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विकासशील भारत में औरतों पर जुल्म आखिर कब तक

विकासशील भारत की तरक्की में महिलाओं का योगदान कम नहीं है. वे पुरुषों के बराबर या पुरुषों से अधिक वेतन पा कर उच्च पदों पर आसीन हैं. सवाल यह है कि क्या तरक्की की चोटी पर पहुंच कर महिलाओं की स्थिति में कोई खास बदलाव आया है? क्या महिलाएं पुरुषों की तरह सबल हैं? क्या महिलाएं अपने खिलाफ हो रहे अत्याचारों का खुल कर विरोध कर पा रही हैं? शायद नहीं, या शायद हां. कुछ मामलों में तो महिलाएं खुल कर सामने आ जाती हैं जबकि अधिकतर मामले आज भी चारदीवारी के भीतर दफन हो कर रह जाते हैं क्योंकि वे घरेलू बदनामी के डर से चुप्पी साध लेती हैं. ऐसी महिलाएं या तो जीवनभर तिरस्कार सहती हैं या फिर मौत को गले लगा लेती हैं.

घरेलू हिंसा के बढ़े मामले

महिलाएं कामकाजी हों या घरेलू, हर जिम्मेदारी को वे बखूबी निभा रही हैं. बावजूद इस के, घरेलू हिंसा के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं. मारपिटाई, जबरदस्ती और प्रताड़ना से महिलाओं को अब भी दोचार होना पड़ रहा है. पतिपत्नी के बीच हुई कहासुनी से बात अकसर इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि नौबत मारपिटाई तक आ जाती है. यह बात सिर्फ कम पढ़ेलिखे लोगों में ही नहीं, बल्कि हाईप्रोफाइल लोगों में भी कई बार सामने आ चुकी है. आम महिलाओं से ले कर बौलीवुड की कई अभिनेत्रियों के साथ मारपिटाई की घटनाएं सरेआम हो चुकी हैं.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था इंटरनैशनल

सैंटर फौर रिसर्च औन वुमेन यानी आईसीआरडब्ल्यु से पता चला है कि भारत में 10 में से 6 पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रवृत्ति उन लोगों में ज्यादा देखने को आती है जो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 52 फीसद महिलाओं ने स्वीकारा है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है. इसी तरह 38 फीसद महिलाओं ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़ माने जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकारी है.

भारत में हर एक घंटे में 22 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं. ये वे आंकड़े हैं जो पुलिस द्वारा दर्ज किए जाते हैं. अधिकांश मामले में तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज करती ही नहीं है. दूसरे लोकलाज के कारण ऐसे मामलों को पीडि़ता के परिजनों द्वारा दबा दिया जाता है. ऐसा कोई दिन नहीं बीतता जब देश के तकरीबन हर कोने से महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की खबरें न आती हों.

स्त्रीपुरुष का निरंतर घटता अनुपात आधी आबादी का भयावह सच दर्शा रहा है. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ ने बालिकाओं के बारे में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए हैं. आंकड़ों के अनुसार, हर वर्ष पैदा होने वाली 1.2 करोड़ लड़कियों में से 1 करोड़ अपना पहला जन्मदिन नहीं देख पाती हैं. 4 वर्षों से कम आयु की बालिकाओं की मृत्युदर बालकों से अधिक है. 5 से 9 वर्षों की 53 प्रतिशत बालिकाएं अनपढ़ हैं. 4 वर्षों से कम आयु की बालिकाओं में 4 में से 1 के साथ दुर्व्यवहार होता है. हर 6ठी बालिका की मृत्यु लिंगभेद के कारण होती है.

हाल के दिनों में पूरे देश में महिलाओं पर यौनहिंसा सहित विभिन्न तरह के अत्याचार के मामले काफी हद तक बढ़ गए हैं. महिलाएं दुष्क र्म, घरेलू हिंसा और भ्रूणहत्या की शिकार हैं. महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा उन के आगे बढ़ने की राह में सब से बड़ा रोड़ा है. महिलाओं, नाबालिग लड़कियों तथा छोटीछोटी बच्चियों के साथ रेप की घटनाओं में तेजी से इजाफा हो रहा है.

इस तरह की घटनाएं किसी एक राज्य या शहर की नहीं हैं बल्कि पूरे देश को निगल रही हैं.

सामंती तथा रूढि़वादी ताकतें भी महिलाओं के अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं पर पाबंदी लगाने में पीछे नहीं हैं. कोई आधी आबादी को मोबाइल फोन के इस्तेमाल करने से रोकना चाहता है, किसी को उस के जीन्स पहनने पर आपत्ति है तो कोई महिलाओं को रात को घर से अकेले न निकलने का दिशनिर्देश देता है. इन मामलों में खाप पंचायतें सब से आगे हैं. देश में जहां तकनीक ने आसमान छू लिया है वहां मात्र 28 प्रतिशत महिलाएं ही फोन का इस्तेमाल करती हैं.

लोगों के घरों में काम करने वाली सुनीता के मुताबिक, ‘‘जब भी उस के पति से उस की तूतू मैंमैं होती है तो पति हाथ उठा देता है. बकौल सुनीता, उस का पति लातघूसों से उस का जिस्म तोड़ सा देता है. ऐसे में वह कई दिनों तक बिस्तर से उठ नहीं पाती.’’ इस सच से सिर्फ सुनीता ही दोचार नहीं हो रही, बल्कि

कई महिलाओं को ऐसी स्थिति झेलनी पड़ रही है. घरदफ्तर संभालतेसंभालते शायद महिलाएं खुद को संभालना भूल गई हैं.

कहां रह जाती है कमी

सात फेरे ले कर जन्मजन्मांतर की कसमें खाने वाले पतिपत्नी आखिर क्यों बन जाते हैं एकदूसरे के दुश्मन? क्यों आती है हाथ उठाने की नौबत? दरअसल, भागदौड़भरी जिंदगी में वैवाहिक जोड़ों के पास समय की कमी है. न तो उन के पास अपने लिए फुरसत है और न ही पार्टनर के लिए. नतीजतन, दोनों में चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है. बातबात पर गुस्सा आने लगता है और फिर बात बढ़तेबढ़ते मारपिटाई तक पहुंच जाती है. ऐसे में संबंध दरकने लगते हैं तो रिश्ता कोर्ट की दहलीज पर पहुंच जाता है. जिस का नतीजा होता है तलाक.

परिवार भी जिम्मेदार

परिवार वालों के अकसर ताने भी कपल्स की निजी शांति को भंग कर देते हैं. बातबात पर टोकना, रोकना आजकल हर किसी को नागवार गुजरता है. कपल्स को पाबंदी पसंद नहीं आती, जिस से आपसी झगड़े बढ़ने लगते हैं. पतिपत्नी के रिश्तों में खटास आने लगती है और धीरेधीरे एकदूसरे के प्रति मनमुटाव बढ़ने लगता है.

बात अगर छोटीमोटी हो तो उसे नजरअंदाज करना सीखें. हर किसी का व्यवहार अलग होता है, इस बात को जितनी जल्दी स्वीकार कर लें, बेहतर होगा. लेकिन अगर मामला हद से आगे बढ़ रहा है, मारपिटाई से ले कर गालीगलौच तक हो रही है तो बेहतर होगा कि अपने करीबी लोगों से इस संबंध में बात करें. पति का व्यवहार रोजाना ऐसा है तो आप पुलिस की भी सहायता ले सकती हैं. महिलाओं के लिए काम करने वाली एनजीओ से भी आप मदद मांग सकती हैं. धारा 408-क, भारतीय दंड संहिता 1860 के तहत किसी भी महिला के पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा किसी भी तरह के क्रूर व्यवहार को गंभीर अपराध माना गया है. अगर सभी आरोप सच पाए गए तो ऐसे व्यक्ति पर क्रूरता के आरोप में सजा के साथसाथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है. ऐसा तभी करें जब पानी सिर से ऊपर आ जाए.

तलाक से पहले

कोर्ट का रास्ता आसान है लेकिन इस आसान रास्ते से पहले मुश्किलभरे रास्ते की तरफ चल कर देखिए. क्या पता, मुश्किलभरा रास्ता आप की जिंदगी बदल कर रख दे. झगड़े की शुरुआत कहीं से भी हो, आप अपने दिल को छोटा न करें. उलझी बातों को सुलझाने की कोशिश करें. हो सकता है कि आपसी मनमुटाव की गांठें आसानी से खुल जाएं. अकसर हम अंह में आ कर बातों को सुलझाने की कोशिश नहीं करते, जिस से हमारा कीमती रिश्ता कांच की तरह दरकने लगता है.

छोटीछोटी बातों को सुलझाएं ऐसे

–       कहासुनी होने पर एक पार्टनर चुप हो जाए.

–       ऊंची आवाज में बात न करें.

–       हो सके तो थोड़ी देर के लिए बाहर चले जाएं.

–       परिवार वालों की बातों को नजरअंदाज करें.

–       आपस में कलह न करें.

–       एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं.

–       अकेले बाहर जाएं, एकदूसरे से मन की बातें शेयर करें.

