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सुई धागा : सरकारी एजेंडे पर स्तरहीन फिल्म

हम कई बार इस बात को रेखांकित करते आए हैं कि जब फिल्मकार सरकार के अजेंडे पर फिल्म बनाता है, तो वह मनोरंजन व कथानक से भटक जाता है. ‘‘दम लगा के हईशा’’ जैसी सफलतम फिल्म के लेखक व निर्देशक शरत कटारिया की फिल्म ‘‘सुई धागा’’ मूलतः प्रधानमंत्री के ‘‘मेक इन इंडिया’’ कार्यक्रम को प्रसारित करने के लिए बनायी गयी फिल्म का अहसास कराती है. पर फिल्मकार ने फिल्मी स्वतंत्रता इस कदर ले ली कि फिल्म का बंटाधार कर दिया. यदि शरत कटारिया ने ‘‘मेक इन इंडिया’’ को प्रचारित करने का लक्ष्य न रखा होता, तो आत्मविश्वास जगाने, अपनी जिंदगी को अपने हाथों बुनने के साथ साथ बड़े शहरों के धूर्त व बेईमान इंसानों के मुकाबले छोटे शहर के इमानदार लोगों की जीत का जश्न मनाने वाली एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी.

फिल्म ‘‘सुई धागा’’ की कहानी  छोटे शहर में रह रहे मौजी (वरुण धवन) और उनकी पत्नी ममता (अनुष्का शर्मा) की है. जो कि अपने माता (यामिनी दास) व पिता (रघुवीर यादव) के साथ एक ही मकान में रहते हैं. मौजी के छोटे भाई जुगनू ने अपनी पत्नी के साथ अलग रहना शुरू कर दिया है. मोजी के दादाजी स्व. छज्जू लाल कभी सिलाई कढ़ाई का काम किया करते थे, पर बाद में जब उनकी फैक्टरी बंद हो गयी तो पूरे परिवार को कई कठिनाइयों से गुजरना पड़ा. अतः मौजी के पिता को सिलाई कढ़ाई के काम से नफरत हो गयी. इसलिए पिता के कहने पर मौजी ने सिलाई मशीन बेचने वाली एक दुकान पर नौकरी कर ली. मगर दुकान के मालिक का बेटा हर दिन मौजी का मजाक उड़ाया करता था. अपनी शादी वाले दिन पूरे समाज, मौजी की पत्नी व माता पिता तथा अपनी नई नवेली पत्नी के सामने मौजी से चिकन के लिए लालची कुत्ते का ऐसा अभिनय करवाया कि ममता की आंख से आंसू निकल पड़े. ममता के कहने पर आत्मसम्मान की खातिर मौजी ने नौकरी छोड़ दी, इस पर पिता के साथ साथ छोटे भाई जुगनू ने भी हायतोबा मचा दी. ममता ने उसे समझाया कि जब वह घर वालों के लिए कपड़े सिल सकता है, तो इसी को पेशा क्यों नहीं अपनाता. तब मौजी अपनी पत्नी ममता के साथ सीमा पर जाकर गरीबों को बांटी जा रही सिलाई मशीन लेकर आता है और बाजार में सिलाई का काम करने के लिए बैठ जाता है. पर मौजी अपने छोटे भाई जुगनू के साले गुड्डू (नमित दास) के चक्कर में ऐसा फंसता है कि बहुत बेइज्जत होना पड़ता है. पिता से भी डांट खानी पड़ती है. मगर इस बार ममता को बहुत बड़ी सीख मिल जाती है. जिसके चलते अब ममता व मौजी दोनों अपनी खुद की कंपनी ‘‘सुई धागा-मेड इन इंडिया’’ बनकार फैशन की दुनिया में उतरने का फैसला लेते हैं. कई अवार्ड जीतते हैं.

इंटरवल तक तो छोटे शहर के मध्यमवर्गीय परिवार के रहन सहन, उनकी दिक्कतें, माता पिता व पति पत्नी के बीच रिश्तों के साथ रोजगार की तलाश में भटकने की बजाय पारिवारिक हूनर व पारिवारिक व्यापार को अपनाकर जिंदगी को खुशहाल बनाने के अहम मुद्दे की तरफ जाती नजर आ रही होती है, मगर अचानक फिल्म से लेखक व निर्देशक की पकड़ छूट जाती है. पटकथा की कमजोरी के चलते वह इस अहम मुद्दे को धार नहीं दे पाए. फिल्मी स्वतंत्रता के नाम पर कहानी में कई ऐेसे प्रसंग जोड़े गए हैं, जिन पर यकीन करना मुश्किल है. क्या कोई पड़ोसी महज अपने पड़ोसी के घर पर चाय पीने के लिए अपनी सिलाई की मशीन उसके घर पर रख देगा, यह जानते हुए कि पड़ोसी हर दिन अपने घर के कपड़े उसी सिलाई मशीन से सिलता है. माना कि नौकरी को बरकरार रखने के लिए इंसान कुछ समझौते कर लेता है, मगर वर्तमान समय में एक इंसान अपनी पत्नी व माता पिता के सामने शादी के समारोह में अपने मालिक के बेटे की नई पत्नी को खुश करने के लिए कुत्ता बनकर मालिक के बेटे के हाथ से चिकन लेने के लिए कुत्ते की तरह अभिनय करे, यह संभव नहीं. इस कदर अपना आत्म सम्मान आज का युवक नहीं बेच सकता. इंटरवल के बाद तो फिल्म पूरी तरह से बिखरी हुई है. फिल्म में मौजी का पिता क्यों उससे नाराज रहता है, कहीं स्पष्ट नही है. सिलाई मशीन वितरण का प्रसंग भी अतिरंजित है. फिल्म के अंत का अहसास दर्शकों को बहुत पहले हो जाता है. बतौर निर्देशक शरत कटारिया असफल हुए हैं. फिल्म में इंसानी भावनाएं भी ठीक से उभर नहीं पाती. निर्देशक ने फिल्म में कई पुराने मसाले भर दिए, मगर पति पत्नी के बीच रोमांस की तरफ उनका ध्यान नहीं गया.

फिल्म का गीत संगीत प्रभावहीन है. कैमरामैन अनिल मेहता व कला निर्देशक ने फिल्म में कहानी के परिवेश को बहुत अच्छे ढंग से गढ़ने में अपना बेहतरीन योगदान दिया है.

जहां तक अभिनय का सवाल हे तो अनुष्का शर्मा का अभिनय ठीक होते हुए भी वह बिना ग्लैमरस व अभाव ग्रस्त परिवार की बहू के किरदार में जंचती नहीं हैं. इसी तरह मौजी का किरदार वरूण धवन पर फिट नहीं होता. रघुवीर यादव भी निराश करते हैं.

दो घंटे दो मिनट की अवधि वाली फिल्म का निर्माण ‘यशराज फिल्मस’ के बैनर तले आदित्य चोपड़ा ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक शरत कटारिया, संगीतकार अनू मलिक, कैमरामैन अनिल मेहता तथा कलाकार हैं- वरूण धवन, अनुष्का शर्मा, रघुवीर यादव, यामिनी दास, सिद्धार्थ भारद्वाज, नमित दास, आशीष वर्मा, भूपेश सिंह व अन्य.

आंशिक सांत्वना देने वाला है आधार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

आधार के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल आंशिक सांत्वना देने वाला है. आधार पर आधारित परिचय पत्र देना सरकार का नागरिकों को एक सुविधा हो सकती है पर इसे हर काम से जोड़ देना एक ऐसा इलैक्ट्रौनिक चौकीदार तैयार कर देना है जो हर नागरिक की निजता व स्वतंत्रता पर आघात करता है. आधार निश्चित रूप से उसी तरह हर नागरिक को जुर्म कर चुका अपराधी मानता है जैसा हिंदू धर्म हर मानव को पापों का फल मानता है. सरकार ने आधार बनाया इसलिए है कि हरेक से पर्याप्त दक्षिणा ली जा सके और कोई भीड़ में छूट न जाए, ठीक पंडों की तरह.

पंडों की तरह नार्थब्लौक में बैठे महापंडितों ने देश भर में आधार पंडों की एक फौज छोड़ रखी है जो हर नागरिक को बाध्य कर रहे हैं कि आओ, दक्षिणा चढ़ाओ, लाइनों में खड़े हों, अपनी शपथ लो, सरकार के प्रति निष्ठावान रहने की गारंटी दो और कार्ड ले जाओ. सुप्रीम कोर्ट ने जो थोड़ी राहत दी है वह हरगिज काफी नहीं है और सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और पंडित सदा सही हैं वाला सिद्धांत अपनाया है. जिस संविधान का गुणगान हम करते हैं कि यह सरकार और शासकों के जुल्मों व अत्याचार के खिलाफ हमें बोलने व काम करने की स्वतंत्रता देती है, यह फैसला सरकार के विश्वासघात का साथ देता है.

आधार बैंक अकाउंटों से जुड़े यह बाध्यता सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त कर दी है पर बैंक बिना आधार कार्ड के परिचय और बैंक चैक पूरा न मानें यह कैसे पता चलेगा. बैंक से ऋण लेने के समय याचक बना ग्राहक अपने कपड़े तक उतार देता है, भला आधार कार्ड देने से इंकार कैसे करेगा.

आधार स्कूल में अनिवार्य नहीं है पर किस पिता की हिम्मत है कि वह बच्चे के मांगे गए आधार परिचय को देने से इंकार कर दे. स्कूलों में प्रवेश एक हक नहीं कृपा बन गई है.

मोबाइल कंपनियां कह सकती हैं कि या तो आधार कार्ड दे दें वर्ना जिलाधीश से लिखवा कर लाएं कि आप वहीं रहते हैं जहां कहते हैं, थानेदार से रिपोर्ट लाएं कि आप अपराधी नहीं हैं, मकान मालिक की रजिस्ट्री की प्रति लाएं कि उसी के मकान में किराएदार हैं, हार मान कर आधार देना पड़ेगा.

आधार मात्र पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस की तरह होना चाहिए कि जिसे आवश्यकता हो वही ही बनवाएं. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सेवाओं से जोड़ कर इसे सीमेंट की मजबूत नींव दे दी है जिस पर सरकार मनचाही जेल बनवा सकती है जो बाहर से स्टेडियम या होटल लगेगी. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जनता के अधिकारों पर एक और आघात है. डिजिटल दुनिया के कारण वैसे ही लोगों ने खुद को न जाने कितनी रस्सियों से बांध रखा है, यह मजबूत चेन सरकारी जेल से जुड़ी है.

पत्नी को दासी समझने वाली पुरानी सोच पर सुप्रीम कोर्ट की चोट

सदियों से पत्नी को अपनी संपत्ति समझने का अधिकार अब पुरुष को नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने यह अधिकार खत्म कर दिया है. अगर पत्नी का विवाहेतर संबंध है तो अब यह अपराध नहीं होगा. शादीशुदा महिला के साथ दूसरे पुरुष के संबंधों को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है. 5 जजों की संविधान पीठ ने कहा कि पति अपनी पत्नी का मालिक नहीं है. यह कानून 158 साल पुराना था.

हालांकि अदालत ने कहा कि विवाहेतर संबंध अपराध नहीं हैं, लेकिन सामाजिक तौर पर गलत हैं. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि संविधान की खूबसूरती यही है कि उस में मैं, मेरा और तुम सभी शामिल हैं.

अदालत ने कहा कि विवोहतर संबंध की वजह से शादी खराब नहीं होती, खराब शादी की वजह से विवाहेतर संबंध होते हैं. इसे अपराध मान कर सजा देने का मतलब दुखी लोगों को औैर सजा देना होगा.

पीठ ने जो अहम बातें कही हैं उन में यह कि स्त्री के शरीर पर सिर्फ उस का हक है. महिला बाहरी पुरुष से संबंध बनाती है तो यह उस का अधिकार है. वह पति की जागीर नहीं है. शादी का मतलब यह नहीं कि महिला अपनी सेक्सुअल औटोनोमी पुरुष को सौंप दे. पवित्रता केवल महिलाओं के लिए नहीं है. यह पतियों पर भी समान रूप से लागू होती है. जब स्त्री संबंध बनाने में भागीदार है तो फिर सजा सिर्फ पुरुष को क्यों मिले.

महिला या पुरुष अपने साथी के बाहरी संबंधों के आधार पर तलाक मांग सकते हैं. यह प्रावधान पहले भी था, अब भी वैसा ही रहेगा. धारा 497 में पुरुष को 5 साल तक की सजा का प्रावधान था. धारा यह भी कहती थी कि पति की इजाजत से गैर पुरुष से संबंध बनाए जा सकते हैं. पति की मंजूरी के बिना पत्नी गैर पुरुष से संबंध बनाती है तो पति गैर पुरुष पर केस दर्ज करा सकता है पर जो पुरुष बाहरी महिला से संबंध बनाता है उस की पत्नी केस दर्ज नहीं करा सकती थी.

इटली में रहने वाले केरल के 41 साल के व्यापारी जोसेफ शाइनी ने दिसंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट में धारा 497 को ले कर जनहित याचिका दाखिल की थी. शाइनी ने 45 पेज की याचिका में धारा 497 को भेदभाव और महिलाओं के खिलाफ काम करने वाला कानून बताया था. कहा था, इस में स्त्रियों की भूमिका को सिर्फ सेक्स के लिए सहमति देने तक सीमित कर दिया गया है. असहमति से सेक्स बलात्कार की श्रेणी में आता है पर जब स्त्री संबंध बनाने की सहमति देने में भागीदार है तो फिर सजा में क्यों नहीं मिलती.

भारत ने ब्रिटेन के काननू के बड़े हिस्से को अपनाया है पर उस देश ने कभी विवाहेतर संबंध को अपराध नहीं माना. दुनिया भर के बहुत से देश इसे अपराध की श्रेणी से हटा चुके हैं. चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील और यूरोपीय देशों में विवाहेतर संबंध अब अपराध नहीं है. यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है.

केंद्र सरकार ने संस्कृति की दुहाई देते हुए इस धारा का पक्ष लिया था. पिछले साल दिसंबर में इस मामले में केंद्र सरकार ने शपथपत्र दिया था कि आईपीसी की धारा 497 और सीपीसी की धारा 198[2] को खत्म करने का सीधा असर भारत की संस्कृति पर पड़ेगा, जो कि शादी की संस्था और उस की पवित्रता पर जोर देता है. धारा 497 एक उचित प्रावधान है और इस का होना अनिवार्य है.

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस एएम खानविलकर ने कहा कि महिला को मजबूर नहीं कर सकते कि वह पुरुष या समाज की तरह सोचे. पति अपनी पत्नी का मालिक नहीं है. ऐतिहासिक भ्रांतियां खत्म करने का वक्त आ गया है. पतिपत्नी के रिश्ते में नैतिक प्रतिबद्घता खत्म होने पर वैवाहिक जीवन में दरार आ जाती है. ऐसे हालात में कोई जीवनसाथी को माफ कर के साथ रहता है तो कोई तलाक मांगता है. विवाहेतर संबंधों के लिए दी जाने वाली सजा भी यह दरार पाट नहीं पाती.

आईपीसी की धारा 497 को खत्म कर सुप्रीम कोर्ट ने स्मृतियों, पुराणों की उस सोच पर चोट की है जो स्त्री को पैर की जूती, पाप की गठरी, नरक का द्वार बता कर उस की स्वतंत्रता पर सिर्फ अपना हक हासिल कर लिया था. धर्म ने सदियों से स्त्री को पुरुष की दासी बना कर रखा. धर्म ने स्त्री के पढ़नेलिखने, पहनने, ओढने, खानेपीने, घूमनेफिरने, प्रेम और शादी करने का अधिकार अपने पास रखा. यानी स्त्री को अपने शरीर का इस्तेमाल करने का हक उसे नहीं दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने ‘माई बौडी, माई राइट्स’ के अधिकार पर ठप्पा लगाया है. इस फैसले ने उसे बराबरी, स्वतंत्रता का हक दिया है. यह अलग बात है अदालत के इस निर्णय से समाज कितना इत्तेफाक रखता है. निश्चित ही समाज की जड़ सोच स्त्री को परपुरुष से संबंध बनाने की छूट को मान्यता नहीं देगी.

कैश कम होने की चिंताओं पर आरबीआई ने कहा- जरूरत से ज्यादा कैश है मार्केट में

नकदी की कमी को लेकर छाई चिंताओं पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कहा कि व्यवस्था में नकदी जरूरत से ज्यादा है. बाजार की जरूरतों के हिसाब से उपलब्ध विकल्पों का उपयोग कर टिकाऊ तरलता व्यवस्था को सुनिश्चित किया जाएगा.

पिछले कुछ दिनों में सक्रियता से उठाए गए कदमों के बारे में आरबीआई ने कहा कि 19 सितंबर को उसने खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों का लेन-देन (ओएमओ) किया था. साथ ही तरलता समायोजन सुविधा (एलएएफ) के सामान्य प्रावधान के अतिरिक्त रेपो के माध्यम से अतिरिक्त तौर पर तरलता के लिए उदार तरीके से जान फूंकने की कोशिश की थी.

आरबीआई ने कहा कि खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-फरोख्त दोबारा से बृहस्पतिवार को की जा सकती है ताकि व्यवस्था में पर्याप्त तरलता को सुनिश्चित किया जा सके. केंद्रीय बैंक ने एक बयान में कहा कि 26 सितंबर को रेपो के माध्यम से बैंकों ने रिजर्व बैंक से 1.88 लाख करोड़ रुपये की सुविधा प्राप्त की. ‘परिणाम स्वरूप व्यवस्था में पर्याप्त से अधिक तरलता मौजूद है.’

रिजर्व बैंक ने घोषणा की सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) में जरूरी राहत एक अक्तूबर 2018 से प्रभावी होगी. इससे प्रत्येक बैंक की तरलता की क्षमता को मदद मिलनी चाहिए.

आरबीआई ने कहा कि व्यवस्था में टिकाऊ तरलता जरूरतों को पूरा करने के वह तैयार है और विभिन्न उपलब्ध विकल्पों के माध्यम से वह इसे सुनिश्चित करेगा. यह उसके बाजार हालातों और तरलता का लगातार आकलन करने पर निर्भर करेगा.उल्लेखनीय है कि आईएलएंडएफएस समूह कंपनी की चूक के बाद तरलता के संकट संबंधी चिंताएं जाहिर की जाने लगी थीं.

कबड्डी खेलते समय लोग बोलते थे चिकनी को पकड़ लो : शालिनी पाठक

राजस्थान की कबड्डी की पहली इंटरनेशनल प्लेयर शालिनी पाठक जब कबड्डी खेलती थीं तो उन्हें भद्दे-भद्दे कौमेंट्स सुनने को मिलते थे. हाल ही में शालिनी ने अपने सफर के कई किस्से सुनाए. राजस्थान पुलिस में इंस्पेक्टर और कबड्डी प्लेयर शालिनी पाठक ने बताया कि जब उन्होंने कबड्डी खेलने का फैसला किया तो शुरुआत में पैरेंट्स ने सपोर्ट नहीं किया.

उन्होंने बताया, ‘मैं राजस्थान की पहली कबड्डी इंटरनैशनल प्लेयर हूं. जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में हमने सिल्वर मेडल हासिल किया. मेरी सारी पहचान INDIA है, हम जो भी संघर्ष और मेहनत करते हैं, इसीलिए करते हैं कि इंडिया के लिए खेल सकें. मैं जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में इंडियन टीम का हिस्सा रही हूं जिसने सिल्वर मेडल जीता.’

उन्होंने बताया, ‘मैंने एक ऐसे गेम को चुना था जिसे पुरुषों का गेम माना जाता है. कोई भी पैरेंट्स नहीं चाहेंगे कि उनकी लड़की कबड्डी जैसा गेम खेले. उनकी बेटी जब घर आए तो पूरी मिट्टी में सनी हुई आए, या कहीं से खून बह रहा हो. यह एक ऐसा खेल है जिसमें पसीने के साथ खून बहता है. मेरे पिता खुद कबड्डी के नैशनल प्लेयर रहे हैं. लेकिन मेरे पैरेंट्स ने शुरू में कोशिश की कि मैं कोई और सेफ गेम जैसे टेनिस वगैरह खेल लूं. लेकिन फिर मेरे पैरेंट्स को लगा कि मैं कबड्डी ही खेलना चाहती हूं तो फिर उन्होंने सपोर्ट किया और मैं यहां तक पहुंची.’

शालिनी ने कहा, स्पोर्ट्स में काफी वर्कआउट करना पड़ता है. मैं जब दौड़ती थी तो मेरे पिता बाइक से साथ में चलते थे. वह चाहते थे कि मैं स्पोर्ट्स में कुछ करूं. फील्ड में खेलने के दौरान मुझे लड़कों से बात करनी पड़ती थी और शार्ट्स में खेलती थी. शालिनी ने कहा, ‘जब आप गांव में खेल रहे हैं तो आपको कान बंद कर लेने पड़ते हैं. गांव में ऐसी-ऐसी बातें लोग बोलते थे कि मैं बता नहीं सकती. खेलने के दौरान कोई बोलता था कि अरे चिकनी को पकड़ लो, इसको जाने मत दो लेकिन आपको ध्यान रखना होता है कि इन सब चीजों से आपका फोकस ना हट जाए.’

शालिनी ने बताया कि उनके पिता दंगल फिल्म वाले बापू जैसे ही थे. उन्हें अपने पिता से बहुत सपोर्ट मिला. उनके पिता ही सबसे बड़े इंस्पेरेशन रहे हैं. मेरी एक रोल मौडल एथलीट कृष्णा पूनिया भी हैं. उन्होंने कहा कि हर किसी की कहानी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

इस ट्रिक को अपनाकर व्हाट्सऐप पर करें किसी को भी ट्रैक

वैसे तो आपलोग व्हाट्सऐप के सभी फीचर्स के बारे में जानते होंगे, लेकिन आज हम आपको यह बताएंगे कि व्हाट्सऐप के जरिए किसी को कैसे ट्रैक किया जा सकता है कि वह अपने फोन में क्या कर रहा है. इसके अलावा हम आपको इस रिपोर्ट में कुछ अन्य ट्रिक्स भी बताएंगे.

व्हाट्सऐप पर मैसेज भेजने वाले दोस्त की लोकेशन

व्हाट्सऐप में किसी दोस्त की जानना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने फोन में Mspy App डाउनलोड करें. यह आपको प्ले स्टोर पर नहीं मिलेगा. इसे आप www.mspy.com से डाउनलोड कर सकते हैं.

अब जिस दोस्त का लोकेशन ट्रैक करना चाहते हैं उसके फोन में इस ऐप को चुपके से डाल दें और इसके आइकन को हाइड कर दें. इसके जरिए आप व्हाट्सऐप, इंटरनेट हिस्ट्री, फेसबुक, ट्विटर, गूगल, इंस्टाग्राम इत्यादि पर नजर रख सकते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो आपके हाथ में आपके दोस्त के फोन का कंट्रोल होगा. हालांकि यह एक पेड ऐप है. दरअसल यह एक पैरेंट्स कंट्रोल ऐप है.

WhatsApp मैसेज शिड्यूल करें

अगर आप चाहते हैं कि आपके दोस्तों के बर्थडे पर अपने आप मैसेज चले जाएं तो इसके लिए WhatsApp Scheduler App डाउनलोड करें और जिस दिन विश करना है उस दिन के लिए बर्थ विश मैसेज लिखकर शिड्यूल कर दें. फिर आपका मैसेज अपने आप सेंड हो जाएगा.

WhatsApp पर आए फालतू के फोटो औटोमेटिक डिलीट करें

कई बार ऐसा होता कि व्हाट्सऐप पर एक ही फोटो कई ग्रुप और दोस्तों भेज देते हैं जिन्हें गैलरी में जाकर एक-एक करके डिलीट करने में परेशानी होती है. ऐसे में आप एक ऐप की मदद से एक जैसे दिखने वाले फोटो को औटोमेटिक डिलीट कर सकते हैं. इसके लिए आपको Galerie Doktor ऐप डाउनलोड करना होगा.

मैसेज भेजने वालों को बिना बताए मैसेज पढ़ें

अगर आप चाहते हैं कि आप दोस्तों को बिना पता चले उनके मैसेज पढ़ें तो इसके लिए अपने फोन को फ्लाइट मोड में डाल दें और फिर मैसेज पढ़ लें. उसके बाद फिर से फ्लाइट मोड औन कर दें. इससे व्हाट्सऐप में मैसेज रीड का विकल्प औन-औफ किए बिना आप मैसेज पढ़ सकते है और दोस्तों को पता भी नहीं चलेगा.

WhatsApp से बिना कुछ लिखे मैसेजे भेजें

वैसे तो व्हाट्सऐप पर Empty भेजने का ऑप्शन नहीं है, लेकिन एक ऐप की मदद से आप दोस्तों को बिना कुछ लिखे मैसेज भेज सकते हैं. इसके लिए प्ले स्टोर से EMPTY ऐप अपने फोन में डाउनलोड करें.

नाना और अमिताभ ने दिया तनुश्री के आरोपों पर बड़ा बयान

तनुश्री दत्ता ने 10 साल पुराने मामले का खुलासा करते हुए दिग्गज कलाकार नाना पाटेकर पर बदसलूकी और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है. यह बौलीवुड में ‘मी टू मूवमेंट’ की शुरुआत मानी जा रही है. फिल्म के ट्रेलर लांच पर संवाददाताओं ने अमिताभ और सुपरस्टार आमिर खान से इस खबर पर अपने विचार साझा करने के लिए कहा. तनुश्री विवाद मामले में अमिताभ ने कहा, “ना तो मेरा नाम तनुश्री है, ना ही नाना पाटेकर, कैसे उत्तर दूं इस सवाल का?” दूसरी तरफ, “आमिर ने कहा, सच या किसी जानकारी के बिना, मुझे नहीं लगता कि मैं टिप्पणी कर सकता हूं. यह मेरे लिए सही नहीं है. लेकिन मैं यह कहना चाहूंगा कि जब भी ऐसा कुछ हुआ है, तो यह दुखद है. अब अगर ऐसा हुआ है या नहीं, जांच करानी चाहिए.

वहीं इस आरोप को गलत बतलाते हुए नाना पाटेकर का कहना है कि “यौन उत्पीड़न से आपका क्या मतलब है? उस समय सेट पर मेरे साथ 50-100 लोग मौजूद थे. मैं देखूंगा कि इस पर क्या कानूनी कार्यवाही हो सकती है. लोग कुछ भी कह सकते हैं. मैं अपना काम करना जारी रखूंगा.”

बता दें कि वर्ष 2008 में ही नाना के खिलाफ आवाज उठा चुकीं तनुश्री ने हाल ही में दिए एक साक्षात्कार में एक बार फिर यौन उत्पीड़न का मुद्दा उठाया. उन्होंने फिल्म ‘हौर्न ओके प्लीज’ के सेट पर यौन उत्पीड़न का खुलासा किया था. तनुश्री ने कहा, “राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता होने के नाते नाना के रुतबे की वजह से मेरी आवाज दबा दी गई.” उन्होंने कहा, “हमारे देश में अभिनेत्री को ज्यादातर उनकी औन-स्क्रीन छवि से पहचाना जाता है.

यह मेरे लिए अलग नहीं था, क्योंकि मैंने बौलीवुड में ‘आशिक बनाया आपने’ जैसी फिल्म के साथ शुरुआत की थी, जिसके लिए मुझे बोल्ड सीन करने थे. चूंकि वह लोकप्रिय और सम्मानित हस्ती होने के साथ दिग्गज राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हैं, इसलिए मेरी आवाज को दबाना सबसे आसान काम था. इस वजह से वह ऐसा कर पाएं.” तनुश्री ने एक सांस में कहा, “लेकिन, एक राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने से वह एक अच्छा इंसान नहीं बन जाते.”

पटाखा : फिल्म में हैं मनोरंजन का घोर अभाव

साहित्यिक कहानियां व उपन्यासों और देहाती व देसी पृष्ठभूमि की कहानियों पर फिल्में बनाने में माहिर विशाल भारद्वाज ने इस बार राजस्थान के लेखक चरन सिंह पथिक की एक छह पन्नों की कहानी ‘दो बहनों’ पर फिल्म ‘‘पटाखा’’ बनायी है. मगर इस बार वह असफल रहे हैं. ‘‘पटाखा’’ न साहित्यिक फिल्म बन पायी और न ही काल्पनिक. इतना ही नहीं यह माना जाता है कि फिल्म का निर्देशक ऐसा जादूगर होता है, जो कि फिल्म के हर पात्र व घटनाक्रम को इस तरह पेश करता है कि दर्शक के लिए वह पात्र व कहानी विश्वसनीय लगने लगे. इस तर्क के धरातल पर भी विशाल भारद्वाज असफल हैं. क्योंकि दो बहनों के बीच के युद्ध को उन्होंने भारत व पाकिस्तान के बीच के युद्ध की संज्ञा देते हुए जिस अंदाज में पेश किया है, उससे कम से कम भारतीय इत्तफाक नहीं रखते. मगर विशाल भारद्वाज का दावा है कि लेखक चरन सिंह पथिक ने यह कहानी वास्तविक बहनों पर लिखी है. इस बार विशाल भारद्वाज मनोरंजक फिल्म नहीं बना पाए. ‘पटाखा’ देखकर नहीं लगता कि यह फिल्म ‘मकबूल’, ‘ओंकारा’या ‘कमीने’ जैसी फिल्मों के फिल्मकार की फिल्म है.

फिल्म की कहानी राजस्थान के एक गांव की है, जहां अपनी पत्नी की मौत के बाद शांतिभूषण (विजय राज) अपनी दो बेटियों चंपा कुमारी उर्फ बड़की (राधिका मदान) और गेंदा कुमारी उर्फ छुटकी (सान्या मल्होत्रा) के साथ रहता है. शांति भूषण ने अपनी पत्नी से वादा किया था कि वह दोनों बेटियों की अच्छी परवरिश करेंगे, उन्हें किसी चीज की कमी नहीं होने देंगे. इसी के चलतेउन्होंने दूसरी शादी नहीं की. मगर बड़की और छुटकी एक दूसरे को फूटी आंख भी देखना पसंद नहीं करती.

इनमें बीड़ी पीने से लेकर दंबगई करने और एक दूसरे से निरंतर झगड़ते रहने की आदत है. गाली गलौज के बीच एक दूसरे को थप्पड़ रसीद करने, एक दूसरे की लात घूंसे से पिटाई करने, मिट्टी से लेकर गोबर तक में एक दूसरे को सबसे बड़े दुश्मन की तरह पीटते हुए युद्ध करती रहती हैं. इन दोनों के बीच लड़ाई से सबसे ज्यादा मनोरंजन डिप्पर (सुनील ग्रोवर) को मिलता है. इसलिए वह इन दोनों के कान भरकर एक दूसरे से लड़वाता रहता है.

बड़की का सपना बहुत बड़ी दूध की डेरी खोलकर व्यापार करना है. जबकि छुटकी का सपना शिक्षक बनना है. इधर गांव का एक अमीर युवक पटेल (सानंद वर्मा) इनमें से किसी के भी संग शादी करने के लिए लालायित है. इसीलिए वह शांति भूषण को अपने खदान को बचाए रखने के लिए चार लाख रूपए भी देता है. मगर ऐन शादी से एक दिन पहले बड़की अपने प्रेमी जगन (नमित दास) के साथ भाग जाती है. अब पटेल, छुटकी के साथ शादी करना चाहता है, पर जब पटेल बारात लेकर पहुंचता है, तो पता चलता है कि छुटकी भी अपने प्रेमी विष्णु (अभिषेक दुहान) के साथ भाग गयी. विष्णु सेना में है, जबकि जगन जूनियर इंजीनियर है. मजेदार बात यह है कि इन्हे भागने में डिप्पर ही मदद करता है. पर दोनों शादी करके एक ही घर पहुंचती हैं. क्योंकि जगन व विष्णु सगे भाई हैं. इनके बीच अटूट प्यार है.

अब पटेल, शांति भूषण के खिलाफ गांव की पंचायत बुलाता है, जहां डिप्पर तर्क देकर पटेल का मुंह बंद करा देता है, पर जगन व विष्णु को मिलकर चार लाख रूपए चुकाने पड़ते हैं.

शादी के बाद बड़की व छुटकी अपने पिता की कसम खाकर  वादा करती हैं कि वह नहीं झगड़ेंगी. दोनों की जिंदगी सकून मेंबीतने लगती है. समय के साथ दोनों एक एक बेटी की मां भी बन जाती हैं. लगभग छह सात वर्ष बाद डिप्पर पुनः इनकी जिंदगी में पहुंचता है और इन्हे अपने सपने याद दिला कर इनके बीच की आग भड़काता है. बड़की व छुटकी अपने अपने पतियों के कान भर घर का बंटवारा कर खेत बिकवा कर अपने अपने सपनों को पूरा करती हैं.

बड़की को डेरी उद्योग और छुटकी को शिक्षक के रूप में पुरस्कार मिलता है. यह बात दोनों को बर्दाश्त नहीं होती. एक दिन बड़की की आवाज और छुटकी की देखने की शक्ति चली जाती है. डाक्टर के अनुसार कोई कमी नहीं है. तब डिप्पर के कहने परशांति भूषण मरने का नाटक करते हैं, बड़की व छुटकी ठीक होकर एक दूसरे पर पिता को मार डालने का आरोप लगाकर लड़नाशुरू करती हैं. शांतिभूषण उठकर बड़की व छुटकी से बात करते हैं. दोनों बहने गले मिलती हैं.

यदि हम पात्रों व कहानी की विश्वसनीयता को नजरंदाज कर दें, तो भी पटकथा के स्तर पर भी काफी कमियां हैं. कमजोर पटकथा व कमजोर चरित्र चित्रण के चलते दर्शक फिल्म के साथ खुद को जोड़ नहीं पाता. फिल्म में सुनील ग्रोवर के किरदार को स्थापित करने में असफल रहे हैं. फिल्म में बड़की डेरी उद्योग को स्थापित कर पुरस्कार जीतती है. छुटकी पहले पढ़ाई करती है,फिर शिक्षक बनती है और पुरस्कार जीतती है.

परिणामतः कुछ वर्ष गुजरते हैं, मगर इनकी बेटियों की उम्र में कोई अंतर नहीं आता. यह है विशाल भारद्वाज की कल्पनाशक्ति…इतना ही नहीं फिल्म को बेवजह काफी लंबा खींचा गया है. कई सीन अति अविश्वसनीय लगते हैं. एडीटिंग टेबल पर फिल्म को कसने की आवश्यकता थी. सुनील ग्रोवर का नारद मुनि जैसा डिप्पर का किरदार गले नहीं उतरता है. फिल्म का क्लायमेक्स व अंत तो बहुत ही बेकार है. कुल मिलाकर फिल्म मनोरंजन करने की बजाय बोर ही करती है.

फिल्म ‘‘पटाखा’’ की खूबसूरती यही है कि विशाल भारद्वाज ने  राजस्थानी गांवों को सजीव रूप में उकेरा है. इसके लिए फिल्म के कैमरामैन रंजन पलित बधाई के पात्र हैं. मगर विशाल भारद्वाज ने जिस तरह से बड़े दांत, गंदे उलझे हुए बाल, कुरूप चेहरे के साथ गांव की लड़कियों की कल्पना की है, वह तो महज मजाक लगता है. क्योंकि आज की तारीख में शहरी लड़कियों के मुकाबले गांव की लड़कियां ज्यादा फैशन परस्त हो चुकी हैं.

फिल्म का गीत संगीत प्रभावित नहीं करता. पार्श्वसंगीत जरुरत से ज्यादा लाउड है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो राधिका मदान व सान्या मल्होत्रा ने बेहतरीन अभिनय किया है. मगर इंटरवल से पहले सान्या मल्होत्रा राजस्थानी की बजाय हिंदी भाषा में ही संवाद अदायगी करती हैं. विजय राज, सुनील ग्रोवर, सानंद वर्मा,नमित दास आदि ने भी ठीक ठाक काम किया है.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘पटाखा’’ का निर्माण विशाल भारद्वाज, रेखा भारद्वाज, अजय कपूर, धीरज वाधवान,इशान सक्सेना ने किया है. लेखक निर्देशक व संगीतकार विशाल भारद्वाज, कहानीकार चरण सिंह पथिक, कैमरामैन रंजित पलित व कलाकार हैं – सान्या मल्होत्रा, राधिका मदान, विजय राज, सानंद वर्मा, नमित दास, सुनील ग्रोवर व अन्य.

पहचानें ऐसे दगाबाजों को : आस्तीन का सांप बन रची गहरी साजिश

इंतजार करतेकरते कई दिन बीत चुके थे, पर लवकुश अभी तक घर लौट कर नहीं आया था. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था त्योंत्यों नाहर सिंह की चिंता

बढ़ती जा रही थी. उन की पत्नी सीमा सिंह भी चिंतित थी. बेटे की याद में उन्होंने खानापीना तक छोड़ दिया था. दरअसल, नाहर सिंह का 20 वर्षीय बेटा लवकुश ड्राइवर था. वह दूध कलेक्शन करने वाली एक कंपनी की गाड़ी चलाता था. कई दिनों से वह घर नहीं आया था.

वैसे तो लवकुश रोजाना ही देर रात तक घर वापस आ जाता था. कभीकभी उसे जब देर हो जाती तो वह घर फोन कर के इस की सूचना दे देता था. लेकिन इस बार तो कई दिन बीत चुके थे. न तो वह घर आया और न ही उस ने कोई सूचना दी थी.

कहीं लवकुश के साथ कोई अप्रिय घटना तो नहीं हो गई, इस तरह के अनेक विचार नाहर सिंह के मस्तिष्क में घूमने लगे थे. उन्होंने बेटे की खोज में रातदिन एक कर दिया था. रिश्तेनाते में जहां भी वह जा सकता था, फोन कर के उन सभी से पूछा.

साथी दोस्तों में भी उस की तलाश की. पर उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. नाहर सिंह बेटे के बारे में जानकारी लेने के लिए उस की दूध कंपनी भी गए. वहां पता चला कि लवकुश कई रोज से काम पर नहीं आ रहा है. यह मई, 2018 के अंतिम सप्ताह की बात है.

वह कई दिन से ड्यूटी पर नहीं जा रहा है तो आखिर वह गया कहां, यह बात नाहर सिंह की समझ में नहीं आ रही थी, जब कहीं भी उस का पता नहीं चला तो नाहर सिंह थाना अकबरपुर पहुंच गए. थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला को उन्होंने अपने 20 वर्षीय बेटे के कई दिनों से लापता होने की जानकारी दे दी.

नाहर सिंह की बात सुनने के बाद थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला ने उन्हें धैर्य बंधाया और कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आप का बेटा अपने यारदोस्तों के साथ कहीं घूमनेफिरने निकल गया हो. यदि ऐसा है तो वह 2-4 दिन में घूमफिर कर वापस आ जाएगा. फिर भी आप उस का हुलिया आदि लिख कर दे दीजिए हम भी उसे तलाशेंगे और यदि आप को भी उस के बारे में कोई सूचना मिले तो थाने आ कर बताना.

आश्वासन पा कर बुझे मन से नाहर सिंह घर वापस आ गए. दरवाजे पर टकटकी लगाए उन की पत्नी सीमा सिंह खड़ी थी. देखते ही बोली, ‘‘लवकुश का कुछ पता चला. कहां है वह.’’

‘‘नहीं, अभी तो पता नहीं चला, पुलिस को सूचना दे दी गई है, वह भी अपने स्तर से उसे ढूंढेगी.’’ नाहर सिंह ने बताया.

10 जून, 2018 की शाम नाहर सिंह चौपाल पर बैठे थे. वहां मौजूद सभी लोग लवकुश के बारे में ही बातें कर रहे थे. तभी नाहर सिंह के मोबाइल फोन पर काल आई. जैसे ही उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘तुम्हारा बेटा लवकुश हमारे पास है. उस की जान की सलामती चाहते हो तो जल्द से जल्द 25 लाख रुपए का इंतजाम कर लो.’’ इतना कहने के बाद फोनकर्ता ने फोन काट दिया. नाहर सिंह हैलोहैलो कहते रह गए.

फिरौती के मांगे 25 लाख रुपए

नाहर सिंह ने जब फोन चेक किया तो पता चला कि वह काल लवकुश के फोन से ही की गई थी. इस से उन्हें विश्वास हो गया कि उन का बेटा अपहर्त्ताओं के ही चंगुल में है. उस के बाद तो नाहर सिंह के घर में कोहराम मच गया. अब यह स्पष्ट हो गया था कि फिरौती के लिए लवकुश का अपहरण किया गया है. परिवार के सभी लोग बहुत चिंतित हो गए. सभी को इस बात की चिंता हो रही थी कि पता नहीं लवकुश किस हाल में होगा.

इस के ठीक 10 मिनट बाद अपहर्त्ता ने नाहर सिंह को पुन: फोन कर के कहा, ‘‘पुलिस को इस बारे में कुछ भी बताया तो तुम्हारे बेटे की सेहत के लिए यह अच्छा नहीं होगा. ध्यान रहे कि ज्यादा चालाक बनने की गलती न करना.’’

‘‘भाई आप कौन बोल रहे हैं? क्या बिगाड़ा है मैं ने आप का. मैं आप के हाथ जोड़ता हूं, पैर पड़ता हूं. मेरे बेटे को कुछ मत करना.’’ घबराहट भरे स्वर में उन्होंने उस से विनती की.

‘‘तो अपना समय घर में बैठ कर बरबाद मत करो. फटाफट रुपयों का बंदोबस्त करने में जुट जाओ. इस के लिए चाहे गहने बेचो या फिर जमीन. क्योंकि मेरे पास अधिक समय नहीं है.’’ अपहर्त्ता ने कहा.

25 लाख कोई मामूली रकम नहीं होती, इतनी बड़ी रकम जल्द जुटा पाना नाहर सिंह के लिए संभव नहीं था. लिहाजा अपने घर वालों से सलाहमशविरा कर ने के बाद उन्होंने पुलिस को सारी बातें बताना जरूरी समझा.

वह अपने बड़े बेटे धीरेंद्र सिंह के साथ थाना अकबरपुर पहुंच गए. उन्होंने थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला को अपहर्त्ता का फोन आने तथा 25 लाख रुपए की फिरौती मांगने की बात बताई. साथ ही यह भी बताया कि अपहर्त्ता उन के बेटे के ही मोबाइल से फोन कर रहे हैं.

अपहरण और फिरौती की बात सुन कर थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला चौंक पडे़े उन्होंने तत्काल नाहर सिंह की तहरीर पर अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ लवकुश के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली और घटना की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी. अब वह गंभीरता से मामले की जांच में जुट गए.

उन्होंने नाहर सिंह से पूछा, ‘‘आप की किसी से रंजिश या जमीनी विवाद तो नहीं है, जिस के चलते उन लोगों ने बेटे को अगवा कर लिया हो और वो फिरौती मांग रहे हों.’’

नाहर सिंह कुछ देर दिमाग पर जोर डालते रहे फिर बोले, ‘‘मेरी रंजिश भी है और जमीनी विवाद भी, लेकिन रंजिश और जमीनी विवाद घरेलू हैं. यकीनन तो कुछ नहीं कह सकता पर शक जरूर है.’’

‘‘खुल कर सारी बात बताओ.’’ श्री शुक्ला ने कहा.

नाहर सिंह ने जताया शक

‘‘सर, मुझे ससुराल में 4 बीघा जमीन मिली थी. जिस की कीमत लाखों में है. जाहिर है कि मेरे सालों को जमीन खटकती होगी. रही बात रंजिश की तो वह बड़े बेटे की ससुराल से है. एक साल पहले बेटे की पत्नी प्रीति लड़झगड़ कर मायके चली गई थी. उस ने उत्पीड़न का आरोप लगा कर हम लोगों को परेशान किया. प्रीति का साथ उस की मां रेखा तथा पिता रामसिंह ने भी दिया, शक है कि इन्हीं लोगों का अपहरण में हाथ हो सकता है.’’ नाहर सिंह ने बताया.

नाहर सिंह के साले शक के दायरे में आए तो थानाप्रभारी ने उन्हें थाने बुला लिया और उन से हर दृष्टिकोण से पूछताछ की लेकिन ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस से लगे कि लवकुश का अपहरण उन्होंने किया है. उन्हें यह कह कर पुलिस ने घर भेज दिया कि जरूरत पड़ने पर उन से आगे भी पूछताछ की ज सकती है.

नाहर सिंह के बड़े बेटे धीरेंद्र सिंह की ससुराल वाले भी संदेह के घेरे में थे. अत: थानाप्रभारी ने धीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रीति, सास रेखा व ससुर रामसिंह को थाने बुलवा लिया. प्रीति, रेखा और रामसिंह से अलगअलग की गई पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला को लगा कि वह तीनों निर्दोष हैं. अत: उन्होंने तीनों को थाने से जाने दिया.

रिपोर्ट दर्ज हुए अब तक एक सप्ताह बीत चुका था. थानाप्रभारी करीब एक दरजन लोगों से पूछताछ कर चुके थे. लवकुश अपहरण व फिरौती का मामला एसपी राधेश्याम के संज्ञान में भी था और क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ था. मीडिया में भी यह मामला सुर्खियां बटोर रहा था.

एसपी राधेश्याम ने अपहरण व फिरौती के इस मामले के खुलासे के लिए एक स्पैशल पुलिस टीम का गठन किया. इस टीम में थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला, स्वाट टीम प्रभारी रोहित कुमार, सर्विलांस प्रभारी राजीव कुमार के साथ आधा दरजन विश्वसनीय सिपाहियों को शामिल किया गया. टीम का निर्देशन सीओ अर्पित कपूर को सौंप दिया गया.

पुलिस टीम ने जांच शुरू की तो चौंकाने वाली बातें सामने आने लगीं. पता चला कि गांव का एक युवक विपिन यादव लवकुश का गहरा दोस्त है. लवकुश के घर वाले उस पर अटूट विश्वास करते हैं और उसे अपना हितैषी मानते हैं. लवकुश को ढूंढने में वह नाहर सिंह के साथ साए की तरह लगा रहा. नाहर सिंह जहां भी बेटे की खोज में गए विपिन उन के साथ लगा रहा. नाहर सिंह व उन के परिवार को धैर्य बंधाने में भी उस की अहम भूमिका रही.

शक के दायरे में आया विपिन यादव

एक चौंकाने वाली बात यह भी पता चली कि विपिन ने दबाव के साथ नाहर सिंह को यह सलाह भी दी थी कि वह ससुराल वाली जमीन बेच कर लवकुश को अपहर्त्ताओं के चंगुल से छुड़ा लें. इस के लिए वह जमीन का रेट मालूम करने घाटमपुर भी गया था. वह नाहर सिंह को उकसाता था कि बेटे से बढ़ कर जमीन नहीं है. जब लवकुश ही नहीं आएगा तो जमीन क्या चाटोगे.

इधर सर्विलांस प्रभारी राजीव कुमार ने अपहृत लवकुश के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया था. उस की लोकेशन मुक्तापुर गांव तथा आसपास की मिली. इस से जाहिर हो रहा था कि अपहर्त्ता मुक्तापुर गांव या फिर पासपड़ोस का है.

राजीव कुमार ने एक बात और चौंकाने वाली बताई कि अपहर्त्ता लवकुश के मोबाइल में दूसरा सिम डाल कर अपने अन्य साथियों से बात करता है. शायद वह पुलिस की गतिविधियों की जानकारी उन्हें देता है.

इन सब बातों से मुक्तापुर गांव का विपिन यादव भी शक के घेरे में आ गया. फिर सीओ अर्पित कपूर के निर्देश पर पुलिस टीम ने मुक्तापुर गांव में छापा मार कर विपिन यादव को गिरफ्तार कर लिया.

थाना अकबरपुर ला कर जब उस से लवकुश के अपहरण के संबंध में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया और बोला, ‘‘साहब, लवकुश मेरा जिगरी दोस्त है. भला मैं उस का अपहरण क्यों करूंगा. मैं तो उस की खोज में रातदिन लगा हूं. उस के पिता की हर संभव मदद करता हूं.’’

विपिन ने स्वीकारा अपराध

साधारण पूछताछ में विपिन यादव ने कुछ नहीं बताया तो थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला ने पुलिसिया अंदाज में उस से पूछताछ शुरू की. वह ज्यादा देर टिक न सका और बोला, ‘‘साहब, मुझे मत मारो मैं सब कुछ आप को बता दूंगा.’’

‘‘तो बताओ लवकुश कहां है? उसे तुम ने कहां बंधक बना कर रखा है?’’ श्री शुक्ला ने पूछा.

‘‘साहब, लवकुश अब इस दुनिया में नहीं है. मैं ने अपने साथी शिवम, पंकज व दुर्गेश की मदद से लवकुश की हत्या कर दी और उस का मोबाइल फोन अपने पास रख लिया था. फिर उसी मोबाइल से फिरौती मांगी थी.’’

पुलिस ने विपिन यादव की निशानदेही पर उस के घर से लवकुश का मोबाइल फोन तथा एक अन्य मोबाइल फोन बरामद कर लिया. दूसरा फोन लूट का था. इस के बाद पुलिस टीम ने रात में ही छापा मार कर विपिन यादव के दोस्त शिवम यादव, पंकज यादव व दुर्गेश को हिरासत में ले लिया. पूछताछ में सभी ने बिना हीलाहवाली के अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

जब विपिन यादव की गिरफ्तारी की सूचना नाहर सिंह को मिली तो वह थाने पहुंच गए. उन्होंने पुलिस से गुहार लगाई कि विपिन बेकसूर है. वह तो उन के परिवार का हितैषी है उसे इस मामले में न फंसाया जाए. लेकिन पुलिस ने जब सारी हकीकत बताई तो नाहर सिंह भौचक्के रह गए. वह माथा पकड़ कर बैठ गए. सोचने लगे कि यह तो बड़ा ही खतरनाक आस्तीन का सांप निकला. इस के बाद तो उन के घर में कोहराम मच गया.

अब पुलिस को आरोपियों की निशानदेही पर लवकुश की लाश बरामद करनी थी. लिहाजा वह चारों आरोपियों व नाहर सिंह को ले कर अमृतसर के लिए रवाना हो गई. क्योंकि उन्होंने वहीं पर लवकुश की हत्या कर लाश ठिकाने लगाई थी. थानाप्रभारी आरोपियों को फतेहपुर गांव के बाहर नहर किनारे खेत पर ले गए जहां उन्होंने लवकुश की हत्या की थी.

लेकिन पुलिस को वहां कुछ भी नहीं मिला. पूछताछ से पता चला कि यह स्थान अमृतसर (रूरल) जिले के जंडियाला थाना क्षेत्र में आता है. इस के बाद पुलिस टीम थाना जंडियाला पहुंची टीम ने वहां मौजूद थानाप्रभारी हरसन दीप सिंह को लवकुश की हत्या वाली बात बताई.

थानाप्रभारी हरसनदीप सिंह ने अकबर पुर पुलिस को एक युवक की लाश के फोटो दिखाते हुए कहा कि इस युवक की लाश 30 मई, 2018 को फतेहपुर गांव के बाहर नहर किनारे खेत में मिली थी. युवक की गला घोंट कर हत्या की गई थी.

थाने पर सूचना फतेहपुर गांव के सरपंच तरसेम सिंह ने दी थी. उसी की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज है.

फोटो देख कर फफक पड़े नाहर सिंह

नाहर सिंह ने जब वह फोटो देखा तो वह फफक कर रो पड़े और बताया कि यह फोटो उन के बेटे लवकुश की है. अकबरपुर पुलिस थाने से मृतक की फोटो एफआईआर की प्रति आदि ले कर वापस लौट आई. इस के बाद थानाप्रभारी ने सारी जानकारी एसपी राधेश्याम को दी. पुलिस अधिकारियों ने आननफानन में प्रैस कौन्फै्रंस कर के मामले का खुलासा कर दिया.

चूंकि लवकुश के हत्यारोपी अपहर्त्ताओं ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. अत: थानाप्रभारी ऋषिकांत शुक्ला ने मृतक के पिता नाहर सिंह को वादी बना कर भादंवि की धारा 364ए/302 आईपीसी के तहत विपिन यादव, पंकज यादव, शुभम यादव व दुर्गेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उन्हें विधि सम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में दोस्त की गहरी साजिश का जो परदाफाश हुआ, वह चौंकाने वाला था.

उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) जनपद के अकबरपुर थाना अंतर्गत एक गांव मुक्तापुर पड़ता है. रूरा और अकबरपुर जैसे 2 बडे़  कस्बों के बीच पड़ने वाले इस गांव के लोग काफी संपन्न हैं. वह या तो व्यापार करते हैं या फिर अपनी खेती. इसी मुक्तापुर गांव में संपन्न किसान नाहर सिंह रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सीमा सिंह के अलावा 2 बेटे धीरेंद्र सिंह व लवकुश थे. नाहर सिंह के पास अच्छीखासी खेती की जमीन थी. जिस में अच्छी उपज होती थी. इस के अलावा उन्हें ससुराल में भी 4 बीघा जमीन मिली थी. कुल मिला कर उन की आर्थिक स्थिति अच्छी थी.

बड़ा होने पर धीरेंद्र सिंह पिता के साथ खेती कार्य में हाथ बंटाने लगा. बाद में नाहर सिंह ने उस की शादी मूसानगर निवासी राम सिंह की बेटी प्रीति से कर दी. प्रीति खूबसूरत व चंचल थी जबकि धीरेंद्र सिंह सीधासादा था. प्रीति दिखावे में तो उस की पत्नी थी, लेकिन उस ने मन से धीरेंद्र को अपना पति स्वीकार नहीं किया था. इस की वजह यह थी कि धीरेंद्र अपने काम में व्यस्त रहने की वजह से उस की भावनाओं को नहीं समझता था.

इस के बाद छोटीछोटी बातों को ले कर पतिपत्नी में कलह होने लगी. कलह ने जब विकराल रूप धारण किया तो प्रीति ससुराल से नाता तोड़ कर मायके में रहने लगी.

गांव में लवकुश का एक दोस्त था विपिन यादव. दोनों में गहरी दोस्ती थी. लवकुश व विपिन दोनों शराब के लती थे. अकसर दोनों की महफिल जमती रहती थी. एक रोज शराब पीने के दौरान लवकुश ने विपिन को बताया कि उस के पिता को ससुराल में जो 4 बीघा जमीन मिली है उस की कीमत बढ़ रही है. वह अब 25-30 लाख से कम नहीं है.

विपिन के मन में आ गया था लालच

विपिन यादव साधारण किसान लल्ला यादव का बेटा था. घर से उसे खर्च के लिए फूटी कौड़ी नहीं मिलती थी. छुटपुट काम से वह जो कमाता था वह शराब तथा अय्याशी में खर्च कर देता था. पैसा न रहने पर वह परेशान रहता था. विपिन ने जब 25-30 लाख की बात लवकुश के मुंह से सुनी तो उस के मन में लालच समा गया, फिर वह लालच की चाह में अमीर होने के तानेबाने बुनने लगा.

विपिन का एक दोस्त शिवम था. शिवम, रूरा निवासी बबलू यादव का बेटा था. शिवम अमृतसर की एक फैक्ट्री में काम करता था. शिवम महत्त्वाकांक्षी था. वह जल्द रईस बनना चाहता था. लेकिन फैक्ट्री की नौकरी से उस का खर्चा भी पूरा नहीं होता था. एक रोज रूरा में विपिन की मुलाकात शिवम से हुई. वह छुट्टी ले कर अमृतसर से आया था.

दोस्त का अपहरण कर के कर दी हत्या

बातचीत के दौरान शिवम ने रईस बनने की इच्छा जाहिर की तो विपिन ने भी उस की हां में हां मिलाई. पर रईस कैसे बना जाए, इस पर विचार करने के लिए जब दोनों सिर जोड़ कर बैठे तो वे इस नतीजे पर पहुंचे कि सीधे तरीके से तो बड़ी रकम हाथ आने से रही.

इस के लिए कोई गलत रास्ता अपनाना पड़ेगा. वह गलत रास्ता क्या हो इस के लिए दोनों ने काफी सोचविचार के बाद किसी अमीरजादे के बच्चे का अपहरण कर के लाखों रुपए फिरौती वसूलने का मंसूबा बनाया.

विपिन ने शुभम को बताया कि उस का दोस्त लवकुश संपन्न किसान नाहर सिंह का बेटा है. यदि उस का अपहरण कर फिरौती मांगी जाए तो 20-25 लाख रुपया आसानी से मिल सकता है. नाहर सिंह को ससुराल में 4 बीघा जमीन मिली है, जिसे बेच कर वह फिरौती दे सकता है.

यह सुन कर शुभम की आंखों में चमक आ गई. फिर दोनों ने मिल कर लवकुश के अपहरण व हत्या कर फिरौती वसूलने की योजना बनाई. इस योजना में शुभम ने अपने दोस्त सवायज पुरवा (नरवल) निवासी पंकज यादव तथा अहिरन पुरवा (रनियां) निवासी दुर्गेश को भी शामिल कर लिया. दोनों पैसों के लालच में साथ देने को तैयार हो गए.

योजना के तहत 28 मई, 2018 को विपिन यादव व उस के दोस्त शुभम, दुर्गेश तथा पंकज लवकुश को घुमाने के बहाने अमृतसर ले गए. 29 मई की शाम को सभी ने अमृतसर के जंडियाला में शराब पी फिर अंधेरा होने पर वह सब लवकुश को नहर किनारे खेत में ले गए और अंगौंछे से गला घोंट कर हत्या कर दी.

उस का मोबाइल फोन विपिन ने अपने पास रख लिया. इस के बाद सभी वापस आ गए और अपनेअपने घरों में रहने लगे. कुछ दिनों बाद उस के घर वालों को विपिन ने लवकुश के मोबाइल से ही 25 लाख रुपए फिरौती की मांग की.

तब नाहर सिंह ने थाना अकबरपुर जा कर रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस के बाद पुलिस सक्रिय हुई और लवकुश के अपहरण व हत्या का परदाफाश कर उस के दगाबाज दोस्त व उस के साथियों को बंदी बनाया.

25 जून, 2018 को थाना अकबरपुर पुलिस ने अभियुक्त विपिन यादव, शुभम यादव, पंकज यादव तथा दुर्गेश को माती कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया. जहां से माती जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक सभी अभियुक्तों की जमानत लोअर कोर्ट से खारिज हो गई थी. वे सब जेल में हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अंधविश्वास : भूत ‘पालने’ पर हुक्कापानी बंद

पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर जिले के शालबनी थाने क्षेत्र के तहत आने वाले गांव भीमशोल में पंचायत बुला कर एक परिवार के लोगों को भूत पालने का सिर्फ कुसूरवार ही नहीं ठहराया गया, बल्कि परिवार का हुक्कापानी भी बंद कर दिया गया. गांव भीमशोल में किसान मानिक महतो खेतीबारी से अपने घर का खर्च उठाते थे. उन का बेटा रमेश महतो 10वीं जमात तक ही पढ़ा था. पढ़ाई बीच में रुक जाने से वह अपने पिता के साथ खेतीबारी में हाथ बंटा देता था.

अच्छी फसल कैसे पैदा की जाए, इस के लिए रमेश ने वैज्ञानिक तरीके की खेतीबारी से जुड़ी कई किताबें पढ़ीं और धान समेत दूसरी फसलों की खेती भी की. इस से जमीन बेहतरीन फसलों से फूल की तरह खिल उठी. मानिक महतो की जमीन पर अच्छी फसल देख कर गांव के कुछ लोग उन से जलने लगे. जल्दी ही यह अफवाह फैल गई कि कहीं इस के पीछे कोई चमत्कार या भूतप्रेत का हाथ तो नहीं है? मानिक महतो ने कहीं अपने घर में कोई भूत तो नहीं पाल रखा है?

मानिक महतो के घर में पालतू भूत का पता लगाने के लिए गांव भीमशोल में लोगों ने एक सालिशी सभा बुलाई. आदिवासी समाज में पंचायत को सालिशी कहा जाता है. सभा में एक जानगुरु को भी बुलाया गया. आदिवासी समाज में ओझा या तांत्रिक को जानगुरु कहते हैं. जानगुरु ने तंत्रमंत्र कर के कहा, ‘‘मुझे तो मानिक महतो की जमीन में हुई भारी फसल के पीछे कोई चमत्कार या भूत का हाथ दिख रहा है. महतो के घर में कोई पालतू भूत है. उसी भूत की मदद से उस ने इतनी अच्छी फसल उगाई है.’’

जानगुरु की बातों की काट करते हुए रमेश महतो ने कहा, ‘‘मैं ने वैज्ञानिक तरीके से खेती करने के लिए कई किताबें पढ़ी हैं. उन्हीं तरीकों के मुताबिक फसलें उगाई हैं. इस के पीछे भूतप्रेत या किसी चमत्कार का कोई हाथ नहीं है.’’ पर जानगुरु की बातों को गांव के लोगों ने ज्यादा अहमियत दी. मानिक महतो के घर में वाकई भूत है, इस बात की जांच उन्होंने किसी दूसरे जानगुरु से कराने की सोची.

इस के बाद मानिक और उस के बेटे रमेश महतो और गांव के हर परिवार के एक सदस्य को एक गाड़ी से ओडिशा के मयूरभंज जिले के रायरांगपुर थाना क्षेत्र के गांव पटीपुर में विधातासम नामक एक जानगुरु के पास ले जाया गया. उस जानगुरु ने गांव भीमशोल से आए हर एक सदस्य की हथेली पर

2-2 बूंद सरसों का तेल डाल कर मुट्ठी बंद करने को कहा. कुछ देर तक मंत्र पढ़ने के बाद उस जानगुरु ने एकएक शख्स की मुट्ठी खोल कर हथेली को देखना शुरू किया. अचानक रमेश महतो की हथेली को देख कर जानगुरु ने कहा, ‘‘इस की हथेली पर सरसों के तेल में बाल का एक टुकड़ा है. इस के घर में ही भूत है. पालतू भूत के सहारे ही इस ने अपने खेत में अच्छी फसल उगाई है. पर चिंता की बात यह है कि इस भूत से गांव भीमशोल का भारी नुकसान होने का डर है.

‘‘जब तक मानिक महतो अपने घर से भूत को गांव से बाहर नहीं निकाल फेंकता है, तब तक मानिक और उस के पूरे परिवार का हुक्कापानी बंद कर दिया जाए.’’ मानिक महतो के घर में भूत है, इसे साबित करने के बदले में उस जानगुरु ने गांव भीलशोल से आए लोगों से मोटी रकम भी वसूली थी.

गांव लौटने के बाद लोगों ने फिर सालिशी सभा बुलाई, जिस में मानिक महतो और उस के पूरे परिवार पर भूत पालने का आरोप लगाया गया. इस के बाद पंचायत ने फरमान जारी किया, ‘जब तक मानिक अपने घर से भूत को गांव से खदेड़ नहीं देता है, तब तक उस के पूरे परिवार का हुक्कापानी बंद रहेगा.’

पंचायत के इस फरमान के बाद अपने परिवार की सिक्योरिटी के लिए मानिक महतो ने पुलिसप्रशासन से मदद की गुहार लगाई. इस पर पुलिस ने गांव वालों को सचेत भी किया, लेकिन पुलिसप्रशासन की दखलअंदाजी के बाद महतो परिवार की मुश्किलें और बढ़ गईं. आखिर में भूत पालने के झूठ से छुटकारा दिलवाने के लिए मानिक महतो ने भारतीय विज्ञान व युक्तिवादी समिति से लिखित रूप में मदद मांगी.

इस मामले का जिक्र करते हुए भारतीय विज्ञान व युक्तिवादी समिति के अध्यक्ष प्रबीर घोष ने इस रिपोर्टर से मोबाइल फोन पर कहा, ‘‘आप और सुमन दोनों समिति के कार्यकर्ता हो. आप को गांव भीमशोल का दौरा करना पड़ेगा. मानिक महतो के परिवार को भूत पालने के आरोप से छुटकारा दिलाना पड़ेगा. इस काम में युक्तिवादी समिति के पश्चिमी मिदनापुर जिले के कार्यकर्ता भी आप की मदद करेंगे.’’ प्रबीर घोष के सुझाव पर इस रिपोर्टर ने सुमन को साथ में ले कर गांव भीमशोल जाने की तैयारी शुरू कर दी. वे दोनों कोलकाता से टे्रन से मिदनापुर शहर पहुंचे, जहां समिति के कार्यकर्ता अनिंद्य सुंदर मंडल के साथ गांव भीमशोल में जाने से पहले एक बैठक की.

दूसरे दिन सुबह कुल 8 लोग एक बस से गांव भीमशोल के लिए रवाना हो गए. तकरीबन 3 घंटे के बाद वे शालबनी थाना इलाके के 7 नंबर सातपाटी की ग्राम पंचायत पहुंचे. वहां उन्होंने पंचायत की प्रधान आरती बास्के और उपप्रधान परिमल धर से मुलाकात की और उन से गांव भीमशोल जाने का इंतजाम करने को कहा.

उन की बातें मानते हुए पंचायत प्रधान ने जरूरी सामान के साथ उन के जाने का पूरा इंतजाम करा दिया. तब तक प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया के कई पत्रकार भी उन के साथ दूसरी गाडि़यों से गांव भीमशोल के लिए रवाना हो गए.

वहां मानिक महतो के घर के एक कमरे में कार्यक्रम का मंच तैयार कर दिया गया. इस रिपोर्टर ने लाउडस्पीकर पर आवाज लगाई, ‘‘हम युक्तिवादी समिति के कार्यकर्ता हैं. कोलकाता से आए हैं. आप गांव वालों के सामने एक कार्यक्रम पेश करने वाले हैं.’’

गांव के बच्चे से ले कर बुजुर्ग कार्यक्रम मंच के सामने इकट्ठा होने लगे. तब तक समिति के बाकी सदस्य भी वहां पहुंच चुके थे. सुमन ने मिट्टी से बनी एक कटोरी में थोड़ी सी सूखी लकड़ी मेज पर रखी. एक बोतल से पानी जैसा तरल पदार्थ एक चम्मच में ले कर उसे कटोरी में रखी सूखी लकड़ी पर बूंदबूंद गिराते हुए कोई मंत्र पढ़ना शुरू किया.

कुछ ही पलों में कटोरी से धुआं निकलने लगा और अचानक उस में आग जल उठी. यह देख कर गांव वाले हैरान रह गए. एक खाली सूप और एक गमछा ले कर मंच पर पहुंचे अनिंद्य ने गांव वालों से पूछा, ‘‘क्या आप में से 2 लोग मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं?’’

भीड़ में से 2 लोग सामने आए. उन के हाथों में गमछा दे कर अनिंद्य ने कहा, ‘‘आप गमछे के दोनों किनारों को कस कर पकड़ें.’’ उन 2 लोगों के हाथों में गमछा थमा कर अनिंद्य ने एक मुट्ठी चावल ले कर पूछा, ‘‘चावल से मुड़ी बनाने के लिए क्याक्या लगता है?’’

दर्शकों ने बताया, ‘‘कड़ाही या हांड़ी, आग और बालू…’’ एक मुट्ठी चावल सूप पर फैला कर अनिंद्य ने सूप को गमछे के ऊपर हिलाते हुए मंत्र पढ़ने शुरू किए.

देखते ही देखते सूप मुड़ी से भर गया. यह देख कर सब हैरान हो गए. कार्यक्रम के बीच में एक पत्रकार आए और इस रिपोर्टर के कानों में बोले, ‘‘आप लोग गांव में कार्यक्रम कर रहे हैं, यह खबर गांव के मस्तानों के कानों तक पहुंच गई है. वे लोग किसी भी समय आप पर हमला कर सकते हैं.’’

‘‘पर क्यों?’’ रिपोर्टर ने पूछा. पत्रकार ने बताया, ‘‘गांव के कई मस्तानों ने ही एक साजिश रच कर मानिक महतो के परिवार पर भूत पालने का आरोप लगाया है. ये मस्ताने चाहते हैं कि गांव के लोग भूत पालने के आरोप में मानिक महतो के परिवार की हत्या कर दें. इस के बाद वे उस की घरजमीन पर कब्जा कर लेंगे.

‘‘हम पत्रकारों ने पहले से ही यह खबर पिड़कांटा थाने को दे रखी है कि युक्तिवादी कार्यकर्ता गांव भीमशोल में जाने वाले हैं. आप कहेंगे तो पुलिस गांव में आ जाएगी.’’ ‘‘आप पुलिस को गांव में आने के लिए सूचना दे दें.’’

थोड़ी ही देर में पिड़कांटा पुलिस चौकी से भारी पुलिस बल कार्यक्रम मंच के सामने आ पहुंचा. कुछ ही देर में पंचायत प्रधान आरती बास्के और उपप्रधान परिमल धर भी वहां आ गए. अब मंच पर कांच का एक गिलास, एक बरतन में पानी और थोड़ा आटा रखा गया. पानी से आटा गूंदा गया और उस की छोटीछोटी कई गोलियां बना कर एक पत्तल में रखी गईं.

दर्शकों की भीड़ में खड़े रमेश महतो को पास बुला कर सुमन व अनिंद्य के साथ एक कतार में खड़ा कर दर्शकों से कहा गया, ‘‘आप ने देखा होगा कि गांव में किसी घर में भूतप्रेत का पता लगाने के लिए जानगुरु 2-4 कारनामे कर के दिखाते हैं. आज हम भी ऐसा ही कर के दिखाने वाले हैं.’’ गिलास पानी से भरा गया. पत्तल से आटे की एक गोली हाथ में ले कर कहा गया, ‘‘गोली में मंत्र पढ़ा हुआ है. कतार में खड़े एक के बाद एक आदमी का नाम लिया जाएगा और उस के नाम पर गोली गिलास के पानी में डाली जाएगी. जिस का नाम लेने पर गोली पानी में नहीं डूबी तो यह साबित होगा कि उस के घर में भूत बसा हुआ है.’’

जब अनिंद्य के नाम पर गिलास में गोली डाली तो वह तैरने लगी. यह देख कर दर्शक हैरानी में पड़ गए. तभी दर्शकों की भीड़ में से एक आदमी ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘रमेश के घर में भूत है.’’

‘‘कौन कहता है कि रमेश के घर में भूत है?’’ ‘‘जानगुरु ने तंत्रमंत्र कर के यह साबित कर के दिखाया है कि रमेश के घर में भूत है,’’ भीड़ में से एक आवाज आई.

‘‘क्या आप लोग उस जानगुरु को इस मंच पर हाजिर कर सकते हैं? अगर उस ने हमारे सामने दोबारा यह साबित कर दिया कि रमेश के घर में भूत है तो हम उसे 25 लाख रुपए का इनाम देंगे.’’ ‘‘युक्तिवादी समिति के महासचिव प्रबीर घोष ने अपनी ‘अलौकिक नहीं, लौकिक’ नामक किताब में भूत होने का सुबूत देने वाले को 25 लाख रुपए का इनाम देने का ऐलान किया है.’’

अपने दावे के सुबूत के तौर पर दर्शकों को वह किताब भी दिखाई गई. भीड़ में मौजूद लोग एकदूसरे का मुंह देखने लगे.

‘‘रमेश के घर में भूत है, इसे बताने लिए जानगुरु ने जो कारनामा दिखाया था, उस में सिर्फ धोखाधड़ी है. भूतप्रेत की बात बकवास है. आत्माओं या भूतप्रेत का वजूद ही नहीं होता है और यह अंधविश्वास है. पर जानगुरु जैसे पाखंडी लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए भूतप्रेत के नाम का डर दिखा कर अंधविश्वास में डूबे लोगों को लूटते हैं. मानिक महतो के घर में भूत होने का आरोप भी सरासर बेबुनियाद है.’’ एक गांव वाले ने पूछा, ‘‘आप ने मंच पर जो भी कारनामा दिखाया है, उस के पीछे तंत्रमंत्र नहीं है?’’

इस रिपोर्टर ने कहा, ‘‘हम कोई जादूगर या चमत्कारी बाबातांत्रिक नहीं हैं. हमारे पास जादू की छड़ी नहीं है. हम ने तो सिर्फ लौकिक तरकीब से यह कारनामा दिखाया है.’’ ‘‘बिना माचिस के मिट्टी की कटोरी में रखी लकड़ी में आग कैसे लग गई?’’ एक और आदमी ने सवाल दागा.

‘‘आप ने देखा होगा कि सुमन ने एक चम्मच से पानी जैसा तरल कटोरी में बूंदबूंद कर के गिराया था. वह कोई आम तरल नहीं, बल्कि ग्लिसरीन थी और कटोरी में पहले से ही लकड़ी के साथ एक कैमिकल पोटेशियम परमैगनेट रखा हुआ था. पोटेशियम परमैगनेट में ग्लिसरीन घुलते ही कटोरी में आग जल उठी थी.’’

‘‘आटे की गोली पानी में कैसे तैरने लगती है?’’ ‘‘आटे की गोलियों में तंत्रमंत्र की शक्ति नहीं है. पत्तल में रखी हुई गोलियों में से कइयों में पहले से थर्माकोल के छोटेछोटे टुकड़े भरे हुए थे. ऐसी गोली पानी में डूबने के बजाय तैरने लगी.

‘‘जानगुरु, तांत्रिक, बाबाजी के पास कोई भी अलौकिक शक्ति नहीं होती? है. वे जो भी कारनामे दिखाते हैं उन्हें देख कर आम लोग समझने लगते हैं कि जानगुरु के पास अलौकिक शक्ति है.’’

यह सुन कर पंचायत प्रधान आरती बास्के ने कहा, ‘‘जानगुरु की बातों में आ कर गांव वालों ने बेगुनाह मानिक महतो के परिवार पर जुल्म ढाया. उन के परिवार को समाज से बाहर किया. इस के लिए हमें दुख है. महतो परिवार पर घर में भूत पालने का जो आरोप लगाया गया था, वह सरासर गलत है. आज से महतो परिवार पर लगाए गए सभी आरोपों से मुक्त कर दिया जाता है.’’

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