अगर कोई भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता से सोचेगा, तो आखिरकार इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि दृष्टिहीनों को छोडकर सभी पुरुषों की नजर महिलाओं के नाजुक अंगों को टटोलती रहती हैं. यह पुरुष का प्राकृतिक स्वभाव है, इसे अन्यथा नहीं लिया जा सकता और न ही मात्र स्त्री अंगों को देखने भर से उसे दोषी ठहराया जा सकता है. पुरुष दोषी तभी ठहराया जा सकता है जब वह स्त्री अंगों को हाथ से छुए, उसे हासिल करने क लिए शारीरिक ताकत का इस्तेमाल करे या फिर किसी तरह का डर दिखाये या कि फिर लालच देकर अपनी उद्दात इच्छा पूरी करे.

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