अपराध का बढ़ता ग्राफ

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में देश की अदालतों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 12,27,187 केस ट्रायल के लिए आए. इन में से महज 1,28,240 (करीब 10 फीसदी) मामलों का ही ट्रायल पूरा हो सका. सिर्फ 27,844 मामलों में ही अपराध साबित हो सका और 1,00,396 (यानी करीब 78 फीसदी) मामले खारिज हो गए और आरोपी छूट गए. यानी, अपराध सिद्घ होने की दर महज 22 फीसदी. एनसीआरबी के मुताबिक, 2015 में महिलाओं के खिलाफ कुल 3,27,394 अपराध दर्ज हुए. इन में सब से ज्यादा मामले यानी करीब 38 फीसदी (कुल 1,23,403) पति या परिजनों की ओर से किए गए अत्याचार के थे. यही नहीं, रेप के कुल 34,651 मामले दर्ज हुए, जिन में 33,098 (95.5 फीसदी) में आरोपी परिचित थे. कुल मिला कर तमाम सफलताओं के बाद भी आधी आबादी के लिए हिंसा और असमानता की चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं.

तीस वर्ष बाद पारसी किरदार में शबाना आजमी

29 अगस्त से ‘‘यूट्यूब’’ पर प्रदर्शित निर्देशक अदीब रईस की बीस मिनट की अवधि वाली लघु फिल्म ‘‘आंटी जी’’ में शबाना आजमी पारसी किरदार में नजर आ रही हैं. पारसी किरदार में पूरे तीन दशक बाद उनकी वापसी हुई है. इससे पहले 1988 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘पेस्टनजी’’ में शबाना आजमी ने पारसी महिला का किरदार निभाया था. जबकि पूरे 13 वर्ष बाद उन्होंने किसी लघु फिल्म में अभिनय किया है. इससे पहले गूगल पर प्रसारित लघु फिल्म ‘‘वाटर बौर्ने’’ में उन्होंने अभिनय किया था.

शबाना आजमी का मानना है कि फीचर फिल्मों के समानांतर ही लघु फिल्में भी लोकप्रिय होती रहेंगी. वह कहती हैं-‘‘लघु फिल्म बनाम फीचर फिल्म की बात करना बेमानी है. दोनों समानांतर चलती रहेंगी. लघु फिल्मों में कहानी कहना आसान नहीं होता है. लेकिन दर्शकों को विविधतापूर्ण कहानियां परोसने के लिए लघु फिल्में सर्वाधिक बेहतरीन माध्यम है.’’

फिल्म ‘‘आंटी जी’’ की कहानी एक पारसी महिला के एक दिन की जीवनचर्या की कहानी है. जिसमें शबाना आजमी 60 वर्षीय विधवा पारसी महिला प्रवीणा की भूमिका में नजर आ रही हैं.

लिव इन रिलेशनशिप : नफा भी, नुकसान भी

दिनांक 4 जुलाई, 2016, स्थान हरियाणा का वल्लभगढ़.

मामला लिवइन रिलेशनशिप का, जहां लिवइन में रह रही लड़की प्रैग्नैंट हो गई तो उस ने लड़के पर शादी के लिए दबाव डाला. दबाव में आ कर लड़के ने लड़की से शादी भी कर ली. लेकिन लड़के ने उस के साथ एक और चाल चली, उस ने लड़की को पहले तो गर्भनिरोधक दवा खिला कर उस का गर्भपात करा दिया और फिर खुद फरार हो गया.

27 जून, 2016, स्थान मध्य प्रदेश का मंदसौर इलाका. पहले तो 25 वर्षीय एक लड़की ने लड़के के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहना शुरू किया, फिर जब वह प्रैग्नैंट हो गई तो उस ने अपने प्रेमी की जम कर फजीहत की. उस ने अपने प्रेमी को न सिर्फ सड़क के बीचोंबीच जम कर पीटा बल्कि उस के खिलाफ थाने में रेप केस भी दर्ज करवा दिया. ऐसे एक नहीं कई मामले हैं.

शादी की पुरानी मान्यता को दरकिनार करते हुए फाइनैंशियल जिम्मेदारियों की साझेदारी, जिम्मेदारियों का अकेले बोझ उठाने का झंझट नहीं, अपनी मरजी की जिंदगी, इन्हीं सब आकर्षणों के चलते युवकयुवतियों को लिवइन रिलेशनशिप खासा भा रहा है लेकिन बिना नाम के इस रिश्ते का परिणाम उपरोक्त खबरों में साफसाफ दिखाई दे रहा है. लिवइन रिलेशनशिप को यदि साफ शब्दों में कहें तो इस में बिना विवाह किए लड़का और लड़की एक घर में एकसाथ रहने का निर्णय लेते हैं. इस रिलेशनशिप में एकदूसरे के प्रति विवाह जैसी जिम्मेदारियां नहीं होतीं.

कच्चा रिश्ता है यह

देखने में यह रिलेशनशिप अच्छी और लुभावनी लगती है. जो प्रेमी युवकयुवतियां स्वतंत्र खयाल के होते हैं और आत्मनिर्भर होते हैं, वे इस रिलेशनशिप में अधिक यकीन रखते हैं. उन का मानना है कि जब उन में प्यार है तो उस के लिए विवाह जैसे बंधन की क्या आवश्यकता है. वे साथसाथ रह कर आपसी प्यार व एहसास शेयर करते हैं. सुबह तैयार हो कर अपनेअपने काम पर निकल जाते हैं. ऐसे में युवक या युवती की यह जिम्मेदारी नहीं कि कौन सुबह नाश्ता बनाएगा या ले जाने का लंच तैयार करेगा या कपड़े धोएगा. आपसी सुविधानुसार वे अपनेअपने कार्य अकसर स्वयं करते हैं या नौकरनौकरानी रख लेते हैं या विवाह की स्थिति की भांति लड़की सारे कार्य करती है. फिर भी यदि चाहें तो एकदूसरे की मदद कर सकते हैं. विवाहित जीवन की भांति एकदूसरे का खयाल रखना अनिवार्यता या मजबूरी नहीं होती. इसी कारण एकदूसरे से शिकायत करने का हक भी नहीं रहता कि कौन कब रात को देर से आया या किसी पार्टी में ड्रिंक ज्यादा कर के आया वगैरा.

लिवइन रिलेशनशिप का पीरियड प्यार की गहराई पर निर्भर करता है. इस में विवाह के अतिरिक्त सभी कुछ विवाहित जीवन जैसा रहता है, जैसे साथ में रहना, खाना, सोना, सैक्स, प्यार, लड़ाईझगड़ा आदि लेकिन विवाह जैसा कानूनी बंधन नहीं होता. अलग या आजाद होने के लिए कोर्ट से तलाक लेने की आवश्यकता नहीं रहती. जब तक साथ अच्छा लगता है, खुशी से साथ रहो. जिस दिन यह रिश्ता बोझ लगने लगे, अलग रहने लगो. लिवइन रिलेशनशिप में रह कर युवतियों को जहां विवाह पूर्व सैक्स का आनंद प्राप्त होता है वहीं यदि गर्भावस्था की स्थिति हो जाए तो उसे स्वयं ही भुगतना पड़ता है. यदि आपसी प्रेम इस हद तक गहरा है कि युवक अपने होने वाले बच्चे की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो तो यह रिलेशनशिप शादी में तबदील हो जाती है. हालांकि कुछ समय पूर्व कोर्ट ने इस रिलेशनशिप में भी विवाह जैसी जिम्मेदारियों की बात की है तथा पुरुष को अनेक आवश्यक जिम्मेदारी उठाने पर जोर दिया है.

स्वतंत्र युवकयुवतियां लिवइन रिलेशनशिप में रह कर एकदूसरे को भलीभांति समझ पाते हैं, ऐसा वे दावा करते हैं. यदि उन्हें लगता है कि वे एकदूसरे की आदतें पसंद करने लगे हैं और विवाह के बाद उन्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी तो वे इसे विवाहबंधन में परिवर्तित करने का निर्णय लेते हैं. लेकिन यदि कुछ समय साथ रह कर बातबात पर तूतू मैंमैं की नौबत आ जाए तो उन्हें महसूस होने लगता है कि उन का रिश्ता सफल नहीं होगा और वे अलगअलग रास्ते पर चले जाते हैं.

भावी रिश्तों पर असर

लिवइन वर्तमान रिश्तों के अलावा भावी रिश्तों यानी वैवाहिक रिश्तों पर भी अपना खासा असर डालता है. एक शोध के अनुसार, वे महिलाएं जो विवाह से पूर्व लिवइन में थीं उन में से केवल 60 प्रतिशत महिलाओं ने ही विवाह के बाद अपने लाइफपार्टनर के साथ वफादारी निभाई जबकि वे महिलाएं जो विवाह पूर्व लिवइन में नहीं थीं उन में से 90 प्रतिशत महिलाएं अपने बैटरहाफ के प्रति वफादार रहीं. अगर बेवफाई के मामले में पुरुषों की बात की जाए तो वे महिलाओं से एक कदम और आगे निकले. जहां 90 प्रतिशत विवाहित पुरुष अपनी पत्नी के प्रति वफादार रहे वहीं लिवइन में रहे केवल 43 प्रतिशत पुरुषों ने अपनी पत्नी के प्रति वफादारी निभाई. यह साबित करता है कि महिला या पुरुष जो भी विवाह पूर्व शारीरिक संबंधों में लिप्त रहता है उस के विवाह के बाद भी अतिरिक्त वैवाहिक संबंधों में होने की संभावना अधिक रहती है. इसलिए अगर आप विवाह के बाद अपने संबंधों को लंबे समय तक निभाना चाहते हैं तो लिवइन के झमेले में न पड़ना ही आप के लिए समझदारी होगी.

