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शत्रुघ्न और यशवंत ने बढ़ाये अखिलेश यादव के हौसले

गठबंधन की राजनीति में ताकत का सबसे अधिक महत्व होता है. जिसकी जितनी ताकत दिखती है उसका पलड़ा उतना भारी रहता है. बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में गठबंधन पर कांग्रेस का साथ छोड़ कर यह दिखाने की कोशिश की कि बसपा चुनावी तैयारी में कांग्रेस से आगे है.

उत्तर प्रदेश में बसपा ने यह साफ कर दिया कि गठबंधन के लिये वह भीख नहीं मांगेगी और सम्मानजनक सीटे मिलने पर ही समझौता करेगी. असल में मायावती बसपा की ताकत को सपा और कांग्रेस दोनों से ज्यादा मानती हैं. इस वजह से कांग्रेस और बसपा का तालमेल नहीं हो पाया.

उत्तर प्रदेश में अब सपा-बसपा के तालमेल को लेकर भी सवालियां निशान लगे हैं. दोनो ही दलों में अभी तक कोई बातचीत सामने नहीं आई है. पूर्व सपा नेता शिवपाल यादव के समाजवादी सेकुलर मोर्चा बनाने के बाद सपा को कमजोर करके आंका जा रहा था. ऐसे में सपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भाजपा के दो कद्दावर नेताओं को अपने मंच पर बुलाकर नये संकेत दे दिये हैं.

जय प्रकाश नारायण की जंयती के अवसर पर भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा ने समाजवादी पार्टी के प्रदेश कार्यालय जाकर न केवल अखिलेश यादव को भविष्य का नेता बताया बल्कि भाजपा की वर्तमान सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना की. शत्रुघ्न सिन्हा ने राफेल सौदे और नोटबंदी दोनो को भाजपा नहीं मोदी का फैसला बताया.

यशवंत सिन्हा ने कहा कि मोदी सरकार में आपातकाल से खराब हालत है. अखिलेश यादव शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा और राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव को लेकर एक ऐसा तालमेल करना चाहते हैं जिससे वह सत्ता तक पहुंच सकें. लोकसभा चुनाव में सपा को कुछ बड़े नेताओं की दरकार है. जिनकी चर्चा से सपा का पलड़ा भारी दिख सके. शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा इस काम में सपा की मदद कर सकते हैं. भाजपा से विरोध के बाद अब इन दोनों नेताओं को भाजपा से टिकट की उम्मीद भी नहीं है.

सपा में बड़े नेताओं के शामिल होने से उसकी ताकत भी मजबूत होती दिखेगी, जिससे बसपा और कांग्रेस के साथ वह बराबरी की बातचीत कर सकेगी. अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश ओर उत्तर प्रदेश से बाहर के समान विचारधारा के छोटे छोटे दलों को भी सपा के साथ जोड़ना चाहते हैं. जिससे राष्ट्रीय स्तर पर उनकी ताकत दिख सके.

तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में सपा अपने सहयोगियों के साथ चुनाव लड़ेगी. उत्तर प्रदेश में भले ही कांग्रेस और बसपा के साथ तालमेल की तस्वीर साफ न हो पर सपा और लोकदल के बीच तालमेल होकर रहेगा. लोकसभा चुनाव के पहले अखिलेश यादव अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं, जिससे आपसी समझौते में बसपा से कमतर सपा को ना आंका जा सके.

पिछले साल के मुकाबले इस साल अक्टूबर की हवा ज्यादा खराब

सरकारी विभागों की तमाम कवायद के बावजूद पिछले साल की तुलना में इस बार अक्टूबर में अब तक दिल्ली को कहीं अधिक खराब दिन मिले हैं. 15 अक्टूबर से ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान लागू करने के साथ-साथ सीपीसीबी की टीमों का निरीक्षण अभियान शुरू हो जाएगा.

111 दिन में इस साल 7 दिन खराब

सीपीसीबी के अनुसार अक्टूबर में इस साल अभी तक खराब दिनों की संख्या अधिक रही है. 2017 में 1 से 11 अक्टूबर के बीच दिल्ली में 5 दिन खराब और 5 दिन सामान्य स्तर प्रदूषण रहा था, लेकिन इस साल तक अब तक 4 दिन सामान्य और 7 दिन खराब स्तर का प्रदूषण मिला है. पिछले साल 17 अक्टूबर को दिल्ली में पहली बार बेहद खराब स्तर रहा था. पूरे अक्टूबर माह के दौरान पिछले साल 5 दिन सामान्य, 10 दिन खराब, 14 दिन बेहद खराब और एक दिन खतरनाक स्तर का प्रदूषण रहा था.

स्थानीय निकायों को अपनी टीमें बनाने के निर्देश

सीपीसीबी ने दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के स्थानीय निकायों को गुरुवार को ही एक बैठक कर निर्देश जारी किए हैं कि प्रदूषण से निपटने के लिए वह भी अपनी टास्क फोर्स टीमों का गठन करें. पराली जलने का सिलसिला शुरू हो चुका है. ऐसे में प्रदूषण के उल्लंघन के मामलों को तेजी से दूर करने के लिए सीपीसीबी की 41 टीमें दिल्ली- एनसीआर को कवर नहीं कर पाएंगी. इसलिए स्थानीय निकाय भी अपनी टीमों को बनाएं और इन टीमों के लिए एक नोडल अधिकारी भी रखें.

हवा की गति बढ़ी, प्रदूषण घटा

हवा की गति बढ़ते ही गुरुवार को न केवल दिल्ली की फिजा में ठंडक का अहसास हुआ बल्कि प्रदूषण भी घट गया. हालांकि यह अभी कुछ ही देर के लिए है. शुक्रवार दोपहर बाद फिर से हवा की गति कम होने लगेगी. इस बीच 11 अक्टूबर का दिन पिछले 7 सालों में सबसे ठंडा दर्ज किया गया.

गुरुवार को राजधानी का अधिकतम तापमान महज 32.3 डिग्री सेल्सियस रहा. जो सामान्य से एक डिग्री कम रहा. न्यूनतम तापमान 24.5 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से चार डिग्री अधिक था. हवा में नमी का स्तर 49 से 79 फीसद दर्ज किया गया. मौसम विभाग के अनुसार हवा की गति औसतन 20 से 22 किलोमीटर प्रति घंटे रही. बीच-बीच में यह 35 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे तक भी दर्ज की गई.

सीपीसीबी के अनुसार हवा की गति बढ़ने से पीएम 10 और पीएम 2.5 के प्रदूषक तत्व छंटने में मदद मिली है. दिल्ली का एयर इंडेक्स भी गिरकर 210 पहुंच गया. जबकि बुधवार को यह 241 रहा था. मौसम विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. बीपी यादव ने बताया कि यह बदलाव पहाड़ों पर हुई ताजा बर्फबारी की वजह से हुआ है.

दूसरी तरफ स्काईमेट वेदर के अनुसार जम्मू-कश्मीर से पश्चिमी विक्षोभ गुजर रहा है. इसकी वजह से उत्तरी राजस्थान और इससे लगते पंजाब व हरियाणा में साइक्लोनिंग सकरुलेशन बना है. हालांकि यह बदलाव कुछ देर के लिए ही है. शुक्रवार से फिर हवा की गति कम हो जाएगी. रात के तापमान में 1 से 2 डिग्री की गिरावट आ सकती है, लेकिन दिन में किसी तरह की राहत नहीं मिलेगी.

स्काईमेट के अनुसार उत्तर-पश्चिम की हवाओं के साथ पंजाब और हरियाणा में जलने वाली पराली का धुआं यहां पहुंचेगा और दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ाएगा. जैसे-जैसे न्यूनतम तापमान में गिरावट आएगी कोहरा बढ़ेगा और पराली के धुएं का प्रदूषण मिलकर स्मॉग का रूप भी ले सकता है.’

समस्या

– इस साल 11 दिन में से सात दिन खराब रहा हवा का स्तर

– इसी अवधि में बीते वर्ष पांच दिन खराब और पांच दिन थे सामान्य

पिछले साल से क्या अलग है

– पराली जलाने से रोकने के लिए स्पेशल बजट के तहत स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम बनाया गया है. यह मशीन खेतों में ही पराली को क्रश कर बिछा देती है जिससे मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है

– पेट कोक पर बैन लगा है

– ईस्टर्न पेरिफेरल वे शुरू हुआ है

– औद्योगिक इकाइयों के लिए सॉक्स और नॉक्स के मानक तय हुए हैं

सावधान : मोबाइल से है गठिया का खतरा

मोबाइल और कंप्यूटर पर अधिक देर तक काम करने से हड्डियों में दर्द की परेशानी होने की बात कही जाती रही है. अब डॉक्टरों का कहना है कि यह दर्द गठिया में तब्दील हो सकता है. यह स्थिति इतनी खतरनाक है कि गठिया के कारण हड्डियों में होने वाली जकड़न दिल की धड़कन भी रोक सकती है. विश्व गठिया दिवस पर डौक्टरों ने इस बीमारी के बढ़ते खतरे पर चिंता जाहिर की और लोगों में जागरूकता पर जोर दिया.

इस बारे में नोएडा स्थित मेट्रो अस्पताल की वरिष्ठ कंसल्टेंट व गठिया रोग विशेषज्ञ डौ. किरन सेठ ने कहा कि इस समस्या को आमतौर पर नजरअंदाज किया जाता है. जानकारी के अभाव में इसे सिर्फ हड्डियों की बीमारी समझा जाता है, जबकि इसके कारण हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी व लिवर खराब होने की समस्या हो सकती है. कई मरीजों में हार्ट अटैक के कारण गठिया की बीमारी होती है. समय रहते असल बीमारी का इलाज नहीं होने के कारण लोग जानलेवा बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. शुरुआती दौर में ही बीमारी की पहचान कर इसका इलाज किया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में खराब जीवनशैली भी इसका कारण बन रहा है. जंक फूड का अधिक इस्तेमाल, प्रदूषण का दुष्प्रभाव व तनाव भी गठिया के कारण हैं. इसके अलावा कंप्यूटर पर अधिक देर तक काम करने वाले लोगों की गर्दन व अंगुलियों में दर्द की बीमारी देखी जाती है. यह भी गठिया में तब्दील हो सकती है. लोग मोबाइल पर लंबे समय तक व्यस्त रहते हैं. इससे भी हाथ व कलाई में दर्द की परेशानी व गठिया हो सकती है.

उन्होंने कहा कि वर्ष 1993 तक देश में गठिया की बीमारी से करीब 70 लाख लोग पीड़ित होते थे. एक अनुमान के मुताबिक,वर्ष 2017 में यह आंकड़ा पहुंचकर करीब 18 करोड़ तक पहुंच चुका है. इसलिए आशंका जाहिर की जा रही है कि वर्ष 2025 तक यह बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनकर सामने आएगी. इसका असर इलाज पर पड़ता है. यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि यदि समय पर इलाज नहीं कराया गया तो पीड़ित व्यक्ति की उम्र 5-10 साल कम होने की आशंका बढ़ जाती है.

इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर के डौ. मनिंदर शाह के अनुसार बुजुर्गों को यह बीमारी अधिक होती है. यह देखा जा रहा है कि कूल्हे की गठिया से अधिक बुजुर्ग हाथ की गठिया से पीड़ित होते हैं. करीब 45 फीसद बुजुर्गों को हाथ में गठिया की शिकायत होती है. इसका कारण उम्र से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं. इस बीमारी से बचाव के लिए पोषणयुक्त खानपान व नियमित व्यायाम जरूरी है.

यह लक्षण हो तो न करें नजरअंदाज

  • लंबे समय तक हल्का बुखार रहना
  • मुट्ठी बंद करने में तकलीफ
  • जोड़ों में सूजन के साथ दर्द, सोते वक्त करवट बदलने में परेशानी

मोनसेंटो पर दो हजार करोड़ के जुर्माने के बाद क्या जागेगी भारत सरकार?

इस साल 10 अगस्त को सैन फ्रांसिस्को की एक अदलात ने फैसला सुनाया कि दुनिया भर में सबसे अधिक प्रयोग किए जाने वाले राउंडअप हर्बीसाइड (खरपतवार नाशक) के प्रभाव से ड्वेन जॉनसन, जो सैन फ्रांसिस्को के पास के एक स्कूल में ग्राउंडकीपर थे, को लाइलाज कैंसर हुआ है. जूरी ने सजा और क्षतिपूर्ति के रूप में कृषि प्रोद्योगिकी कंपनी मोनसेंटो को आदेश दिया कि वह जॉनसन को 2116 करोड़ रुपए बतौर मुआवजा दे. बता दें कि राउंडअप मोनसेंटो की कंपनी है. जॉनसन ने कोर्ट में अपनी गवाही में कहा था कि वो हर्बीसाइड का प्रयोग साल में 20-30 बार करते थे और कम से कम दो बार उन्हें रसायन से नहाना पड़ा. फिर 2014 में उन्हें गैर-हॉजकिन लिंफोमा हो गया. यह एक दुर्लभ कैंसर है.

राउंडअप हर्बीसाइड में पड़ने वाला मुख्य रसायन ग्लाइफोसेट है. मनुष्य और पर्यावरण पर इस रसायन के जहरीले प्रभाव की आशंका के चलते सरकारें और अंतरराष्ट्रीय जन स्वास्थ संगठन इस पर अनुसंधान कर रहे हैं. उदाहरण के लिए 2013 में भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, ‘‘राउंडअप से कैंसर सहित अन्य स्वास्थ संबंधी खतरे की गंभीर आशंका है.’’ दो साल बाद विश्व स्वास्थ संगठन की कैंसर पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी आइएआरसी ने ग्लाइफोसेट को मनुष्यों के लिए संभवतः कैंसरकारी बताया था.

पिछले साल जून में ली मोंडे में प्रकाशित मोनसेंटो पेपर्स के अनुसार इस कंपनी ने आईएआरसी को 2015 की रिपोर्ट के लिए उस संस्था को खूब भलाबुरा कहा था. इन रिपोर्टों के अंग्रेजी अनुवाद के अनुसार कंपनी ने रिपोर्ट को ‘जंक’ अथवा कबाड़ विज्ञान कह कर खारिज कर दिया था.

मोनसेंटो इंडिया लिमिटेड ने 2017-18 की अपनी सालाना रिपोर्ट में दावा किया है कि ‘‘राउंडअप ग्लाइफोसेट खरपतवार नाशक है जिससे पर्यावरण को कोई हानि नहीं होती और यह बाद में उग आने वाले घासपात को प्रभावकारी तरीके से नियंत्रित कराता है.’’ अमेरिकी अदालत के उपरोक्त फैसले के बारे में जब मैंने कंपनी के प्रवक्ता से बात की तो उनका जवाब था, ‘‘हम लोग जॉनसन और उनके परिवार के प्रति सहानुभूति रखते हैं. परंतु यह निर्णय 800 से अधिक वैज्ञानिक अध्ययन और समीक्षाओं-और अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी और विश्व भर की नियामक संस्थाओं के निष्कर्षों- से प्रमाणित तथ्य को बदल नहीं सकता कि ग्लाइफोसेट से कैंसर नहीं होता और इस रसायन से जॉनसन को कैंसर नहीं हुआ है.’’

