Download App

स्प्रिंट के बाद फुटबौल में छाए बोल्ट, पहले मैच में किए दो गोल

स्प्रिंट की दुनिया के बेताज बादशाह उसैन बोल्ट पेशेवर तौर पर फुटबौल के साथ जुड़ गए. तीन ओलंपिक में आठ स्वर्ण पदक जीतने वाले बोल्ट ने औस्ट्रलिया के क्लब सेंट्रल कोस्ट मेरिनर्स से खेलते हुए साउथ वेस्ट यूनाइटेड के खिलाफ दो गोल दागे. मैच के बाद बोल्ट ने कहा कि वो यहां आ कर काफी खुश हैं. उन्होंने दुनिया को दिखा दिया है कि वो इस खेल में भी अच्छा कर सकते हैं.

बोल्ट ने दोनों गोल मैच के दूसरे हाफ में 57वें और 68वें मिनट पर किए. इस मैच में सेंट्रल कोस्ट मेरिनर्स ने मैकार्थर साउथ वेस्ट यूनाइटेड को 4-0 से हराया. मैच के 57वें मिनट में मिडफील्डर से मिले पास पर बोल्ट ने विपक्षी डिफेंडर को छकाते हुए बौक्स के बाईं ओर से गोल कर दिया.

वहीं 68वें मिनट में विपक्षी डिफेंडर को चकमा देते हुए बोल्ट ने गोल दाग दिया. बोल्ट ने इससे पहले एक मैच खेला था, जिसमें उन्हें 72वें मिनट में मैदान पर उतारा गया था.

आपको बता दें कि एथिलीट से सन्यास लेने के बाद बोल्ट ने फुटबौल खेलने की इच्छा जाहिर की थी. जिसके बाद अगस्त महीने में वो ए-लीग क्लब सेंट्रल कोस्ट मेरिनर्स से जुड़ें.

धोनी, विराट या रोहित शर्मा, कौन है बेहतर कप्तान ?

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली, हाल ही में एशिया कप में कप्तान की भूमिका निभाते हुए भारत को चैंपियन बनाने वाले रोहित शर्मा और क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, आखिर इनमें से किसकी कप्तानी भारतीय टीम के खिलाड़ियों को सबसे ज्यादा पसंद आती है और किसकी अगुवाई में वे सबसे ज्यादा सहज महसूस करते हैं? आइए जानते हैं कि जब युजवेंद्र चहल से पूछा गया तो उन्होंने इसका क्या जवाब दिया?

एक हिन्दी समाचार पत्र से हुई बातचीत में भारतीय स्पिनर युजवेंद्र चहल ने बताया, ‘तीनों (धोनी, विराट और रोहित) की कप्तानी अलग तरह की है. इन तीनों की कप्तानी की आपस में तुलना नहीं की जा सकती.’ इसके साथ ही चहल ने महेंद्र सिंह धोनी के बारे में अपनी बात रखते हुए इतना तो साफ कर दिया कि कप्तान की भूमिका हो या फिर विकेटकीपर के रूप में मौजूद रहना, माही की मौजूदगी उनके लिए और पूरी टीम के लिए कितना मायने रखती है.

चहल ने धोनी के बारे में बात करते हुए कहा, ‘ धोनी भाई की परख शानदार है. वो विकेट के पीछे रहकर भी बता देते हैं कि गेंदबाज को कोई समस्या है या नहीं. मैच के दौरान जब भी समस्या होती है और किसी सलाह की जरूरत होती है तो मैं धोनी भाई के पास ही जाता हूं. जब भी मैं किसी असमंजस की स्थिति में होता हूं तो वो आगे आकर मेरी समस्या दूर कर देते हैं. ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही नहीं बल्कि बाकी गेंदबाजों के साथ भी है. हम किस्मत वाले हैं कि वो हमारी टीम में हैं.’

गौरतलब है कि एशिया कप के दौरान साफ देखा गया था कि धोनी सिर्फ गेंदबाजों की ही नहीं बल्कि कप्तानी कर रहे रोहित शर्मा की भी पूरी मदद कर रहे थे. फिर चाहे वो फील्डिंग लगानी हो, गेंदबाज चुनना हो या फिर कोई बड़ा फैसला लेना हो. भारत ने एशिया कप फाइनल में बांग्लादेश को हराकर सातवीं बार ये खिताब अपने नाम किया था.

इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने के बाद महंगे हो गए हैं ये सामान

रुपये की लगातार घटती कीमत को काबू में करने के लिए सरकार ने 19 सामानों पर सितंबर से इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी थी. इसके अलावा कई टेलीकौम इक्विपमेंट कंपनियों के शुल्क बढ़ा दिए गए हैं. सरकार का कहना है कि चालू खाते में हो रहे घाटे में कमी करने के लिए ये कदम उठाए गए हैं.  इससे राजकीय कोष में 4,000 करोड़ का फायदा होगा और रूपये की घट रही कीमत में रूकावट आएगी. इसके अलावा स्थानीय निर्माताओं का फायदा होगा. हालांकि सरकार के इस कदम से आम इस्तेमाल की कुछ उत्पादों की कीमतों में तेजी आएगी. आइए जानते हैं कि वो कौन से उत्पाद हैं जिनकी कीमतों में वृद्धि होगी.

मोबाइल फोन

बेस स्टेशन, औप्टिकल ट्रांसपोर्ट इक्विपमेंट, स्विच और आईपी रोडियो जैसे सामान पर आयात शुल्क बढ़ाए गए हैं. ये शुल्क 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 प्रतिशत किया गया है. इससे मदरबोर्ड पर भी आयात शुल्क बढ़ेगा. इसके चलते बाजार में मोबाइल फोन महंगे हो सकते हैं.

गहनें

कीमती धातु जैसे सोना, चांदी में ड्यूटी 15 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दी गई है. इस वजह से गहने भी महंगे होंगे.

फ्रीज और एसी

इन दोनों सामानों पर आयात शुल्क 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है. हालांकि ठंड के कारण लोगों की जेब पर इसका बहुत असर नहीं होगा.

वौशिंग मशीन

10 किलो तक की क्षमता वाले वौशिंग मशीन पर आयात शुल्क बढ़ाकर 10 से 20 प्रतिशत कर दिया गया है. इसके चलते वौशिंग मशीन  भी महंगे होंगे.

फ्लाइट 

एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर सरकार ने 5 प्रतिशत इंपोर्ट ड्यूटी लगा दी है. इसके बाद एविएशन इंडस्ट्री टिकट की कीमत बढ़ाने वाले हैं.

शिवपाल पर मेहरबान योगी सरकार, दिया मायावती का बंगला

शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं. राजनीति में उनको मुलायम का दाहिना हाथ माना जाता है. मुलायम परिवार में आई दूरी के बाद वह समाजवादी पार्टी में अलगथलग पड चुके थे. गंगा यमुना के दोआब में जहां रामायण और महाभारत काल से भाई भाई का सत्ता संघर्ष गवाह रहा है. ऐसे में शिवपाल पर भाजपा सरकार की मेहरबानी नया गुल खिला सकती है.

