई. अपने मोबाइल नंबर तो वे पहले ही एकदूसरे को दे चुके थे, जिस से वह बातचीत करते रहते थे.

देवीलाल ने जब देखा कि खूबसूरत अंजलि पूरी तरह शीशे में उतर गई है तो वह रात के समय उसे स्कूल में बुलाने लगा. अंजलि के आने पर वह उस के साथ महंगी शराब पीता. अंजलि भी उस के साथ शराब पीती फिर दोनों अपनी हसरतें पूरी करते थे.

अंजलि को जब भी पैसों की जरूरत होती, देवीलाल अपने अंडरवियर की जेब से निकाल कर उसे दे देता था. अंजलि उस के पास इतने सारे रुपए देख कर बेहद प्रभावित हो गई थी, इसलिए वह देवीलाल को हर तरह से खुश रखने की कोशिश करती थी.

धीरेधीरे उस का देवीलाल के पास आनाजाना इतना बढ़ गया कि आसपड़ोस के लोगों को भी उस के अवैध संबंधों की जानकारी हो गई. लेकिन अंजलि और देवीलाल को इस से कोई फर्क नहीं पड़ा. देवीलाल को जब भी मौका मिलता, वह अंजलि को अपने कमरे में बुला कर अपनी हसरतें पूरी कर लेता.

SOCIETY

अंजलि की मौसी मधु का पति साजिद उस का हालचाल पूछने उस के पास आता रहता था. दोनों सालों से एकदूसरे को जानते थे. अंजलि के पति की मौत के बाद साजिद ने ही अंजलि को सहारा दिया था. साजिद भी अंजलि के हुस्न पर लट्टू था. साजिद के साथ भी अंजलि के शारीरिक संबंध थे.

वह कईकई दिन अंजलि के यहां रुक जाता था. इस कारण उस के और मधु के संबंधों में भी खटास आ चुकी थी. साजिद ड्राइवर था, हरियाणा से करनाल बाइपास की ओर आने वाले यात्रियों को अपनी इनोवा कार में ढोया करता था.

साजिद को जब अंजलि और गार्ड देवीलाल के संबंधों की जानकारी हुई तो वह इस का विरोध करने लगा. चूंकि अंजलि पर गार्ड देवीलाल खुल कर खर्च करता था, इसलिए वह उसे छोड़ना नहीं चाहती थी. वह साजिद को किसी तरह समझा देती फिर मौका मिलते ही देवीलाल से मिलने स्कूल में बने उस के कमरे में चली जाती थी. किसी तरह साजिद को यह बात पता चल ही जाती थी, तब उस ने अंजलि पर देवीलाल से रिश्ता तोड़ देने का दबाव बनाया.

अंजलि के दिमाग में एक शैतानी योजना ने जन्म ले लिया. साजिद की इनोवा कार खराब थी. कार ठीक कराने के लिए उस के पास पैसे तक नहीं थे, इसलिए वह खाली बैठा था.

तब अंजलि ने साजिद को बताया कि देवीलाल के पास काफी रुपए रहते हैं. अगर दोनों मिल कर उस का काम तमाम कर दें तो उस के रुपयों पर आसानी से हाथ साफ किया जा सकता है.

साजिद तो देवीलाल से पहले से ही खार खाए बैठा था. लालच में वह उस की हत्या करने के लिए राजी हो गया. अब दोनों अपनी इस योजना को अंजाम देने के लिए अवसर की तलाश में रहने लगे. 3 मार्च, 2018 की रात देवीलाल का मूड बना तो उस ने उसी समय अंजलि को फोन कर दिया.

इस से पहले उस ने व्हिस्की की बोतल और खाना पैक करवा लिया. रात के 10 बजे उस ने अपनी प्रेमिका अंजलि को फोन कर के स्कूल में पहुंचने के लिए कहा तो अंजलि और साजिद की आंखें खुशी से चमकने लगीं.

अंजलि ने पहले तो शृंगार किया. होंठों पर सुर्ख लिपस्टिक लगाई, फिर साजिद की बुलेट मोटरसाइकिल पर बैठ कर कौन्वेंट स्कूल के नजदीक पहुंचा. अंजलि जिस समय स्कूल में पहुंची, रात के 10 बज रहे थे. देवीलाल की निगाहें केवल अंजलि पर पड़ीं तो वह उसे टकटकी लगाए देखता रह गया. उसे अंजलि इतनी सुंदर पहले कभी नहीं लगी थी. अंजलि के अंदर आने पर उस ने बांहों में भर कर चूमा फिर अपने कमरे पर बिछी चारपाई पर ले गया. तभी अंजलि ने उस से कोल्डड्रिंक लाने की फरमाइश की.

देवीलाल कोल्डड्रिंक लाने स्कूल से बाहर गया, तभी मौका मिलते ही अंजलि ने फोन कर के साजिद को अंदर बुलाया और छिप जाने के लिए कह दिया. देवीलाल के आने के बाद अंजलि व्हिस्की में कोल्डड्रिंक मिला कर उसे शराब पिलाने लगी. देवीलाल ने अंजलि के लिए भी पैग बना लिया.

अंजलि भी शराब की शौकीन थी, लेकिन उस दिन उस ने स्वयं तो कम पी लेकिन देवीलाल को अधिक पिला कर मदहोश कर दिया. जब अंजलि ने देवीलाल को बेसुध देखा तो उस ने साजिद को इशारा कर बुला लिया.

अंजलि ने उस से देवीलाल का काम तमाम करने के लिए कहा. फिर साजिद ने देवीलाल के सिर पर लोहे की रौड का भरपूर वार कर उस का काम तमाम कर दिया. इस के बाद साजिद और अंजलि ने देवीलाल के अंडरवियर में रखे लगभग 60 हजार रुपए तथा मोबाइल फोन ले लिया.

जब दोनों वहां से जाने लगे तो अंजलि को शक हुआ कि कहीं देवीलाल बच न जाए. अगर वह बच गया तो वह इस मामले में फंस जाएगी, इसलिए अंजलि ने साजिद को उस की कलाई की नसें काटने के लिए कहा.

यह सुन कर साजिद ने अपने साथ लाए पेपर कटर से देवीलाल के दोनों हाथों की नसें काट दीं, जिस से उस का खून बह गया. देवीलाल की हत्या करने के बाद दोनों शातिर इत्मीनान से अपने घर लौट गए.

