कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता. एक न एक दिन उस का भंडाफोड़ हो ही जाता है. बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बालिका संरक्षण गृह में बालिकाओं के शोषण की घटना इस का ताजा उदाहरण है. अगर टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज (टिस) की टीम वहां नहीं जाती तो पता नहीं वहां बालिकाओं के साथ शोषण कब तक और चलता.

बात फरवरी, 2018 की है. मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की इकाई ‘कोशिश’ ने मुजफ्फरपुर जिले के ‘सेवा संकल्प समिति’ के बालिका संरक्षण गृह का औडिट किया. इस संरक्षण गृह में 44 लड़कियां रहती थीं. औडिट के दौरान टीम ने पाया कि संरक्षण गृह का रखरखाव सही नहीं है और वहां रह रही बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है. दुर्व्यवहार ही नहीं, बल्कि टीम को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की शिकायतें भी मिलीं.

औडिट करने के बाद टिस ने अपनी रिपोर्ट समाज कल्याण विभाग को सौंप दी. इस से पहले नवंबर 2017 में ‘कोशिश’ के स्टेट कोआर्डिनेटर कायम मासूमी, सुनीता बिस्वास और आसिफ इकबाल इसी बालिका गृह में आए थे. तब यहां डरीसहमी बालिकाओं ने टीम के सदस्यों को बताया था कि उन का दैहिक शोषण किया जाता है. टिस ने अपनी औडिट रिपोर्ट में बालिकाओं की उसी पीड़ा का उल्लेख किया था.

टिस की सनसनीखेज रिपोर्ट पढ़ कर समाज कल्याण विभाग के निदेशक देवेश शर्मा उछल गए. उस औडिट रिपोर्ट में कुछ ऐसा उल्लेख किया गया था कि उसे जो भी पढ़ता, चौंके बिना नहीं रह पाता. टिस ने अपनी औडिट रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि मुजफ्फरपुर बालिकागृह में रह रही 44 लड़कियों में से 42 की मैडिकल जांच कराए जाने पर उन में से 34 लड़कियों के साथ दुष्कर्म किए जाने की पुष्टि हुई है.

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