इस दावे के बावजूद मोनसेंटो पर सिर्फ अमेरिका में 5000 के लगभग केस दर्ज हैं जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि राउंडअप से कैंसर होता है. जॉनसन का मामला ऐसा पहला केस है जिस पर सुनवाई हुई. यह केस विश्व भर में ग्लाइफोसेट के प्रयोग और इससे संबंधित नियामकों को समझने के लिए अच्छा अवसर है.

बहुत से देशों ने ग्लाइफोसेट और उन हर्बीसाइड को, जिनमें इस रसायन का प्रयोग होता है, प्रतिबंधित करने की कोशिश की है. 2013 में अल सल्वाडोर की संसद ने ग्लाइफोसेट वाले कीटनाशकों पर रोक लगा दी. इसके अगले सालों में बेल्जियम, नीदरलैंड्स, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल ने ग्लाइफोसेट को प्रतिबंधित कर दिया. फ्रांस में भी इस पर प्रतिबंध के बारे में अच्छी खासी बहस चल रही है. अपने चुनावी वादे में फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों ने इस पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी. हाल में उनकी पार्टी के सांसदों ने उनकी इस योजना को अस्वीकार कर दिया.

खेतिहर मजदूरों में किडनी के रोगों की वृद्धि के मद्देनजर, श्रीलंका की सरकार ने ग्लाइफोसेट रसायन वाले कीटनाशकों पर आंशिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया था लेकिन बाद में इसे हटा लिया. भारत में, कीटनाशक संबंधी कमजोर नियामक तंत्र और इसके खतरे को पहचानने में सरकार की आनाकानी के चलते, इस रसायन पर गहरी छानबीन नहीं हो सकी है.

कागजों में ग्लाइफोसेट को भारत में केवल चाय और कृषि न होने वाले इलाकों में इस्तेमाल करने की इजाजत है. तो भी इस बात के प्रमाण हैं कि इसका इस्तेमाल व्यापक तौर पर हो रहा है. कृषि मंत्रालय के 2016-17 के प्रोविजनल उपभोग आंकड़ों के अनुसार यह रसायन आयातित हर्बीसाइड के 35 प्रतिशत और स्थानीय स्तर पर उत्पादित हर्बीसाइड के 14.5 प्रतिशत में होता है.

पेस्टीसाइड (कीटनाशन) एक्शन नेटवर्क, पेन, के प्रोग्राम कोओर्डिनेटर दिलीप कुमार बताते हैं कि ‘‘गैर चाय फसलों में ग्लाइफोसेट का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा जो इसकी पंजीकरण शर्तों के खिलाफ है.‘‘ उनकी संस्था कृषि में कीटनाशक के टिकाऊ विकल्प पर शोध करती है. कुमार का कहना है, ‘‘ग्लाइफोसेट को फसल लगाने से पहले खेतों में डाला जाता है. तकनीकी रूप में फसल से पहले खेत गैर कृषि इलाका है. ये लोग इस प्रकार नियम को तोड़मरोड़ रहे हैं.’’ कुमार बताते हैं कि ग्लाइफोसेट को गैरकानूनी हर्बीसाइड टॉलरेंट (एचटी) कपास की फसल में भी प्रयोग किया जाता है. यह आनुवांशिक संशोधित कपास है जिस पर हर्बीसाइड का असर नहीं होता. (जब ग्लाइफोसेट को एचटी कपास और उसके आसपास उगे हुए खरपतवार पर छिड़का जाता है तब यह सिर्फ खरपतार को ही नष्ट करता है.)

आईएआरसी की 2015 के अध्ययन के अनुसार रसायन का असर न होने वाले आनुवांशिक संशोधित फसलों के अस्तित्व में आने के बाद से दुनिया भर में ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल बढ़ा है. खबरों के अनुसार भारत में भी हर्बीसाइड टॉलरेंट फसलों की गैरकानूनी खेती बढ़ने से ग्लाइफोसेट के प्रयोग में बढ़ोतरी आई है.

इस साल के शुरू में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सरकारों ने ग्लाइफोसेट बेचने वालों पर शिकंजा कसा. फरवरी 2018 के अपने आदेश में आंध्र प्रदेश सरकार ने कहा था, ‘‘ग्लाइफोसेट जैसे रसायन वाले हर्बीसाइड के विवेकहीन इस्तेमाल से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है. इसी प्रकार तेलंगाना सरकार ने जून 2018 में आदेश जारी किया कि “अवैध रूप से अस्वीकृत हर्बीसाइड टॉलरेंट कापस की खेती के विस्तार से तेलंगाना में कृषि फसलों में, खासकर कपास में, ग्लाइसोफेट जैसे हर्बीसाइड का अंधाधुंध प्रयोग हो रहा है.’’ इसके बावजूद भी सरकार ने कीटनाशक कानून के तहत इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया. राज्य केवल अस्थाई तौर पर कीटनाशकों पर 60 दिनों तक प्रतिबंध लगा सकते हैं. इस प्रतिबंध को वह अतिरिक्त 30 दिनों तक बढ़ा सकता है.

भारत में लागू कीटनाशक नियामकों की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं है. उदाहरण के लिए 2001 में केरल सरकार ने दुनिया भर में व्यापक स्तर पर प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक इंडोसल्फान को प्रतिबंधित कर दिया था. फिर 2002 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया (हवाई छिड़काव पर प्रतिबंध जारी रहा). जबकि, इस बात के सबूत हैं कि इस रसायन के असर से विलंबित पौरुष, शारीरिक विकृति और मानसिक रोग होते हैं. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में देश भर में इंडोसल्फान के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया.

मैंने पेन के निदेशक दोंती नरसिम्हा रेड्डी से फोन पर बात की. उन्होंने बताय, ‘‘भारत में कीटनाशक पर लागू होने वाले नियमों में बहुत सी खामियां हैं. ये नियम केन्द्र से नियंत्रित होते हैं और इनमें राज्यों का बहुत कम हस्ताक्षेप होता है. इसके अलावा सरकार टिकाऊ विकास के नजरिए से कीटनाशकों पर ध्यान नहीं दे रही है. इसे जन स्वास्थ्य की चिंताओं के नजरिए से देखा जाना चाहिए लेकिन यह फाइलों को यहां से वहां ले जाने की प्रक्रिया बन कर रह गया है.’’

भारत में ग्लाइफोसेट के प्रयोग पर कीटनाशक कानून 1968 लागू होता है. 1970 में कृषि मंत्रालय ने दो संस्थाओं वाले केन्द्रीय कीटनाशक बोर्ड और पंजीकरण समिति, सीआईबीआरसी, का गठन किया. कृषि मंत्रालय की सीआईबी एक स्वायत्त संस्था है जो कीटनाशकों के उत्पादन, बिक्री, भंडारण और ढुलाई को नियंत्रित करने के साथ मानव स्वास्थ पर इसके खतरे का आंकलन करती है. वहीं पंजीकरण समिति का काम आयातकर्ता या उत्पादकों के दावों और कीटनाशकों की जांच कर पंजीकरण करना है. जब मैंने कीटनाशन नियमों पर टिप्पणी के लिए सीआईबीआरसी के सचिव को ईमेल किया तो उनका कहना था कि इन सवालों के लिए सीआईबीआरसी सही जगह नहीं है और मुझे कृषि मंत्रालय के पौध संरक्षण विभाग से संपर्क करना चाहिए. मैंने कृषि सहकारिता और किसान विभाग के सचिव और पौध संरक्षण विभाग के एक निदेशक को ईमेल किया लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला.

