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सरदार सिंह : 28 दिन पहले ओलिंपिक में खेलने की इच्छा जताई, अब संन्यास

भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान सरदार सिंह ने इंटरनेशनल हॉकी से संन्यास ले लिया है. सरदार ने 12 साल के करिअर में 350 मैच खेले. 32 साल के सरदार 2008 से 2016 तक टीम के कप्तान भी रहे. सरदार ने हाल ही में जकार्ता में आयोजित एशियन गेम्स में हिस्सा लिया था. वहां भारतीय टीम ने ब्रॉन्ज मेडल जीता था. सरदार के संन्यास लेने की खबर तब आई, जब एशियन चैंपियंस ट्रॉफी और वर्ल्ड कप के लिए आयोजित नेशनल कैंप के लिए 25 सदस्यीय संभावित टीम की घोषणा हुई. इस टीम में सरदार को जगह नहीं मिली है. जबकि सरदार ने 28 दिन पहले एशियन गेम्स के लिए रवाना होने से पहले कहा था कि वे टोक्यो ओलिंपिक में खेलना चाहते हैं. उन्होंने यो-यो टेस्ट में क्रिकेट कप्तान विराट कोहली को भी पीछे छोड़ दिया था.

पहला और अंतिम मैच पाक के खिलाफ ही खेला

सरदार ने अपना सीनियर डेब्यू 2006 में पाकिस्तान के खिलाफ किया था. अंतिम मैच भी एशियाड में पाक के खिलाफ ही खेला. वे टीम में मिडफील्ड के महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन गए. सरदार ने 2008 में सुल्तान अजलान शाह कप में टीम की कमान संभाली. तब वे भारतीय टीम के कप्तान बनने वाले सबसे युवा खिलाड़ी थे. 2016 में उनकी जगह पीआर श्रीजेश को कप्तान बनाया गया. सरदार को 2012 में अर्जुन अवॉर्ड और 2015 में पद्मश्री अवॉर्ड मिला. उन्होंने दो ओलिंपिक (लंदन-2012 और रियो-2016) खेले.

नेशनल कैंप के लिए 25 सदस्यीय टीम घोषित

हॉकी इंडिया ने बुधवार को नेशनल कैंप के लिए 25 सदस्यीय टीम की घोषणा की. कैंप 16 सितंबर से भुवनेश्वर के कलिंगा हॉकी स्टेडियम में शुरू होगा. यह कैंप एशियन चैंपियंस ट्रॉफी और वर्ल्ड कप की तैयारियों के लिए लगाया जा रहा है. एशियन चैंपियंस ट्रॉफी 18 अक्टूबर से मस्कट में शुरू हो रही है. यहां भारत खिताब बचाने उतरेगा. वहीं, वर्ल्ड कप 28 नवंबर से भुवनेश्वर में होना है.

कैंप के लिए चयनित खिलाड़ी

गोलकीपर: श्रीजेश, सूरज, कृष्ण बहादुर डिफेंडर: हरमनप्रीत, रूपिंदर पाल, गुरिंदर, वरुण, कोथाजीत, सुरेंद्र, जरमनप्रीत, प्रदीप मिडफील्डर: मनप्रीत, चिंगलेनसना,सिमरनजीत, सुमित, नीलकांता, हार्दिक, ललित, विवेक. फारवर्ड: एसवी सुनील, आकाशदीप, गुरजंत, मंदीप, दिलप्रीत, सुमित कुमार.

लार्ज कैप फंड का रिटर्न हमेशा इंडेक्स से ज्यादा

लंबे समय में संपत्ति बनाने के लिए लार्ज कैप फंड को पोर्टफोलियो में शामिल करना जरूरी माना जाता है. इसके कई कारण हैं. ये अपने सेक्टर में लीडर होते हैं, बाजार में इनकी अच्छी मौजूदगी होती है, कैश फ्लो मजबूत होता है और नियमित रूप से डिविडेंड देते हैं. इन वजहों से उतार-चढ़ाव के समय ये फंड पोर्टफोलियो को स्थिरता देते हैं. खुदरा निवेशकों के लिए लार्ज कैप शेयरों में निवेश करना मुश्किल और खर्चीला हो सकता है. खासकर उनके लिए जो बाजार के बारे में ज्यादा नहीं जानते. उनके लिए लार्ज कैप फंड बेहतर विकल्प हैं.

शीर्ष कंपनियों में निवेश करते हैं लार्ज कैप फंड : लार्ज कैप फंड ब्लू चिप कंपनियों में निवेश करते हैं. इन कंपनियों का मैनेजमेंट अनुभवी होता है. इनके बारे में सार्वजनिक रूप से पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध होते हैं जिनके आधार पर इनका मूल्यांकन किया जा सके. सेबी के नए नियमों के मुताबिक लार्ज कैप फंडों को अपने एसेट का कम से कम 80% लार्ज कैप कंपनियों के इक्विटी प्रोडक्ट में निवेश करना जरूरी है. सेबी ने मार्केट कैप के लिहाज से शीर्ष 100 कंपनियों को लार्ज कैप में रखा है.

लार्ज कैप फंड में निवेश के फायदे : यह उनके लिए अच्छा विकल्प है जो कम उतार-चढ़ाव वाले स्टॉक में पैसे लगाना चाहते हैं. लार्ज कैप कंपनियां सेक्टर लीडर होती हैं,बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड होता है, फंडामेंटल मजबूत होते हैं. इनमें लंबे समय तक अच्छा रिटर्न देने की क्षमता होती है. इनके डिविडेंड का भी बढ़िया रिकॉर्ड होता है. मजबूत मैनेजमेंट के कारण बाजार में बदलाव होने पर इनमें ज्यादा अस्थिरता नहीं आती है.

लार्ज कैप फंड की परफॉर्मेंस : अलग-अलग समय के हिसाब से देखें तो लार्ज कैप फंड ने हमेशा सेंसेक्स, निफ्टी 50 और निफ्टी 100 जैसे बेंचमार्क इंडेक्स के टोटल रिटर्न इंडेक्स (टीआरआई) से बेहतर रिटर्न दिया है. इंडेक्स की तुलना में फंड का रिटर्न 1.7-3% तक अधिक रहा है.

लार्ज कैप फंड तेजी के समय इंडेक्स से ज्यादा रिटर्न तो देते ही हैं, मंदी के समय इनमें गिरावट भी कम आती है.

10,000 करोड़ रु. निवेश की वैल्यू : इस कैटेगरी के फंड में अगर अप्रैल 2000 में 10,000 रु. का निवेश किया जाता तो वह अब 1,18,707 रुपए हो जाता. तुलनात्मक रूप से निफ्टी-50 टीआरआई की वैलुएशन 99,436 रु. और सेंसेक्स टीआरआई की 1,04,088 रु. बनती है. फंड में निवेश की वैल्यू हर साल औसतन 14.5% की दर से बढ़ी, जबकि बेंचमार्क इंडेक्स में 13.5% बढ़ोतरी हुई.

लंबे समय तक निवेश में ज्यादा लाभ : एक और जरूरी बात है कि निवेश लंबे समय के लिए हो तो ज्यादा लाभ मिलेगा. निवेश की अवधि कितनी ज्यादा होगी अधिकतम और न्यूनतम रिटर्न के बीच अंतर उतना कम होगा. मौजूदा परिस्थितियों में हमारा मानना है कि मिड और स्मॉलकैप की तुलना में लार्ज कैप बेहतर विकल्प हैं. इनके जरिए आप कम पैसे में ब्लू चिप कंपनियों में हिस्सेदारी ले सकते हैं.

(निमेश शाह, एमडी एवं सीईओ, आईसीआईसीआईसी प्रूडेंशियल)

‘चंदा कोचर को 15 मिनट में आखिर कैसे मिली क्लीनचिट’

बुधवार को आईसीआईसीआई बैंक की सालाना आम बैठक (एजीएम) हुई. इसमें एमडी और सीईओ चंदा कोचर तो नहीं थीं, लेकिन बैठक का माहौल पूरी तरह उनके खिलाफ था. कुछ शेयरहोल्डर्स ने भ्रष्टाचार पर सवाल किया तो कुछ ने गवर्नेंस पर सवाल उठाए. चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर संदीप बख्शी ने उन्हें आश्वासन दिया कि बैंक के कामकाज पर कोचर से जुड़ी घटना का कोई असर नहीं होगा.

आरोप है कि चंदा कोचर के पति दीपक कोचर की कंपनी में वीडियोकॉन ग्रुप के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत ने निवेश किया. इसके बाद आईसीआईसीआई बैंक ने वीडियोकॉन ग्रुप को 3,250 करोड़ रुपए का लोन दिया था. मार्च में मामला सामने आने के बाद बैंक मैनेजमेंट ने पहले तो चंदा कोचर का समर्थन किया, बाद में जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण समिति को इसकी जांच सौंप दी. जांच पूरी होने तक चंदा कोचर छुट्टी पर हैं.

शेयरहोल्डर सुनील हेमनानी ने जानना चाहा कि कोचर के खिलाफ चल रही जांच के बारे में शेयरधारकों को क्यों नहीं बताया जा रहा है. उन्होंने कहा, बैंक मैनेजमेंट ने उन्हें 15 मिनट में ही कैसे क्लीन चिट दे दी थी, जबकि अब उनके खिलाफ जांच में महीनों लग रहे हैं. उन्होंने पूछा, किस आधार पर मैनेजमेंट ने सीईओ का समर्थन किया था? शेयरहोल्डर विमल भट्ट ने गवर्नेंस का मुद्दा उठाया. उन्होंने बैंक की बोर्ड मीटिंग में सरकारी नॉमिनी की गैरमौजूदगी के बारे में भी जानना चाहा. सरकारी नॉमिनी लोकरंजन एजीएम में भी मौजूद नहीं थे. शेयरहोल्डर अरकचंद शाह ने कड़े फैसले लेने और बैलेंस शीट जल्दी साफ करने का आग्रह किया.

शेयरहोल्डर आरपी सुराना ने कोचर की आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के बोर्ड में दोबारा नियुक्ति पर सवाल उठाए. इस पर बख्शी ने कहा कि जांच पूरी होने से पहले बोर्ड द्वारा कोई फैसला लेना उचित नहीं होगा. हमारी एमडी एवं सीईओ ऑफिस नहीं आ रही हैं. किसी भी कार्रवाई के लिए हम जांच पूरी होने का इंतजार करेंगे.

आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज में चंदा की नियुक्ति पर भी ऐतराज

शेयरधारकों ने मैनेजमेंट से पूछे ये सवाल

– चंदा कोचर के खिलाफ चल रही जांच के बारे में शेयरधारकों को क्यों नहीं बताया जा रहा?

– आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के बोर्ड में कोचर को दोबारा क्यों नियुक्त किया गया है?

– सरकार के नॉमिनी लोकरंजन ने बैंक के बोर्ड की मीटिंग में आना क्यों बंद कर दिया है?

– मैनेजमेंट कड़े फैसले लेकर बैलेंस शीट जल्दी साफ करने के लिए क्यों कदम नहीं उठा रहा?

शनि पूजा से खत्म होगा संकट!

शेयरहोल्डर जयेश मानिक ने कहा कि बैंक की यह स्थिति शनि की दशा के कारण हुई है. शनि की नियमित पूजा से इसका समाधान हो सकता है.

क्रिकेटर बनने से पहले ये काम किया करते थे शेन बौंड

बहुत कम लोग यह बात जानते होंगे कि न्यूजीलैंड के पूर्व तेज गेंदबाज शेन बौन्ड एक स्ट्रग्लिंग ट्रैफिक पुलिस औफिसर रह चुके हैं. पुराने दिनों को याद करते हुए बौन्ड ने बताया कि कैसे इस मुश्किल नौकरी ने उन्हें दिमागी तौर पर और मजबूत बनाया.

स्पोर्ट्स स्टार लाइव की रिपोर्ट के मुताबिक शेन बौन्ड ने उस वाकये को याद किया जब उन्होंने एक वाहन को गलत साइड से जाने दिया था. इसके कारण दूसरी साइड खड़े लोगों ने उनका मजाक बनाया था. बौन्ड ने कहा, यकीनन वे दिन सबसे अच्छे नहीं थे. लेकिन उन दिनों ने उन्हें ऐसी स्थितियों में डाला, जिनसे वह दिमागी तौर पर और मजबूत हो गए. इन्हीं मुश्किल स्थितियों के कारण उनमें आत्मविश्वास आया और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के लिए तैयारियां शुरू की.

इसके बाद बौन्ड ने रफ्तार की दीवानगी को लेकर बात की. उन्होंने कहा, मुझे हमेशा रफ्तार से प्यार था और मैं दूसरे गेंदबाजों से ज्यादा तेज होना चाहता था.

उन्होंने कहा, मैं जानता था कि स्लेजिंग मेरे बस की बात नहीं है, लेकिन मैंने सिर्फ गेंदबाजी पर फोकस किया. उन्होंने यह भी कहा कि प्रैक्टिस सेशन के दौरान भी वह खुद के साथ हमेशा ईमानदार रहे और फिजिकल फिटनेस को सबसे ज्यादा महत्व दिया.

इसमें बौक्सिंग ने मुझे यकीन दिलाया कि मैं एक मेहनती इंसान हूं और अन्य गेंदबाजों से बेहतर भी. उन्होंने यह भी कहा कि स्टीव वौ, जैक कैलिस, सचिन तेंदुलकर और ब्रायन लारा का विकेट लेकर उन्हें बेहद सुकून मिला था. ये सभी विश्व क्रिकेट के बड़े खिलाड़ियों में शुमार थे.

फिलहाल शेन बौन्ड न्यूजीलैंड ए साइड के कोच हैं. वह राष्ट्रीय टीम के बौलिंग सलाहकार भी रह चुके हैं. मौजूदा रोल पर बौन्ड ने कहा कि वह अपने अनुभव के जरिए युवा खिलाड़ियों की मदद करते हैं. उन्होंने कहा, मेरा काम खिलाड़ियों से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कराना है.

मुझे खुद से या मेरे समय से कुछ लेना देना नहीं है. अब मुझे सिर्फ अपने अनुभव पर भरोसा है, क्योंकि मैं जानता हूं कि दबाव में खेलना कैसा होता है. शेन बौन्ड ने 18 टेस्ट मैचों में 87 विकेट झटके हैं, वहीं 82 वनडे मैचों में उन्होंने 147 खिलाड़ियों को पवेलियन भेजा है

सियोल के छोंग्येछोन की तर्ज पर बदलगी दिल्ली के नालों की तस्वीर

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल स्थित छोंग्येछोन की तर्ज पर केजरीवाल सरकार दिल्ली के नालों की तस्वीर बदलना चाहती है. अपने तीन दिवसीय दौरे पर सियोल पहुंचे सीएम अरविंद केजरीवाल बुधवार को छोंग्येछोन देखने पहुंचे. आप ने केजरीवाल के दौरे की तस्वीर ट्वीट कीं.

दरअसल, छोंग्येछोन कभी प्रदूषण और गंदगी के लिए लिए बदनाम था. यहां 11 किमी लंबा एक नाला था जो कि हान नदी में जाकर गिरता था. 1976 में खराब हालत को देखते हुए इसे ढंककर एलिवेटेड रोड बना दिया गया. लेकिन 2003 में सियोल के मेयर ली मियंक-बक ने एलिवेटेड रोड हटाकर बहते पानी के प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया. शुरुआत में बड़ी राशि खर्च होने के कारण आलोचना हुई. लेकिन 2005 में जब पिकनिक स्पॉट तैयार हुआ, लोग यहां घूमने पहुंचे तो खूब वाहवाही मिली. प्रोजेक्ट के लिए हान नदी से रोजाना 1.20 लाख टन पानी खींचा गया और ग्राउंड वॉटर रिचार्ज के लिए बहती नदी बनाई गई है. दोनों तरफ पैदल चलने की जगह है और गर्मी में यहां बहुत ज्यादा भीड़ होती है.

technology Arvind Kejriwal in Seoul Visits Cheonggyecheon stream

दिल्ली में कागजों से आगे नहीं बढ़े प्लान

दिल्ली में यमुना की सफाई के लिए कई प्लान बने. लेकिन कोई शुरू होने के बाद ठप हो गए . एक नजर:

पहला – इसमें यमुना का 5 किमी का रिवर फ्रंट डेवलप होना है. इसके लिए नवंबर, 2016 में प्लान बना. मार्च, 2017 में 200 करोड़ का बजट अलॉट किया गया. इसके बाद काम ठप हो गया.

technology Arvind Kejriwal in Seoul Visits Cheonggyecheon stream

दूसरा – नजफगढ़ नाला, सप्लीमेंट्री ड्रेन, शाहदरा नाला तीन बड़े नाले हैं. इसके अलावा बारापुला छोटा नाला है. तीनों बड़े नालों की सफाई के लिए एनजीटी के आदेश से इंटर सेप्टर सीवर डलने हैं. अभी तक पूरा नहीं हो पाया है.

तीसरा – दिल्ली सरकार ने यमुना के सौंदर्यीकरण और प्रदूषित होने को लेकर वर्ष 2016-17 में एक प्लान बनाया, लेकिन यह प्लान कागजों में ही नहीं आ सका.

शरीर में नहीं हुई हलचल तो नई वौच इमरजेंसी करेगी फोन

एप्पल ने बुधवार को 3 फोन लांच किए- आईफोन-Xएस, Xएस मैक्स और आईफोन-Xआर. इनके अलावा एप्पल वॉच की सीरीज 4 भी लांच की गई. आईफोन-Xएस औरXएस मैक्स डुअल सिम वाले फोन हैं. दोनों में ओएलईडी स्क्रीन है. आईफोन-Xआर में एलसीडी स्क्रीन है. 6.5 इंच स्क्रीन वाला मैक्स एप्पल का सबसे बड़ा स्मार्टफोन है. इनमें डुअल कैमरा है. 12 एमपी वाइड एंगल कैमरा और 12 एमपी टेलीफोटो कैमरा. 10आर में सिर्फ एक कैमरा 12 एमपी वाइड एंगल वाला है. भारत में इनकी शुरुआती कीमत 76,900 से 1,09,900 रुपए है. यहां बुकिंग 19 अक्टूबर से शुरू होगी. आईफोन-Xएस और Xएस मैक्स की बॉडी सर्जिकल ग्रेड स्टेनलेस स्टील से बनी है. स्क्रीन में सबसे मजबूत ग्लास होने का दावा किया गया है. यह पुराने ए11 से 50% तेज होगा.

भारत में नए आईफोन के दाम

आईफोन XR -76,900

आईफोन XS – 99,900

*(शुरुआती कीमत)

XS मैक्स – 1,09,900

स्क्रीन साइज : आईफोन -10एस 5.8 इंच, 10एस मैक्स 6.5 इंच,

स्टोरेज : 64, 256, 512 जीबी.

बिक्री : Xएस और Xएस मैक्स की बिक्री अमेरिका में 21 सितंबर से और 10आर की 26 अक्टूबर से शुरू होगी. भारत में ये फोन अक्टूबर में ही मिल पाएंगे.

एप्पल वॉच सीरीज 4 : ईसीजी करने वाली दुनिया की पहली घड़ी, नए हार्ट रेट सेंसर भी

स्क्रीन साइज सीरीज 3 से 35% बड़ा है. इसमें 64 बिट प्रोसेसर लगाया गया है स्पीकर 50% ज्यादा आवाज वाला है. बैटरी 18 घंटे चलेगी. इसके लिए 14 सितंबर से ऑर्डर दिए जा सकेंगे. बिक्री 21 सितंबर से शुरू होगी. गिरने के बाद एक मिनट तक नहीं हिले तो घड़ी इमरजेंसी सर्विसेज को फोन कर देगी और आपकी लोकेशन भी बताएगी. हार्टबीट अनियमित या बहुत कम हुआ तो नोटिफिकेशन आएगा. वॉच के पीछे इलेक्ट्रोड लगाए गए हैं, इससे 30 सेकंड में ईसीजी कर सकते हैं.

एप्पल वॉच की कीमत

जीपीएस – कीमत 29,000 रु.. अभी 26 देशों में मिलेगी.

सेलुलर – शुरुआती कीमत 36,200 रु.. शुरू में 16 देशों में मिलेगी.

सीरीज 3 – कीमत 20,200 रुपए.

(फिलहाल भारत में नहीं मिलेंगे)

स्मार्ट कुकवेयर बनाएं कुकिंग आसान

आजकल जौब के कारण घर से दूर रहने की वजह से महिला हो या पुरुष किसी के पास इतना समय नहीं होता कि वह किचन में घंटों खड़े रह कर खाना बनाए, साथ ही आज परिवार का हर सदस्य हैल्थ कौंशस हो गया है. ऐसे में जरूरत है टाइम सेव करते हुए हैल्दी डिशेज बनाने की. इस के लिए पेश है किचन कुकवेयर आइटम्स की रेंज.

इंडक्शन

देखने में आकर्षक होने के साथसाथ इस में खाना बनाना काफी आसान होता है, क्योंकि इस में किचन में ही खाना बनाने जैसे झंझटों का सामना जो नहीं करना पड़ता. जहां मन करा वहीं खाना बनाने बैठ गए. इस से समय की भी काफी बचत होती है. इंडक्शन पर इस्तेमाल होने वाले बरतन बिलकुल इंडक्शन से लगे होने के कारण जल्दी खाना पकाने में सक्षम होते हैं. इन में दाल, सब्जी, चावल आदि चीजें तो मिनटों में तैयार हो जाती हैं यानी अब मेहमानों के आने पर नो टैंशन.

सैंडविच टोस्टर

गैस के मुकाबले टोस्टर में सैंडविच बनाना आसान ही नहीं, बल्कि स्वाद के लिहाज से भी काफी बेहतर होता है, क्योंकि इस में ज्यादा क्रिस्पीनैस जो होती है और बारबार पलटने के झंझट से भी छुटकारा मिलता है. बच्चे हों या बड़े सभी इस में बने सैंडविच बड़े चाव से खाते हैं.

ब्लैक ऐल्यूमिनियम तवा

डोसा बनाना हो या फिर चीला, आप नौर्मल तवे पर बनाने लगीं तो ज्यादा समय लगने के साथसाथ इन के खराब होेने का भी डर बना रहता है. ऐसे में ब्लैक ऐल्यूमिनियम तवे पर ये चीजें आराम से बनाई जा सकती हैं और इस तवे पर इन्हें बनाने के लिए तेल भी न के बराबर लगता है यानी ये चीजें पूरी तरह सेहतमंद भी होंगी.

बेबी कड़ाही इंडक्शन

बेबी कड़ाही इंडक्शन का आप मल्टीपर्पज यूज कर सकते हैं यानी दालसब्जी बनाने के अलावा यह तड़का लगाने, मैगी बनाने आदि के भी काम आती है और वजन में हलकी होने के कारण इसे हैंडल करना भी काफी आसान होता है, साथ ही छोटी होने के कारण आप को इसे कैरी करने में भी कोई दिक्कत नहीं होगी.

यकीन मानिए आप इन सभी कुकवेयर आइटम्स को प्रयोग कर कम समय में कुकिंग आराम से कर सकती हैं और इन में बना खाना सेहतमंद भी होगा.

आइए आप को आप के भीतर छुपे स्वच्छंद इंसान से रूबरू कराते हैं

समय पर विवाह न हो पाने, जीवनरूपी सफर में हमसफर द्वारा बीच में ही साथ छोड़ देने या पतिपत्नी में आपसी तालमेल न हो पाने पर जब तलाक हो जाता है तो ऐसी स्थिति में एक महिला अकेले जीवन व्यतीत करती है. लगभग 1 दशक पूर्व तक इस प्रकार अकेले जीवन बिताने वाली महिला को समाज अच्छी नजर से नहीं देखता था और आमतौर पर वह पिता, भाई या ससुराल वालों पर निर्भर होती थी. मगर आज स्थितियां इस के उलट हैं. आज अकेली रहने वाली महिला आत्मनिर्भर, स्वतंत्र और जीवन में आने वाली हर स्थिति का अपने दम पर सामना करने में सक्षम है.

‘‘यह सही है कि हर रिश्ते की भांति पतिपत्नी के रिश्ते का भी जीवन में अपना महत्त्व है, परंतु यदि यह रिश्ता नहीं है आप के साथ तो उस के लिए पूरी जिंदगी परेशान और तनावग्रस्त रहना कहां तक उचित है? यह अकेलापन सिर्फ मन का वहम है और कुछ नहीं. इंसान और महिला होने का गौरव जो सिर्फ एक बार ही मिला है उसे मैं अपने तरीके से जीने के लिए आजाद हूं,’’ यह कहती हैं एक कंपनी में मैनेजर 41 वर्षीय अविवाहिता नेहा गोयल. वे आगे कहती हैं, ‘‘मैं आत्मनिर्भर हूं. अपनी मरजी का खाती हूं, पहनती हूं यानी जीती हूं.

घर की स्थितियां कुछ ऐसी थीं कि मेरा विवाह नहीं हो पाया, परंतु मुझे कभी जीवनसाथी की कमी नहीं खली, बल्कि मुझे लगता है कि यदि मेरा विवाह होता तो शायद मैं इतनी आजाद और बिंदास नहीं होती. तब मेरी उन्नति में मेरी जिम्मेदारियां आड़े आ सकती थीं. मैं अभी तक 8 प्रमोशन ले चुकी हूं, जिन्हें यकीनन परिवार के चलते नहीं ले सकती थी.’’ केंद्रीय विद्यालय से प्रिसिंपल पद से रिटायर हुईं नीता श्रीवास्तव का अपने पति से उस समय तलाक हुआ जब वे 45 वर्ष की थीं और उन का बेटा 15 साल का. वे कहती हैं, ‘‘कैसा अकेलापन? मैं आत्मनिर्भर थी.

अच्छा कमा रही थी. बेटे को अच्छी परवरिश दे कर डाक्टर बनाया. अच्छा खाया, पहना और खूब घूमी. पूरी जिंदगी अपनी शर्तों पर बिताई. कभी मन में खयाल ही नहीं आया कि मैं अकेली हूं. जो नहीं है या छोड़ गया है, उस के लिए जो मेरे पास है उस की कद्र न करना कहां की बुद्धिमानी है?’’

रीमा तोमर के पति उन्हें उस समय छोड़ गए जब उन का बेटा 10 साल का और बेटी 8 साल की थी. उन की उम्र 48 वर्ष थी. पति डीएसपी थे. अचानक एक दिन उन्हें अटैक आया और वे चल बसे. अपने उन दिनों को याद करते हुए वे कहती है, ‘‘यकीनन मेरे लिए वे दिन कठिन थे. संभलने में थोड़ा वक्त तो लगा पर फिर मैं ने जीवन अपने तरीके से जीया.

आज मेरा बेटा एक स्कूल का मालिक है और बेटी अमेरिका में है. पति के साथ बिताए पल याद तो आते थे, परंतु कभी किसी पुरुष की कमी महसूस नहीं हुई. मैं अपनी जिंदगी में बहुत खुश थी और आज भी हूं.’’ मनोवैज्ञानिक काउंसलर निधि तिवारी कहतीं हैं, ‘‘अकेलापन मन के वहम के अलावा कुछ नहीं है. कितनी महिलाएं जीवनसाथी और भरेपूरे परिवार के होते हुए भी सदैव अकेली ही होती हैं. वंश को बढ़ाने और शारीरिक जरूरतों के लिए एक पति की आवश्यकता तो होती है, परंतु यदि मन, विचार नहीं मिलते तो वह अकेली ही है न? इसलिए अकेलेपन जैसी भावना मन में कभी नहीं आने देनी चाहिए.’’

अकेली औरतें ज्यादा सफल कुछ समय पूर्व एक दैनिक पेपर में एक सर्वे प्रकाशित हुआ था जो अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा महिलाओं पर कराया गया था. उस के अनुसार:

अकेली रहने वाली 93% महिलाएं मानती हैं कि उन का अकेलापन गृहस्थ महिलाओं की तुलना में जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल रहने में अधिक सहायक सिद्ध हुआ है. इस से उन्हें आजादी से जीवन जीने का अधिकार मिला है.

65% महिलाएं जीवन में पति की आवश्यकता को व्यर्थ मानती हैं और वे विवाह के लिए बिलकुल भी इच्छुक नहीं हैं. द्य आवश्यकता पड़ने पर विवाह करने के बजाय इन्होंने किसी अनाथ बच्चे को गोद लेना अधिक अच्छा समझा.

इन्हें कभी खालीपन नहीं अखरता. ये अपनी रुचि के अनुसार सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती है और आधुनिक मनोरंजन के साधनों का लाभ उठाती हैं. चिंतामुक्त हो कर जी भर कर सोती हैं.

इस सर्वेक्षण के अनुसार एकाकी जीवन जीने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं की संख्या के अनुपात में बहुत कम है.

बढ़ रहा सिंगल वूमन ट्रैंड

पिछले दशक से यदि तुलना की जाए तो एकाकी जीवन जीने वाली महिलाओं की संख्या में 39 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. विदेशों में अकेले जीवन जीने वाली महिलाओं की उपस्थिति समाज में बहुत पहले से ही है, साथ ही वहां वे उपेक्षा और उत्पीड़न की शिकार भी नहीं होतीं. भारतीय समाज में 1 दशक में महिलाओं की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ है. हाल ही में आई पुस्तक ‘आल द सिंगल लेडीज अनमैरिड वूमन ऐंड द राइज औफ एन इंडिपैंडैंट नेशन’ की लेखिका रेबेका टेस्टर के अनुसार 2009 के अनुपात में इस दशक में सिंगल महिलाओं की बढ़ती संख्या समाज में उन के महत्त्व का दर्ज कराती है.

यह सही है कि हर रिश्ते की अपनी गरिमा और महत्त्व होता है. अकेलापन सिर्फ मन का वहम तो है, परंतु इस के लिए सब से आवश्यक शर्त है महिला की आत्मनिर्भरता और आत्मशक्ति का मजबूत होना, क्योंकि यदि वह आत्मनिर्भर नहीं है तो उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पराधीन होना होगा. पराधीनता तो सदैव कष्टकारी ही होती है. आत्मनिर्भरता की स्थिति में उस पर किसी का दबाव नहीं होता और अपने ऊपर उंगली उठाने वालों को भी मुंहतोड़ जवाब दे पाने में सक्षम होती है. ‘‘अकेले रहने वाली महिलाओं को अपनी आत्मशक्ति को मजबूत रखना चाहिए. जो जिंदगी आप ने चुनी है उस में खुश रहना चाहिए. कभी किसी को अपने पति के साथ देख कर मन को कमजोर करने वाले विचार नहीं आने चाहिए,’’ यह कहती हैं नीता श्रीवास्तव.

जब भी कभी ऐसा अवसर जीवन में आता है तो इसे सिर्फ अपने मन का वहम मानें और सचाई को स्वीकार कर के जीवन को आगे बढ़ाएं. जिंदगी जिंदादिली का नाम है न कि किसी के सहारे का मुहताज होने का. स्वयं को अंदर से मजबूत कर के अपनी शक्ति को सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में लगाना चाहिए. साथ ही कुछ ऐसे संसाधनों को भी खोजना चाहिए जिन में आप व्यस्त रहें.

शाम उदास क्यों

क्षितिज के पार ‘सूर्य’

कुल अलसाया था

अदृश्य हो रहा है

पर, वही सुबह समय

उल्लास, आशा भर देने वाला है.

कभीकभी अंधेरा होने पर

आंखें अपनेआप बंद होती हैं

कुछ खट्टीमीठी यादें

आंखों के सामने

घूमने लगती हैं.

‘दिया’ लगने के पूर्व किटकों की

किर्रकिर्र ध्वनि

नैराश्य थकावट

आजूबाजू का अंधेरा देख

‘इस लोक’ से प्रयाण के पूर्व

‘गला भर’ आता है-

पैर लटपटाने लगते हैं

मन जलने लगता है

क्यों घिसट रहे हैं शरीर को

मेरी दशा ऐसी क्यों

रहेगी भी कब तक?

सूर्योदय होगा

जीने की तमन्ना जाग उठेगी

फिर, दिन ढलने के समय

शाम उदास क्यों?

– अविनाश दत्तात्रय कस्तुरे

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सकते में मंदिर, मसजिद, चर्च और गुरुद्वारे

सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश से देश के 20 लाख मंदिरों, 3 लाख मसजिदों और हजारों चर्चों व गुरुद्वारों को सकते में डाल दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों को एक तरह से सरकार चलाने पर निगरानी करने के लिए आदेश दिया है. कहने को आदेश स्वच्छता, प्रवेश और पैसे की संभाल से संबंधित है पर यदि यह लागू हो गया तो मंदिर मसजिद दुकानदारी पर सही और गहरा आघात होगा.

सृष्टि निर्माण ईश्वर, जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म मृत्यु पश्चात स्वर्गनर्क की बातें कर के असल में धर्म लोगों की जेबें काटने वाले अनूठे तरीके ही बने रहे हैं. सभी धर्मों ने बड़ी चतुरता से आम व्यक्ति को अपने पंडे पुरोहितों के थोड़े ज्ञान के सहारे एक अनूठे जाल में फांस लिया और पीढ़ीदरपीढ़ी लोगों को जन्म से मृत्यु तक ले कर धर्म टैक्स देना पड़ रहा है. इसी टैक्स को सुरक्षित करने के लिए धर्म के दुकानदारों मसजिद, मठ, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे, …. बनवाए और उन में नियुक्त लोगों को बैठे ठाले हलवा पूरी भी दिलाई, औरतें पहुंचवाई, ताकत दी और सुरक्षा दी.

धर्म की दुकानदारी में लोग सदियों से अपनी सत्ता की सुरक्षा के लिए लोगों को बहकाते रहे हैं और सामाजिक प्रबंध के नाम पर प्रतिबंधों की लंबी फेहरिश्त बनाते रहे हैं. धर्मों ने केवल अपने को सुरक्षित करने के लिए अरबों की हत्याएं कराई हैं. ज्यादातर युद्घ जर, जमीन और जोरू के लिए नहीं धार्मिक सत्ता के लिए हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश इस सत्ता पर नियंत्रण करने का प्रयास है. यह सफल होगा इस में पूरा संदेह है क्योंकि बुद्ध, महावीर, धर्वाक, मार्टिन लूथर जैसे प्रारंभिक सफलताओं के बावजूद मूल धर्मों का खास बिगाड़ नहीं पाए.

सुप्रीम कोर्ट ने अभी सावधानी रखी है कि आदेश केवल भक्तों की आड़ में दिया है कि उन्हें असुविधाएं न हों और उन के चढ़ावे का सदुपयोग हो. सुप्रीम कोर्ट मंदिरों मसजिदों का प्रबंध नहीं छेड़ रहीं. जो कमा रहा है, कमाता रहे पर हिसाब रखे. उसे चुनौती देना आसान नहीं होगा.

अन्य देशों ने जब भी धार्मिक दुकानों को नियंत्रित करने की कोशिश की है, उन्होंने या तो प्रवेश बंद कराया या राज्य या सरकार ने उन्हें छीन लिया. सुप्रीम कोर्ट का आदेश आल्वीयत कर कोई रोकटोक नहीं लगाता पर यह सभी धर्मों के दुकानदारों को नहीं भाएगा, पक्का है. धर्म पर आधारित भारतीय जनता पार्टी की सरकार को अपनों के ही दिए आघात का मुकाबला करने के उपाय ढूंढ़ने होंगे.

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