वैसे भी अगर देखा जाए तो समाज कितना ही प्रगतिवादी क्यों न हो जाए, इस के मापदंड महिलाओं तथा पुरुषों के लिए हमेशा अलग रहे हैं. महिलाओं को ऐसी रिलेशनशिप स्वीकार करने के पहले गहराई से सोचविचार कर निर्णय लेना चाहिए वरना उन का भविष्य कुछ नहीं रह जाता. कहींकहीं तो वे तनावग्रस्त हो कर आत्महत्या तक की स्थिति में पहुंच जाती हैं. यदि कोई महिला लिवइन रिलेशनशिप को स्वीकार करती है तो उसे सोच कर निर्णय लेना चाहिए कि कहीं वह प्रेमी पुरुष की बदनीयती का शिकार तो नहीं हो रही या कहीं वह अपने प्रेमी के प्रैशर में आ कर इस रिलेशनशिप का निर्णय तो नहीं ले रही. कहीं प्रेमी पूर्व विवाहित तो नहीं जो लिवइन रिलेशनशिप का निर्णय करा कर लड़की की जिंदगी से खिलवाड़ करे

बड़े धोखे हैं इस राह में

किसी भी महिला को लिवइन रिलेशनशिप स्वीकार करते समय इन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए :

–       कहीं वह फिल्मी सितारों की चमकदमक और लिवइन रिलेशनशिप से प्रभावित हो कर तो ऐसा कदम नहीं उठा रही? फिल्मी कलाकारों की जिंदगी और सामान्यजन की जिंदगी में फर्क होता है. वहां संबंध बनतेबिगड़ते रहते हैं. एक कलाकार के एक के बाद दूसरेतीसरे कितने भी संबंध बन सकते हैं जबकि सामान्य जीवन में एक महिला का एक लिवइन रिलेशनशिप बनने के बाद दूसरा संबंध बनना बहुत मुश्किल होता है.

–       यह आवश्यक नहीं कि महिला लिवइन रिलेशनशिप के आरंभ से ही शारीरिक व सैक्स संबंध बनाए. उसे अपने साथी प्रेमी के प्रेम की गहराई जान कर ही ऐसे संबंध बनाने चाहिए.

–       लिवइन रिलेशनशिप स्वीकार करने के पूर्व महिला को स्वयं सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि क्या उस का पुरुषमित्र इतना भरोसेमंद है? कहीं वह पहले से शादीशुदा तो नहीं? यदि हां तो क्या इस बारे में उस ने स्वयं आप को बताया है? कहीं वह आप से अपने बारे में झूठ तो नहीं बोल रहा?

उस की आर्थिक स्थिति, नौकरी, परिवार, बैकग्राउंड आदि जो भी उस ने बताया है, क्या वह सही है? ऐसी अनेक घटनाएं पढ़ने व सुनने को मिलती हैं कि पुरुष ने अपना नाम, धर्म, आर्थिक स्थिति सबकुछ गलत बताया या इंटरनैट पर दोस्ती कर के रिश्ता बढ़ा लिया. यहां तक कि सैक्स संबंध भी बना लिया. फिर कुछ समय बाद वह छोड़ कर चला गया या असलियत खुलती देख आप से अलग हो गया. इन सभी स्थितियों में महिला ही परेशानी में फंसती है.

–       लिवइन रिलेशनशिप में जाने के पहले आप स्वयं से यह पूछें कि क्या आप अपने प्रेमी के दबाव में आ कर ऐसा तो नहीं कर रहीं. कहीं आप का दोस्त या प्रेमी आप को परिवार के खिलाफ भड़का कर आप को लिवइन रिलेशनशिप के लिए उकसा तो नहीं रहा, जबकि आप मानसिक रूप से इस के लिए तैयार नहीं.

–       ऐसा भी संभव है कि आप का मित्र आप के इस रिलेशनशिप को न मानने की स्थिति में छोड़ जाने की धमकी दे रहा हो और आप उसे खोने के डर से सैक्स संबंध बनाने और लिवइन रिलेशनशिप के लिए राजी हो रही हों? यदि आप के मित्र या प्रेमी का प्यार इतना खोखला है तो सतर्क हो जाएं. जो व्यक्ति आप को ब्लैकमेल कर के आप से सैक्स संबंध बना रहा है, वह जरूर आप को एक दिन अचानक छोड़ जाएगा. सच्चा प्यार ऐसी धमकी या प्रैशर की नीति नहीं अपना सकता. अब यह आप पर निर्भर है कि आप उस की धमकी के आगे कितना झुकती हैं.

–       अपनी गर्भावस्था के प्रति अत्यंत सचेत रहें. हमारे समाज में बिन ब्याही मां को आज भी स्वीकार नहीं किया जाता. संभव हो तो गर्भाधान के लिए तभी सोचें जब आप दोनों विवाह करने की स्थिति में हों और आप को भरोसा हो कि आप का मित्र आप के बच्चे को अपनाएगा और अपना नाम देगा.

शुद्ध देशी इंडिया की रोमांटिक सोच

इस विषय पर कई फिल्में भी बन चुकी हैं. हाल ही में ‘लव के फंडे’ और ‘शुद्ध देशी रोमांस’ फिल्में इसी कड़ी में शामिल हैं. ‘लव के फंडे’ से पहले यशराज प्रोडक्शंस ने मैक्स मीडिया के साथ मिल कर एक सर्वे कराया था जिस में 68 प्रतिशत युवाओं का मानना था कि लिवइन प्यार नहीं वासना है. 72 फीसदी लोगों ने माना कि इस का अंत ब्रेकअप होता है. 52 प्रतिशत युवाओं ने लिवइन में रहने की इच्छा जताई. 36 प्रतिशत महिलाओं ने इसे ठीक माना. 80 प्रतिशत अभिभावकों ने माना कि लिवइन में रहने वाले लड़केलड़कियों का चरित्र खराब होता है वहीं 89 प्रतिशत अभिभावकों ने माना कि विवाह से पूर्व सैक्स स्वीकार्य नहीं. जबकि 51 प्रतिशत युवाओं ने इसे गलत करार दिया.

कैफे में रंगरलियां : हम-तुम साइबर कैफे में बंद हों और…

एक लड़की और एक लड़का साइबर कैफे के काउंटर पर पहुंचते हैं. लड़के की उम्र 18 से 20 साल के बीच की होगी. लड़की ने दुपट्टे से अपना चेहरा ढक रखा है. लड़का भी कैप और बड़ा सा काला चश्मा लगाए हुए है. काउंटर पर बैठा शख्स उन्हें देख मुस्कुराता है और पूछता है- कितने घंटे? लड़का कहता है- ‘एक घंटा. उसके बाद लड़का अपने पौकेट से 100 रूपए का नोट उसे थमाता है. जोड़ा छोटे से कमरे में दाखिल हो जाता है और अंदर से किवाड़ बंद हो जाता है. काउंटर पर बैठा आदमी जोड़े से न तो पहचान पत्र मांगता है और न ही रजिस्टर में उनका नाम और पता दर्ज करता है, जबकि आईटी एक्ट के तहत यह जरूरी है. हर कैफे के नोटिस बोर्ड पर तो पहचान पत्र का फोटो कौपी जमा करने, पोर्न साइट नहीं देखने और न डाउनलोड करने की हिदायत तक लिखी रहती है, लेकिन उस पर शायद ही अमल किया जाता हो.

बिहार की राजधनी पटना समेत कई शहरों में ज्यादातर साइबर कैफे में सेक्स का खेल धड़ल्ले से चल रहा है. अगस्त में एक लड़की के साथ हुए गैंग रेप के मामले में साइबर कैफे को चलाने वाले अनिल कुमार की गिरफ्तारी हो चुकी है. एक्जीविशन रोड, कंकड़बाग, अशोक राजपथ, महेंद्रू, राजेंद्र नगर, राजा बाजार के करीब 15 साइबर कैफे का मुआयना करने के बाद साफ हो गया कि कैफे को चलाने वाले रुपयों की लालच में साइबर कैफे के बंद केबिनों में रंगरलियां मनाने की खुली छूट दे रहे हैं. आम तौर पर साइबर कैफे में एक घंटे की फीस 20 रूपये होती है, लेकिन युवा जोड़े एक घंटे के लिए केबिन में बंद होने का 100 रूपये तक दे देते हैं. पटना में तो पुलिस की कड़ाई की वजह से ज्यादातर कैफे वालों ने केबिनों से दरवाजा और परदा तो हटा दिया है पर बाकी शहरों में ऐसा नहीं हो सका है.

पुलिस भले ही कानून की धौंस जमा कर प्रेम के दीवानों को परेशान करने पर तुली हुई हो लेकिन प्रेमियों की नजर से देखा जाए तो युवा जोड़े साइबर कैफे के बंद केबिनों में प्यार और सकून के 2 पल ढूंढने आते हैं. पटना कौलेज में पढ़ने वाले एक प्रेमी जोड़े का दर्द है कि बड़े शहरों में तो प्रेमी जोड़े पार्कों, मेट्रो, मल्टीप्लेक्सों, सुपर मार्केट आदि में प्रेम की पींगे पढ़ते रहते हैं और 2-3 घंटा साथ गुजार लेते हैं. पटना जैसे छोटे शहर में इस तरह की जगहों की सुविधा नहीं है. छोटा शहर होने की वजह से किसी न किसी गली, सड़क, मार्केट आदि में युवा जोड़ों के पहचान वाले या रिश्तेदार घूमते मिल जाते हैं. इस डर से प्रेमी बेखौफ होकर साथ समय नहीं गुजार पाते हैं.