चुनाव जीतने के लिये केवल अपनी पार्टी पर ही निर्भर नहीं रहा जाता. विरोधी पार्टियों में अनबन का लाभ उठाते हुये वहां भडके असंतोष का लाभ भी लिया जाता है. इसमें दलबदल से लेकर वोट काटने तक के काम होते है. इसे ही राजनीति की भाषा में चुनाव प्रबंध कहा जाता है. एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी इसकी आलोचना करती थी. उसका मानना था कि दलबदल और तोड़फोड़ से लोकतंत्र का नुकसान होता है. इससे राजनीतिक विचारधरा में मिलावट आती है. भाजपा ‘पार्टी विद डिफरेंट’ का नारा देती थी.

1995 तक भाजपा को अपनी पार्टी का यह स्लोगन याद रहा. 1997 के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा ने दलबदल, तोड़फोड़ सहित सरकार बनाने के तमाम रास्तों पर चलना शुरू किया. यह वहीं रास्ते थे जिनको लेकर भाजपा कभी कांग्रेस की आलोचना करती थी.

अब तो भाजपा को न तो कांग्रेसियो से कोई गुरेज रहा न कांग्रेस की परिपाटी से. कांग्रेस की तरह भाजपा ने तोड़फोड़ शुरू की. क्षेत्रिय नेताओं के जनाधर को सीमित करना सीखा और विपरीत विचारधरा के लोगों के साथ भी समझौता शुरू किया. एक तरफ भाजपा ने ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत का नारा जनता को दिया पर खुद ‘कांग्रेस युक्त’ हो गई. अब भाजपा को चुनाव के समय दूसरे दलों में तोड़फोड़ करने का चुनावी प्रबंध रास आ रहा है. 2017 के विधनसभा चुनाव के समय समाजवादी पार्टी के मुलायम परिवार में उठे झगड़े को इसी नजर से देखा जा रहा है. उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसे गहरी साजिश मानते थे. तब कई लोग यह मानते थे कि अखिलेश यादव अपनी कमी छिपाने के लिये यह कह रहे हैं.

2017 के विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव के निशाने पर रहे वही नेता शिवपाल यादव और अमर सिंह जब भाजपा के करीब हुये और वहां से इन नेताओं पर कृपा बरसने लगी तो अखिलेश यादव की बात में दम नजर आने लगा कि मुलायम परिवार गहरी राजनीतिक साजिश का शिकार हुआ था. भाजपा की योगी सरकार ने सपा नेता अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रा वाले बंगले को लेकर जिस तरह के आरोप उन पर लगाये वह अपने आप में अध्ययन का विषय है.

अखिलेश यादव द्वारा खाली किये गये बंगले को दिखाने के लिये मीडिया को भेजा गया. अखिलेश यादव पर नल की टोटी, टाइल्स, गमले, बाथरूम टब और न जाने कितनी कितनी चीजों के तोड़फोड़ का आरोप लगाया गया. भाजपा की उसी सरकार ने समाजवादी पार्टी से नाराज नेता शिवपाल यादव को लखनऊ का सबसे आलीशान बंगला तब आंवटित किया जब शिवपाल यादव ने समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा नाम से अलग पार्टी बना ली.

शिवपाल पर मेहरबानी

शिवपाल यादव के द्वारा समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा बनाने के बाद ही योगी सरकार उन पर मेहरबान नहीं है. योगी के मुख्यमंत्रा बनते ही शिवपाल यादव के साथ उनके संबंध मधुर हो गये थे. शिवपाल की सिफारिश पर उनके रिश्तेदार अफसर के काडर में बदलाव भी किया गया था. शिवपाल यादव के पास लखनऊ में ही विक्रमादित्य मार्ग पर अपना निजी आवास है. इसके अलावा रायल होटल में विधायक के रूप में उनको एक आवास अलग से आंवटित है. ऐसे में एक और बड़े आवास को आंवटित करना योगी सरकार की नेक नियती ही कही जायेगी.

आश्चर्य की बात यह है कि खुद योगी सरकार के कई मंत्री बड़े बंगले की जरूरत महसूस करते हैं. सरकार के एक मंत्री ने बड़े बंगले की इच्छा जताते हुये सरकार को एक पत्र लिखा था. पत्र पर फैसला करने के पहले ही उसको वायरल कर दिया जाता है. जिससे उस मंत्री की किरकिरी हो जाती है और उनका बड़े बंगले का सपना धरा का धरा रह जाता है. शिवपाल यादव ने बड़े बगंले पर अपने दावे को रखते हुए कहा ‘मैं सीनियर हूं. 5 बार का विधायक हूं. अब मुझे टाइप 6 के बंगले की जरूरत है. आईबी की रिपोर्ट पर कि मुझे थ्रेड है. मैने बड़े बंगले के लिये मांग की थी. तब जाकर मुझे बड़ा बंगला आंवटित हुआ है.’ शिवपाल यादव मानते हैं कि उनको यह बंगला मेरिट के आधर पर दिया गया है.

मायावती का बंगला

जनता को यह समझना जरूरी है कि एक बंगला अखिलेश यादव के पास था जिसके चलते उनपर नल की टोटी चोरी का आरोप लगा एक बंगला उनके चाचा शिवपाल यादव को दिया गया जो राजधनी के सबसे आलीशान बंगले में शामिल था. शिवपाल यादव को आंवटित 6 लाल बहादुर शास्त्री मार्ग के इस बंगले की कहानी और गहरी है. यह बंगला बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने बनवाया था. यह उनको पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर मिला था. मायावती ने सरकारी बंगले को अपने हिसाब से आलीशान ढंग से बनवाया था. यह बंगला भव्य निर्माण और साज सज्जा के लिये मशहूर था. कोर्ट के फैसले पर पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में आंवटित इस बंगले को मायावती को छोड़ना पडा तब से कई लोगों की निगाह इस बगलें पर लगी थीं.

बसपा और सपा की बढती दोस्ती के प्रभाव को खत्म करने के लिये शिवपाल यादव ने जब समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा बनाया तो भाजपा ने अपना लाभ देखते हुये शिवपाल यादव को महत्व देना शुरू किया. इसे दिल्ली की राजनीति से जोड़ कर देखा जा रहा है. कारण यह है कि शिवपाल यादव के करीबी नेता अमर सिंह पहले ही भाजपा के करीबी हो चुके है. अखिलेश यादव मुलायम परिवार में विघटन के लिये जिन अंकल को जिम्मेदार मानते थे वह अमर सिंह ही माने जाते है. अमर सिंह और शिवपाल यादव की दोस्ती जगजहिर है. ऐसे में दोनो का एक साथ भाजपा के करीब आना पूरी कहानी बयां कर देता है.

यह माना जाता है कि समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद सबसे अधिक समथर्क शिवपाल यादव के ही हैं. ऐसे में सपा को कमजोर करने के लिये जरूरी था कि शिवपाल यादव को वहां से दूर किया जाये. अब सपा को सबसे पहले समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा से बचना होगा. शिवपाल यादव का यह मोर्चा केवल अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में ही सेंधमारी करेगा. जिसका लाभ भाजपा को मिलेगा. चुनावी मैदान से पहले विरोधी दल को पटकनी देने का यह दांव भाजपा को कितना रास आयेगा यह समय बतायेगा. भाजपा बाहरी नेताओं को महत्व दे रही है जबकि खुद पार्टी के भीतर नेताओं में अपनी उपेक्षा को लेकर क्षोभ बढ रहा है.