कीटनाशक कानून में यह अतिरिक्त व्यवस्था है कि कीटनाशकों के उत्पादन, बिक्री और वितरण के लिए कंपनियों को राज्य सरकार से लाइसेंस लेना होगा. एक अन्य एजेंसी है- भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण – खाद्य पदार्थों में कानूनी रूप से स्वीकार्य अवशिष्ट की सीमा तय करने वाली संस्था. इसके अतिरिक्त 1986 का पर्यावरण सुरक्षा कानून यह अधिकार देता है कि वह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्रदूषक (साथ ही कीटनाशक) के जमाव को रोकने के लिए निर्देश जारी करे.

इतनी सारी सरकारी व्यवस्थाओं के बावजूद लालफीताशाही नियामक प्रक्रिया पर हावी है. उदाहरण के लिए 2008 में सरकार ने 1968 के कीटनाशक कानून को बदलने के लिए लोकसभा में कीटनाशक प्रबंधन बिल पेश किया. रेड्डी ने मुझे बताया, ‘‘दोनों कानूनों के फ्रेमवर्क में बहुत अंतर नहीं है’’. नागरिक समूहों ने विस्तृत समीक्षा के बाद इस कानून में 61 बदलावों का सुझाव दिया. कीटनाशकों की परिभाषा, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का आंकलन कर पंजीकरण प्रक्रिया को मजबूत बनाना और उत्पादों की पैकिजिंग और लेबलिंग में नई अवश्यकताएं, जैसे उपाय सुझाए गए. वो कहते हैं, ‘‘जब हमने इस बिल के प्रावधानों की जांच की तो पता चला कि इसे उद्योग के हितों को ध्यान में रख कर लिखा गया है.’’ फिलहाल यह बिल नागरिक समूहों के दवाब और कृषि के लिए संसद की स्थाई समिति के सुझावों के कारण लंबित है.

इस साल संसद में पूछे गए एक सवाल का जो जवाब सरकार ने दिया उससे जारी नियामक फ्रेमवर्क की अनिश्चितताओं को समझा जा सकता है. तेलगु देशम पार्टी के नारामल्ली शिवप्रसाद ने संसद में पूछा कि क्या विवादास्पद ग्लाइफोसेट हर्बीसाइड का प्रयोग गैर कानूनी तरीके से एचटी कपास के लिए हो रहा है और क्या पर्यावरण पर इसके विषाक्त असर का अध्ययन किया गया है? शिवप्रसाद ने यह भी पूछा कि 2013 में 66 संभवतः खतरनाक कीटनाशकों, जिन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध या रोक लगी है, उनकी समीक्षा के लिए बनी अनुपम वर्मा समिति ने क्या इस रसायन पर प्रतिबंध की समीक्षा की है. कृषि राज्य मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत के पास रसायन के जहरीलेपन की कोई विशेष जानकारी नहीं थी और ग्लाइफोसेट के अवैध प्रयोग के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी. शेखावत ने बताया कि वर्मा समिति ने ग्लाइफोसेट की समीक्षा नहीं की है क्योंकि इसे किसी भी अन्य देश में प्रतिबंधित नहीं किया गया है. एक ईमेल के जवाब में वर्मा ने बताया कि ‘‘ग्लाइफोसेट समिति के अधिकार क्षेत्र से बाहर है.’’

एलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर की संयोजक कविता कुरुगंती मानती हैं कि नियामक प्रक्रिया कमजोर हैं. उनका यह एलायंस कृषि, आजीविका और खाद्य सुरक्षा क्षेत्र में काम करने वाले 400 भारतीय संगठनों का गठबंधन है. वह कहती हैं, ‘‘जॉनसन वाला केस एक व्यक्ति को हुए नुकसान जुड़ा में है जो यह साबित कर सका कि उसको हुए नुकसान के लिए राउंडअप एक प्रमुख कारण था.’’ हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग होंगे जो कारण और प्रभाव के संबंध को साबित नहीं कर पाएंगे. नियामक संस्थाओं के लिए जरूरी है कि वे ग्लाइफोसेट पर बड़ा कदम उठाए.’’

कविता कुरुगंती और अन्य एक्टीविस्टों ने 20 अक्टूबर 2017 को सर्वोच्च अदालत में रिट पिटीशन दायर कर दावा किया कि 99 ऐसे कीटनाशकों को भारत में उत्पादन करने की अनुमति दी गई है जो दुनिया के कम से कम एक देश में प्रतिबंधित हैं. पिटीशन में ग्लाइफोसेट से जुड़े मामलों को उठाते हुए कहा गया है कि यह हैरान करने वाली बात है कि भारत सरकार द्वारा समीक्षा की गई कीटनाशकों की सूची में ग्लाइफोसेट का नाम नहीं है बावजूद इसके कि ऐसे कई सारे साक्ष्य उपलब्ध हैं जो इसके सुरक्षित होने पर सवालिया निशान लगाते हैं.

पिटीशन में ऐसे मामलों पर जोर दिया गया है जिनमें कीटनाशक के कारण जहर का तेजी से फैलना और इसके कारण मौत, अस्पताल में भर्ती और बीमारी के मामले सामने आए हैं. पिटीशन में यह भी दावा किया गया है कि इस बात के ढेरों साक्ष्य हैं कि कृषि में कीटनाशकों के प्रयोग के कारण किसान और खेतिहर मजदूरों को कई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है. इन मामलों में कैंसर और प्रजनन में समस्या और मानसिक रोग भी शामिल हैं.’’

साक्ष्य के रूप में उन्होंने केरल में इंडोसल्फान के प्रयोग से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़े असर, महाराष्ट्र के यवतमाल में कीटनाशक के जहर से चार साल में 272 मौतें, पंजाब में रसायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से पर्यावरण प्रदूषण, जल प्रदूषण और कैंसर के मामलों में हुई बढ़ोतरी और बिहार के सारन में 2013 में कीटनाशक मोनोक्रोटोफोस मिले मिडडे मील को खाने से 23 बच्चों की मौत की घटनाओं को अदालत के सामने पेश किया था. इस मामले में सुनवाई चल रही है.

कविता कुरुगंती को विश्वास है कि भारत में ग्लाइफोसेट के खतरे को पहचान लिया जाएगा. ‘‘जल्द ही ग्लाइफोसेट के जहर के सबूतों को भारत में समक्ष लाया जाएगा. भारत में हो रही खेती में कीटनाशकों का जिस तरह से सीधा और अलग अलग स्तर पर घुसपैठ है उसे देखते हुए लगता है कि नियामक संस्थाओं की नींद खुलने तक हम बहुत बड़ी त्रासदी झेल चुके होंगे. उम्मीद है कि हमारे किसानों और खेतिहर मजदूरों के जीवन के अधिकार के प्रति सुप्रीम कोर्ट संज्ञान लेगी और सरकार को ग्लाइफोसेट और अन्य जहरीले कीटनाशकों पर रोक लगाने का निर्देश देगी.’’

‘#MeToo’ पर प्रीटी जिंटा की बेबाक राय

पिछले एक सप्ताह से बौलीवुड में ‘‘MeToo’’ मूवमेंट के चलते हंगामा मचा हुआ है. हर दिन कोई न कोई अदाकारा सोशल मीडिया पर किसी कलाकार या निर्माता निर्देशक पर यौन शोषण करने का आरोप लगा रही है. तनुश्री दत्ता, विंटा नंदा, संध्या मृदुल सहित कई अभिनेत्रियां व महिला लेखक आरोप लगा रही हैं. परिणामतः कई लोग बुरी तरह से हिले हुए हैं. कुछ आरोपों से इंकार कर रहे हैं, तो वहीं चेतन भगत जैसे कुछ लोग अपने कुकृत्य के लिए माफी मांग रहे हैं. तो वहीं कुछ लोग इसे तथाकथित अभिनेत्रियों का प्रचार हथकंडा भी बता रहे हैं. फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी एसोसिएशन भी सक्रिय हो गयी हैं. ‘सिंटा’ के सुशांत सिंह खुद को बेबस महसूस कर रहे हैं. उनका कहना है कि वह ‘सिंटा’ के कानून की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं. ‘सिंटा’ की जिस समिति को इस पर निर्णय लेना है, वह चुप है. यानी कि जो हालात बने हुए हैं, उससे एक बात उभरकर आती है कि बौलीवुड में काम करना लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है.

मगर अभिनेत्री व बिजनेस वुमन प्रीति जिंटा इस बात से सहमत नजर नहीं आती. ‘‘पंजाब इलेवन क्रिकेट’’ टीम की मालकिन प्रीति जिंटा ने हाल ही में अपनी 26 अक्टूबर को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘भईया जी सुपरहिट’’ के प्रमोशन के सिलसिले में मीडिया से बात की. जब मीडिया ने उनसे पूछा कि अभिनेत्रियां जिस तरह के आरोप लगा रही हैं, उससे यही नजर आता है कि बौलीवुड लड़कियों के लिए सुरक्षित जगह नहीं रही ? वह खुद क्या मानती हैं ? इस पर प्रीति जिंटा ने बौलीवुड का जोरदार बचाव करते हुए कहा कि, ‘‘हर पुरुष खिलंदड़ या बलात्कारी या यौन शोषक नहीं है और हर औरत सती सावित्री नहीं है.’’

प्रीति जिंटा ने अपनी लय में बोलते हुए मीडिया से कहा- ‘‘देखिए, मैं आप सभी को पीछे ले जाते हुए भारतीय औरत व पुरुष के ट्रेडीशनल काम याद दिलाना चाहूंगी. भारतीय संस्कृति में पुरुष और औरतों को किस तरह से जिम्मेदारीयों के आधार पर बांट रखा हैं, पुरुष का काम है बाहर जाकर कमाकर लाना और एक औरत का काम है कि वह घर में रहें घर का काम करें. पति की सेवा करे. बच्चों की परवरिश करे. यही उनका ट्रेडीशनल काम है. पर अब अगर आप देखें तो भारत की आबादी का 60 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम उम्र के युवाओ का है. अब जिंदगी व लाइफ स्टाइल बदल गयी है. अब औरतें घर से बाहर निकलकर हर क्षेत्र में काम कर रही हैं. पर यह कहना कि फिल्म इंडस्ट्री में औरतें सुरक्षित नहीं हैं, तो यह बुलशिट है. बहुत गलत बयानबाजी है. मेरी राय में कामकाजी औरतों के लिए फिल्म उद्योग सर्वाधिक सुरक्षित जगह है. दूसरी इंडस्ट्री के हालात औरतों के लिए बहुत खराब हैं. अब कुछ एक्ट्रेस बोल रही हैं कि उनके साथ यहां कुछ हुआ, तो इसलिए कि यहां औरतों को बोलने की आजादी है. मगर बिजनेस या मेडिकल क्षेत्र या राजनीति में तो उन्हें बोलने की आजादी ही नही है. बल्कि वहां पर शिकायत करने वाली को ही मरवा देंगे.’

वह आगे कहती हैं- ‘‘मी टू मूवमेंट के संबंध में मैं कहना चाहूंगी कि हर पुरुष खिलंदड़ या बलात्कारी नहीं है और हर औरत सती सावित्री नहीं है. अच्छे लड़के व बुरे लड़के हैं, तो वहीं अच्छी लड़कियां व बुरी लड़कियां भी हैं. दो लोगों के बीच आकर्षण को आप रोक नहीं सकते. पर कुछ लोग यह सोचते हैं कि वह बहुत अच्छे मुकाम पर हैं, तो सामने वाले का फायदा उठा सकते हैं. यह रूकना चाहिए. किसी समस्या को खत्म करने के लिए जरुरी है कि पहले हम स्वीकार करें कि समस्या है. अब तक तो हम स्वीकार ही नही कर रहे थे कि हमारे समाज में ऐसा हो रहा है. हम सभी कारपेट के अंदर दबाते आ रहे थे. मैं यह नहीं मानती कि कोई लड़की महज प्रचार के लिए किसी पुरुष पर यौन शोषण करने का आरोप लगाएगी.’’

उन्होने कहा- ‘‘मैं गैर फिल्मी परिवार से बौलीवुड में आयी. मेरे साथ बौलीवुड में किसी ने भी गाली गलौज नहीं की. मेरा कोई शोषण नहीं हुआ. मेरे साथ किसी ने भी बदतमीजी नहीं की. मेरा कभी कोई ब्वायफ्रेंड नहीं रहा. फिल्म हो या क्रिकेट मैं किसी भी पुरुष के ज्यादा करीब नहीं आती. यह मैंने नियम बना रखा है. मैं दकियानूसी राजपूत परिवार से हूं. मेरा किसी ने फायदा नही उठाया. मेरा मानना है कि हर इंसान को एक ही रंग में नहीं रंगा जाना चाहिए. पहली बात तो मेरे करियर में अब तक किसी ने भी मुझे परेशान नहीं किया. मैं कर्राटे में भी माहिर हूं. इसलिए करियर की शुरुआत में मैंने एक इंसान को थप्पड़ भी जड़ दिया था. इसके अलावा मेरी फिल्में भी हमेशा सफल होती रही हैं. मैं एक बात और कहना चाहूंगी कि यदि कोई अभिनेत्री किसी फिल्म में आइटम नंबर यानी कि आइटम डांस करती है, तो इसके यह मायने नहीं हैं कि आप उसके साथ कुछ भी कर सकते हैं. मेरा मानना है कि इस तरह के मुद्दों पर बहुत संजीदगी से बात करना चाहिए. इस तरह के मुद्दों को बहुत संजीदगी से हैंडल करना चाहिए. मैं कभी किसी के साथ रिश्ते में थी. लेकिन मैंने कभी प्रचार पाने के लिए कभी किसी मुद्दे को नही उठाया.’’

उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुए आगे कहा- ‘‘मेरे मन में चेतन भगत के प्रति सम्मान बढ़ा है कि वह जिम्मेदारी के साथ खुलकर आए और माफी मांगी. देखिए, गलतियां हमेशा इंसान से होती हैं. ईश्वर से नहीं. हर पुरुष से गलती हो सकती है. पर यदि वह सामने आकर गलती स्वीकार करता है, तो बहुत अच्छी बात है. चेतन भगत के माफी मांगने के साथ ही मामला खत्म हो जाता है. हम में से कोई भी दूध का धुला नहीं है.’’

उन्होंने कहा- ‘‘यह हर अभिनेत्री पर निर्भर करता है कि वह कैसे रिएक्ट करती है. यदि कोई आपको फोन करके मढ़ आईलैंड रात दो बजे औडीशन देने के लिए बुलाए, तो आपको सोचना चाहिए कि अब क्या करें? यदि आप में यह कौमन सेंस नही है, तो यह आपकी गलती है. इसलिए मैं बार बार कहती हूं कि बौलीवुड काम करने के दृष्टिकोण से औरतों व लड़कियां के लिए सबसे सुरक्षित जगह है. पर मैं यह भी नही कहती कि इस तरह की वारदातें नहीं होती है. मैंने कभी खुद कुछ लोगों को ऐसा करते देखा है. पर मैं उन पर कोई बात नहीं करना चाहती. मुझे याद है कि एक फिल्म के गाने की शूटिंग के दौरान एक हीरो, जिसका नाम नहीं लेना चाहूंगी, ने मेरे बाल खींचे, तो मैंने भी उसको एक किक मार दी. जब उसने कहा कि आपने किक क्यों मारी? तो मैंने कहा कि आपने किक क्यों मारी. किक मारकर आप औरतों के खिलाफ हिंसा कर रहे हैं. तो मैं भी हिंसा का जवाब हिंसा से दूंगी. उसके बाद उसने मेरे साथ कभी ऐसा नहीं किया. मैंने हमेशा वल्गर सीन करने से मना किया. मैंने एक फिल्म ‘‘चोरी चोरी चुपके चुपके’’ में वेश्या का किरदार निभाया, जिसमें मेरे हीरो सलमान खान थे. सेट पर कभी मेरी स्कर्ट छोटी दिखी, तो सलमान ने डायरेक्टर से कहा कि इस तरह के कपड़े मत पहनाओ. ढंग के कपड़े पहनाओ. फिल्म के सेट पर सेंसर का काम तो सलमान खान कर रहे थे. इस तरह मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे अच्छे लोगों के साथ काम करने का मौका मिला. अब यदि कुछ गलत हो रहा है, तो उस पर बात जरूर होनी चाहिए. माफी मांगने में कोई बुरायी नही है.’’

जानिए चेक बाउंस होने पर कौन सा बैंक कितना जुर्माना वसूलता है

आप अक्सर सुनते होंगे की ‘फलां का चेक बाउंस हो गया’, ‘इतने का चेक बाउंस हो गया’. दरअसल जब आपके बैंक में जितना भी पैसा है, उससे ज्यादा की राशि का आप चेक काटते हैं, तो कहा जाता है कि आपका चेक बाउंस हो गया है. क्योकि आपके खाते में पर्याप्त बैलेंस नहीं होता. इस परिस्थिति में पेनल्टी के तौर पर कानूनी कारवाई या जुर्माने का प्रावधान है. इसलिए ये जरूरी है कि चेक काटते वक्त आप खासा सावधानी बरतें. हम आपको बताएंगे कि चेक बाउंस होने की स्थिति में कौन सा बैंक कितना जुर्माना वसूलता है.

  • भारतीय स्टेट बैंक 

खाते में कम राशि होने की सूरत में चेक बाउंस होने पर एसबीआई जुर्माने के तौर पर 500 रुपये प्लस जीएसटी वसूलता है. यदि किसी तकनीकी कारण से आपका चेक वापस होता है तो जीएसटी के साथ 150 रुपये का जुर्माना लगता है. वहीं, प्रक्रिया में अगर ग्राहक की कोई गलती नहीं होती है तो बैंक उससे कोई चार्ज नहीं वसूलता.

  • बैंक औफ बड़ौदा

इस बैंक का जुर्माना चेक की राशि पर निर्भर करता है. अगर कम राशि के कारण एक लाख रुपये तक का चेक वापस होता है तो 250 रुपये का जुर्माना है. वहीं एक लाख से एक करोड़ तक की राशि पर जुर्माने की राशि बढ़ कर 750 रुपये हो जाती है. वहीं नौन फाइनेंशियल कारणों से चेक रिटर्न पर 250 रुपये का फाइन है.

  • ICICI बैंक

ICICI बैंक में ये चार्ज अलग-अलग हैं. ICICI से दूसरे बैंक और आउटस्‍टेशन रिटर्निंग के आधार पर चार्ज लगता है. लोकल एरिया के हिसाब से ICICI ब्रांच के अंदर चेक भेजने पर महीने में 1 चेक रिटर्न होने पर चार्ज 350 रुपये, महीने में 1 से ज्‍यादा चेक कम बैलेंस के चलते रिटर्न होने पर चार्ज 750 रुपये प्रति चेक है. नौन फाइनेंशियल कारणों से चेक रिटर्न होने पर चार्ज 50 रुपये है. अन्‍य बैंकों को चेक भेजे जाने की सूरत में बैलेंस कम होने पर चेक रिटर्न होने पर चार्ज 100 रुपये प्रति चेक और आउटस्‍टेशन के मामले में यह चार्ज 150 रुपये प्‍लस अन्‍य बैंक का चार्ज है.

  • HDFC बैंक

HDFC बैंक में अकाउंट में कम राशि होने की सूरत में चेक बाउंस होने पर 500 रुपये का जुर्माना है. फंड ट्रांसफर के चलते चेक रिटर्न होने पर चार्ज 350 रुपये और तकनीकी कारणों से रिटर्न होने पर 50 रुपये है.

  • एक्सिस और कोटेक महिंद्रा बैंक

इन दोनों बैंकों में अपर्याप्‍त बैलेंस के चलते चेक रिटर्न होने पर 500 रुपये जुर्माना है.

बता दें कि चेक बाउंस होना कानूनी अपराध भी है. भारत में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्‍ट, 1881 में हुए संशोधन के बाद सेक्‍शन 138 के तहत चेक बाउंस होने पर 2 साल तक की जेल या चेक में भरी राशि का दोगुना तक जुर्माना या दोनों लगाया जा सकता है.

हर घर में उगा हुआ है अलगाव का कैक्टस

गुजरात से हिंदी भाषाई लोगों के भागने की जिम्मेदारी गुजरात सरकार कांग्रेस नेता अल्पेश ठाकोर पर मढ़ कर दोषमुक्त होने की कोशिश कर रही है. एक सत्तारूढ़ पार्टी जो अपनी मनमानी और अपनी पुलिस की ज्यादितियों के लिए 2002 में खूब नाम कमा चुकी है, वह एक अदने से नेता की आड़ में शिकार करना चाह रही है. शिखंडी का पीछे से छिप कर वार करना या पेड़ के पीछे खड़े हो कर मल्लयुद्ध में विरोधी पर तीर चलाना नेताओं ने पौराणिक ग्रंथों से ही सीखा है.

गुजरात की रीढ़ बन चुके हैं हिंदी भाषाई मजदूर. इन्होंने ही पिछले कई दशकों में कम दाम पर ज्यादा काम कर के राज्य के उद्योगों को जिंदा रखा है. गुजरात में 2 सदियों में जो शिक्षा का प्रसार हुआ है, उस का एक असर यह हुआ है कि वहां खेतों में पहले काम करने वाले अब छोटेमोटे व्यापारी बन गए हैं और उन्होंने कारखानों में काम छोड़ दिया है. कारखानों में मेहनत का काम करने वालों को बाहर से बुलाना पड़ा है और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार की भयंकर बेकारी व गरीबी से भाग कर लाखों देश भर में बसे.

इन लोगों ने घर वगैरा तो नए राज्य में बना लिए पर राज्य में घुलमिल न पाए. ये बाहरी ही बने रहे हैं. जाति और भाषा की दीवारें कई दशकों बाद भी नहीं टूटी. ऊपर से गुजरात में कभी आरक्षण विरोधी, कभी मुसलिम विरोधी, कभी अंधभक्ति आंदोलन चलते रहे हैं. इन सब से गुजराती समाज लगातार खेमों में बंटा रहा है.

नरेंद्र मोदी ने 12 साल में गुजरात को बदलने की कोशिश नहीं की. वह भेदभाव का लाभ उठाते रहे. गुजरात में तरहतरह के मठ हैं और हर मठ अपनी जाति का है और न सरकार न नेता इन लोगों को एक साथ खड़ा कर पाई. हिंदू धर्म के नाम पर चाह इन की दरी एक ही हो पर ऊपर बैठा हर गुट अलग रहा, एकदूसरे का दुश्मन बना रहा.

यह कभी देशभर में होता है. कभी मुंबई में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ आंदोलन बाल ठाकरे ने चलाया था. अब राज ठाकरे हिंदी भाषियों के खिलाफ चलाते हैं. बंगलौर से उत्तरपूर्व के लोगों को अचानक भगा दिया गया था. यही गुजरात में हो रहा है जहां हिंदी भाषियों को बाहरी कहा जा रहा हे.

सुप्रीम कोर्ट में बैठे जज चाहे जितनी संवैधानिक नैतिकता की बात कर लें, असलीयत यह है कि घरघर में अलगाव का कैक्टस उगा हुआ है और रीतिरिवाजों से उस पर रोज पानी खाद डाला जाता है. गुजरात का असर बिहार, उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश पर कैसा पड़ेगा कहा नहीं जा सकता. यहां की जनता व सरकारें वैसे कमजोर और ढुलमुल हैं और अपने राज्यों में अपनी जनता की सुरक्षा नहीं कर पातीं, वे बाहर चले गए लोगों के लिए बयानबाजी के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगी.

इन बातों का रखें ध्यान और करें हेल्दी औनलाइन शौपिंग

आजकल सभी ईकौमर्स कंपनियों में ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ताओं को अपनी ओर खींचने की होड़ लगी है. यही कारण है कि ग्राहकों को रिझाने के लिए कंपनियों ने औफर्स की भरमार लगा दी है. सभी का दावा है कि वो अगले से बेहतर डील दे रही हैं. वहीं ग्राहकों के लिए चुनना मुश्किल है कि वो जाएं किस तरफ. पर डील और औफर्स की लड़ाई में कई महत्वपूर्ण बातें लोगों के ध्यान में नहीं रहती और इसका फायदा साइबर फ्राड और उचक्के उठाते हैं. इस लिए हम लाए हैं आपके लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें जिनकों ध्यान में रखने से आप साइबर फ्राड और चोर उचक्कों से बच सकेंगे.

  • स्पेसिफिकेशन के बारे में प्रोडक्ट के आधिकारिक वेबसाइट से पता करें 

अपने प्रोडक्ट को ज्यादा से ज्यादा बेचने के लिए कई बार ईकौमर्स कंपनियां प्रोडक्ट के बारे में गलत जानकारी डालती हैं. इस लिए ये जरूरी है कि कोई भी प्रोडक्ट खरीदने से पहले आप उसके स्पेसिफिकेशनस् के बारे में उसके आधिकारिक वेबसाइट पर जरूर देख लें.

  • रिव्यू और रेटींग जरूर देखें

जब आप कोई सामान खरीदते हैं तो उसके स्पेसिफिकेशनस् ही नहीं बल्कि यूजर रेटींग भी गौर से देखें. इससे आप प्रोडक्ट के गुणवत्ता के बारे में और बेहतर ढंग से जान सकेंगे.

  • http और लौक साइन का ध्यान रखें

किसी भी वेबसाइट से खरीदारी के बाद पेमेंट करते वक्त ध्यान रखें कि लिंक अड्रेस के टैब में http जरूर लिखा हो. इसके अलावा इस बात का भी ध्यान दें कि उस टैब में लौक साइन ना हो. कई फ्राड और साइबर चोर उचक्के, फर्जी वेबसाइट बना कर पेमेंट में गड़बड़ियां करती हैं.

  • प्राइज कंपेयर जरूर करें

सेल और औफर्स की आड़ में ईकौमर्स कंपनियां बेस प्राइज बढ़ा कर डिस्काउंट देती हैं. ऐसे में ग्राहकों के लिए अच्छा होगा कि वो कोई भी प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसके प्राइज को अन्य वेबसाइटों पर जरूर कंपेयर कर लें.

  • वारंटी

कोई भी प्रोडक्ट खरीदने से पहले, खास कर के इलेक्ट्रौनिक प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसके पार्टस्, एक्सेसरिज की वारंटी, और उसके नियम और शर्तों पर ध्यान दें.

  • औफर्स

एक समय पर वेबसाइटस् कई औफर्स देते हैं. कुछ औफर्स बैंको से पेमेंट मेथड पर होते है. तो इन औफर्स को ध्यान में रखें और इनका उपयोग करें.

  • रिफंड और रिटर्न का ख्याल रखें

खरीदारी करते वक्त रिफंड और रिटर्न की शर्तों का ख्याल रखें. कुछ प्रोडक्ट पर 10 दिनों की रिफंड और रिटर्न पालिसी होती है तो कुछ की 30 दिनों की होती है.

  • कहीं प्रोडक्ट सेकेंड हैंड तो नहीं

आजकल ईकौमर्स वेबसाइटों पर सेकेंड हैंड प्रोडक्टस भी मिलते हैं. हालांकि रिफर्बिश्ड प्रोडक्टस की जानकारी वेबसाइट्स देती हैं. पर ये आपकी जिम्मेदारी है कि आप इन बातों पर ध्यान दें.

फेस्टिवल सेल में फोन, लैपटौप खरीदते समय ध्यान रखें ये बातें

त्यौहार को देखते हुए अमेजान इंडिया, फ्लिपकार्ट, पेटीएम और स्नैपडील जैसे कई वेबसाइट्स पर सेल शुरू हुई है. अलग-अलग वेबसाइट्स पर कई तरह के आकर्षक औफर्स मिल रहे हैं और खास बात यह है कि आप और हम ऐसी सेल का इंतजार भी करते हैं, लेकिन सच कुछ और ही है. एक सच यह भी है कि कई वेबसाइट्स पर फोन की कीमत को ज्यादा लिखा जाता है और फिर उस पर छूट देने का दावा किया जाता है, जबकि वास्तव में आपको कोई छूट मिलती ही नहीं है. तो आइए जानते हैं इस फेस्टिव सीजन में औनलाइन खरीदारी करते समय किन-किन बातों का ख्याल रखना चाहिए.

स्पेसिफिकेशन की जानकारी कंपनी की वेबसाइट से पता करें

जब भी औनलाइन फोन खरीदने जाएं तो उस फोन के फीचर्स के बारे में उस फोन की कंपनी की वेबसाइट से जानकारी लें, क्योंकि कई बार ई-कामर्स वेबसाइट पर प्रोडक्ट्स के बारे में गलत जानकारी दी गई होती है.

रिव्यू और रेटिंग

अमेजान और फ्लिपकार्ट से फोन खरीदना ही काफी नहीं है, क्योंकि ये कंपनियां आधिकारिक सेलर नहीं हैं. ऐसे में यह जरूर चेक करें कि आप जिस फोन को खरीदने जा रहे हैं उसे बेचने वाला कौन है और उसके बारे में लोगों ने क्या-क्या रिव्यू दिए हैं. रिव्यू में सच्चाई सामने आ जाती है.

बिना https और लौक वाली साइट पर न करें शापिंग

किसी भी वेबसाइट पर जहां पेमेंट करनी है उस वेबसाइट के यूआरएल में https जरूर देख लीजिए और साथ ही यह भी देखें कि उसमें लौक का चिन्ह है या नहीं. जो भी वेबसाइट सिक्योरिटी के लिहाज से पक्की हैं उसपर https होगा. जब औनलाइन उचक्के किसी बैंक की नकल करके या ऐसे फर्जी वेबसाइट बनाते हैं तो उनमें https कभी नहीं मिलेगा.

कीमत की जानकारी

किसी भी औनलाइन सेल में या ऐसे ही औनलाइन खरीदारी करने से पहले उस सामान की कीमत अलग-अलग वेबसाइट्स जरूर चेक करें, क्योंकि कई औनलाइन वेबसाइट्स असली कीमत से अधिक कीमत के साथ प्रोडक्ट्स को दिखाती हैं और फिर कहती हैं कि 50 फीसदी का डिस्काउंट मिल रहा है.

वारंटी

किसी भी फोन को औनलाइन खरीदने से पहले उसकी वारंटी और एसेसरीज का भी वारंटी चेक कर लें. साथ ही नियम व शर्तों को भी ध्यान से पढ़ें.

औफर

एक ही वेबसाइट एक ही सामान के साथ कई सारे बैंकों से मिलकर कई औफर्स मिलते हैं. ऐसे में खरीदारी करने से पहले देख लें कि यदि आपके बैंक अकाउंट के साथ कोई औफर है तो उसका फायदा उठाएं.

फायदे का सौदा है एक्सचेंज

हमेशा तो नहीं लेकिन कई बार एक्सचेंज औफर फायदे का सौदा होता है. ऐसे में पेमेंट करने से पहले एक्सचेंज भी देख लें, हो सकता है कि आपके पुराने फोन को अच्छी कीमत मिल जाए.

रिफंड और रिटर्न

खरीदारी से पहले रिटर्न और रिफंड के बारे में नियम व शर्तें ध्यान से पढ़ें. कई कंपनियां 10 दिनों के अंदर रिफंड और रिटर्न की बात करती हैं तो कई 30 दिनों की.

कहीं फोन सेकेंज हैंड तो नहीं है

कई ई-कामर्स कंपनियां रिफर्बिश्ड फोन यानि सेकेंड हैंड फोन बेचने लगी हैं. ऐसे में आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि आप जो फोन खरीद रहे हैं वह रिफर्बिश्ड फोन तो नहीं है. वैसे यदि फोन रिफर्बिश्ड होगा तो साइट पर इसकी जानकारी दी जाती है.

कहीं आप भी ‘ट्रौफी वाइफ’ तो नहीं हैं..?

कहने को तो जेनिफर सीबल न्यूसम की पहचान के लिए उनका अमेरिकी डौक्यूमेंट्री फिल्मकार, लेखक, वीमेंस राइट एक्टिविस्ट होना काफी है. इसके बावजूद उन पर ट्रौफी वाइफ होने का टैग लगा है. यह बात खुद जेनिफर स्वीकारती हैं कि अलग अलग फील्ड में कामयाब होने और अहम योगदान देने के बावजूद उन्हें जब कैलीफोर्निया के लेफ्टीनेट गवर्नर गेविन न्यूसम की बीवी के नाम से जाना जाता है तो वे खुद को ट्रौफी वाइफ जैसा फील करती हैं. हालांकि वे इस टैग को छुड़ाने के लिए भरसक प्रयास कर रही हैं और शायद आने वाले दिनों में कैलीफोर्निया की फर्स्ट लेडी बन जाएं. पर इस पूरी कवायद में उनके बयान ने दुनिया भर में ट्रौफी वाइफ के तमगे को चर्चा में ला दिया है. यों तो ट्रौफी हस्बैंड भी होते हैं लेकिन यह टर्म ज्यादातर महिलाओं के लिए इस्तेमाल होती है.

क्या होता है ट्रौफी वाइफ होना

पुराने जमाने में राजामहाराजाओं के महलों की दीवारों पर अलग-अलग जानवरों की खालें, उनके सींग व अन्य हिस्सों की नुमाइश होती थी. वे एक तरह से शिकार करने के बाद की ट्रोफियां होती थीं, जिनको लेकर राजा अपनी बहादुरी और शिकार के कसीदे पढ़ा करते थे. अब शिकार तो लीगल रहा नहीं लेकिन राजाओं की जगह ले चुके अमीर तबके अपने घर में सजाने या दिखाने के लिए ऐसी औरतों से शादी करते हैं जो उनसे उम्र व खूबसूरती में बहुत आगे हों. उसे अपने प्रभाव से घर पर लाकर वे उन्हें एक तरह से ट्रौफी वाइफ बना देते हैं. फिर उसकी खूबसूरती के जरिये समाज, परिवार और दोस्तों के बीच अपना ईगो बूस्ट कर सोशल स्टेटस में इजाफा करते हैं. फिर उस चमचमाती ट्रौफी को घर लाकर किसी कोने पर सजा दिया जाता है और कभी-कभार लोगों को अपनी शान बघारने के लिए उनका जिक्र होता है. ऐसे लोगों को अपनी पत्नी के विचारों और सोच से कोई खास लेनादेना नहीं होता.

हर महिला की ख्वाहिश होती है कि उसका पति उसकी खूबसूरती, नैन-नक्श और पहनावे की तारीफ करे. उन्हें सबके सामने कॉम्प्लीमेंट दे लेकिन जब हसबैंड सिर्फ आपकी ब्यूटी, फिगर, ड्रेस और मेकअप की ही तारीफ करने लग जाए और आपके गुण-अवगुण, सोच, तर्क, काबिलियत और अन्य मसलों को कुछ न समझे तो समझ जाइये कि आप अपने पति के लिए महज ट्रौफी वाइफ बन चुकी हैं.

क्यों है इनकी जरूरत

दरअसल ट्रौफी वाइफ की चाहत रखने वाले मर्दों को सोशल सर्कल में दिखावा करने का शौक होता है. खूबसूरत और आकर्षक बीवी उनके लिए शो-ऑफ करने का एक जरिया होता है. जैसे कोई बुजुर्ग बिजनेस मैन किसी ब्यूटी क्वीन या ऐक्ट्रेस से शादी कर लेता तो समाज में वह महज ट्रौफी वाइफ ही होती है. प्लेबॉय के फाउंडर ह्यूग हेफनर 90 साल की उम्र में मरे लेकिन जब तक जिन्दा रहे 20-25 की मौडल्स के साथ शादियां रचाते रहे. सब जानते थे कि घर में बीवी नहीं बल्कि ट्रौफी वाइफ ला रहे हैं.

इसके अलावा कई बार लोगों को स्टेटस सिंबल के लिए तो कई दफा सेक्सुअल सेटिसफेक्शन के लिए ट्रौफी वाइफ की जरूरत होती है. दिलचस्प बात यह है कि ट्रौफी वाइफ की ख्वाहिश रखने वाले ज्यादातर पुरुष उम्रदराज होते हैं. कम उम्र की बीवी के साथ रहकर वो खुद को भी वैसा ही महसूस करते हैं.

कैसे जाने कि आप ट्रौफी वाइफ हैं

कोई भी महिला ट्रौफी वाइफ हो सकती है. अगर पति के कुछ लक्षणों पर ध्यान दें तो आप जान सकती हैं कि वे आपको ट्रौफी वाइफ से ज्यादा कुछ नहीं समझते.

जैसे हर फंक्शन या पार्टी में आपका पति आपके गुणों से ज्यादा अजनबियों के बीच आपके फिगर और ब्यूटी के ढोल पीटे. हर आने जाने वालों से जबरन आपको मिलाए तो समझ लीजिए आप अपने पति के लिये ट्रौफी वाइफ से ज्यादा कुछ नहीं हैं. इसके अलावा अगर सिर्फ सेक्स के दौरान ही आपसे बातें करें या आपसे इज्जत से पेश आए तो तो इशारा काफी है समझदार के लिए.

कई बार इसकी पहचान तब होती है जब आपकी अपनी पर्सनल डेट पर वह दोस्तों या औफिस कुलीग को बुलाकर आपकी नुमाइश करे. आप के अंदरूनी व्यक्तित्व और क्वालिटीज से अनजान  रहे, आपके अस्तित्व को नकारते हुए सिर्फ अपनी ही बातें करे. सीरियस टाक के बजाए कपड़ों, खूबसूरत चेहरे और सेक्स की बात करें तो समझ जाइये वह आपको ट्रौफी वाइफ से ज्यादा कुछ नहीं समझते.

कैसे बचें इस टैग से

हर महिला को इस बात का एहसास जल्द ही हो जाता है कि उसे उसे किसी ऑब्जेक्ट की ही तरह देखा जा रहा है. यह इतना समझने के लिए काफी है कि आप अपने पति के लिए ट्रौफी वाइफ बन चुकी है. इसलिए जैसे ही पता चल जाए कि आपका इस्तेमाल हो रहा है तो आप चुप न बैठें. यह आपके आत्सम्मान का मामला है. अपने पति से इस बाबत खुलकर बात करें. अगर अवह आपके विचारों, बुद्धि और मन के साथ आपसे रिश्ता निभाना चाहता है तो ठीक है वर्ना अपने अस्तित्व और पहचान के लिए अलग राह चुन लें.

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