कुछ युवकों और युवतियों से जब यह पूछा गया कि पुलिस की रोक के बाद भी वे क्यों साइबर कैफे के केबिनों में बैठते हैं और उसमें आप लोग क्या करते हैं? एनआईटी बिहार का एक स्टूडेंट तैश में कहता है कि लड़का और लड़की साइबर कैफे में जाते हैं तो पुलिस को इससे एतराज क्यों है? यह जरूरी है कि साइबर कैफे में साथ जाने वाला हर युवा जोड़ा प्रेम की पींगे पढ़ने के लिए ही जाता है. कई युवाओं के घर पर कंप्यूटर और इंटरनेट सुविधा नहीं है तो वह किसी इम्तिहान का नतीजा देखने, नौकरियों के बारे में पता करने या पढ़ाई से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी हासिल करने के लिए साइबर कैफे जाते हैं, पर पुलिस छापामारी के दौरान कैफे में मौजूद हर लड़का और लड़की को एक ही डंडे से हांकने लगती है.

पटना के सिटी एसपी चंदन कुशवाहा कहते हैं कि आईटी एक्ट (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000) के तहत साइबर कैफे में सेक्स करने, सेक्स वीडियो या अपत्तिजनक सामग्री डाउनलोड या अपलोड करने पर कानूनी कारवाई की जाती है. इस एक्ट की धारा 78 के तहत इंस्पेक्टर लेवल के अफसर को जांच का अधिकार मिला हुआ है. धारा 80 के तहत आईटी एक्ट का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ पुलिस को बगैर वारंट के किसी को गिरफ्तार करने या छापा मारने का अधिकार मिला हुआ है. आईटी मामलों के जानकार मयंक बताते हैं कि आईटी एक्ट की धाराएं इतनी लचीली और बड़ी हैं कि पुलिस किसी भी साइबर मामले को अपराध बता कर उसके खिलाफ कारवाई कर सकती है.

मगध महिला कौलेज की बीए सेकंड ईयर की एक स्टूडेंट पुलिस के इस रवैये पर तैश में कहती है कि पुलिस बड़े और खतरनाक अपराधियों को तो पकड़ नहीं पाती है, जिसका भड़ास वह साइबर कैफे या पार्कों में युवा जोड़ों पर निकालती है. अपराधियों को पकड़ने में अकसर फेल रहने वाली पुलिस साथ घूम रहे या पार्कों या कैफे में बैठे युवा जोड़ों के साथ अपराधियों से भी बदतर सलूक करती है. यह क्या गैर कानूनी नहीं है? एडल्ट लड़का और लड़की अगर एक साथ घूम रहे हैं तो पुलिस को क्या परेशानी है? किसी पब्लिक प्लेस पर बैठ कर किसी तरह का भोंडा या भड़काऊ प्रदर्शन गैरकानूनी है. साइबर कैफे के केबिन में अगर युवा जोड़ा प्रेम के गीत गा रहा हो तो पता नहीं पुलिस को क्या परेशानी होने लगती है?

साइबर कैफे के केबिन में बैठना किसी भी नजर से गैरकानूनी नहीं है. आईटी कानून के तहत कैफे में बैठने वाले हरेक लोग से उनके पहचान पत्र की फोटो कौपी रिकार्ड में रखना जरूरी है. अमूमन कैफे चलाने वाले लोगों से न उनके पहचान पत्र की फोटो कौपी लेते हैं और न ही उनका नाम और पता रजिस्टर में लिखा करते हैं. रिटायर पुलिस अपफसर एके सिंह कहते हैं कि साइबर कैफे में आए हर आदमी से उसका पहचान पत्र लेना संचालक का काम है, अगर किसी का पहचान पत्र नहीं लिया गया है तो इसके लिए संचालक जिम्मेवार है न कि कस्टमर. पैसों के लालच में संचालक पहचान पत्रा नहीं लेते हैं.

पुलिस अफसरों का कहना है कि किसी भी कैफे से अपराधी किसी को जान से मारने की धमकी, रंगदारी वसूली और किसी भी तरह के अपराध से जुड़ा ई-मेल कर सकते हैं. पहचान पत्र की कौपी और उनके आने एवं जाने का समय रिकार्ड में नहीं रखने पर कैफे संचालक ही फंस सकते हैं. सभी तरह का रिकार्ड रखने पर कैफे संचालक तो कानून के फंदे में फंसने से बचेंगे ही साथ ही पुलिस को भी मुजरिम तक पहुंचने में आसानी होती है.

पुलिस ने तो सभी साइबर कैफे संचालकों को केबिन और परदा हटाने का आदेश दिया है, इसके बाद भी केबिन के अंदर और परदों के पीछे इश्कबाजी का खेल बेधड़क चल रहा है. एक साइबर कैफे के स्टाफ ने बताया कि पुलिस साइबर कैफों को नियम कायदों पर अमल करने की घुट्टी तो पिलाती है लेकिन करकरे नोट की चमक के आगे खुद ही कानून को भूल जाती है. हर कैफे वाले को हर महीने ‘चढ़ावा’ चढ़ाने के लिए मजबूर किया जाता है और इसके लिए इलाके के हिसाब से ‘चढ़ावा’ भी फिक्स कर रखा है.

संविधान ना होता तो इस देश में केवल पंडितों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती

अगर संविधान न बना होता तो इस देश में केवल पंडितों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती. 1946-47 की संविधान सभा की बहस की रिपोर्ट पढ़ें तो यह साफ दिखता है कि कांग्रेस के भी ज्यादा जोर से बोलने वाले सदस्य किसी न किसी तरह पौराणिक राज को लाने की कोशिश कर रहे थे पर जवाहर लाल नेहरू, भीमराव अंबेडकर व अन्य कई सुधारकों के कारण जो संविधान बना उस नेअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मूल मंत्र बना दिया. आज फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है.

पुणे पुलिस द्वारा 5-7 वामपंथी विचारकों की गिरफ्तारी तो केवल एक नमूना भर है. यह तो हर कदम पर हो रहा है. स्वामी अग्निवेश की रक्षा उन के अपने भगवा वस्त्र भी नहीं कर पाए और सरकार की कृपा से उन पर हमला करवा दिया गया. भगवाई ट्रौलरों ने यह सिद्ध कर रखा है कि स्वतंत्रता पर एकाधिकार केवल उन का है. वे जितनी मर्जी गालियां दें, कोई कुछ नहीं कहेगा, दूसरे खरीखरी बात से जवाब देंगे तो पुलिस खटखटाने पहुंच जाएगी. देश भर में सैकड़ों के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं क्योंकि उन्होंने सरकार या सरकार की मानसिकता के खिलाफ कुछ बोला या लिखा है.

इस के प्रत्युत्तर में उन हजारों को छोड़ा जा चुका है जिन्होंने केवल धमकियां नहीं दीं अपितु खुलेआम मारपीट की और कुछ मामलों में तो हत्याएं तक कर डालीं. भगवा सोच के आरोपियों पर कमजोर मामले बनाए जाते हैं ताकि 3-4 दिन बाद उन्हें जमानत मिल जाए. जहां जेल से निकलते ही उन का फूलों से स्वागत होता है, उधर दूसरी तरफ अपने विचारों को अभिव्यक्त करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वालों को जेलों में आम कैदियों के साथ सड़ने पर मजबूर किया जा रहा है. यह गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट उदार हैं और लोकतंत्र को बचाने में लगी है. सब से नीचे के पायदान पर बैठे मजिस्ट्रेट मशीनी ढंग से सरकार के मंशे पूरे करने के लिए लाए गए आरोपी को जेल भेज देते हैं. मजिस्ट्रेट अपने विवेक का इस्तेमाल करते नजर नहीं आते. वे सोचते हैं कि विचारक और जेबकतरे में शायद कोई अंतर ही नहीं.

अगर पुलिस गिरफ्तार करने के लिए वारंट पर हस्ताक्षर करा के आई हो तो यह भी संभव है कि जजों ने ब्लैंक हस्ताक्षर किए वारंट पुलिस वालों को दे रखे हों. जिन पर अभियुक्त का नाम लिख कर पकड़ने की छूट पुलिस को हो. 2-4 दिन जेल में बंद रखना तो आम होने लगा है. अगर संविधान न होता तो देश पाकिस्तान, इरान, इराक और उत्तरी कोरिया बन गया होता. अगर कांग्रेस के कुछ नेता अपने व्यक्तित्व की साख दांव पर न लगाते तो शायद भारत सैकड़ों राजाओं में बंट चुका होता. जहां शास्त्रों की चलती, नए सोचविचार की नहीं.

विकास का अहम पड़ाव है प्री टीन एज

पेरेंट्स के लिए  बच्चे जितने मर्जी बड़े हो जाएं, बच्चे ही रहते हैं. लेकिन अगर परवरिश  की बात की जाए तो माता पिता को विकास के हर दौर में उनके साथ अलग अलग तरह से व्यवहार करना चाहिए. जब भी हम विकास के दौर की बात करते हैं तो बचपन, किशोरवस्था, युवावस्था व प्रौढ़ावस्था की बात  करते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि बचपन और टीन एज के बीच एक महत्वपूर्ण अवस्था होती है जिसे प्री टीन एज कहा जाता है.

यह वह पड़ाव होता है जब वे बचपन से टीन एज  की ओर बढ़ रहे होते हैं. अगर उम्र की बात की जाए तो 9 से 12 वर्ष के बीच के समय को प्री टीन एज कहा जाता है. इस उम्र से पहले तक हर पेरेंट्स को लगता है कितने अच्छे थे वे दिन जब बच्चे हमारी हर बात आसानी से मान लेते थे जहाँ बैठने को कहा  बैठ गए, जो खाने को दिया, खा लिया, जब सुलाया, सो गए.

लेकिन अब न जाने उन्हें क्या हो गया है वे हमारी कोई बात सुनते ही नहीं, हर बात पर बहस करते हैं, कुछ भी कहो तो हजारों सवाल पूछते हैं इसलिए हमने तो उन्हें कुछ कहना ही छोड़ दिया है. कई बार तो इन प्री टीन बच्चो के बदलते व्यवहार को ले कर पति पत्नी में भी महाभारत तक हो जाती है. दोनों एक दुसरे पर इल्जाम लगाते देखे जाते हैं “तुमने ही इसे सर पर चढाया था अब तुम ही भुगतो इसे”.

प्री टीन एज बच्चे के विकास का अत्यंत महत्वपूर्ण  दौर होता है जहाँ उनमें अनेक तरह के बदलाव आते है. अधिकांश पेरेंट्स बच्चों के इस बदले व्यवहार को कम्युनिकेशन गैप या जनरेशन गैप का नाम देते हैं लेकिन वे नहीं जानते कि उनकी बच्चों की परवरिश को लेकर बने पैरामीटर्स ही गलत हैं वे नहीं समझते कि हर बच्चा दुसरे से बिलकुल अलग है.

वे अपने बच्चे के विकास की तुलना पड़ोस के बच्चे से करते है “देख उसे अपने जूते के लेसेज बांधने आते हैं तुझे नहीं आते तू सबसे पीछे ही रहना, ”उसे देख वह सुबह कितनी जल्दी उठ कर सारे काम कर लेता है और एक तू है कि तुझे दस बार उठाना पड़ता है”.

इसके अतिरिक्त आज के पेरेंट्स के साथ एक अन्य समस्या यह भी है कि वे अत्यंत महत्वाकांक्षी हो गए हैं. जहाँ  पहले के पेरेंट्स के लिए बच्चो का स्कूल जाना और पढ़ना ही काफी था वहीं आज के पेरेंट्स नंबर गेम के पीछे भाग रहे है. उनका बच्चा अगर 90 % अंक भी ले आया तो उसे कहते हैं “देख उसके 98% आये हैं तेरा कुछ नहीं हो सकता, उसे देख उसका कैट का एग्जाम क्लियर हो गया, तेरे बस का कुछ नहीं है”.

लेकिन शायद वे नहीं जानते कि कि जिस पढाई पर वे सबसे ज्यादा  जोर देते हैं वह बच्चे को सिर्फ पहली नौकरी दिलाती है उसके बाद की जिन्दगी की वे बच्चों को कोई ट्रेनिंग नहीं देते. उसके बाद का क्या? क्या आपने कभी सोचा कि क्यों आज एक युवा कहीं टिक कर नौकरी नहीं कर पाता क्यों वह जॉब होपिंग करता रहता है क्योंकि आपने एक पेरेंट्स होने के नाते उसे धैर्य, सामजस्य, सहयोग जैसी लाइफ स्किल्स नहीं सिखाई. इन स्किल्स की कमी  के चलते ये बच्चे आगे चलकर दोस्तों के साथ, ऑफिस में कलीग्स के साथ कैसे डील करना हैं सीख नहीं पाते.

पेरेंट्स की भूमिका

बच्चों की परवरिश करते समय ज्यादातर पेरेंट्स यही कहते सुने जाते है ‘अरे हमारे टाइम में तो ऐसा होता था हम तो ऐसे नहीं थे, ये आज कल के बच्चे हैं, जमाना ही खराब है और न जाने क्या क्या. अरे भाई एक साधारण सी बात है. क्या आप उल्टा चल सकते हैं? नहीं न? तो फिर आप बच्चो की परवरिश करते समय पीछे यानी अपने समय को क्यों देखते हैं? आप बदलते समय के साथ चलिए तभी आप अपने बच्चे की बेहतर परवरिश कर सकते हैं.

बच्चों के रोल मॉडल बनें

बच्चा लाइफ में सबसे ज्यादा पेरेंट्स को देखकर सीखता है. इसका बेहतरीन उदाहरण आप इस तरह से समझ सकते हैं कि क्या आपको किसी ने समझाया या सिखाया था की आपको घर चलाने के लिए नौकरी करनी है, या घर के काम करने हैं, आपने अपने पेरेंट्स को ऐसा करते देखा और आप सीख गए.

बच्चा वही बनता है, वही करता है जो वह आपको करते हुए देखता है आप बच्चे  को तो कहते हैं कि गेजेट्स का ज्यादा यूज करना खराब आदत है लेकिन वह आपको हमेशा फेसबुक वाट्सएप्प पर बिजी देखता है. तो फिर आप ही बताइए आप उसे किस तरह गेजेट्स का ज्यादा प्रयोग करने से रोक सकते हैं.

आप शिकायत करते हैं आपकी बात नहीं मानता लेकिन क्या आपने कभी सोचा है वह ऐसा क्यों करता है. दरअसल, जब वह आपसे कुछ कहना चाहता है आप अपने फोन में बिजी रहते हैं उसकी बात का जवाब उसकी आँखों में आखें डाल कर नहीं देते बल्कि आप का पूरा ध्यान अपने फोन पर लगा रहता है और आप बस हूँ हाँ करके “सुन रही हूँ न, बोलो” कह कर उसकी बात जवाब देते है.

ध्यान कीजिये जब आप अपने पति से कोई जरूरी बात करना चाहती हैं और वह टीवी या फोन में बिजी रहते हैं तो आपको कितना गुस्सा आता है और आप कहती हैं मेरी बात ध्यान से सुनो. ऐसा ही कुछ बच्चा भी महसूस करता है लेकिन चूंकि वह बच्चा है इसलिए वह कुछ कर नहीं पाता और यही वजह है कि आपके साथ उसका जुड़ाव नहीं हो पता और आपके कही बातों को उतना महत्व नहीं देता और आपको लगता है बच्चा अब आपकी सुनता नहीं उसने आपकी बात माननी छोड़ दी है.  हर माता पिता चाहता है कि उनके बच्चे के साथ उनका रिश्ता अच्छा हो लेकिन बच्चे के साथ अच्छा रिश्ता एक दिन में नहीं बनता उसके लिए लगातार कोशिश करनी पड़ती है.

बच्चो के साथ जुड़ाव बनाने के लिए उससे बातचीत कीजिये. बातचीत का अर्थ ये कुछ रटे रटाये वाक्य नहीं है “ खाना खा लिया, होम वर्क हो गया, जल्दी सो जाओ, एग्जाम्स की तैयारी है?” आदि. आपको उसके साथ बात करते समय उसकी हर बात को ध्यान से सुनना होगा वह बात भी समझनी होगा जो वह कहना चाहता है पर कह नहीं पा रहा है.

आप को उसके हर छोटे बड़े काम की तारीफ करनी होगी. तारीफ का अर्थ ‘गुड, वैरी गुड’ कहना नहीं है. आप उसकी दिल से तारीफ करें. अगर उसका अच्छा परीक्षा परिणाम आया तो उसे ये न कहें कि गुड, आगे से और मेहनत करना बल्कि उससे कहें “ये तुम्हारी मेहनत का फल है तुमने सारे काम समय पर किये सभी नियमों का पालन किया इसलिए तुम सफल हुए”.

स्विच ऑफ टेकनीक सीखें

पेरेंटिंग कंसल्टेंट डॉक्टर शिल्पा गुप्ता का कहना है कि हम सभी अपनी निजी जिन्दगी में अनेक तरह की उलझनों में उलझे रहते हैं, घर में काम का बोझ, काम वाली बाई से झिकझिक ऑफिस में काम का प्रेशर, ऑफिस पॉलिटिक्स, टारगेट अचीव करने का दबाव, रास्ते में मेट्रो की भीड़ इस सब के बीच जब आप घर पहुंचते हैं और बच्चा आपसे कुछ पूछता है तो आप अपनी सारी टेंशन, सारा गुस्सा बेचारे बच्चे पर निकाल देते हैं क्योंकि एक वही है जो आपको सबसे ज्यादा कमजोर दिखता है, ऐसा हरगिज न करें.

आप सोचिये आप भले ही कितने ही गुस्से में क्यों न हों लेकिन क्या आप अपने सीनियर पर अपना गुस्सा निकाल सकते हैं नहीं न तो फिर बेचारे मासूम बच्चे के साथ ऐसी ज्यादती क्यों. खासकर जबकि वह आपका अपना बच्चा है आप हमेशा उसका भला चाहते हैं उसकी खुशी में ही आपकी खुशी होती है. इसलिए पेरेंट्स को जरुरत है कि वे स्विच ऑफ तकनीक सीखें. बच्चे के साथ जब भी रहें सिर्फ बच्चे के साथ रहें अगली पिछली सारी बातों को भूल जाएँ.

स्विच ऑफ के लिए आप कोई अच्छी किताब पढ़ सकते है, अच्छा म्यूजिक सुन सकते हैं, वाक पर जा सकते है. लेकिन अपनी परेशानियों का रिएक्शन अपने बच्चे पर न निकालें. वैसे भी बच्चे जो भी सीखते हैं आप से ही सीखते है आप जिस तरह से अपने स्ट्रेस से डील करते हैं बच्चा भी आपसे वही सीखता है.

एग्जाम के दिनों में जब बच्चा आपको स्ट्रेस में देखता है तो वह भी स्ट्रेस में आ जाता है जिसका असर उसके परीक्षा परिणाम पर पड़ता है. बच्चे सोशल स्किल्स या सामाजिक कौशल अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों से सीखते हैं. आप बच्चे को उसके आसपास होने वाली हर छोटी बड़ी घटना से सोशल स्किल सिखा सकते है. फिर चाहे वह घर में होने वाला गेट टू गेदर हो या खेल खेल में बच्चों की लड़ाई.

बड़ा सवाल : बच्चों को सैक्स शिक्षा आखिर कौन दे

भारत में बच्चों की जनसंख्या विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा सब से अधिक है. बचपन में शादी, किशोरावस्था में गर्भ, यौनशोषण, यौनसंक्रमण इत्यादि के चलते देश के स्कूलों में विद्यार्थियों को यौनशिक्षा भी दिए जाने की मांग गाहेबगाहे उठती रहती है. पेशे से वकील, गौतम रंगनाथन इन्हीं विषयों पर कार्य करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘स्कूलों में व्यापक व विस्तारपूर्ण यौनशिक्षा होनी चाहिए जो बच्चों को सही जानकारी उपलब्ध कराए.’’

क्रिस्प नामक गैरसरकारी संस्था के संस्थापक, कुमार वी जागीरदार बताते हैं, ‘‘बच्चों का शोषण अकसर वही लोग करते हैं जो उन के करीब होते हैं. लड़कियों के साथसाथ लड़कों का भी शोषण होता है. इसलिए दोनों को ही सजग और जागरूक करने की आवश्यकता है. दोनों को सही स्पर्श और गलत स्पर्श के बारे में सचेत करना चाहिए.’’

विशेषज्ञों की राय है कि इंटरनैट में सही फिल्टर न होने के चलते बच्चों तक सही यौन संबंधी जानकारी पहुंच नहीं पाती है, इसलिए उन्हें यौनशिक्षा दी जानी बेहद जरूरी है.

बच्चों के अधिकारों के लिए कार्य कर रही मनोरंजनी गिरीश कहती हैं, ‘‘बच्चे आसानी से मीडिया में प्रचलित खबरों से प्रभावित हो जाते हैं, फिर चाहे वे खबरें असली हों या भ्रामक. इसीलिए औपचारिक यौनशिक्षा द्वारा सही और पूरी जानकारी बच्चों तक पहुंचानी चाहिए.’’

खतरे में बच्चों की यौन सुरक्षा

11 शहरों में किए गए सर्वेक्षण में यह पाया गया कि सर्वेक्षण में शामिल सभी युवाओं में से आधे लोगों को एड्स या एचआईवी से स्वयं को बचाने के उपायों के बारे में संपूर्ण जानकारी नहीं थी.

–       अखिल भारतीय शिक्षा व व्यावसायिक मार्गदर्शन संस्थान की जांच से पता चला कि 42 से 52 प्रतिशत विद्यार्थियों को सैक्स के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है.

–       विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि भारत की 47 प्रतिशत शादियों में दुलहन वयस्क नहीं थीं.

–       यूनिसेफ के अनुसार, भारत में 28.5 प्रतिशत स्त्रियों का पहला बच्चा 18 वर्ष की आयु से पहले होता है.

–       हाल ही में महिलाओं व बच्चों के विकास मंत्रालय ने यूनिसेफ तथा प्रयास (गैरसरकारी संस्था) द्वारा 12,247 बच्चों व 2,324 किशोरों का भारत के 13 राज्यों में इंटरव्यू किया. शोध से अचंभित करने वाले नतीजे सामने आए. शोध से पता चला कि

5 से 12 वर्ष के बीच के 53 प्रतिशत बच्चों का यौनशोषण हो चुका है. और अधिकतर ये शोषण अभिभावक, गार्जियन या परिवार के किसी अपने करीबी व्यक्ति द्वारा किया गया है. साथ ही, यह तथ्य भी सामने आया कि आधे से ज्यादा मामलों में ऐसे अपराध कहीं रिपोर्ट ही नहीं किए जाते हैं.

–       तीसरे राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण ने बताया कि मुंबई, दिल्ली, कोलकाता व चेन्नई में वर्ष 2005-2006 के बीच 36,700 गर्भपात किशोरावस्था में कराए गए. वर्ष 2014-2015 में यही आंकड़ा अकेले मुंबई में 31 हजार तक पहुंच गया.

–       वर्ष 2007 में, महिलाओं व बच्चों के विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु की 1 करोड़ 50 लाख लड़कियों तथा 73 लाख लड़कों का जबरन यौनशोषण किया गया. इस में दोराय नहीं है कि बच्चों की यौन सुरक्षा खतरे में है.

यौन शिक्षा और स्कूल

निजी स्कूलों की अपनी इच्छा है कि वे यौनशिक्षा अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित करते हैं या नहीं. इस की भी कोई जानकारी नहीं है कि देश में कितने निजी स्कूलों में यौनशिक्षा दी जा रही है. जो स्कूल सीबीएसई बोर्ड के अंतर्गत आते हैं उन्हें यौनशिक्षा को अपने पाठ्यक्रम में पढ़ाना आवश्यक है. लेकिन राज्यों के बोर्ड के अंतर्गत जो स्कूल आते हैं उन पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है, इसलिए वहां यौनशिक्षा नहीं दी जाती है.

भारतीय एड्स नियंत्रण संगठन तथा यूनीसेफ के सहयोग से केंद्र सरकार द्वारा किशोर शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी. किंतु कुछ संस्थाओं ने इस कार्यक्रम का विरोध यह कह कर किया कि इस में जो पढ़ाया जा रहा है वह हिंदू संस्कारों के विरुद्ध है. विरोध के कारण 12 राज्यों में इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया जिन में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात शामिल हैं जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं. इस विषय में भाजपा और कांगे्रस के बीच काफी राजनीति भी हुई.

जो इस कार्यक्रम का विरोध करते हैं उन का मत है कि इस से बच्चों में विपत्तिभरा व्यवहार बढ़ जाएगा. किंतु विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोध ‘इफैक्ट्स औफ सैक्स एजुकेशन औन यंग पीपल्स सैक्सुअल बिहेवियर’ के अनुसार, यौनशिक्षा देने से छोटी उम्र में सहवास के प्रति आकर्षण बढ़ता नहीं है, बल्कि इस शिक्षा से यौन गतिविधि कम होती है, देर से होती है और जब होती है तब सुरक्षात्मक ढंग से होती है.

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई की शोध विद्यार्थी केतकी चोखानी कहती हैं, ‘‘?सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच रही है और इस वजह से गैरसरकारी संस्थाएं यौनशिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी निभा रही हैं.’’ लेकिन वे मानती हैं कि इस की प्रथम जिम्मेदारी स्कूलों की है.

अभिभावकों का योगदान

आज भी अभिभावक घर पर बच्चों को सैक्स संबंधी जानकारी देने के बजाय अपने बच्चों को निजी वर्कशौप में भेजना पसंद करते हैं. वर्कशौप के बाहर 9 से 12 वर्षीया लड़कियों के लौटने का इंतजार करती माताओं का मत है कि इस विषय में अपने बच्चों से स्वयं बात करना उन्हें असहज लगता है. इसीलिए वे चाहती हैं कि कोई और उन के बच्चों को यौनशिक्षा प्रदान करे.

मुंबई की एक सैक्स एजुकेटर अंजू किशिनचंदानी बच्चों, किशोरों तथा उन के अभिभावकों के लिए वर्कशौप आयोजित करती रहती हैं. उन का मानना है कि भारत में हम सैक्स से परहेज नहीं करते लेकिन सैक्स संबंधी बातों को करने में हमारी संस्कृति, नैतिकता और सभ्यता नष्ट होती है.

मुंबई के डी वाई पाटिल अंतर्राष्ट्रीय स्कूल के शैक्षिक निदेशक हुसैन बुरहानी का मानना है कि बच्चे बाहर वालों से अधिक खुल कर बातें कर पाते हैं. और इसलिए निजी स्कूल अध्यापकों के बजाय बाहर से किसी विशेषज्ञ को बुलाना पसंद करते हैं.

इसी सोच की पुष्टि करते हुए शलाका सिसोदिया बताती हैं कि बच्चे अपने प्यार के बारे में अपनी अध्यापिकाओं या काउंसलर्स से बात करने में संकोच करते हैं. मासिकधर्म के बारे में बात करने में अब झिझक महसूस नहीं होती लेकिन सैक्स के बारे में अपने मातापिता से बात करने में बच्चे अभी भी झिझकते हैं. शलाका सिसोदिया यौन जागरूकता वर्कशौप चलाती हैं.

दिल्ली में ऐसी ही वर्कशौप चलाने वाले सुशांत कालरा कहते हैं कि पहले उन्होंने मातापिता को सिखाया कि बच्चों से इस विषय में कैसे बात की जाए. लेकिन जब कुछ समय बाद पूछा तो पाया कि 10 प्रतिशत अभिभावकों ने घर में बात नहीं की थी.

दरअसल, बच्चों को सही समय पर उन की शारीरिक रचना तथा लैंगिकता के बारे में सिखाना उन्हें सही और गलत स्पर्श के बारे में सचेत करता है. ऐसी शिक्षा से बच्चे यौनशोषण के प्रति जागरूक होते हैं और उन के साथ वर्तमान में हो रहे शोषण व उस से जुड़े डर या ग्लानि से बच पाते हैं.

लड़कियों के लिए जरूरी यौनशिक्षा

सैंटर फौर डिसीज कंट्रोल के अनुसार, हाल ही के वर्षों में शेमिडिया, गोनोरिया और सिफलिस के मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है. यौनरोग से सब से ज्यादा लड़कियां प्रभावित होती हैं. चार में से एक युवती यौन रोग से प्रभावित है. यौनशिक्षा के अभाव में 13 से 19 साल की लड़कियांयुवतियां ज्यादा प्रभावित हो रही हैं. कुछ आंकड़े पेश हैं :

–       नो द फैक्ट्स के अनुसार, 15 साल पूरे करने तक 13 फीसदी लड़कियां सैक्स का अनुभव करने लगती हैं और 19 की होते तक 68 फीसदी युवतियां पूरी तरह सैक्स करने लगती हैं. इस संख्या को देख कर ही यौनशिक्षा की जरूरत समझी जा सकती है.

–       50 फीसदी से ज्यादा युवतियों, जिन्होंने 3 या इस से अधिक पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं, में यौनरोग पाए गए हैं.

–       इस समय करीब 15 से 24 साल की उम्र के ग्रुप में 51 प्रतिशत युवतियां यौनरोग की शिकार हैं. पुरुषों के मामले में यह प्रतिशत 49 है.

–       सैंटर फौर डिसीज कंट्रोल के अनुसार, 14 से 19 साल के बीच की 15 फीसदी लड़कियों को एक से ज्यादा यौन रोग हैं.

–       रिसर्च के मुताबिक, यौनरोग का इलाज न करने पर महिलाओं में सरवाइकल कैंसर भी हो सकता है.

–       ज्यादातर बच्चों को मालूम ही नहीं होता कि यौनरोग कैसे होता है.

–       10 फीसदी से ज्यादा युवतियों को एक से ज्यादा यौनरोग हैं

राह में रोड़ा कौन

ऐसा नहीं है कि सरकार ने स्कूलों में बच्चों को यौनशिक्षा दिलाने के लिए अपनी तरफ से कोई पहल नहीं की. साल 2005 में भारत सरकार द्वारा एडोलसैंट एजुकेशन प्रोग्राम शुरू किया गया था. लेकिन इस को ले कर काफी विरोध हुआ. विरोध में अध्यापक, बच्चों के मातापिता व नीतिनिर्माता भी शामिल थे. नतीजतन, 2007 में यह प्रोग्राम प्रतिबंधित कर दिया गया. सिर्फ राजस्थान, गुजरात और केरल ने इस के बाद यौनशिक्षा के अलग संस्करण की स्थापना की.

कुछ साल पहले बंगाल में जब सैंट्रल बोर्ड औफ सैकंडरी एजुकेशन यानी सीबीएसई की पहल पर पश्चिम बंगाल उच्च शिक्षा परिषद ने इस मुद्दे पर सैद्धांतिक तौर पर अपनी सहमति दी थी तब कच्ची उम्र में यौनशिक्षा की पढ़ाई से बच्चे पढ़ाई छोड़ कर इसी की ओर आकर्षित होंगे, स्कूल परिसरों में यौनअपराध बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे और यह शिक्षा ग्रेजुएट स्तर पर शुरू की जानी चाहिए जैसे तर्क दे कर इस का विरोध किया गया था.

यौनशिक्षा के खिलाफ अकसर वे ही खड़े हो जाते हैं जिन्हें आगे बढ़ कर यौनशिक्षा को बढ़ावा देने वाली मुहिमों को आगे बढ़ाना चाहिए. अगर अभिभावक, अध्यापक और नीतिनिर्माता ही यौनशिक्षा की मुखालफत करेंगे तो बच्चों को यौन विषयों की सही जानकारी भला किस से और कहां से मिलेगी

पावर बैंक खरीदते समय ध्यान रखें ये 4 बातें

मौजूदा वक्त में फोन के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण फोन की बैटरी जल्दी खत्म हो जाती है. ऐसे में हम लंबे सफर पर ही नहीं औफिस जाते वक्त भी पावर बैंक साथ रखते हैं. हमारे फोन में कुछ ऐसे ऐप भी होते हैं, जिनके इस्तेमाल से बैटरी ज्यादा खर्च होती है. ऐसे में पावर बैंक की आवश्यकता पड़ती ही है. पावर बैंक केवल बैटरी क्षमता, साइज व रंग को देखकर न खरीदें, बल्कि कुछ अन्य चीजें हैं, जिनको ध्यान में रखना जरूरी है.

2.5 गुना ज्यादा क्षमता वाले पावर बैंक

फोन चार्जिंग के लिए पावर बैंक खरीदें, तो इस बात का जरूर ध्यान रखें कि पावर बैंक की क्षमता आपके स्मार्टफोन की बैटरी क्षमता से 2.5 गुना अधिक हो. इससे फोन तेजी से चार्ज होगा. साथ ही पावर बैंक की बैटरी भी लंबे समय तक चलेगी और आप अपने स्मार्टफोन को कई बार चार्ज कर सकते हैं. इसके साथ ही जब भी आप पावर बैंक लें, तो उसमें कितने एमएएच की बैटरी है.

यूएसबी चार्जिंग

इसके अलावा पावर बैंक के यूएसबी चार्जिंग पर भी नजर रखें. पावरबैंक खरीदते समय बैटरी की क्षमता के साथ-साथ उसकी यूएसबी चार्जिंग को भी जांच-परख कर लें, क्योंकि बाजार में मौजूद पुराने पावर बैंक केवल अपने यूएसबी केबल के साथ ही काम करते हैं. ऐसे में आपको पावर बैंक से अपने एंड्रायड फोन को चार्ज करने में काफी परेशानी होगी. ऐसे पावर बैंक आपके फोन के लिए किसी काम के नहीं होंगे.

आउटपुट वोल्टेज

पावर बैंक का इस्तेमाल करें, तो पावर बैंक के आउटपुट वोल्टेज का जरूर ध्यान रखें. यदि आपका पावर बैंक का आउटपुट वोल्टेज आपके फोन के आउटपुट वोल्टेज के बराबर नहीं है, तो फोन चार्ज नहीं होगा. ऐसे में इस बात का ध्यान रखें कि पावर बैंक का आउटपुट वोल्टेज हमेशा आपके फोन चार्जर के आउटपुट वोल्टेज के बराबर होना चाहिए. आउटपुट वोल्टेज के बराबर न होने पर आप अपने फोन के चार्जर से पावर बैंक को चार्ज भी नहीं कर पाएंगे.

डिवाइस की संख्या के आधार पर ले पावर बैंक

आजकल अधिकांश कामकाजी लोगों के पास एक से अधिक स्मार्टफोन मौजूद हैं. चार्जिंग की समस्या होने से दोनों फोन बंद न हो. इसके लिए ज्यादा क्षमता वाला पावर बैंक खरीदें. लेकिन अगर आपके पास एक ही डिवाइस है, तो कम क्षमता वाला पावर बैंक भी ले सकते हैं.

नयी पीढ़ी के साथ काम करने में डर लगता है : अमिताभ बच्चन

हिंदी सिनेमा जगत में चार दशक से अधिक समय बिता चुके और सदी के महानायक के रूप में परिचित अभिनेता अमिताभ बच्चन से कोई अपरिचित नहीं. वे हिंदी सिनेमा जगत के सबसे प्रभावशाली अभिनेता माने जाते हैं. सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के तौर पर उन्हें कई बार राष्ट्रीय पुरस्कार, पद्मश्री और पद्मभूषण से भी नवाजा गया है. फिल्मों के अलावा वे गायक, निर्माता और टीवी शो प्रेजेंटर भी हैं. हालांकि उनका शुरुआती दौर बहुत अच्छा नहीं था, लेकिन फिल्म ‘जंजीर’ उनके कैरियर का टर्निंग प्वाइंट था. जिसके बाद से उन्हें पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं मिला. वे आज भी उतने ही दर्शकों में पोपुलर हैं जितने सालों पहले थे. यही वजह है कि आज उन्हें ध्यान में रखकर कहानियां लिखी और बनायीं जाती है. अभी वे कौन बनेगा करोड़पति के दसवें सीजन को फिर से होस्ट कर रहे हैं. पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

ये शो आपको किस तरह से प्रेरित करता है? इस शो ने आपको कितना बदला है?

इस शो से मुझे साधारण लोगों के संघर्ष और जीवन के बारें में जानने का मौका मिलता है, जो मुझे बहुत प्रेरित करता है. ये लोग बहुत ही संघर्षपूर्ण जीवन बिताने के बाद भी खुश रहते हैं और आगे बढ़ते रहते हैं, लेकिन मुझे दुःख तब होता है, जब वे कई बार मेहनत कर मंच तक पहुंचते हैं और अंत में गलत जवाब की वजह से सारे जीते हुए पैसे को हार जाते हैं.

यहां जो भी आते हैं उनसे एक संपर्क जुड़ जाता है. उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है. मेरे लिए ये एक नयी जानकारी होती है. फिल्मों में सारी बातें लिखी हुई होती है, पर यहां सब ओरिजनल होता है जो मुझे बहुत पसंद है.

क्या आपके जीवन में कोई संघर्ष था?

शुरू में बहुत था, लेकिन मैंने ये तय कर लिया था कि मुझे अभिनय की दिशा में ही आगे बढ़ना है. मैंने वैसा ही किया और यहां तक पहुंचा. असल में कोई भी व्यक्ति जब अपनी मंजिल तक पहुंचना चाहता है तो उसे रास्ते में बहुत कठिनाइयां आती है और उससे उसे खुद ही निकलना पड़ता है.

आजकल डिजिटल मीडिया काफी आगे बढ़ चुका है बच्चे भी इसके आदि हो चुके हैं ये उनके लिए कितना सही कितना गलत है?

ये सही है कि आजकल छोटे-छोटे बच्चे भी मोबाइल पर रहते हैं इससे उनकी कम्युनिकेशन स्किल कम होती जा रही है. नयी खोज है जो रहेगी पर माता-पिता को उसका ध्यान रखना चाहिए. घर में भी आजकल कोई एक दूसरे से बात नहीं करता और सब मोबाइल से बातें करते है. आज के यूथ एक साथ कई काम कर सकते है, जो पहले संभव नहीं था.

आपका कई सामाजिक कार्य से जुड़ने की वजह क्या है? आगे और क्या करना चाहते हैं?

मैं कई सामाजिक कार्य से जुड़ा हुआ हूं, क्योंकि इसमें सुधार की जरुरत है. पोलियो में मैंने 8 साल काम किया और अब भारत पोलियो मुक्त हुआ. हेपेटाइटिस बी से मैं जुड़ा हुआ हूं, क्योंकि मैं खुद इसका मरीज हूं. जब मैं फिल्म ‘कुली’ के दौरान दुर्घटना ग्रस्त हुआ तो खून की जरुरत थी, जिसमें 200 लोगों ने खून दिया था जिस दौरान एक व्यक्ति हेपेटाइटिस बी का मरीज था. मुझे ये सालों बाद पता चला कि मुझे हेपेटाइटिस बी है और मैं अभी 25 प्रतिशत लीवर के साथ जी रहा हूं. इसके कैम्पेन के साथ मैं जुड़ा हूं. इसमें मेरा कहना है कि अगर आपको कोई भी बीमारी है तो उसका इलाज सही तरह से सही डाक्टर से करवाएं. इसके आगे किसानो के आत्महत्या को कम करने और सीमा पर रहने वाले शहीद हो चुके सेना के परिवार वालों के लिए भी काम कर रहा हूं.

आप महिलाओं को बहुत सम्मान देते हैं, अपने जीवन में आप किस महिला अभिनेत्री से बहुत प्रेरित रहे?

वहीदा रहमान, मीना कुमारी, नूतन और दक्षिण में सावित्री ये सभी अद्भुत कलाकार हैं. मैंने वहीदा रहमान और नूतन के साथ काम किया है और सपने में भी कभी सोचा नहीं था कि कभी इनके साथ काम करने का मौका मिलेगा. दिलीप कुमार का भी मैं बहुत बड़ा फैन हूं. अभी की नयी पीढ़ी में आलिया भट्ट, दीपिका पादुकोण और अनुष्का शर्मा ये सभी बहुत अच्छा काम करते हैं, उनके साथ काम करने में डर लगता है. मैं सालों साल काम करने के बाद यहां तक पहुंचा हूं और ये तो पहले दिन से ही इतनी प्रतिभावान हैं कि इनका मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है. वे आत्मविश्वास से भरपूर हैं.

आजकल हिंदी भाषा का प्रचार और प्रसार कम होता जा रहा है, नयी जेनरेशन को तो हिंदी ठीक से बोलना ही नहीं आता, ऐसे में क्या हिंदी और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को कोई खतरा महसूस होता है? आपके घर में कौन सी भाषा बोली जाती है?

इस बात से मैं कुछ हद तक सहमत हूं. हमारे सामने जो हिंदी लिखकर आती है वह अंग्रेजी में होती है और मैं उसको पढ़ नहीं पाता और उसे वापस लौटाकर देवनागरी में मंगवाता हूं. मेरे हिसाब से अगर हिंदी का कार्यक्रम है, तो हिंदी में बोलना ही अच्छा होता है. अंग्रेजी आजकल थोड़ी प्रबल हो चुकी है जो चिंता का विषय है. मेरे घर में दोनों ही भाषाएं बोली जाती है, क्योंकि हमारे घर में कुछ लोग उत्तर भारतीय और कुछ दक्षिण भारतीय हैं, इसलिए सभी का ख्याल रखना पड़ता है. साथ ही साथ बंगाल का भी ध्यान रखना पड़ता है.

यमला पगला दीवाना फिर से : समय व पैसे की बर्बादी..

पता नहीं फिल्मकारों को कब समझ में आएगा कि काठ की हांडी बार बार आग पर नहीं चढ़ती. देओल परिवार की 2011 की सफल हास्य फिल्म ‘‘यमला पगला दीवाना’’ का सिक्वल 2013 में ‘यमला पगला दीवाना 2’ के नाम से आया, तब इसे दर्शकों ने पसंद नहीं किया था. मगर पूरे पांच साल बाद उसका एक और सिक्वल ‘‘यमला पगला दीवना फिर से’’ लेकर आए हैं, जिसे देखकर दर्शक यही कहता है- कहां फंसाओ नाथ.

फिल्म की कहानी के केंद्र में अमृतसर के आयुर्वेदिक वैद्य पूरन सिंह (सनी देओल), उनका भाई काला (बौबी देओल) और किराएदार जयंत परमार (धर्मेंद्र) हैं. जयंत परमार पेशे से वकील हैं और साइड ट्रेक वाले स्कूटर पर सवारी करते रहते हैं. उस वक्त पुरानी फिल्मों के गाने बजते हैं.. वैद्य पूरनसिंह चुप रहते हैं, पर जब कोई उन्हें गुस्सा दिला दे, तो वह उसे छोड़ते नहीं हैं. पूरे शहर में पूरनसिंह की काफी इज्जत है, जबकि 40 साल के अविवाहित काला की कोई इज्जत नहीं है. काला तो कनाडा जाने का सपने देखता रहता है. पूरन सिंह के पास पुश्तैनी ‘‘वज्र कवच’’ नामक दवा है, जिसका तोड़ किसी के पास नही है. यह दवा नपुंसकता व पिंपल दूर करने के साथ ही हर बीमारी का इलाज कर देती है. फिल्म में दावा किया गया है कि अकबर को जब वज्र कवच दवा दी गयी, तभी उनकी संतान हुई. बहरहाल, कई मल्टीनेशनल कंपनियां ‘वज्र कवच’ का फार्मूला लेना चाहती हैं. एक दवा कंपनी के मालिक माफतिया (मोहन कपूर) काला की मदद से पूरन सिंह से बात करता है, पर बात नहीं जमती. माफतिया, पूरनसिंह को धमकी देकर चला जाता है.

उसके बाद पूरनसिंह व उनकी दवाओं पर शोध करने के लिए गुजरात से एक डाक्टर चिकू (कृति खरबंदा) आती हैं. चिकू पर काला लट्टू हो जाते हैं. उधर चिकू चोरी से ‘वज्र कवच’ का फार्मूला चुरा कर वापस चली जाती है. वह यह फार्मूला माफतिया को दे देती है. माफतिया उसे अपनी कंपनी के साथ पेटेंट करवाकर पूरनसिंह को कानूनी नोटिस भेज देते हैं. उसके बाद कहानी पंजाब से गुजरात पहुंच जाती है. फिर कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः चिकू अदालत में सच बया कर देती है.

अति कमजोर कहानी व पटकथा के चलते फिल्म हंसाने की बजाय बोझिल बनाती है. कहानी सुनाने का ढंग भी गड़बड़ है. निर्देशन काफी कमजोर है. परिणामतः सनी देओल और धर्मेंद्र का अभिनय भी कमजोर पड़ जाता है. इतना ही नहीं इस फिल्म की गति काफी धीमी है और बेवजह लंबी खींची गयी है. इसे एडीटिंग टेबल पर ठीक किया जाना चाहिए था. इंटरवल के बाद तो फिल्म काफी सुस्त हो जाती है. फिल्म में ‘वज्र कवच’ दवा का मुद्दा भी हवा में ही नजर आता है. फिल्म के कई दृश्य ‘सब टीवी’ के अति लोकप्रिय हास्य धारावाहिक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की याद दिलाते हैं. यह पूर्णरूपेण एक लोकप्रिय फ्रेंचाइजी को भुनाने का असफल प्रयास है. जबकि सलमान खान, शत्रुघ्न सिंहा, रेखा आदि भी कुछ पलों के लिए इस फिल्म में नजर आते हैं, मगर उनकी उपस्थिति से भी फिल्म अच्छी नहीं होती.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म देखकर अहसास होता है कि यह फिल्म बौबी देओल को अभिनय में नए सिरे से स्थापित करने के लिए बनायी गयी है..पर देओल परिवार यह भूल गया कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती. पूरी फिल्म में सबसे अधिक समय तक नजर आने वाले बौबी देओल अपने अभिनय से काफी निराश करते हैं. धर्मेंद को महज कैरीकेचर बनाकर रख दिया गया है. सनी देओल भी प्रभावित नहीं कर पाए. कृति खरबंदा सिर्फ खूबसूरत नजर आयी हैं, मगर अभिनय के स्तर पर काफी निराश करती हैं.

फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावहीन है.

दो घंटे 28 मिनट की अवधि वाली फिल्म का निर्माण ‘‘सनी साउंड प्रा. लिमिटेड’’ के बेनर तले किया गया है. फिल्म के निर्देशक नवनीत सिंह, पटकथा लेखक धीरज रतन व बंटी राठौड़, संगीतकार विशाल मिश्रा, राजू सिंह, संजीव दर्शन, कैमरामैन जीतन हरमीत सिंह व कलाकार हैं- धर्मेंद्र, सनी देओल, बौबी देओल, कृति खरबंदा, रेखा,सतीश कौशिक, शत्रुघ्न सिंहा, सलमान खान, बिन्नी ढिल्लों, जौनी लीवर, असरानी, शरत सक्सेना, सोनाक्षी सिन्हा, परेश गणात्रा व अन्य.

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