अंजलि की निशानदेही पर पुलिस ने उस के पहले प्रेमी साजिद को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. दोनों की निशानदेही पर देवीलाल से लूटे गए रुपए, 3 मोबाइल फोन, मोटरसाइकिल तथा हत्या में प्रयुक्त रौड, पेपर कटर बरामद कर लिया. पुलिस ने दोनों को 7 मार्च को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

डाक्टरों के यहां पड़े छापों से बदला चाइल्ड सेक्स रेशियो

भले ही समाज आज चाहे आधुनिक होने पर इतरा रहा है पर इसी समाज के अनेक लोग ऐसे हैं जो बेटी होने पर या तो खुशी जाहिर करते ही नहीं और यदि करते भी हैं तो उतनी खुशी जाहिर नहीं करते जितनी बेटा पैदा होने पर की जाती है. बेटा होने की चाहत में वह गर्भ में पल रही कन्या की हत्या तक करा देते हैं.

भारत के किसीकिसी क्षेत्र में तो बेटी को जन्म देने वाली मां को ही इस का कुसूरवार समझा जाता है. जिस से उन इलाकों में भ्रूण हत्याएं बहुत होती है. इस का नतीजा यह निकलता है कि उस इलाके में लड़कों के बजाए लड़कियों की संख्या बहुत कम रह जाती है. जो सामाजिक संतुलन के लिए सही नहीं है.

राजस्थान के झुंझनू, सीकर जिलों में भी यही स्थिति थी. लड़के की चाहत रखने वाले अनेक लोग डाक्टरों की मिलीभगत से कन्या को जन्म लेने से पहले ही गर्भ में खत्म करा देते थे. जिस की वजह से इन इलाकों में लड़कियों की संख्या में गिरावट आ रही थी. सन 2011 की जनगणना के अनुसार झुंझनू में 1000 लड़कों के मुकाबले 837 लड़कियां थीं.

यह गिरावट चिंता का विषय थी. लिहाजा क्षेत्र के कुछ जिम्मेदार लोग इस कुरीति को रोकने और लोगों की सोच बदलने के लिए सामने आए. लोगों ने तय कर लिया कि अब बेटी पैदा होने पर घर में खुशी जाहिर की जाएगी. कोई भी कन्या भ्रूण की हत्या नहीं कराएगा. इस अभियान को चलाने के लिए समितियां भी बनाई गईं.

समितियों ने कुछ गर्भवती महिलाओं को डमी बना कर अलगअलग डाक्टरों के पास कन्या भ्रूण हत्या कराने की बात तय करने के लिए भेजा. जो डाक्टर इस काम के लिए तैयार हुए उन्हें रंगे हाथों पकड़वाया गया. इस से डाक्टरों में भी डर बैठ गया.

इस से जो भी डाक्टर कन्या भ्रूण की चोरीछिपे हत्या करते थे, उन्होंने भी यह काम बंद कर दिया. इस काम में झुंझनू जिले की 63 महिलाओं ने एक्टिव रोल निभाया. एक गर्भवती महिला ने तो 4 जगह छापे डलवाए.

शुरुआत हुई तो लोगों की सोच भी बदलती चली गई. अब जिस परिवार में बेटी जन्म लेती है, वहां भांगड़े के साथ जश्न मनाया जाता है और लड़कों के जन्म की तरह कुआं पूजन भीहोने लगा है. जब लोगों ने इस सामाजिक समस्या के प्रति अभियान चलाया तो सरकार ने भी इन लोगों के इस प्रयास को सराहा और पीसीपीएनडीटी एक्ट सख्ती से लागू किया.

जिस के तहत लिंग जांच करने वाले के खिलाफ 10 साल की सजा का प्रावधान कर दिया, जबकि अन्य राज्यों में यही सजा मात्र 3 साल की है. लोगों में आई इस जागृति का यह परिणाम निकला कि लड़कियों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से इजाफा होना शुरू हो गया.

सन 2011 में 1000 लड़कों के मुकाबले जो 837 लड़कियां थीं, वो संख्या बढ़ कर 955 हो चुकी है. सीकर जिले के जिलाधिकारी नरेश ने बताया कि सीकर पहले भ्रूण हत्या के लिए बदनाम था.

हम ने हर ब्लौक में एक लड़की को ब्रैंड अंबेसडर बनाया. इस से चाइल्ड सेक्स रेशियो में बहुत सुधार आया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी तरह काम करने वाले 10 जिलाधिकारियों को सम्मानित किया है.

फांसी से बचाने के लिए सालान खर्च करते हैं 36 करोड़ रुपए

हर देश का अपना अलगअलग कानून होता है. कहींकहीं, खासतौर पर अरब देशों में कानून बहुत सख्त है. पाकिस्तान को ही ले लीजिए, वहां एक बच्ची से रेप और हत्या के दोषी को 2 महीने में फांसी की सजा सुना दी गई, लेकिन हमारे यहां देश के सब से चर्चित मामले निर्भया रेप और हत्या के मामले में दोषी साबित हो जाने के बाद भी मुजरिमों को जेल में पाला जा रहा है.

अगर ऐसा अरब देशों में हुआ होता तो मुजरिमों को अब से 6 साल पहले फांसी हो चुकी होती. सख्त कानून के चलते अरब देशों में यह भी कानून है कि अगर कोई व्यक्ति किसी की हत्या कर देता है और शरिया कानून के अंतर्गत उसे फांसी की सजा हो जाती है तो फांसी से बचने के लिए उस के पास एक ही उपाय होता है, पीडि़त परिवार से सौदेबाजी.

अगर पीडि़त परिवार उस से इच्छित रकम ले कर उसे माफ कर देता है तो अदालत फांसी की सजा को रद्द कर देती है. लेकिन सौदेबाजी की यह रकम इतनी बड़ी होती है, जिसे चुकाना आसान नहीं होता. इस रकम को वहां ब्लड मनी कहा जाता है.

दुबई में रहने वाले भारतीय मूल के बड़े बिजनैसमैन एस.पी.एस. ओबराय ऐसे व्यक्ति हैं, जो लोगों को फांसी से बचाने के लिए प्रतिवर्ष 36 करोड़ रुपए खर्च करते हैं. यानी फांसी पाए लोगों को बचाने के लिए ब्लड मनी खुद देते हैं. अब तक वह 80 से ज्यादा युवाओं को फांसी से बचा चुके हैं, जिन में से 50 से ज्यादा भारतीय थे. ये ऐसे लोग थे, जो काम की तलाश में सऊदी अरब गए थे और हत्या या अन्य अपराधों में फंसा दिए गए.

2015 में भारत के पंजाब से अबूधाबी जा कर काम करने वाले 10 युवकों से झड़प के दौरान पाकिस्तानी युवक की हत्या हो गई. अबूधाबी की अल अइन अदालत में केस चला, जहां 2016 में दसों युवकों को फांसी की सजा सुनाई गई. बाद में जब इस सिलसिले में याचिका दायर की गई तो अदालत ब्लड मनी चुका कर सजा को माफी में बदलने के लिए तैयार हो गई.

सौदेबाजी में मृतक का परिवार 6 करोड़ 50 लाख रुपए ले कर माफी देने को तैयार हुआ. यह ब्लड मनी चुकाई एस.पी.एस. ओबराय ने.

इस तरह दसों युवक फांसी से बच गए. ओबराय साहब यह काम सालों से करते आ रहे हैं और उन के अनुसार जीवन भर करते रहेंगे.

प्रीत किए दुख होए: भाग 2

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था:

काजल दलित थी और सुंदर ब्राह्मणों का लड़का. दोनों गांव के एक ही स्कूल में पढ़ते थे. छोटे स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद सुंदर बड़ी क्लास में पढ़ने के लिए न चाहते हुए भी अपने मामा के यहां चला गया. काजल गांव में ही पढ़ने लगी. वहां मामा सुंदर को पढ़ाने के नाम पर घर के सारे काम कराता था. उस के साथ मारपीट भी करता था. इस बात से सुंदर बहुत दुखी था. उसे काजल और अपने परिवार की बहुत याद आती थी.

अब पढ़िए आगे… 

मामा बबलू को आया देख आंसू पोंछ कर सुंदर ने चूल्हे पर पतीली चढ़ाई. देखते ही देखते एक साल बीत गया.

पंडिताइन ने सारे गहने बेच कर पैसा मामा बबलू को भेज दिया, क्योंकि सुंदर को हाकिम बनाने का झांसा जो दिया था. हर महीने फोन आता और डिमांड होती, कभी 2 हजार, कभी 5 हजार की.

एक दिन सुंदर को मौका मिल गया. यों तो मामा खुद जाता था सड़क पर पान खाने, पर पैर में बिवाई निकलने के चलते वह दर्द से चल नहीं पाता था, सो 10 का नोट दे कर सुंदर को ही भेजा. बस फिर क्या था, वह नोट रिकशे वाले को दे कर सुंदर वहां से पहुंच गया बेगुसराय स्टेशन.

एक ट्रेन खगडि़या के लिए चलने वाली थी, सो वह उस में चढ़ गया. पहुंच तो गया वह खगडि़या, लेकिन अब नंदीग्राम कैसे पहुंचे? पैसे नहीं थे, जो आटोरिकशा वाले को देता. चल पड़ा पैदल. रास्ते में एक गांव का तांगा मिला. चढ़ गया उस में. तांगे वाला गांव के चाचा लगते थे, जिन्होंने पैसे नहीं लिए.

सुंदर ज्यों ही घर पहुंचा कि मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘कल कहीं से जुगाड़ कर 2 हजार रुपए भेज दो भाई को. बड़ा स्कूल है. एक दिन की देर में बहुत फाइन लग जाता है.’’

तभी सुंदर रो पड़ा और उस ने पुकारा, ‘‘मां.’’

मां दौड़ कर आवाज की ओर भागीं. किवाड़ की आड़ में छिपे सुंदर को सिसकता देख वे पिघल गईं.

‘‘सुंदर, क्या स्कूल में छुट्टी हो गई? तू वहां से अकेला कैसे आया?’’

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‘‘अपने भरोसे. और स्कूल? वहां स्कूल ही नहीं है तो छुट्टी कैसी?’’ उस ने पीठ और हाथ दिखाए, जो मामा की मार से फफोले उठ कर चिपक गए थे.

‘‘देखो, देखो अपना सुंदर हाकिम बन कर आ गया,’’ मां इतना कह कर बेहोश हो कर गिर पड़ीं.

पंडितजी जो सोने वाले थे, एकदम उठे और पंडिताइन को पानी के छींटे मारे, तब कहीं वे होश में आईं और दहाड़ कर बोलीं, ‘‘भैया… नहीं छोड़ूंगी तुझे. तू भाई नहीं कसाई है. तू आ तो जरा,’’ और बेटे सुंदर को खिलानेपिलाने लगीं.

‘‘इस का नाम यहीं स्कूल में लिखा दूंगी. नहीं बनाना हाकिम,’’ मां बोलीं.

दूसरे दिन दोनों मांबेटे चले स्कूल, जिस में काजल भी पढ़ती थी. अब वह 10वीं जमात में थी.

‘‘मां, काजल मुझ से पढ़ने में आगे हो गई होगी?’’

‘‘क्यों नहीं? किसी मामा के फेर में पड़ी होगी क्या वह?’’

‘‘मां, मैं उस स्कूल में कभी नहीं जाऊंगा. वहां मुझे शर्म आएगी. काजल ताना कसेगी,’’ रुक कर सुंदर ठुनकने सा लगा.

‘‘मजाल है जो एक शब्द भी निकाले. चल मेरे साथ…’’

‘‘अरे सुंदर,’’ सुंदर को स्कूल में आया देख काजल चहक कर नजदीक आ गई, ‘‘तू तो शहर गया था न?’’

सुंदर ने कोई जवाब नहीं दिया और मां की आड़ में छिप गया.

‘‘चाची, सुंदर अब यहीं पढ़ेगा न?’’ काजल ने पूछा.

‘‘हां… क्यों? स्कूल तेरे बाप का है क्या? जा, अपनी सीट पर बैठ,’’ सुंदर की मां बोलीं.

बेचारी काजल अपना सा मुंह लिए सीट पर जा बैठी. सुंदर का भी दाखिला हो गया, वह भी उसी की क्लास में.

दूसरे दिन सुंदर स्कूल आया तो काजल से दूरी बना कर बैठा. काजल हारी नजरों से कभीकभार उसे देख लेती और अपनी किताब खोल कर उस में सुंदर को भूलने की कोशिश करती. छमाही इम्तिहान हुए. सब को नंबर मिले. जहां काजल सब से अव्वल थी, वहीं सुंदर सब से फिसड्डी.

इस बार पंडितजी चढ़े आए, ‘‘आप पढ़ाते हैं या खेल करते हैं?’’

‘‘क्या हुआ?’’ हैडमास्टर ने पूछा.

‘‘आप जानते हैं न कि सुंदर मेरा

बेटा है?’’

‘‘जी हां, अच्छी तरह.’’

‘‘फिर भी सभी बच्चेबच्चियां इस से बाजी मार गए. कैसे?’’

‘‘क्यों? इम्तिहान क्या आप ने दिया था या सुंदर ने?’’

‘‘मतलब?’’ पंडितजी गरम दिखे.

‘‘यह तो होना ही था. पिछली क्लास के छात्र को आगे की क्लास के इम्तिहान में बिठा दिया जाए तो क्या होगा? यही होगा न?’’

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‘‘नहीं, आप तो दलित टीचर हैं, इसलिए. क्या काजल से काबिल

कोई लड़का नहीं है बाबू लोगों के लड़कों में?’’

‘‘मैं तो कहूंगा कि नहीं.’’

‘‘समझ गया. चल सुंदर, नहीं पढ़ना दलितों के स्कूल में,’’ और वे सुंदर को अपने साथ ले गए.

पंडितजी ने सुंदर का दाखिला अपने गांव से 10 किलोमीटर दूर एक मिडिल स्कूल में करा दिया. वहां बाबू लोगों के बच्चे ही पढ़ा करते थे. गांव से एक आटोरिकशा जाता था.

एक दिन सुंदर के अंगरेजी के एक टीचर मिश्राजी की नजर उस पर पड़ी. वे पारखी नजर रखते थे. तुरंत अपनी बेटी मीनाक्षी की जोड़ी मन ही मन बिठा ली.

स्कूल में सुंदर की सीट मीनाक्षी के साथ ही थी. इस से मीनाक्षी को मिलने वाली सारी मदद सुंदर को भी मिलने लगी.

मिश्राजी ने पूछताछ कर के पता कर लिया था कि सुंदर एक ब्राह्मण का लड़का है. इसे पास रख कर बचपन से ही दोनों के बीच प्यार के बीज खिल सकते हैं. उन्होंने पंडित रमाकांत को बुलवाया और अपनी मंशा जाहिर की.

‘‘बाप रे बाप, घर में कुबेर आ जाए, और पूछे कि कितना पैसा चाहिए?’’ कह कर पंडितजी खुश हो कर उन के पैरों की ओर झुके, ‘‘मैं ने तो सिर्फ जन्म दिया है, बाकी सबकुछ तो आप ही देंगे सरकार.’’

‘‘आप ने हीरा पैदा किया है हीरा.’’

‘‘हीरा क्या खाक होगा? इस के सब साथी इस से 2 क्लास ऊपर हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं. स्कूल में जो पढ़े सो पढ़े. घर पर मैं इस के साथ मेहनत करूंगा. यह सब के बराबर हो जाएगा. मीनाक्षी भी पढ़ने में तेज है. वह उस की अच्छी मदद करेगी. आप को आगे के लिए कुछ नहीं सोचना है.’’

‘‘ठीक है माईबाप. जब भी आऊंगा तो खाली हाथ नहीं आऊंगा सरकार,’’ कह कर पंडितजी चलते बने.

‘‘सुदर की मां, उसे सही जगह पर दे आया हूं. समझो, देवता मिल गए हैं,’’ घर आते ही पंडितजी ने सारी बात पंडिताइन को सुनाई.

पंडिताइन के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया.

‘‘अरी भाग्यवान, तुम किस सपने में खोई हुई हो? कुछ सुना कि नहीं, जो मैं ने कहा?’’

‘‘सुन लिया. यहां काजल थी, वहां मीनाक्षी है. यही तो कह रहे थे तुम? बेटे को जानते हो न? छोटी सी उम्र में ही प्रेम रोग लगा बैठा है?’’

‘‘इसीलिए तो मैं ने वहां दे दिया. जगहंसाई की वजह तो न बनेगा. कम से कम मीनाक्षी तो ऊंची जाति की है.’’

‘‘तो यह कहो न कि सुंदर का सौदा कर दिया है. मैं तो कहती हूं, उस का मन जजमानी में लगाओ. ट्रेनिंग दो. आप के बाद क्या होगा, सोचा है कभी?’’

‘‘तुम दोनों कान की बहरी हो, कुछ नहीं सुनोगी,’’ कहते हुए पंडितजी कंधे पर गमछा डाल कर बाहर निकल गए. काजल ज्योंज्यों बड़ी होने लगी, त्योंत्यों उस के बदन का उभारनिखार भी बढ़ने लगा. इसी के चलते वह सभी लड़कों के ख्वाबों में बस गई थी. सभी उस का साथ पाने को बावले हो गए थे.

काजल ने पढ़ाई में ऐड़ीचोटी का जोर लगा दिया. कभीकभी सुंदर की याद आती तो वह सोचती कि पता नहीं, उस ने फार्म भरा भी है या नहीं. वैसे, एक क्लास तो वह चूक ही गया था.

इधर, सुंदर को टीचर मिश्राजी ने जीजान से पढ़ाना शुरू कर दिया. सुबहशाम उस पर इतना समय लगाया कि वह एक क्लास चूकने के बावजूद फार्म भरने के लायक हो गया.

मिश्राजी ने किसी दूसरे स्कूल से उसे भी मैट्रिक का छात्र बनवा दिया. सुंदर ने भी अपनी ओर से पढ़ाई करने में कोई कमी नहीं छोड़ी. कभीकभी वह मीनाक्षी से काजल की बातें करता तो मीनाक्षी कहती, ‘‘दिखाओ न एक दिन?’’

‘‘नहीं आएगी वह. ग्राम पंचायत का फैसला है कि कोई भी ऊंची जाति का शख्स उस से नहीं मिल सकता,’’ ऐसा कह कर सुंदर उदास हो गया.

‘‘क्यों?’’ मीनाक्षी ने पूछा.

‘‘क्यों, क्या? सारा गांव बाबुओं का है और वह दलित है.’’

‘‘काजल दलित है?’’

‘‘हां, लेकिन उस से क्या? यह कोई छूत की लाइलाज बीमारी तो है नहीं. दिल की बड़ी अच्छी है. देखने में भी सुंदर है,’’ कह कर सुंदर सिसक उठा.

मीनाक्षी ने प्यार से सुंदर की पीठ पर हाथ रखा, ‘‘अच्छा, मैं समझी. तुझे इसी बात का दुख है कि वह तुझ से आगे निकल जाएगी?’’ सुंदर बस हिचकियां भरता रहा.

‘‘फिर भी तू काजल से अच्छे नंबर लाएगा,’’ मीनाक्षी ने उस का हौसला बढ़ाया. सुंदर भी यह सोच कर खिल उठा कि अगर ऐसा हुआ तो काजल की हेकड़ी टूट जाएगी.

मैट्रिक का इम्तिहान हुआ. नतीजा आया तो काजल राज्य में 5वें नंबर पर आई. अखबार में उस के फोटो समेत छपा, ‘गुदड़ी की लाल, जिले में कमाल’.

मुख्यमंत्री ने टौप 10 छात्रा को 25-25 हजार रुपए व कलक्टर ने 10-10 हजार रुपए दे कर सम्मानित करने का ऐलान किया.

समारोह में जिले के डीईओ साहब बतौर मुख्य अतिथि पधारे थे. इन के ही हाथों काजल को कामयाबी की माला पहनानी थी और 10 हजार रुपए का चैक देना था. सो, दोनों मांबेटी को बुलाया गया.

आई तो बस काजल की मां और माइक थाम कर बोल गई, ‘‘अब काहे की काजल? काहे की माला? हुजूर, गांव में 2 ही घर दलितों के हैं. बाकी हैं बाबू लोग. इन लोगों ने अपने बच्चों को काजल से दूर रहने की हिदायद दे रखी है. सभी हिकारत की नजर से देखते हैं. आज उस के लिए ही माला? नहीं आएगी काजल, साहब,’’ उस ने डीईओ साहब को नमस्ते किया और मंच से उतर कर घर चली गई.

मंच पर ही कोलाहल मच गया. कानाफूसी होने लगी कि अब क्या होगा? डीईओ साहब खुद दलित थे. कहीं स्कूल की यूनिट खत्म कर दी तो बच्चे 10 किलोमीटर दूर जा कर पढ़ सकेंगे क्या?

डीईओ साहब खुद काजल के घर आए और पुचकार कर माला पहनाई और चैक दिया. फिर पूछा कि किस कालेज में दाखिला लोगी. जहां वह दाखिला लेना चाहेगी, वहां उस के लिए सीट रिजर्व रहेगी. यह सरकारी इंतजाम है.

‘‘नहीं साहब, मेरी मां अकेली रह जाएंगी. फिर ज्यादा पढ़लिख कर दलितों में शादीब्याह की भी समस्या आती है. पढ़ेलिखे लड़के मिलते ही नहीं. मिलते हैं तो दहेज में मोटी रकम चाहिए. मैं ठहरी गरीब लड़की.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई समस्या नहीं आएगी. तुम्हारे पीछे पूरी सरकार खड़ी है. शादीब्याह की जब बात आएगी तो लड़के भी मिलेंगे और वे भी बिना दहेज के. केवल तुम अपने पढ़ने की रफ्तार कम मत करो,’’ इतना समझा कर वे चले गए.

काजल को तो बस सुंदर की चिंता सता रही थी कि वह मैट्रिक में पास हुआ भी है या नहीं. उस ने तय किया कि अगर सुंदर फेल हो गया होगा तो वह भी आगे दाखिला नहीं लेगी.

काजल का फोटो अखबार में देख सुंदर चहक उठा, ‘‘यही है मेरी काजल. मीनाक्षी, यही है मेरी काजल…’’ और उस का गला भर्रा गया, ‘‘मीनाक्षी, काजल कितनी दूर चली गई? कटी पतंग की तरह बदलों के पार. मुझे मिल पाएगी या नहीं?’’ और गमछे से वह आंसू पोंछने लगा.

‘‘पागल… एक तो तुम कहते हो कि वह दलित है, दूसरे तुम से अव्वल. अब वह तुम्हें देखेगी भी क्या?’’

‘‘नहीं मीनाक्षी, वह मेरी बचपन की दोस्त है. हम ऊंची जाति वाले उसे भूल सकते हैं, पर वह नहीं भूलेगी.’’

तभी मिश्राजी गरजे, ‘‘चुप… जाति का ब्राह्मण हो कर दलित लड़की का नाम रटे बैठा है. तुझ पर मैं दिनरात मेहनत और खर्च कर रहा हूं. मैं अंधा हूं क्या?

(क्रमश:)

क्या काजल व मीनाक्षी कभी मिल पाईं? सुंदर की जिंदगी में काजल आई या मीनाक्षी? पढ़िए अगले अंक में…

मोदी सरकार के 4 साल : जस के तस सांसद आदर्श गांव

साल 2014 में नेता जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों के सांसदों को 3-3 गांवों को ‘सांसद आदर्श गांव’ के रूप में चुन कर देशभर से तकरीबन 6 लाख गांवों में से 2500 गांवों में बुनियादी सुविधाओं समेत उन्हें हाईटैक बनाने का टारगेट दिया था.

इन गांवों को चुनने के पीछे कुछ शर्तें भी रखी गई थीं जिन के तहत कोई भी सांसद खुद का या पत्नी के मायके का गांव नहीं चुन सकता था. गांव की आबादी 3 से 5 हजार के बीच होनी थी. इन गांवों में 80 से ज्यादा समस्याओं को ध्यान में रख कर तरक्की के काम किए जाने थे. सेहत, सफाई, पीने का साफ पानी, पढ़ाईलिखाई, ईलाइब्रेरी, कसरत, खेतीबारी, बैंकिंग, डाकघर समेत ऐसे तमाम मुद्दों पर तरक्की के काम होने थे.

इस से गांवों में शहरों की तरह सुविधाएं मिलना शुरू हो जातीं और वहां के लोगों को शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ता. लेकिन सांसद आदर्श गांवों की हकीकत कुछ और ही है. अगर सांसद आदर्श गांवों में हुए तरक्की के कामों की हकीकत की बात करें तो देश में तकरीबन 6 लाख गांवों में से अब तक 3 चरणों में 2500 गांवों को चुन लिया जाना था. लेकिन अभी पहले चरण में लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 500 सांसदों ने ही गांवों को चुना है यानी 43 सांसद ऐसे हैं जिन्हें गांवों की तरक्की से कुछ लेनादेना नहीं है.

राज्यसभा के सांसद तो गांवों को ले कर और भी उदासीन हैं. पहले चरण में 253 सांसदों में से केवल 203 सांसदों ने ही गांवों को चुना जबकि बाकी के 50 सांसद चुनने की जहमत तक नहीं उठा सके.

अगर इस योजना के दूसरे चरण की बात की जाए तो इस के हालात तो और भी खराब हैं. इस में 545 लोकसभा सांसदों में से केवल 323 सांसदों ने ही गांवों को चुना जबकि 222 सांसद गांवों को चुनने में नाकाम रहे. राज्यसभा के 241 सांसदों में से केवल 120 सांसदों ने गांवों को चुना, बाकी सांसदों ने तो इस के बारे में सोचा तक नहीं.

जिन सांसदों ने दूसरे चरण में गांवों को चुना उन में से ज्यादातर सांसद तीसरे चरण के गांवों को चुनने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. अभी तक तीसरे चरण में लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 93 सांसदों ने ही गांवों को चुना है. बाकी के सांसदों को गांवों के चुनने में कोई दिलचस्पी नहीं. अगर राज्यसभा के सांसदों की बात की जाए तो 241 सांसदों में से केवल 24 सांसदों ने ही गांवों के चुनने में दिलचस्पी दिखाई यानी बाकी राज्यसभा सांसदों को गांव की तरक्की से कुछ भी लेनादेना नहीं है. कई सांसद आदर्श गांवों का दौरा करने पर पता चलता है कि ऐसे गांवों के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. ज्यादातर सांसद ऐसे हैं जिन्होंने गांवों को चुन तो लिया है लेकिन तरक्की के कामों में वे फिसड्डी साबित हुए. जो छोटेमोटे काम हुए भी हैं, उस का फायदा सिर्फ अगड़ों तक ही सिमट कर रह गया.

बस्ती लोकसभा क्षेत्र के सांसद हरीश द्विवेदी ने पहले चरण में गांव अमोढ़ा को चुना. इस गांव के उत्तरी छोर पर हरिजन बस्ती व सोनकर बस्ती यानी खटीक लोग रहते हैं जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं. सरकार व प्रशासन बड़े जोरशोर से स्वच्छ भारत का राग अलाप रहे हैं और इस मुहिम के कामयाब होने का ढोल भी पीट रहे हैं, पर आज भी यहां के लोग खुले में शौच जाने को मजबूर हैं. यहां की पूरी दलित बस्ती ही खुले में शौच के लिए जाती है. तमाम औरतें अपनी जान जोखिम में डाल कर खुले में शौच के लिए जाने को मजबूर हैं.

सीतारुन्निसा जैसी कई औरतें विधवा पैंशन पाने के लिए सैकड़ों बार सरकारी अफसरों की चौखट पर नाक रगड़ चुकी हैं, लेकिन आज तक उन्हें विधवा पैंशन नसीब नहीं हुई है. हरिजन बस्ती के लोग आज भी बिजली के लिए तरस रहे हैं, क्योंकि इस बस्ती में आज तक बिजली पहुंची ही नहीं है.

सड़कों पर बजबजाती नालियों का गंदा पानी व कूड़े का ढेर यहां की साफसफाई व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहा है. गांव के दलित परिवार आज भी फूस के घरों में रहने को मजबूर हैं. उत्तर प्रदेश में एक दिन के लिए मुख्यमंत्री की कुरसी संभालने वाले सिद्धार्थनगर जिले की डुमरियागंज सीट के सांसद जगदंबिका पाल द्वारा चुने गए सांसद आदर्श गांव तरक्की का भी यही हाल है.

यहां भी दलित पुरवा तरक्की की योजनाओं का फायदा लेने के लिए तरस रहा है. इस गांव के पश्चिमी छोर पर हरिजन टोले में पहुंचने पर सब से पहले सड़क किनारे खुले में किया गया शौच आप का स्वागत करता हुआ मिल जाएगा. मिश्रीलाल, रामफल शर्मा, मनोहर, मंजू देवी, नीरज, नंदू जैसे सैकड़ों परिवार हैं, जिन के पास रहने को घर तक नहीं हैं. शौचालय न होने के चलते ये लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं. गांव में शौचालय, घर, बिजलीपानी की समस्या जैसे पहले थी वैसे ही आज भी बनी हुई है. गांव के लोगों में सांसद जगदंबिका पाल के खिलाफ गुस्सा है. उन का कहना है कि जब गांव को पिछड़ेपन के दलदल में ही धकेलना था तो फिर इस गांव को सांसद आदर्श गांव के रूप में क्यों चुना गया?

लोग नहीं पहचानते सांसद को जिन सांसदों ने आदर्श गांवों को चुना, वे उस गांव में जाने की कोशिश ही नहीं करते. इस वजह से गांव के ज्यादातर लोग सांसदों को पहचानते ही नहीं हैं.

देश में ऐसे तमाम सांसद हैं जो सदन की बैठक तक में शामिल नहीं होते, ऐसे में गांवों में जाने की बात तो दूर की कौड़ी है. जिन गांवों की पड़ताल की गई वहां के ज्यादातर लोगों का यही कहना था कि वे सांसद को नहीं पहचानते. क्रिकेटर रह चुके सचिन तेंदुलकर को ले कर सांसद आदर्श गांव के लिए बड़ी छीछालेदर हुई. इस के बाद वे पहली बार गोद लिए गांव में गए.

दलितों से वसूले जाते हैं पैसे सरकार दलितों के लिए ऐसी तमाम योजनाएं चलाती है जिन में उन्हें मुफ्त में बुनियादी सुविधाओं का फायदा मिलना चाहिए. लेकिन सांसद आदर्श गांव की हकीकत तो कुछ और है. यहां गरीबों को खाना पकाने के लिए मुफ्त में उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनैक्शन मिलना था लेकिन जिन दलितों को इस योजना का फायदा दिया गया उस में 1-1 कनैक्शन के लिए 1600 रुपए वसूले गए.

जो दलित परिवार पैसा दे पाने में नाकाम थे उन को कनैक्शन के कागज ही नहीं दिए जा रहे थे. कुछ परिवारों ने उधार के पैसे से कनैक्शन लिए. सोना देवी, गुडि़या, रेनू, आशा जैसी तमाम औरतों ने बताया कि उन से उज्ज्वला गैस कनैक्शन के नाम पर 1600 रुपए वसूले गए. 2 और क्यों चुन लिए

जिन सांसदों ने प्रधानमंत्री के दबाव में तीनों चरणों के गांवों को चुन भी लिया, अभी उन के द्वारा चुने गए पहले चरण के गांवों में ही तरक्की को रफ्तार नहीं मिल पाई है, ऐसे में जब अगले साल यानी 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं, तो सांसद आदर्श गांवों में तय किए गए तरक्की के कामों को अमलीजामा पहनाना मुश्किल दिख रहा है. आज जब देश और देश के 19 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, उस के बाद 3 गांवों को चुन पाना और उन गांवों की तरक्की करने में पूरी तरह फेल हो जाने से सरकार की गांवों के प्रति अनदेखी का पता चलता है.

सांसद आदर्श गांवों को ले कर लोग यहां तक कह रहे हैं कि ये गांव 4 साल बाद भी गोदी में ही खेल रहे हैं. इस से जाहिर होता है कि सरकार गांव के लोगों को बेवकूफ बना कर अपना चुनावी उल्लू सीधा करना चाहती है.

सांसद आदर्श गांवों को आईना दिखाता एक गांव

उत्तर प्रदेश में सिद्धार्थनगर जिले के ब्लौक भनवापुर का हसुड़ी औसानपुर गांव अपनी तरक्की के कामों के चलते बड़ेबड़े शहरों तक को मात दे रहा है. यह सब सरकार, गांव के लोगों व ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी की कोशिशों के चलते मुमकिन हुआ है. जिस समय दिलीप कुमार त्रिपाठी ने गांव की जिम्मेदारी संभाली थी, उस समय गांव में गंदगी थी. लोगों के घरों में शौचालय न होने के चलते हर कोई खुले में शौच करने को मजबूर था. गांव में बना प्राथमिक व जूनियर स्कूल बदहाली का शिकार था. बेरोजगारी के चलते लोग गांव से बाहर जाने को मजबूर थे.

ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी ने पंचायत सदस्यों के साथ सलाहमशवरा कर गांव की तरक्की का खाका तैयार किया. लेकिन पता चला कि इस गांव के लिए सरकार के पास इतना भी बजट नहीं है जिस से एक भी काम पूरा किया जा सके. ऐसे में उन्होंने तय किया कि वे इस गांव को शहरों से भी ज्यादा सुविधाएं मुहैया कराएंगे. उन्होंने अपने मछलीपालन व सोलर के कारोबार से होने वाली कमाई को गांव की तरक्की में खर्च करने की ठान ली. गांव हुआ डिजिटल हसुड़ी औसानपुर गांव में बिजली के खंभों पर अब 23 सीसीटीवी कैमरे लग गए हैं. इन कैमरों से गांव में खुले में शौच रोकने की निगरानी किए जाने के साथसाथ दूसरी तमाम गलत हरकतों पर नजर रखी जाती है.

गांव वालों को फ्री में वाईफाई सुविधा देने के लिए बिजली के खंभों पर इंटरनैट राउटर लगाए गए हैं. हर खंभे पर लगे सिस्टम से उद्घोषक गांव वालों को जागरूक करने का काम करते हैं. गांव वालों को सरकार की औनलाइन सेवाओं के लिए शहर न जाना पड़े, इस के लिए गांव में कौमन सर्विस सैंटर बनाया गया है जहां से राशनकार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, मृत्यु प्रमाणपत्र, खेतीबारी से जुड़े अनुदान, वृद्धावस्था पैंशन, विधवा पैंशन वगैरह की आवेदन सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं. यह प्रदेश का पहला ऐसा गांव है जहां की गांव से

जुड़ी 18 सूचनाओं समेत जमीनजायदाद की सूचनाएं जियोग्राफिकल इनफौर्मेशन सिस्टम के जरीए गांव की वैबसाइट से सार्वजनिक की गई हैं. हर घर में बिजली पहुंच चुकी है. गांव में बिजली की बचत के लिए एलईडी के बल्ब जलाए जाते हैं. बिजली के खंभों पर भी एलईडी की स्ट्रीट लाइटें लगाई गई हैं.

इस गांव को कैशलैस बनाने के लिए एक बैंक द्वारा गांव में ही ग्राहक सेवा केंद्र बनाने की कवायद की गई है. बैंक से जुड़े अफसर हिमांशु टंडन ने बताया कि गांव की तरक्की में भागीदारी करते हुए गांव के सरकारी स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए रंगबिरंगे बैंच व डिजिटल लाइब्रेरी समेत अनेक सुविधाएं देने की कवायद शुरू की गई है.

ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी ने राजस्थान के जयपुर से प्रभावित हो कर इस गांव के घरों की सभी दीवारों को गुलाबी रंग में रंगवा दिया है. अब तो इस गांव को ‘पिंक विलेज’ के नाम से जाना जाने लगा है. इस गांव के स्कूल का ऐसा बदलाव किया गया है कि यह पढ़ाई और दूसरी सुविधाओं के मामले में प्राइवेट स्कूलों को भी मात दे रहा है. टाइल्स लगे फर्श, लड़केलड़कियों के लिए अलगअलग शौचालय, साफ पानी के लिए स्कूल में आरओ सिस्टम, बच्चों की सिक्योरिटी के लिए हर क्लास में सीसीटीवी कैमरे, प्रोजैक्टर और दूसरी तकनीकी सुविधाओं से लैस स्मार्ट क्लास, साफसुथरे भोजन का इंतजाम इस स्कूल को दूसरे स्कूलों से अलग बनाता है.

गांव में कोई बीमार न पड़े, इस के लिए सभी को सेहत व सफाई की आदतों को ले कर जागरूक किया गया है. गांव को चारों ओर से खूबसूरती बढ़ाने वाले पौधों के साथसाथ फलदार व औक्सिजन बढ़ाने वाले पौधों को रोपा गया है. गांव के अंदर सड़कों को इंटरलौकिंग ईंटों से पक्का किया जा चुका है और गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क को कंक्रीट का बनाया जा चुका है.

इस गांव में किसानों को मजबूत किए जाने की कोशिश की जा रही?है. उन्हें समयसमय पर ट्रेनिंग, जैविक खेती की तकनीक, उन्नत कृषि यंत्र व बीज वगैरह की जानकारी मुहैया कराई जाती है. गांव के किसानों को सस्ती सिंचाई के लिए 6 सोलर पंप मुहैया कराए गए हैं. कृषि विज्ञान केंद्र, सोहना के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को खेती के नुसखे दिए जाते हैं.

गांव के लोगों को मनरेगा के जरीए रोजगार भी दिया जा रहा है. गांव की लड़कियों, औरतों व नौजवानों के लिए कंप्यूटर व सिलाईकढ़ाई की मुफ्त ट्रेनिंग दी जा रही है. इस गांव में छुआछूत का नामोनिशान तक नहीं मिलेगा. गांव की लड़कियों की शादी में ग्राम प्रधान की तरफ से 11 हजार रुपए की मदद भी दी जाती है.

क्या यही लोकतंत्र है

श…श…श… कोई सुन न ले. अब यह भूल जाइए कि आप की कोई बात गुप्त है. आप की हर बात कोई भी सुन सकता है और कभी भी कहीं भी. आप का लिखा पढ़ सकता है, आप का फोटो देख सकता है. अगर मौजमस्ती मेंकोई अंतरंग फोटो खींचा है, तो उस का दुरुपयोग कर सकता है. आप के खाने की रैसिपी पढ़ कर आप को बेसन के विज्ञापन भेज सकता है. आप के मसूरी के प्रोग्राम के बारे में सहेली को लिखे मैसेज को जान कर आप को मसूरी के ट्रैवल एजैंटों के नाम भेजना शुरू कर सकता है. आप के बचपन की तसवीरें ढूंढ़ सकता है. बीसियों के गु्रप में आप को पहचान सकता है.

यह सब इसलिए हो सकता है, क्योंकि आप मोबाइल इस्तेमाल कर रही हैं और उसे अपना जीवन अमृत मानती हैं. इस में आप की आत्मा बसती है, इसी के सहारे आप जिंदा हैं.

मोबाइल कंपनियों के लिए मोबाइल और उस के मुफ्त ऐप असल में शेर का शिकार करने के लिए बांधे गए मेमने हैं, जिन के सहारे आप के पर्स पर कब्जा किया जा रहा है. कुछ शातिर लोग आप की निजी बातों को जान कर कब आप को ब्लैकमेल करने लगें, पता नहीं.

हम डरा नहीं रहे. फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने अमेरिकी संसद की संयुक्त समिति में एक हियरिंग में यह माना और कहा कि वे अपने यूजर्स के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, क्योंकि यूजर्स ने उन की मुफ्त सेवाएं लेते समय सब जान लेने की सहमति दी थी. यह सहमति आप ने एक बौक्स पर ‘हां’ का निशान लगाते समय दी थी, जिस के बिना आप फेसबुक अकाउंट खोल ही नहीं सकतीं.

कल्पना करिए कि आप की अविवाहित सहेली कहती है कि वह प्रैगनैंट है और यह बात कहीं से कहीं होती हुई उस तक पहुंच जाती है जो इस का दुरुपयोग कर सकता है. फेसबुक कंपनी मानती है कि उस के पास तो यह डेटा है ही पर सुरक्षित है. यह सुरक्षा कैसी है यह सब जानते हैं.

भारत सरकार ने भी बहुत सा डेटा आधार नंबर के जरीए जमा कर रखा है. आप का मोबाइल आधार से जुड़ा है और आप ने मोबाइल से ही लाल रंग की पैंटी खरीदी थी, यह अब सरकार को मालूम है. आप की निजी जिंदगी है ही नहीं. आप फेसबुक, व्हाट्सऐप, आधार के सामने बिना कपड़ों की हैं. सारे राज जगजाहिर हैं.

क्या यही लोकतंत्र है, जिस में आप कैदी की तरह हैं और जिस के चारों ओर कैमरे लगे हैं? निजता जीवन का अभिन्न अंग है. आप ने सही किया या गलत यह किसी को भी नहीं पता चलना चाहिए जब तक आप ने अपराध न किया हो. सरकार हर जने को जन्मजात अपराधी नहीं मान सकती.

आप के डेटा का दुरुपयोग करने वाला कौन है? कोई भी हो सकता है. सरकारी नौकरी है तो सरकार हो सकती है. निजी नौकरी में हैं तो कोई पैसा दे कर यह जानकारी ले सकता है. डिटैक्टिव ऐजेंसियां इस तरह की जानकारी जमा कर सकती हैं. बैंक आप को लोन देने से पहले आप का कच्चा चिट्ठा जमा कर सकते हैं. विवाहपूर्व जानकारी जमा करने का धंधा आधार और फेसबुक से डेटा चोरी करने वाले खोल सकते हैं. कैंब्रिज एनैलिटिका ने यही किया था और कई देशों में नेताओं के प्रचार में सही तरह से भरमाने का रास्ता सुझाया था. आप के छोटे से मोबाइल की सुविधा जंजीर भी हो सकती है आप की आजादी की.

आज खतरा मंडरा नहीं रहा. लोग पकड़े नहीं जा रहे, पर कल क्या होगा पता नहीं. मोबाइल छोड़ना आसान नहीं पर यह समझ लें कि यह वह टाइम बम है जो अगर फटा तो जीवन में हलचल मचा देगा.

बौलीवुड डेब्यू से पहले ही कानूनी पचड़े में फंसी सारा अली खान

सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान फिल्म ‘केदारनाथ’ से बौलीवुड में डेब्यू करने वाली हैं. लेकिन करियर की पहली फिल्म की रिलीज से पहले ही सारा कानूनी पचड़े में फंस गई हैं. ‘केदारनाथ’ के डायरेक्टर- प्रोड्यूसर अभिषेक कपूर ने फिल्म के कौन्ट्रैक्ट के उलंघन का आरोप लगाते हुए सारा को कानूनी नोटिस भेजा है. अभिषेक का कहना है कि सारा ने ‘केदारनाथ’ के कौन्ट्रैक्ट को नजरअंदाज करते हुए डायरेक्टर रोहित शेट्टी की फिल्म ‘सिम्बा’ को डेट्स दे दी हैं. केदारनाथ के प्रोड्यूसर ने कहा कि सारा ने एग्रीमेंट्स पर साइन किया था.

सारा से बहुत गुस्सा हैं अभिषेक

अभिषेक कपूर के एक बहुत करीबी सूत्र ने बताया कि वे इस बात को लेकर सारा से बहुत नाराज हैं कि पहली फिल्म की शूटिंग अभी बाकी है और उन्होंने दूसरी फिल्म (‘सिम्बा’) साइन कर ली. उनका कहना है कि एग्रीमेंट्स में ये साफ लिखा था फिल्म की शूटिंग के दौरान वह सभी डेट्स पर मौजूद रहेंगी लेकिन जब मेकर ने सारा को मई से 5 जुलाई तक शूटिंग के लिए मौजूद रहने को कहा तो उनके एजेन्ट ने बताया कि सारा जून में सिंबा की शूटिंग में बिजी हैं. अब प्रोड्यूसर की डिमांड है कि या तो सारा पहले अपनी कमिटमेंट्स पूरी करें या फिर 5 करोड़ का हर्जाना भरें.

कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी

शुक्रवार को कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी. कोर्ट में अभिषेक की ओर से शरण जग्तियानी और सारा की ओर से गौरव जोशी ने अपना-अपना पक्ष रखा. जब कोर्ट ने दोनों पक्षों से सेटलमेंट करने को कहा तो वे तैयार नहीं हुए. कोर्ट अब मंगलवार को इस मामले में सुनवाई करेगा.

एंड्रायड टीवी समेत इन डिवाइस पर नहीं चलेगा ट्विटर

अगर आप भी एक ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं तो यह खबर आपको परेशान कर सकती है. हाल ही में एप्पल के मैक के लिए सपोर्ट बंद करने के बाद ट्विटर ने अन्य कई डिवाइस पर भी अपने प्लेटफौर्म को बंद करने का फैसला लिया है. जी हां, यह सच है रोकु के टीवी ऐप्स, एंड्रायड टीवी और एक्सबौक्स पर पर यूजर्स ट्विटर नहीं चला सकेंगे. इसकी जानकारी ट्विटर ने खुद एक ट्वीट कर दी है.

हालांकि ट्विटर ने इस बात की जानकारी नहीं दी है कि उसके इतने बड़े फैसले लेने की वजह क्या है? इन प्लेटफौर्म से वह अपना सपोर्ट क्यों बंद कर रहा है?  वैसे आमतौर पर लोग मोबाइल या डेस्कटौप पर ही ट्विटर यूज करते हैं. ऐसे में ट्विटर के एडिक्ट यूजर्स ही टीवी पर इसे यूज करना पसंद करते होंगे.

वहीं कहा जा रहा है कि 25 मई से यूरोप में जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेग्यूलेशन (GDPR) लागू दिया गया है, जिसे देखते हुए ट्विटर ने यह फैसला लिया है. हालांकि एप्पल टीवी और अमेजौन फायर टीवी पर ट्विटर उपलब्ध रहेगा. बता दें कि Twitter ने रोकु ऐप के लिए 2017 में सपोर्ट दिया था, उससे पहले 2016 में कंपनी ने एप्पल TV, फायर टीवी और एक्सबॉक्स के लिए ट्विटर को पेश किया था.

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