Download App

किचन में ही छिपा है प्यार की मिठास बनाए रखने का राज

‘‘कितनी खुश होती हैं वे पत्नियां जिन के पति रोज सुबह उन्हें चाय का कप थमा कर जगाते हैं… चाय का कप तो दूर की बात है कभी 1 गिलास पानी तक नहीं मिला इन के हाथों से,’’ पत्नी शालू को हमेशा पति विवेक से शिकायत रहती. पत्नी की रोजरोज की शिकायत दूर करने के लिए एक दिन सुबह जल्द उठ कर विवेक ने 2 कप चाय बनाई और फिर जबान में मिठास घोलते हुए बोला, ‘‘गुडमौर्निंग डार्लिंग… गरमगरम चाय हाजिर है.’’

यह सुन शालू के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. मुसकराते हुए पति के हाथ से चाय का कप ले लिया. मगर एक घूंट पीते ही बुरा सा मुंह बना कर बोली, यह क्या बकवास चाय बनाई है? न चायपत्ती का कोई हिसाब न चीनी का… दूध तो जैसे डाला ही नहीं… सुबहसुबह मूड खराब कर दिया.

विवेक को भी गुस्सा आ गया. बोला, इधर गिरो तो कुआं उधर गिरो तो खाई… कुछ करो तो बुरा, न करो तो निकम्मा… मुझे तो बस बुराई ही मिलनी है…

रमेश औफिस से आ कर मूड फ्रैश करने के लिए अपना सोशल अकाउंट और मेल चैक करने लगा. तभी सीमा ने पूछा, ‘‘खाने में क्या बनाऊं?’’

कुछ भी बना लो, जो तुम्हें पसंद हो,

रमेश ने फेसबुक पर दिनभर की पोस्ट पढ़ते हुए जवाब दिया.

‘‘क्यों, खाना क्या सिर्फ मैं खाती हूं? तुम्हारी कोई पसंद नहीं? पूछो तो नौटंकी और न पूछो तो ताने कि हमारी पसंद तो कोई पूछता ही नहीं,’’ सीमा ने भन्नाते हुए कहा.

तब रमेश को एहसास हुआ कि जानेअनजाने उस ने गृहविवाद की शुरूआत कर दी है. वह बहस को और आगे बढ़ा कर घर का माहौल खराब नहीं करना चाहता था, इसलिए हथियार डालते हुए बोला, ‘‘अच्छा, तुम अपने औप्शन बताओ.’’

‘‘आलूमटर, गाजरमटर या पनीरमटर,’’ सीमा बोली.

‘‘मतलब यह कि आज तो मटर खिला कर ही मानोगी. अच्छा तुम मटरपनीर बना लो,’’ रमेश ने सीमा को मनाने का प्रयास करते हुए कहा तो वह मुसकरा दी.

रमेश फिर से अपने लैपटौप में उलझ गया.

लगभग 1 घंटे बाद सीमा ने खाने के लिए आवाज लगाई तो रमेश मन ही मन मटरपनीर का स्वाद याद करते हुए खाने की मेज पर गया. मगर यह क्या? टेबल पर कढ़ी देख कर उस का माथा ठनका, ‘‘मटरपनीर कहां है?’’ उस ने पूछा.

‘‘नहीं बनाया. फ्रिज खोलने पर मुझे दही दिखाई दिया तो मैं ने सोचा कढ़ी बना लूं वरना यह खट्टा हो जाएगा.’’ सीमा ने अपनी समझदारी पर तारीफ की उम्मीद से रमेश की तरफ देखा.

मगर रमेश का मूड खराब हो गया. बोला, ‘‘जब अपनी पसंद का ही बनाना होता है तो फिर पूछती ही क्यों हो?’’

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं? क्या घर में मैं केवल अपनी ही चलाती हूं? सब कुछ पूछपूछ कर करने के बाद भी यही सुनने को मिलता है,’’ सीमा ने आंसू बहाते हुए कहा तो घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया.

कुछ इसी तरह का नजारा हरीश के यहां देखने को मिला. पत्नी ने उस से मनुहार करते हुए कहा, ‘‘जल्दी से यह सब्जी काट दो ना… आज देर हो गई.’’

हरीश ने पत्नी की मदद करने की मंशा से फटाफट सब्जी काट दी.

कटी सब्जी देखते ही पत्नी ने ताने का गोला दागा, ‘‘सब्जी क्या ऐसे काटी जाती है? आलू बड़े और गोभी छोटी. आलू पकने तक तो गोभी की चटनी बन जाएगी. बेकार ही तुम से मदद मांगी. काम करवाने के बजाय मेरा काम बढ़ा दिया. सब्जी बरबाद हुई वह अलग.’’

हरीश उस पल को कोस रहा था जब उस ने पत्नी का हाथ बंटाने की सोची थी.

घरघर की कहानी

यह सिर्फ 1-2 घरों का ही किस्सा नहीं है, बल्कि घरघर की कहानी है. हर घर में कमोबेश ऐसे दृश्य आम बात हैं. पति बेचारा अगर रसोई में अपनी राय दे तो बुरा और न बोले तो निकम्मा.

आम गृहिणी चूंकि सारा दिन घर में रहती है, इसलिए शाम को पति से करने के लिए उन के पास ढेरों बातें होती हैं. साथ ही पति के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करने के लिए उस का मनपसंद खाना बना कर खिलाना भी उन का प्रिय शगल होता है, इसलिए वे खाने में पति की पसंद पूछती हैं. मगर किफायत से घर चलाना भी वे अपनी जिम्मेदारी समझती हैं.