बंगले की इस राजनीति पर उत्तर प्रदेश के राज्य संपत्ति विभाग ने सफाई देते हुए कहा कि शिवपाल यादव को जो टाइप 6 का बंगला दिया गया है वैसा बंगला कई दूसरे नेताओं के पास भी है. ऐसे में शिवपाल यादव को अलग से कोई सुविधा नहीं दी गई है. यह बंगला टाइप 6 के दूसरे बगलों से बेहद अलग साजसज्जा और भव्यता वाला है. इसका महत्व इसलिये भी है क्योकि यह बसपा नेता मायावती के बंगले के पास राजनीतिक रूप से बेहद वीवीआईपी कहे जाने वाले मालऐवन्यू में है. राजनीति में कई फैसले अपने समय को लेकर खास हो जाते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव के समय पर किया गया यह फैसला बेहद अहम है. अभी कई ऐसे चौंकाने वाले फैसले देखने को मिलेंगे जिससे साफ होगा कि भाजपा अब ‘पार्टी विद डिपफरेंट’ नहीं रही. चुनाव जीतने की ‘चुनावी प्रंबध कला’ को वह अपना चुकी है.

होमवर्क सहित कई काम होंगे चुटकियों में, डाउनलोड करें ये 4 मोबाइल ऐप

आज के समय में अधिकतर काम स्मार्टफोन्स और इंटरनेट के जरिए हो रहे हैं, तो फिर भला पढ़ाई क्यों न हो? कितना अच्छा हो, यदि स्कूल व कालेज जाने वाले विद्यार्थियों को पढ़ाई में मदद करने के लिए किसी ऐप का साथ मिल जाए? अब विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई-लिखाई से संबंधित कई ऐप इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध हैं. जानिए इसके बारें में-

Istudiez Pro – Legendary Planner  : डे प्लान के लिए यह सबसे विश्वसनीय और बेहतर ऐप माना गया है. इसमें विद्यार्थी शेड्यूल और्गेनाइज कर सकते हैं. साथ ही अपना होमवर्क फौलो करने से लेकर औनलाइन क्लासेज और पेंडिंग पड़े असाइनमेंट तक देख सकते हैं.

MyHomework Student Planner : इससे विद्यार्थी स्कूल के शेड्यूल से लेकर क्लासवर्क और होमवर्क तक का रिकार्ड रख सकते हैं. इसके साथ ही इसमें टेस्ट और एग्जाम से संबंधित रिमाइंडर भी लगाया जा सकता है. यह ऐप एंड्रायड आईओइस और विंडोज के लिए मुफ्त है.

Free Graphing Calculator : यह कैलकुलेशन से संबंधित ऐसी सभी समस्याएं सुलझाता है, जो आम कैलकुलेटर नहीं सुलझा सकता. जैसे- स्क्वेयर रूट से लेकर क्यूब रूट, अर्थमेटिक फंक्शन, नेचुरल लौग आदि. इसके अलावा मुश्किल से मुश्किल ग्राफ बनाने में भी यह काफी मददगार है

Office Lens : यह एक स्कैनर की तरह काम करता है. इसके जरिए विद्यार्थी क्लासरूम में किए गए काम और नोट्स को स्कैन और शेयर कर सकते हैं. खास बात यह है कि यदि विद्यार्थी औफलाइन हैं, तो वे इसकी मदद से ब्लैक बोर्ड या व्हाइट बोर्ड पर लिखे नोट्स की फोटो खींच सकते हैं.

ऐश्वर्या राय ने कुछ इस तरह किया ससुर को बर्थडे विश

ऐक्ट्रेस ऐश्वर्या राय बच्चन की अपने ससुर अमिताभ बच्चन के साथ शानदार बॉन्डिंग है. दोनों के बीच रिश्ता एक ससुर-बहू से ज्यादा पिता-बेटी जैसा है. इसका उदाहरण कई इवेंट्स में भी देखने को मिल चुका है. अपने ससुर को बर्थडे जैसे स्पेशल डे पर विश करने के लिए भी ऐश्वर्या ने खास तरीका चुना.

ऐश्वर्या राय ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अमिताभ बच्चन की फोटो शेयर की जिसमें वह डांस की मुद्रा में एक हाथ उठाए हुए हैं और उनके बगल में आराध्या बच्चन भी खड़ी हैं. इस प्यारी तस्वीर के साथ ऐश्वर्या ने कैप्शन लिखा, ‘हैपी 76वां जन्मदिन दादाजी.’

 

View this post on Instagram

 

??✨HAPPYYY 76th BIRTHDAY Dadaji

A post shared by AishwaryaRaiBachchan (@aishwaryaraibachchan_arb) on

इससे पहले उन्होंने सिर्फ अमिताभ की भी तस्वीर शेयर की जिसमें उनके पीछे हैपी बर्थडे लिखा हुआ है और उसमें आग जल रही है. फोटो के साथ खास मेसेज शेयर करते हुए उन्होंने लिखा ‘आप पर हमेशा यूं ही रोशनी चमकती रहे. हैपी बर्थडे पा.’

 

View this post on Instagram

 

✨MAY THE LIGHT KEEP SHINING GOD BLESS ✨?HAPPY BIRTHDAY PA????✨

A post shared by AishwaryaRaiBachchan (@aishwaryaraibachchan_arb) on

वैसे ऐश्वर्या के अलावा बौलीवुड के कई सितारों ने अमिताभ को उनके बर्थडे के लिए सोशल मीडिया के जरिए बधाई दी. जूही चावला को बिग बी को विश करने का अंदाज काफी जुदा सा रहा. उन्होंने लिखा, ‘रिश्ते में तो आप सबके बाप लगते हैं… हैपी बर्थडे अमित जी.’ अनुपम खेर ने लिखा कि आप मेरी प्रेरणा है. आपसे हमेशा बहुत कुछ सीखने को मिलता है. जन्मदिन की शुभकामनाएं.

‘औक्सफैम बेस्ट फिल्म औन जेंडर इक्वालिटी अवार्ड 2018’ के लिए नौ फिल्में नामांकित

‘जियो 20वें मुंबई फिल्म फेस्टिवल विद स्टार’ (जियो मामी) के लिए ‘औंक्सफैम बेस्ट फिल्म औन जेंडर इक्वालिटी अवौर्ड 2018’ के तीसरे संस्करण के लिए निर्णायक मंडल ने विभिन्न नौ भारतीय भाषाओं की फिल्मों का चयन किया है. विभिन्न भारतीय भाषाओं की यह संजीदा व सशक्त फिल्में समसामायिक समाज पर टिप्पणी करती हैं. इन नौ फिल्मों में से ही ज्यूरी पुरस्कार के लिए कए फिल्म का चयन करेगी.

इस वर्ष औक्सफैम इंडिया ने फिल्मकारों और कलाकारों को ऐसी फिल्में बनाने की चुनौती दी है,  जो फिल्मों में पुरूष व नारी पात्रों के रूढ़िवादी चित्रण से इतर हो. इसी लिए इस बार अवार्ड के लिए थीम है- ‘सिनेमा बियौंड स्टीरियोटाइप’.

मामी फिल्म समारोह सदैव सर्वश्रेष्ठ व गुणवत्ता प्रधान सिनेमा को बढ़ावा देता आया है. 2017 में ‘मामी’ में ‘औक्सफैम बेस्ट फिल्म न जेंडर इक्वालिटी अवार्ड’ जीतने वाली रीमा दास की फिल्म ‘विलेज रौक स्टार’ को न सिर्फ तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिलें,  बल्कि औस्कर में भारत की तरफ से आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भेजा गया है.

इस पुरस्कार के लिए नोमीनेट की गयी नौ फिल्मों में से एक मराठी भाषा की फिल्म ‘इमागो’ है,  जो कि एक शर्मीली किशोर उम्र की लड़की की कहानी है. यह लड़की ल्यूकोडर्मा और इससे जुडे़ सामाजिक कलंक से जूझ रही है. वहीं हिंदी फिल्म ’हामिद’ एक 8 वर्षीय लड़के की नजर से कश्मीरी संघर्ष की पड़ताल करती है. इस फिल्म में इस बालक व उसकी मां यह दो अहम किरदार हैं. वहीं कन्नड़ फिल्म ‘बालेकेम्पा’ एक ऐसे दंपत्ति की कहानी है,  जो संतान पैदा करने में असमर्थ है. जबकि बंगला फिल्म ‘जोना’ की प्यार की तलाश में भटक रही 80 वर्षीय महिला की कहानी है. तो वही इवान अय्यर निर्देशित हिंदी फिल्म ‘सोनी’,  आदीश केलुस्कर द्वारा निर्देशित ‘जाउं कहा बता ए दिल’,  राहुल रिजी नायर निर्देशित ‘लाइट इन द रूम’,  मंसूर निर्देशित कन्नड़ फिल्म ‘नाथिचरामी’ और वसंत एस साई निर्देशित तमिल फिल्म ‘सिवारंजनी एंड टू अदर ओमैन’ के बीच जबरदसत टक्कर होगी.

इस वर्ष ‘औक्सफैम बेस्ट फिम औन जेंडर इक्वालिटी अवार्ड’ की निर्णारूक समिति में रीमा दास के साथ राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री पार्वती और ‘दोहा फिल्म इंस्टीट्यूट’ की सीईओ फातिमा अल रे माही का समावेश है.

औक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर कहते हैं- ‘हम इस बात को लेकर रोमांचित हैं कि इस वर्ष चुनी गयी फिल्मों की संख्या पिछले वर्ष की चार फिल्मों से बढ़ कर नौ हो गई है. यह इस बात का संकेत हैं कि हमारे देश में कंटेंट प्रधान व सामाजिक मुद्दों को उकरने वाली फिल्मों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है. यह दुनियाभर में बदलते सिनेमा का भी प्रतिबिंब हैं. अब भारतीय सिनेमा की कहानियां वर्तमान समय के भारत की सामाजिक व राजनैतिक वास्तविकताओं का दर्पण हैं. अब सिनेमा जाति,  वर्ग और लिंग को लेकर रूढ़िवादी चित्रण को बदल रही हैं. इन्हें समाज और दर्शकों से स्वीकार्यता और सराहना भी मिल रही है. फिल्मों में महिलाएं अपनी बेहतर जगह तेजी से बना रही हैं. यह अवार्ड यथास्थिति की चुनौती देने वाली कहानियों और लोगों की सराहना, जश्न मनाने और समर्थन करने का काम करते हैं. इस बार चयनित फिल्में विभिन्न भारतीय भाषाओं यानी कि कन्नड़,  मराठी, हिंदी, मलयालम, तमिल व बंगला भाषा की हैं. हमारे लिए गर्व की बात है कि पिछले वर्ष की विजेता फिल्म ‘विलेज रौक स्टार’ इस वर्ष औस्कर के लिए भारत की तरफ से भेजी जा रही है.’

इस वर्ष के लिए मामी में ‘औक्सफैम बेस्ट फिल्म औन जेंडर इक्वालिटी अवार्ड 2018’ के विजेता की घोषणा 1 नवंबर 2018 को फेस्टिवल की अंतिम रात को की जाएगी.

जिसके पास भी ताकत होती है, वह दूसरे को कुचलता है : महेश भट्ट

26 साल की उम्र में बतौर निर्देशक के रूप में काम करने वाले निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक महेश भट्ट को सफलता फिल्म ‘अर्थ’ से मिली. इसके बाद उन्होंने कई सफल फिल्में दी. जिसमें सारांश, जानम, सड़क, जख्म आदि हैं. उन्होंने हमेशा नए टैलेंट को बढ़ावा दिया है. उनकी फिल्में कर्णप्रिय गानों के लिए हमेशा जानी जाती रही हैं.

जितना सफल उनका फिल्मी कैरियर था उतना सफल उनका निजी जीवन नहीं था. पहले उन्होंने किरण भट्ट (लारेन ब्राइट) से शादी की, उनसे उनके दो बच्चे पूजा भट्ट और राहुल भट्ट हैं. परवीन बौबी के साथ अफेयर के चलते उनकी शादी टूट गयी. बाद में महेश भट्ट, सोनी राजदान के प्यार में पड़ गए और उनसे शादी की और अब उनके दो बच्चे शाहीन भट्ट और आलिया भट्ट हैं.

महेश भट्ट ने जो भी फिल्में बनायीं, वे फिल्में उनके जीवन से कहीं न कहीं जुडी रहीं. वे फिल्मों में सच्चाई को दिखाने की कोशिश करते हैं. फिल्में हिट हो या फ्लाप उस पर अधिक ध्यान नहीं देते. उनकी हिट फिल्म ‘सारांश’ भी थी, जिसमें उन्होंने अनुपम खेर को पहला मौका दिया था. उनकी फिल्म ‘जलेबी रिलीज हो चुकी है, उनसे मिलकर बात करना रोचक था पेश है अंश.

बांग्ला फिल्म ‘प्राक्तन’ को रीमेक बनाने की कैसे सूझी ?

मुझे वह फिल्म बहुत अच्छी लगी थी. ये माडर्न इंडिया को कनेक्ट करती है, इसमें मैंने उसके कांसेप्ट को लिया है, बाकी हमारे लेखक ने इसे अलग रूप में पेश किया है. जो अलग है. जब मैंने फिल्म ‘अर्थ’ बनायीं थी, तो बहुत लोगों ने मुझे टोका था कि फिल्म ‘सिलसिला’, ये नजदीकियां ये सब एक तरह की फिल्में हैं, जिसमें बड़े-बड़े कलाकार हैं आपकी फिल्म चलना मुश्किल है, पर मेरी फिल्म ‘अर्थ’ चली, क्योंकि मैं जो भी फिल्म बनाता हूं वह मेरे दिल से जुडी होती है. इसलिए इसमें जो सच्चाई होती है वही दर्शकों के दिल को छूती है और 35 साल बाद आज भी लोग ‘अर्थ’ के इस कांसेप्ट से जुड़े हुए हैं. मेरे हिसाब से फिल्म अर्थ के बाद ये मेरी दूसरी सफल फिल्म है.

आपके हिसाब से फिल्मों की कहानियां कितनी बदली है ?

कहानिया अधिकतर हमारे आस-पास के माहौल पर आधारित होती है और आज की औरतों की सोच विचार में काफी परिवर्तन आया है. वे अपने विचार को सबके सामने खुलकर कहने से घबराती नहीं है और ये सही है कि उनमें इतनी हिम्मत आ चुकी है. अभी पुरुषों को सम्हलकर रहने की जरुरत है. फिल्म ‘जलेबी’ मी टू कैम्पेन से प्रेरित है, जहां एक तरफ महिलाओं को देवी मानकर मंदिर में पूजा की जाती है वहीं घर पर उसके साथ अत्याचार या रेप जैसी घिनौनी हरकते की जाती है, और ये वही पुरुष हैं, जो अपने आपको साधू संत कहते हैं.

‘मी टू’ मूवमेंट अभी जोरो पर है, इसमें फिल्म इंडस्ट्री की कई कहानियां, जो अब तक दबी थी, उजागर हो रही है, इस तरह की यौन उत्पीड़न किसी भी क्षेत्र में कितना खतरनाक होता है? आप इसे कैसे लेते हैं?

मैंने इस तरह की कई संदेश के साथ फिल्में बनायीं है. पूजा भट्ट ने कई साल पहले फिल्म ‘तमन्ना’ ऐसी ही कन्या भ्रूण हत्या पर बनायीं थी. उस समय जब मैंने दिल्ली में इसे टैक्स फ्री करने के लिए भेजा तो वहां के वित्त मंत्री ने कहा था कि ये तो भारत में होता ही नहीं है, चीन में होता है. वह रोती हुई बाहर आई थी. यही तो समस्या है कि लोग घर में अपनी पत्नी और बेटी के साथ दुर्व्यवहार करते हैं और बाहर जाकर महिलाओं के कल्याण के लिए भाषण देते हैं. ये अंधापन है. महिलाएं आज भी बसों और ट्रेन में जब सफर करती हैं, तो ऐसे गंदे विचार वाले लोगों से रोज उन्हें अपने आपको बचाना पड़ता है. यौन उत्पीड़न की समस्या किसी रिलेशनशिप पर आधारित नहीं होता. इस समस्या को कोर्ट या कोई सुलझा नहीं सकता है. जब तक आप अपने अंदर क्रांति नहीं लायेंगे, तबतक कुछ भी होने वाला नहीं. यहां तो व्यक्ति ‘मी टू हैश टैग’ का सहारा ले रहा है, पर घरों में जो यौन उत्पीड़न होता है, उसे कोई क्या करेगा? वहां मां ही बेटी को घर की बदनामी के डर से कुछ कहने से मना कर देती है. मैं खुश हूं कि औरतों ने बोलना तो शुरू किया और ये मुबारक लम्हा है और पुरुषों को भी इसका साथ देना चाहिए. आलिया ने फिल्म ‘हाई वे’ के दौरान जब उसे उसकी स्क्रिप्ट मिली, वह रात भर उसे पढ़ती रही. उसने वह फिल्म की और बहुत सारी महिलाओं पर उसका असर पड़ा. आज भी मैं बेटी को कहीं जाने पर उसे क्या करे क्या न करें, उसकी सलाह देता रहता हूं. मेरे हिसाब से ‘मी टू मूवमेंट’ हमारे बदलते भारत की एक अभिव्यक्ति है.

असल में जहां भी किसी को पावर मिलता है, वह दूसरे को कुचलता है और ये सिर्फ पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी कई जगहों पर पुरुषों पर करती है. जब तक आप किसी को जलील नहीं करते, आपको पावरफुल होने का एहसास नहीं होता. इसे बदलने के लिए माडर्न रेवोल्यूशन चाहिए.

आप की फिल्में अधिकतर संगीत के लिए प्रसिद्ध हुआ करती हैं, अब वैसा संगीत न होने की वजह क्या है?

अब दर्शकों की पसंद बदल चुकी है, लेकिन मैं अभी भी फिल्मों में गाने पसंद करता हूं. मैं फिल्मों को सच्चे दिल से बनाने की कोशिश करता हूं.

आप स्पष्ट भाषी हैं इसका प्रभाव आपके काम पर पड़ा?

मैं हमेशा से ऐसा ही हूं, मेरे पिता मेरे साथ नहीं रहते थे. उन्होंने मेरी मां से शादी ही नहीं की थी. मुझे याद आता है कि बचपन में मेरे आस-पास के बच्चे ये कहकर जलील करते थे कि मेरे पिता कहा हैं. मैं कहता था कि वे शूटिंग पर गए हैं. इसपर भी वे मजाक उड़ाते थे कि क्या वे सालों से शूटिंग कर रहे हैं. एक बार मैंने गुस्से में आकर कह दिया था कि मेरे पिता मेरे साथ नहीं रहते. इस पर मां बहुत गुस्सा हुई और बहुत मार पड़ी थी. तब मुझे समझ में आया कि लोग आपको उसी बात से डराते हैं, जिसे आप छुपाते हैं.

इंडस्ट्री में भाई भतीजावाद पर आपकी क्या राय है?

मैंने तो कभी इसका सहारा नहीं लिया मैंने अपनी किसी भी बेटी को लौंच नहीं किया. उन्हें काम करने की आजादी दी है और आज वे सफल हैं. ये सही है कि मेरे परिवार में हम दोनों भाई मिलकर कंपनी चलाते हैं और काम अच्छा होता है, क्योंकि बचपन से हम एक दूसरे को जानते हैं. व्यवसाय में एकजुटता होना जरुरी है.

आपकी फिटनेस का राज क्या है?

मैं शुरू से ही ऐसा ही हूं. मेरा डी एन ए ऐसा है. समय से सब काम करने की कोशिश करता हूं, इसलिए फिट रहता हूं.

कातिल निकली सौतेली मां : मंजीत का ऐसा कौन सा स्वार्थ रह गया

‘‘देखो सरदारजी, एक बात सचसच बताना, झूठ मत बोलना. मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूं कि आजकल तुम अपनी भरजाई पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटा रहे हो. क्या मैं इस की वजह जान सकती हूं?’’ राजबीर कौर ने यह बात अपने पति हरदीप सिंह से जब पूछी तो वह उस से आंखें चुराने लगा.

पत्नी की बात का हरदीप को जवाब भी देना था, इसलिए अपने होंठों पर हलकी मुसकान बिखेरते हुए उस ने राजबीर कौर से कहा, ‘‘तुम भी कमाल करती हो राजी. तुम तो जानती ही हो कि बड़े भाई काबल की मौत हुए अभी कुछ ही समय हुआ है. भाईसाहब की मौत से भाभीजी को कितना सदमा पहुंचा है. यह बात तुम भी समझ सकती हो. मैं बस उन्हें उस सदमे से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा हूं. और फिर भाईसाहब के दोनों बच्चे मनप्रीत सिंह और गुरप्रीत सिंह भी अभी काफी छोटे हैं.’’

हरदीप अपनी पत्नी को प्यार से राजी कह कर बुलाता था.

‘‘हां, यह बात तो मैं अच्छी तरह समझ सकती हूं पर कोई ऐसे तो नहीं करता, जैसे तुम कर रहे हो. तुम्हें यह भी याद रखना चाहिए कि अपना भी एक बेटा किरनजोत है. तुम अपनी बीवीबच्चे छोड़ कर हर समय अपनी विधवा भाभी और उन के बच्चों का ही खयाल रखोगे तो अपना घर कैसे चलेगा.’’ राजबीर कौर बोली.

‘‘मैं समझ सकता हूं और यह बात भी अच्छी तरह से जानता हूं कि मेरी लापरवाही में तुम घर को अच्छी तरह संभाल सकती हो. फिर अब कुछ ही दिनों की तो बात है, सब ठीक हो जाएगा.’’ पति ने समझाया.

कहने को तो यह बात यहीं खत्म हो गई थी पर राजबीर कौर अच्छी तरह जानती थी कि अब आगे कुछ ठीक होने वाला नहीं है. इसलिए उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि जहां तक संभव होगा, वह अपने घर को बचाने की पूरी कोशिश करेगी.

पंजाब के अमृतसर देहात क्षेत्र के थाना रमदास के गांव कोटरजदा के मूल निवासी थे बलदेव सिंह. पत्नी के अलावा उन के 3 बेटे थे परगट सिंह, काबल सिंह और हरदीप सिंह. बलदेव सिंह ने समय रहते सभी बेटों की शादियां कर दी थीं और तीनों भाइयों में जमीन का बंटवारा भी कर के अपने फर्ज से मुक्ति पा ली थी.

अपने हिस्से की जमीन ले कर परगट सिंह ने अपना अलग मकान बना लिया था. काबल और हरदीप अपने पुश्तैनी घर में मातापिता के साथ रहते थे. काबल सिंह की शादी मनजीत कौर के साथ हुई थी. उस के 2 बच्चे थे 13 वर्षीय मनप्रीत सिंह और 12 वर्षीय गुरप्रीत सिंह.

सन 2003 में हरदीप सिंह की शादी खतराये निवासी राजबीर कौर के साथ हुई थी. शादी के बाद उन के घर किरनजोत सिंह ने जन्म लिया था. बच्चे के जन्म से दोनों पतिपत्नी बड़े खुश थे. तीनों भाइयों की अपनी अलगअलग जमीनें थीं. सब अपनेअपने कामों और परिवारों में मस्त थे.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि 24 जून, 2008 को काबल सिंह की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई. इस के बाद तो उस घर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. उस की खेती आदि के काम कोई करने वाला नहीं था क्योंकि उस समय बच्चे भी छोटे थे. तब भाई के खेतों के काम से ले कर उस के दोनों बच्चों की देखभाल का जिम्मा हरदीप सिंह ने संभाल लिया था.

अपनी विधवा भाभी मनजीत कौर से सहानुभूति रखने और उस की मदद करतेकरते हरदीप सिंह का झुकाव धीरेधीरे अपनी विधवा भाभी की ओर होने लगा. हरदीप की पत्नी राजबीर कौर इन सब बातों से बेखबर नहीं थी.

वह समयसमय पर पति हरदीप सिंह को उस की अपनी घरेलू जिम्मेदारियों का अहसास दिलाती रहती थी. पर उस ने इन बातों को ले कर कभी पति से क्लेश या लड़ाईझगड़ा नहीं किया था. वह हर मसले को प्यार और समझदारी से निपटाने के पक्ष में थी और यही बात उस के हक में नहीं रही.

उसे जब इन सब बातों की समझ आई तब पानी सिर से ऊपर गुजर चुका था. उस का पति हरदीप अब उस का नहीं रहा. वह कभी का अपनी विधवा भाभी मंजीत कौर की आगोश में जा चुका था. राजबीर कौर ने जब अपना घर उजड़ता देखा तब उस की नींद टूटी और उस ने इस रिश्ते का जम कर विरोध किया था.

बाद में उस ने इस मसले पर रिश्तेदारों से शिकायत भी की पर कोई नतीजा नहीं निकला. इस पूरे मामले में राजबीर कौर की यह गलती रही कि उस ने अपने पति पर विश्वास करते हुए समय रहते इन सब बातों का विरोध नहीं किया था. शायद उसे पति की वफादारी और अपनी समझ पर भरोसा था. बहरहाल उस का बसाबसाया घर टूट गया था. हरदीप सिंह और राजबीर कौर के बीच तलाक हो गया था. यह सन 2013 की बात है.

राजबीर कौर का हरदीप सिंह से तलाक भले ही हो गया था, पर वह वहीं रहती रही. हरदीप सिंह अपने 9 वर्षीय बेटे किरनजोत सिंह और अपने दोनों भतीजों मनप्रीत सिंह और गुरप्रीत सिंह के साथ मंजीत कौर के साथ रहने लगा था. भाभी के साथ रहने पर लोगों ने कुछ दिनों तक चर्चा जरूर की पर बाद में सब शांत हो गए.

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. सब अपनेअपने कामों में व्यस्त हो गए थे. हरदीप तीनों बच्चों और दूसरी पत्नी मंजीत कौर के साथ खुशी से रह रहा था.

बात 28 जून, 2018 की है. तीनों बच्चों सहित हरदीप और मंजीत कौर रात का खाना खा कर सो गए थे. हरदीप और मंजीत कौर कमरे के अंदर और तीनों बच्चे बाहर बरामदे में सो रहे थे. बिस्तर पर लेटते ही हरदीप को तो नींद आ गई थी पर मंजीत कौर अपने बिस्तर पर लेटेलेटे ही टीवी पर कोई कार्यक्रम देख रही थी. कमरे की लाइट बंद थी पर टीवी चलने के कारण उस कमरे में पर्याप्त रोशनी थी.

रात के करीब 12 बजे का समय होगा कि मंजीत कौर ने अपने कमरे में एक साया देखा. साया कमरे से बाहर की ओर निकल गया था. फिर अचानक मंजीत कौर की नजर कमरे में रखी हुई अलमारी पर पड़ी. अलमारी खुली हुई थी और पास ही सामान बिखरा पड़ा था. यह देख कर वह चौंक गई. घबरा कर उस ने पास में सोए पति हरदीप को जगाया और अलमारी की ओर इशारा किया.

कमरे में चल रहे टीवी की रोशनी में उसे भी खुली अलमारी के आसपास कपड़े आदि बिखरे दिखे. इस के बाद हरदीप ने तुरंत उठ कर घर की लाइट जला दी. वह समझ गया कि घर में चोरी हो गई है. कमरे से निकल कर जब वह बरामदे में पहुंचा तो उस की नजर बरामदे में सोए बच्चों पर गई. वहां मनप्रीत और गुरप्रीत तो सो रहे थे, लेकिन उस का अपना 9 वर्षीय बेटा किरनजोत सिंह गायब था.

यह सब देख कर हरदीप ने चोरचोर का शोर मचाना शुरू कर दिया था. रात के सन्नाटे में उस की आवाज सुन कर पड़ोसी उस के घर आ गए और जब सब को पता चला कि 9 वर्षीय किरनजोत को भी चोर अपने साथ उठा कर ले गए हैं तो सब हैरान रह गए.

किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. ऐसे में किरनजोत को कहां और कैसे ढूंढा जाए. फिर भी समय व्यर्थ न करते हुए सभी लोग रात में ही किरनजोत की तलाश में अलगअलग दिशाओं में निकल पड़े.

पूरी रात किरनजोत की तलाश होती रही. लोगों ने गांव से ले कर मुख्य मार्ग तक भी छान मारा पर वह नहीं मिला. पूरी रात बीत गई थी पर किरनजोत का कुछ पता नहीं चला था. हरदीप सिंह की पहली बीवी यानी किरनजोत को जन्म देने वाली मां राजबीर कौर को जब अपने बेटे के चोरी होने का पता चला तो रोरो कर उस ने अपना बुरा हाल कर लिया था.

किरनजोत को तलाश करतेकरते दिन निकल आया था. बच्चे के न मिलने पर सभी लोग निराश थे. कुछ देर बाद गांव के एक आदमी ने हरदीप सिंह को आ कर यह खबर दी कि किरनजोत की लाश नहर किनारे पड़ी है.

यह सुनते ही हरदीप व अन्य लोग नहर किनारे पहुंचे तो वास्तव में वहां किरनजोत की लाश मिली. कुछ ही देर में गांव के तमाम लोग नहर किनारे जमा हो गए. किसी ने पुलिस को भी खबर कर दी.

सूचना मिलते ही थाना रमदास के थानाप्रभारी मनतेज सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने बच्चे की लाश को अपने कब्जे में ले कर जरूरी काररवाई कर के पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दी और भादंवि की धारा 302 के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद मनतेज सिंह ने हरदीप सिंह के घर का मुआयना किया. हरदीप सिंह से बात करने के बाद पता चला कि उस के घर का कोई सामान चोरी नहीं हुआ था. इस से यही पता लगा कि वारदात को चोरी का रूप देने की कोशिश की गई है.

पुलिस को यह भी पता चला कि कमरे में कोई साया होने की बात सब से पहले हरदीप सिंह की पत्नी मंजीत कौर ने बताई थी, इसलिए थानाप्रभारी ने मंजीत कौर के ही बयान लिए.

थानाप्रभारी मनतेज सिंह को मंजीत के बयानों में काफी झोल दिखाई दे रहे थे. यह बात भी उन्हें हजम नहीं हो रही थी कि कमरे में जागते और टीवी देखते हुए कैसे चोर की हिम्मत हो गई कि वह चोरी करने के साथसाथ बच्चे को भी उठा कर अपने साथ ले गया. भला उस बच्चे से उसे क्या मतलब था और किस मकसद से उस ने बच्चे को अगवा किया था. लाख सोचने पर भी मनतेज सिंह को यह बात समझ नहीं आ रही थी.

तब थानाप्रभारी ने अपने कुछ विश्वासपात्र लोगों को सच्चाई का पता करने पर लगाया. इस बीच अस्पताल में किरनजोत के पोस्टमार्टम के समय उस की मां राजबीर कौर ने खूब हंगामा खड़ा किया. उस ने अपनी जेठानी मंजीत कौर पर आरोप लगाते हुए कहा कि किरनजोत की हत्या के पीछे मंजीत कौर का ही हाथ है क्योंकि वह उसे अपना सौतेला बेटा मानती थी.

राजबीर कौर के आरोप को मद्देनजर रखते हुए पुलिस ने अपने मुखबिरों को सच्चाई का पता लगाने के लिए लगाया. इस के बाद थानाप्रभारी को मंजीत कौर के बारे में जो खबर मिली, वह चौंकाने वाली थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में किरनजोत की मौत के बारे में बताया कि उस की मौत गला घोंटने से हुई थी.

सोचने वाली बात यह थी कि मारने वाले ने बच्चे को घर से उठाया और हत्या के बाद वह उसे नहर के किनारे फेंक आया. इस में इकट्ठे सो रहे तीनों बच्चों में से उस ने किरनजोत सिंह को ही क्यों उठाया.

थानाप्रभारी मनतेज सिंह ने मृतक किरनजोत की मां राजबीर कौर से भी पूछताछ की. राजबीर कौर ने बताया कि 10 साल पहले उस का विवाह हरदीप सिंह के साथ हुआ था.

उस के जेठ काबल सिंह की मौत हो जाने के बाद उस के पति हरदीप सिंह के उस की जेठानी मंजीत कौर से अवैध संबंध हो गए थे. इस कारण उस ने अपने पति को तलाक दे दिया और दूसरा विवाह कर लिया.

उस के पति हरदीप सिंह ने भी उस की जेठानी के साथ शादी कर ली थी. शादी के बाद न तो उस की जेठानी उसे उस के बेटे किरनजोत से मिलने देती थी और न ही वह उसे पसंद करती थी. उसे पूरा यकीन है कि उस के बेटे की हत्या मंजीत कौर ने ही करवाई है.

थानाप्रभारी ने महिला हवलदार सुरजीत कौर को भेज कर मंजीत कौर को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. शुरुआती दौर में वह अपने आप को निर्दोष बताते हुए चोरी की कहानी पर डटी रही पर जब उस से पूछा गया कि क्याक्या सामान चोरी हुआ है तो यह सुन कर वह बगलें झांकने लगी.

थोड़ी सख्ती करने पर उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि उसी ने किरनजोत की गला घोंट कर हत्या की थी और लाश को गोद में उठा कर नहर किनारे फेंक आई. फिर आधी रात को अपने पति हरदीप को जगा कर चोरी वाली कहानी सुनाई थी.

इस की वजह यह थी कि मंजीत कौर को हरदीप और किरनजोत के बीच का प्यार खलता था. वह नहीं चाहती थी कि उस के दोनों बेटों के अलावा उस का पति हरदीप अपनी पहली बीवी से हुए बेटे किरनजोत के साथ कोई भी रिश्ता रखे. पिता का यही प्यार बेटे की मौत का कारण बन गया.

दरअसल हरदीप सिंह तीनों बच्चों से तो प्यार करता था पर वह सब से अधिक अपने किरनजोत को चाहता था. पति के इस प्यार की वजह से मंजीत कौर को यह भ्रम हो गया था कि हरदीप सिंह किरनजोत के बड़े होने पर अपनी सारी जायदाद उसी के नाम कर देगा.

ऐसे में उस के पैदा किए बच्चे दानेदाने को मोहताज हो जाएंगे, जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी. हरदीप ने सपने में भी कभी यह नहीं सोचा था कि मंजीत कौर ऐसा भी कुछ सोच सकती है.

मंजीत कौर के बयान दर्ज करने के बाद किरनजोत सिंह की हत्या के आरोप में उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया. अदालत के आदेश पर उसे जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अपने आप में सिमटती “आप”

किसी भी चुनावी सर्वे और राजनैतिक विश्लेषण तो दूर आम आदमी पार्टी की चर्चा राजनीति के बड़े अड्डों चौराहों और गुंठियों तक पर नहीं है, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ तीनों राज्यों में आप किसी गिनती में नहीं है बावजूद इस हकीकत के कि दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता इन तीनों राज्यों में किसी सबूत की मोहताज नहीं. हर कोई कहता और मानता है कि सीएम हो तो केजरीवाल जैसा जिसने दिल्ली की काया पलट कर रख दी और अकेले अपने दम पर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी जैसे दिग्गज राष्ट्रीय नेताओं की नाक में दम कर रखा है.

यह ठीक है कि आप जिन हालातों में बनी थी वह वक्त की मांग थी और अरविंद केजरीवाल अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की देन थे लेकिन यह अरविंद केजरीवाल की काबिलियत ही थी कि उन्होंने दिल्ली की जनता को निराश नहीं किया और वहां एक बेहतर शासन देने में दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बढ़त हासिल कर ली पर तीन राज्यों में आप की हालत चुनावी हाजिरी भर लगाने की हो गई है तो इसकी वजहें भी हैं.

इनमें से पहली है संगठनात्मक ढांचे का न होना हालांकि आप की इकाइयां जिला और तहसील स्तर तक गठित हो गईं हैं लेकिन आम आदमी को वे समझा पाने में नाकाम रहीं हैं कि आप उनके लिए क्यों जरूरी है. मैदानी और सक्रिय कार्यकर्ताओं का टोटा भी आप में है इससे जुड़े लोगों की कोई खास पकड़ वोटर पर नहीं है. मिसाल मध्यप्रदेश आप के अध्यक्ष आलोक अग्रवाल जिन्हें पार्टी अपना मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर चुकी है को ही लें तो उनका नाम शहरी लोग जानने लगे हैं लेकिन जिस भोपाल दक्षिण सीट से वे लड़ रहें हैं वहां ही उनको लेकर कोई उत्साह या उत्सुकता नहीं है. इस सीट के प्रमुख इलाके शिवाजी नगर के कोई सौ मतदाताओं को जब इस प्रतिनिधि ने टटोला तो सभी का जवाब था कि आप दौड़ में है कहां फिर क्यों उसे वोट देकर वोट जाया करें यह इलाका तो भाजपा का गढ़ है पर इस बार उसकी भी हालत खस्ता है.

यह हालत या जवाब हर विधानसभा सीट पर बराबरी से है. आप अपने प्रत्याशियों के नाम घोषित करती जा रही है लेकिन कोई रेस्पोंस उसे नहीं मिल रहा है. आप की दूसरी कमी मीडिया से दूरी है अब से तीन साल पहले तक आप को तीनों राज्यों में एक सशक्त विकल्प माना जाता था और मीडियाकर्मी आप के पीछे भागते थे पर अब हालत उलट है आप की पत्रकार वार्ताओं में 4-6 पत्रकार ही दिखते हैं.

क्या साजिश की शिकार हुई आप –  आखिर तीन सालों में ऐसा क्या हो गया कि आप की शाम भरी दोपहर में ही होने लगी है. इस सवाल पर बारीकी से गौर करें तो आप की अंदरूनी खामियों के अलावा हालातों की मार और सियासी साजिश की बू भी आती है. कमलनाथ का मध्यप्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनते ही भाजपा से नाउम्मीद वोटरों में यह आस जागी कि कांग्रेस अभी है और पूरे दमखम से है नहीं तो इसके पहले आम लोगों ने कांग्रेस को विकल्प मानना ही छोड़ दिया था. कांग्रेस को भी समझ आ गया था कि इस बार अगर एकजुट होकर लड़ाई नहीं लड़ी तो उसका यह राज्य भी तीसरी ताकतों के हाथ में चला जाएगा.

यानि कांग्रेस का ग्राफ बढ़ना आप के ग्राफ गिरने की बड़ी वजह बनी लेकिन उससे से भी ज्यादा अहम वजह रहे बीती 2 अक्तूबर को वजूद में आए 2 दल सपाक्स और जयस. इनमें से भी सपाक्स एक बड़ा फेक्टर है जो कहने को तो सवर्णों का है और आरक्षण और एससी एसटी एक्ट का विरोध करता है लेकिन यह चर्चा एकदम बेदम नहीं है कि सपाक्स के गठन और उसे रातोंरात मिली शोहरत के पीछे भाजपा और आरएसएस का हाथ है.

aap-to-compete-on-all-assembly-seats-in-madhya-pradesh-and-rajasthan

दरअसल में जैसे ही केंद्र सरकार ने संसद में एससी एसटी एक्ट पर दलितों के सामने घुटने टेके तो देश भर के ऊंची जाति वाले गुस्सा उठे मध्यप्रदेश में इस गुस्से का असर तब दिखा जब 2 अप्रैल की दलित हिंसा के बाद सवर्ण एकजुट होकर सड़कों पर आने लगे. कोई शक नहीं कि सवर्ण भाजपा का परंपरागत वोट बेंक है इसकी नाराजी की कीमत तो अब भी भाजपा को चुकाना तय दिख रहा है पर सपाक्स का चुनावी मैदान में कूद पड़ना एक अलग और अनूठी बात है.

अब सपाक्स भी मध्यप्रदेश की सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ रही है जिसका नुकसान आप को भी उठाना पड़ रहा है नहीं तो 2 अप्रैल की हिंसा के पहले “आप” को सियासी हलक़ों में तीसरी ताकत हर कोई मान रहा था.  यह अंदाजा गलत नहीं था कि बड़ी तादाद में ऐसे वोटर हैं जो भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही पसंद नहीं करते ये अगर आप के खेमे में जाते तो किसी को हैरानी नहीं होती लेकिन सपाक्स के गठन ने ऐसे वोटरों को जाति के नाम पर एक नया  विकल्प दे दिया है.

भगवा खेमे के रणनीतिकार यह गुणाभाग लगाते खुश हैं कि अब सवर्ण वोट तीन हिस्सों में बंट जाएगा जिससे भाजपा की हार जीत पर बड़ा और मारक असर नहीं पड़ेगा. सपाक्स अगर हर सीट पर औसतन तीन हजार वोट भी ले जाती है तो उसमें से एक एक हजार कांग्रेस और आप के हिस्से के भी होंगे. इस गणित का असर भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों से ज्यादा आप पर पड़ा जो इन्हीं एक हजार को दस हजार में तब्दील करते बड़ा उलटफेर कर सकती थी वह मौका उससे छिन गया है.

बहुत हैरतअंगेज तरीके से उभरी आदिवासियों की पार्टी जयस की पूछपरख अगर आप से कहीं ज्यादा है तो उसकी वजह आदिवासियों की एकजुटता है उन्हें इस पार्टी में अपनापन नजर आ रहा है जिसके चलते आदिवासी इलाकों में आप पैर नहीं पसार पा रही खासतौर से मालवा निमाड अंचल में जहां कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुक़ाबला होता आया है. आप यहां कुछ कर गुजर सकती थी लेकिन वह मौका जयस ने झटक लिया है जो भाजपा के वोट ज्यादा काटेगी. अलावा इसके जयस में शिक्षित आदिवासियों की फौज है जिसमें जोश है और आदिवासी इस पार्टी को ठीक वैसे ही चंदा दे रहे हैं जैसे सवर्ण सपाक्स को दे रहे हैं.

यानि आप जाति धर्म या समुदाय के नाम पर लड़ती तो ही यहां कामयाब हो पाती. अगर तुलना दिल्ली से करें तो वहां भी छुआछूत और जातपात है लेकिन इन तीन राज्यों से बहुत कम है. अरविंद केजरीवाल चुनाव के पहले इन तीनों राज्यों में रोड शो करेंगे और उनमें भीड़ भी उमड़ेगी लेकिन यह भीड़ वोटों में तब्दील होगी इसकी उम्मीद कम ही है वजह इन राज्यों में मुद्दा भ्रष्टाचार कम जाति ज्यादा हो गया है जो जानबूझकर बनाया गया है.

ऐसे में आप का भविष्य इन राज्यों में अच्छा तो कतई नहीं कहा जा सकता जिसकी जिम्मेदार आप की राज्य इकाइयां भी कम नहीं जो यह मानते धरने  प्रदर्शन करतीं रहीं की आप को तो दिल्ली और अरविंद केजरीवाल के नाम पर बिना कुछ करे धरे वोट मिल जाएंगे. ये इकाइयां अपनी तरफ झुके वोटों को कायम रखने में नाकाम रहीं हैं जिससे लगता है कि राजनीति में तजुर्बा एक बड़ा फैक्टर होता है और हर राज्य में एक बड़े नाम का होना भी जरूरी है जो कि आप के पास नहीं है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें