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निवेश में शौर्ट टर्म और लांग टर्म का संतुलन रखें

निवेश पर रिटर्न दो तरह के होते हैं- शौर्ट टर्म और लांग टर्म. आपके पास निवेश के लिए ज्यादा समय नहीं है तो वहां शौर्ट टर्म रिटर्न की जरूरत होगी. संपत्ति बनाने के लिए लांग टर्म रिटर्न चाहिए. सवाल है कि इन दोनों में संतुलन कैसे बनाया जाए. यहां इसके कुछ टिप्स हैं.

ट्रेडिंग और निवेश को अलग रखें : अगर आप शौर्ट टर्म के लिए स्टॉक में निवेश कर रहे हैं तो यह चिंता मत कीजिए कि 20 साल में इंडस्ट्री कैसे चलेगी. आपको कम समय में कमाई के मौके देखने चाहिए. लेकिन अगर रिटायरमेंट के लिए निवेश कर रहे हैं तो रोज के उतार-चढ़ाव की परवाह मत कीजिए. बड़ी बातों पर गौर कीजिए. मसलन, क्या कंपनी का बिजनेस मॉडल टिकाऊ है, क्या मैनेजमेंट कंपनी को आगे ले जाने में सक्षम है, और सबसे बड़ी बात क्या कॉरपोरेट गवर्नेंस के स्टैंडर्ड इतने ऊंचे हैं कि कंपनी की वैलुएशन लंबे समय तक बनी रहे?

कम समय के रिटर्न से सालाना रिटर्न न निकालें : शौर्ट टर्म में कुछ खास मौकों के कारण रिटर्न मिलता है. ये मौके लांग टर्म में टिकाऊ नहीं होते. किसी शेयर में आपको एक हफ्ते में 10% रिटर्न मिल गया तो इसका मतलब यह नहीं कि उस आधार पर एक साल का रिटर्न निकालें. ऐसा होता तो आपकी रिटायरमेंट की जरूरत के लायक रकम सालभर में ही मिल जाती. इसलिए शौर्ट टर्म रिटर्न को अलग इवेंट के तौर पर देखा जाना चाहिए.

शौर्ट टर्म के लिए मोमेंटम पर फोकस करें : शौर्ट टर्म में रिटर्न स्टॉक के मोमेंटम पर निर्भर करता है. इसलिए इस पर फोकस करना चाहिए. 3 साल से फार्मा शेयरों की कीमत कम लग रही है. इसके बावजूद इनमें गिरावट होती रही. जून 2018 से इनमें ग्रोथ की मोमेंटम दिख रही है. इसलिए अगर आप ट्रेडिंग कर रहे हैं तो जून 2018 में आए इस मोमेंटम पर गौर करें. खास कीमत पर कोई स्टॉक अच्छा हो सकता है, लेकिन जब तक मोमेंटम उस स्टॉक के पक्ष में न हो या कोई खास खबर न हो तब तक शौर्ट टर्म रिटर्न के लिए उसमें निवेश नहीं करना चाहिए.

लांग टर्म के लिए वैल्यू और समय पर फोकस करें : दोनों बातों को अलग-अलग समझते हैं. सालाना 15% रिटर्न वाले इक्विटी फंड में आप हर महीने 10,000 रु. निवेश करते हैं तो 20 साल बाद आपके पास 1.51 करोड़ रु. का फंड होगा. रकम बड़ी है, लेकिन यह समय के कारण अर्जित हुई है न कि वैल्यू के कारण. वैल्यू के जरिए संपत्ति बनाने के लिए सीधे शेयर में निवेश कर सकते हैं. लेकिन यह तभी संभव है जब अनुमान सही हो. बीते 20 वर्षों में बड़े सेक्टर क्या थे? आईटी, फार्मा, कमोडिटी, इन्फ्रास्ट्रक्चर सब वर्षों से बड़ी थीम रही हैं. कौन से नए सेक्टर आगे आएंगे? वैकल्पिक ऊर्जा, स्मार्ट कार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा, मशीन लर्निंग ऐसे सेक्टर हैं. लेकिन इनमें तत्काल रिटर्न नहीं मिलेगा. दो-चार साल में भी नहीं. इन पर काम करने वाली कंपनियों की ग्रोथ में लंबा समय लगेगा. पहले ये मुनाफे में आएंगी उसके बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन करेंगी. पर लांग टर्म में वैल्यू चाहिए तो आपको यह अनुमान लगाकर निवेश करना होगा.

(मयूरेश जोशी, हेड, पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विस, एंजेल ब्रोकिंग)

मैं कंफर्ट जोन से बाहर निकलना चाहता था : अभिषेक बच्चन

बौलीवुड  में ‘‘आंख से ओझल दिमाग से ओझल’’ वाली कहावत आम है. इसी के चलते हर कलाकार की कोशिश रहती है कि वह सदैव लोगों की नजरों में बना रहे. ऐसे में दो वर्ष तक खुद को बौलीवुड से दूर रखना बहुत बड़ा जोखिम होता है. दो वर्ष तक दूर रहते ही लोग कलाकार को भूल जाते हैं, परिणामतः कलाकार का करियर खत्म सा हो जाता है. इसके बावजूद अभिषेक बच्चन ने जोखिम उठाया ओर खुद को दो वर्ष तक अभिनय से दूर रखकर अपने आपको नए सिरे से काम करने के लिए तैयार करते रहे. अब वह दो वर्ष बाद 14 सितंबर को प्रदर्शित हो रही फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ से पुनः बौलीवुड में कदम रख रहे हैं.

bollywood abhishek bachchan interview on sets of manmarjiyan

आपके करियर के टर्निंग प्वाइंट क्या रहे?

मेरे लिए हर फिल्म का रिलीज होना ही टर्निंग प्वाइंट होता है. इससे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है कि हमारे दर्शक हमसे क्या चाहते हैं? हमारे दर्शक क्या नहीं देखना चाहते? किसी फिल्म की सफलता या असफलता की वजह क्या है?

आप दो वर्ष के बाद ‘‘मनमर्जियां’ में नजर आएंगे?

सही फिल्म का चयन करने में समय लगा. तीन वर्ष पहले मुझे लगा कि मैं जो काम कर रहा हूं, उससे संतुष्ट हो गया हूं. तो मुझे कुछ चैलेंजिंग काम के लिए इंतजार करना चाहिए. इसलिए दो वर्ष के लिए मैंने सिनेमा की लाइट से दूरी बनाकर अपने अंदर को खोजा और मैंने महसूस किया कि अब मुझे वह फिल्में या किरदार करने चाहिए, जो आसान व सहज न हों और उन्हें करना मेरे लिए चुनौती हो. मैं कंफर्ट जोन से बाहर निकलना चाहता था. हर कलाकार को समय समय पर स्वखोज करनी चाहिए. जो कलाकार नही करते हैं, वह फ्रस्टेशन के शिकार हो जाते हैं. जब अनुराग कश्यप मिले और उन्होंने मुझसे ‘‘मनमर्जियां’’ के बारे में बात की, तो मुझे लगा कि मुझे ऐसा काम करना चाहिए. फिल्म ‘मनमर्जियां’ के प्रोमो के बाजार में आने के बाद दर्शकों ने जिस तरह से पौजिटिव रिस्पौंस दिया, उससे मेरे निर्णय को बल मिला.

bollywood abhishek bachchan interview on sets of manmarjiyan

इन दो वर्षों में आप क्या करते रहे?

देखिए, ऐसा नहीं रहा कि मैं इन दो वर्षों में काम नहीं कर रहा था. मैं अपने दूसरे व्यवसाय पर ध्यान दे रहा था. मसलन, कबड्डी टीम व फुटबाल टीम. फिल्मों को लेकर मैं चाहता था कि अपने अंदर की उर्जा को नए सिरे से पुनः संचारित करुं. मैं इस खोज में था कि किस तरह की फिल्में की जाएं, किसके साथ फिल्में की जाएं,किस तरह से अपने करियर को अब आगे बढ़ाया जाए.

‘मनमर्जियां’ उसी तरह की फिल्म है, जैसी फिल्म आप करने के लिए सोच रहे थे?

जी बिलकुल वैसी ही फिल्म है. मजे की बात यह है कि यह फिल्म बहुत जल्द शुरु हुई. मैं अनुराग कश्यप से जनवरी 2018 में मिला था और एक माह बाद हम शूटिंग कर रहे थे अब यह फिल्म प्रदर्शित होने जा रही है. अनुराग कश्यप से मिला, कहानी व किरदार सुना और फिर जो लोग इस फिल्म के साथ जुड़े हुए थे या जुड़ने वाले थे, उन सब पर गौर करने के बाद मैंने पाया कि यह वही फिल्म है, जिस तरह की फिल्में मैं अब करना चाहता हूं. मेरे अंदर से आवाज आयी कि यह फिल्म करना सही है.

अनुराग कश्यप डार्क फिल्म बनाने वाले फिल्मकार हैं.क्या ‘मनमर्जियां’ भी डार्क फिल्म है?

यह डार्क फिल्म नहीं है. बल्कि अद्भुत बात यही थी कि अनुराग कश्यप एक प्रेम कहानी वाली फिल्म बनाने जा रहे थे. अनुराग कश्यप बेहतरीन निर्देशक हैं, तो मुझे लगा कि यदि अनुराग प्रेम कहानी बनाएंगे, तो कुछ खास करेंगे. इसीलिए यह फिल्म चुनी.

फिल्म ‘‘मनमर्जियां’ क्या है? इसमें आपका अपना किरदार क्या है?

यह त्रिकोणीय प्रेम कहानी है. इसमें तीन किरदार हैं. रूमी के किरदार में तापसी पन्नू, विक्की कौशल ने डी जे विक्की संधू का किरदार निभाया है और मेरा किरदार रौबी का है, जो कि बैंकर है और लंदन से पंजाब, भारत शादी करने के लिए आता है. उसे रूमी से प्यार हो जाता है. मेरा रौबी का किरदार षांत व समझदार है.

आपने इसमें पहली बार सरदार का किरदार निभाया है?

यह मोना सरदार है.

यह तो संगीत प्रधान फिल्म है?

जी हां! मैंने यह बात अनुराग से पूछी थी कि आपकी फिल्मों में तो गाने नहीं होते हैं. पर आपने इसमें 15 गाने क्यों डाल दिए. तो उनहोंने कहा कि, ‘ऐसा नहीं है. आप मेरी फिल्में देखें, तो हर फिल्म में दस से ज्यादा गाने होते हैं. पर अब तक मैं अपनी फिल्मों में हर गाना बैकग्राउंड में लगाता रहा हूं. पर इस फिल्म में पटकथा की मांग के अनुरूप फिल्म के किरदार गीत गाते नजर आएंगे. मुझे तो इसका संगीत बहुत अच्छा लगा. आप देखें, तो पिछले एक दो साल से कोई पूरा अलबम नहीं आया. पहली बार किसी फिल्म का पूरा खूबसूरत संगीत अलबम आया है. अन्यथा हर फिल्म में सिर्फ एक या दो गाने ही निकलते थे.

तो इसमें रोमांटिक गाने होंगे?

जी नहीं.. हर मूड के गाने हैं. इसमें मेरे दो फेवरेट गाने हैं. एक का नाम है-‘‘अल्लाह..’ और दूसरा ‘दरिया.’

क्या आपने इसमें भी गाना गाया है. पिछली एक दो फिल्मों में आप गा चुके हैं?

मैं खुद को गायक नहीं मानता. मेरे एक दो निर्देशक ऐसे हैं, जो मुझसे गवाते हैं, पर मैं खुद को अच्छा गायक नहीं मानता. इसके अलावा ‘मनमर्जियां’ में मेरा अपना रौबी का किरदार गाता नहीं है.

संगीत में आपकी रूचि है या नहीं..?

मेरी संगीत में बहुत रूचि है. बचपन से मेरे इर्द गिर्द संगीत रहा है.

आपके पसंदीदा गायक कौन हैं?

मो.रफी व किशोर कुमार दा सहित कई हैं.

इस फिल्म के संगीतकार अमित त्रिवेदी का संगीत आपने पहले सुना है?

जी हां!! मैं तो उनके संगीत का फैन रहा हूं. पर पहली बार मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला. वह बहुत अच्छे संगीतकार हैं. वह गाते भी बहुत सुंदर हैं.

किसी फिल्म में स्वयं द्वारा स्वरबद्ध गीत पर परफार्म करने और दूसरे गायक द्वारा स्वरबद्ध गीत पर परफार्म करने में कितना अंतर होता है?

मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि मुझे दूसरे गायकों द्वारा रिकॉर्ड किए गए गीत पर परफौर्म करने की आदत पड़ गयी है. वास्तव में जब हम लोग गाने की शूटिंग करते हैं, तो हम वास्तव में गाते हैं. सच कहूं तो यह बात मुझे शाहरूख खान ने सिखायी थी. जब मैं फिल्म ‘रिफ्यूजी’ की शूटिंग करने जा रहा था, उस वक्त मैंने उनसे सलाह मांगी थी कि आप कुछ खास टिप्स देना चाहेंगे. तब उन्होंने कहा था कि, ‘गाने की शूटिंग के दौरान आपको होंठ चलाते हुए कंविंस करना होता है कि आप ही गा रहे हैं. इसलिए जरूरी है कि शूटिंग के दौरान आप खुद वह गाना गाएं. यदि आप जोर से गाएंगे, तो इमोशन ज्यादा उभर कर आएगा.’’ तो मैंने यही किया था और हर फिल्म में करता हूं. लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार ऐसा बहुत कम कलाकार करते हैं.

आनंद एल राय के साथ काम करने के अनुभव क्या रहे?

बहुत अच्छे अनुभव रहे. वह बेहतरीन निर्माता हैं. वास्तव में वह खुद भी अच्छे निर्देशक हैं. इसलिए उन्हें इस बात की समझ है कि किसी फिल्म के लिए क्या जरूरी है. वह सिर्फ लाभ व हानि के चक्कर में नहीं रहते. वह निर्माता के रूप में भी रचनात्मक दृष्टिकोण से सोचते हैं. अनुराग कश्यप के लिए तो वह फायदेमंद साबित हुए. अनुराग कश्यप और आनंद एल राय दोनों अलग तरह के फिल्मकार हैं, जब यह दोनों एक साथ आए, तो कुछ अलग काम हो गया. आनंद एल राय की सेंसीबिलिटी और अनुराग कश्यप की सेंसीबिलिटी के मिलने पर फिल्म में चार चांद लग गए.

आपने तापसी पन्नू व विक्की कौशल के साथ भी पहली बार काम किया है. क्या कहना चाहेंगे?

दोनों बहुत बेहतरीन कलाकार हैं. मुझे यह देखकर बड़ा अच्छा लगा कि यह लोग स्वाभाविक अभिनय बिना किसी प्रयास के कर जाते है.

संगीत प्रधान फिल्म ‘जग्गा जासूस’ असफल रही. जबकि हॉलीवुड की संगीत प्रधान फिल्म ‘ला ला लैंड’ को ऑस्कर अवार्ड मिल गया.इस पर क्या कहेंगे ?

मेरी समझ के अनुसार भारत की हर फिल्म संगीत प्रधान होती है. हमारे यहां संगीत फिल्म का अभिन्न हिस्सा है. मेरा मानना है कि हमारा कल्चर भी संगीत प्रधान है. ‘रामायण’ हो या ‘गीता’ इन्हें मीटर में लिखा गया है. इन्हें गाया जाता है. इसलिए हमारे यहां कथाकथन संगीतमय होता है.

आपने कबड्डी और फुटबौल के खेलों को आगे बढ़ाने के लिए ‘प्रो कबड्डी लीग’ शुरू की. इससे क्या फर्क पड़ा ?

खेल को जो बढ़ावा मिला, उसका क्रेडिट मैं नहीं लेना चाहता. पर जबसे हमने प्रो कबड्डी लीग शुरू की, उसके बाद विश्व स्तर पर भारतीय कबड्डी टीम का स्तर काफी बढ़ गया. इसके मायने हैं कि हमारे खिलाड़ी काफी इम्प्रूव कर रहे हैं. यूं तो हम लोग बचपन से कबड्डी खेलते व देखते आए हैं. पर ‘प्रो कबड्डी लीग’ के बाद कबड्डी के प्रति लोगों की रूचि बढ़ी है. आईपीएल क्रिकेट मैच के बाद ‘प्रो कबड्डी लीग’ को सबसे ज्यादा दर्शक मिल रहे हैं.अब लोग ना सिर्फ कबड्डी खेल रहे हैं, बल्कि उसके बारे में चर्चाएं भी करने लगे हैं.

खेलों को लेकर कुछ और किया जाना चाहिए?

जो कुछ संभव है,वह सब हम कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर क्या लिखना पसंद करते हैं?

प्रशंसकों के साथ बातचीत करना पसंद है. मुझे भाषण देना पसंद नही.

सोषल मीडिया पर ट्रोलिंग बहुत होती है. आपके साथ ऐसा कुछ हुआ?

मैं इस पर ध्यान नहीं देता. सबसे अहम यह है कि आप पर क्या प्रभाव डाले और क्या ना डाले? यह आप पर निर्भर करता है. सोशल मीडिया से जानकारी बहुत मिलती है. हम बहुत कुछ सीखते हैं. सिर्फ हमारे देश में ही नही बाहर भी क्या हो रहा है? लोग क्या सोच रहे हैं? इसकी जानकारी मिलती है. पर सोशल मीडिया कलाकार के तौर पर मदद नहीं करता. आज तक ऐसा नही हुआ कि किसी कलाकार ने सोशल मीडिया पर कहा हो कि मेरी फिल्म जाकर देखें और सभी ने जाकर देखी हो. तो सोशल मीडिया का बाक्स आफिस के दर्शक से कोई रिश्ता नहीं है.

पर अब चर्चाएं हो रही हैं कि कलाकार जितना अधिक अपने बारे में सोशल मीडिया पर चर्चा करता है, उससे उसके स्टारडम को नुकसान होता है?

मैं भी इस बात से सहमत हूं. पर यह कलाकार पर निर्भर है कि वह अपनी कितनी जानकारी सोशल मीडिया पर साझा करें. वैसे अब दर्शक भी सोशल मीडिया पर कलाकार से बात करना चाहता है. अब सोशल मीडिया की वजह से कलाकार व प्रशंसक के बीच एक अपनापन वाला रिश्ता जुड़ गया है. फिर भी मैं इससे सहमत हूं कि पहले जिस तरह का स्टारडम कलाकार को मिलता था, वह अब नही मिलटा. पर ‘जो बीत गयी, बात गयी.’ वक्त बदलता रहता है. आपको भी वक्त के साथ बदलना पडे़गा.

अब आप किस तरह के किरदार निभाना चाहेंगे?

हर कलाकार के लिए यह बड़ा मुश्किल सवाल होता है. मैं कोई फिल्म करना चाहता हूं, पर वह मुझे मिलेगी या नहीं यह कैसे पता चलेगा. हमारे पास जो फिल्में आती हैं, उन्ही में से हम अच्छी फिल्में चुनते हैं.

एक बार माजिद मजीदी से बात हो रही थी. उन्होंने कहा डिजिटल सिनेमा की वजह से सिनेमा मर रहा है?

मैं इससे सहमत नही हूं. अब डिजिटल के आने से सिनेमा को नया उपकरण मिल गया है. अब वीएफएक्स की वजह से फिल्म की गुणवत्ता बढ़ी है. पहले हमारे यहां मूक फिल्में बना करती थी. फिर साउंड आया तो बोलती फिल्में बनने लगीं. अब हम यह नही कह सकते कि साउंड आने के बाद फिल्में खराब बन रही हैं. सिनेमा तो हर इंसान की अपनी निजी पसंद होती है. हर दर्शक की पसंद अलग है.

बैंक धोखाधड़ी से जुड़े केस की सूची पीएमओ को भेजी थी : राजन

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि उनके समय बैंक धोखाधड़ी से जुड़े हाई-प्रोफाइल मामलों की एक सूची प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भेजी गई थी. पीएमओ से आग्रह किया गया था कि कम से कम एक-दो लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. इनमें क्या कार्रवाई हुई, यह नहीं मालूम.

बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली आकलन समिति को भेजे नोट में राजन ने ये बातें कही हैं. पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने समिति के सामने एनपीए के मुद्दे पर राजन की तारीफ की थी. इसके बाद समिति ने राजन का पक्ष जानना चाहा था.

राजन के अनुसार, ‘एनपीए की तुलना में धोखाधड़ी की रकम बहुत कम है, लेकिन बढ़ रही है. मेरे समय फ्रॉड पकड़ने के लिए मॉनिटरिंग सेल बना था. इसका मकसद ऐसे मामलों को पहचान कर जांच एजेंसियों को भेजना था. सिस्टम एक भी बड़े धोखेबाज पर कार्रवाई में नाकाम रहा.’

राजन की राय, जांच एजेंसियों के डर से बैंकर फ्रॉड जल्दी उजागर नहीं करते

राजन सितंबर 2013 से सितंबर 2016 तक तीन साल के लिए आरबीआई गवर्नर थे. अभी वह शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रोफेसर हैं.

फ्रॉड रिपोर्टिंग में देरी

ट्रांजैक्शन को फ्रॉड नहीं बताते हैं बैंक अधिकारी

जांच एजेंसियां बैंकों पर आरोप लगाती हैं कि वे धोखाधड़ी के काफी समय बाद उसे उजागर करते हैं. बैंक अधिकारियों को लगता है कि अगर वे किसी ट्रांजैक्शन को फ्रॉड बताएंगे तो जांच एजेंसियां फ्रॉड करने वाले को पकड़ने के बजाय उन्हें परेशान करने लगेंगी.

आरबीआई की भूमिका                             

कर्ज की क्वालिटी पर सवाल उठा सकता था

रिजर्व बैंक बैंकों के कर्ज की क्वालिटी पर पहले सवाल उठा सकता था. बैंकों की एसेट क्वालिटी की पहले समीक्षा की जा सकती थी. दिवालिया कानून को भी पहले लागू किया जा सकता था. अच्छी बात है कि हाल के वर्षों में ढिलाई की संस्कृति बदली है.

आरबीआई का नॉमिनी

सरकारी बैंकों में रिजर्व बैंक का नॉमिनी गलत

आरबीआई रेफरी की तरह है. बैंक बोर्ड में इसके प्रतिनिधि को कर्ज देने का कोई अनुभव नहीं होता. वह सिर्फ नियमों का पालन सुनिश्चित करने की कोशिश कर सकता है. नॉमिनी से लोगों को यह आभास होता है कि आरबीआई ही बैंक को कंट्रोल कर रहा है.

एनपीए बढ़ने के ये कारण बताए

बैंकर अति-विश्वासी थे, प्रोजेक्ट की छान-बीन नहीं कर रहे थे.

प्रोजेक्ट पर काम रुकने से लागत बढ़ी, इससे कर्ज एनपीए बने.

2006-08 की तेज ग्रोथ के दौरान दिए कर्ज ज्यादा एनपीए बने.

फैसले लेने की धीमी गति से भी ऐसा हुआ.

क्या जिताएंगे मोदी योगी को बनारस में लगाए पत्थर

उत्तर प्रदेश का बनारस शहर साल 2014 के लोकसभा चुनाव में चर्चा में था. तब अपने भाषणों में बनारस लोकसभा सीट से चुनाव लड़े नरेंद्र मोदी ने खुद को कभी गंगा का बेटा बताया तो कभी कहा कि वे बनारस आए नहीं हैं, उन को मां गंगा ने बुलाया है. कभी कहा कि गंगा की सफाई होगी, गंगा में पानी के जहाज चलेंगे वगैरह.

प्रधानमंत्री बनने के बाद 5 साल का समय गुजर रहा है. बनारस और उस के आसपास के शहरों में बदलाव की जो उम्मीद की जा रही थी, वह जरा भी पूरी नहीं हुई है. भाजपा सरकार इस बात को समझ रही है. इस वजह से ‘मोदीयोगी’ दोनों ही बनारस में पत्थरों को टांकने की झड़ी लगा रहे हैं.

2019 के आगामी लोकसभा चुनाव में बनारस और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाके की अहमियत ज्यादा है. उत्तर प्रदेश का यह इलाका बिहार तक असर डालता है. उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों ही प्रदेश 2019 के लोकसभा चुनाव को ले कर अहम हैं.

अगर भाजपा यहां अपना प्रदर्शन दोहरा नहीं पाई तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य उत्तर प्रदेश के इलाकों की हार को पूरा नहीं कर पाएगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ‘कैराना’ लोकसभा सीट पर कोई धार्मिक धुव्रीकरण भाजपा के काम नहीं आया था. ऐसे में बनारस के ये पत्थर भी ‘मोदीयोगी’ को लोकसभा चुनाव में जीत नहीं दिला पाएंगे.

उत्तर प्रदेश में हालात लगातार खराब होते गए हैं. कानून व्यवस्था के साथसाथ हर शहरकसबे में भगवा गमछाधारी ऐंटी रोमियो और गौरक्षा करने वालों की एक भीड़ सी उमड़ पड़ी है. बनारस जैसे शहरों में सैलानी कम हुए हैं. अकेले लड़कालड़की साथ चलने में डरने लगे हैं. जानवरों का कारोबार करने वालों ने गौरक्षकों के डर से कारोबार बंद कर दिया है. पत्थर पूजन इस की अहम वजह है.

‘मोदीयोगी’ द्वारा बनारस में लगाए जाने वाले पत्थर क्या उन्हें चुनाव जिता पाएंगे? इस बारे में किए गए सवाल पर कांग्रेस के प्रवक्ता सुरेंद्र सिंह राजपूत कहते हैं, ‘‘2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी और खुद अपना चुनावी प्रचार करते हुए नरेंद्र मोदी ने जो वादे किए थे, वे पूरे नहीं हुए. ऐसे में तरक्की के नए पत्थर जड़ने के जरीए एक बार फिर से जनता को वादों के मायाजाल में उलझाने की कोशिश की जा रही है.

‘‘भाजपा को यह समझ नहीं आ रहा है कि पिछले 5 सालों में गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका है. जिन वादों पर जनता ने पहले भरोसा कर लिया था, अब उन का हिसाब देने का वक्त आ गया है. पत्थर पूजन के जरीए जनता को भरमाने की कोशिश की जा रही है.’’

पत्थर लगाने का दिखावा

बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30,000 करोड़ रुपए के विकास कामों के मौडल को जनता के बीच रखा. 4 साल में नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में यह 13वां दौरा था. जुलाई महीने की अपनी बनारस यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 33 परियोजनाओं के पत्थर लगाए. बनारस के साथ ही साथ लखनऊ से गाजीपुर तक 341 किलोमीटर लंबे ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ का पत्थर आजमगढ़ में लगाया.

‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ पर सपा यानी समाजवादी पार्टी का अपना दावा है. सपा का कहना है कि यह योजना मुख्यमंत्री रह चुके अखिलेश यादव की थी.

‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ को तरक्की की नई राह बताते हुए योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ‘‘हमारी सरकार पूर्वांचल और बुंदेलखंड में ऐक्सप्रैसवे और इंडस्ट्रियल कौरीडोर बना रही है, जिस से रोजगार, पर्यटन और औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा. ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ अयोध्या, बनारस और गोरखपुर को जोड़ेगा. इस से तरक्की को नई रफ्तार मिलेगी.’’

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके और सपा नेता अखिलेश यादव ने ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ को अपनी सरकार की योजना बताते हुए कहा, ‘‘भारतीय जनता पार्टी समाजवादी पार्टी की सरकार के कामों का ही शिलान्यास और उद्घाटन कर रही है. समाजवादी पार्टी की सरकार ने ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ के बलियाबिहार बौर्डर तक बढ़ाने की योजना बनाई थी, लेकिन भाजपा की सरकार ने इसे गाजीपुर तक ही सिमटा कर रख दिया है.

‘‘भाजपा सरकार ने इस योजना को शुरू करने में देर की जिस से इस की लागत बढ़ जाए. भाजपा समाजवादी पार्टी की सरकार की खड़ी फसल को काटने का काम कर रही है.’’

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डाक्टर महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा, ‘‘अखिलेश यादव ने ऐसी योजनाओं का फर्जी शिलान्यास कर दिया था. इस की डीपीआर तक नहीं बनी थी.’’

बनारस के बहाने…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी बनारस के दौरे पर आते हैं, केवल पत्थर पूजने का काम ही नहीं करते, बल्कि अपनी यात्रा को बड़े कैनवास में ले जाते हैं. वे अपने बनारस दौरे पर कई बार दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भी बतौर मेहमान ला चुके हैं.

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो के बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों बनारस में आए थे. दोनों को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस घुमाया.

फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के साथ मोदी ने 382 एकड़ पर फ्रांस की कंपनी की मदद से बने सोलर पावर प्लांट का उद्घाटन किया था.

निशाने पर आजमगढ़

लखनऊ से गाजीपुर तक बनने वाले ‘पूर्वांचल ऐक्सप्रैसवे’ का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजमगढ़ जिले के मंदूरी गांव हवाईपट्टी में हुए एक कार्यक्रम में किया. यह हवाईपट्टी आजमगढ़ जिले से 14 किलोमीटर दूर थी. दिल्ली के बाटला हाउस ऐनकाउंटर में मारे गए लोगों का गांव संजरपुर आजमगढ़ में ही आता है. हवाईपट्टी से यह केवल 30 किलोमीटर दूर था.

वैसे तो पूर्वांचल में भाजपा का मजबूत जनाधार है,  इस के बावजूद भी आजमगढ़ उस की पकड़ से हमेशा ही दूर रहा है. नरेंद्र मोदी की सभा के बहाने भाजपा ने यहां पर अपना प्रचार किया. पूरे इलाके को सफेद केसरिया रंग से सराबोर कर दिया गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस से हैलीकौप्टर द्वारा आजमगढ़ हवाईपट्टी तक आए. बरसात से बचने के लिए वाटरप्रूफ पंडाल का इंतजाम किया गया था. इस में तकरीबन 40,000 लोग बैठ सकते थे. मंच से दूर शिलान्यास की पट्टिका लगाई गई. रिमोट द्वारा मंच से इस का उद्घाटन किया गया था.

आजमगढ़ पूर्वांचल का प्रमुख जिला है. यहां से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव सांसद हैं. 2014 की मोदी लहर में भी भाजपा यहां पर चुनाव नहीं जीती थी.

भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ की सीट अपनी झोली में डालना जरूरी है. सपा ने कहा है कि मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे. ऐसे में भाजपा के लिए यहां जीत आसान हो जाएगी.

भाजपा ने केवल 2009 के लोकसभा चुनाव में यह सीट जीती थी. तब रमाकांत यादव सांसद बने थे. 1991 की राम लहर और 2014 की मोदी लहर में भी यहां भाजपा चुनाव नहीं जीती.

कबीरदास पर निशाना

मार्च से जुलाई के बीच पिछले 5 महीने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 बार बनारस और एक बार कबीरदास के निर्वाण स्थल मगहर की यात्रा कर चुके हैं.

विचारधारा के लैवल पर देखें तो कबीरदास और राम दोनों अलगअलग विचारधाराओं को आगे बढ़ाते हैं. राम धार्मिक रहे तो कबीरदास धर्म का आडंबर का विरोध करते थे.

अपना जीवन बनारस में बिताने वाले कबीरदास धार्मिक आडंबर का विरोध करने के लिए ही अपने अंतिम समय मगहर चले आए थे.

राम और कबीरदास को एकसाथ ले कर चलना भाजपा की मजबूरी बन गई है.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में दलित तबका भाजपा के साथ था. उत्तर प्रदेश और केंद्र में बनी ‘मोदीयोगी’ की सरकार में दलित सम्मान की बातें तो हुईं, पर असल में उस के लिए कुछ हुआ नहीं. भगवा गैंगों ने दलितों को सहारनपुर से ले कर भीमाकोरेगांव तक परेशान किया. अब दलित तबका भाजपा से टूट गया है.

‘‘उत्तर प्रदेश के 4 उपचुनावों में भाजपा की हार में दलित तबके का भाजपा से छिटकना बड़ी वजह था. अब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का तालमेल होने के बाद भाजपा के सामने मजबूरियां बढ़ जाएंगी. ऐसे में दलितों को वापस पार्टी से जोड़ना जरूरी है.

‘‘इस के लिए भाजपा को कबीरदास की याद आई. भाजपा को साफ लग रहा है कि केवल राम और बनारस का नाम ले कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. दलितों को जोड़ने के लिए कबीरदास का महिमामंडन जरूरी है. कबीरदास को दलितों में गुरु सा भाव दिया जाता है. ऐसे में भाजपा भी कबीर को राम की तरह कब्र से निकाल कर राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहती है.’’

जी हां ! ये बिल्कुल सच है, सिर्फ 30 सेकेंड्स और फोन हैक

अब लैपटॉप और डेस्कटॉप का जमाना गया लोग अपना हर काम स्मार्टफोन की मदद से ही करते हैं. प्रोफेशनल लाइफ से लेकर पर्सनल लाइफ तक सबकुछ स्मार्टफोन से जुड़ गया है. चाहें बात बैंक पासवर्ड से जुड़ी हुई हो या किसी पार्टी की फोटोज से आपका स्मार्टफोन अगर किसी गलत हाथ में पड़ जाए तो काफी मुश्किल हो सकती है. अगर हम आपसे कहें की स्मार्टफोन से जुड़ी कुछ जानकारियां मात्र 30 सेकेंड में कोई भी आसानी से चुरा सकता है. जी हां, आज हम आपको बताने जा रहे किस तरह आपके स्मार्टफोन का उपयोग कर हैकर आपको चुना लगा सकते है

टिल्ट सेंसर

अगर आप ऑफिस कर्मचारी हैं तो स्मार्टफोन को अपनी डेस्क पर रखना आपकी आदत बन चुकी होगी. स्मार्टफोन में एक डिवाइस लगा होता है जिसका नाम टिल्ट सेंसर है. अगर किसी हैकर ने आपके स्मार्टफोन को शिकार बना लिया है तो इस डिवाइज की मदद से आसानी से कम्प्यूटर पर हो रही हर गतिविधी का पता लगाया जा सकता है. इसके जरिए सेव किए हुए पासवर्ड, बैंक अकाउंट, सिस्टम पर क्या टाइप हो रहा है, यहां तक की नॉन वेज चैट को भी आसानी से कॉपी किया जा सकता है.

स्मार्टफोन सेंसर

स्मार्टफोन के सेंसर की मदद से आसानी से क्रेडिट कार्ड के सारे राज खोले जा सकते हैं. इसके लिए बस स्मार्टफोन को क्रेडिट कार्ड के करीब लाने की जरूरत है. इसके लिए स्मार्टफोन से निकलने वाली वेव्स का सहारा लिया जाता है. बस किसी अनुभवी हैकर के सामने अपना क्रेडिट कार्ड रखिए और काम तमाम. इसके अलावा भी कई ऐसे तरीके हैं जो स्मार्टफोन का इस्तेमाल जरूरी जानकारी चुराने के लिए प्रयोग किए जाते हैं. फ्री चार्जिंग सर्विस स्टेशन और वायरलेस चार्जिंग से लेकर किसी अन्य सॉफ्टवेयर की मदद से स्मार्टफोन हैक किया जा सकता है.

हैकिंग सॉफ्टवेयर

इस तकनीक के माध्यम से हैकर उस फोन की तलाश में रहते हैं जिसमें ब्लूटूथ या वाई फाई का उपयोग हो रहा हो. इसके लिए हैकर किसी भीड़ वाली जगह में अपने लैपटॉप पर हैकिंग सॉफ्टवेयर को एक्टिवेट करता है. यह सॉफ्टवेयर एक एंटीने के जरिए उपयोग में आ रहे नजदीकी ब्लूटूथ के सिग्नल को पकड़ लेता है. फिर अपने लैपटॉप के जरिए वह आपके मोबाइल पर उपलब्ध सारी जानकारी हासिल कर उसका उपयोग कर सकता है.

मैं अपने करियर को लेकर कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता : विक्की कौशल

बौलीवुड में बहुत कम समय में अपनी एक अलग पहचान बना लेने वाले अभिनेता विक्की कौशल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह हर फिल्म में एकदम नए अंदाज में ही नजर आते हैं.आनंद एल राय निर्मित और अनुराग कश्यप निर्देशित 14 सितंबर को प्रदर्शित हो रही फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ में विक्की कौशल का लुक भी एकदम अलग है.

अब आपको अपना करियर कहां जाता नजर आ रहा है?

मैं अपने करियर का प्लानर नहीं हूं. मैने आज तक कोई योजना नहीं बनायी. मैं अपने वर्तमान पर मेहनत कर रहा हूं. आज पर मैं मेहनत कर रहा हूं. अपने कर्म ईमानदारी से कर रहा हूं. मुझे नहीं पता कि मेरा करियर कहां तक जाएगा. मैं अपने करियर को लेकर कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता.

आपकी पिछली ‘राजी’और ‘संजू’ दोनों ही फिल्में वास्तविक किरदारों व कहानी पर आधारित हैं. इनमें से किसमें किसी को महिमा मंडित किया गया?

कहीं आपका इशारा फिल्म ‘संजू’की तरफ तो नहीं है. तो सर आप खुद बताइए कि इसमें संजय सर की इमेज को सुधारने की बात तब आती, जब इसमें संजय दत्त को पाक साफ बताया जाता. इसमें बताया गया है कि वह ड्रग्स लेता है या उसने घर में हथियार रखा. पर आप बताएं कि संजू का अपराध क्या है. सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे हथियार रखने का अपराधी बताया. तो इसे फिल्म में दिखाया गया है. जेल के द्रश्य दिखाए गए हैं. तो उसकी इमेज कहां सुधारी गयी. हमने फिल्म में संजू को मदर टेरेसा की तरह थोड़े ही पेश किया है. उसका दोस्त कमली भी उसे लताड़ता रहता है कि वह नही सुधरेगा.

राजी’और ‘संजू’ के प्रदर्शन के बाद आपको किस तरह के कमेंट सुनने को मिले?

बहुत प्यारे कमेंट मिले. मैं खुद आश्चर्यचकित हो रहा था कि ऐसा क्या काम मैंने कर दिया. ‘राजी’के प्रदर्शन से पहले लोग मुझसे कहते थे कि अरे,आप पाकिस्तानी सेना के मेजर का किरदार निभा रहे हो? तो मुझे तनाव हो रहा था. पर फिल्म के रिलीज के बाद लोगों ने बधाई दी तो खुशी हुई. एक पाकिस्तानी सैनिक का किरदार निभाकर मुझे सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान सहित पूरे विश्व से प्यार मिला. लोगों ने कहा कि पाकिस्तानी सैनिक भी एक इंसान है, जिसे अपने वतन से प्यार है. हर इंसान को अपने वतन से प्यार करना ही चाहिए. यह तो राजनीति है,जो कि हमें अलग करती है. सत्ता का मसला अलग है.

यदि ‘‘संजू’’ की बात करें, तो मेरे किरदार कमली को काफी पसंद किया गया. मेरे पास हजारों लोगों ने संदेश भेजा की, उन्हें भी कमली जैसा दोस्त चाहिए. कुछ लोगो ने लिखा कि उन्हे भी अपनी जिंदगी में कमली बनना है, जिससे लगा कि लोगों ने कनेक्ट किया. यानी कि हम जो इमोशंस आम दर्शकों तक पहुंचाना चाह रहे थे, वह इमोशन पहुंचा. यह बात हमें अच्छी लगी. लोग प्लेन में मिलते हैं, तो मुझे ‘ओ कमली’ कह कर बुलाते हैं. यह सुनकर मुझे बड़ी ख़ुशी मिलती है. इतना ही नही मुझे उस दिन बहुत ख़ुशी मिली थी, जब मैं सर्बिया में ‘उरी’ की शूटिंग कर रहा था और मेरे पापा लंदन में शूटिंग कर रहे थे. वहां से उन्होने मुझे फोन करके बताया कि, ‘पता है आज क्या हुआ? आज मुझे किसी ने एक तीसरे इंसान से विक्की कौशल के पिता शाम कौशल कह कर परिचय कराया.’ मेरे लिए यह बड़े गर्व की बात है.

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पर इन फिल्मों की वजह से आपकी जिंदगी और आपके आस पास क्या बदलाव आया?

सबसे बड़ा बदलाव यही है कि लोग मेरे पिता का परिचय विक्की कौशल का पिता कहकर कराने लगे. जबकि बौलीवुड में उनका करियर मेरी उम्र के बराबर का है.

फिल्म ‘‘मनमर्जिया’’ को लेकर क्या कहेंगे?

‘मनमर्जियां’ तीन ऐसे इंसानों की कहानी है, जो एक छोटे से शहर के हैं और उनकी अपने पार्टनर से क्या इच्छाएं है, उसी में उलझे हुए हैं. इन तीनों फिल्मों की दुनिया ही अलग है. इसकी पटकथा सुनते ही मैंने इस फिल्म को करने के लिए हामी भर दी थी.

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आपको पटकथा सुनकर यह फिल्म करने की इच्छा क्यों हुई?

क्योंकि यह संगीत प्रधान प्रेम कहानी वाली फिल्म है. मेरे करियर की यह पहली फिल्म है, जिसमें मैं नाच और गा रहा हूं. इसके अलावा इस फिल्म के तीनों किरदार इतने अलग हैं कि आप देखते रह जाएं. एक है जो कमिटमेंट से डरता है. दूसरा भगवान राम की तरह आदर्शवादी है. हर मॉं ऐसे ही युवक से अपनी बेटी की शादी करना चाहती है. इन दोनों के बीच एक लड़की है, जिसे पैशनेट प्यार और सुरक्षा में से एक को चुनना है. खुशहाल जीवन के लिए पैशन व सुरक्षा दोनों चाहिए, पर उसे एक युवक से पैशन और दूसरे से सुरक्षा मिल रही है. ऐसे में वह क्या करे? एक युवक कमिटमेंट नहीं दे पा रहा है और दूसरा कमिटमेंंट दे पा रहा है. फिर फिल्म का ट्रीटमेंट और संगीत भी बहुत बेहतरीन है.

यह पंजाब के छोटे शहर अमृतसर की कहानी है, जहां हर किसी को जाने का मौका नहीं मिलता है. तो एक नया स्वाद है. अभिषेक बच्चन जी दो साल बाद इस फिल्म में नजर आएंगे. इसमें रोचकता बहुत है. हमें इस फिल्म को करने का गर्व है.

फिल्म के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

फिल्म ‘मनमर्जिया’ में पंजाब का एक आवारा लौंडा है, जो कि डी जे है. उसका नाम डी जे सैंड है. वह मनमौजी व शरारती है. जिसे रूमी (तापसी पन्नू) नामक इस लड़की से प्यार करने के अलावा कुछ आता ही नहीं है. वह दूसरा कोई काम जानना भी नहीं चाहता. वह अधीर युवक है. वह काम करने से पहले या बाद में भी नहीं सोचता कि उसने जो किया वह सही है या गलत. इस तरह तीनों ही किरदारों में बहुत अलग अलग शेड्स हैं. मुझे यह तीनों किरदार निभाने में बड़ा मजा आया.

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आपका प्यार कैसा है?

मेरी राय में पैशन व सुरक्षा दोनों का होना बहुत जरुरी है. कई बार लड़की का हाथ पकड़ लेना ही बहुत कुछ होता है. कई बार दूर रहकर फोन पर बात कर लेना ही सकून देता है. सवाल यह कि आप दोनों के बीच किस तरह का जुड़ाव है और कितना एक दूसरे को समझते हैं. ऐसा दोस्ती में भी होता है.

हरलीन कौर से आपके प्यार व रिश्ते की जो चर्चाएं हो रही हैं, उनमें कितनी सच्चाई है?

आज हम निजी रिश्तों पर बात नहीं करना चाहते. इसके लिए हम फिर कभी बैठकर बात करेंगे.

इसके अलावा कौन सी फिल्म कर रहे हैं?

एक फिल्म ‘उरी’ कर रहा हूं. यह फिल्म सितंबर 2016 में उरी हमले और उसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक पर यह फिल्म है. इसमें मैने एक भारतीय कमांडों का किरदार निभाया है. यह पूर्न्क्षेपण एक्शन फिल्म है. पहली बार मैं किसी एक्शन फिल्म का हिस्सा बना हूं. इसके लिए हम सर्बिया में दो माह की संजीदा व अति कठिन शूटिंग करके आए हैं. इसके लिए हमें पांच माह तक आर्मी से ट्रेनिंग लेनी पडी़. अभी पांच दिन की शूटिंग होनी बाकी है.

आप फिल्म ‘उरी’ की शूटिंग सर्बिया में कर रहे थे. क्या वहां कोई भारतीय फिल्म देखी?

सर्बिया में बौलीवुड फिल्में रिलीज नहीं होती. कुछ बौलीवुड फिल्में लंबे समय बाद रिलीज होती हैं. मसलन ‘पद्मावत’ हमारे यहां फरवरी माह में रिलीज हुई थी. जबकि सर्बीया में ‘पद्मावत’ अगस्त माह में सुबह नौ बजे सिर्फ एक शो में रिलीज हुई. वहां पर बौलीवुड फिल्म डीवीडी पहुँचने  पर रिलीज होती हैं. सर्बिया में वैसे भी फिल्म का कोई क्रेज नहीं है. वहां पर थिएटर यानी कि नाटक का क्रेज है. वहॉं पर हर वर्ष सिर्फ पांच छह फिल्में बनती है. वहॉं के लोग ताज्जुब कर रहे थे कि भारत हर वर्ष हजार फिल्में कैसे बना लेता है.

सर्बिया में किस तरह की फिल्में बनती हैं?

उन्हें नब्बे के दशक में आजादी मिली. पहले वह बहुत बड़े देश यूगोस्लाविया का हिस्सा था. उनका 25 साल पुराना गृहयुद्ध का इतिहास है. इसलिए उनकी फिल्में कहीं न कहीं उसी सुर पर होती हैं. सिविल वार/गृह युद्ध व राजनीति के चलते वहां पर जो जिंदगियां बदलीं, उन्हीं को वह कहानी के साथ अपनी फिल्मों में पेश कर रहे हैं. इस तरह की फिल्मों के साथ आज की पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी दोनों रिलेट कर पा रही हैं. पर मुझे वहॉं की फिल्म देखने का अवसर ही नहीं मिला.

क्या करें जब आप प्ले स्टोर से खरीद लें गलत ऐप

गूगल प्ले स्टोर पर 17 लाख ऐप हैं. लेकिन सभी ऐप ऐसे नहीं हैं जो आप फ्री डाउनलोड कर सकते हैं. कई ऐप ऐसे भी हैं जिनको डाउनलोड करने के लिए गूगल प्ले स्टोर को ही पैसे देने पड़ते हैं.

अगर ये ऐप किसी कारण से आपके लिए ठीक नहीं हैं तो उन्हें वापस भी किया जा सकता है. लेकिन हर तरह की खरीदारी को वापस नहीं किया जा सकता है.

वापस करने के लिए गूगल की पॉलिसी के बारे में पूरी जानकारी यहां मिल सकती है. अगर रिफंड गूगल को मंजूर है तो आम तौर पर तीन से पांच दिन में पैसे वापस हो जाते हैं.

लेकिन कुछ हालातों में खरीदा हुआ ऐप वापस नहीं किया जा सकता है.

पहले ऐसे रिफंड के बारे में डाउनलोड करने के 15 मिनट के अंदर गूगल को बताना पड़ता था. लेकिन इतने कम समय में उस ऐप के बारे में जानना काफी मुश्किल है.

गूगल प्ले स्टोर को आजकल चार हिस्सों में बांटा गया है – मूवीज, म्यूजिक, बुक्स और न्यूजस्टैंड. अब नयी पॉलिसी लागू होने के बाद वापसी इस बात पर निर्भर है कि किसी ने किस सेक्शन से वो ऐप खरीदा है.

ऐप के लिए पैसे वापस करने की अधिकतम सीमा 48 घंटे हैं. लेकिन अगर किसी ने आपके कार्ड या अकाउंट से जाने अनजाने में गलत खरीदारी की है, तो उसके लिए आप गूगल से 65 दिनों तक पैसे वापस करने की गुजारिश कर सकते हैं.

अगर डाउनलोड करने के दो घंटे से ज्यादा समय के बाद ऐप को वापस करना है तो उसके लिए एक ऑनलाइन फॉर्म भरना होगा. गूगल अकाउंट पर लॉग इन करने के बाद ये फॉर्म मिल जाएगा.

अपने गूगल प्ले स्टोर के ‘अकाउंट’ में जाकर ‘आर्डर हिस्ट्री’ देखेंगे तो अपनी खरीदारी के बारे में पूरी जानकारी मिल जायेगी. जिस ऐप को वापस करना है उसके साथ लिखे ‘रिफंड’ पर क्लिक करके पैसे वापस लेने का काम शुरू कर सकते हैं.

अगर 48 घंटे से ज्यादा समय हो गया है और आपने पैसे वापस करने के लिए फॉर्म नहीं भरा है तो उसके बाद पैसे वापस करने का फैसला सिर्फ ऐप बेचने वाली कंपनी का होता है.

गूगल प्ले स्टोर से खरीदारी करने के लिए उस पर अपने क्रेडिट कार्ड की जानकारी देनी पड़ेगी. किसी भी क्रेडिट कार्ड से भारत में खरीदारी करने के लिए स्मार्टफोन पर एक पासवर्ड आता है. जो भी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसकी वेबसाइट पर वो पासवर्ड इस्तेमाल करने के बाद ही वो खरीदारी पूरी की जा सकती है.

इसलिए क्रेडिट कार्ड की जानकारी गूगल पर देना अब सुरक्षित है और आपकी जानकारी के बिना कोई भी खरीदारी नहीं की जा सकेगी.

वसंत मेरे गांव में

अमलतास के रंग से

पीली हुई धरती की चुनर

दिन सुर्ख लाल हुए

मुसकरा उठे जब गुलमोहर.

हवाओं ने जैसे बांध लिए

घुंघरू अपने पांव में

देखो, लौट आया है

वसंत मेरे गांव में.

भ्रमरों के संग गाने को

खोल रही हैं कलियां अधर

पी-कहां पुकारती है

पपीहा कहीं पागल हो कर.

हार जाना चाहता मन

स्वप्निल नयनों के दांव में

देखो, लौट आया है

वसंत मेरे गांव में.

हर पत्ता छुपा रहा है

बूढे़ पीपल की उम्र

हर मन यही चाहता है

जीवन जाए यहीं ठहर.

रात मदमातीइठलाती यहां

चांदनी की छांव में

देखो, लौट आया है

वसंत मेरे गांव में.

– के. मनोज सिंह

बालिका गृह का नर्क : नाबालिग बच्चियों के यौनशोषण की कहानी

कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता. एक न एक दिन उस का भंडाफोड़ हो ही जाता है. बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बालिका संरक्षण गृह में बालिकाओं के शोषण की घटना इस का ताजा उदाहरण है. अगर टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज (टिस) की टीम वहां नहीं जाती तो पता नहीं वहां बालिकाओं के साथ शोषण कब तक और चलता.

बात फरवरी, 2018 की है. मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की इकाई ‘कोशिश’ ने मुजफ्फरपुर जिले के ‘सेवा संकल्प समिति’ के बालिका संरक्षण गृह का औडिट किया. इस संरक्षण गृह में 44 लड़कियां रहती थीं. औडिट के दौरान टीम ने पाया कि संरक्षण गृह का रखरखाव सही नहीं है और वहां रह रही बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है. दुर्व्यवहार ही नहीं, बल्कि टीम को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की शिकायतें भी मिलीं.

औडिट करने के बाद टिस ने अपनी रिपोर्ट समाज कल्याण विभाग को सौंप दी. इस से पहले नवंबर 2017 में ‘कोशिश’ के स्टेट कोआर्डिनेटर कायम मासूमी, सुनीता बिस्वास और आसिफ इकबाल इसी बालिका गृह में आए थे. तब यहां डरीसहमी बालिकाओं ने टीम के सदस्यों को बताया था कि उन का दैहिक शोषण किया जाता है. टिस ने अपनी औडिट रिपोर्ट में बालिकाओं की उसी पीड़ा का उल्लेख किया था.

टिस की सनसनीखेज रिपोर्ट पढ़ कर समाज कल्याण विभाग के निदेशक देवेश शर्मा उछल गए. उस औडिट रिपोर्ट में कुछ ऐसा उल्लेख किया गया था कि उसे जो भी पढ़ता, चौंके बिना नहीं रह पाता. टिस ने अपनी औडिट रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि मुजफ्फरपुर बालिकागृह में रह रही 44 लड़कियों में से 42 की मैडिकल जांच कराए जाने पर उन में से 34 लड़कियों के साथ दुष्कर्म किए जाने की पुष्टि हुई है.

संरक्षण गृह की 34 लड़कियों के साथ दुष्कर्म होना कोई छोटीमोटी बात नहीं थी. मामला प्रकाश में आते ही जिला ही नहीं बल्कि पूरे राज्य में भूचाल खड़ा हो सकता था. मीडिया अलग से नाक में दम कर देती. काफी सोचविचार कर निदेशक शर्मा ने टिस की औडिट रिपोर्ट को हलके में लिया. उन्होंने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया और कान में रूई डाल कर चुपचाप बैठ गए.

रिपोर्ट पर 4 महीने तक कोई काररवाई न होता देख टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की ‘कोशिश’ टीम परेशान हो गई. लेकिन वह चुप नहीं बैठी. टीम ने 26 मई, 2018 को 100 पेज की सोशल औडिट रिपोर्ट बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा पटना और मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन को भी भेज दी.

चूंकि रिपोर्ट अब शासन तक पहुंच चुकी थी और जिला प्रशासन उसे दबा नहीं सकता था. इस से औडिट रिपोर्ट को ठंडे बस्ते के हवाले करने वाले समाज कल्याण विभाग के निदेशक देवेश शर्मा की आंखों से नींद उड़ गई. जिला प्रशासन सिर के बल दौड़ने लगा. इस से पहले कि देवेश शर्मा पर कोई गाज गिरती, उन्होंने अपनी भूल स्वीकारते हुए कहा कि वह रिपोर्ट को हलके में ले रहे थे, जो उन की बड़ी भूल थी.

मुक्त कराई गईं लड़कियां

इस के बाद 31 मई, 2018 को जिला प्रशासन ने सेवा संकल्प एवं विकास समिति के बालिका संरक्षण गृह से 46 किशोरियों को मुक्त कराया. मुक्त कराई गई किशोरियों को पटना, मोकामा और मधुबनी के संरक्षण गृहों में भेज दिया गया.

देवेश शर्मा ने बालिका गृह का संचालन कर रहे एनजीओ के मालिक और सरगना ब्रजेश ठाकुर, सरगना की पर्सनल असिस्टैंट मधु, बालिका गृह की अधीक्षिका इंदु कुमारी, सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा, समिति की कार्यकर्त्री किरण, मंजू, मीनू, हेमा, नेहा, चंदा समेत 11 लोगों के खिलाफ महिला थाने में दुष्कर्म की धारा एवं पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मामले की जांच महिला थाने की प्रभारी ज्योति कुमारी ने खुद संभाली.

बालिका संरक्षण गृह में बड़े पैमाने पर चल रहे देहव्यापार के खुलासे के बाद जिले के आला अफसरों आईजी (जोन) सुनील कुमार, डीआईजी अनिल कुमार सिंह, एसएसपी हरप्रीत कौर, एसपी (सिटी) उपेंद्रनाथ वर्मा और डीएसपी (सिटी) आनंद कुमार मुकुल के होश फाख्ता थे. अधिकारियों ने किशोरियों को न्याय दिलाने के लिए कमर कस ली थी.

बालिका गृह से मुक्त कराई गई किशोरियों को मोकामा नाजरथ अस्पताल में भरती कराया गया, जहां उन का इलाज शुरू हुआ. जांच अधिकारी ज्योति कुमारी किशोरियों के बयान लेने के लिए अस्पताल पहुंच गईं. किशोरियों के बयान से हैरान कर देने वाला सच सामने आया.

किशोरियों ने बताया कि बालिका गृह में काम करने वाली महिला कर्मचारी न केवल उन के साथ होने वाले रेप में साथ देती थीं, बल्कि खुद भी बच्चियों का यौनशोषण करती थीं. महिला कर्मचारी उन के साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया करती थीं.

एक 16 साल की किशोरी मीरा ने जांच अधिकारी को बताया कि बालिका गृह में खाने में नींद की गोलियां मिला कर देने के बाद उन के साथ गलत काम किया जाता था. सुबह जागने के बाद गुप्तांग में असहनीय दर्द होता था. तब देखभाल करने वाली वहां की इंदु आंटी उन्हें बताती थी कि उन के साथ गलत काम किया गया है.

इलाजरत पीडि़त किशोरियों के संबंध में मनोचिकित्सक ने जांच अधिकारी ज्योति कुमारी को बताया कि यौनशोषण होने के कारण कई किशोरियां एसटीडी (सैक्सुअल ट्रांसमिटेड डिजीज) से पीडि़त हो गई हैं. उन में से सब से ज्यादा बैड वेटिंग (बिस्तर पर पेशाब कर देना) से पीडि़त हैं. सभी का इलाज किया जा रहा है. बैड वेटिंग सभी लड़कियों में एक कौमन बीमारी के रूप में सामने आई.

बीमारी देख कर यह पता चलता है कि सभी के दिलोदिमाग में यौनशोषण घर कर गया है और इसी वजह से उन के साथ यह समस्या आ रही है. जब तक पीडि़त किशोरियां इस त्रासदी से निकल कर बाहर नहीं आएंगी, तब तक ऐसे ही पीडि़त रहेंगी.

कानून के दायरे में आए संचालक और उन के साथी

बहरहाल, 2 जून, 2018 को जांच अधिकारी ज्योति कुमारी ने एनजीओ के मालिक और मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर और संस्था से जुड़े 8 लोगों को महिला थाने बुला कर पूछताछ शुरू की. उसी दिन बालिका संरक्षण गृह को सील भी कर दिया.

पूछताछ के बाद 9 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही संस्था की पीए कही जाने वाली मधु और दिलीप कुमार वर्मा भूमिगत हो गए. इधर गिरफ्तार आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां अदालत ने सभी को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया. इधर फरार आरोपी मधु और दिलीप कुमार वर्मा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने जगहजगह इश्तहार लगवाए. इतना ही नहीं, पुलिस उन की संपत्ति की कुर्की की काररवाई करने में भी जुट गई.

चूंकि यह कोई छोटामोटा मामला नहीं था, बल्कि मुजफ्फरपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार ‘प्रात: कमल’ के मालिक और मीडिया जगत के सिंडीकेट ब्रजेश ठाकुर से जुड़ी हुई बहुचर्चित घटना थी, जिस की पहुंच सत्ता के ऊंचे गलियारों तक थी. जिस के एक इशारे पर बड़ेबड़े सफेदपोश माथा टेकने के लिए समर्पित रहते थे.

ब्रजेश ठाकुर के सिंडीकेट की खेवनहार उस की अपनी हनीप्रीत कही जाने वाली महिला मित्र मधु थी. सरगना ब्रजेश के सारे अच्छेबुरे कामों का लेखाजोखा वही रखती थी, इसलिए यह मामला तूल पकड़ने लगा.

आगे की कहानी बताने से पहले ब्रजेश ठाकुर और उस की हनीप्रीत कही जाने वाली महिला दोस्त मधु के जीवन के रंगीन पन्नों का यहां उल्लेख करना अनिवार्य है, इस तरह था—

करीब 55-60 वर्षीय ब्रजेश ठाकुर मूलरूप से मुजफ्फरपुर का रहने वाला है. उस के पिता का नाम राधामोहन ठाकुर था. उन की सालों पहले असामयिक मौत हो गई थी. वह एक सच्चे समाजसेवक थे. इसी सेवा से ओतप्रोत हो कर वह समाज के लिए कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिस से दुनिया से विदा होने के बाद भी लोग उन्हें याद करें.

इसी सोच को साकार रूप देने के लिए उन्होंने रोशनाई से भरी कलम को अपने हाथों में उठा लिया और चल पड़े पत्रकारिता की दोधारी तलवार जैसी दुरूह राह पर. पत्रकारिता जगत में राधामोहन ठाकुर बड़े नाम के रूप में विख्यात हुए. समाज के छोटेबड़े तबके में उन की अलग पहचान बनी. लोगों का उन्हें प्यार और सम्मान मिला.

राधामोहन ने सन 1982 में मुजफ्फरपुर से एक हिंदी अखबार ‘प्रात:काल’ का बीजारोपण किया. राधामोहन ठाकुर की पत्रकारों के बीच अच्छी पहचान बनने लगी. बिहार में छोटे अखबारों को शुरू करने वाले शुरुआती नामों से नाम राधामोहन ठाकुर का नाम बड़े सम्मान से लिया जाने लगा. धीरेधीरे राधामोहन ठाकुर ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर के अपने अखबार के लिए सरकारी विज्ञापन लेने शुरू कर दिए. इन विज्ञापनों से राधामोहन ठाकुर ने खूब पैसे बनाए और उस पैसे को रियल एस्टेट में लगा दिया.

पिता की उपलब्धि का लाभ उठाया ब्रजेश ने

राधामोहन ठाकुर पत्रकारिता जगत के मंझे हुए बड़े खिलाड़ी बन चुके थे. जब उन्होंने रियल एस्टेट के व्यवसाय में हाथ डाला तो वहां भी कुंदन बन कर दमकने लगे. जबकि उन्हें इस कारोबार की कोई जानकारी नहीं थी. उस समय रियल एस्टेट का शुरुआती दौर था और उस दौर में राधामोहन ठाकुर ने इस से भी खूब पैसा बनाया.

बताया जाता है कि उसी दौरान राधामोहन ठाकुर बीमार पड़े तो फिर स्वस्थ नहीं हो सके और फिर एक दिन उन की मृत्यु हो गई. पिता की मौत के बाद विरासत उन के बेटे ब्रजेश ठाकुर ने संभाली. पैसा पहले से ही विरासत में मिला था, साथ ही पिता का रसूख भी, इसलिए ब्रजेश ठाकुर के हाथ में कमान आते ही उस ने रियल एस्टेट के कारोबार को तो संभाला ही, एक कदम आगे बढ़ कर राजनीति में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया.

बिहार के बाहुबली नेता आनंद मोहन से ब्रजेश ठाकुर की गहरी छनती थी. दोनों बचपन के दोस्त थे. ब्रजेश ठाकुर ने आनंद मोहन की अंगुली पकड़ कर राजनीति की पिच पर पारी खेलनी शुरू की. उसी दौरान 1993 में जब आनंद मोहन ने जनता दल से अलग हो कर अपनी ‘बिहार पीपुल्स पार्टी’ बनाई तो ब्रजेश ठाकुर उस में शामिल हो गया.

1995 में बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए तो ब्रजेश ठाकुर मुजफ्फरपुर की कुड़हानी विधानसभा सीट से बिहार पीपुल्स पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा. लेकिन उसे चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा. इतना ही नहीं, उस के बाद भी वह कभी कोई चुनाव नहीं जीत सका.

सन 2004 में मुखिया आनंद मोहन ने अपनी पार्टी का कांग्रेस के साथ विलय कर दिया. इस के बाद ब्रजेश ठाकुर के चुनाव लड़ने के रास्ते बंद हो गए, लेकिन उस की आनंद मोहन से नजदीकी बरकरार रही. साथ ही राजद और जदयू नेताओं के साथ भी उस का उठनाबैठना जारी रहा.

जब आनंद मोहन को गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या में जेल हो गई तो भी ब्रजेश ठाकुर आनंद मोहन से मिलने जेल में जाता रहा. इतना ही नहीं, जबजब आनंद मोहन की जेल बदली गई, ब्रजेश आनंद मोहन के साथ खड़ा दिखा और उसे आर्थिक मदद भी पहुंचाता रहा.

उसी दौरान ब्रजेश ठाकुर ने अपनी सामाजिक संस्था ‘सेवा संकल्प’ और ‘विकास समिति’ की नींव डाल दी थी और दोनों संस्थाएं घुटनों के बल रेंगने लगी थीं. तब तक ब्रजेश ठाकुर की संस्था में मधु की एंट्री हो चुकी थी.

इसी बीच ब्रजेश ठाकुर ने अपने अखबार ‘प्रात:कमल’ का मालिक अपने बेटे राहुल आनंद को बना दिया था. पुलिस के मुताबिक, ब्रजेश ठाकुर खुद अपने अखबार में सिर्फ पत्रकार बन कर रह गया था. इसी दौरान ब्रजेश ठाकुर की किस्मत ने एक नई ऊंचाई को छुआ.

सूत्रों के मुताबिक, सन 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो ब्रजेश ठाकुर ने मुजफ्फरपुर में अपने घर बेटे राहुल आनंद के जन्मदिन की पार्टी दी. इस पार्टी में शामिल होने के लिए उस वक्त के बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पहुंचे थे. ब्रजेश ठाकुर ने यह पार्टी अपना सियासी रसूख दिखाने के लिए आयोजित की थी. इस कार्यक्रम के जरिए उस ने एक तीर से 2 निशाने लगाए थे.

पहला यह कि उस के अखबार को सरकारी विज्ञापन बड़े पैमाने पर मिलते रहें. दूसरा यह कि अपने बेटे राहुल आनंद को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जरिए राजनीति के अखाड़े में उतार सके. इस के बाद प्रात:कमल जैसे अखबार को और ज्यादा सरकारी विज्ञापन मिलने लगे और उसे बिहार सरकार की ओर से मान्यताप्राप्त पत्रकार का तमगा भी मिल गया.

इतना होने के बावजूद ब्रजेश ठाकुर के अंदर का सियासी कीड़ा मरा नहीं था. उस की खुद की सियासी पारी शुरू होने से पहले ही खत्म तो हो गई. ब्रजेश जान चुका था कि राजनीति उस के भाग्य में नहीं है, इसलिए बेटे को इस अखाड़े में उतार दिया. उस ने सन 2016 में बेटे राहुल आनंद को जिला परिषद के चुनाव में कुड़नी से उतार दिया.

बेटे को उतारा राजनीति के मैदान में

चुनाव हुआ और राहुल आनंद ने जीत दर्ज कर ली. बेटे के राजनीतिक संरक्षण से ब्रजेश ठाकुर को बल मिलने लगा, क्योंकि ब्रजेश ठाकुर सेवा संकल्प एवं विकास समिति एनजीओ चलाता था, जिस में बालिका गृह भी था.

बहरहाल, आइए अब सेवा संकल्प की हनीप्रीत कही जाने वाली मधु के जीवन पर रोशनी डालते हैं. कौन है मधु? आखिर वह कैसे ब्रजेश ठाकुर तक पहुंची? उस के भी जीवन की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं है.

37 वर्षीया मधु मुजफ्फरपुर की ही रहने वाली थी. वह ब्रजेश ठाकुर के संपर्क में 17 साल पहले आई थी. उन दिनों मधु की जिंदगी कठिनाइयों के दौर से गुजर रही थी. किशोरावस्था में पिता का साया सिर से उठने के बाद वह अपनी मां के साथ मुजफ्फरपुर के चर्चित चतुर्भुज मोहल्ले में रहने लगी.

यह मोहल्ला रेडलाइट एरिया के नाम से कुख्यात था और आज भी है. उस समय मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज मोहल्ले में औपरेशन उजाला चला था. इस औपरेशन को चलाने वाली प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारी दीपिका सूरी थीं.

दीपिका सूरी एक कड़क अफसर थीं, जिन का नाम मुजफ्फरपुर के लोग आज भी लेते हैं. उन्होंने चतुर्भुज के रेडलाइट एरिया में सुधार के लिए बड़ा काम किया था. प्रशिक्षु आईपीएस ने मोहल्ला सुधार समिति का गठन कराया, जिस में ब्रजेश ठाकुर और मधु सहित 12 लोग सदस्य बने थे.

मोहल्ला सुधार समिति की देखरेख में वहां जागरुकता अभियान चलने लगा. इसी दौरान 90 के दशक में ब्रजेश ठाकुर और मधु करीब आए थे. उन में काफी मधुर संबंध स्थापित हो गए थे. तब ब्रजेश ठाकुर की शादी भी नहीं हुई थी. वह कुंवारा और गबरू जवान था.

मधु बनी खेवनहार

मधु बेहद खूबसूरत और जवान थी तो ब्रजेश ठाकुर भी कम रसिक नहीं था. वह मधु पर मर मिटा था. मधु भी ब्रजेश की दीवानी हो गई थी. फिर क्या था? मधु की मजबूरी और दीवानगी को उस ने कैश करना शुरू कर दिया. मधु को आगे कर के ब्रजेश ने अधिकारियों से गैरकानूनी कई काम कराए और अपनी संस्था और अखबार के लिए पैसे बटोरे.

बाद में जब ब्रजेश की शादी हो गई तो मधु को ले कर उस का पारिवारिक जीवन खतरे में आ गया. मधु की वजह से ब्रजेश ठाकुर और उस की पत्नी के बीच कई बार झगड़े हुए. इस झगड़े के कारण दोनों के संबंधों में दरार आ गई थी. फिर भी ब्रजेश ने उस से संबंध नहीं तोड़ा.

ब्रजेश ठाकुर ने मधु के साथ वफादारी निभाई. आगे चल कर ब्रजेश ठाकुर ने मधु को पहचान दिलाने के लिए चतुर्भुज में ही ‘सेवा संकल्प’ और ‘विकास समिति’ के अलावा वामा शक्ति वाहिनी के नाम से एक और स्वयंसेवी संगठन बनाया और मधु को इस का निदेशक बना दिया.

संगठन का काम चतुर्भुज स्थान में सुधार के कार्य चलाना था. संस्था का उद्देश्य बाजार में बिकने वाली लड़कियों को मुक्त कराना और एड्स को ले कर जागरुकता जैसे कार्यक्रम शामिल थे.

वामा शक्ति वाहिनी की ओर से कई तरह के सामाजिक कार्यक्रम समाज को दिखाने के लिए चलाए जाते थे. लेकिन परदे के पीछे कुछ और ही होता था. संस्था में सिर छिपाने आई पीडि़त और मजबूर लड़कियों को डराधमका और मारपीट कर देहव्यापार के नरक में धकेल दिया जाता था.

बाद में जब राज से परदा उठा और पीडि़त लड़कियों ने अपनी जुबान खोली, तब जा कर पता चला कि यौनशोषण कराने में निदेशिका मधु मुख्य किरदार निभाती थी. इस मामले का परदाफाश होने के बाद मधु भूमिगत हो गई. उस का अब तक पता नहीं चला कि वह जिंदा भी है या उस के साथ कोई अनहोनी घट चुकी है.

अगर जिंदा है तो कहां है, क्योंकि ब्रजेश ठाकुर के सारे बुरे कामों की एकलौती राजदार वही है. वही गलत धंधे से कमाई गई दौलत का हिसाबकिताब रखती थी. मधु के गिरफ्तार होते ही ब्रजेश ठाकुर के चेहरे से कई नकाब उतर जाएंगे, जिस पर उस ने मुखौटा चढ़ा रखा है.

बहरहाल, 25 जून, 2018 को 22 बच्चियों के बयान कोर्ट में दर्ज कराए गए. बच्चियों ने कोर्ट के समक्ष बयान देते हुए बताया कि जब वह गलत काम करने के लिए तैयार नहीं होती थीं तो उन के साथ मारपीट की जाती थी. उन्हें नशीली दवाएं खिला कर उन के साथ दुष्कर्म किया जाता था. पीडि़ताओं ने बताया कि मंगलवार का दिन उन के लिए बेहद यातना भरा होता था. उस दिन बड़े सर का कहर उन पर आफत बन कर टूटता था.

इस बाबत पुलिस पहले ही अपनी जांच कर चुकी थी. जांच के दौरान पता चला कि सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा को ही बड़े सर के नाम से जाना जाता था. दिलीप के अलावा समाज कल्याण विभाग का अधिकारी रवि रोशन और विकास कुमार भी बालिका गृह में मुंह काला करने आते थे. पीडि़त किशोरियों ने उन के फोटो देख कर उन्हें पहचान भी लिया.

बालिका गृह रेप कांड बड़ा मामला बन गया था. इस कांड में बड़ेबड़े सफेदपोश नेता और पुलिस अधिकारियों के नाम उछलने लगे थे. मामले में बड़े लोगों के संलिप्त होने की वजह से लोगों को सिविल पुलिस की निष्पक्ष जांच पर अंदेशा था, इसलिए इस केस की जांच सीबीआई से कराए जाने के लिए 3 जुलाई, 2018 को कोर्ट में एक याचिका दायर की गई. 9 जुलाई, 2018 को पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार से इस मामले में जवाब मांगा.

19 जुलाई को पटना कोर्ट में बच्चियों की पेशी हुई. उस दौरान कोर्ट के सामने एक बच्ची ने बयान दिया कि बालिका गृह में एक किशोरी के साथ बलात्कार किया गया. उस के बाद उस की हत्या कर दी गई और लाश बालिका गृह में ही दफना दी गई. बच्ची के सनसनीखेज बयान के बाद मामला और गरमा गया.

इस के बाद विपक्षियों ने हंगामा खड़ा किया. सच्चाई का पता लगाने के लिए अगले दिन पोक्सो कोर्ट ने साहू रोड स्थित बालिका गृह में मृत किशोरी के शव की खोज के लिए जमीन खोदने का आदेश दिया. 5 फीट गहरी खुदाई की गई लेकिन शव कहीं नहीं मिला. यही नहीं यह मामला संसद में भी उठा.

शुरू हुई सीबीआई जांच

24 जुलाई को लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर बिहार सरकार चाहे तो हम सीबीआई जांच के लिए तैयार हैं. 26 जुलाई को बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ने इस मामले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश की. केंद्रीय गृहमंत्री  ने बिहार सरकार की सिफारिश मंजूर कर ली और घटना की जांच के लिए सीबीआई को हरी झंडी दे दी.

28 जुलाई, 2018 को आईजी (जोन) सुनील कुमार और डीआईजी अनिल कुमार सिंह ने बालिका गृह का निरीक्षण किया. इस दौरान डीएसपी (सिटी) आनंद कुमार मुकुल, महिला थानाप्रभारी ज्योति कुमारी के साथ अन्य पुलिस पदाधिकारी मौजूद थे. आईजी के निरीक्षण के क्रम में ही एफएसएल व मैडिकल टीमें भी वहां पहुंचीं.

वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य एकत्रित करने के लिए पहुंची एफएसएल टीम ने पहले बारीकी से कमरे का निरीक्षण किया. इस के बाद किशोरियों के बैड सहित बालिका गृह के सभी कमरों में लगे बैड की चादर, गद्दों के साथ ही अन्य कपड़ों के दाग पर कैमिकल लगा कर जांच की.

इस के बाद दागधब्बे युक्त चादर, तौलिए, तकियों के खोल आदि को जब्त कर लिया. यही नहीं, एफएसएल टीम ने कमरे में मौजूद हैंगर पर लटके कपड़ों की भी कैमिकल लगा जांच की. वहां मौजूद बरतन और ग्लासों को भी जांच के दायरे में लाया गया. पूरी जांचपड़ताल की फोटो व वीडियोग्राफी भी कराई गई.

29 जुलाई को सीबीआई की टीम पटना पहुंची. टीम का नेतृत्व एसपी जे.पी. मिश्र कर रहे थे. पटना पहुंच कर उन्होंने एक नया मुकदमा आरोपियों के खिलाफ दायर किया. बालिका गृह मामले की कमान संभालते ही सीबीआई टीम 30 जुलाई की शाम 4 बजे साहू रोड पहुंची. एसपी जे.पी. मिश्रा खुद टीम का नेतृत्व कर रहे थे. उन के साथ केस की जांच अधिकारी इंसपेक्टर विभा कुमारी, इंसपेक्टर राजेश कुमार, ए.के. सिन्हा सहित अन्य अधिकारी भी थे.

31 जुलाई को रामदयालु स्थित सीबीआई कैंप कार्यालय में सुबह 11 बजे जांच अधिकारी ज्योति कुमारी पहुंचीं. सीबीआई की पूरी टीम की मौजूदगी में उन्होंने केस से जुडे़ जब्त किए गए सारे दस्तावेज सीबीआई के हवाले कर दिए. उस में 23 जुलाई को जब्त किए गए स्टाफ रजिस्टर, उपस्थिति पंजिका, मीटिंग रजिस्टर, और्डर रजिस्टर, डोनेशन रजिस्टर 2017, डिसपोजल रजिस्टर, गर्ल्स ट्रेनिंग रजिस्टर, आगंतुक रजिस्टर, फोन डायरेक्टरी, 11 फोटोग्राफ सहित कई सामान शामिल थे.

उस के बाद सीबीआई ने बालिका गृह के खुले कमरों को देखा. टीम के सदस्यों ने ब्रजेश के आवास, प्रिंटिंग प्रैस व बालिका गृह के कमरे की हर एंगल से फोटोग्राफी कराई. एसपी जे.पी. मिश्र ने ब्रजेश के घर का बाहर से निरीक्षण करते हुए अखबार के प्रिंटिंग कक्ष के पास बारीकी से पूरे भवन का मुआयना किया. प्रिंटिंग कक्ष में 3 सीढि़यां देख कर चौंक गए. उन्होंने बालिका गृह की बिल्डिंग पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह जेल की तरह दिखता है.

सीबीआई जांच में खुलते गए राज सीबीआई ने करीब एक घंटे तक बालिका गृह का निरीक्षण किया और स्थानीय लोगों को बुला कर पूछताछ भी की. उन से ब्रजेश के बारे में हर प्रकार की जानकारी ली. एसपी ने खुद गली में पैदल घूम कर हर मकान में रहने वाले लोगों की जानकारी ली. जिस जगह पर खुदाई की गई थी, उस जगह की भी सीबीआई ने जांच की.

सीबीआई जांच से कई चौंकाने वाले राजों से परदा उठ गया. जांच के दौरान पता चला कि बालिका गृह चलाने वाली संस्था सेवा संकल्प व विकास समिति को पिछले 5 सालों में 60 लाख रुपए समाज कल्याण विभाग की ओर से मिले थे.

यह राशि बालिका गृह में रहने वाली लड़कियों के भोजन, उन के वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई के मद में दिए गए. हालांकि टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की सोशल औडिट रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि यहां रह रही किशोरियों के लिए वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं थी. भोजन की गुणवत्ता भी ठीक नहीं थी.

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, संस्था को हर साल 12 लाख रुपए भोजन, वोकेशन कोर्स चलाने और शिक्षा के मद में दिए जाते थे. समाज कल्याण विभाग से 1 लाख रुपए का फंड हर महीने जाता था. बालिका गृह में वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई के लिए सरकार से फंड दिए जाने का प्रावधान है. बच्चियों ने भी महिला आयोग के सामने बयान दिया था कि वहां पढ़ाई, कोर्स और खाने की व्यवस्था नहीं थी. एनजीओ ने हर महीने बच्चियों की संख्या 50 बता कर सरकार से पैसे लिए, जबकि यहां कुल 44 बच्चियां ही रहती थीं.

बाल संरक्षण के निदेशक देवेश शर्मा ने बताया कि एनजीओ सेवा संकल्प को हर महीने 1 लाख रुपए दिए जाते थे. यह राशि 50 बच्चियों के हिसाब से जोड़ कर दी जाती थी. एक बच्ची पर खर्च के लिए सरकार ने 2 हजार रुपए तय किया था.

विभागीय नियम के अनुसार 2 हजार में से 200 रुपए एनजीओ को अपनी तरफ से खर्च करने होते हैं. बाद में ये 200 रुपए भी हिसाब के समय सरकार की तरफ से ही जोड़ लिए जाते हैं यानी संस्थान का एक पैसा भी खर्च नहीं होता.

खैर, मामले की जांच सीबीआई कर रही है. सीबीआई ने जांच के दौरान पाया कि ब्रजेश ठाकुर के एक मंत्री और 2 आईएएस अफसरों से गहरे ताल्लुकात हैं, जिन्होंने ब्रजेश के सारे गलत कामों में अहम भूमिका निभाई थी. वे भी सीबीआई के रडार पर आ गए हैं.

जांच के दौरान ब्रजेश ठाकुर की संस्था को दिए जाने वाले सरकारी फंड को रोक दिया गया. उस के अखबार प्रात:कमल के सरकारी विज्ञापन पर भी रोक लगा दी गई यहां तक कि अखबार की मान्यता भी समाप्त कर दी गई. पुलिस फरार चल रहे सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा और मधु की तलाश में जुटी हुई है. दोनों आरोपी अभी भी पुलिस गिरफ्तार से बाहर है.

वहीं जेल में बंद समाज कल्याण विभाग के बाल संरक्षण अधिकारी रवि रोशन की जमानत याचिका को पोक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश आर.पी. तिवारी ने 7 अगस्त, 2018 को खारिज कर दिया. रवि रोशन ने अपने वकील के माध्यम से एक पूरक आवेदन कोर्ट में डाला था. जिस में उस ने कहा था कि कार्बन डेटिंग पद्धति से केस डायरी और अन्य रिपोर्ट की जांच होनी चाहिए.

वहीं बच्चियों की मैडिकल जांच रिपोर्ट भी रेप की पुष्टि नहीं करती है. बाल संरक्षण अधिकारी ने यह भी कहा कि मुझे फंसाने के लिए थानाप्रभारी ज्योति कुमारी ने बच्चियों के बयान के साथ डायरी की रिपोर्ट में छेड़छाड़ की है, मैं निर्दोष हूं.

उधर 13 अगस्त को खुदीराम बोस केंद्रीय कारागार में हुई सीबीआई छापेमारी के दौरान बालिका गृह कांड में गिरफ्तार हुए ब्रजेश ठाकुर के पास से बरामद 3 पर्चियों से मिले नंबर से पुलिस ने एक नेता को खोज निकाला है. पटना के अनीसाबाद में नेताजी का ठिकाना है. पर्ची में लिखे सभी नंबरों की काल डिटेल्स पुलिस निकाल रही है. पुलिस इस बात का पता कर रही है कि ब्रजेश ने किस नंबर से जेल में रहते हुए नेता से संपर्क किया था.

इतना ही नहीं, नेता के अलावा और किनकिन नंबरों पर उस ने फोन किया, यह जांच से पता चल सकेगा. जेल से मिले पन्ने पर लेनदेन का जिक्र होने के बाद राहुल से जमीन की बिक्री के बारे में सीबीआई जानकारी लेगी. इस के अलावा ब्रजेश और सेवा संकल्प एवं विकास समिति के खातों के बारे में सीबीआई जानकारी जुटा रही है.

इस मामले में समाज कल्याण विभाग की पूर्वमंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा का नाम आने के बाद सीबीआई का मंत्री दंपति पर लगातार शिकंजा कसता जा रहा है. बेगूसराय के चेरियाबरियापुर थाने में मंजू वर्मा और उन के पति चंद्रशेखर वर्मा के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है.

बेगूसराय स्थित चेरिया बरियापुर के अर्जुन टोला स्थित उन के घर से सीबीआई ने 17 अगस्त को 50 जिंदा कारतूस समेत अन्य सामान बरामद किए थे.

सीबीआई ने 19 अगस्त को मंजू वर्मा और चंद्रशेखर वर्मा के खिलाफ चेरियाबरियापुर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

बहरहाल, कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया जा चुका था. बालिका गृह रेप कांड की आगे की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी थी. अब देखना यह है कि जांच में कौनकौन से चेहरे बेनकाब होने वाले हैं.

– कथा में पीड़ितों के नाम परिवर्तित हैं. कथा पुलिस सूत्रों, समाचारपत्रों और जनचर्चाओं पर आधारित

एसडीएम का अनोखा फरमान, जो आप को हैरान कर देगा

न्यू क्लियर फैमिली में जहां एक ओर व्यक्ति खुद को आजाद समझ कर अपना जीवन अपने तरह से जीता है तो वहीं इस तरह की फैमिली में कई तरह की समस्याएं भी आती हैं. जो दंपति उन समस्याओं का आपसी समझदारी और सामंजस्य से समाधान नहीं कर पाते, उन दंपतियों के बीच छोटीछोटी बातों को ले कर पैदा हुआ विवाद बढ़ जाता है. अगर इस बीच उन का ईगो या अहं टकराता है तो विवाद देहरी लांघ कर न्यायालय तक पहुंच जाता है.

ऐसे में परिवार टूटने में देर नहीं लगती. सहनशीलता के अभाव और ईगो के टकराने की वजह से अदालतों में पारिवारिक विवादों की संख्या बढ़ती जा रही है. लेकिन भोपाल के एक मजिस्ट्रैट ने एक अनोखी पहल कर के एक परिवार को टूटने से ऐसे बचाया कि उस की खूब चर्चा हो रही है.

दरअसल, हुआ यह कि भोपाल के रहने वाले एक दंपति पवन और मनीषा के बीच एक मामूली सी बात को ले कर आपस में विवाद रहता था. पति को शिकायत यह थी कि उस की पत्नी 2-2 घंटे तक अपने रिश्तेदारों से फोन पर बतियाती रहती है. और यदि खाना बनाते समय उस के रिश्तेदार का फोन आ जाए तो वह खाना बनाना तक छोड़ देती है.

पवन ने इस बात का पत्नी से विरोध किया तो मनीषा को यह बात बुरी लगी. उधर मनीषा का पवन पर यह आरोप था कि पता नहीं पवन काफीकाफी देर तक फोन पर किस से बात करते हैं और यह बताते तक नहीं कि किस से बतियाते हैं.

दोनों में से किसी ने भी अपनी हठ नहीं छोड़ी. लिहाजा उन का मामला एसडीएम राजकुमार खत्री की अदालत में पहुंच गया.

दंपति ने मजिस्ट्रैट से कहा कि घर के हालात ऐसे हो गए हैं कि वे एक साथ नहीं रह सकते. एसडीएम राजकुमार खत्री ने दंपति की लगातार काउंसलिंग करते हुए समझाया कि जेल जाने के बाद परिवार के टूटने की आशंका बढ़ जाएगी. इतना समझाने के बावजूद दोनों अपनीअपनी जिद पर अड़े रहे.

तब एसडीएम ने दंपति के सामने यह शर्त रखी कि उन के मामले में काररवाई तभी की जाएगी, जब दोनों घर से एक साथ एक ही गाड़ी में बैठ कर कोर्ट आएंगे. उन्हें 11 बजे से शाम 5 बजे तक कोर्ट के बाहर ही रहना होगा. इस के बाद वे शाम को भी साथसाथ ही घर जाएंगे. इस दौरान दोनों में से किसी के पास भी मोबाइल फोन नहीं होना चाहिए.

3 दिनों तक दोनों ने ऐसा ही किया. उन 3 दिनों के दौरान पवन और मनीषा के व्यवहार में जमीनआसमान का सुधार आ गया. उन के पास मोबाइल फोन न होने पर मजबूरी में उन्होंने एकदूसरे से बातें करनी शुरू कर दीं. अब उन्हें महसूस हुआ कि मोबाइल से बढ़ कर भी उन की जिंदगी में बहुत कुछ है.

चौथे दिन पवन और मनीषा कोर्ट नहीं पहुंचे बल्कि उन्होंने एसडीएम को अपनी सेल्फी भेज कर कहा कि उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है. दोनों अब साथसाथ रहेंगे. पवन ने कहा कि आज वह पत्नी का बर्थडे सेलिब्रेट कर रहा है.

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