इसलिए उन की कोशिश रहती है कि पहले वह बनाया जाए जिस के खराब होने या बिगड़ने की संभावना ज्यादा रहती है. तभी पति की पसंद को नजरअंदाज कर के वे अपने हिसाब से खाना बना लेती हैं. वहीं दूसरी तरफ  कामकाजी महिला सोचने में वक्त गंवाने के बजाय पति से पूछ कर सोचने की जिम्मेदारी उस पर डाल देती है और खुद किचन में संभावनाएं देखने लगती है. यदि पति की पसंद उस से मैच कर जाती है तो ठीक वरना वह पति के जवाब का इंतजार किए बिना खाना बना लेती है.

मजे की बात यह है कि महिलाओं को यदि खुद कुछ बनाने की समझ नहीं आती तो इस बात का ठीकरा भी पति के सिर ही फोड़ा जाता है. यह कह कर कि इतना सा काम ही कहा था वह भी ठीक से नहीं कर सकते. यह भी मुझे ही देखना पड़ता है.

क्या है उपाय

तो किया क्या जाए? क्या पत्नी का अपने पति से मदद की उम्मीद करना गलत है या फिर पति को बिना प्रतिकार किए चुपचाप पत्नी की जलीकटी सुन लेनी चाहिए? नहीं, ये दोनों ही बातें सुखी दांपत्य के लिए सही नहीं कही जा सकतीं.

पति अगर पत्नी की घरेलू कामों में मदद करता है तो पत्नी की नजरों में उस की इज्जत और भी बढ़ जाती है वहीं यदि पति चुपचाप अपना अपमान सहन करता रहे तो उस का आत्मसम्मान दांव पर लग जाता है और उस का खुद पर से भरोसा भी उठने लगता है. तो क्या है बीच का रास्ता?

पत्नी क्या करे

– यदि पत्नी चाहती है कि पति उस की मदद करे तो सब से पहले यह देखा जाए कि वाकई पति के पास उस की मदद करने के लिए समय है भी या नहीं.

– पति पर रोब जमा कर मदद मांगने के बजाय मदद की रिक्वैस्ट की जाए.

– यह भी स्पष्ट किया जाए कि आप किस तरह की मदद चाहती हैं अन्यथा बाद में आशानुरूप न होने पर झल्लाहट हो सकती है.

– पति के औफिस से आते ही अपने कामों का पिटारा ले कर न बैठ जाएं, बल्कि उन के रिलैक्स होने के बाद ही अपनी बात रखें.

– मनमाफिक काम होने के बाद पति की तारीफ अवश्य करें. यदि सहेलियों और रिश्तेदारों के सामने उन की तारीफ करेंगी तो उन्हें और भी बेहतर लगेगा.

– यदि घरेलू कामों में पति की रुचि नहीं है तो आप उन से बच्चों का होमवर्क देखने को भी कह सकती हैं. यह भी आप की मदद ही होगी.

– जैसा आप चाहती हैं यदि काम वैसा न भी हुआ हो तो भी अपने जज्बात काबू में रखें, क्योंकि गुस्सा करने से कोई लाभ नहीं, बल्कि हो सकता है कि पति भविष्य में आप की मदद करने का खयाल ही त्याग दें.

पति क्या करे

– हर पत्नी की इच्छा होती है कि पति उस की परेशानियों को समझे, इसलिए जब भी मौका मिले पत्नी की मदद अवश्य कीजिए. पत्नी चाहे गृहिणी हो या कामकाजी, पति से मदद की उम्मीद सभी को होती है. मदद एक सहायक के रूप में ही कीजिए, पत्नी पर हावी होने की कोशिश करेंगे तो मात खा जाएंगे.

– यदि आप अतिव्यस्त रहते हैं तब भी कम से कम अवकाश के दिन तो पत्नी की कुछ मदद जरूर करें ताकि उसे भी फुरसत के कुछ पल मुहैया हों.

– जिस भी काम में आप पत्नी का हाथ बंटाने की कोशिश कर रहे हों उस की पूरी जानकारी अवश्य ले लें ताकि पत्नी को यह न लगे कि जैसा वह चाहती थी काम वैसा नहीं हुआ.

– पत्नी की चाहे जितनी भी मदद करें, मगर उस की सहेलियों के सामने यही कहें कि क्या करूं, बेचारी खुद ही लगी रहती है. मैं तो चाह कर भी इस की कोई मदद नहीं कर पाता. फिर देखिए, कैसे पत्नी की नजरों में आप हीरो बनते हैं.

– धुले बरतन सजा कर रखना भी पत्नी की एक बड़ी मदद हो सकती है. बस ध्यान रहे कि कुछ टूटे नहीं.

– हरी सब्जियां सेहत के लिए अच्छी होती हैं, मगर उन्हें साफ करने में बहुत समय लगता है. यदि इस काम में पत्नी का हाथ बंटाएंगे तो पत्नी तो खुश होगी ही, परिवार की सेहत भी दुरुस्त होगी.

सब से बड़ी बात यह कि आप पत्नी की मदद करें या न करें, उस के साथ किचन में खड़े भी होंगे तो भी उसे अच्छा लगेगा. आप दोनों को एकसाथ बिताने के लिए कुछ पल अतिरिक्त मिलेंगे. मगर हां, पत्नी के काम में मीनमेख निकालने की गलती कभी न कीजिए. कोई भी पत्नी अपनी सत्ता में दखल बरदास्त नहीं करती.

– इंजी. आशा रानी  

अपनाएं ये तरीके ताकि नवजात की त्वचा बनी रहे कोमल

नवजातों की त्वचा बहुत नाजुक और संवेदनशील होती है. साबुन, शैंपू, डिटर्जैंट, तेल, पाउडर और कपड़ों में मौजूद रसायन उन की त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं. इस से उन की त्वचा में जलन, ड्राइनैस, रैशेज आदि समस्याएं हो सकती हैं. इसी तरह खुशबूदार बेबी प्रोडक्ट्स का भी इस्तेमाल न करें.

बच्चे की त्वचा को कोमल बनाए रखने में ये टिप्स आप के काम आएंगे:

नहलाना: जन्म के पहले महीने में सप्ताह में 3-4 बार स्पंज बाथ दें. दूध पिलाने के बाद मुंह को स्पंज से साफ करें. डायपर बदलने के बाद भी स्पंज से अच्छी तरह साफ करें. दूसरे महीने जब बच्चे को नहलाना शुरू करें तो कुनकुने पानी से नहलाएं. माइल्ड सोप, ऐंटीबैक्टीरियल सोप आदि का इस्तेमाल न करें वरना ये बच्चे की संवेदनशील त्वचा को नुकसान पहुंचा सकते हैं. नहलाने के बाद कौटन के मुलायम तौलिए से धीरेधीरे पोंछें ताकि त्वचा को नुकसान न पहुंचे.

कैसे लगाएं पाउडर: बच्चों के लिए उन के लिए बने टैलकम पाउडर का ही इस्तेमाल करें. खूशबूदार और दूसरे रसायनों वाले पाउडर का इस्तेमाल न करें. डायपर एरिया में पाउडर न लगाएं.

मसाज: नवजात व छोटे बच्चों का शरीर बहुत नाजुक होता है, इसलिए उन की मसाज करने से पहले मसाज की तकनीक, कौन सा तेल इस्तेमाल करें, कितनी देर तक मसाज करें और कब मसाज न करें जैसी बातों की जानकारी होनी बेहद जरूरी है. बच्चों की विशेष जरूरतों के अनुसार मसाज की अलगअलग तकनीकों का इस्तेमाल करें.

मसाज की सामान्य विधि का प्रयोग करना ही बेहतर रहेगा और उसे मां या परिवार के किसी अन्य सदस्य के द्वारा घर पर किया जा सकता है. बच्चों की त्वचा संवेदनशील होती है, इसलिए ऐसे तेल के प्रयोग से बचें, जिस में रसायनों का प्रयोग किया गया हो. सूरजमुखी का तेल बच्चों की त्वचा के लिए अच्छा रहता है और बच्चे को मोटे तौलिए पर लिटा कर मसाज करें.

डायपर और नैपीज: बच्चे के लिए नैपी का चयन सोचसमझ कर करें. नैपी खरीदते समय इस बात का ध्यान रखें कि वह सही फिटिंग का हो, उस की सोखने की क्षमता बेहतर हो और उस का फैब्रिक बच्चे की संवेदनशील त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाला न हो.

मौसम कोई भी हो कौटन या लिनन के नैपी सब से अच्छे रहते हैं. ये फैब्रिक नमी को अवशोषित करते हैं. कई अच्छी क्वालिटी के डिसपोजेबल नैपी भी बाजार में उपलब्ध हैं. नैपी को हर 3-4 घंटे में बदलती रहें, अधिकतम 6 घंटे में. नैपी जितनी जल्दी बदलेंगी, संक्रमण का खतरा उतना ही कम होगा.

कपड़े के नैपी बच्चे को सूखा और कंफर्टेबल रखते हैं. ये मुलायम माइक्रोफाइबर के बने होते हैं और इन की अवशोषण करने की क्षमता अच्छी होती है.

इन बातों का भी रखें ध्यान:

कपड़े: शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए कपड़े खरीदते समय आप को केवल यही नहीं देखना है कि उन्हें पहन कर आप का बच्चा कितना सुंदर लगेगा. हमेशा मुलायम और आरामदायक कपड़े ही खरीदें और जिन्हें धोना भी आसान हो.

फैब्रिक ऐसा हो जिस से बच्चे की त्वचा को कोई नुकसान न पहुंचे. बच्चों के लिए कौटन सब से अच्छा रहता है. लेकिन कौटन के कपड़े थोड़े सिकुड़ जाते हैं. ऊपरी और निचले भाग के लिए अलगअलग कपड़े खरीदने से बेहतर है कि आप वनपीस खरीदें. इन्हें पहनाना और उतारना आसान होता है. इन से त्वचा पर रगड़ नहीं लगती है.

मौसम के अनुसार पाजामा पहनाएं. गरमी के मौसम में पतले कपड़े तो सर्दी के मौसम में मोटे कपड़े का पाजामा अच्छा रहता है. बस ध्यान रहे कि इन में टाइट रबड़ या इलास्टिक न लगा हो.

कैसे धोएं: बच्चों की त्वचा संवेदनशील होती है, इसलिए सामान्य डिटर्जैंट का इस्तेमाल न करें. रंगीन और खूशबू वाले डिटर्जैंट का इस्तेमाल तो बिलकुल न करें. उस डिटर्जैंट का इस्तेमाल करें जिस का ऊनी कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल करते हैं. छोटे बच्चों के कपड़ों को पानी में अच्छी तरह खंगालें ताकि डिटर्जैंट पूरी तरह निकल जाए. अगर बच्चे की त्वचा ज्यादा संवेदनशील है, तो छोटे बच्चों के लिए बने खास डिटर्जैंट (बेबी स्पैसिफिक डिटर्जैंट) का इस्तेमाल करें.

क्यों होते हैं रैशेज: लगातार नैपी पहने रहने से बच्चों के नितंबों और जांघों पर रैशेज पड़ जाते हैं. वहां भी रैशेज पड़ जाते हैं जहां त्वचा फोल्ड होती है. रैशेज होने का सब से प्रमुख कारण नमी होती है. दूसरे प्रमुख कारणों में नैपी को कस कर बांधना, ठीक प्रकार से न धोना हैं, जिस से डिटर्जैंट या साबुन नैपी में रह जाता है.

तो नहीं पड़ेंगे रैशेज: बच्चे को रैशेज से बचाने का सब से अच्छा तरीका यह है कि नैपी वाले एरिया को साफ और सूखा रखें. गीले नैपी को तुरंत बदलें. उसे बदलने के बाद हमेशा बच्चे के बौटम को कुनकुने पानी से साफ करें.

– बच्चे को कुनकुने पानी और माइल्ड साबुन से ही नहलाएं.

– त्वचा के पूरी तरह सूखने के बाद ही कपड़े और नैपी पहनाएं.

– 24 में से 8 घंटे बच्चे को बिना नैपी के रखें ताकि त्वचा को सांस लेने का अवसर मिल सके.

रैशेज ठीक करने के घरेलू उपाय

– रैशेज पर ऐलोवेरा जैल लगाएं.

– रैशेज पर पैट्रोलियम जैली लगाएं.

– रैशेज पर टैलकम पाउडर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है पर अधिक मात्रा में नहीं. वरना यह बच्चे के फेफेड़ों में पहुंच कर उसे नुकसान पहुंचा सकता है.

अगर बच्चे के नितंबों, जांघों औ रगुप्तांगों पर लाल रैशेज अधिक मात्रा में पड़ गए हैं तो घरेलू उपायों से उन्हें ठीक करने का प्रयास करें. अगर 7 दिनों में रैशेज ठीक न हों और उन में जलन, खुजली हो या खून  निकले अथवा बच्चे को बुखार आ जाए तो तुरंत डाक्टर को दिखाएं.

– डा. गौरव भारद्वाज, सरोज सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल

गूगल मैप का इस्तेमाल हुआ और आसान, जोड़े गए ये नए फीचर्स

गूगल फार इंडिया 2018 (Google For India 2018) का चौथा संस्करण 28 अगस्त को दिल्ली में आयोजित किया गया. इसमें गूगल के कई प्रोडक्ट्स को लौन्च किया गया. इसके साथ ही इस इवेंट में गूगल मैप्स के भारत में 10वीं सालगिरह के मौके पर गूगल मैप्स के वाइस प्रेसिडेंट गायत्री रंजन ने कहा, ”गूगल मैप्स के लिए भारत एक तेजी से बढ़ रहा देश है. इस मौके पर गूगल मैप्स के नए फीचर्स के साथ ही कोलकाता के 25,000 घरों में प्लस कोड जारी किया गया, जिसकी मदद से गूगल मैप्स पर इन घरों की पहचान की जा सकेगी. ये प्लस कोड इन घरों का वर्चुअल एड्रेस होगा.”

गूगल मैप्स के नए फीचर्स

गूगल मैप्स के जरिए अब यूजर्स इंटर-सिटी बस के आगमन और प्रस्थान के बारे में भी पता लग सकेगा. इसके लिए गूगल ने औनलाइन बस बुकिंग प्लेटफार्म रेड बस के साथ साझेदारी की है. इतना ही नहीं, गूगल मैप्स के जरिए यूजर्स को अपने बुक किए हुए बस की जानकारी मिल सकेगी. गूगल की यह सेवा 20,000 से ज्यादा बस रूट पर मिलेगी.

गूगल मैप्स के लाइट वर्जन गूगल मैप्स Go के यूजर्स भी टर्न-बाय-टर्न वौयस नेविगेशन की सेवा हिंदी और अंग्रेजी भाषा में ले सकेंगे. आने वाले कुछ सप्ताह में इस सेवा को रोल आउट कर दिया जाएगा.

गूगल मैप्स गो में अब पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बारे में भी यूजर्स को हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं में सूचना मिल सकेगी. इतना ही नहीं, बस के स्टॉप के साथ ही गंतव्य के लिए कितना पैदल चलना होगा, इसके बारे में भी जानकारी मिल सकेगी.

गूगल मैप्स गो के जरिए यूजर्स को यह भी पता चल सकेगा कि उन्होंने कितनी यात्रा पूरी की है और कितनी बांकी है. यह सुविधा भी हिंदी और अंग्रेजी दोनो ही भाषाओं में मिल सकेगी.

गूगल मैप्स गो के यूजर इंटरफेस में भी बदलाव किया गया है. गूगल मैप्स गो को अपग्रेड करते हुए इसमें एक नया होम स्क्रीन दिया गया है. साथ ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए शार्टकट भी दिया गया है.

गूगल मैप्स गो को यूजर्स 3G और 2G नेटवर्क में भी इस्तेमाल कर सकेंगे. यह ऐप सस्ते स्मार्टफोन्स में भी काम करेगा.

इसके अलावा गूगल ने दावा किया है कि 2018 में 50 मिलियन यूजर्स ने गूगल मैप्स का इस्तेमाल किया है. साथ ही, 20 मिलियन यूजर्स ने गूगल मैप्स के टू-व्हीलर मोड का इस्तेमाल किया है.

एसबीआई ने बदले 1295 ब्रांच के नाम और IFSC कोड

एसबीआई (भारतीय स्टेट बैंक) ने 1295 ब्रांच के IFSC कोड बदल लिए हैं. इस बदलाव के बाद औनलाइन फंड ट्रांसफर करने के लिए आपके पास नया IFSC कोड होना जरूरी है. जिसके बिना आपको दिक्कत हो सकती है. दरसअल एसबीआई के 5 सहयोगी बैंकों का इसमें विलय होने के बाद बैंक ने यह बड़ा बदलाव किया है.

दुनिया का 53वां बड़ा बैंक है एसबीआई

एसबीआई एसेट्स के मामले में दुनिया के टौप बैंकों में 53वें पायदान पर है. 30 जून, 2018 तक बैंक की कुल एसेट्स लगभग 33.45 लाख करोड़ रुपए थी. डिपौजिट्स, अडवांसेस, कस्टमर एक्विजिशन और बैंकिंग आउटलेट्स के मामले में एसबीआई भारत का सबसे बड़ा बैंक है और चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के अंत तक उसकी देश भर में 22,428 शाखाएं थीं. डिपौजिट्स में बैंक का भारत में 22.84 फीसदी और एडवांसेस 19.92 फीसदी मार्केट शेयर है.

रातों रात बदली 3.25 करोड़ कस्टमर्स की बैंक ब्रांच

एसबीआई के इस फैसले के चलते करीब 3.25 करोड़ कस्टमर्स की रातों रात अब बैंक ब्रांच बदल चुकी है. दरअसल इन सभी 6 बैंकों का कस्टमर बेस करीब 3.25 करोड़ था. ब्रांच का IFSC कोड और नाम बदलने के बाद ये सभी कस्टमर इस बदलाव की इसकी जद में आएंगे. इसकी पूरी लिस्ट जारी कर दी गई है. बता दें कि मर्जर से पहले एसबीआई का कुल कस्टमर बेस करीब 33.25 करोड़ (2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक) था. वहीं इस मर्जर के बाद उसका कस्टमर बेस बढ़कर 37 करोड़ हो गया था.

आपकी शाखा इस सूची में शामिल है कि नहीं : पता करने का प्रक्रिया

संभव है कि आपका खाता भी इन बदली हुई शाखाओं में हो. आपकी शाखा इस सूची में शामिल है कि नहीं, यह आप घर बैठे ही चेक कर सकते हैं. इसके लिए आप एसबीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर पहुंच सकते हैं. यहां आपको ‘अनाउंसमेंट’ सेक्शन में इन ब्रांच की पूरी लिस्ट मिल जाएगी. इस लिस्ट में आपको पुराने IFSC कोड और पुराने नाम भी मिलेंगे.

पुराने नाम और IFSC कोड के साथ ही आपको इस लिस्ट में नये नाम और IFSC कोड भी मिल जाएंगे. आप https://www.एसबीआई.co.in/webfiles/uploads/files/RATIONALISED_BRANCHES_WITH_IFSC.pdf  लिंक के जरिए सीधे लिस्ट तक पहुंच सकते हैं. इस तरह आप आसानी से चेक कर पाएंगे कि आपकी ब्रांच में भी तो कोई बदलाव नहीं हुआ है.

जानें हौकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के बारे में 10 खास बातें

भारत को 3 ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलाने वाले ‘हौकी के जादूगर’ मेजर ध्यानचंद का आज (29 अगस्त) को 114वां जन्मदिन है. उनके सम्मान में ही 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में भी मनाया जाता है. इस दिन राष्ट्रपति, राजीव गांधी खेल रत्न, अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार से खिलाड़ियों को सम्मानित करते हैं.

हौकी के जादूगर’ के 114वें जन्मदिवस पर आइए एक नजर डालते हैं, उनसे जुड़े कुछ दिलचस्प बातों पर :

– ध्यानचंद ने 16 साल की उम्र में भारतीय सेना ज्वाइन कर ली थी. इसी समय उन्होंने हौकी खेलना भी शुरू किया. ध्यानचंद ब्रिटिश आर्मी में लांस नायक थे. उनके बेहतरीन खेल प्रदर्शन को देखते हुए ब्रिटिश गवर्मेंट ने उन्हें मेजर बनाया था.

– 23 वर्ष की उम्र में ध्यानचंद 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में पहली बार हिस्सा लिया. यहां चार मैचों में भारतीय टीम ने 23 गोल किए. ध्यानचंद 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में सबसे ज्यादा गोल (14) करने वाले खिलाड़ी थे. भारत की जीत पर एक रिपोर्ट में कहा गया, यह हौकी का खेल नहीं बल्कि एक जादू है.

– एक बार ध्यान चंद एक मैच में कोई भी गोल नहीं कर पाए. उन्होंने तर्क दिया कि गोल पोस्ट छोटा है. उस वक्त हर व्यक्ति चकित रह गया जब गोल पोस्ट को नापा गया और वह अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप नहीं पाया गया.

– ध्यानचंद ने भारत को अनेक यादगार जीत दिलवाईं, लेकिन वह अपना बेस्ट मैच 1933 में बेईघटन कप फाइनल में कोलकाता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच हुए मैच को बताते थे.

– 1932 के ओलंपिक में भारत ने अमेरिका को 24-1 से, जापान को 11-1 से हराया. ध्यान चंद ने 12 गोल किए जबकि उनके भाई रूप सिंह ने 35 में से 13 गोल किए. इसके बाद दोनों भाइयों को हौकी ट्वीन्स कहा गया.

– 1936 के बर्लिन ओलंपिक में, हौकी स्टेडियम में कोई अन्य प्रतिस्पर्धा हो रही थी. ध्यानचंद भी वहां बैठे थे. अगले दिन जर्मन न्यूजपेपर की सुर्खियां थीं- हौकी स्टेडियम आइए, भारतीय हौकी का जादूगर एक्शन में है.

– ध्यानचंद ने 1928 में एम्सटर्डम, 1932 में लास एंजेलिस और 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हौकी टीम का नेतृत्व किया और भारत को स्वर्ण पदक दिलाया. 1948 में 43 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतरराट्रीय हौकी को अलविदा कहा.

– 1935 में औस्ट्रेलिया के सर डान ब्रैडमैन और ध्यानचंद एडीलेड में मिले. ध्यानचंद का खेल देखने के बाद महान क्रिकेटर ब्रैडमैन ने कहा था, वह ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बन रहे हों.

– 22 साल (1926-48) के अपने करियर में ध्यानचंद ने 400 गोल किए.

– नीदरलैंड हौकी प्रशासन ने एक बार उनकी हौकी चेक की थी और यह देखा था कि ध्यानचंद की हौकी स्टिक पर कहीं कोई चुंबक तो नहीं लगा है.

जब ठुकराया हिटलर का औफर

हौकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का खेल जिसने भी देखा वह उनका मुरीद हो गया. भारत के महान हौकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की गोल करने की अद्भुत क्षमताओं से विपक्षी टीमें भी अक्सर हैरान रह जाती थीं. उनके बारे में यहां तक कहा जाता था कि गेंद उनकी हौकी से चिपक जाती है. ध्यानचंद को चाहने वाले उन्हें ‘दद्दा’ भी कहकर पुकारा करते थे. दद्दा के खेल का जादू ऐसा था जिसने जर्मन तानाशाह हिटलर तक को अपना दीवाना बना दिया था. मेजर का खेल देखने के बाद हिटलर ने उनको जर्मन सेना में पद औफर किया था, जिसे इस ‘भारतरत्न’ ने ठुकरा दिया था. मेजर साहब ने हिटलर से बड़ी ही विनम्रता से कहा, ‘मैंने भारत का नमक खाया है. मैं भारतीय हूं और भारत के लिए ही खेलूंगा.’ उस समय ध्यानचंद लांस नायक थे.

इस अंदाज में हुई थी ध्यानचंद की आखिरी विदाई

ध्यानचंद का निधन 3 दिसम्बर, 1979 को 74 साल की उम्र में हुआ था. जैसे ही उनकी मृत्यु की खबर फैली. झांसी में हौकी के प्रेमियों ने उनके घर में इकट्ठा होना शुरू कर दिया. सभी अपने चहेते खिलाड़ी की आखिरी झलक पाना चाहते थे. लोग कारों पर, इमारतों के शीर्ष पर खड़े थे. ऐसा कहा जाता है कि उनके अंतिम संस्कार में करीब 1,00,000 लोग शामिल हुए थे. हालांकि इसमें किसी राजनेता को शामिल होने की अनुमति नहीं थी. झांसी शहर ने फैसला किया कि दद्दा का किसी अन्य व्यक्ति की तरह अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा, लिहाजा उनका अंतिम संस्कार एक हौकी फील्ड में होगा.

राज्य सरकार ने हस्तक्षेप किया और अनुमति देने से इनकार कर दिया और हौकी फील्ड में शव को रोकने के लिए पुलिस को भेज दिया. ऐसे वक्त में सेना ने हस्तक्षेप किया और पुलिस को उनके आदेशों को चलाने से रोक दिया. बाद में हौकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का पूरा राज्य सम्मान के साथ हीरोज हौकी मैदान में अंतिम संस्कार किया गया था.

आपकी पसंद से पैसा बना रहे हैं फेसबुक और गूगल

आपकी पसंद क्‍या है? आपके लिए सबसे जरूरी बात क्‍या है, जिसे आप जानना चाहते हैं, ऐसी कौन सी बात है जिसका मूल्‍य आपके लिए आपकी जिंदगी में सबसे खास है? इसे कोई सबसे बेहतर जानता है, तो वह स्‍वयं आप हैं, और हम में से हर कोई ऐसा ही होता है. जैसे कि हर इंसान का डीएनए अलग होता है, उसी तरह से लोगों की पसंद-नापसंद भी अलग-अलग होती है. और आजकल डिजिटल वर्ल्‍ड में आपकी पसंद के आधार पर ही नए प्रोडक्‍ट लाए जा रहे हैं और उसको आपकी जरूरत के हिसाब से अपडेट किया जा रहा है. फेसबुक और गूगल,एप्‍पल आजकल यहीं कर रहे हैं.

फेसबुक की न्‍यूजफीड देख लीजिए, फेसबुक ने जो ताजा बदलाव किए हैं वह यूजर की पसंद के आधार पर किया है और उसे इस बात की आजादी दी है कि वह अपनी वॉल पर किस तरह के कंटेट, फोटो या वीडियो देख सकता है और यह सब करते समय फेसबुक ने अपने यूजर की पसंद को आधार बनाकर चीजें तय कीं.

फेसबुक का लक्ष्‍य क्‍या है, बहुत सिंपल सी बात है वह अपने यूजर को फीलगुड अनुभव देना चाहता है और लोकतांत्रिक आजादी जिसमें वह अपनी फेसबुक वॉल पर चीजें खुद तय कर सके. उसे इस बात का पूरा कंट्रोल दिया जाए कि वह अपनी फेसबुक वॉल पर अपनी पसंद की चीज देख सकें. वह उसके दोस्‍त की पोस्‍ट, फोटो, वीडियो या फिर ऐसी न्‍यूज हो सकती है जिसे वह देखना, पढ़ना पसंद करता हो और इन सब बातों के साथ फेसबुक अपने प्रोडक्‍ट को एड मार्केट में अधिक पैसा भी बनाना चाहता है.

फेसबुक का संदेश साफ है अगर आप अपने ब्रांड के लिए फेसबुक यूजर तक पहुंचना चाहते हैं तो आपको फेसबुक यूजर की पसंद के हिसाब से कंटेट पोस्‍ट करना होगा और अधिक यूजर तक पहुंचने के लिए आपको फेसबुक को पहले की अपेक्षा अधिक भुगतान भी करना पड़ेगा.

एयर इंडिया को कर्ज के बोझ से उबारेगी सरकार

भारी कर्ज तले दबी विमानन कंपनी एयर इंडिया को उबारने के लिए सरकार तैयार हो गई है. सरकारी विमानन कंपनी के विनिवेश की कोशिशों के बावजूद कोई खरीदार नहीं मिलने पर वित्त मंत्रालय खुद मदद की तैयारी में जुट गया है.

सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय ने दो अलग-अलग तरीके से एयर इंडिया की मदद करने की योजना बनाई है. इसके तहत मंत्रालय तत्काल प्रभाव से कंपनी को दो हजार करोड़ रुपये की बैंक गारंटी देने को तैयार हो गया है. इसका मतलब है कि बैंक ये रकम एयर इंडिया को देगा और वित्त मंत्रालय इसकी गारंटी लेगा.

इसके अलावा कंपनी के कर्ज का बड़ा हिस्सा स्पेशल पर्पज व्हीकल को ट्रांसफर किया जा सकता है. साथ ही कर्ज की जिम्मेदारी कम करने के लिए नकद सहायता भी दी जा सकती है. इन दोनों तरीकों पर वित्त मंत्रालय इस हफ्ते ही विचार करेगा. योजना के तहत मिलने वाली 2000 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी का इस्तेमाल विमानन कंपनी के रोजमर्रा के खर्चों में होगा.

नहीं मिला था खरीदार

इससे पहले सरकार ने एयर इंडिया के रणनीतिक विनिवेश की कोशिश की थी, लेकिन कंपनी पर 54 हजार करोड़ से ज्यादा के कर्ज के चलते कोई खरीदार सामने नहीं आया. वर्ष 2007 में इंडियन एयरलाइंस के विलय के बाद से एयर इंडिया घाटे में है. सुरेश प्रभु ने भी कहा था कि बड़े कर्ज के साथ सेवा देना संभव नहीं है.

स्थायी मदद के लिए दो तरह की रणनीति बनाई

वित्त मंत्रालय ने कंपनी की स्थायी मदद करने की भी रणनीति बनाई है, जिस पर इस सप्ताह विचार-विमर्श किया जाएगा. इसके तहत दो तरह की योजना बनाई गई है.

  1. कंपनी के कुल कर्ज में से 35,484 करोड़ स्पेशल पर्पज व्हीकल (एसपीवी) में ट्रांसफर किए जाएं. इसी एसपीवी में एयर इंडिया के रीयल एस्टेट की संपत्तियों, जमीन व सब्सिडी को भी ट्रांसफर किया जाए. एसपीवी दो साल में इन संपत्तियों को बेचकर कर्ज उतारेगी.
  2. दूसरे प्रस्ताव के तहत शेष बचे 19,236 करोड़ रुपये में से 7000 करोड़ रुपये सरकार तत्काल एयर इंडिया को दे दे. इसमें से 6000 करोड़ रुपये सितंबर तक और 400 करोड़ रुपये दिसंबर तक जबकि 600 करोड़ रुपये अगले साल मार्च तक कंपनी को दे दिए जाएं.

‘पटाखा’ के गाने ‘गुंडो बलमा’ में दिखा दो बहनों के बीच का कोल्ड वार

हाल ही में विशाल भारद्वाज की फिल्म पटाखा का जबरदस्त ट्रेलर रिलीज किया गया था. जिसे लोगों ने काफी पसंद किया. अब फिल्म के ट्रेलर के बाद इस फिल्म का गाना रिलीज कर दिया गया है. ‘गुंडो बलमा के नेक बलमा?’ गाने में दोनों बहनों के बीच जारी कोल्ड वार को दिखाया गया है. इस गाने को आवाज रेखा भारद्वाज और सुनिधि चौहान ने दी है. गाने को कंपोज खुद विशाल भारद्वाज ने किया है. लेखक गुलजार ने इस गाने को लिखा है. वैसे रेखा-विशाल और गुलजार की सुपरहिट तिकड़ी पहले भी अपना जादू बिखेर चुकी है. एक बार फिर ये तीनों दिग्गज एक साथ अपना जलवा बिखरने को तैयार हैं.

बता दें कि 14 अगस्त को निर्माताओं ने फिल्म का ट्रेलर जारी किया था. ट्रेलर काफी प्रभावी है. पटाखा हास्य से भरपूर फिल्म है. दरअसल ये दो सगी बहनों- बड़की और छुटकी की कहानी है, जो हमेशा ही एक दूसरे से लड़ती रहती हैं. बीड़ी पीती हैं और हम उम्र लड़कों के साथ फ्लर्ट भी करती हैं. शादी के बाद दोनों को यह अहसास होता है कि वे एक-दूसरे के साथ नहीं रह सकती लेकिन एक-दूसरे के बिना भी नहीं रह सकती हैं. दोनों की लड़ाई भारत-पाकिस्तान की तरह हैं.

फिल्म की कहानी राजस्थान के लेखक चरण सिंह पथिक की लघु कहानी पर आधारित है. फिल्म में सान्या मल्होत्रा, सुनील ग्रोवर, राधिका मदान और विजय राज मुख्य भूमिकाओं में हैं. मझे अभिनेता विजय राज ने लड़कियों के पिता की भूमिका निभाई है. फिल्म पटाखा 28 सितंबर को रिलीज होगी.

मंजीत ने 800 मीटर में 1982 के बाद दिलाया पहला स्वर्ण

बेरोजगार और अनजान एथलीट मंजीत सिंह ने ट्रैक पर धूम मचायी तथा एशियाई खेलों की पुरूष 800 मीटर दौड़ में प्रबल दावेदार हमवतन जिनसन जॉनसन को पीछे छोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीता. भारत ने इस स्पर्धा में पहले दो स्थान हासिल किये.

मंजीत को पदक का दावेदार नहीं माना जा रहा था लेकिन उन्होंने अनुभवी जानसन को पीछे छोड़कर एक मिनट 46.15 सेकेंड का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय निकालते हुए अपना पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक जीता. केरल के एशियाई चैंपियनशिप के पदक विजेता जानसन एक मिनट 46.35 सेकेंड का समय लेकर दूसरे स्थान पर रहे.

भारत ने 800 मीटर में आखिरी बार 1982 दिल्ली एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था. तब चार्ल्स बोरोमियो ने यह उपलब्धि हासिल की थी.

यह एशियाई खेलों में केवल दूसरा अवसर है जबकि भारतीय एथलीट 800 मीटर दौड़ में पहले दो स्थानों पर रहे. उनसे पहले नयी दिल्ली में 1951 में पहले एशियाई खेलों में रंजीत सिंह और कुलवंत सिंह ने यह कारनामा किया था.

सेना के अमरीश कुमार से कोचिंग लेने वाले मंजीत ने एक मिनट 46.24 सेकेंड के अपने पिछले सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में सुधार किया जो उन्होंने गुवाहाटी में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में किया था.

कोई भी मंजीत को स्वर्ण पदक का दावेदार नहीं मान रहा था लेकिन उन्होंने कहा कि वह खुद को साबित करने के लिये प्रतिबद्ध थे.

जींद में रहने वाले मंजीत ने कहा, ‘‘मैंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी दौड़ के वीडियो देखे और गलतियों का आकलन किया. मैं अपने प्रदर्शन में सुधार करने के लिये प्रेरित था.’’

यह पहला अवसर नहीं है जबकि मंजीत ने जानसन को पीछे छोड़ा. इससे पहले पुणे में 2013 में भी उन्होंने केरल के एथलीट को हराया था.

मंजीत ने कहा, ‘‘मैं आशान्वित था. मैंने अपने हिसाब से तैयारी की और कभी राष्ट्रीय रिकार्ड तोड़ने के बारे में नहीं सोचा. मैं केवल अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहता था. मेरे पास नौकरी नहीं है लेकिन मेरा कोच सेना से जुड़ा है.’’

मंजीत ने कहा कि वह पिछले डेढ़ साल से ऊटी में अभ्यास कर रहे थे और एशियाई खेलों से पहले तीन महीने भूटान में भी अभ्यास किया.

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने अच्छी तैयारी की थी. मेरी रणनीति शुरू में धावकों का अनुसरण करना और फिर अंतिम 100-150 मीटर में तेजी दिखाना था. मैंने ऐसा किया और मैं अपने देश के लिये स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहा.’’

मध्यपूर्व के कई देशों ने अफ्रीकी एथलीटों को अपनी टीमों से जोड़ा है लेकिन मंजीत ने कहा कि वह उन्हें पीछे छोड़ने के प्रति प्रतिबद्ध थे.

उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय एथलीट अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. तेजिंदरपाल सिंह तूर और नीरज चोपड़ा ने स्वर्ण पदक जीते जिससे मुझे प्रेरणा मिली. यहां तक कि जिन्होंने रजत पदक जीते उन्होंने राष्ट्रीय रिकार्ड बनाये.’’

जानसन ने कहा कि मंजीत का प्रदर्शन बेजोड़ था और वह जीत का हकदार था.

उन्होंने कहा, ‘‘उसने वास्तव में शानदार दौड़ लगायी और इसलिए वह पहले स्थान पर रहा. उसका प्रदर्शन बेजोड़ था.’’

कतर के अब्दुल्ला अबुबाकर एक मिनट 46.38 सेकेंड के साथ तीसरे स्थान पर रहे.

जोसन थाम की हुई सगाई

टीवी कलाकार और आनंद एल राय निर्मित तथा मुदस्सर अजीज निर्देशित फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ में चांग का किरदार निभा चुके अभिनेता जोसन थाम ने फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ के प्रदर्शन से दो दिन पहले यानी कि 22 अगस्त को मुंबई में अपनी प्रेमिका व टीवी कलाकार दीक्षा कंवल के साथ सगाई कर ली थी.

सगाई का यह समारोह बहुत ही चुपचाप पारिवारिक सदस्यों की मौजूदगी में संपन्न हुआ था. जोसन थाम और दीक्षा कंवल की पहली मुलाकात सीरियल ‘‘एजेंट राघव’’ की शूटिंग के दौरान हुई थी, जिसमें दोनों एक साथ अभिनय कर रहे थे. अब दोनों दावा कर रहे हैं कि सेट पर पहली मुलाकात में ही दोनों ने एक दूसरे को दिल दे बैठ थे. तब से उनकी यह प्रेम कहानी चली आ रही थी.

सगाई की रस्म को निभाते हुए दोनों ने अपने पारिवारिक सदस्यों व कुछ खास मित्रों के सामने एक दूसरे को अति संजीदा चुंबन लेकर अपने रिश्ते पर मुहर लगाई.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें