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इमरान खान : कट्टरपंथी देश का इश्किया प्रधानमंत्री

बुशरा मनेका ठीक वैसे ही सौंदर्य की स्वामिनी हैं, जैसी 60 के दशक की भारतीय अभिनेत्रियां नरगिस और मधुबाला हुआ करती थीं. सांचे में ढला बदन, लंबी नाक, मासूम बोलता चेहरा, बड़ीबड़ी आंखें और पतली कमर पर झूलते बाल. इस के अलावा भी वह उन तमाम सौंदर्य के पैमानों पर खरी उतरती हैं, जो साहित्यकारों, दर्शनशास्त्रियों और विश्लेषकों ने गढ़ रखे हैं. बहुत संक्षिप्त में कहें, तो संगमरमर की मूर्ति या जीवित ताजमहल.

बुशरा बीती 16 अगस्त को 40 की हो चुकी हैं, लेकिन 5 बच्चों की मां बनने के बाद भी इतनी उम्र की लगती नहीं हैं. कहीं से रत्ती भर उम्र उन की खूबसूरती पर हावी नहीं हो पाई है. पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री और अपने वक्त के मशहूर क्रिकेटर इमरान खान के उन पर मर मिटने की दूसरी वजहें भी थीं, जिन्होंने बुशरा को उन की तीसरी बीवी होने की इज्जत बख्शी थी.

साल 2018 का पहला दिन ही एक सनसनाती खबर ले कर आया था कि इमरान ने बुशरा मनेका से शादी कर ली. सुनने वालों या इमरान खान को जानने वालों के लिए यह कतई हैरानी की बात नहीं थी. लेकिन दिक्कत यह थी कि खुद इमरान ने इस खबर का खंडन करते हुए इसे मीडिया द्वारा फैलाई गई अफवाह बताया.

इमरान खान के साथसाथ क्रिकेट और पाकिस्तानी राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों ने इस खबर को होल्ड पर रख दिया था. जनवरी का पूरा महीना और फरवरी 2018 के पहले पखवाड़े तक इमरान और बुशरा की शादी की खबर रुकरुक कर आती रही तो आम और खास लोगों ने मन ही मन मान लिया कि शादी की खबर तो पक्की है, जिसे इमरान नहीं मान रहे हैं तो इस की एक बड़ी वजह साल के मध्य में होने वाले आम चुनाव हो सकते हैं. क्योंकि पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी यानी पीटीआई के मुखिया इमरान प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश हो चुके थे.

ऐसे में शादी की अटकलें उन की इमेज बिगाड़ रही थीं, इसलिए फरवरी के तीसरे हफ्ते में खुद पीटीआई के प्रवक्ता फराद चौधरी ने मान ही लिया कि इमरान खान तीसरी शादी के बंधन में बंध चुके हैं.

शादी या टोटका

थोड़ी हैरानी और तमाम चर्चाओं के बाद बात आईगई हो गई. हर किसी ने मान लिया कि इमरान की तो आदत बन गई है, पहले शादी करने और फिर बीवी के छोड़ कर चले जाने को सहज ढंग से लेने की. सभी ने बुशरा मनेका से हमदर्दी रखते हुए इमरान खान की पहली 2 पत्नियों जेमिमा मार्सले गोल्ड स्मिथ और रेहम खान को याद किया.

तीसरी शादी कैसे इमरान के प्रधानमंत्री बनने की वजह बनी, यह बात बताती है कि इमरान खान बहुत ज्यादा अंधविश्वासी हैं. वह जादूटोनों और गंडाताबीजों में आम पाकिस्तानियों जैसा ही भरोसा करते हैं. अब पाकिस्तान का भविष्य क्या होगा, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है, जिस की तह में जाने के लिए बुशरा के बारे में जानना जरूरी है.

बुशरा मनेका दरअसल एक पीर हैं. पढ़ेलिखे लोग भले ही उन्हें आध्यात्मिक गुरु कहते रहें लेकिन हकीकत में वे एक ज्योतिषी और भविष्यवक्ता हैं. साथ ही जादूटोना वगैरह की रूहानी ताकत उन्हें सीधे ऊपर से यानी प्रकृति से मिली हुई है.

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के पाकपट्टन जिले में जन्मी बुशरा की पहली शादी बहुत कम उम्र में खाबर फरीद मनेका से हुई थी. खाबर कस्टम विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं. उन से बुशरा को 5 बच्चे हुए, लेकिन फिर तलाक हो गया. तब बुशरा इस्लामाबाद में रहती थीं.

लाहौर के एचिसन कालेज से ग्रैजुएट बुशरा का तलाक के बाद अध्यात्म में रुझान हो गया और वे आध्यात्मिक बातें करने लगीं. अध्यात्म में तो आजकल कोई दिलचस्पी नहीं लेता बुशरा मशहूर हुईं अपनी भविष्यवाणियों और ज्योतिष से. इसी के चलते उन के इर्दगिर्द बच्चा चाहने वालों से ले कर तबादला कराने वालों और कुरसी के ख्वाहिशमंदों तक की भीड़ जमा होने लगी.

देखते ही देखते बुशरा का धंधा और नाम दोनों चल निकले और लोग श्रद्धा से उन्हें पिंकी बीबी और बुशरा बीबी बुलाने लगे. दौलत खुदबखुद चल कर उन के पास आने लगी, पर शोहरत उतनी नहीं हुई थी जितनी वे चाहती थीं.

फिर एक दिन ऊपर वाले ने उन की फरियाद सुन ली और इमरान खान उन के दरबार में जा पहुंचे. यह महज इत्तफाक की बात थी, लेकिन इस के बाद जो हुआ वह इत्तफाक नहीं बल्कि एक साजिश भरा ड्रामा लगता है. साल 2015 में लोधरन में एनए-154 सीट के लिए उपचुनाव था, जिस में इमरान अपनी पार्टी पीटीआई के उम्मीदवार जहांगीर तरीन के लिए चुनाव प्रचार कर रहे थे. यहीं दोनों की पहली मुलाकात हुई.
इमरान ने बुशरा के बारे में सुना और उन से हारजीत के बारे में पूछा. इस पर बुशरा ने उन के उम्मीदवार की जीत की भविष्यवाणी कर दी, जो सच साबित हुई. तभी से इमरान बुशरा के आध्यात्मिक ज्ञान के मुरीद हो गए. तब तक उन्होंने बुशरा की सूरत नहीं देखी थी, क्योंकि वे बुरके में रहती थीं और सिर पर हैट लगाती थीं.

बुशरा के किरदार की तरह उन की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी कम दिलचस्प नहीं, जो उन्हें महत्त्वाकांक्षी बनाती है. उन के पहले पति खाबर फरीद मनेका के पिता यानी उन के ससुर गुलाम फरीद मनेका पाकिस्तान सरकार में मंत्री रह चुके हैं और खुद बुशरा पंजाब के प्रतिष्ठित रियाज वट्टू वंश से ताल्लुक रखती हैं. उन की बड़ी बेटी मेहरू पंजाब प्रांत के सांसद मियां अट्टा मोहम्मद मानिका की बहू है.

ऐसे बनी बुशरा की आध्यात्मिक छवि

अपने वक्त के मशहूर पंजाबी सूफी गुरु गुलाम फरीद की कविताएं पढ़ कर बुशरा प्रसिद्ध होने लगीं. साथ ही उन की एक चमत्कारिक छवि भी स्थापित हो गई. लेकिन बुशरा महज इतने से संतुष्ट नहीं थीं कि ताबीज बांटती रहें, भभूत देती रहें या फिर नीचे वालों की दुआएं कबूल होने के लिए ऊपर वाले को फारवर्ड करती रहें.

जो वह चाहती थीं वह उन्हें इमरान से मिला. जहांगीर तरीन की जीत ने इमरान का भरोसा उन पर पुख्ता कर दिया. यह वह वक्त था, जब इमरान के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बनने को लेकर चर्चा तो होती थी, लेकिन एक हिचकिचाहट के साथ.

एक दिन बुशरा ने इमरान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने का टोटका बताया कि वह उन से शादी कर लें तो बात बन जाएगी. लोकतांत्रिक इतिहास में शायद ही कभी किसी आध्यात्मिक गुरु ने ऐसा अनूठा रास्ता किसी राजनेता को बताया हो और राजनेता ने उस पर अमल भी किया हो. पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बन जाने के लिए यह शर्त आकर्षक थी जिस में कुरसी मिलने की गारंटी भले ही नहीं थी, लेकिन एक निहायत ही खूबसूरत संगमरमरी हसीना गारंटेड मिल रही थी. लिहाजा इमरान न नहीं कह सके.

3 साल की मेलमुलाकातों के बाद आखिर बुशरा इमरान की तीसरी बीवी बन कर उन के घर आ गईं. शादी उन के भाई के घर पर हुई उस वक्त वे बुरके में ही थीं और इमरान पठानी सलवारसूट में थे.

सुर्ख गुलाबी रंगत के चेहरे वाले 65 वर्षीय इमरान को देख तब सहज ही लगा था कि औरतों की नजाकत और खूबसूरती पर तो खूब लिखा गया है, लेकिन जाने क्यों मरदाना कशिश पर कलम कम ही चलाई गई. बुशरा से शादी करने के पहले 2 बीवियों को तलाक दे चुके इमरान खान के चेहरे पर नए दूल्हों जैसी ही हया थी, तब भी वे एक मुकम्मल मर्द या हीमैन कुछ भी कह लें, लग रहे थे.

बुशरा की भविष्यवाणी का पंजाब प्रांत पर वाजिब असर पड़ा और पीटीआई ने यहां से उम्मीद के मुताबिक सीटें हासिल कीं जिस की वजह से 18 अगस्त को इमरान खान ने पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री की शपथ ली.

इमरान के दांपत्यों की दिलचस्पी किसी रोमांटिक उपन्यास से कम नहीं है. लोगों की यह आशंका सच साबित हई कि पहली शादी तो जैसेतैसे 9 साल चल गई थी और दूसरी 10 महीने तक घिसटी थी. कहीं ऐसा न हो कि तीसरी का अंजाम इस से भी कम दिनों का हो.

3-4 महीनों में ही बुशरा इमरान का घर छोड़ कर अपने घर वापस चली गईं. दूसरे पति से अलगाव की वजह पालतू कुत्ते थे जो उन की आध्यात्मिक राह में भौंकभौंक कर रोड़े अटकाते थे. इमरान खान पर तीसरी बीवी के भी चले जाने का कोई असर क्यों नहीं हुआ और कैसे वे अपनी पत्नी के आशीर्वाद से प्रधानमंत्री बने, यह बात अब समझ में आने लगी है. दरअसल यह एक धार्मिक पाखंड था, जिस के चलते लोग पीटीआई को वोट करें. सिर्फ कुत्तों की वजह से बुशरा इमरान का घर छोड़ कर गई थीं, यह भी पूरा सच नहीं है. कहा यह भी गया कि इस अलगाव की जड़ में इमरान की बहनें भी थीं.

सच जो भी हो, लेकिन इस अलगाव ने इमरान की पहली 2 शादियों और बीवियों के इश्क के किस्सों की याद ताजा कर दी, जिस से नए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का एक अलग ही चेहरा बेनकाब होता है. साथ ही यह भी साबित करता है कि इमरान वाकई एक रोमांटिक शख्सियत के मालिक हैं और पूरी शिद्दत से इश्क फरमाते रहे हैं. इमरान खान के इश्किया किस्से जातपांत धर्म और सीमाओं से परे हैं.

रेहम की मजबूरी या तेवर

एक तरफ जहां बुशरा को इमरान के लिए लकी लेडी के तौर पर जाना जाता है तो दूसरी तरफ उन की दूसरी पत्नी रेहम खान ने इमरान का जीना दूभर कर दिया था. अब उन के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वह उन के खिलाफ जहर उगलना नहीं छोड़ रही हैं.

रेहम की मानें तो इमरान अव्वल दरजे के अय्याश शख्स हैं. शुक्र तो इस बात का रहा कि रेहम ने सीधेसीधे इमरान को औरतखोर मर्द नहीं कहा. जब पाकिस्तान में चुनाव प्रचार शवाब पर था तब रेहम तरहतरह से इमरान के खिलाफ जहर उगल रही थीं, जिस से एक बार लगने भी लगा था कि इमरान का प्रधानमंत्री बनने का सपना शायद ही पूरा हो पाए.

लेकिन रेहम इमरान की छवि जरूरत से ज्यादा बिगाड़ नहीं पाईं, जिस से साबित होता है कि एक पिछड़े देश में जहां धर्म के नाम पर सेना की हुकूमत चलती हो, वहां के लोग आलोचनाओं और प्रशंसा में कोई खास फर्क नहीं करते. पाकिस्तानी समाज में खुलेआम प्यार करना किसी गुनाह से कम नहीं माना जाता, ऐसे में इमरान खान की जीत बताती है कि वोटर ने उन की व्यक्तिगत छवि से कोई वास्ता नहीं रखा.
रेहम खान की पहली शादी महज 19 साल की उम्र में पेशे से मनोचिकित्सक अपने कजिन एजाज रहमान से हुई थी. रेहम का परिवार 60 के दशक में लीबिया जा बसा था, लेकिन उस का पाकिस्तान से नाता नहीं टूटा था. खूबसूरत रेहम पेशावर के जिन्ना कालेज फार वूमेन में पढ़ी थीं. संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि वाली रेहम की रुचि पत्रकारिता में थी और वह बीबीसी पर मौसम का हाल सुनाती थीं.

महत्त्वाकांक्षी होने के साथसाथ रेहम प्रतिभाशाली भी थीं. उन की उर्दू के साथसाथ अंगरेजी पर भी अच्छी पकड़ थी. एजाज से शादी कर के उन्होंने एक गृहिणी की तरह रहना चाहा और इस बाबत कोशिश भी की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाईं. 3 बच्चों की मां रेहम को उस वक्त जिंदगी की हकीकत से सामना करना पड़ा, जब एजाज ने उन्हें तलाक दे दिया. रेहम का यह फलसफा रहा है कि औरत को मर्द से दबना नहीं चाहिए.

पाकिस्तान में तलाक की कोई घोषित या वैधानिक वजह होना अनिवार्य नहीं है, इसलिए कोई भी अंदाजा नहीं लगा पाया कि एजाज ने रेहम को तलाक क्यों दिया. जहां तलाक पति की इच्छा से होता हो वहां औरतों की दुर्दशा क्या होती होगी, इस का सहज अंदाजा रेहम को देख कर लगाया जा सकता था.
रेहम हालात से हार मानने वाली महिलाओं में से नहीं थीं. उन्होंने कई मीडिया संस्थानों में काम किया लेकिन पहचानी वह बीबीसी से गईं. पाकिस्तान के कई चैनल्स पर उन्होंने काम किया और एक टीवी पत्रकार और शो मेकर के रूप में अच्छा नाम और पैसा कमाया. 2 पाकिस्तानी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया.

इमरान खान से उन की शादी जनवरी 2015 में हुई थी, लेकिन महज 10 महीनों में ही नौबत तलाक तक जा पहुंची थी. अक्टूबर 2015 में दोनों का तलाक हो गया और रेहम एक बार फिर बेघर हो गईं.
इस बार तलाक क्यों हुआ, इस बाबत रेहम ने कुछ छिपाया नहीं. तलाक के बाद उन्होंने एक बयान में कहा था कि इमरान खान शादी निभाना नहीं जानते. वे अच्छे क्रिकेटर और राजनेता हो सकते हैं, लेकिन वे एक अच्छे लाइफ पार्टनर नहीं बन सकते.

बात यहीं खत्म नहीं हुई थी, वजह यह कि तलाक के बाद रेहम को पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था, क्योंकि उन्हें कथित तौर पर धमकियां मिल रही थीं. इस में कोई शक नहीं कि टीवी पत्रकार के रूप में उन की पहचान सिमटी हुई थी, जिसे विस्तार इमरान से शादी और तलाक के बाद मिला. हालांकि यह अप्रिय था लेकिन रेहम के हिस्से में स्वाभाविक तौर पर शोहरत आई, क्योंकि वह इमरान खान की पत्नी थीं.

रेहम ने उगला जहर

चुनाव प्रचार के दौरान रेहम ने इमरान के बारे में जो कहा, उसे देख लगता नहीं कि महज 10 महीने के वैवाहिक जीवन में वे इमरान के बारे में इतना जानने लगी होंगी या उन्हें इतना समझने लगी होंगी, जितना कि वे दावा कर रही थीं.

अपनी किताब जिस का शीर्षक उन के नाम का ही है. ‘रेहम खान’ में रेहम ने इमरान के खिलाफ जो जहर उगला, उसे देख लगता है कि रेहम किसी भी कीमत पर इमरान को इतना बदनाम कर देना चाहती थीं कि वह जीत न पाएं. बकौल रेहम, इमरान के 5 नाजायज बच्चे हैं, जिन में से कुछ भारतीय भी हैं. इस आत्मकथा में रेहम ने इमरान को खुले तौर पर अय्याश और ड्रग एडिक्ट बताया है. उन्होंने यह भी कहा कि वह कोकीन और हेरोइन जैसी ड्रग्स के आदी हैं.

बुशरा से शादी करने के बाद इमरान की छवि एक धार्मिक व्यक्ति की बन रही थी, इस पर प्रहार करते रेहम ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि इमरान कुरान तक का पाठ नहीं करते और इतने अंधविश्वासी हैं कि काले जादू में विश्वास करते हैं. एक बार तो एक पीर की सलाह पर उन्होंने अपने पूरे शरीर पर काली दाल लगा ली थी.

इमरान अंधविश्वासी हैं, इस में कोई शक नहीं. यह बात तब भी उजागर हुई थी जब बुशरा की सलाह पर उन्होंने 2015 से लेकर 2018 की गर्मियां पहाड़ी इलाकों में गुजारी थीं.

रेहम की जिंदगी का अधिकतर वक्त पाकिस्तान से बाहर गुजरा है, इसलिए वे अंदाजा नहीं लगा पाईं कि इमरान को अंधविश्वासी बता कर वे उन का प्रचार ही कर रही हैं. वजह पाकिस्तान के अधिकतर लोग गंडाताबीज और जादूटोने की गिरफ्त में हैं. ऐसे में उन्हें इसी मिजाज का प्रधानमंत्री मिल जाए तो बात सोने पे सुहागा जैसी हो जाती है. बात अकेले पाकिस्तान की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की हालत यही है कि उन्हें एक धार्मिक और अंधविश्वासी इमेज वाला मुखिया चाहिए होता है.

रेहम की कोशिशें वैसी ही थीं जैसी एक शेर के सामने बिल्ली की रहती है. लाख कोशिशों के बाद भी वह इमरान का कुछ नहीं बिगाड़ पाईं तो इस की एक बड़ी वजह उन के बयानों और किताबों में अतिशयोक्ति का होना भी था.

पीटीआई की जीत के बाद रेहम ने इमरान के राजनैतिक भविष्य का आकलन भी यह कहते हुए किया कि इमरान अब तक पाकिस्तान के हीरो थे, पर अब आइटम नंबर बन कर रह जाएंगे, क्योंकि उन्हें चलाने वाले लोग दूसरे यानी फौज के होंगे.

रेहम का यह भी कहना है कि इमरान बहुत ज्यादा दिनों तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नहीं रह पाएंगे और जब उन की कुरसी जाएगी तो इज्जत भी चली जाएगी. इमरान ने धर्म के नाम पर वोट मांगे हैं, जबकि निजी जिंदगी में वे कतई धार्मिक नहीं हैं.

एकाएक आलोचना से राजनैतिक विश्लेषक की भूमिका में आ गईं रेहम खान अब भी खंभा ही नोंच रही हैं, जिन्हें पत्रकारिता के पेशे में रहते यह तजुर्बा नहीं हुआ कि लोग धर्म के नाम पर ढोंग पाखंड करने वाला प्रधानमंत्री ही चाहते हैं. देश कल्याण और लोकतंत्र जैसी सियासी महज राजनीति की चालें होती हैं.
रेहम के पूर्वाग्रह कुंठा और विष वमन से परे इमरान नई जिंदगी व भूमिका में हैं. उन्हें जीत पर बधाई देने वालों में एक महत्त्वपूर्ण शख्स उन की पहली पत्नी जेमिमा मार्सले गोल्डस्मिथ थीं.

दुनिया भर की दर्जनों महिलाओं के साथ इमरान का नाम जुड़ा और उन के इश्क के चर्चे हमेशा आम रहे, इतने आम कि ऐसा लगता है कि 65 में से 50 साल वे इश्क ही फरमाते रहे हैं.

अच्छी पत्नी और दोस्त

इमरान की जिंदगी में बहैसियत एक औरत सब से लंबी पारी खेलने वाली जेमिमा ने उन्हें बधाई देते कहा कि मेरे बेटों के पिता को प्रधानमंत्री बनने पर बधाई.

यह बेहद दिलचस्प इत्तफाक है कि इमरान की तीनों पत्नियां अब 40 पार कर चुकी हैं यानी उन से उम्र में 20 साल तो छोटी हैं ही. साल 1995 में उन की पहली शादी ब्रिटेन की जेमिमा से हुई थी. तब जेमिमा की उम्र महज 21 साल थी और इमरान उम्र में उन से लगभग दोगुने थे.

1995 में इमरान और जेमिमा की शादी का खासा तहलका मचा था. एक ब्रिटिश फायनेंसर की बेटी जेमिमा भी पेशे से पत्रकार थीं. यह वह वक्त था, जब इमरान क्रिकेट से संन्यास ले चुके थे. इस के पहले 1992 में उन्होंने अपनी कप्तानी में पाकिस्तान को विश्वकप जितवाया था. हालांकि किसी मैच में वे उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर पाए थे.

जेमिमा इमरान पर फिदा थीं तो कहा जा सकता है कि यह एक अपरिपक्व और अल्हड़ युवती की दीवानगी और जुनून था. लेकिन शादी के बाद इसलाम अपनाते हुए जेमिमा ने खुद को अप्रत्याशित तरीके से बदला और पूरी तरह इस्लामिक रंगढंग में ढल गईं. तब ऐसा लग रहा था कि वह एक कामयाब क्रिकेटर की जिंदगी और गृहस्थी में रम गई हैं.

खुले विचारों वाली जेमिमा जल्द ही पाकिस्तान की चहेती बहू बन गईं. उन्होंने न केवल पाश्चात्य परिधान बल्कि उस सभ्यता से भी किनारा कर लिया. दरअसल जेमिमा चाहती थीं कि पाकिस्तान और इसलाम दोनों उन्हें कुबूल कर लें और अपनी इस कोशिश में फौरी तौर पर वे कामयाब भी रहीं. इमरान के क्रिकेटर साथियों सहित पूरा पाकिस्तान उन्हें भाभी कहने लगा था. अगर जेमिमा पाकिस्तान और इमरान के लिए बदलीं थीं तो इस का भरपूर रिस्पौंस भी उन्हें मिला था.

इमरान से उन्हें 2 बेटे हुए. यह इमरान की भटकती जिंदगी का स्थायित्व वाला दौर था जिस में उन्होंने पत्नीबच्चों और गृहस्थी का सुख भोगा. इसी दौरान इमरान पर समाजसेवा का भूत सवार हुआ तो उन्होंने अपनी मां की याद में कैंसर अस्पताल खोल डाला. इस नेक काम में भी जेमिमा उन के साथ थीं.

बेमकसद जिंदगी जीना इमरान की फितरत नहीं था. वे खेतीकिसानी और पशुपालन जैसे व्यवसाय करते थे. लेकिन इस से उन्हें संतुष्टि नहीं मिल रही थी. एक बेचैनी उन्हें घेरे रहती थी, जिस से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने राजनीति में कदम रखते हुए 1996 में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी का गठन कर डाला. इमरान की लोकप्रियता के चलते पीटीआई को शुरुआती दौर में ही पूछपरख मिली तो साफ दिखने लगा था कि यह पार्टी पाकिस्तानी सियासत में हलचल मचाएगी.

शुरुआत में इमरान ने वही किया जो नए दल बनाने वाले करते हैं, मसलन धरने, प्रदर्शन, सरकार का विरोध और तब्दीली की बात करना. कहने को तो बदलाव और न्याय के लिए पीटीआई बनी थी, लेकिन इमरान के पास स्पष्ट राजनैतिक सोच का अभाव था.

पीटीआई के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए नवाज शरीफ और परवेज मुशर्रफ ने उन्हें अपने साथ मिलाने की कोशिशें कीं, लेकिन इमरान ने मन ही मन जो ठान रखा था वह 2018 के नतीजों से उन्हें हासिल हुआ.
जेमिमा की समझदारी

जेमिमा इमरान को लगातार प्रोत्साहित करती रही थीं और एक अच्छी पत्नी की तरह उन का साथ भी देती रहीं. शौहर के साथ उन्होंने पूरा पाकिस्तान घूम डाला. इस दौरान वही हुआ जिस का कुछ तजुर्बेकार लोगों को डर था.

आजादख्यालों वाली जेमिमा को पाकिस्तानी माहौल में घुटन महसूस होने लगी. कट्टर इस्लामिक समाज की बंदिशें उन के आसमान को निगलने लगीं तो साल 2004 में उन्होंने इमरान से तलाक ले लिया और दोनों बेटों के साथ ब्रिटेन चली गईं.

यह तलाक बेहद स्वस्थ ढंग से सहमति से हुआ था. तय है इमरान जेमिमा की मनोदशा समझ रहे थे कि वे उन्हें तो चाहती हैं लेकिन रूढि़वाद से और ज्यादा तालमेल नहीं बिठा पा रही हैं. इस में गलत कुछ भी नहीं था. दोनों ने बेहद दोस्ताना अंदाज में वैवाहिक विच्छेद कर के मिलतेजुलते रहने के वादे किए इमरान के बेटे कभीकभार पाकिस्तान आते थे और कभी खुद इमरान उन से मिलने ब्रिटेन चले जाते थे.

दोनों के बीच कोई खटास या कटुता आज भी नहीं है, इसलिए इमरान के प्रधानमंत्री घोषित किए जाने के बाद जेमिमा ने उन के संघर्ष को तरहतरह से ट्वीट कर के उन्हें बधाई दी और खुद के पति की जगह बेटों के पापा पीएम बनेंगे जैसी बात कही.

ब्रिटेन जा कर जेमिमा ने इस्लामिक लबादा उतार फेंका और फिर तन और मन दोनों से पाश्चात्य रंगढंग में ढल गईं. इमरान के साथ बिताया वक्त उन के लिए एक सपने की तरह था.

यह उम्र का उन्माद था या फिर वाकई प्यार था, यह तो वही जानें लेकिन कभी भी उन्होंने इमरान की शान में गुस्ताखी नहीं की. न ही कभी रेहम की तरह कड़वा बोला, उलटे जब रेहम इमरान पर आक्रामक हो रही थीं, तब उन्होंने रेहम को अदालत में घसीटने तक की धमकी भी दी थी.

ये चोंचले चुनाव तक ही सिमटे रहे. इमरान की जीत के साथ ही तूतू मैंमैं बंद हो गई. अब हर कोई उत्सुकता से इमरान की तरफ देख रहा है कि वे प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या करेंगे. कौन सी तब्दीली पाकिस्तान में आएगी और इमरान क्याक्या बदलेंगे.

इमरान और इश्क का चोलीदामन का साथ रहा है, जो इस धारणा को खंडित करता है कि इमरान खान एक शर्मीले युवा थे.

इश्किया इमरान

एक वक्त में पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के साथ उन के इश्क के किस्से चटखारे ले कर सुने जाते थे. कहा जाता है कि बेनजीर उन पर हद से ज्यादा फिदा थीं. इमरान की जिंदगी पर किताब लिखने वाले लेखक क्रिस्टोफर सैंडफोर्ड ने इस चर्चित प्रेमप्रसंग के बारे में लिखा है कि बेनजीर और इमरान के बीच शारीरिक संबंध भी बने थे. लेकिन क्रिस्टोफर इस बात की पुष्टि नहीं करते. लाहौर के शेर का खिताब बेनजीर ने ही इमरान को दिया था.

हर कोई जानता है कि बेनजीर भुट्टो एक उन्मुक्त खयालों वाली महिला थीं और एक वक्त में उन की छवि एक परमानेंट प्रिगनेंट प्राइम मिनिस्टर की थी. 1975 के आसपास दोनों ब्रिटेन में पढ़ते थे और अकसर साथ भी दिखते थे.

लेकिन राजनीति में दोनों एकदूसरे का विरोध करते रहे. साल 2007 में जब बेनजीर की हत्या हुई तब जा कर यह सिलसिला थमा. लेकिन बेनजीर का विरोध करते रहने वाले इमरान को इस से काफी लोकप्रियता मिली.

इमरान की मां शौकत खानम की इच्छा थी कि इमरान और बेनजीर की शादी हो. इस बाबत उन्होंने कोशिशें भी की थीं लेकिन बेनजीर इमरान से कहीं ज्यादा आक्रामक स्वभाव की थीं. वे समझ गई थीं कि इमरान कभी उन की अधीनता नहीं स्वीकारेंगे, लिहाजा यह प्रेमप्रसंग शादी में तब्दील नहीं हो पाया. तब तक इमरान की प्लेबौय की इमेज भी बन चुकी थी, जो बेनजीर को पसंद नहीं थी.

इमरान का दूसरा मशहूर इश्क बौलीवुड की बोल्ड अदाकारा जीनत अमान के साथ था. 70-80 के दशक के दौरान पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के भारतीय दौरे के समय इमरान जीनत के इश्क के चर्चों के चलते भी सुर्खियों में रहते थे. एक वक्त तो दोनों की शादी की अफवाह भी उड़ी थी, लेकिन यह महज अफवाह ही साबित हुई. क्रिकेट और फिल्म प्रेमी तब यह जानने के लिए बैचेन रहते थे कि इस इश्क का नया किस्सा क्या है.

तब जीनत इमरान का कैरियर भी शवाब पर था और इमरान भी क्रिकेट में नएनए कीर्तिमान गढ़ रहे थे. ड्रेसिंग रूम में इमरान के साथी खिलाड़ी यह मानते थे कि मैदान पर इमरान खान ज्यादा थकेथके नजर आते हैं क्योंकि एक दिन पहले ही वे जीनत से मिलने गए थे.

संबंधों को कभी गहराई से नहीं लिया इमरान ने

इन बातों के कोई दीर्घकालिक तो दूर तात्कालिक माने भी नहीं निकले, लेकिन कलाकार ऐमा सार्जेंट 80 के दशक में इमरान के बेहद नजदीक थीं. दोनों की मुलाकात एक पार्टी में हुई थी, वहां आंखें मिलीं और दोनों में प्यार हो गया. अकसर ऐमा और इमरान साथ दिखे जाने लगे थे, जंगलों से ले कर पार्टियों तक में. लेकिन ऐमा एक प्रतिभाशाली कलाकार के अलावा समझदार महिला भी थीं.

कहा जाता है कि इमरान से शादी उन्होंने इसलिए नहीं की थी कि वे पाकिस्तान की घुटन भरी जिंदगी और माहौल में रह नहीं पातीं. रेहम की तरह ऐमा भी नहीं चाहती थीं कि उन की पहचान पति के नाम से हो, इसलिए हर स्तर पर भरपूर प्यार कर लेने के बाद दोनों जुदा हो गए. अकेली सीता व्हाइट ऐसा नाम था, जिस से इमरान पल्ला नहीं झाड़ पाए थे. सीता व्हाइट का असली नाम ऐना लूसिया था. सीता और इमरान बिना शादी किए लंबे समय तक पतिपत्नी की तरह रहे थे. 1987 में यह प्रेमप्रसंग उजागर हुआ था और 1992 में सीता ने इमरान से एक बेटी को जन्म दिया था.

सीता व्हाइट इमरान पर मरती थीं और उन के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती थीं, जिस में बगैर शादी किए साथ रहना भी शामिल था. बेटी का नाम उन्होंने टिरियन रखा और इमरान से उसे अपनाने की गुजारिश की तो इमरान साफसाफ मुकर गए थे.

कुछ समय तक सीता चुप रहीं पर बारबार कहने पर भी इमरान ने टिरियन को बेटी नहीं माना तो वे अदालत जा पहुंची. मुकदमा चला और 1997 में यह साबित हो गया कि इमरान ही टिरियन के पिता हैं. तब कहीं खुद इमरान ने भी इस सच को स्वीकार लिया था. लेकिन टिरियन को बेटी होने के वैधानिक अधिकार नहीं दिए थे.

एक जेमिमा को छोड़ इमरान की जिंदगी में जितनी भी औरतें आईं, वे या तो शादीशुदा थीं या फिर इमरान की ही तरह उन के इश्किया किस्से मीडिया की सुर्खियां बनते रहते थे. सीता व्हाइट इस का अपवाद नहीं थीं. लेकिन टिरियन को ले कर वे गंभीर थीं और उसे हक दिलाना चाहती थीं.

जीते जी तो वे ऐसा नहीं कर पाईं, लेकिन साल 2004 में हार्टअटैक से हुई उन की मौत के बाद इमरान ने टिरियन को बेटी मान लिया था. इस की वजह सिर्फ यह नहीं थी कि इमरान पसीज गए थे या उन का जमीर जाग उठा था, बल्कि यह है कि इस प्रेमप्रसंग को ले कर पाकिस्तान में राजनैतिक स्तर पर उन का विरोध होने लगा था. नवाज शरीफ को जब भी इमरान को सार्वजनिक तौर पर नीचा दिखाना होता था तो वे सीता व्हाइट का नाम ले देते थे.

इमरान की प्रेमिकाओं की सूची में और जो प्रमुख नाम शामिल हैं, उन में एक्ट्रेस स्टैफनी बीजम, गोल्डी हान, लीजा कैंपबेल, पत्रकार केरोलिन केलेट, सुजाना कांस्टाइन वगैरह वगैरह हैं.

अब आगे क्या

हैरत की एक और बात यह है कि इमरान की पत्नियों और पे्रेमिकाओं की राय उन के बारे में कभी अच्छी नहीं रही, सिवाय जेमिमा गोल्डस्मिथ के जिन्होंने 9 साल ही सही पत्नीधर्म पूरी ईमानदारी से निभाया.
प्रधानमंत्री बनते ही ये किस्से उजागर हुए पर इन से इमरान के राजनैतिक व्यक्तित्व और पहलू का कोई खास लेनादेना नहीं है. सभी की नजरें क्रिकेट और इश्क से इतर इमरान की आने वाली नीतियों पर हैं कि वह क्या करेंगे.

इमरान ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय नेताओं को ठेंगा दिखा कर साफ कर दिया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या किसी और से प्रभावित नहीं हैं. लेकिन अपने क्रिकेटर दोस्तों सुनील गावस्कर, कपिलदेव और नवजोत सिंह सिद्धू को बुलाना वे नहीं भूले. यह अलग बात है कि इन में से केवल नवजोत सिंह सिद्धू उन के शपथ समारोह में गए. इसे ले कर अपने देश में सिद्धू की जो छीछालेदर हुई, वह होनी ही चाहिए थी.

प्यार करना गुनाह नहीं, न ही बहुतों से प्यार करने को व्यभिचार कहा जा सकता है. इस लिहाज से इमरान कोई अपराधी नहीं लेकिन अपनी नई भूमिका में उन्हें सजग रहना पड़ेगा, क्योंकि वे अब एक ऐसे देश के प्रमुख हैं जिस की असल समस्या पिछड़ापन और कट्टरवाद है. सेना के साए में रहते इन चीजों से निपटना किसी चुनौती से कम नहीं.

ऐसे में लग भी नहीं रहा कि इमरान पाकिस्तान के लिए कुछ खास कर पाएंगे. फिर भी लोगों को उन से उम्मीदे हैं तो इस की वजह उन का जिद्दी और प्रतिभाशाली होना है, जिस के चलते वह एक नामुमकिन मिशन पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बन जाने का पूरा कर पाए हैं.

फिसलन भरे रास्तों की नायिका : भाग 1

बात 26 जुलाई, 2018 की है. कुछ चरवाहे भोगपुर डैम के पास अपने जानवर चरा रहे थे. तभी उन की
नजर डैम के मछली झाला क्षेत्र में पानी पर तैरती एक लाश पर पड़ी. चरवाहों ने डैम के किनारे जा कर देखा तो लाश किसी युवक की थी.

एक चरवाहे ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. चूंकि यह इलाका जसपुर थाना कोतवाली के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से जसपुर कोतवाली को सूचना दे दी गई.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी सुशील कुमार, परमापुर चौकी इंचार्ज वी.के. बिष्ट के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस के पहुंचने तक अंधेरा घिर आया था, मौके पर कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं था. पुलिस ने लाश डैम के पानी से बाहर निकलवाई. लाश की जांच की तो उस के कपड़ों से पहचान की कोई चीज नहीं मिली. लाश एक युवक की थी. शिनाख्त न होने पर पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए काशीपुर भेज दी.

घटनास्थल की काररवाई निपटा कर पुलिस जब थाने लौट रही थी, तो रास्ते में पड़ने वाले गांव गढ़ीनेगी पहुंच कर पुलिस ने वहां के लोगों को डैम में लाश मिलने की बात बताते हुए पूछा कि यहां का कोई युवक तो गायब नहीं है. पुलिस ने लोगों को मोबाइल में मौजूद मृत युवक के फोटो भी दिखाए. वहां मौजूद एक युवक ने उस फोटो को देखते ही कहा कि यह तो करनपुर के तोताराम का बेटा पप्पू सिंह है.

इस के बाद पुलिस करनपुर गांव में तोताराम के घर पहुंच गई. पुलिस ने पप्पू की पत्नी शशि से पप्पू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि कल वह कहीं जाने की बात कह कर घर से निकले थे, तब से अभी तक नहीं लौटे हैं. पुलिस ने उसे बताया कि पप्पू की लाश भोगपुर डैम के मछली झाला क्षेत्र में पानी पर तैरती पाई गई है. यह सुन कर शशि दहाड़ मार कर रोने लगी. घर में रोने की आवाज सुन कर आसपड़ोस वाले भी वहां पहुंच गए.

पप्पू का बड़ा भाई राजपाल जोकि दूसरे मकान में रहता था. खबर सुन कर घर वालों के साथ पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गया. राजपाल ने लाश की शिनाख्त अपने भाई पप्पू सिंह के रूप में की. लाश की शिनाख्त कर राजपाल घर लौट आया. भाई की मौत को ले कर घर वाले सारी रात परेशान रहे.

भाई को संदेह था भाई की पत्नी पर

अगले दिन सुबह के समय राजपाल अपनी पत्नी के साथ भाई पप्पू के घर पहुंचा तो घर बिलकुल सुनसान पड़ा था. राजपाल ने पप्पू की बीवी शशि को आवाज लगाई तो कोई जवाब नहीं मिला. राजपाल और उस की बीवी ने अंदर जा कर देखा तो मृतक के दोनों बच्चे सोए हुए थे.

राजपाल ने शशि को आसपास तलाशा, लेकिन उस का कहीं भी पता नहीं चला. पति की मौत के बाद शशि के अचानक गायब हो जाने से लोग अपनी मानसिकता के अनुसार तरहतरह के कयास लगाने लगे.

उसी दौरान किसी ने बताया कि शशि अभी थोड़ी देर पहले घर के सामने खड़ी थी. यह जानकारी मिलने से यह तो साबित हो गया कि वह थोड़ी देर पहले ही घर से निकली है. राजपाल ने पड़ोसियों की मदद से उसे आसपास खोजने की कोशिश की तो वह जंगल की तरफ जाती हुई मिली.

राजपाल और उस के परिजनों ने उसे रोकने की कोशिश की तो वह जोरजोर से दहाड़ें मार कर रोते हुए कहने लगी कि जब उस का मर्द ही नहीं रहा तो वह जी कर क्या करेगी. उस ने बताया कि अब वह आत्महत्या कर के पति के पास जाना चाहती है. घर वालों को उस वक्त उसे समझा कर शांत करना ठीक लगा. उन लोगों ने घर वापस चलने को कहा तो उस ने जाने से साफ मना कर दिया. घर वाले उसे जैसेतैसे समझा कर घर वापस ले आए.

राजपाल सिंह पहले से ही शशि के त्रियाचरित्र को जानता था. उसे शक था कि हो न हो शशि ने ही उस के भाई को न मरवा दिया हो. राजपाल भाई के 12 वर्षीय बेटे राज को साथ ले कर अपने घर आ गया. घर जा कर  उस ने राज से उस के पापा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि कल शाम भूपेंद्र अंकल घर आए थे.
वह पापा को किसी काम के बहाने घर से बाहर ले गए थे. उस के बाद पापा सारी रात घर नहीं आए. उस ने मम्मी से पापा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि तुम्हारे पापा किसी काम से बाहर गए हैं. सुबह तक आ जाएंगे. इस के बाद मम्मी ने दोनों भाईबहन को सुला दिया था.

भाई के बेटे राज के द्वारा इतनी जानकारी मिलने से यह तो पक्का हो ही गया था कि पप्पू की हत्या में भूपेंद्र सिंह शामिल था. राजपाल ने यह बात वहां मौजूद अपने घर वालों को बता दी और पुलिस को भी सूचित कर दिया.

यह जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी सुशील कुमार महिला पुलिस के साथ मृतक के घर पहुंच गए. उन्होंने सब से पहले मृतक के बेटे राज से बात की तो उस ने वही सारी बात उन्हें बता दीं, जो अपने ताऊ राजपाल को बताई थीं. इस के बाद पुलिस ने शशि को एकांत में ले जा कर पूछताछ की.

शशि ने साफ शब्दों में कहा कि उस के पति की हत्या किस ने और क्यों की, इस बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है. पुलिस ने उस समय उस से सख्ती करनी जरूरी नहीं समझी. इस की जगह पुलिस ने उस के पड़ोसियों के साथसाथ उस के घर वालों से पूछताछ की.

पता चला काफी समय से गांव कलिया वाला टांडा निवासी भूपेंद्र सिंह का शशि के यहां आनाजाना था. वह वक्तबेवक्त आताजाता रहता था. इस बात की पुष्टि शशि के बेटे राज ने भी कर दी, जिस से साफ हो गया कि पप्पू अपनी पत्नी शशि और भूपेंद्र के बीच पनपे अवैध संबंधों की भेंट चढ़ गया था.

शशि ने स्वीकारा अपना अपराध

शशि के खिलाफ सबूत मिल चुके थे, इसलिए पुलिस उसे अपने साथ पुलिस चौकी पतरामपुर ले गई. पुलिस चौकी में की गई पूछताछ में भी वह मुंह खोलने को तैयार नहीं थी. इस पर पुलिस ने अपने गेम का अगला पासा फेंकते हुए कहा कि उस के बताने या न बताने से पुलिस को कोई फर्क नहीं पड़ता. उस के बेटे राज ने उस की सारी करतूतें बता दी हैं. वही इस केस का गवाह भी बनेगा.

यह सुनते ही शशि फफकफफक कर रोते हुए बोली, ‘‘साहब, इस में मेरा कोई कसूर नहीं है. मैं अपने आदमी को भला क्यों मारूंगी. यह सब भूपेंद्र का ही कारनामा है. वह काफी समय से मेरे पीछे पड़ा था. उस ने कई बार मुझ से शादी करने को भी कहा था. मैं ने इस के लिए मना किया तो उस ने मेरे पति की हत्या कर दी.’’

वह रोते हुए आगे बोली, ‘‘साहब, मेरे दोनों बच्चे छोटे हैं, मेरे बिना अनाथ हो जाएंगे. मुझ पर रहम करो. पति को मैं ने नहीं मारा.’’

शशि से पूछताछ करने से यह तो साफ हो गया कि पप्पू की हत्या शशि और भूपेंद्र के अवैध संबंधों की वजह से हुई थी और हत्यारा था भूपेंद्र.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस भूपेंद्र को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर से फरार था. इस के बाद भी पुलिस उस के पीछे पड़ी रही. बाद में भूपेंद्र को देर रात सोते हुए उस के घर से ही गिरफ्तार कर लिया गया.

भूपेंद्र से पुलिस ने कड़ी पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म कबूलते हुए बताया कि उस ने शशि के कहने पर ही पप्पू की हत्या की थी. शशि ने उस से कहा था कि पप्पू के खत्म होते ही रास्ते का कांटा हट जाएगा. फिर दोनों मियांबीवी की तरह रहेंगे.

शशि और भूपेंद्र दोनों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. उन से की गई पूछताछ के बाद पप्पू की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह काफी दिलचस्प निकली—

उत्तराखंड के जिला काशीपुर के जसपुर थाना कोतवाली क्षेत्र के गांव भरतपुर में तोताराम का परिवार रहता था. तोताराम की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी. गांव में न तो उन के पास जुतासे की जमीन थी और न ही अच्छी आमदनी का कोई जरिया. भरतपुर गांव के अधिकांश लोग जंगलों से लकड़ी ला कर बेचते थे. उसी से उन का गुजारा होता था. तोताराम का भी यही काम था.

वह जंगलों से लकड़ी बीन कर लाता और उन्हें बेच कर अपने परिवार की गुजरबसर करता था. तोताराम के 3 बेटे थे, जो काफी छोटे थे. किसी बीमारी के चलते तोताराम की मौत हो गई. सिर से बाप का साया हटते ही बच्चे अनाथ हो गए. पति की मौत के बाद बच्चों को पालनेपोसने की जिम्मेदारी उस की पत्नी सुनीता पर आ गई थी. सुनीता ने जैसेतैसे बच्चों को इस लायक कर दिया कि अपने पैरों पर खड़े हो सकें.

बच्चे जवान हुए तो कामधंधे में लग गए और फिर करनपुर गांव में अपना मकान बना कर रहने लगे. करनपुर जंगल से सटा हुआ इलाका है. कुछ लोग जंगल का फायदा उठा कर कच्ची शराब बनाने का धंधा करते हैं. कच्ची शराब की भरमार होने की वजह से यहां के अधिकांश लोग शराबी बन चुके हैं.

बढ़ती गई विषबेल : पति पत्नी के संबंधों में आने लगी कड़वाहट

26 जून, 2018 की बात है. दिन के करीब 11 बज रहे थे. जयसिंहपुर पुलिस थाने के असिस्टेंट इंसपेक्टर
शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ किसी मामले को ले कर बातचीत कर रहे थे, तभी 11 वर्षीय बच्चे के साथ सूर्यकांत शिंदे वहां पहुंचा. उसे देख कर निकम और शिंदे गायकवाड़ स्तब्ध रह गए. उस की घायलावस्था और कपड़ों पर लगा खून किसी बड़ी वारदात की तरफ इशारा कर रहा था.

दोनों पुलिस अधिकारी सूर्यकांत शिंदे को अच्छी तरह से जानते पहचानते थे. इस से पहले कि वे सूर्यकांत शिंदे से कुछ पूछते उस ने पुलिस अधिकारियों को जो बताया, उसे सुन कर वे चौंक गए.

मामला काफी गंभीर और सनसनीखेज था. असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ ने सूर्यकांत शिंदे को तुरंत अपनी हिरासत में ले कर उसे उपचार के लिए जिला अस्पताल भेज दिया. फिर मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे दी. इस के बाद वह बिना कोई देर किए पुलिस टीम ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

मामला एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था की महिला कार्यकर्ता की हत्या का था. इस से पहले कि घटनास्थल पर पुलिस टीम पहुंच पाती, हत्या की खबर जंगल की आग की तरह पूरे गांव और इलाके में फैल चुकी थी, जिस से घटनास्थल पर काफी भीड़ एकत्र हो गई थी.

असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम ने पहले मौके पर जा कर घटनास्थल का मुआयना किया. अभी वह लोगों से पूछताछ कर ही रहे थे कि खबर पा कर कोल्हापुर के एसएसपी कृष्णांत पिंगले भी वहां पहुंच गए. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी.

पुलिस अधिकारियों ने जब घटनास्थल का निरीक्षण किया तो वहां दिल दहला देने वाला मंजर मिला. किचन में एक महिला का शव पड़ा हुआ था. शव के चारों तरफ खून ही खून फैला था. घटनास्थल का दृश्य दिल दहला देने वाला था. मृतका के शरीर और सिर पर कई घाव थे, जो काफी गहरे और चौड़े थे. खून से सनी कुल्हाड़ी भी वहीं पड़ी थी. लग रहा था कि मृतका पर उसी कुल्हाड़ी से हमला किया गया था.

फोरैंसिक टीम का काम खत्म होने के बाद एसएसपी कृष्णांत पिंगले ने मामले की जांच असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ को करने का निर्देश दिया. पुलिस ने खून सनी कुल्हाड़ी अपने कब्जे में ले ली और लाश पोस्टमार्टम के लिए स्थानीय अस्पताल भेज दी. पता चला मृतका का नाम माधुरी था. इस बीच सूचना पा कर उस के घर वाले भी आ गए थे.

यह घटना महाराष्ट्र के जिला कोल्हापुर के उदगांव में घटी थी. चूंकि आरोपी सूर्यकांत शिंदे ने घटना के बारे में पुलिस को पहले ही बता दिया था, इसलिए पुलिस ने उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. सूर्यकांत शिंदे ने अपने ऊपर हुए हमले और पत्नी की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी.

सूर्यकांत और माधुरी का मिलन

42 वर्षीय सूर्यकांत शिंदे के पिता महादेव शिंदे गांव के एक साधारण किसान थे. वह सीधेसादे और नेकदिल इंसान थे. गांव वालों की मदद के लिए वह अकसर तैयार रहते थे, इसी वजह से गांव वालों के बीच उन के प्रति आदर और सम्मान था.

परिवार में उन की पत्नी आनंदी बाई के अलावा एकलौता बेटा सूर्यकांत था. वह हाईस्कूल तक ही पढ़ सका था. ज्यादा पढ़ालिखा न होने की वजह से उसे ठीक सी नौकरी नहीं मिली तो वह सांगली के एक बिल्डर के यहां सुपरवाइजर का काम करने लगा.

माधुरी पाटिल और सूर्यकांत शिंदे की मुलाकात करीब 18 साल पहले सांगली की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर हुई थी. माधुरी अपने परिवार के साथ सांगली के बैरणबाजार में रहती थी. परिवार के मुखिया लक्ष्मण पाटिल का निधन हो चुका था. मां मंगला पाटिल पर 2 बेटियों की जिम्मेदारी थी. बड़ी बेटी सविता की शादी हो चुकी थी. माधुरी की जिम्मेदारी बाकी थी.

परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. पूरा परिवार खाने के टिफिन तैयार कर अपना गुजारा किया करता था. सूर्यकांत शिंदे जब कंस्ट्रक्शन साइट पर गया तो उस के खाने का बंदोबस्त माधुरी के टिफिन बौक्स से हो गया था.

माधुरी देखने में सुंदर और चंचल स्वभाव की आधुनिक विचारों वाली युवती थी. शिंदे की तरह वह भी ज्यादा पढ़लिख नहीं पाई थी लेकिन जितनी भी पढ़ी थी, उस के लिए काफी था. वह इतनी होशियार थी कि किसी से भी बेझिझक बात करती थी. वह जिस से भी एक बार बातें कर लेती, वह उस की तरफ खिंचा चला आता था.

यही हाल सूर्यकांत शिंदे का भी हुआ. वह माधुरी की पहली झलक में ही उस का दीवाना हो गया था. वह जब भी माधुरी के घर पर खाना खाने जाता था, उस की नजर खाने पर कम माधुरी पर ज्यादा रहती थी. टिफिन की तारीफ तो वह करता ही था, साथसाथ उसे अच्छी टिप भी दिया करता था.
शुरू में तो 20 वर्षीय माधुरी को सूर्यकांत शिंदे के इरादों का आभास नहीं हुआ, लेकिन वह जल्द ही उस की आंखों की भाषा समझ गई. धीरेधीरे माधुरी भी उस की ओर आकर्षित होने लगी. उसे अपने सपने और अरमान सूर्यकांत शिंदे में ही पूरे होते दिख रहे थे.

माधुरी जल्दी ही मन ही मन सूर्यकांत शिंदे को जीवनसाथी के रूप में देखने लगी. विचार मिले तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया. यह बात जब दोनों के परिवार वालों को पता चली तो उन्होंने दोनों की शादी पर कोई ऐतराज नहीं किया. जल्दी ही साधारण तरीके से दोनों की शादी हो गई.

शादी के बाद सूर्यकांत शिंदे माधुरी के साथ अपने गांव में रहने लगा. इसी बीच सूर्यकांत के पिता की मृत्यु हो गई तो घर की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर आ गई. वह बखूबी अपनी जिम्मेदारी निभाने लगा. प्राइवेट नौकरी होने की वजह से सूर्यकांत सप्ताह में एक दिन ही आ पाता था. एक रात रुक कर वह अगले दिन वापस सांगली चला जाता था. घर में सिर्फ सूर्यकांत की बूढ़ी मां और भाई ही रह जाते थे.

बिखरने लगे माधुरी के अरमान

ऐसी स्थिति में माधुरी को अपने सारे सपने और अरमान बिखरते नजर आ रहे थे. ऊपर से पुराने खयालों की सूर्यकांत की बूढ़ी मां को माधुरी का आधुनिक विचारों वाला आचरण पसंद नहीं था. जिसे ले कर घर में कलह और सासबहू में अकसर लड़ाईझगड़े होने लगे.

पहले तो सूर्यकांत शिंदे ने माधुरी को समझाया. लेकिन जब उस ने साफ कह दिया कि वह सास के साथ हरगिज नहीं रहेगी तो सूर्यकांत माधुरी को ले कर शिरोल तालुका के चिपरी गांव में किराए के मकान में रहने लगा.

समय अपनी गति से चल रहा था. माधुरी एक बेटी और एक बेटे की मां बन गई. पतिपत्नी ने दोनों बच्चों को अच्छी परवरिश दी. बेटी 12वीं में पढ़ रही थी तो बेटा कक्षा 2 में था.

बच्चे बड़े हुए तो घर के खर्चे भी बढ़ गए, जबकि आमदनी सीमित थी. इस सब के चलते माधुरी को अपने खुद के खर्चों में कटौती करने की नौबत आ गई. उसे अपने सपने धूमिल होते नजर आने लगे. फलस्वरूप इसे ले कर उस की पति से नोंकझोंक शुरू हो गई, जो रोजाना के झगड़े में बदलती चली गई.

नतीजा यह हुआ कि दोनों के रिश्तों में दरार आ गई, जिस की वजह से सूर्यकांत शिंदे को मजबूरन कंस्ट्रक्शन साइट की नौकरी छोड़नी पड़ी. माधुरी को किनारे कर के वह गांव में अपनी बूढ़ी मां के साथ रहने लगा. माधुरी ने सास के साथ रहने से मना कर दिया था, इसलिए वह बच्चों को ले कर अपने मायके चली गई थी.

घर तो चलाना ही था, लिहाजा सूर्यकांत ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली. अब वह पत्नी के साथ नहीं रहना चाहता था, लिहाजा उस ने अदालत में पत्नी से तलाक लेने की अर्जी दाखिल कर दी, जिस का माधुरी ने विरोध किया.

उस के विरोध पर कोर्ट ने तलाक के मामले को कुछ दिनों के लिए पेंडिंग में रख कर सूर्यकांत शिंदे को आदेश दिया कि वह माधुरी को गुजारा और रहने के लिए आधा घर दे. अदालत के आदेश के बाद माधुरी दोनों बच्चों के साथ आ कर रहने लगी.

दोनों के बीच गहराती गईं दरारें

माधुरी और सूर्यकांत शिंदे के बीच आई दरारें तब और गहरी हो गईं, जब वह संतोष माने और प्रमोद पाटिल के संपर्क में आई और उन की सामाजिक संस्था भूमाता ब्रिगेड व शिवाजी छत्रपति से जुड़ गई. प्रमोद पाटिल इस संस्था का संस्थापक और संतोष माने सक्रिय कार्यकर्ता था. एक तरह से संतोष माने प्रमोद पाटिल का दायां हाथ था. इस संस्था की पूरे कोल्हापुर जिले में कई शाखाएं थीं, जिस में हजारों कार्यकर्ता थे.

यह संस्था गरीब, लाचार महिलाओं की सहायता करती थी. साथ ही तमाम तरह के कार्यक्रमों का आयोजन और प्रोत्साहन वाले काम भी करती थी. संतोष माने ने माधुरी को करीब लाने के लिए उस के दिल में समाजसेवा का बीज बो दिया था.

दरअसल, माधुरी सुंदर और स्मार्ट थी. संतोष माने ने जब उसे देखा तो वह उस का दीवाना हो गया था. 2 बच्चे होने के बाद भी उस के शरीर का कसाव वैसे का वैसा ही था. संतोष माने उस के गांव के पड़ोस में ही रहता था. वैसे उस का विवाह हो चुका था और उस के 2 बच्चे भी थे. फिर भी जब से उस ने माधुरी को देखा था, वह उसी के बारे में सोचता रहता था. बहाने से उस ने माधुरी के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया.

गांव का पड़ोसी और एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था का सदस्य होने के कारण माधुरी उस की इज्जत करती थी. माधुरी और संतोष माने के बीच की दूरियां कम हुईं तो वह माधुरी की रगों में सामाजिक कार्यक्रमों के रंग भरने लगा. पहले तो माधुरी ने इस में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन संतोष के काफी जोर देने पर वह संस्था के सामाजिक कार्यों में शरीक होने के लिए तैयार हो गई.

संतोष माने ने माधुरी को संस्था के संस्थापक प्रमोद पाटिल से मिलवाया. प्रमोद पाटिल ने माधुरी की दिलचस्पी देख कर उसे संस्था का जिला उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया. संस्था के सामाजिक कार्यों का दायरा बड़ा होने के नाते अब उसे संस्था के हर छोटेबड़े कार्यक्रमों और मीटिंगों में जाना पड़ता था.
व्यस्तता की वजह से माधुरी का समय अपने बच्चों के साथ कम और बाहर अधिक बीतने लगा. यह बात सूर्यकांत शिंदे को अच्छी नहीं लगी. उस ने कई बार माधुरी को बच्चों के प्रति सचेत कर के समझाया. लेकिन उस ने पति की बातों पर ध्यान नहीं दिया. वह संतोष माने के साथ अधिक रहने लगी, जिस का नतीजा यह हुआ कि माधुरी अपनी सीमा लांघ गई.

जब यह बात धीरेधीरे गांव और गलियों में होते हुए सूर्यकांत के कानों तक पहुंची तो उस का खून खौल उठा. उस ने भले ही माधुरी को तलाक का नोटिस दिया था, लेकिन अभी तक तलाक हुआ नहीं था. वह अभी भी कानूनी और सामाजिक तौर पर उस की पत्नी थी.

पत्नी की वजह से उस की और उस के परिवार की समाज में बुराई हो, वह सहन नहीं कर सकता था. जिस की वजह से माधुरी और सूर्यकांत शिंदे के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा, मारपीट होने लगी.

बनने लगी अपराध की भूमिका

मामला पुलिस थाने तक जाता था लेकिन पुलिस इसे एक पारिवारिक झगड़ा समझ कर कोई काररवाई नहीं करती थी. माधुरी को परेशान देख कर संतोष माने से रहा नहीं गया तो उस ने प्रमोद पाटिल से मशविरा कर के सूर्यकांत शिंदे को आड़े हाथों लिया.

उस ने शिंदे को चेतावनी दी कि अगर वह माधुरी और उस के बीच दीवार बनने की कोशिश करेगा तो प्रमोद पाटिल और वह उसे हमेशाहमेशा के लिए माधुरी के रास्ते से हटा देंगे. लेकिन हुआ इस का उलटा.
26 जून, 2018 को सूर्यकांत शिंदे जब माधुरी के घर के अंदर गया तो उस का धैर्य जवाब दे गया. उस ने किचन के दरवाजे के सुराख से अंदर देखा तो माधुरी और संतोष माने आपत्तिजनक स्थिति में थे.
यह देख कर उस के होश उड़ गए. वह अपने आप को रोक नहीं सका और उन्हें भद्दीभद्दी गालियां देते हुए दरवाजा जोरजोर से पीटने लगा. आवाज सुन कर सूर्यकांत शिंदे की बूढ़ी मां और अन्य लोग भी वहां आ गए.

इस के पहले कि लोग कुछ समझ पाते, किचन का दरवाजा खुला और हाथ में कुल्हाड़ी लिए संतोष माने किचन से बाहर निकला. आते ही उस ने सूर्यकांत शिंदे पर हमला बोल दिया. सूर्यकांत ने कुल्हाड़ी का पहला वार अपने हाथों पर झेल लिया.

दूसरा वार करने से पहले ही सूर्यकांत संभल गया और उस ने संतोष माने को जोर से धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया. जिस से उस के हाथों से कुल्हाड़ी छूट गई और वह सूर्यकांत शिंदे ने उठा ली.
अपने ऊपर हुए हमले के कारण सूर्यकांत शिंदे भी अपना आपा खो बैठा था. उस ने संतोष माने पर कुल्हाड़ी का वार कर दिया. इस से पहले कि कुल्हाड़ी माने को लगती माधुरी बीच में आ गई और कुल्हाड़ी का सीधा वार माधुरी के सिर पर हुआ. तभी संतोष माने यह कहते हुए वहां से भाग निकला कि प्रमोद पाटिल उसे छोड़ेगा नहीं.

संतोष माने तो वहां से निकल गया लेकिन माधुरी पति के गुस्से का शिकार बन गई. शिंदे ने उस पर कई वार किए. कुछ ही देर में माधुरी की मौत हो गई. इस के बाद सूर्यकांत शिंदे अपने बेटे शिवराज को साथ ले कर जयसिंहपुर थाने पहुंच गया और उस ने पुलिस को पूरी बात बता दी. पुलिस ने उस का इलाज कराकर उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

सूर्यकांत शिंदे से पूछताछ करने के बाद जांच अधिकारी शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ ने भूमाता ब्रिगेड व छत्रपति शिवाजी सामाजिक संस्था के संस्थापक प्रमोद पाटिल और संतोष को सूर्यकांत शिंदे के ऊपर जानलेवा हमला करने और धमकी देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

प्रमोद पाटिल और संतोष माने की गिरफ्तारी पर भूमाता ब्रिगेड और शिवाजी छत्रपति सामाजिक संस्था के कार्यकर्ताओं के बीच में हड़कंप मच गया. शिरोल तालुका की अध्यक्ष तृप्ति देसाई ने कार्यकर्ताओं के साथ प्रमोद पाटिल और संतोष माने की गिरफ्तारी का विरोध किया, लेकिन कानून सब के लिए बराबर होता है, चाहे कोई समाज सेवक हो या खास आदमी.

अधूरी प्रेम कथा : ममता के घर वालों ने खेला खूनी खेल

इंटरमीडिएट करने के बाद सोमबीर ने आगे की पढ़ाई का इरादा त्याग दिया था. अब वह कोई कामधंधा करना चाहता था. रोहतक के पास स्थित सोमबीर के गांव सिंहपुरा में कई ऐसे युवक थे, जो ऊंची डिग्रियां ले कर नौकरी की तलाश में भटकने के बाद भी बेरोजगार थे. इसी के मद्देनजर सोमबीर ने पहले ही सोच लिया था कि वह नौकरी के चक्कर में न पड़ कर अपना खुद का कोई काम शुरू करेगा, जिस में सीधा कमाई का जरिया बन जाए.

सोचविचार कर उस ने प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने का फैसला किया. इस काम में न तो ज्यादा मेहनतमशक्कत की जरूरत थी और न ही ज्यादा भागदौड़ की. हां, एक अदद पूंजी की जरूरत जरूर थी, जो उस ने अपने पिता जयराज की मदद से थोड़े ही दिनों में एकत्र कर ली थी. उस ने प्रौपर्टी डीलिंग के काम के लिए पास के गांव गद्दीखेड़ा को चुना.

सोमबीर ने गद्दीखेड़ा के जाट रामकेश के मकान में किराए का कमरा ले कर अपना औफिस खोल लिया. धीरेधीरे उस का काम चल निकला तो वह उसी मकान में एक दूसरा कमरा ले कर रात में भी वहीं रहने लगा. कुछ ही दिनों में वह मकान मालिक रामकेश के पूरे परिवार के साथ काफी घुलमिल गया.
रामकेश के परिवार में पत्नी सरिता के अलावा 3 बेटियां थीं, जिन में सब से बड़ी ममता थी. ममता जब ढाई साल की थी, तभी उसे रोहतक की श्याम कालोनी में रहने वाली उस की बुआ कृष्णा ने गोद ले लिया था. वह रोहतक में बारहवीं में पढ़ रही थी.

पिछले साल ममता रोहतक से अपने जैविक मातापिता के घर गद्दीखेड़ा गई थी. ममता 17 साल की जवान हो चुकी थी. मां सरिता ने बेटी को देखा तो देखती रह गई.

ममता ने आगे बढ़ कर मां के पैर छुए तो सरिता निहाल हो गई. ममता अपनी दोनों छोटी बहनों से गले मिली, कुशलक्षेम पूछा. ममता के आने से पूरे घर का माहौल खुशनुमा हो गया. सरिता ने फोन कर के अपनी ननद कृष्णा से कह दिया कि ममता कुछ दिनों यहां रहने के बाद रोहतक लौटेगी, इसलिए वह उसे जल्दी बुलाने के लिए फोन न करे.

एक दिन ममता का सामना सोमबीर से हुआ तो वह उसे अपलक देखता रह गया. गोरीचिट्टी, बला की खूबसूरत ममता किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. दरअसल, सोमबीर को यह मालूम नहीं था कि रामकेश अंकल की एक और बड़ी लड़की भी है, जिसे बचपन में ही उस के फूफा ने गोद ले लिया था. ममता ने उसे अपनी ओर टकटकी लगाए देखा और पलभर के लिए उसे तिरछी नजरों से देखते हुए मुसकरा कर घर के अंदर चली गई.

ममता और सोमबीर की यह पहली मुलाकात थी, जो कुछ न कह कर भी बहुत कुछ कह गई थी. इस के कुछ दिनों बाद जब सोमबीर को ममता से बात करने का मौका मिला तो वह उस की खूबसूरती की तारीफ करने लगा. ममता को न जाने क्यों उस की बातें अच्छी लगीं.

इसे उम्र का तकाजा कह सकते हैं और पहली नजर का प्यार भी, जिस में आकर्षण की भूमिका बड़ी होती है. बहरहाल, इसी के चलते सोमबीर और ममता ने भी प्यार का इजहार भी किया. प्यार जैसेजैसे दिन गुजरते गए, सोमबीर और ममता एकदूसरे के प्यार में डूबते चले गए.

शुरू में तो सरिता और रामकेश ने ममता और सोमबीर के मिलनेजुलने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब वे हद से आगे बढ़ने लगे तो उन का माथा ठनका.

सरिता ने ममता को समझाया कि सोमबीर अनुसूचित जाति का लड़का है, इसलिए उस से ज्यादा घुलनामिलना ठीक नहीं है. ममता ने मां की बातें एक कान से सुन कर दूसरे से बाहर निकाल दीं.
इस के बाद सरिता बेटी पर नजरें रखने लगी. हालांकि ममता और सोमबीर रामकेश और सरिता की नजरों से बच कर मिलते थे, पर उन की अनुभवी आंखों को धोखा देना आसान नहीं था. कई बार किसी न किसी ने दोनों को मिलते हुए देख लिया और इस की खबर रामकेश तक पहुंचा दी.

पानी सिर से ऊपर जाते देख रामकेश ने सोमबीर को ममता से दूर रहने के लिए कहा. इतना ही नहीं, उसे छोटी जाति का हवाला दे कर खतरनाक परिणाम भुगतने की भी चेतावनी दी. रामकेश की धमकी से परेशान सोमबीर ने ममता से कहा कि दोनों के परिवार वाले उन्हें किसी भी हाल में मिलने नहीं देंगे, इसलिए जल्दी ही कोई उपाय नहीं किया गया तो उन का एक होना मुश्किल हो जाएगा.

सोमबीर की बातें सुन कर ममता उसे विश्वास दिलाते हुए बोली कि वह उस के बिना नहीं जी सकती. इस के बाद दोनों ने एक साथ जीने और मरने की कसमें खाईं. सोमबीर जानता था कि ममता के घर वाले एक तो जाट हैं और दूसरे रसूख वाले दबंग भी, इसलिए उस ने कानून का सहारा ले कर कोर्ट में शादी करने की योजना बनाई.

24 अगस्त, 2017 को ममता मौका पा कर घर से निकली और सोमबीर के पास पहुंच गई. सोमबीर उसे साथ ले कर चंडीगढ़ पहुंचा. वहां दोनों ने पहले आर्यसमाज मंदिर में और फिर कोर्ट में शादी कर ली.
ममता के गायब होने की बात जब उस की मां सरिता को पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सरिता और रामकेश ने यह बात रमेश को बताई तो उन्हें ममता की इस हरकत पर बहुत गुस्सा आया. मां कृष्णा भी ममता की इस हरकत से सन्न रह गई. वे लोग रामकेश के घर आ गए.

सोमबीर के खिलाफ लिखाई रिपोर्ट

सब ने विचारविमर्श कर के रोहतक के थाना आर्यनगर में ममता के नाबालिग होने और सोमबीर व उस के पिता जयराज के खिलाफ अपनी बेटी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का मुकदमा दर्ज करवा दिया.
गांवों और ग्रामीण समाज में ऐसी बातें देरसबेर किसी न किसी तरह पहुंच ही जाती हैं. जिस ने भी इस बारे में सुना वह इस बात को और भी बढ़ाचढ़ा कर बखान करने लगा. जितने मुंह उतनी ही बातें होने लगीं.
मामला केवल प्रेम विवाह का नहीं था, बल्कि इस बात का था कि जाट बिरादरी की एक लड़की ने अपने से छोटी जाति के लड़के के साथ शादी रचा ली है. रामकेश और रमेश के परिवार की बिरादरी में थूथू होने लगी. इस सब से गुस्साए रमेश ने ममता की हत्या करने का फैसला कर लिया.

रमेश के इस फैसले से ममता को जन्म देने वाली मां सरिता और पिता रामकेश भी सहमत थे. सब से पहले उन्होंने कोर्ट में ममता का स्कूल सर्टिफिकेट दे कर बताया कि ममता अभी नाबालिग है, 17 साल की. इसलिए कोर्ट उस की शादी को रद्द घोषित करे.

जब कोर्ट ने इस मामले की छानबीन की तो पता चला ममता की उम्र सचमुच 17 साल ही है. हकीकत जानने के बाद कोर्ट ने सोमबीर और ममता को कोर्ट में पेश होने का सम्मन जारी कर दिया. यह बात जनवरी, 2018 की है. जब दोनों कोर्ट में पेश हुए तो पता चला कि सोमबीर ने फरजी तरीके से ममता की उम्र 18 साल बता कर उस से शादी की थी.

कोर्ट को धोखे में रखने के जुर्म में सोमबीर और उस के पिता को जेल और ममता को बालिग होने तक नारी निकेतन भेज दिया गया. ममता के बालिग होने में अभी 17 महीने बाकी थे.

ममता के बालिग हो जाने के बाद 8 अगस्त, 2018 को रोहतक कोर्ट में पेश किया जाना था. उधर करनाल स्थित नारी निकेतन में रह रही ममता की खुशी देखते ही बन रही थी. लोगों ने ममता को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था. वह सब से कह रही थी ‘आज मैं अपने घर चली जाऊंगी.’

सबइंसपेक्टर नरेंद्र और लेडी हैडकांस्टेबल सुशीला ममता को नारी निकेतन से ले कर रोहतक कोर्ट पहुंचे. चूंकि ममता का पति सोमबीर और ससुर जेल में थे, इसलिए सोमबीर की मां सरोज तथा छोटा भाई देवेंद्र कोर्ट पहुंचे थे. सरोज और देवेंद्र काफी डरे हुए थे, जिस की वजह ममता के पिता की ओर से समयसमय पर दी गई जान से मार देने की धमकियां थीं.

यहां तक कि ममता ने यह कह कर कई बार अपने दत्तक पिता रमेश से माफ कर देने की गुहार भी लगाई थी कि वह अपनी इस नई जिंदगी से काफी खुश है. लेकिन ममता द्वारा अपने से छोटी जाति के युवक से शादी कर लेने से बुरी तरह आहत रमेश का एक ही रटारटाया जवाब था, ‘ममता को मरना होगा, क्योंकि उस ने सोमबीर से शादी कर के हमें समाज और बिरादरी के आगे हमेशा के लिए नीचे झुका दिया है.’
ममता को जन्म देने वाली मां सरिता और पिता रामकेश भी उस की जान बख्शने को तैयार नहीं थे. रमेश तथा रामकेश भी कोर्ट में मौजूद थे.

ढाई बजे कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराने के बाद ममता अपनी सास सरोज, देवर देवेंद्र के साथ लघु सचिवालय के गेट नंबर-2 से बाहर निकल रही थी. साथ में सबइंसपेक्टर नरेंद्र और लेडी हैडकांस्टेबल सुशीला भी थे. पांचों लोगों ने सड़क के पार पहुंच कर एक दुकान पर जूस पीया. वहां से निकल कर वे आटो पकड़ने के लिए आगे बढ़ ही रहे थे कि तभी पीछे से आए 2 मोटरसाइकिल सवारों ने ममता को 3 गोलियां मारीं.

एसआई नरेंद्र ने हमलावरों को मारने के लिए अपना रिवौल्वर निकालने की कोशिश की, लेकिन वे ऐसा कर पाते इस से पहले ही हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी. वह सड़क पर ही ढेर हो गए. हेडकांस्टेबल सुशीला ने सरोज को बदमाशों की गोलियों से देवेंद्र सड़क से पत्थर उठाने के लिए नीचे झुका तो गोलियां उस के सिर के ऊपर से गुजर गईं. हमलावर उन पर और भी गोलियां चलाना चाहते थे, लेकिन गोलियां खत्म होने के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए.

योजना बना कर किया हमला

हमलावरों के भाग जाने के बाद हैडकांस्टेबल सुशीला जैसेतैसे घायल ममता और सबइंसपेक्टर नरेंद्र को उठा कर पीजीआई रोहतक ले गई. लेकिन दोनों को बचाया नहीं जा सका. घटना के बाद पूरे क्षेत्र में हडंकंप मच गया. हमलावरों को पकड़ने के लिए रोहतक में सड़कों पर बैरिकेड्स लगा कर तलाशी अभियान चला, लेकिन वे भागने में कामयाब रहे.

8 अगस्त को लेडी हेडकांस्टेबल सुनीता के बयान पर ममता और सबइंसपेक्टर नरेंद्र की संदिग्ध हत्यारों के विरुद्ध भादंवि की धारा 333, 353, 196, 307, 302, 34 और 120बी के तहत दर्ज कर के तफ्तीश शुरू की गई. इस केस की जांच आर्यनगर की थानाप्रभारी सुनीता को सौंपी गई.

रोहतक के एसपी जशनदीप सिंह ने डीएसपी रमेश कुमार को निर्देश दिया कि इस केस से संबंधित सभी आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें. थानाप्रभारी सुनीता ने हमलावरों की तलाश में ममता के पिता रामकेश के गांव गद्दीखेड़ा में दबिश दी. वहां वारदात में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल तो मिल गई पर वहां से कातिल फरार हो चुके थे.

रामकेश और सरिता से पूछताछ करने के बाद दोनों को 10 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया. उसी दिन ममता के दत्तक पिता को भी पुलिस उन के घर से गिरफ्तार कर थाना आर्यनगर ले आई.

चारों से प्रारंभिक पूछताछ के बाद ममता हत्याकांड के पीछे यह बात निकल कर सामने आई कि उस की हत्या कराने में मुख्य हाथ उस के दत्तक पिता रमेश का हाथ था. उस की हत्या 7 लाख की सुपारी दे कर कराई गई थी, जिस में मुख्य भूमिका ममता के मौसेरे भाई मोहित उर्फ मंगलू ने निभाई थी.

मंगलू ने उत्तर प्रदेश के 2 पेशेवर शार्पशूटरों को ममता की हत्या की सुपारी दी थी. दोनों शूटर हत्या के एक दिन पहले गद्दीखेड़ी गांव आ गए थे. मोहित ने अगले दिन उन के लिए एक बाइक मुहैया करवाई और खुद शूटर्स की कार में बैठा रहा.

घटना वाले दिन जब ममता अपनी सास के साथ सड़क पर चल रही थी तो उस से कुछ ही दूरी पर खड़े उस के दत्तक पिता ने हत्यारों को ममता की ओर इशारा कर के उसे गोली मारने का इशारा किया.
उस का इशारा पाते ही मोटरसाइकिल सवार हत्यारों ने पहले तो ममता पर गोली चलाई, लेकिन जैसे ही उन्होंने सबइंसपेक्टर नरेंद्र को रिवौल्वर निकालते देखा तो उन्हें भी गोली मार दी. इस के बाद सभी गद्दीखेड़ा गांव पहुंचे.

वहां खाना खाने के बाद वे अपनी कार से फरार हो गए. पुलिस की जांच में यह तथ्य सामने आया कि ममता के मौसेरे भाई मोहित का मोबाइल फोन गद्दीखेड़ा गांव पहुंचने तक औन था. वहां पहुंचते ही उस का मोबाइल औफ हो गया था. घटना वाले दिन उस की आखिरी लोकेशन गद्दीखेड़ा गांव में ही थी.
उधर पोस्टमार्टम के बाद पुलिस की निगरानी में ममता की लाश का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस की लाश को मुखाग्नि उस के ताऊ के लड़के नान्हा ने दी.

सबइंसपेक्टर नरेंद्र की लाश को उन के घर वालों के हवाले कर दिया गया, जिन्होंने उन का अंतिम संस्कार पुलिस सम्मान के साथ किया. उस समय कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वहां मौजूद थे. शहीद सबइंसपेक्टर नरेंद्र के परिवार वालों को सरकार की ओर से 60 लाख रुपए का अनुदान देने की घोषणा की गई है.

चूंकि नरेंद्र अनुसूचित जाति के थे, इसलिए इस दोहरे हत्याकांड में अब एससी/एसटी एक्ट जोड़ कर आगे की जांच रोहतक के डीएसपी रमेश कुमार करेंगे. ममता का पति सोमबीर और ससुर जयराज अभी भी सुनारिया जेल में बंद हैं. उन्हें अपने घर वालों की हत्या किए जाने की आशंका है. इस हत्याकांड में शामिल अन्य आरोपियों की जोरशोर से तलाश जारी है.

जब इन फिल्मों में पद्मिनी कोल्हापुरे ने दिये थे न्यूड सीन

70 और 80 के दशक में एक्ट्रेस पद्मिनी कोल्हापुरे ने अपने करियर के दौरान कई हिट फिल्मों में काम किया. पद्मिनी बचपन से ही गाना गाती थी और अपना करियर एक सिंगर के रूप में बनाना चाहती थीं. वो अपनी बहन के साथ कोरस में गाना गाया करती थीं.

उन्होंने यादों की बारात फिल्म में भी गाया था. ऋषि कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे की ब्लाकबस्टर फिल्म ‘प्रेम रोग’ तो आपको याद ही होगी. इस फिल्म से पद्मिनी काफी पौपुलर हो गईं थीं. इस फिल्म को महान एक्टर-डायरेक्टर राज कपूर ने डायरेक्ट किया था.

इस फिल्म के लिए उन्हें निर्देशन के लिए बेस्ट डायरेक्टर फिल्म फेयर अवौर्ड भी मिला. इसके साथ ही यह फिल्म बौक्स औफिस पर कई रिकौर्ड तोड़ने में कामयाब रही. लेकिन यहां हम बात कर रहे हैं एक्ट्रेस पद्मिनी कोल्हापुरे की. दरअसल, पद्मिनी कोल्हापुरे ने अपने करियर के शुरुआती दिनों में कई एसे रोल किए जिससे लोगों ने उन्हें एडल्ट एक्ट्रेस कहना शुरू कर दिया था.

1980 में रिलीज हुई फिल्म ‘गहराई’ में पद्मिनी ने एक न्यूड सीन देकर सनसनी मचा दी थी. इतना ही नहीं इसी साल आई फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ में भी पद्मिनी ने एक लंबा रेप सीन दिया. जिसके बाद लोगों ने पद्मिनी कोल्हापुरे को एडल्ट एक्ट्रेस का तमगा दे दिया. ये दोनों ही फिल्में बौक्स औफिस पर हिट साबित हुई. इन फिल्मों की सफलता को देखते हुए पद्मिनी कोल्हापुरे काफी खुश हुईं.

लेकिन कुछ दिनों बाद उन्हें एहसास हुआ कि इस तरह की फिल्में कर ज्यादा समय तक इंडस्ट्री में कामयाब नहीं रह पाएंगी. पद्मिनी को लेकर लोगों के मन में धारणा बदल रही थी. जब इस बात का अहसास पद्मिनी को हुआ तो वो इस तरह के सीन करने से बचने लगी. हालांकि डायरेक्टर्स लगातार इस तरह की फिल्में लेकर उनके पास आते रहें. लेकिन वो हर फिल्म को ठुकराती चली गईं.

मनमर्जियां : तापसी पन्नू और विक्की कौशल का शानदार अभिनय

प्रेम त्रिकोण पर कई फिल्में बन चुकी हैं. ‘मनमर्जियां’ भी उन्ही में से एक है. कहानी के स्तर पर दूसरी फिल्मों से यह कुछ ज्यादा भिन्न नहीं है. मगर प्रस्तुतिकरण के स्तर पर ‘मनमर्जियां’ काफी अलग तरह की फिल्म है. इसमें प्यार व रिश्तों की जटिलताओं के साथ प्यार के पैशन व जिंदगी भर की सुरक्षा के बीच लड़की क्या चुनती है, इसका भी चित्रण है. पर फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप हैं, तो कुछ तो डार्क हिस्सा भी रहेगा.

फिल्म की कहानी अमृतसर में अपने चाचा, चाची और दादा जी के साथ रह रही रूमी (तापसी पन्नू) और विक्की संधू उर्फ डी जे संधू (विक्की कौशल) की प्रेम कहानी से शुरू होती है. दोनों इस कदर गले तक प्यार में डूबे हुए हैं, मिलते ही एक दूसरे में समा जाना चाहते हैं. इनका प्यार शारीरिक सीमाओं को पार कर चुका है. विक्की संधू समाज की परवाह किए बगैर दूसरों की घरों की छतों पर से कूदता फांदता रूमी के शयनकक्ष में किसी भी समय पहुंच जाता है. रूमी किचन में हो या कहीं और वह भी संधू की आहट पाते ही अपने शयनकक्ष में पहुंच जाती है. और फिर शारीरिक प्यार होता है. संतुष्ट होते ही संधू नौ दो ग्यारह हो जाता है. पूरे अमृतसर में इनके प्यार के चर्चे हैं. मगर रूमी घर के सदस्यों को यह कहकर भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करती रहती है कि यदि उसके माता पिता जिंदा होते तो उसके साथ ऐसा नहीं होता.

पर जब रूमी की चाची व दादाजी रूमी और संधू को शयनकक्ष में रंगे हाथों पकड़ते हैं, तो रूमी के घर वाले रूमी पर शादी के लिए दबाव बनाते हैं. रूमी के परिवार के लोग रूमी की शादी, संधू से भी करने को तैयार हैं, बशर्ते संधू अपने माता पिता के साथ रूमी का हाथ मांगने आएं. रूमी, संधू से कहती है कि वह अपने पिता के साथ उसके घर शादी की बात करने आ जाए. मगर आवारा लौंडा विक्की संधू कब आने लगा. वह तो शादी की स्थिति के लिए अभी परिपक्व ही नहीं हुआ है. उसके लिए तो रूमी के संग प्यार ही काम है.

जब रूमी को संधू गच्चा दे जाता है, तो रूमी की उसके घरवालों के सामने काफी फजीहत होती है. गुस्से में रूमी, संधू से झगड़ती है. रूमी कुछ समय मांगती है, पर अपने प्यार को जैसा का तैसा जारी रखना चाहती है. अब तो इनके प्यार का खेल वहां भी होने लगता है जहां संधू डी जे है. इसी बीच रूमी के घर वाले शादी कराने वाले काकाजी से कह कर रूमी के लिए रिश्ता ढूंढ़ने के लिए कहते हैं. और काकाजी की तरफ से लंदन से शादी करने आए बैंकर रौबी (अभिषेक बच्चन) का रिश्ता आ जाता है.

अब रूमी, संधू से झगड़ती है और संधू को बता देती है कि उसकी शादी रौबी से होने जा रही है. संधू से निराश रूमी भी रौबी के साथ शादी के लिए तैयार हो जाती है. पर विक्की अपने प्यार की शिद्दत का वास्ता देकर उसे अपने साथ घर से भागने के लिए राजी कर लेता है. दोनों घर से भागते हैं. कुछ दूर जाने पर रूमी को पता चलता है कि संधू के पास फूटी कौड़ी नही है. अब सवाल है कि वह बिना पैसे के कहां जाएं और वहां क्या करेंगे, कैसे रहेंगे. दोनों में झगड़ा होता है और वह वापस अपने घर आ जाती है.

रूमी व रौबी की शादी तय हो जाती है. तब संधू रात में काकाजी के घर पहुंचकर उसे धमकाता है. दूसरे दिन काकाजी सारी कहानी रूमी के घर वालों को बता देता है. रूमी को गुस्सा आता है. वह संधू से कह देती है  कि अब वह रौबी से ही शादी करेगी. पर संधू एक बार फिर रूमी के साथ भागने की योजना बनाता है. मगर वह पुनः रूमी को धोखा दे देता है. अंततः रूमी मनमारकर रौबी के नाम की मेंहदी रचा लेती है. तब फिर संधू उसके पास पहुंचता है. पर अब रूमी, संधू को भगाकर रौबी से शादी कर लेती है. पर मन व दिल से संधू से अलग नहीं हो पाती और हनीमून के लिए कश्मीर से एक ही दिन में रौबी के साथ वापस आ जाती है.

इधर रौबी अपनी तरफ से रूमी के साथ सामंजस्य बैठाने और उसके दिल में अपने प्रति प्यार पैदा करने के प्रयास में लगा रहता है. उधर रूमी झूठ बोलकर संधू के पास जाती रहती है. दोनों जब भी मिलते हैं,पुराने अंदाज में ही प्यार करते रहते हैं. एक दिन रौबी छिपकर रूमी का पीछा करता है और संधू व रूमी के बीच की बातचीत सुनता है. फिर रौबी अपने आपको ही दोषी ठहराते हुए रूमी से तलाक लेने का निर्णय लेता है. इससे संधू खुश हो जाता है और वह अपने माता पिता के साथ रूमी के घरवालों के पास पहुचता है. संधू बड़ी बड़ी हांकते हुए आस्ट्रेलिया जाने की बात करता है. रूमी, संधू को समझाकर आस्ट्रेलिया भेज देती है.

इधर रूमी व रौबी अदालत में तलाक की कारवाही पूरी कर निकलते हैं. रास्ते में उनके बीच बातचीत होती है, फिर रूमी रौबी के साथ ही रहने के लिए चल देती है.

अनुराग कश्यप बेहतरीन निर्देशक हैं, इसमें कोई दो राय नहीं. मगर इस बार उन्हे अति प्रतिभाशाली कलाकारों का साथ भी मिल गया. जिसके चलते दर्शक फिल्म के साथ इस कदर बंधा रहता है कि फिल्म की कमियों की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता. इसमें कोई दो राय नहीं कि यह फिल्म अनुराग कश्यप की पिछली सभी फिल्मों से बहुत अलग है. इसमें प्यार का रंग है. मगर फिल्म के अंत से हर किसी का सहमत होना आवश्यक नहीं. वैसे भी अनुराग कश्यप ने अब तक परंपराओं का निर्वाह नहीं किया है. पर अनुराग कश्यपप ने युवा दर्शकों लुभाने के लिए हर मसाला डाला है. फिल्म देखकर लगता है कि अनुराग कश्यप ने नई पीढ़ी को ध्यान में रखकर ही फिल्म को गढ़ा है.

फिल्म की लेखक कनिका ढिल्लों ने प्यार को गहराई से उकेरने के अलावा दिल की सुनकर इंसान किस तरह गलतियां करता है, उसकी तरफ भी इशारा किया है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो रूमी के किरदार में तापसी पन्नू और विक्की संधू उर्फ डी जे संधू के किरदार में विक्की कौशल ने कमाल का अभिनय किया है. प्यार को समझने वाले मगर जिंदगी और जिम्मेदारी को न समझने वाले विक्की संधू के किरदार को विक्की कौशल ने सही मायनों में जिया है. विक्की कौशल ने इस फिल्म में अपने अभिनय के जलवे से साबित कर दिखाया कि बौलीवुड में उनके अभिनय से लोहा लेने वाला कोई कलाकार नहीं है. तापसी पन्नू के करियर की यह अति सर्वश्रेष्ठ फिल्म है. फिल्म में कई ऐसे सीन हैं जहां तापसी पन्नू बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती हैं. कुल मिलाकर यह पूरी फिल्म तापसी पन्नू और विक्की कौशल की ही है. पिछली फिल्मों के मुकाबले इस फिल्म में अभिषेक बच्चन का अभिनय कुछ ठीक है. पर अभी भी उन्हे अपनी अभिनय प्रतिभा को निखारने की जरुरत है.

जहां तक संगीत का सवाल है, तो अमित त्रिवेदी का संगीत ठीक ठाक है. पर इसमें पंजाबी हिप हाप गीत संगीत की भरमार है.

दो घंटे 35 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ का निर्माण आनंद एल राय की कंपनी ‘येलो कलर प्रोडक्शंस’ ने फैंटम के साथ मिलकर किया है. निर्देशक अनुराग कश्यप, लेखक कनिका ढिल्लों, संगीतकार अमित त्रिवेदी तथा कलाकार हैं- अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू, विक्की कौशल, अक्षय अरोड़ा, अशनूर कौर, पवन मल्होत्रा व अन्य.

आम आदमी से लेता हूं अभिनय की प्रेरणा : हेमंत पांडे

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के रहने वाले, मजाकिया हेमंत पांडे 1996 से ही अदाकारी की दुनिया के हो गए थे, लेकिन लोगों ने उन्हें कौमेडी शो ‘औफिसऔफिस’ में उन के द्वारा निभाए गए पांडेजी के किरदार से जाना. इस के बाद ‘कृष’, ‘रहना है तेरे दिल में’ जैसी 2 दर्जन से ज्यादा फिल्मों में उन्होंने हंसी की फुलझडि़यां बिखेरी हैं.

वे अपनी अलगअलग छवियां बनाना चाहते हैं. इसलिए इन दिनों वे कौमेडी से इतर भी कई तरह के रोल करने में खासी रुचि ले रहे हैं. हालांकि वे कौमेडी में इतना रचबस गए हैं कि लोग उन्हें किसी दूसरी छवि में देखने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने ढाई दशकों तक रंगमंच और सिनेमा से जुड़ी कई नामचीन हस्तियों के साथ काम किया है. बावजूद इस के, वे कहते हैं कि जिंदगी की असली लड़ाई तो अब शुरू हुई है.

एक बातचीत में उन्होंने बताया, ‘‘पढ़ाईलिखाई में कमजोर होने की वजह से लड़कियां उन्हें पसंद नहीं करती थीं. लेकिन मैं एक लड़की को पसंद करता था. उस का नाम जानने के लिए मैं आटे की चक्की तक चला गया था. उस के चक्की से लौटने के बाद, मैं वहां गया और रजिस्टर देखा जिस पर उस का नाम लिखा था.’’

हेमंत इतना बताने के बाद जोर से हंस पड़े. थोड़ी देर बाद हंसी रोकते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मैं ने उस लड़की के लिए 64 पेज का लव लैटर लिखा था. मैं ने जब उस के हाथ में 64 पेज दिए तो वह घबरा गई थी. उस ने पूछा, लैटर कहां है? मैं ने कहा, ये सारे पेज लव लैटर ही के तो हैं.’’

हेमंत कहते हैं, ‘‘हास्य अभिनय की शुरुआत मैं ने अपने पड़ोसियों की मिमिक्री से की थी. बचपन की यह शरारत मेरे बहुत काम आई है. मैं आम आदमी से हास्य अभिनय की प्रेरणा लेता हूं. मुझे पोस्टमैन, बैंक मैनेजर, परचून की दुकान का लाला वगैरह सभी अभिनय की प्रेरणा देते हैं.’’ उन का मानना है, ‘‘आज की स्ट्रैस वाली लाइफ में अगर किसी के चेहरे पर उन के कारण हंसी आती है, तो इस से अच्छी बात और क्या होगी.’’

लव सोनिया : बेहतरीन कलाकारों के अभिनय से सजी फिल्म

सेक्स रैकेट, बाल यौन शोषण और वूमन ट्रैफीकिंग पर कई फिल्में बन चुकी हैं. 2014 में मशहूर फिल्मकार नागेश कुकनूर भी इसी विषय पर फिल्म ‘‘लक्ष्मी’’ लेकर आए थे. अब इसी विषय पर ‘‘लाइफ आफ पाई’’ जैसी आस्कर अवार्ड विजेता फिल्म के निर्माता तबरेज नूरानी बतौर निर्माता व निर्देशक फिल्म ‘‘लव सोनिया’’ लेकर आए हैं. जिसमें उन्होंने दो बहनों के अगाध प्यार की कहानी के बहाने वूमन ट्रैफीकिंग व देह व्यापार की बदसूरत दुनिया की उस क्रूर व निर्मम सच का चित्रण किया है, जिसे देख इंसान विचलित हो जाता है. यह एक अति डार्क फिल्म है. मगर फिल्मकार तबरेज नूरानी को सारी गंदगी व गरीबी महज भारत में ही क्यों नजर आयी?

फिल्म की कहानी महाराष्ट् के एक गांव से शुरू होती है, जहां कर्ज तले दबा किसान शिवा (आदिल हुसेन) की दो बेटियां हैं, बेटा नहीं है. वह अपनी बड़ी बेटी सोनिया (मृणाल ठाकुर) से सांड़ की तरह खेत में मेहनत करवाता है. छोटी बेटी प्रीति (रिया सिसोदिया) उतनी मेहनत नहीं कर पाती है. इसलिए शिवा अक्सर उसे पीटता रहता है और कोसता रहता है कि ईश्वर ने बेटे के जगह बेटियां क्यों दे दी. पर सोनिया और प्रीति के बीच अगाध प्यार है. सोनिया के बनिस्बत प्रीति काफी खूबसूरत भी है.

एक दिन शिवा अपना कर्ज चुकाने के लिए काका ठाकुर (अनुपम खेर) के हाथों चंद रूपयों में प्रीति का सौदा कर लेता है. जब वह पैसे लेकर प्रीति को दादा ठाकुर के पास सौंपने जाता है, तो वहां सोनिया भी पहुंच जाती है और वह उसका विरोध करती है. पर सोनिया की एक नहीं चलती. दादा ठाकुर, प्रीति को अंजली (साई ताम्हणकर) के हवाले करते हैं. अंजली, प्रीति को लेकर मुंबई में फैजल उर्फ बाबू (मनोज बाजपेयी) के वेश्यागृह में पहुंचा देती है.

कई दिन बीत जाने पर भी जब प्रीति की कोई खबर नहीं मिलती है, तो सोनिया, दादा ठाकुर के पास पहुंचकर कहती है कि वह उसे भी प्रीति के पास मुंबई पहुंचा दें. वह भी मुंबई में काम करेगी. अंजली, सोनिया को लेकर बाबू के पास पहुंचती है. यानी प्रीति की तलाश में सोनिया भी देह व्यापार के घिनौने धंधे में पहुंच जाती है. सोनिया वहां भी प्रीति से मिलने की बात करती है. बाबू और उसकी सहयोगी माधुरी (रिचा चड्ढा) कई तरह से सोनिया को टार्चर करते हैं. यहीं पर सोनिया की मुलाकात रश्मि (फ्रीडी पिंटो) से होती है. इन्हे भी किसी न किसी मजबूरी के तहत देह व्यापार में जबरन ढकेला गया था. पर एक दिन सोनिया को उसकी बहन प्रीति से मिलवाया जाता है.

ड्रग्स के नशे की आदी हो चुकी प्रीति, सोनिया को बहन मानने से इंकार कर देती है. उधर सोनिया को इस दलदल से निकालने के लिए समाज सेवक मनीष (राज कुमार राव) अपनी जान की बाजी लगा देता है. पर अपनी बहन प्रीति को बचाने के लिए वह जिस्मफरोशी के उस दलदल से निकलने के लिए राजी नहीं होती. कहानी में कई मोड़ आते हैं. एक दिन बाबू, सोनिया का सौदा किसी विदेशी ग्राहक से करता है और फिर कंटेनर के अंदर बंद कर समुद्री रास्ते से माधुरी व सोनिया को दुबई और वहां से लास एंजेल्स भेज दिया जाता है.

जहां एक दिन सोनिया भागने में सफल होती है और उसे एक एनजीओ की मदद मिलती है. जिसकी मदद से उसका संपर्क भारत में मनीष से होता है. पता चलता है कि मनीष के ही एनजीओ में दूसरी लड़कियों के साथ प्रीति भी रह रही है. अंततः सोनिया भारत आकर मनीष के एनजीओ में रहना शुरू करती है. पर उसकी बहन प्रीति तब तक पुनः देह व्यापार के दलदल में जा चुकी होती है.

तबरेज नूरानी की फिल्म काफी विचलित करती है और कई जगह पर वह बहुत सतही स्तर पर कहानी को बयां कर गए हैं. पर उन्होंने डार्क पक्ष को ही ज्यादा महत्व दिया है. उन्होंने इंसानियत के काले पक्ष को भी उजागर किया है. फिल्म में इस बात का बड़ी बेबाकी से चित्रण है कि यहां इंसान महज अपने स्वार्थ लिप्तता के चलते संवेदनहीन हो गया है. फिल्म में देह व्यापार के साथ पुलिस प्रशासन की मिली भगत की ओर भी इंगित किया गया है. अफसोस फिल्मकार ने फिल्म को अधूरा ही छोड़ा है.

फिल्मकार का दावा है कि यह फिल्म कई सत्य घटनाओं पर आधारित है, पर फिल्म देखकर यह अहसास भी होता है कि यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है, जो प्रेम कहानी के नाम पर उत्तेजित होना चाहते हैं. इतना ही नहीं फिल्मकार ने भारत में ही ज्यादा गंदगी व प्रताड़ना आदि का चित्रण किया है. जबकि दुबई व लास एजेंल्स को काफी अच्छा दिखा दिया है.

मगर हम सभी इस हकीकत से वाकिफ हैं कि पूरे विश्व में देह व्यापार और वूमन ट्रैफीकिंग के अनैतिक धंधे में अमरीका का लास एंजेल्स शहर नंबर वन है. फिल्म में ‘मुंह से सेक्स’ ‘बैक डोर एंट्री, ‘सील’ जैसे संवाद फिल्म का स्तर घटाते है. बहरहाल, आम दर्शक इस फिल्म को पसंद करेगा, ऐसी उम्मीद कम नजर आती है.

अफसोस की बात यह है कि देह व्यापार के धंधे में सोनिया के पहुंचते ही  शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व मौखिक दुव्र्यवहार आदि हवा में उड़ जाता है. सिर्फ देह व्यापार की स्याह दुनिया ही रह जाती है. पर फिल्म के निर्देशक तबरेज नूरानी को प्रतिभाशाली कलाकारों का अच्छा साथ मिला है. फिल्म का पार्श्व संगीत उम्दा है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो प्रीति के किरदार में रिया सिसोदिया ने ठीक ठाक अभिनय किया है. मगर सोनिया के किरदार में मृणाल ठाकुर ने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. उनके अभिनय के ही चलते उनकी पीड़ा दर्शकों को भी कचोटती है. रिचा चड्डा तो बेहतरीन अदाकारा हैं, इसमें कोई दो राय नहीं. वेश्याग्रह के मालिक के किरदार में मनोज बाजपेयी भी जमे हैं. अपने छोटे किरदार में राज कुमार राव भी अपनी छाप छोड़ ही जाते हैं. फ्रीडा पिंटो की प्रतिभा को जाया किया गया है. डेमी मूर, अनुपम खेर, आदिल हुसेन आदि ने भी अच्छा अभिनय किया है.

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘लव सोनिया” का निर्माण डेविड वोमार्क और तबरेज नूरानी ने किया है. निर्देशक तबरेज नूरानी, लेखक अल्केश वजा व तेड कप्लान, संगीतकार नील्स बाय नेल्सन और कलाकार हैं – मनोज बाजपेयी, राज कुमार राव, रिचा चड्ढा, डेमी मूर, फ्रीडा पिंटो, मृणाल ठाकुर, रिया सिसोदिया, आदिल हुसेन, अनुपम खेर, साई ताम्हणकर, सनी पवार, मार्क डुप्ल व अन्य.

पेशे से प्लंबर एलन प्राइस 80 साल की उम्र में हैं एक्टिव क्रिकेटर

कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती. यह बस एक नंबर बनकर रह जाती है. इस बात की मिसाल स्टैफोर्डशायर के रहने वाले क्रिकेटर एलन प्राइस हैं. 80 साल की उम्र में भी वे एक्टिव क्रिकेटर हैं. खास बात यह है कि उन्होंने 56 साल की उम्र में खेलना शुरू किया था.

एलन प्लंबर हैं और पहले फुटबॉल खेला करते थे. एक दिन वे बतौर दर्शक क्रिकेट मैच देख रहे थे. तभी उन्हें सब्स्टिट्यूट फील्डर के तौर पर ग्राउंड पर बुलाया गया. उस दिन 12वां खिलाड़ी बनने के बाद से वे नियमित तौर पर अपने लोकल क्लब निपर्सली के प्लेइंग इलेवन में शामिल रहने लगे. वे लगभग हर रविवार को स्टोन एंड डिस्ट्रिक लीग में खेलने लगे.

एलन प्राइस के साथी खिलाड़ी एलन स्मिथ कहते हैं कि हर कोई उनसे प्यार करता है और लीग में सम्मान की नजर से देखता है. खासकर प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी उनका बहुत आदर करते हैं. जब वे विपक्षी टीम के मैदान पर खेल रहे होते हैं, तब भी दर्शक उनके लिए तालियां बजाते हैं. वे एक गेंदबाज हैं और अब भी विकेट लेते हैं. लेकिन, उनका मुख्य योगदान युवा खिलाड़ियों में सुधार लाने का रहता है.

जिस उम्र में लोग पेंशन लेकर घर बैठते हैं, उस उम्र में प्राइस लीग क्रिकेट में 16.07 के औसत से 243 विकेट ले चुके हैं. यह इस लीग में पांचवां सर्वश्रेष्ठ आंकड़ा है. जून 2014 में बर्सलेम के खिलाफ उन्होंने 32 रन देकर सात विकेट लिए थे. यह इस लीग में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. उन्होंने कुल 18 बार पारी में पांच विकेट लेने का कारनामा किया है. 79 साल की उम्र में 2017 में उन्होंने एक सीजन में 38 विकेट लिए थे. यह एक सीजन में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.

लीग के सचिव बोले, पिछले 10 साल में बेहतरीन प्रदर्शन

लीग के सचिव डेविड पावेल ने कहा, ‘मैं उन्हें निजी तौर पर नहीं जानता हूं. लेकिन, पिछले 10 साल में उन्होंने जैसा प्रदर्शन किया है वह काबिले तारीफ है. वे अपनी टीम के सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में से एक हैं. यकीन ही नहीं होता कि वे 80 साल के हैं. वे हम सभी के लिए उदाहरण हैं क्योंकि वे इस उम्र में भी कमाल का प्रदर्शन करते हैं.

ऑस्ट्रेलियन अखबार में छपे सेरेना के कार्टून पर विवाद

नाओमी ओसाका के साथ यूएस ओपन फाइनल के बाद से सेरेना विलियम्स सुर्खियों में हैं. उस मैच में सेरेना हार गई थीं और उन्होंने चेयर अंपायर पर महिला खिलाड़ियों से भेदभाव करने का आरोप लगाया था. इसके बाद से टेनिस और मीडिया से जुड़ा एक तबका सेरेना के पक्ष में है जबकि एक तबका उनके खिलाफ है.

इसी बीच, ऑस्ट्रेलिया के कार्टूनिस्ट मार्क नाइट इसी मामले पर बनाए अपने कार्टून को लेकर विवादों में घिर गए हैं. नाइट ने ऑस्ट्रेलिया के सबसे लोकप्रिय अखबारों में से एक हेराल्ड सन में प्रकाशित अपने कार्टून में एक ओर सेरेना को रैकेट तोड़ते दिखाया है, तो दूसरी ओर चेयर अंपायर को ओसाका से यह कहते दिखाया है कि क्या वे सेरेना को जीतने दे सकती हैं?

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इस कार्टून पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है. नाइट के ऊपर नस्लभेदी और लिंगभेदी होने के आरोप भी लगे हैं. पहले भी विवादास्पद कार्टून बनाने के लिए मशहूर रहे नाइट के कार्टून वाले ट्विटर पोस्ट पर 22 हजार से अधिक लोगों ने कमेंट किया है. इनमें ज्यादातर ने उनकी आलोचना ही की है.

हैरी पाटर सीरीज की लेखिका जेके रोलिंग ने लिखा, ‘महानतम स्पोर्ट्स वूमन में से एक को आपने नीचा दिखाया है. साथ ही एक और महान खिलाड़ी को गलत रूप में दर्शाया है.’ नाइट ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि उनका इरादा खराब व्यवहार को दिखाने का था, न कि किसी महिला को नीचा दिखाने का.

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अखबार के संपादक डेमन जॉन्सटन ने भी नाइट का बचाव किया है. उन्होंने लिखा है कि नाइट ने एक स्टार खिलाड़ी के खराब प्रदर्शन को सही तरीके से उकेरा है. कार्टून नस्लभेदी या लिंगभेदी नहीं है. उन्हें हम सब का समर्थन हासिल है.

कुछ लोगों ने कार्टून में ओसाका को सुनहरे बाल वाली श्वेत महिला के तौर पर दिखाने पर आपत्ति जताई है. ओसाका की मां जापानी मूल और पिता हैती मूल के हैं. अमेरिका में नेशनल एसोसिएशन ऑफ ब्लैक जर्नलिस्ट ने भी नाइट के कार्टून की आलोचना की है.

अंपायर ने सेरेना पर गेम पेनल्टी लगाई थी

सेरेना को कोचिंग के कारण कोड उल्लंघन, रैकेट पटकने के कारण पेनल्टी प्वाइंट, अंपायर को चोर कहने के कारण चेयर अंपायर कार्लोस ने गेम पेनल्टी लगाई थी. कोचिंग के कारण कोड उल्लंघन इसलिए लगाया गया क्योंकि मैच के दौरान सेरेना के कोच उन्हें हिंट देने की कोशिश कर रहे थे.

नवरातिलोवा ने कहा, सेरेना ने गलती की, पर टेनिस में भेदभाव होता है

पूर्व दिग्गज और 18 ग्रैंड स्लैम विजेता मार्टिना नवरातिलोवा ने यूएस ओपन के फाइनल में सेरेना विलियम्स की हरकत को गलत बताया है. हालांकि वे इस बात से सहमत हैं कि टेनिस में पुरुष और महिला खिलाड़ियों में भेदभाव किया जाता है. न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखे अपने आर्टिकल में 61 साल की नवरातिलोवा ने कहा है कि हमें इस बात से खुद का आकलन नहीं करना चाहिए कि क्या गलत करके हम बच सकते हैं. मेरी राय में अगर किसी पुरुष खिलाड़ी ने भी ऐसा किया होता तो वह गलत होता.

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