अगर कोई भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता से सोचेगा, तो आखिरकार इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि दृष्टिहीनों को छोडकर सभी पुरुषों की नजर महिलाओं के नाजुक अंगों को टटोलती रहती हैं. यह पुरुष का प्राकृतिक स्वभाव है, इसे अन्यथा नहीं लिया जा सकता और न ही मात्र स्त्री अंगों को देखने भर से उसे दोषी ठहराया जा सकता है. पुरुष दोषी तभी ठहराया जा सकता है जब वह स्त्री अंगों को हाथ से छुए, उसे हासिल करने क लिए शारीरिक ताकत का इस्तेमाल करे या फिर किसी तरह का डर दिखाये या कि फिर लालच देकर अपनी उद्दात इच्छा पूरी करे.

दिक्कत तो यह मान लेना है कि पुरुष स्वभाव से ही लमपट होता है, वासना के लाल लाल डोरे उसकी आंखों में तैरते ही रहते हैं और वह सिर्फ और सिर्फ औरत के शरीर को हासिल कर लेना चाहता है. कोई महिला पत्रकार अगर मुद्दत बाद विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर पर यह आरोप लगा रही है कि कभी उन्होंने उसके साथ बड़ी बेहूदी बदसलूकी की थी जिसे ज्यों का त्यों लिखना ही सिर्फ वयस्कों के लिए वाली श्रेणी में आता हो या नीले पीले साहित्य की याद दिलाता हो तो इसे आप कैसे देखेंगे. मी टू नाम के आंदोलन से उपजा आत्मविश्वास या कुछ और?

अकबर कभी वाकई पत्रकारिता की दुनिया के जिल्लेलाही थे, उनके इर्द गिर्द खूबसूरत लड़कियां तितलियों की तरह मंडराती थीं, सत्ता के गलियारों में प्रशासनिक हलकों में एमजे अकबर के नाम का सिक्का चलता था. पत्रकारिता में कैरियर बनाने की ख्वाहिशमंद महत्वाकांक्षी युवतियां उनकी नजदीकियां पाने बेताब रहती थीं, ऐसे में यह भी नामुमकिन नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने वह सब कुछ नहीं किया होगा जिसके आरोप उन पर लग रहे हैं.

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