Download App

यदि करनी हो व्यवसाय की शुरुआत…

भारत में महिलाओं की छिपी व्यवसाय करने की क्षमताएं, उनकी भूमिका और समाज में आर्थिक स्थिति में बढ़ती संवेदनशीलता के साथ लगातार परिवर्तन देखा गया है. लगभग सभी देशों में, पिछले कुछ दशकों में जिस व्यवसाय को महिलायें कर रही हैं उनमें उनका प्रदर्शन बड़ा ही उम्दा रहा हैं. भारत जैसे विकासशील देश में अभी भी महिला उद्यमियों की भारी कमी हैं.

इसलिए इस पोस्ट में हम महिलाओं के लिए कुछ व्यवसाय करने के बेहतरीन तरिकों को लेकर आए हैं, इन्हें आप जरूर पढ़े और यदि आप व्यवसाय शुरू करना चाहती हैं तो जरूर करें.

औनलाइन बिजनस आइडियाज महिलाओं के लिए

आजकल कंप्यूटर, लैपटौप, मोबाइल और टेबलेट आपको हर घर में मिल जाएगा, हर व्यक्ति One Click Service चाहता है. व्यक्ति अपने काम को बिना परिश्रम किये करना चाहता हैं और यही चाह Online Business को बढ़ावा देती है. महिलाओं के लिए औनलाइन बिजनस एक बहुत ही अच्छा विकल्प हैं. बहुत से ऐसे काम होते हैं जहां पर आप किसी विशेष कंपनी के लिए काम करके अच्छा पैसा कमा सकती हैं. पैसा सीधे आपके अकाउंट में आ जायेगा. उदाहरण के लिए – Blogging, Youtube Video Creation, Online Survey, Online Data Entry, Affiliate Marketing आदि. इससे आप बड़े आराम से 10 हजार से 25 हजार तक एक महीने में कमा सकती हैं.

महिलाओं के लिए लघु उद्योग

महिलाओं के लिए लघु उद्योग आइडियाज जो घर से भी संचालित किये जा सकते हैं. इसे आप कम पैसा लगाकर भी शुरू कर सकती हैं.

बुटीक

बुटीक का व्यवसाय अक्सर महिलाओं के दिमाग में आता है, किसी शहर में बुटीक की कोई कमी नही हैं, ऐसे स्टोर के ग्राहक हर दिन बढ़ते रहते हैं. हर व्यक्ति कपड़े और सामान पहनने के प्रकार में बेहतर गुणवत्ता और विविधता चाहता हैं. महिलाओं के लिए यह एक बहुत ही अच्छा बिजनस आइडिया है.

ब्यूटी सैलून

इस लघु उद्योग में आपको थोड़ा ब्यूटी उत्पादों और उपकरणों पर निवेश करना होगा और इन्हें प्रयोग करने की पूरी जानकारी होनी चाहिए. घर के किसी भी कमरे को ब्यूटी पार्लर में आसानी से बदला जा सकता हैं. यह बिजनस हर उम्र की महिला के लिए उपयुक्त हैं. शादी के समय ऐसे कामों के लिए बहुत अच्छे पैसे मिलते हैं.

फिटनेस सेंटर (जिम)

इस व्यवसाय में आपको अधिक जगह और अधिक निवेश की जरूरत होगी लेकिन इस व्यवसाय में आपके निवेश के अनुसार ही आपको लाभ भी अधिक मिलेगा. लगभग हर कोई इन दिनों स्वास्थ के प्रति जागरूक हैं, इसलिए यह व्यवसाय लाभदायक होगा.

डेकेयर / बाल गृह

महिलायें बच्चो से प्यार करती हैं, इसलिए वे अपने घर में एक छोटा-सा डेकेयर / बाल गृह शुरू कर सकती हैं. इसमें आप दूसरों की बच्चों का दिन भर ख्याल रखकर अच्छा पैसा कमा सकती हैं और साथ-ही-साथ अपने घर के कामों को भी कर सकती हैं. इस काम में आपके दिनचर्या का भी संतुलन बना रहेगा.

उपहार की दुकान

इस व्यवसाय के बारे में सबको पता हैं इसे आप बड़ी आसानी से शुरू कर सकते हैं. आप औनलाइन इन्टरनेट के माध्यम से बढ़िया-बढ़िया गिफ्ट का एक छोटा सा स्टोर बना कर इस व्यवसाय में बढ़िया लाभ कमा सकते हैं.

डांस ट्रेनिंग

इस व्यवसाय के लिए आपको डांस का अच्छा ज्ञान होना चाहिए. यह आपको और आपके काम को पौपुलर भी कर सकता हैं. आजकल एक्टिंग, टीवी रियलिटी शो और फिटनेस के लिए लोग जरूर डांस सीखते हैं. आप किसी को अपने यहां डांस ट्रेनर रखकर भी इस व्यवसाय को शुरू कर सकती हैं.

आंतरिक सजावट स्टोर

महिलाओं को सजावट के बारे में ज्यादा जानकारी होती है, यह गुण स्वाभविक रूप से हर महिला के अंदर होता हैं इसलिए महिलाएं इंटीरियर डिजाइनिंग बिजनस को खोल कर इसे अच्छे से कर सकती हैं. Interior Decoration की सलाह देकर भी लोग अच्छा पैसा कमाते हैं.

ट्यूशन

आप अपने घर बच्चों को पढ़ाकर भी अच्छा पैसा कमा सकते हैं. यदि आपके पास 10 बच्चे भी पढ़ने की लिए आने लगे तो आप पूरे दिन में एक-से-दो घंटे काम करके अच्छा पैसा कमा सकती हैं. यदि आप को अच्छा नालेज है और आपके पास अधिक बच्चे पढ़ने आने लगे तो आप इसे व्यवसाय में भी परिवर्तित कर सकती हैं.

सिर्फ एमजे अकबर और आलोक नाथ ही क्यों, ऐसे तो पूरा पुरुष समुदाय गुनहगार है

अगर कोई भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता से सोचेगा, तो आखिरकार इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि दृष्टिहीनों को छोडकर सभी पुरुषों की नजर महिलाओं के नाजुक अंगों को टटोलती रहती हैं. यह पुरुष का प्राकृतिक स्वभाव है, इसे अन्यथा नहीं लिया जा सकता और न ही मात्र स्त्री अंगों को देखने भर से उसे दोषी ठहराया जा सकता है. पुरुष दोषी तभी ठहराया जा सकता है जब वह स्त्री अंगों को हाथ से छुए, उसे हासिल करने क लिए शारीरिक ताकत का इस्तेमाल करे या फिर किसी तरह का डर दिखाये या कि फिर लालच देकर अपनी उद्दात इच्छा पूरी करे.

दिक्कत तो यह मान लेना है कि पुरुष स्वभाव से ही लमपट होता है, वासना के लाल लाल डोरे उसकी आंखों में तैरते ही रहते हैं और वह सिर्फ और सिर्फ औरत के शरीर को हासिल कर लेना चाहता है. कोई महिला पत्रकार अगर मुद्दत बाद विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर पर यह आरोप लगा रही है कि कभी उन्होंने उसके साथ बड़ी बेहूदी बदसलूकी की थी जिसे ज्यों का त्यों लिखना ही सिर्फ वयस्कों के लिए वाली श्रेणी में आता हो या नीले पीले साहित्य की याद दिलाता हो तो इसे आप कैसे देखेंगे. मी टू नाम के आंदोलन से उपजा आत्मविश्वास या कुछ और?

अकबर कभी वाकई पत्रकारिता की दुनिया के जिल्लेलाही थे, उनके इर्द गिर्द खूबसूरत लड़कियां तितलियों की तरह मंडराती थीं, सत्ता के गलियारों में प्रशासनिक हलकों में एमजे अकबर के नाम का सिक्का चलता था. पत्रकारिता में कैरियर बनाने की ख्वाहिशमंद महत्वाकांक्षी युवतियां उनकी नजदीकियां पाने बेताब रहती थीं, ऐसे में यह भी नामुमकिन नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने वह सब कुछ नहीं किया होगा जिसके आरोप उन पर लग रहे हैं.

क्या उन्होंने गलत किया था और उससे भी ज्यादा गंभीर सवाल या खतरा अब यह मंडरा रहा है कि क्या सालों बाद इस तरह के आरोप स्वीकार्य होने चाहिए. दो दिन पहले ही मेनका गांधी ने एक बयान में इस बात की वकालत की थी कि हां दुष्कर्म या इस प्रवृति के अपराधों की शिकायत की कोई समय सीमा तय नहीं होना चाहिए, यानि पीड़िता 20-30 साल बाद भी शिकायत करे तो कथित आरोपी पुरुष पर कारवाई होनी चाहिए.

यहां एक दिलचस्प मामला फिल्म अभिनेता जितेंद्र का लिया जा सकता है जिन पर इस साल फरवरी के दूसरे हफ्ते में उनकी फुफेरी बहन ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. यह बात पीड़िता को 47 साल बाद याद क्यों आई कि हिमाचल प्रदेश में एक फिल्म की शूटिंग के वक्त जितेंद्र ने जो किया था उसकी सजा उन्हें अब  मिलनी ही चाहिए. दो बड़े और नामी बच्चों के पिता जितेंद्र ने इस आरोप को गलत बताया था.

यह मामला दिलचस्प इस लिहाज से भी था कि जितेंद्र की बहन ने अदालत में यह जज्बाती दलील दी थी कि वह यह शिकायत वह अपने मां बाप की मौत के बाद कर रही है, उनके जीतेजी करती तो उन्हें इससे सदमा पहुंचता. जवाब में जितेंद्र के वकील रिजवान सिद्दीकी ने आरोप को बेबुनियाद बताते हुये लिमिटेशन एक्ट 1963 का हवाला दिया था जिसके तहत इस तरह की कोई भी शिकायत तीन साल के भीतर करनी होती है, जिससे शिकायत की ठीक तरह से जांच हो सके. अपने फैसले में हिमाचल हाइकोर्ट ने इस मामले में आगे की कारवाई और जांच पर रोक लगाने का फैसला दिया था.

इस पीड़िता के पास कोई सबूत अपने आरोप के बाबत नहीं थे, ठीक वैसे ही जैसे अकबर पीड़ित युवतियों या महिलाओं के पास नहीं है. इसी कड़ी में अभिनेता आलोक नाथ का भी नाम उल्लेखनीय है जिन पर आरोप क्या लगा कि वे एकदम से इंसाफ का तराजू फिल्म के राज बब्बर लोगों को नजर आने लगे.

प्रसंगवश बात जहां तक एमजे अकबर की है तो उनसे बेहतर कोई नहीं समझ पा रहा होगा कि दरअसल में मुद्दत बाद मीडिया समूहों की व्यापारिक और वैचारिक लड़ाई में वे दो पाटों के बीच पीसे जा रहे हैं. एक तरफ भगवा छाप मीडिया उन्हें निर्दोष साबित करने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी तरफ वामपंथी मीडिया चिल्ला रहा है कि इन कथित आरोपों के चलते उन्हें इस अहम संवैधानिक पद पर विराजे रहने का कोई हक नहीं. नरेंद्र मोदी को तुरंत उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए. बार बार विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और कानून मंत्री रविशंकर को छोटे पर्दे पर दिखाया जाकर यह सवाल पूछा जा रहा है कि वे चुप क्यों हैं.

लग ऐसा रहा है कि द्रौपदियों का चीर हरण हो रहा है और विदुर और भीष्म सरीखे ज्ञानी महात्मा भी धृतराष्ट्र की तरह अंधे होकर बैठे हैं कि कृष्ण गुजरात की बनी साड़ी लेकर आएगा और इस लज्जाजनक कांड का पटाक्षेप कर देगा जो इत्तफाक से नवरात्रि के पहले दिन ही सुर्खियों में आ गया. अकबर और आलोक दुर्योधन और दुशासन हैं इन्हें सजा मिलना ही चाहिए.

मुद्दे की बात से सब कन्नी काटते नजर आ रहे हैं, जिस पर बहुत जल्द कानूनी बहस छिड़ना तय दिख रहा है कि क्या कथित छेड़छाड़, अश्लील हरकतों और बलात्कार जिन्हें अंग्रेजी के एक शब्द हेरेसमेंट में पिरो दिया गया है पर सालों बाद पुरुष को दोषी ठहराया या माना जाना चाहिए, वह भी उस सूरत में जब पीड़िता अपने आरोप साबित नहीं कर पा रही हो. क्या स्त्री इतनी पवित्र रह गई है या पहले कभी थी कि उसके कहने भर से पुरुष गुनहगार करार दे दिया जाये.

जवाब साफ है कि नहीं, यह समूची पुरुष जाति के साथ ज्यादती होगी, महिला को अपने लगाए आरोप तो साबित करने ही होंगे. यहां एक दिलचस्प और वास्तविक उदाहरण भोपाल के एक कानवेंट स्कूल का लेना प्रासंगिक होगा. 2 महीने पहले एक महिला ने रिपोर्ट लिखाई कि स्कूल के फलां फादर ने उसके साथ ज्यादती की. मामला हिन्दू महिला और ईसाई पुरुष का था, इसलिए माहौल गरमाया पर तीसरे ही दिन ठंडा भी पड़ गया क्योंकि स्कूल में उस नाम का कोई फादर या प्रिंसिपल था ही नहीं जिस पर यह आरोप लगाया गया था. बाद में यह पीड़िता फरार हो गई और शाहजहानाबाद थाने के पुलिस वाले उस वक्त सकते में रह गए जब महिला का नाम पता और मोबाइल नंबर भी फर्जी निकले.

यानि पीड़िता के होम वर्क में ही कमी थी, नहीं तो अगर वाकई कोई उस नाम का फादर या प्रिंसिपल होता तो बेचारा जेल में बैठा जमानत की राह देखता, अपने उस कुकर्म को कोस रहा होता जो वास्तव में उसने किया ही नहीं था. ऐसे उदाहरण रोज हर कहीं देखने में आ जाते हैं.

लेकिन इससे कड़वा सच उन उदाहरणों का भी है जो देखने में ही नहीं आ पाते. हर कहीं कोई पुरुष महिला से मौके का फायदा उठाकर ज्यादती कर रहा होता है, अपनी कुत्सित मंशा को अंजाम दे रहा होता है और महिला बेचारी लोकलाज और इज्जत के डर से खामोश रहते सब कुछ सहती रहती है. कई बार उसकी कोई मजबूरी भी उसे खामोशी ओढ़े रहने मजबूर करती है.

सवाल जो एमजे अकबर और आलोकनाथ जैसे मामलों में जबाब का मुंह ताक रहा है कि ऐसा  क्या होना चाहिए जिससे न्याय भी हो और अन्याय भी न होने पाये. रही बात पुरुष की तो वह तो सार्वजनिक स्थानों में दफ्तरों में और जहां भी उसे मौका मिलेगा वहां स्त्री और उसके अंगों खासतौर से उभारों को देखेगा ही. जरूरी नहीं कि उसकी मंशा कुछ गलत करने की ही हो पर  उसका यह स्वभाव नहीं बदला जा सकता जो प्रकृति ने उसे दिया है.

हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अब ऐसे मामलों की बाढ़ आने लगे, जिनमें कोई 40-50 साल की महिला विलाप करती हुई सोशल मीडिया या फिर थाने में ही नजर आए कि आज से कोई 20–25 साल पहले उसके बौस ने या पड़ोसी ने या फिर फलां नजदीकी रिश्तेदार ने उसके साथ ज्यादती की थी. अगर महिला को कोई पुरानी खुन्नस निकालना होगी तो वह झूठा आरोप भी मढ़ने से चूकेगी नहीं. मुमकिन है इसकी पटकथा भी उसका पुरुष संरक्षक या साथी ही लिखे, फिर तो इज्जतदार और मालदार मर्दों की खैर नहीं रहेगी.

वोडाफोन सखी : पर क्या इतने भर से महिलाएं सुरक्षित हो जाएंगी?

बाजार में बने रहना है तो कुछ अलग तो करना ही होता है. जियो ने सस्ती दरों पर सेवाएं क्या उपलब्ध करा दी, टेलीकौम कंपनियों में एकदूसरे से आगे निकलने की होड़ मच गई है. जाहिर है, इससे फायदा तो उपभोक्ताओं को हो रहा है, वहीं मोबाइल औपरैटर कंपनियां होड़ में बने रहने के लिए ग्राहकों को फायदा भी दे रही हैं.

बेहतर पहल

इसी कड़ी में देश की अग्रणी दूरसंचार सेवा प्रदाता वोडाफोनआइडिया ने महिलाओं की सुरक्षा पर आधारित सेवा ‘वोडाफोन सखी’ की शुरुआत की है. अब वोडाफोन के नंबर का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं मुफ्त में इस सेवा का इस्तेमाल कर सकती हैं और इसे बाद में आइडिया के नंबरों पर भी सुलभ कराया जाएगा.

स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने इस सेवा की शुरुआत करते हुए ‘अब रुके क्यों’ अभियान का उद्घाटन किया. कंपनी की इस नई सेवा के बारे में वोडाफोनआइडिया लिमिटेड के ग्राहक कारोबार के निदेशक अवनीश खोसला ने मीडिया से बातचीत में कहा,”यह सेवा फीचर और स्मार्ट दोनों तरह के फोन पर बिलकुल मुफ्त उपलब्ध होगी. इस सेवा के तहत संकट के समय महिलाएं बगैर इंटरनेट और बैलेंस के भी 10 लोगों को अलर्ट भेज सकेंगी. अलर्ट के साथ महिला का लोकेशन भी मैसेज प्राप्त लोगों को मिल जाएगा.”

कंपनी द्वारा जारी नंबर

कंपनी ने इसके लिए एक नंबर 5500  जारी किया है. इस सेवा में महिलाएं फोन में पर्याप्त बैलेंस नहीं रहने पर भी 10 मिनट तक बात कर सकेंगी. खोसला ने मीडिया से बातचीत में कहा कि ‘सखी सेवा’ को अपनाने वाली महिलाओं को 10 अंकों का एक प्रौक्सी नंबर उपलब्ध कराया जाएगा, जिस के जरीए वे अपना फोन रिचार्ज करा सकेंगी. वोडाफोन का टोल फ्री नंबर 1800123100 पर फोन करके उपभोक्ता इस सेवा को चालू करा सकती हैं.

सरकारी कंपनियां क्या कर रही हैं

महिलाओं पर बढती घटनाओं को देखते हुए कंपनी इस सेवा के जरीए यह बताना चाहती है कि महिलाओं की सुरक्षा अहम है पर सवाल यह भी है कि पुलिस कितनी जल्दी मुसीबत में फंसी महिला को मदद के लिए पहुंचती है, जो खुद घटना के घंटों बाद पहुंचने के लिए बदनाम है.

अलबत्ता कंपनी की यह सुविधा मुसीबत में घिरी महिला को किसी तरह सहायता उपलब्ध करा देगी, यह एक बेहतर पहल तो है, पर क्या इससे सरकारी मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी को सीख लेने की जरूरत नहीं है जिसके ग्राहकों की संख्या दिनबदिन घटती चली जा रही है.

नशे के खिलाफ संदेश देगी फिल्म “दलदल”

उत्तर प्रदेश सरकार की फिल्मनीति और लखनऊ की खूबसूरती अब फिल्म निर्माताओं को खूब पसंद आ रही है. लखनऊ और आसपास के शहरों में कई हिंदी और भोजपुरी फिल्मों के साथ म्यूजिक एलबम भी शूट हो रहे हैं.

नशे के कारोबार और दुष्प्रभाव पर आधारित फिल्म “दलदल” की शूटिंग उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मलिहाबाद में हो रही है.

daldal movie is awareness against anti drug

निर्माता संजीव कुमार तिवारी और निर्देशक दीपक कुमार ने बताया कि फिल्म “दलदल” एक साफ सुथरी और स्वस्थ मनोरंजन देने वाली फिल्म होगी. फिल्म की पूरी शूटिंग लखनऊ और इसके आसपास के खुबसूरत लोकेशन पर की जाएगी.

उल्लेखनीय है कि फिल्म “दलदल” में गौरव झा और ऋतु सिंह मुख्य भूमिका में हैं. ऋतु सिंह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली हैं. लखनऊ के ही बीएनए से उन्होंने एक्टिंग सीखी है. वो कहती हैं लखनऊ में शूटिंग के लिए आना बहुत अच्छा लगा.

सहयोगी कलाकरों के रूप में मनमोहन तिवारी, राव रणविजय, नेहा माधवी पांडेय, विजय पांडेय, नंदिनी वर्मा, सोनम उजाला, मास्टर आश्रय तिवारी, बेबी वाणी शर्मा और सुशील सिंह आदि मुख्य भूमिका में हैं.

फिल्म की सह निर्मात्री हैं अनुराधा शुक्ला जबकि गीतकार व संगीतकार हैं संतोष पूरी, एक्शन डायरेक्टर हैं हीरा यादव, सिनेमेटोग्राफी करने वाले हैं अयूब अली खान, कला निर्देशक है मोहन मावा, असोसिएट डायरेक्टर हैं के के श्रीवास्तव नीरज, कोरियोग्राफर हैं राम देवन और महेश आचार्या, प्रोजेक्ट डिजाइनर हैं प्रवीन चंद्रा, प्रोडक्शन की कमान संभाली है जोश प्रोडक्शन ने और प्रचारक हैं उदय भगत.

यौन उत्पीड़न की समस्या पूरे देश में किसी न किसी रूप में है : अर्जुन कपूर

फिल्म ‘कल हो न हो’ में सहायक निर्देशक के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता अर्जुन कपूर ने फिल्म ‘इश्कजादे’ से अभिनय क्षेत्र में कदम रखा. फिल्म में उसके काम को काफी सराहना मिली और एक अभिनेता के रूप में वे इंडस्ट्री में स्थापित हुए. उनकी कुछ फिल्में सफल तो कुछ असफल रहीं, जिसे वे अधिक महत्व नहीं देते और आगे बढ़ते जाते है. वे अपने चाचा अनिल कपूर को अपना मेंटर मानते हैं और उनकी सभी फिल्मों से बहुत प्रभावित हैं.

उनका वजन पहले बहुत अधिक था, जिसे कम करने में उन्होंने काफी मेहनत की और इसकी सलाह सलमान खान ने उन्हें दी थी. आज भी वे उन्हें अपना प्रेरणास्त्रोत मानते हैं, जिसकी वजह से वे अभिनेता बन पाए.  अर्जुन कपूर स्पष्टभाषी हैं और जो भी कहना है, सामने कहना पसंद करते हैं. अभी उनकी फिल्म ‘नमस्ते इंग्लैंड’ रिलीज पर है पेश है कुछ अंश.

इस फिल्म को चुनने की खास वजह क्या है?

कहानी सुनते ही लगा कि ये कुछ अलग है, क्योंकि अधिकतर फिल्मों में पहले प्यार और शादी अंत में दिखाते हैं, जबकि इसमें फिल्म शुरू होते ही थोड़ी देर में शादी और बाद में कहानी आगे बढती है. आज के जमाने में शादी का मतलब समझौता नहीं है. दोनों में सहमति की भावना होना जरुरी है. जो ये कहानी कहती है. इसे सुनते हुए मैं ये महसूस कर रहा था कि ये कहानी माडर्न होने के साथ-साथ परंपरागत भी है.

आज के जमाने में रिश्तों के माइने बदल चुके हैं, जबकि ये किसी के लिए भी जरुरी है और आपने इसे सिद्ध किया और मुश्किल घड़ी में आप परिवार के साथ हमेशा रहे, परिवार या रिश्तों के साथ चलना कितना आवश्यक है?

रिश्ते तो रिश्ते होते हैं, उसके बिना जीवन नीरस होता है. ये सही है कि आज के जमाने में लोग दूसरों की भावनाओं को कम समझते हैं और स्वार्थी हो जाते हैं. मेरे हिसाब से मैंने जो जिंदगी देखी है उसकी वजह से मैं रिश्तों की कद्र कुछ अधिक ही करता हूं, क्योंकि मैंने देखा है कि अचानक से आपकी जिंदगी कभी भी बदल सकती है. मैंने जान्हवी और खुशी को सहयोग दिया ये कुछ अलग मैंने नहीं किया. मैं जानता हूं कि अगर मेरी मां जिन्दा होती, तो वह भी उन्हें साथ देने को कहती. मेरी परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई है, जहां रिश्ते माइने रखते हैं. अभी गर्लफ्रेंड और बौयफ्रेंड के रिश्ते नाजुक हुए हैं, पर परिवार के रिश्ते अभी भी कायम है. रिश्ते को सम्हालना दोनों तरफ से होता है. परिवार के लोगों को भी बच्चे को समझने की जरुरत है, क्योंकि रिश्ते हर किसी के जीवन में जरुरी है.

इसके अलावा गर्लफ्रेंड बौयफ्रेंड की बात करें, तो किसी को भी ये समझना पड़ेगा कि किसी भी पहली लड़की से अगर आप मिलते हैं, तो वह आपकी जीवन साथी बन जाएगी, ये सोचना सही नहीं होता. उसे समझना और स्पेस देना फिर किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए. ऐसा करने से रिश्ते कम टूटते हैं.

आप अपने लिए किस तरह के पार्टनर की उम्मीद रखते हैं ?

हम जो सोचते हैं, अधिकतर उसका उल्टा ही होता है. हमारा प्रोफेशन ऐसा है कि इसमें कुछ भी मन मुताबिक नहीं होता. अधिकतर समय दूसरों के लिए ही होता है. मेरी पार्टनर को ये समझना पड़ेगा कि मेरी जिंदगी उसके अलावा लोगों के साथ शेयर करना भी है. जो औरत मुझे वह दे पायेगी, वही मेरी पार्टनर बन सकती है और मैं भी उसे समय देने की कोशिश अवश्य करूंगा.

आपका लुक हमेशा ‘एंग्री यंग मैन’ का रहा है, असल जिंदगी में आप कैसे हैं ?

मैं उससे बिल्कुल उल्टा हूं, मैंने आज तक किसी के उपर हाथ भी नहीं उठाया है. थोडा अक्कड़ और मूडी हूं पर एंग्री नहीं हूं. लोगों को मेरे एक्शन फिल्म पसंद हैं, मैं इस बात से खुश हूं. एक्शन फिल्म के अलावा मैंने कई रोमांटिक फिल्में भी की हैं.

आगे कौन सी फिल्में हैं ?

अभी मैं एक फिल्म ‘इंडियाज मोस्ट वांटेड’ कर रहा हूं. ये एक माडर्न एक्शन फिल्म है.

आप अपनी जर्नी से कितना खुश हैं ?

मैं अपनी जर्नी से खुश नहीं हूं, क्योंकि मुझे बहुत काम करने है. मैंने हर फिल्म से कुछ न कुछ सीखा है. अपने काम का क्रिटिक मैं खुद हूं, पर मैं इस बात से खुश हूं कि जितना भी मैंने काम किया, लोगों ने मुझे देखा और सहयोग दिया. इस बात से संतुष्टि है कि जो सपना मैंने देखा था, उससे मैं आगे ही बढ़ पाया हूं.

अब तक का सबसे बेस्ट कौम्प्लीमेंट क्या है ?

मेरा पहला कौम्प्लीमेंट जो मेरे दिल को छू गया था. मैं एक शादी के लिए जोधपुर गया था. शादी के बाद एक प्राइवेट टैक्सी में मैं एअरपोर्ट जा रहा था. उस गाड़ी में बैठा ड्राईवर शीशे से बार-बार मुझे देख रहा था. मुझे लगा कि ये मुझे पहचान नहीं पा रहा है या कुछ और बात है ऐसा सोचकर मैं चुपचाप बैठा रहा. फिर मैंने उससे पूछा कि आखिर मुझे घूर क्यों रहे हो. इस पर उसने कहा कि मैंने आपको फिल्म ‘इश्कजादे’ में देखा है. आप वही हीरो है न ? इससे मुझे लगा कि मेरी पहचान देश के कोने में पहुंच चुकी है और मेरे लिए ये खुशी की बात है.

‘मी टू मूवमेंट’ जो आजकल काफी चर्चा में है और महिलाये आगे आकर इसमें शामिल होकर अपनी बात सबसे कह रही हैं, इसे आप कैसे लेते हैं ?

यौन उत्पीड़न की समस्या पूरे देश में किसी न किसी रूप में है. औरत की इज्जत करना तो सबसे अधिक जरुरी है. हमारी परवरिश में कुछ कमी रहने की वजह से ये समस्या आ रही है. बचपन से ही बच्चे को सिखा देना चाहिए कि आप महिलाओं से कैसे वर्ताव करें, क्योंकि आप अपनी मां, बहन और रिश्तेदार से कभी ऐसा व्यवहार नहीं करते और अगर आपके किसी अपने के साथ ऐसा हुआ हो, तो आप इसे गलत मानते हैं. असल में किसी भी लड़की से आप ऐसी हरकत करें कि उसे बुरा लगता हो, तो ये बहुत गलत है. ये केवल फिल्म इंडस्ट्री में ही नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या है, मुझे बहुत अफसोस होता है, लेकिन इसे ठीक करने के लिए हमें अपने अंदर बदलाव लाने की जरुरत है.

जीवन में खुश रहने का मंत्र क्या है ? तनाव होने पर क्या करते हैं ?

मैं फिल्में देखने का बहुत शौकीन हूं और समय मिलते ही देखता रहता हूं. इसके अलावा समय मिले, तो सो जाता हूं, जिससे तनाव अपने आप ही भाग जाता है. परिवार के साथ बैठकर घर के खाने को एन्जाय करना टीवी देखना, फोन को अपने से दूर रखना आदि मैं करता रहता हूं. खुश रहने का कोई मंत्र नहीं है, जिसे करने के बाद आपको खुशी मिले, उसे करते रहना चाहिए.

वर्कप्लेस से बाहर ढूंढ़ें साथी

ऐक्ट्रैस तनुश्री दत्ता ने फिल्म ‘होर्न ओके प्लीज’ के सैट पर नाना पाटेकर की बदतमीजी और सैक्सुअल हैरेसमैंट को ले कर वर्षों बाद सवाल उठाया है. कुछ हुआ हो या न हो, बौलीवुड के सैटों पर सनसनी फैल गई है कि मेल ऐक्टर अपनी धौंस फीमेल ऐक्ट्रैसों पर जमाएंगे तो कब उन्हें जवाब देना पड़ जाएगा, इस का पता नहीं.

सोशल मीडिया ने हर महिला को अब यह अधिकार या अवसर दे दिया है कि वह किसी के खिलाफ कभी की भी शिकायत कर के, गड़े मुरदे उखाड़ कर, किसी भी दंभी, गुस्सैल और बड़बोले पुरुष की बोलती बंद कर दे. अब यह पुरुष पर निर्भर करता है कि वह कितना, कैसे झेले. इस सारी कवायद के पीछे सोच यह है कि जब एक जानीमानी महिला अपने चरित्र को दांव पर लगा रही है तो कुछ तो बात होगी ही.

कोई भी लड़की बिना कारण अपना चरित्र उघड़वाने को तैयार न होगी. उस के साथ कुछ हुआ होगा तभी वह महीनों या बरसों बाद भी अपने पात्र के चिथड़े उधेड़ने को इसलिए तैयार है ताकि दोषी को सजा न भी मिले तो कम से कम उसे कठघरे में खड़ा तो किया जा सके.

लड़कियों को कई क्षेत्रों में आज भी कमजोर व असहाय समझा जाता है. बहुत से पुरुष उन की कमजोरी का नाजायज फायदा उठाने की कोशिश करते हैं. जब से सैक्स संबंध वर्जित नहीं रह गए हैं और जो लड़कियां खुल्लमखुल्ला सिगरेट व शराब पीती हैं, तो समझा यह जाता है कि वे हर बात के लिए सहमति दे देंगी, यहां तक कि बिस्तर पर जाने को भी. लड़कियां यह अपनी मरजी से कर रही हैं या जबरन, यह कहना बड़ा कठिन है, कम से कम उस समय जब पुरुष साथी को अपने पर जरूरत से ज्यादा कौन्फिडैंस हो.

यही बाद में कैक्टस बन जाता है और एक दिन कैंसर की तरह फट पड़ता है. लड़केलड़कियां जब काम पर आएं तो वे बराबर की हैसियत से आएं और सैक्स का, स्मार्टनैस का या लस्ट का लालच छोड़ आएं. वर्कप्लेस में लड़केलड़कियां सहयोगियों की तरह काम करें, अपोजिट सैक्स की तरह नहीं. अगर प्रेमी ढूंढ़ना है तो वर्कप्लेस से बाहर कहीं ढूंढ़ें जहां वे मिलें तो उन में से कोई अधिकारी की हैसियत में न हो. आजकल इस के अवसर कम नहीं हैं. पार्टियां हैं, रैस्तरां हैं, बसें हैं, कालेज हैं, डेटिंग ऐप्स हैं, व्हाट्सऐप ग्रुप हैं, इन सब से जो चाहे वह रास्ता चुनें.

वर्कप्लेस में जहां एक के पास कुछ ज्यादा अधिकार होते हैं, किसी भी तरह का उस से लगाव खतरनाक है क्योंकि वह कब परेशान करे, कहा नहीं जा सकता. हैसियत और अधिकार रखने वाले हर शख्स को अपने पर नियंत्रण रखना होगा क्योंकि अब महिलाएं चुप नहीं रहतीं या कहिए कि उन की चुप्पी को ग्रांटेड नहीं लिया जा सकता.

कूड़े के ढेर पर दिल्ली, नेताओं में घमासान

दिल्ली की गंदगी पर सुप्रीम कोर्ट तक कई बार सख्त टिप्पणियां कर चुका है पर इस के बावजूद सफाई और सफाई कर्मचारियों को वेतन देने के मुद्दे पर दिल्ली सरकार और भाजपा शासित दिल्ली नगर निगम आमनेसामने है.

पूर्वी दिल्ली निगम के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल 29 दिनों तक चली और इस दौरान आम आदमी पार्टी और भाजपा नेताओं के बीच रोज तकरारें होती रहीं. सफाई के लिए एकदूसरे को दोषी ठहराया जाता रहा.

दिल्ली नगर निगम तीन हिस्सों में बंटा हुआ है. पूर्वी दिल्ली निगम, उत्तरी और दक्षिणी निगम. तीनों निगमों में भाजपा का राज है जबकि दिल्ली में सरकार आम आदमी पार्टी की है. साफसफाई का काम स्थानीय निकायों का है.

दिल्ली निगम के कर्मचारी वेतन, दिवाली पर बोनस और अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने जैसी कुछ मांगों को ले कर हड़ताल पर थे. सफाई कर्मचारियों ने धरने, प्रदर्शन किए. पुलिस ने लाठियां बरसाईं. हड़ताल के दौरान दिल्ली में सफाई का काम ठप्प हो गया सड़कों, गलियों में कूड़ेकचरे के ढेर लग गए. कई कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया.

उधर नेता आपस में एकदूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल कर खड़े हो गए. दिल्ली सरकार ने कहा कि केंद्र ने सफाई कर्मियों का पैसा दिया नहीं है जबकि दिल्ली भाजपा के नेताओं का कहना था कि पैसा केंद्र तो दे चुका है पर आम आदमी पार्टी की सरकार ने कर्मचारियों के हिस्से का पैसा नहीं दिया. केंद्र सरकार ने दिल्ली को आवंटित पैसे का सही उपयोग न करने का आरोप लगाया.

केंद्र सरकार यह भुगतान करने को तैयार है. सरकार ने कहा है कि वर्ष 2018-19 के लिए आवंटित 790 करोड़ रुपए के बजट प्रावधान के अलावा अतिरिक्त धनराशि देने की गुंजाइश नहीं है. इस आवंटन के 325 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं.

दिल्ली सरकार का दावा है कि केंद्र शासित पांच राज्यों मेंसे दिल्ली को सब से कम बजट मिलता है. आंकड़ों से यह स्थिति स्पष्ट की गई है. चंडीगढ को 4084 करोड़, पुदुचेरी को 1476 करोड़, अंडमान निकोबार को 4523 करोड़ दिए जाते हैं.

आप नेताओं का कहना है कि फंड के मामले में केंद्र सरकार गुमराह कर रही है. दिल्ली के साथ भेदभाव अपनाया जा रहा है. स्थानीय निकायों को ग्रांट इन एड नहीं मिलने से यह संकट खड़ा हुआ है.

दरअसल दिल्ली नगर निगम के सफाई कर्मचारियों को ही नहीं, अस्पतालों में डाक्टरों तक को समय से वेतन नहीं मिल पाता. अस्पताल के कर्मचारी भी आए दिन वेतन को ले कर हड़ताल पर रहते हैं.

केंद्र सरकार की नाक के नीचे राजधानी दिल्ली में साफसफाई और स्वास्थ्य से जुड़ महकमों को महीनों तक वेतन नहीं मिलना लापरवाही और आपसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का नतीजा है. राजनीतिक नफानुकसान के चक्कर में आम जनता पिस रही है.

कई बार लगता है दिल्ली में विपक्ष आम आदमी पार्टी की सरकार को तंग करने के मकसद से भाजपा और केंद्र सरकार आम जनता से जुड़े बुनियादी कामों में बेवजह की अड़चनें पैदा करती है. यह एक बड़े दल और उस की ऊपर केंद्र में बैठी सरकार के लिए शोभा नहीं देता. दिल्ली की टैक्सपेयर जनता का क्या कसूर है. आपसी राजनीतिक लाभ के फेर में जनता को परेशान क्यों किया जाए.

उत्तर प्रदेश में बढ रहा है ‘गन कल्चर’

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने लाइसेंसी असलहों पर लगी रोक हटा कर समाज में ’गन कल्चर’ को बढ़ाने वाला काम किया है. आंकड़े बताते हैं कि आत्मरक्षा के नाम पर खरीदे जाने वाले असलहे का ज्यादातर प्रयोग आत्महत्या के लिये ही किया जाता है. इससे समाज में अपराध भी बढेगा.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सबसे पौश सहारा गंज मौल के बेसमेंट में एक वाशिंग सेंटर है. जहां पर कार की धुलाई होती है. स्कार्पियो गाड़ी में धुलाई के समय डैशबोर्ड पर रिवाल्वर रखी दिखी. सफाई करने वाले कर्मचारियों ने रिवाल्वर से खेल खेलना शुरू किया. रिवाल्वर लोडेड थी. उसके हाथ से चल गई. जिससे दूसरा साथी घायल हो गया. राजधनी लखनऊ की ही दूसरी घटना है जिसमें पुलिस विभाग से सिपाही ने रात में कार न रोकने वाले विवेक तिवारी को रिवाल्वर से गोली मार दी. जिससे विवेक की मौत हो गई. उत्तर प्रदेश के अलग अलग शहरों में ऐसी घटनाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है. जहां लाइसेंसी असलहों से ऐसी घटनायें घट रही हैं.

कई मामलों में यह देखा गया है कि घर में रखे लाइसेंसी असलहे आत्महत्या करने के रास्ते बन गये. एक लड़के ने अपने पिता के रिवाल्वर से खुद को गोली मार ली. आत्महत्या करने के तरीकों में रिवाल्वर से गोली मारने की घटनायें सबसे अधिक हो रही हैं. रिवाल्वर को पकड़ कर खुद को गोली मारना सरल होता है. यह सवाल भी उठ रहे हैं कि आत्मरक्षा के लिये खरीदे जाने वाले असलहे आत्महत्या के काम आ रहे है. उत्सवों के दौरान होने वाली फायरिंग में सबसे अधिक दुर्घटनायें उत्तर प्रदेश में ही घटी हैं. इन घटनाओं के बढ़ने से ही शस्त्र लाइसेंस पर रोक लगा दी गई थी.

दबगंई की फितरत :

उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनऊ से लगे मल्हौर और जुग्गौर गांव में खेती की जमीन खत्म हो चुकी है. किसानों ने अपनी जमीन आवासीय प्लाट बनाने वालों को बेच दी. कई अमीरों ने यहां फार्म हाउस खोलने के लिये जमीन ले ली है. ऐसे में इन गांवों में जमीन की कीमत ऊंची हो गई है. 60 से 80 लाख रूपये बीघे की दर से खेत बिकने लगे हैं. खेत बेचने के बाद सबसे पहले बन्दूक की खरीद्दारी होती है. इसके बाद चार पहिया वाहन और पक्का मकान बनता है. लखनऊ ही नहीं उत्तर प्रदेश के बाकी गांवों की भी यही कहानी है. गांव ही क्यों शहरों में भी यही कहानी है. पैसा आने के बाद सबसे पहले बन्दूक खरीदने का चलन उत्तर प्रदेश में सबसे अलग है. यही वजह है कि देश भर में सबसे अधिक असलहे उत्तर प्रदेश में हैं.

अधिक से अधिक असलहे रखने की वजह दंबगई दिखाना होता है. कई कई लोग तो ऐसे हैं जिनके पास एक से अधिक असलहे पाये जाते है. लाइसेंसी असलहों को लेना सरल नहीं होता है. सबसे पहले सरकारी प्रक्रिया के नाम पर लंबा समय लगता है. इसके बाद रिश्वत भी देनी पड़ती है. इसके बाद भी यहां के लोग हर परेशानी उठाकर लाइसेंसी असलहा लेने की होड़ में लगे रहते हैं.

योगी सरकार ने जब शस्त्र देने पर लगी रोक को हटाया तो पूरे प्रदेश में खुशी की लहर दौड़ गई. ऐसा लग रहा था जैसे जनता इसका इंतजार ही कर रही थी. शायद यही वजह है कि दंबगों को खुश करने के लिये ही योगी सरकार ने यह फैसला किया है. असल में देखा जाये तो सबसे अधिक असलहे अगड़ों और पिछड़ों के पास ही हैं. समाजवादी पार्टी सरकार के समय पर सबसे अध्कि शस्त्र लाइसेंस दिये गये. इनमें भी जाति विशेष के लोगों की संख्या सबसे अधिक थी.

असलहों के मामले में विश्व स्तर पर छाया उत्तर प्रदेश :

आंकड़ों को देखें तो देश का हर तीसरा असलहा उत्तर प्रदेश में पाया जाता है. 12.72 लाख शस्त्र लाइसेंस उत्तर प्रदेश में हैं. जबकि पूरे देश में 33.69 लाख लाइसेंस हैं. उत्तर प्रदेश में बढ़ते हुये लाइसेंस को देखते हुये 2013 में कोर्ट ने नये शस्त्र लाइसेंस देने पर रोक लगा दी थी. इसके बाद भी 18 हजार शस्त्र लाइसेंस जारी हुये. उत्तर प्रदेश की मौजूदा योगी सरकार ने शस्त्र लाइसेंस पर लगी रोक को हटा लिया है. इसके बाद प्रदेश में शस्त्र लाइसेंस लेने की होड़ लग गई है. उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक शस्त्र लाइसेंस लखनऊ में हैं.

यहां पर 55476 लाइसेंस हैं. उत्तर प्रदेश के हर 200 लोगों में से एक के पास लाइसेंसी अस्त्र है. शादी-विवाह, जन्मदिन और दूसरे तमाम अवसरों पर अपनी खुशी को जाहिर करने के लिये सबसे अधिक फायरिंग उत्तर प्रदेश में होती है. इस में हर साल तमाम लोगों की जान जाती है. यही वजह है कि 2013 में कोर्ट ने नये शस्त्र जारी करने पर रोक लगा दी थी. योगी सरकार ने फिर से इस पर लगी रोक को हटा दिया है. जानकार लोग मानते हैं कि रोक हटने के बुरे परिणाम सामने आयेंगे. विश्व स्तर पर असलहों के गणित को देखें तो पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में जितने लाइसेंस हैं उसके आधे चीन जैसे देश में भी नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश में भी तहजीब वाले शहर लखनऊ में सबसे अधिक असलहे हैं. 80 हजार शस्त्र लाइसेंस के आवेदन लंबित हैं. इसके बाद तो उत्तर प्रदेश में असलहों की संख्या और भी अधिक बढ़ जायेगी.

बढ़ेंगे अपराध :

अपराध और असलहों के बीच बहुत सीधा संबंध होता है. यही वजह है कि समाज को अपराध मुक्त करने की दिशा में चली बहस में लाइसेंसी असलहों को बंद करने पर भी चर्चा चली थी. 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने शस्त्र लाइसेंस पर रोक लगाई तो उसकी वजह भी फायरिंग में लोगों के मरने की घटनायें थी. लखनऊ में पुलिस के सिपाही द्वारा विवेक तिवारी की हत्या में भी यह बात सामने आ रही कि गुस्से में सिपाही ने सीधे सिर पर गोली मार दी. अगर सिपाही के पास रिवाल्वर नहीं होती तो गोली मारना संभव नहीं था. ऐसे में यह बात साफ है कि अगर समाज को अपराधमुक्त करना है तो लाइसेंसी असलहे भी खत्म होने चाहिये.

सभ्य समाज में असलहों की जरूरत नहीं होनी चाहिये. असलहे आत्मरक्षा के नाम पर लिये जरूर जाते हैं पर बहुत कम ऐसे मामले देखे गये हैं जब वह आत्मरक्षा के काम आये हों. ज्यादातर असलहे दूसरों को धमकाने के ही काम आते हैं. लखनऊ के ही पौश इलाके में एक घर में डकैती पड़ी. डकैतों ने घर के 5 लोगों के हाथ पांव बांधकर बाथरूम में बंद कर दिया. उनके घर में 2 असलहे रखे रह गये किसी काम नहीं आये. डकैत बिना किसी असलहे के आये और पूरे घर को लूट कर चले गये. इलाहाबाद के प्रशांत गोली कांड में हमलावरों ने मरने वाले प्रशांत को अपनी कमर में लगा रिवाल्वर निकालने का मौका ही नहीं दिया. रिवाल्वर लगा होने के बाद भी प्रशांत अपनी रक्षा नहीं कर सका. ऐसे मामले तमाम हैं. इन घटनाओं से साफ पता चलता है कि लाइसेंसी असलहों से केवल दंबगई होती है. आत्मरक्षा नहीं हो पाती. यह असलहे आत्मरक्षा से अध्कि आत्महत्या के काम आते हैं. समाज को अपराध मुक्त करने के लिये लाइसेंसी असलहों को भी समाज से बाहर करने की जरूरत है. असलहे केवल सुरक्षा कर्मियों के पास ही होने चाहियें. तभी समाज से ‘गन कल्चर’ खत्म हो सकता है.

पीएफ का पैसा निकालना है बेहद आसान, बस ध्यान में रखें ये बातें

एंप्लौयीज प्रोविडेंट फंड और्गनाइजेशन (ईपीएफओ) का फायदा ‘विदड्रौल क्लेम रिटायरमेंट’ के वक्त लिया जाता है, जिससे जमा प्रोविडेंट फंड मिल सके. संस्था ने अब एक औइलाइन सुविधा शुरू की है, जिससे फंड रिटर्न प्रोसेस किए जा सकें.  इस पूरे प्रोसेस में 15 20 दिन लग सकते हैं.  इसके अलावा  कोशिश की जा रही है कि इसके वक्त को घटा कर कुछ घंटों तक किया जाए.

अपने आधार नंबर की मदद से आप फंड कैसे क्लेम कर सकते हैं इसकी पूरी जानकारी हम आपको देंगे. इसके लिए आपको नीचे दिए कुछ जरूरी बातों का ख्याल रखना होगा.

यूएएन: एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर ईपीएफओ द्वारा जारी किया हुआ होना चाहिए और इस नंबर का एक्टिवेट होना जरूरी है.

रिटर्न पाने के लिए सदस्यों को https:unifiedportal-mem.epfindia.gov.in पर जाना होगा.

प्रक्रिया
पोर्टल पर लौगइन करने के बाद आपको आधार बेस्ड औनलाइन क्लेम सबमिशन टैब सेलेक्ट करना होता है. इसमें आपको अपनी जानकारी की जांच करनी होती हैं.

थेंटिकेशन
एक वन टाइम पासवर्ड यूआईडीएआई डेटाबेस से रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजा जाएगा. ओटीपी को एंटर करने के बाद क्लेम फौर्म सबमिट हो जाता है. इससे विदड्रौल प्रोसेस शुरू हो जाता है.

कुछ अन्य जरूरी बातें जो ध्यान रखना होगा

  • सदस्य का मोबाइल नंबर यूएएन डेटाबेस में रजिस्टर्ड होना चाहिए
  • सदस्य का पैन भी ईपीएफओ डेटाबेस में होना चाहिए
  • सदस्य का आधार ब्योरा ईपीएफओ वेबसाइट पर होना चाहिए
  • सदस्य का बैंक ब्योरा भी यूएएन में दर्ज होना चाहिए

यूथ ओलंपिक : मनु भाकर को निशानेबाजी में स्वर्ण पदक

भारत की उभरती निशानेबाज मनु भाकर ने अपने उम्दा प्रदर्शन को ब्यूनस आयर्स में चल रहे यूथ ओलिंपिक में भी बरकरार रखा है. उन्होंने 9 तारीख को महिलाओं के 10 मीटर एयर पिस्टल इवेंट में गोल्ड मैडल जीता.

मनु भाकर इस से पहले वर्ल्ड कप और कौमनवेल्थ खेलों में भी गोल्ड मैडल जीत चुकी हैं और अब 16 साल की इस निशानेबाज ने 236.5 अंक बटोर कर सोने का तमगा हासिल किया.

यूथ ओलिंपिक में निशानेबाजी के इस इवेंट में फाइनल राउंड में कुल 8 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था जबकि क्वालिफिकेशन राउंड में 20 खिलाड़ियों ने भागीदारी की थी.

वैसे इस बार के एशियाई खेलों में भी मनु भाकर से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद थी पर वे अपना बेस्ट नहीं दे पाई थीं. लेकिन वे जल्दी ही इस निराशा से उबर गई हैं और वापस अपने रंग में आ गई हैं.

मनु भाकर ने इस जीत के बाद कहा, “यह मेरे लिए अहम जीत है. यह मेरे लिए मनोबल बढ़ाने वाली है, क्योंकि मेरा लक्ष्य और ज्यादा गौरवपूर्ण लम्हों के साथ लौटना था.

“मैं ने हमेशा अपना बेस्ट देने की कोशिश की और इस दौरान कभी कभी कामयाबी नहीं मिली. लेकिन मेरा लक्ष्य हमेशा अच्छा प्रदर्शन करना, अच्छे निशाने लगाना और ज्यादा अंक हासिल करना रहा है. यह काफी संतोषजनक है.”

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें