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प्यार ने किया शिकार : सुलेखा ने क्यों बनाए परपुरुष से संबंध

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद का एक कस्बा है धाता. यह कस्बा दूध, घी, खोया तथा दूध से बने उत्पादों के लिए मशहूर है. इसी कस्बे में दयाराम यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस का दूध, घी का अच्छा कारोबार था. उस के परिवार में पत्नी मालती के अलावा 2 बेटियां थीं.

दयाराम अपने नजदीक के गांवों से दूध खरीदता, उस से घी और खोया तैयार कर के उसे खागा, धाता, फतेहपुर आदि के थोक बाजारों में बेच देता था. इस काम में दयाराम की बेटियां और  पत्नी भी उस की मदद करती थीं.

वक्त की बयार चलती रही. रेखा और सुलेखा का बचपन किशोरावस्था के सांचे में ढला और निखरता हुआ जवानी में तब्दील हो गया. बेटियां जवान हुईं तो पिता को उन की शादी की चिंता सताने लगी. दयाराम को अपनी बड़ी बेटी रेखा के लिए लड़के की तलाश में अधिक भागदौड़ नहीं करनी पड़ी.

दयाराम ने अपने ही जिले के बिंदकी कस्बे के एक संपन्न खोया व्यापारी घनश्याम के बेटे रामबाबू से रेखा का विवाह कर के मुक्ति पा ली. लेकिन दूसरी बेटी सुलेखा बहुत खूबसूरत थी. इसलिए उस के योग्य लड़का तलाशने में काफी भागदौड़ करनी पड़ी.

ऐसे लड़के की तलाश में उन्हें समय तो जरूर ज्यादा लगा, लेकिन उन के मन मुताबिक एक लड़का फतेहपुर जिले के बेरुई गांव में मिल गया. लड़का था रामसिंह यादव का बेटा दिनेश यादव.

दिनेश अपने 3 भाइयों में सब से बड़ा था. उम्र में वह सुलेखा से बड़ा जरूर था, लेकिन संपन्न था. दिनेश कम उम्र से ही पिता के साथ खेतीबाड़ी करने लगा था. इसी वजह से वह अधिक पढ़लिख नहीं पाया था.

लड़का पसंद आया तो बातचीत आगे बढ़ी. आखिर सुलेखा की शादी दिनेश से हो गई. ससुराल में जिसने भी सुलेखा को देखा सभी ने उस के रूप सौंदर्य की प्रशंसा की. दिनेश भी  सुलेखा को पा कर बहुत खुश था.

समय अपनी गति से गुजरता रहा. धीरेधीरे दोनों की शादी को 8 साल बीत गए. शादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी सुलेखा की गोद नहीं भरी थी.

दिनेश ने सुलेखा का कई डाक्टरों से इलाज कराया. झाड़फूंक के लिए तांत्रिकों, ओझाओं के पास गया, लेकिन उस की कोख में कोई फूल नहीं खिला. इस के बाद घर और बाहर वाले उसे हेय दृष्टि से देखने लगे. जिस सुलेखा को ससुराल वालों ने विवाह के बाद सिरआंखों पर बिठा लिया था, वही अब उसे देख कर नजरें फेरने लगे थे.

घरपरिवार के लोगों का तो उस के प्रति व्यवहार बदला ही, पड़ोसी और मोहल्ले वाले भी उस के नाम पर तरहतरह की बातें करने लगे थे. कोई उसे बांझ तो कोई उसे निपूती कहता था. जहां 2-4 औरतें इकट्ठी होतीं, वहां इस तरह की बातें कुछ ज्यादा ही होती थीं.

एक रोज सुलेखा की उम्रदराज पड़ोसन उस के पास आई और उस ने गर्भवती होने के तमाम उपाय सुझा दिए. इस पर सुलेखा बोली, ‘‘काकी, सारे जतन कर लिए हैं हम ने, अब तो लगता है कि भगवान के घर हमारी सुनवाई नहीं होगी.’’ कहते हुए सुलेखा ने लंबी सांस भर कर छोड़ी.

सुलेखा के चेहरे पर निराशा की परत चढ़ी देख कर उस की पड़ोसन उस की कलाई पकड़ कर एक ओर ले गई. उस ने शरारत से सुलेखा के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘बहू ऐसा तो नहीं कि दिनेश में ही कोई कमी हो? कमी उस में होगी पर भुगतना तुझे पड़ेगा. इस से अच्छा तो यह है कि किसी दूसरे आदमी से बीज दान करा ले.’’

‘‘कैसी बात कर रही हो काकी?’’ सुलेखा ने शर्म से अपना सिर झुका लिया, ‘‘मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं.’’

सुलेखा की पड़ोसन ने यह बात भले ही मजाक में कही थी, मगर इस से सुलेखा के दिलोदिमाग में हलचल मचानी शुरू कर दी. जब भी वह अकेली होती, उस के मन में यही कशमकश रहती कि लोगों के तानों से बचने के लिए क्या उसे किसी परपुरुष की मदद लेनी चाहिए.

इसी बीच अचानक दिनेश के पिता रामसिंह की तबीयत खराब हो गई और उन्होंने चारपाई पकड़ ली. उन की बीमारी की खबर पा कर दिनेश की बुआ का लड़का अनिल उन्हें देखने आया. 30 वर्षीय अनिल कानपुर के मछरिया मोहल्ले में रहता था. वह हृष्टपुष्ट और स्मार्ट था. कपड़े का व्यवसाय करने वाला अनिल सजसंवर कर रहता था.

अनिल हालचाल जानने तो रामसिंह का आया था, लेकिन उस की नजर पड़ गई भाभी सुलेखा पर, जो उस वक्त किसी गहरी सोच में डूबी थी. अनिल ने पहले भी कई बार सुलेखा को देखा था, लेकिन उस रोज उसे सादे लिबास में देखा तो वह उस के दिल को भा गई.

उस ने सुलेखा का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की गरज से कहा, ‘‘भाभी, मुझे नहीं मालूम था कि मामा की तबीयत इतनी ज्यादा खराब है. इन का बदन तो सूख कर कांटा हो गया है.’’

‘‘तुम्हारे भैया ने दवादारू में तो कोई कसर नहीं छोड़ी है. फिर भी पता नहीं क्यों दिनबदिन कमजोर होते जा रहे हैं.’’ नजरें उठा कर सुलेखा ने निराश भाव से कहा.

‘‘नाना जी का ध्यान रखिएगा भाभी, अगर मेरे लायक कोई काम हो तो जरूर बताना.’’ अनिल ने चाहतभरी आंखें सुलेखा की आंखों में डाल दीं.

सुलेखा सिहर सी गई. अनिल काफी देर वहां बैठा रहा. इस दौरान सुलेखा की चोर निगाहें अनिल के मजबूत बदन पर पड़ीं तो उसे पड़ोसन वाली सलाह याद आ गई. सुलेखा ने अपने पति से सुन रखा था कि अनिल की पत्नी मानसिक रोगी थी, जिसे उस ने छोड़ रखा था. अनिल में सुलेखा की दिलचस्पी जागी तो पूछ बैठी, ‘‘तुम्हारी घर वाली के अब क्या हाल हैं?’’

पत्नी का नाम सुनते ही अनिल का चेहरा उतर गया. उस ने नाकभौंह सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘भाभी, वह मेरी जिंदगी की नासूर थी. अब जैसी भी होगी, अपने मायके में होगी. और वैसे भी हर किसी के भाग्य में आप जैसी सुंदर और सुशील बीवी तो होती नहीं.’’ कह कर उस ने एक बार फिर सुलेखा को भरपूर नजरों से देखा.

सुलेखा को उस की नजरों में चाहत दिखी.

उस रोज के बाद अनिल मामा का हाल जानने के बहाने अकसर दिनेश के घर आने लगा. जब भी वह आता काफी देर तक सुलेखा के पास बैठ कर इधरउधर की बातें करता. उस की रसीली बातें सुलेखा के दिलोदिमाग पर हलचल मचा देतीं. इस बीच सुलेखा के पति दिनेश के स्वभाव में एक विचित्र सा परिवर्तन आ गया था.

संतान सुख से वंचित होने की मानसिकता ने उस के मन में निराशा भर दी थी, जिस के चलते उस ने शराब पीनी शुरू कर दी थी. सुलेखा में भी उस की रुचि कम हो गई थी. इस से सुलेखा के स्वभाव पर भी फर्क पड़ा. बिस्तर की तन्हाई उसे जलाने लगी थी, जिस से वह चिड़चिड़ी सी हो गई थी.

हालात धीरेधीरे सुलेखा को पतित करने की भूमिका बनाने लगे थे. एक तरफ संतान की चाहत से वंचित और पति की उपेक्षा तो दूसरी तरफ परपुरुष का आकर्षण.

एक रोज सुलेखा घर का कामकाज निपटा कर आराम करने जा रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई. सुलेखा ने दरवाजा खोला तो सामने अनिल खड़ा था. उसे देख कर वह खुश होते हुए बोली, ‘‘अरे, अनिल तुम. अंदर आओ.’’

सुलेखा ने दरवाजा अंदर से बंद किया फिर मन ही मन खुश हो कर कमरे में आ गई. तभी अनिल ने उस की कलाई थाम ली और आंखों में अथाह चाहत तथा उन्माद भर कर बोला, ‘‘भाभी, तुम भी अधूरी, मैं भी अधूरा. आज इस अधूरेपन को पूरा करने का मौका है.’’

सुलेखा ने न अपना हाथ छुड़ाया और न कोई विरोध किया, बल्कि अनिल के स्पर्श से उस के बदन पर चीटियां सी रेंगने लगी थीं. अनिल को अब सब्र कहां था. बेसब्री के आलम में उस ने सुलेखा का चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में भरा और उस का निचला होंठ अपने होंठों में भर कर चूसने लगा.

‘‘बहुत दिनों से प्यासे लगते हो.’’ सुलेखा ने उस की गरदन में अपनी बांहें फंसाते हुए कहा.

‘‘हां भाभी.’’ कह कर अनिल उस के नाजुक अंगों को सहलाने लगा, ‘‘आज मेरी प्यास बुझा दो.’’

इस के बाद दोनों ने अपनी हसरत पूरी कर ली.

एक बार अवैध संबंधों का यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर अकसर चलने लगा. हालांकि दोनों ने अपने इस अवैध रिश्ते को छिपाने की भरपूर कोशिश की. लेकिन कहावत है कि पाप चाहे कितना भी छिप कर किया जाए, उजागर हो ही जाता है.

ऐसा ही अनिल और सुलेखा के साथ भी हुआ. एक दिन दिनेश इंजन के लिए डीजल खरीदने फतेहपुर के लिए निकला. उस के निकलते ही अनिल आ गया. आते ही अनिल ने सुलेखा को बाहों में भर लिया.

सुलेखा ने किसी तरह अनिल की बांहों से मुक्ति पाई फिर बोली, ‘‘सब्र किया करो अनिल. आते ही भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़ते हो. आज हमारे पास पूरा दिन है. तुम्हारे भैया डीजल खरीदने गए हैं. वहां से देर शाम तक ही लौटेंगे.’’

सुलेखा की बात सुन कर अनिल खुश हो कर बोला, ‘‘ठीक है, फिर तो पूरा दिन मस्ती करेंगे.’’ कह कर अनिल, कमरे में बैठ कर कोई किताब पढ़ने लगा और सुलेखा सजनेसंवरने लगी.

कुछ देर बाद सुलेखा सजधज कर कमरे में आई तो अनिल उसे देखता ही रह गया. वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. अनिल ने उस की सुंदरता की जम कर तारीफ की तो वह मन ही मन खुश हुई और अनिल के साथ मस्ती में डूब गई.

दोनों का खेल चल ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई. दस्तक से अनिल और सुलेखा घबरा गए. उन्होंने सोचा कहीं दिनेश तो वापस नहीं आ गया. सुलेखा सोच ही रही थी कि बाहर से आवाज आई, ‘‘दरवाजा खोल सुलेखा. क्या घोड़े बेच कर सो रही है?’’

दरअसल दिनेश पैसे घर में ही भूल गया था. इसलिए उसे बीच रास्ते लौटना पड़ा था.

सुलेखा ने पति की आवाज सुनी तो वह घबरा गई. वह घुटी सी आवाज में बोली, ‘‘आ रही हूं.’’ उस ने जैसेतैसे कपड़े लपेटे और दरवाजा खोला. देर से दरवाजा खोलने और सुलेखा की घबराहट व छितरे बालों से दिनेश समझ गया कि दाल में कुछ काला जरूर है. दिनेश अंदर आया तो कमरे में अनिल बैठा था. बैड की अस्तव्यस्त चादर और टूटी चूडि़यां काफी कुछ बयां कर रही थीं.

इस के बाद तो दिनेश का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने अनिल व सुलेखा की पिटाई कर दी. अपराधबोध के कारण दोनों ने पिटाई का विरोध नहीं किया.

कुछ देर बाद जब दिनेश का गुस्सा शांत हुआ तो उस ने अनिल व सुलेखा को ऊंचनीच का वास्ता दे कर समझाया भी. समझाने पर दोनों ने दिनेश से माफी मांग ली और आइंदा गलती न दोहराने का वादा किया.

उन्होंने वादा तो कर लिया था लेकिन वह ज्यादा समय तक अपने वादे पर कायम नहीं रह सके. रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद कुछ दिन तक तो दोनों एकदूसरे से दूरी बनाए रहे किंतु बाद में उन्होंने फिर से पहले की तरह मिलना शुरू कर दिया. लेकिन अब वह बेहद सतर्कता बरतने लगे थे. सुलेखा को जब भी मौका मिलता वह अनिल को फोन कर के घर बुला लेती थी.

इसी दौरान एक घटना और घट गई. दिनेश को बैंक से नोटिस मिला कि वह कर्ज की किस्तें चुकाए अन्यथा उस की आरसी कट जाएगी. इस के लिए उसे जेल भी जाना पड़ सकता है. बैंक नोटिस मिलने से दिनेश घबरा गया. फसल खराब हो जाने से वह कर्ज नहीं चुका पा रहा था. फलस्वरूप दिनबदिन उस पर कर्ज बढ़ता जा रहा था.

सुलेखा भी परेशान हो उठी. उस ने इस बाबत अपने प्रेमी अनिल से बात की तो वह उस की मदद के लिए तैयार हो गया. पर वह चाहती थी कि पैसे लेने की बात दिनेश ही अनिल से करे.

एक दिन दिनेश कर्ज को ले कर ज्यादा परेशान दिखा तो सुलेखा ने पति को सुझाव दिया कि वह अनिल से पैसे उधार ले कर बैंक की किस्तें चुका दे. फसल कटने पर अनिल का पैसा चुका देंगे. पत्नी का यह सुझाव दिनेश को पसंद आया.

उस ने सुलेखा की मार्फत अनिल को घर बुलाया. दिनेश ने बैंक के कर्ज वाली परेशानी बता कर अनिल से पैसे उधार मांगे. अनिल ने पहले तो कुछ नखरे दिखाए फिर पैसा देने को राजी हो गया.

दिनेश ने अनिल से पैसे ले कर बैंक कर्ज चुका दिया और राहत की सांस ली. इस के बाद अनिल का सुलेखा के घर बेरोकटोक आनाजाना होने लगा. अब वह वहां रात को भी ठहरने लगा. अनिल ने दिनेश को पीने की लत भी डाल दी थी. दिनेश अब अनिल के अहसानों तले इतना दब गया था कि वह उस के रात में ठहराने के लिए भी मना नहीं कर सकता था.

अनिल की महफिल सप्ताह में 2-3 दिन दिनेश के यहां जमने लगी थी. दिनेश को मुफ्त में शराब व गोस्त की दावत मिलने लगी तो वह भी खुश रहने लगा. अनिल, शराब पीने के दौरान दिनेश को ज्यादा नशे में कर देता, जिस की वजह से कभीकभी तो वह खाना खाए बिना ही चारपाई पर लुढ़क जाता और खर्राटे भरने लगता. इस के बाद अनिल व सुलेखा रात भर मस्ती करते.

अनिल का दिनेश के घर आना और रात में रुकना पासपड़ोस के लोगों को खलने लगा तो वे कानाफूसी करने लगे. एक रोज पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग रामदत्त ने उसे टोका, ‘‘दिनेश, तुम रातदिन नशे में डूबे रहते हो. घर में तुम्हारी लुगाई क्या गुल खिलाती है, तुम्हें पता भी है. बेटा जानबूझ कर अनजान मत बनो. अनिल का तुम्हारे घर आनाजाना और रात में रुकना ठीक नहीं है. उन दोनों पर नजर रखो. तुम्हें खुद ही सब पता चल जाएगा.’’

दिनेश शराबी जरूर था, लेकिन मूर्ख नहीं था. रामदत्त चाचा की बात उस के कलेजे को चीरते हुए निकल गई. अब वह दोनों पर नजर रखने लगा. एक रोज अनिल दिनेश के घर आया तो उस ने शराब पीने से इनकार कर दिया.

वह अपने साथ पीनेपिलाने का सामान लाया था. उस ने पीने के लिए दिनेश को बुलाया तो उस ने बताया कि वह पहले से नशे में है. एक दोस्त के साथ खापी कर आ रहा है.

इस के बाद दिनेश सोने का बहाना कर चारपाई पर लेट गया. कुछ देर बाद दिनेश खर्राटे भरने का नाटक करने लगा तो अनिल व सुलेखा हर बार की तरह निश्ंिचत हो गए. फिर दोनों वासना का खेल खेलने लगे. आधी रात को दिनेश की आंखें खुलीं तो देखा कि सुलेखा कमरे में नहीं है.

वह दबे पांव कमरे के बाहर आंगन में पहुंच गया. आंगन में आते ही दिनेश के कदम ठिठक गए. आंगन से सटे कमरे से फुसफुसाहट और चूडि़यों की खनक की अवाज आ रही थी. दिनेश सधे कदमों से कमरे के पास पहुंच गया. दरवाजा उढ़का हुआ था. उस ने धकेला तो खुल गया. कमरे में अनिल और सुलेखा निर्वस्त्र थे.

सुलेखा को अनिल के साथ रंगरलियां मनाते देख दिनेश की मर्दानगी जाग उठी. उस ने दोनों को जलील किया. फिर सुलेखा की जम कर पिटाई की. दिनेश कुल्हाड़ी ले कर अनिल की तरफ बढ़ा तो वह जान बचा कर भाग गया. अब दिनेश की समझ में आ गया था कि अनिल उस पर क्यों मेहरबान था. क्यों उसे कर्ज दिया और क्यों उसे शराब और गोस्त की दावत देता था.

इधर रंगेहाथों पकडे़ जाने के बाद भी अनिल ने सुलेखा के घर आनाजाना बंद नहीं किया था. अब वह कर्ज मांगने के बहाने आता था. यद्यपि दिनेश अनिल के आने का विरोध करता था और उसे जलीकटी भी सुनाता था लेकिन अनिल, सुलेखा के शरीर को पाने की चाहत में सब सहन कर लेता था.

अब अनिल जब भी सुलेखा के घर आता, घर में जम कर कलह होती थी. सुलेखा को वह जलील करता अैर उस पर कड़ी नजर रखता, जिस से सुलेखा और अनिल का मिलन नहीं होता था. अनिल झुंझला कर वापस चला जाता था. अनिल के जाते ही दिनेश सुलेखा पर टूट पड़ता और उसे बेरहमी से पीटता था. वह चीखतीचिल्लाती तो लोग इकटठा हो जाते थे.

पति की प्रताड़ना से सुलेखा परेशान हो चुकी थी. अत: एक रोज जब अनिल उस के घर आया तो वह झुंझला कर बोली, ‘‘तुम कैसे मर्द हो. तुम्हारे आने से वह मुझे जानवरों की तरह पीटता है और गालियां देता है. तुम उस का कुछ नहीं कर पा रहे हो. धिक्कार है तुम्हारी ऐसी मर्दानगी पर.’’

सुलेखा ने प्रेमी की मर्दानगी को ललकारा तो अनिल बोला, ‘‘भाभी, मेरी मर्दानगी को मत ललकारो. मैं अब भी तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर सकता हूं. तुम्हारे इशारे पर किसी की जान ले भी सकता हूं और अपनी जान दे भी सकता हूं.’’

‘‘तो फिर प्यार में रोड़ा बने दिनेश को हटा क्यों नहीं देते. कब तक मैं तुम्हारे लिए मार खाती रहूं. कब तक उस की प्रताड़ना सहूं.’’ कहते हुए उस की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘ठीक है भाभी, तुम्हारे लिए मैं यह काम भी करने को तैयार हूं. अब तुम्हें न तो मार खानी पड़ेगी और न ही प्रताड़ना सहनी होगी.’’ इस के बाद अनिल व सुलेखा ने दिनेश की हत्या की योजना बना ली.

8 जुलाई, 2018 को अनिल, सुलेखा को अपने साथ मछरिया (नौबस्ता) ले आया. दिनेश को जब पता चला तो वह भी मछरिया पहुंच गया. मछरिया में दिनेश ने हंगामा खड़ा कर दिया.

उस ने अनिल के घर वालों को बताया कि अनिल और सुलेखा के बीच नाजायज संबंध हैं. दोनों ने उस का जीना हराम कर दिया है. अनिल के घर वालों ने किसी तरह दिनेश को समझाया और दूसरे रोज सुलेखा को उस के साथ भेजने का वादा कर दिया.

9 जुलाई की शाम को अनिल अपने दोस्त की कार ले आया. इसी कार में सवार हो कर अनिल, सुलेखा व दिनेश गांव बेरुई के लिए निकले. सरसौल कस्बा पार करने के बाद अनिल ने कार महौली गांव की ओर मोड़ दी. दिनेश के टोकने पर अनिल बोला कि महौली गांव के पास कोल्ड स्टोरेज है. वहां उस का दोस्त काम करता है, उस से मिलना है. यह सुन कर दिनेश चुप हो गया.

अनिल ने महौली गांव से पहले एक सुनसान जगह पर गाड़ी रोक दी. फिर वह पिछली सीट पर आ गया, जहां दिनेश और सुलेखा बैठे थे. सुलेखा को ले कर दिनेश व अनिल के बीच फिर से कहासुनी होने लगी.

इसी बीच दिनेश ने सुलेखा का हाथ पकड़ लिया और कार से उतर कर साथ चलने की जिद करने लगा. सुलेखा कार से नहीं उतरी तो दिनेश ने उसे 2 थप्पड़ जड़ दिए. तिलमिला कर सुलेखा बोली, ‘‘देखते क्या हो अनिल. आज इस राक्षस को सबक सिखा ही दो.’’

तब तक अंधेरा छा गया था. अनिल व सुलेखा ने कार में ही दिनेश को दबोच लिया और अंगौछे से दिनेश का गला घोंट दिया. उस की हत्या करने के बाद उन्होंने शव को कोल्ड स्टोरेज के पास झाडि़यों में फेंक दिया. इस के बाद दोनों फतेहपुर आ गए. रास्ते में उन्होंने एक ढाबे पर खाना खाया. खाना खाने के बाद अनिल, सुलेखा को उस की ससुराल बेरुई छोड़ कर कानपुर आ गया.

अगले दिन सुबह 10 बजे महौली गांव के कुछ बच्चे बकरियां चरा रहे थे, तभी उन्होंने झाडि़यों में एक युवक की लाश पड़ी देखी. बच्चों ने भाग कर गांव वालों को बताया तो वहां गांव वालों की भीड़ जुट गई. इसी बीच गांव के सरपंच धनीराम ने लाश पड़ी होने की सूचना थाना महाराजपुर पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी रामविलास वर्मा पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने ग्रामीणों से लाश के बाबत पूछा. लेकिन कोई भी लाश को नहीं पहचान सका. शव की तलाशी ली गई तो जेब में आधार कार्ड मिला जिस में उस का नाम दिनेश, पिता का नाम रामसिंह, पता गांव बेरुई फतेहपुर लिखा था.

थानाप्रभारी ने तत्काल दिनेश की हत्या की जानकारी उस के घर वालों को दे दी और मौके की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया.

हत्या की खबर पा कर सुलेखा व अन्य लोग पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए. सुलेखा पति की लाश देख कर घडि़याली आंसू बहाने लगी. लेकिन साथ आए लोगों ने थानाप्रभारी को बताया कि पति की हत्या का राज सुलेखा के पेट में ही छिपा है.

यह जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी सुलेखा को हिरासत में ले कर थाना महाराजपुर आ गए. महिला एसआई ममता सिंह ने सुलेखा से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई. उस ने बताया कि उस ने अपने प्रेमी अनिल की मदद से पति दिनेश की हत्या कर के लाश झाडि़यों में फेंक दी थी.

पुलिस ने सुलेखा के प्रेमी अनिल को पकड़ने के लिए उस के मछरिया स्थित घर पर छापा मारा. पुलिस को देख कर अनिल भागा भी, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया. थाना महाराजपुर में जब उस का सामना सुलेखा से हुआ तो वह समझ गया कि अब चुप रहने से कुछ नहीं होगा.

उस ने बड़ी आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. अनिल ने बताया कि सुलेखा से उस के नाजायज संबंध थे. उस का पति संबंधों में बाधक था, इसलिए उसे रास्ते से हटाना पड़ा. अनिल की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त कार व अंगौछा भी बरामद कर लिया.

चूंकि दिनेश की हत्या का जुर्म दोनों ने कबूल कर लिया था, अत: पुलिस ने सरपंच धनीराम को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत अनिल व सुलेखा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और दोनों को कानूनी रूप से गिरफ्तार कर लिया.

इस के बाद 12 जुलाई, 2018 को पुलिस ने अभियुक्त अनिल व सुलेखा को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से दोनों को जिला कारागार भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत स्वीकृत नहीं हुई थी. मामले की जांच थानाप्रभारी रामविलास वर्मा कर रहे हैं.

बिखर गई मैं

हो कर दूर बिखर गई मैं,

माला से टूट बिखर गई मैं.

थी मेरी पहचान भी कोई,

था मेरा अरमान भी कोई,

हुआ चूर वजूद जो मेरा,

इस भीड़ में, किधर गई मैं.

जब से मेरा ध्यान है टूटा,

मुझ से मेरा हर काम है छूटा,

अब तेरे रंग में रंगी हुई है,

अपने रंग से नितर गई मैं.

अर्पित जीवन का तुम को हरपल,

मन में उठी हलचल हर क्षण,

तोड़ के हर रिश्ते का बंधन,

अपनेआप से बिगड़ गई मैं.

आ जाओ अब तुम जीवन में,

देख रही हूं मैं दर्पण में.

उठतीगिरती बहती लहरें,

जाने क्याक्या कहती लहरें,

गूंज रहा बस शोर तुम्हारा,

बाकी सबकुछ बिसर गई मैं,

माला से टूट बिखर गई मैं.

– गीता उपरैती गुप्ता

हिचकोले खाता हवाई सफर : झूठे लगते हैं हवाई सपने

सस्ते किराए वाली एयरलाइंसों के आने से सरकारी ‘उड़ान’ स्कीम जैसी योजनाओं के चलते हवाई चप्पल वालों को भी हवाई सफर का सपना काफी समय से दिखाया जा रहा है. पर क्या यह अब मुमिकन है? एक तरफ बदहाल ‘महाराजा’ यानी एयर इंडिया सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद बिक नहीं रहा है, उधर ठसाठस भरे विमानों के बावजूद अच्छी मानी जाने वाली निजी एयरलाइंसों के बढ़ते घाटे के कारण, पसीने छूटने लगे हैं.

जानीमानी एयरलाइंस जेट एयरवेज के कर्ताधर्ता नरेश गोयल ने तो साफतौर से अपने शेयरधारकों से तब माफी मांग ली, जब उन की कंपनी के शेयर

60 फीसदी से नीचे चले गए. खबर यह भी आई थी कि जेट एयरवेज के पास एयरलाइंस चलाने के लिए 60 दिनों से ज्यादा का पैसा नहीं बचा है और इस के लिए कर्मचारियों के वेतन में कटौती हो सकती है. हालांकि आधिकारिक रूप से इन खबरों का खंडन किया गया लेकिन कंपनी के मालिक द्वारा शेयरधारकों से माफी मांगने के बाद साफ हो गया कि वहां सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.

कुछ ऐसा ही हाल इंडिगो और स्पाइस जेट जैसी एयरलाइंसों का भी दिखा, जब इन के शेयर गर्त में जाने लगे. सिर्फ प्राइवेट ही नहीं, सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया में भी ऐसे ही सवाल उठे. वहां पायलटों के संगठन इंडियन कौमर्शियल पायलट्स एसोसिएशन यानी आईपीसीए ने एयरलाइंस के प्रबंधन से पूछा कि क्या उन के पास एयरलाइंस के संचालन और मेंटिनैंस के लिए पर्याप्त धन है.

यह सवाल खासतौर से तब उठता है कि जब इन निजी एयरलाइंसों के विमानों में यात्रियों की संख्या में कोई कमी न दिखे और नजदीकी भविष्य में उन के पैसेंजरों में कमी आने की कोई आशंका न हो.

बढ़ते यात्री, घटती कमाई

भारत को उन देशों में गिना जाता है, जहां जहाज से उड़ने वालों की संख्या में तेज इजाफे की संभावना है. आंकड़ों को देखें तो ऐसा लगातार हो भी रहा है. जैसे, वर्ष 2018 की पहली छमाही यानी जनवरी से जून में घरेलू विमान यात्रियों की संख्या ने अब तक के सारे रिकौर्ड तोड़ दिए और यह करीब 6 करोड़ 80 लाख रही. यह संख्या पिछले साल की पहली छमाही के मुकाबले 22 प्रतिशत ज्यादा थी. इस बढ़ोतरी को अंतर्राष्ट्रीय निगरानी संस्थाएं भी दर्ज कर रही हैं.

इंटरनैशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने इस का जो हिसाब लगाया है, उस के अनुसार अमेरिका, चीन जैसे देशों के मुकाबले भारत में घरेलू विमानन टै्रफिक तेजी से बढ़ा है. इस संस्था का आंकड़ा है कि वर्ष 2018 की पहली छमाही तक चीन में 12 प्रतिशत यात्री बढ़े, अमेरिका में साढ़े 5 प्रतिशत जबकि भारत में 17 प्रतिशत. यही नहीं, पिछले 4 वर्षों से यानी 2014 से लगातार भारत में एविएशन सैक्टर करीब 10 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. इस बढ़ोतरी की अहम वजह यह है कि भारत में अभी भी महज 2 से 3 फीसदी लोग ही विमान यात्राएं करते हैं. जबकि लोग कई बार ट्रेनों में समान दूरी के लिए ज्यादा किराया  देते हैं. लेकिन वे या तो जानकारी के अभाव में या फिर किसी संकोच के कारण विमान से यात्रा नहीं करते. इन में से ज्यादातर को यही लगता कि हवाई जहाज एक महंगी सवारी है और यह सिर्फ अमीरों के लिए है.

सरकार ने हालांकि लोगों की इस सोच को बदलने के लिए ‘हवाई चप्पल में हवाई सफर’ जैसा नारा दिया और वर्ष 2015 में नई सिविल एविएशन पौलिसी का ड्राफ्ट जारी करते हुए विमान किराए कम करने और देश के 300 बंद पड़े छोटेमोटे हवाई अड्डों का इस्तेमाल शुरू करने का इरादा जाहिर किया.

सरकार ने उड़ान योजना के तहत एक योजना पेश की कि देश के अंदर किसी भी हवाई यात्रा का खर्च 2,500 रुपए प्रति घंटे से ज्यादा न हो. हालांकि इस योजना का असर दिखने में अभी वक्त लग सकता है क्योंकि बंद हवाई अड्डों को चालू कराना और निजी एयरलाइंस को उन रूटों पर जाने के लिए प्रेरित करना आसान नहीं है.

वैसे भी देश में प्राइवेट एयरलाइंसें मुनाफे वाले 5-7 रूटों पर ही रहना चाहती हैं. इस कारण कई ऐसे शहर छूट जाते हैं, जहां कारोबारी गतिविधियां तेज हुई हैं और पैसेंजर्स भी काफी मिल सकते हैं. पर इस के लिए जरूरी है कि वहां अच्छे हवाई अड्डे और अन्य सुविधाएं उपलब्ध हों.

निजी एयरलाइंसों की विस्तार योजनाओं पर नजर डालने से लगता है कि वे भारत में विमान यात्रियों की बढ़ती तादाद का फायदा उठाना चाहती हैं. जेट एयरवेज की ही बात करें तो उस की योजना अगले एक दशक में 225 नए बोइंग 737 विमान खरीदने की है. इस के अलावा इंडिगो 40 नए विमान खरीदने की योजना बना रही है, जिन में से 25 एयरबस होंगी. उधर, स्पाइसजेट अपने फ्लीट में 10 नए विमान शामिल करने की तैयारी कर रहा है.

सवाल है कि जब लगभग सभी निजी एयरलाइंसों की विस्तार की योजना तैयार है, उन के विमानों में यात्री ठसाठस भरे हैं तो वे इधर लगातार घाटा क्यों दिखाने लगी हैं? जैसे, जेट एयरवेज ने पिछले साल की आखिर तिमाही में घाटा दिखाया तो इंडिगो ने बताया कि इस साल अप्रैलजून में उस का मुनाफा पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 97 प्रतिशत गिर गया. घाटे के इन्हीं हालात के मद्देनजर जेट एयरवेज से ले कर दूसरी सभी एयरलाइंसों में विचार चल रहा है कि फायदा बढ़ाने के लिए खर्च में कटौती की जाए.

चूंकि प्रतिस्पर्धा के चलते टिकट की कीमतें बढ़ाई नहीं जा सकतीं, इसलिए सारा जोर पायलटों, कर्मचारियों की सैलरी, रखरखाव आदि में कटौती पर रहता है.

घाटा, घाटा और घाटा

कभी मौनसून सेल तो कभी न्यू ईयर सेल के नाम पर 1,000-1,500 रुपए के टिकट बेचने वाली निजी एयरलाइंसों के बारे में सवाल यह है कि अगर घाटा है तो 5,000 का टिकट 1,000 में क्यों बेचा जा रहा है. यही नहीं, वर्ष 2016 तक यही एयरलाइंस जम कर मुनाफा काट रही थीं, तो अब ऐसा क्या हो गया जो उन के बारे में कथिततौर पर कई अफवाहें उड़ने लगी हैं.

असल में इस की एक बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होना है. खासतौर से विमान का ईंधन यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी एटीएफ जिस ब्रेंट क्रूड औयल से बनता है, उस की कीमत 2018 के पहले 6 महीनों में 16 प्रतिशत बढ़ गई थी. इस से एटीएफ महंगा हो गया, विमान संचालन की लागत में जिस की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत होती है. इस में कोढ़ में खाज के हालात अमेरिकी डौलर के मुकाबले लगातार गिरते रुपए ने पैदा कर दिए.

रुपया ऐतिहासिक ढंग से रसातल में पहुंच गया, जिस से डौलर में खरीदे जाने वाले तेल की महंगाई और बढ़ गई. कमजोर रुपए का असर एयरलाइंस के कर्ज को चुकाने, मरम्मत के लिए पुर्जे मंगाने, विदेशी पायलटों की सैलरी देने, नए विमान खरीदने और संचालन लागत आदि पर पड़ता है. एक अन्य अहम वजह सस्ते एयर टिकट भी हैं. ध्यान रहे, ज्यादातर घरेलू उड़ानों में महज 2 फीसदी टिकट ही महंगे या लिस्टेड कीमतों में बेचे जाते हैं. इस के अलावा ज्यादातर तो प्रतिस्पर्धा के कारण सस्ती दरों पर ही बेचने पड़ते हैं.

विमानों की मरम्मत और रखरखाव का खर्च बढ़ रहा है. सिर्फ निजी ही नहीं, एयर इंडिया जैसी सरकारी विमान सेवा के तमाम विमान हैंगरों में खड़े हैं क्योंकि उन की मरम्मत के लिए हर महीने 200 करोड़ रुपए निकाले नहीं जा पा रहे हैं.

अधिग्रहण ने तोड़ी कमर

किसी कंपनी के लिए यह बड़े गौरव की बात होगी है कि वह किसी दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करती है. इसी तरह अगर उस में कोई दूसरी बड़ी या विदेशी कंपनी निवेश करती है तो उस से भी कंपनी को फायदे की उम्मीद होती है. जेट एयरवेज की बात करें तो उसे इन दोनों हालात से गुजरना पड़ा है.

करीब 3 वर्षों पहले सऊदी अरब की एत्तिहाद एयरलाइंस ने जेट एयरवेज की 24 प्रतिशत हिस्सेदारी 2 हजार करोड़ रुपए में खरीदी थी. पहले से फायदे में चल रही जेट एयरवेज की हालत पर इस निवेश का अच्छा असर हुआ था और उस दौरान उस का सालाना मुनाफा वर्ष 2015 में 2,097 करोड़, जबकि वर्ष 2016 में 1,211 करोड़ रुपए रहा था. लेकिन डूबी हुई सहारा कंपनी की एयरलाइंस को खरीदना जेट एयरवेज को भारी पड़ा है.

कहने को तो निजी एयरलाइंस चाकचौबंद बताई जाती हैं पर देश में हुए कुछ किस्सों ने इस निजीकरण की पोल खोल दी है. खासतौर से जिन एयरलाइंस पर यात्रियों का काफी दबाव है, वहां जहाजों की नियमित जांच में लापरवाही ने लोगों की जान का संकट पैदा किया है.

इसी साल मार्च 2018 में इंडिगो और गोएयर जैसी एयरलाइंसों की 600 से ज्यादा उड़ानें इसलिए नहीं करवाई जा सकीं क्योंकि उन के आधुनिक विमानों के एक खास इंजन में भारी गड़बड़ी महसूस की गई थी. बाद में पता चला कि दोष इंजन से ज्यादा नियमित जांच की व्यवस्था का काम नहीं करने या फिर जानबूझ कर खामियों की अनदेखी करने का था.

डीजीसीए को यह जानकारी थी कि कुछ समय से यात्री विमानों में इस्तेमाल हो रहे अमेरिका की प्रैट ऐंड विटनी कंपनी के बनाए एक खास सीरीज के जेट इंजनों के साथ बीच उड़ान में ही बंद हो जाने की समस्या आ रही है. यों आज के ज्यादातर यात्री विमान 2 इंजन वाले होते हैं, जिस कारण उड़ान के दौरान एक इंजन के बंद होने पर भी विमान उड़ता रह सकता है, लेकिन वैमानिकी के नियमों के मुताबिक, ऐसा करना (एक इंजन बंद होने पर भी विमान उड़ाते रहना) यात्रियों और विमान चालक दलों की जिंदगी को खतरे में डालना है.

इसी खतरे को महसूसकरते हुए इस साल 9 फरवरी को यूरोपियन एविएशन एजेंसी ने उन सभी विमानों को न उड़ने देने का आदेश जारी दिया, जिन में दोनों इंजन प्रैट ऐंड विटनी कंपनी के पीडब्लू 1100 इंजन मौजूद हों.

इस आदेश को भारत में लागू करवाने में टालमटोल चलती रही, जिस के कारण 24 फरवरी से 12 मार्च के बीच इंडिगो की 2 और गोएयर की एक यानी कुल 3 उड़ानों के बीच रास्ते में एक इंजन बंद होने की वजह से इमरजैंसी लैंडिंग करानी पड़ गई. इस से यह सवाल पूछा जाने लगा था कि कहीं एयरलाइंस जानबूझ कर तो समस्या की अनदेखी नहीं कर रही हैं?

सस्ती उड़ानों का सपना दिखाने के नाम पर कई एयरलाइंस यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रही हैं और नियामक संस्थाएं बड़े व कठोर फैसले लेने के लिए किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार करती दिखती हैं.

सोशल मीडिया और समाज में बढ़ता अकेलापन

इंगलैंड में हुए एक सर्वे में यह पता चला है कि फेसबुक पीढ़ी बहुत अकेली होती जा रही है. 16 से 24 साल के 40 फीसदी युवा काफी अकेलापन महसूस करते हैं जबकि 65 से 74 साल के 29 फीसदी ही हैं और 75 साल से ज्यादा के 27 फीसदी. बु्रनेल युनिवर्सिटी की रिसर्च से पता चला है कि फेसबुक, व्हाट्सऐप और डेटिंग साइटों की मौजूदगी के बावजूद युवाओं में अकेलापन बढ़ रहा है.

शायद इस का एक कारण यह है कि परिवार छोटे होते जा रहे हैं और जौब करने की जगह दोस्त नहीं बनते, बल्कि प्रतियोगी बनते हैं. काम बदलने और मोबिलिटी बढ़ने से भी हर थोड़े दिनों बाद आसपास का जो चेहरा अपना सा लगने लगा था, अचानक गायब हो जाता है. हर नए चेहरे से मित्रता बढ़ाने में समय तो लगता ही है.

अब वह जमाना नहीं रह गया जब लोग एक जगह टिक कर काम करते थे और टिक कर रहते थे. तब दोस्ती व परिचय वर्षों के होते थे. आज उम्रदराज लोगों को समस्याएं कम होती हैं क्योंकि उन की जिंदगी में ठहराव आ जाता है. वे टिक कर रहते हैं, अपना घर खरीद लेते हैं, काम आसानी से बदलते नहीं हैं. वे रिश्तेदारों को सहेज कर भी रखते हैं. ‘यह मेरा स्पेस है’, ‘यह मेरा टाइम है’ जैसे वाक्य उन के मुंह से नहीं निकलते. वे हर चीज शेयर करना जानते हैं, वक्त पर एकदूसरे के काम आते हैं. उन की जड़ें जमने लगती हैं. आज युवाओं की दोस्ती गुलदस्तों के फूलों जैसी होती है जिन की जड़ें नहीं होतीं और जो 24 घंटे में सूख कर झड़ जाते हैं.

पहले फूलों को धागे में पिरोया जाता था, अब तो उन्हें डंठल से बांध कर रखने का फैशन है, जो ढीले होते ही, एकएक कर बिखर जाते हैं. कंप्यूटर क्रांति ने लोगों को काफी नजदीक लाने का जो वादा किया था वह खोखला साबित हुआ है. कंप्यूटर ने तो एकदूसरे को दूर कर दिया है क्योंकि अब तो लिखावट भी पहचान में नहीं आती. अब तो कंप्यूटर के फौंटों ने अपना एकाधिकार जमा लिया है. कुछ ऐप्स तो फौंट को बदलने भी नहीं देते और मैसेज मां ने भेजा है, बहन ने भेजा है, प्रेमिका ने भेजा है या बेटी ने, कोई फर्क नहीं रह जाता.

हां, इतना जरूर है कि अकेलेपन को कोई सजा समझना गलत होगा. पहले 8-10 सदस्यों के घर में भी बहुत से खुद को अकेला और अनचाहा समझते थे. उन की कोई गिनती नहीं करता था. लोग असल में तब अकेलेपन को ढूंढ़ा करते थे. अकेलापन खराब नहीं होता. इस का अपना मजा है. आप का स्पेस, आप का टाइमटेबल, आप का अपना खानपान, आप की सफलता ये सब बड़े काम के हैं.

टेस्टी फूड स्पैशल : रेडी टु ईट, जब चुटकी में हो खाना तैयार

रेडी टु ईट/प्रीकुक्ड फूड यानी वे ईटेबल फूड आइटम जो सीधे, बिना पकाए, पकाने या काटनेछांटने व धोने की झंझटों से दूर बस गरम कर खाए जा सकें. मतलब यह कि अगर आप किसी दुकान से रेडी टु ईट खाने का बौक्स या पैकेट खरीद कर लाते हैं तो आप को उसे पकाने के लिए कुछ और करने की जरूरत नहीं है. मान लीजिए, आप दालमखनी का रेडी टु ईट पैक लाते हैं तो न तो कोई अलग से दाल डालने की जरूरत है न नमक और न ही तेलमसाला. इसी तरह

खिचड़ी, दलिया, मीट से ले कर पुलाव, मटरपनीर, पालकपनीर, छोले, कोफ्ता, नवरतनकोरमा, बिरयानी, मटनकोरमा, शाहीपनीर, टिक्काकबाब ही नहीं बल्कि नूडल्स, सूप, चिकन नगेट्स, चिकन बौल्स, मीट बौल्स, मटन नगेट्स, साग, पनीर तक हर वह डिश जो आप किचन में बनाते हैं, रेडी टु ईट फौर्मेट में उपलब्ध है.

यही वजह है कि आजकल की व्यस्त जिंदगी में लोग रेडी टु ईट और रेडी टु कुक ब्रैंड्स खूब पसंद कर रहे हैं. हाल में केरल के बाढ़ पीडि़तों को भी रेडी टु ईट फूड के पैकेट राहत सामग्री के तौर पर भेजना काफी आसान लगा, बजाय परंपरागत भोजन भिजवाने के.

क्यों है चलन

रेडी टु ईट का चलन इसलिए भी जोर पकड़ रहा है क्योंकि अचानक किसी मेहमान के आ जाने पर पैकेट फूड या फ्रोजन फूड का बड़ा सहारा होता है और दूसरा बड़ा कारण है इस की उपलब्धता. ये रेडी टु ईट फूड मौल्स से ले कर नुक्कड़ की दुकानों तक हर जगह उपलब्ध हैं.

यदि आप को सुबह छोले बनाने हैं तो रात से ही तैयारी करनी पड़ती है. उन्हें पानी में भिगोना, सुबह तमाम मसालों को तालमेल के साथ तैयार करना व फिर छोले उबालना, मसाले पीसना, भूनना वगैरह. लेकिन रेडी टु ईट को सीधे गरम कीजिए और सर्व कर डालिए. सब्जीभाजी से ले कर मछलीमीट तक प्रीकुक्ड यानी पहले से तैयार खाने का सामान बंद पैकेटों में मिल जाता है.

बनने में आसान, स्वाद में बेजोड़ रेडी टु ईट फूड किचन की शान बनता जा रहा है. इस की आसान उपलब्धता के चलते पैकेटबंद फूड आज बड़ा बाजार बन कर उभरा है. सिर्फ शहरों में ही नहीं, बल्कि छोटे कसबों में भी इस की खपत बढ़ी है.

केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि पिछले एक दशक में आसानी से तैयार हो जाने वाले पैकेटबंद फूड के बाजार में 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

पैकेटबंद खाने के चयन को ले कर सावधानी और जानकारी बेहद जरूरी है वरना यह आप की सेहत के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है. फूड ऐक्सपर्ट सचेत करते हैं कि रेडी टु ईट खाना अच्छे ब्रैंड्स का ही लेना चाहिए. इस तरह के खाने में कई कंपनियां स्वास्थ्य मानकों का ध्यान नहीं रखती हैं. इस में नमक ज्यादा मात्र में होता है, साथ ही कार्बोहाइड्रेट्स, फ्रक्टोज, ट्रांसफैट भी बड़ी मात्रा में होते हैं, जबकि विटामिंस और मिनरल्स इस में अपेक्षाकृत कम होते हैं.

सब से बड़ी बात यह है कि इसे तैयार करने में इन के पौष्टिक गुण नष्ट हो जाते हैं. दूसरा, इन में खासी मात्रा में प्रिजरवेटिव्स के साथ कृत्रिम रंग और खुशबू का इस्तेमाल होता है. इसलिए ऐसी कंपनी का सामान लें जो अपने फूड में प्रिजरवेटिव्स और रंगों का इस्तेमाल कम या न के बराबर करती हों.  हालांकि इन के इस्तेमाल का न केवल एक मानक तय कर दिया गया है बल्कि इस से संबंधित कानून भी है. इसलिए बड़ी कंपनियां इन का पालन करती हैं जबकि लोकल कंपनियां क्वालिटी से समझौता करती हैं.

गुड फैट वाला रेडी टु ईट

कोशिश करें कि गुड फैट वाला रेडी टु ईट सामान ही खरीदें यानी उन ब्रैंड्स को चुनें जिन के प्रोडक्ट में मूफा, पूफा और ओमेगा 3 रिच हों. ऐसे खाने को गुड फैट कहा जाता है क्योंकि ये शरीर को पोषकतत्त्व एबजौर्ब करने में मदद करते हैं और दिल की सेहत के लिहाज से भी लाभदायक होते हैं.

कुल मिला कर रेडी टु ईट यानी तैयार खाने के सामानों ने जीवन को बहुत आसान बना दिया है, खासतौर पर उन कामकाजी महिलाओं के लिए जिन पर घर व बाहर दोनों की जिम्मेदारी है.

मां और नवजात के प्यार भरे रिश्ते के लिए भी जरूरी है स्तनपान

नवजात के लिए मां के दूध से ज्यादा सेहतमंद और पोषक कुछ भी नहीं. फिर भी आजकल की अधिकतर मांओं को बच्चे को फीड कराना मुश्किल काम लगता है. मां के दूध से बच्चे की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. यह दूध बच्चे के लिए अमृत समान होता है.

स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञा, डा. बंदिता सिन्हा कहती हैं कि ब्रैस्ट फीडिंग को ले कर आज भी शहरी महिलाओं में जागरूकता कम है, जबकि ब्रैस्ट फीडिंग करवाने से ब्रैस्ट कैंसर की संभावना भी कम हो जाती है. जिन महिलाओं ने कभी ब्रैस्ट फीडिंग नहीं कराई होती है, उन में ब्रैस्ट कैंसर का रिस्क बढ़ जाता है.

बचाए ब्रैस्ट कैंसर से

हाल ही में हुए कुछ शोधों में पाया गया कि जिन महिलाओं को ब्रैस्ट कैंसर मेनोपौज के बाद हुआ है, उन्होंने कभी ब्रैस्ट फीडिंग नहीं कराई थी. जिन महिलाओं ने 30 की उम्र के आसपास स्तनपान करवाया है उन में ब्रैस्ट कैंसर होने की संभावना कम होती है.

इसलिए मां बन चुकी हर महिला को स्तनपान करवाना जरूरी है और उसे यह समझ लेना चाहिए कि इस से बच्चा तंदुरुस्त होता है और साथसाथ मां का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है.

आइए, जानते हैं स्तनपान करवाने के अन्य फायदों के बारे में:

– डिलिवरी के बाद जब नवजात को मां की गोद में दिया जाता है तो उस की अपनी मां से बौंडिंग बनाने की शुरुआत फीडिंग से ही होती है. मां भी यहीं से अपने बच्चे से जुड़ाव महसूस करना शुरू करती है.

– मां के दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन और एमिनो ऐसिड बच्चे की ग्रोथ के लिए अच्छा होता है. यह बच्चे को कुपोषण का शिकार होने से बचाता है.

– बच्चे के जन्म के बाद मां के स्तनों से निकलने वाला पहला दूध कोलोस्ट्रम कहलाता है, जिस में ऐंटीबायोटिक की मात्रा सब से अधिक होती है, जो बच्चे की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है.

– मां के स्तनों से निकला पहला दूध बच्चे की अंतडि़यों और श्वसन प्रक्रिया को भी मजबूत बनाता है.

– मां का दूध हड्डियों को अच्छी तरह ग्रो करने और मजबूत बनाने में सहायक होता है.

– जबजब मां बच्चे को दूध पिलाती है, बच्चे को ऐंटीबायोटिक दूध के जरीए मिलता है, जिस से बच्चा किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचता है.

– मां का दूध आसानी से पच जाता है, जिस से बच्चे को कब्ज की शिकायत नहीं होती.

– जो बच्चे 6 महीने तक लगातार ब्रैस्ट फीडिंग करते हैं उन की इम्युनिटी पावर दूसरे बच्चों की तुलना में ज्यादा अच्छी रहती है.

मां के लिए ब्रैस्ट फीडिंग कराने के फायदे

स्तनपान कराने का फायदा बच्चे के साथसाथ उस की मां को भी होता है. कुछ इस तरह:

– ब्रैस्ट फीडिंग कराने से प्रैगनैंसी के दौरान बढ़ा मां का वजन धीरेधीरे कम होता जाता है.

– ब्रैस्ट फीडिंग से महिला में यूटरस का संकुचन शुरू हो जाता है. डिलिवरी के बाद ब्लीडिंग अच्छी तरह हो जाती है, जिस से महिला को ब्रैस्ट और ओवेरियन कैंसर का खतरा कम हो जाता है.

– पोस्टमार्टम डिप्रैशन का खतरा मां के लिए कम हो जाता है.

– अधिक उम्र में बच्चा होने पर भी अगर महिला सही तरह से स्तनपान कराती है तो कैंसर के अलावा मधुमेह, मोटापा और अस्थमा जैसी बीमारियों से भी अपनेआप को बचा सकती है.

– स्तनपान 1 साल से अधिक समय तक कराने से मां और बच्चा दोनों ही स्वस्थ रह सकते हैं. 

हेलीकोप्टर ईला : फिल्म देखते हुए आप को सताएगी ‘निल बटे सन्नाटा’ की याद

काजोल व रिद्धिसेन के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘हेलीकोप्टर ईला’’ के प्रदर्शन की तारीखे क्यों बार बार बदलती रहीं, इसकी वजहें फिल्म देखकर समझ में आ गयी. फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके लिए दर्शक अपनी मेहनत की कमाई को इस फिल्म की टिकट खरीदने में खर्च करेगा. उत्कृष्ट फिल्मकार प्रदीप सरकार की यह फिल्म कहीं न कहीं सफलतम फिल्म ‘‘निल बटे सन्नाटा’’ की याद दिलाती है. फर्क इतना है कि ‘निल बटे सन्नाटा’ में एक घरों में काम करने वाली सिंगल मां और उसकी बेटी के साथ उस तरह का परिवार था. जबकि ‘हेलीकोप्टर ईला’ में उच्चवर्ग की सिंगल मां व बेटा है. ‘निल बटे सन्नाटा’ में मां व बेटी के संघर्षों, सपनों व जीवन में आगे बढ़ने के जद्दोजहद की कहानी को खूबसूरती से पेश किया गया था. मगर फिल्म ‘हेलीकोप्टर ईला’ एक भी क्षण दर्शकों को बांधकर नहीं रखती.

आनंद गांधी के मशहूर गुजराती भाषा के नाटक ‘‘बेटा कागड़ो’’ पर आधारित फिल्म ‘‘हेलीकोप्टर ईला’’ की कहानी एक सिंगल मदर ईला (काजोल) की कहानी है, जिसने अपने संगीत व गायन के करियर को महज अपने बेटे विवान (रिद्धि सेन) की परवरिश के लिए त्याग दिया. अब ईला हर दम विवान के पीछे पड़ी रहती है. यहां तक कि कभी भी बिना सूचना के वह विवान के कमरे में भी पहुंच जाती है.

विवान की अपनी कोई स्वतंत्र जिंदगी ही नहीं है. मां की हरकतों से परेशान होकर विवान अपनी मां को आगे की पढ़ाई करने की सलाह देता है. ईला तुरंत विवान के ही कौलेज में एडमिशन लेकर उसका पीछा करने लगती है. इतना ही नहीं ईला भी विवान की ही कक्षा में बैठकर पढ़ती है. वह किससे बात करे, किससे नहीं, यह सलाह भी देती रहती है. बीच बीच में कहानी अतीत में जाती रहती है, जिससे यह पता चलता है कि ईला अपने बेटे विवान को लेकर इतना असुरक्षित क्यों है. मां बेटे के बीच झगड़े के साथ ही कहानी में कई मोड़ आते हैं. कौलेज में नाटक की शिक्षक लिसा मरीन (नेहा धूपिया), ईला को समझाती है. तब ईला पुनः संगीत का कांसर्ट करती है. जिसके चलते मां बेटे के बीच विवाद खत्म होते हैं.

गुजराती नाटक को फिल्म की पटकथा में बदलते समय पटकथा लेखक द्वय आनंद गांधी व मितेश शाह भूल गए कि थिएटर व फिल्म दोनों बहुत अलग माध्यम हैं. कहानी बार बार अतीत में जाती है, जिससे दर्शक की समझ में ही नहीं आता कि आखिर फिल्म है क्या. इतना ही नहीं फिल्म की लंबाई भी बहुत है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसकर डेढ़ घंटे के अंदर समेटना चाहिए था. कम से कम अतीत की कहानी को इतना लंबा नहीं दिखाना चाहिए था. अतीत की कहानी के चलते फिल्म सिर्फ बोर करती है. फिल्म का क्लायमेक्स गड़बड़ है.

बतौर निर्देशक प्रदीप सरकार इस बार बुरी तरह से मात खा गए हैं. यहां तक कि प्रदीप सरकार ने अपने संबंधों के चलते अमिताभ बच्चन, शान, ईला अरूण आदि से भी इसमें छोटे छोटे किरदार करवा लिए हैं, मगर इससे फिल्म उत्कृष्ट नहीं बन पाती. बल्कि फिल्म के शुरू होते ही दर्शक सोचने लगता है कि कब इस फिल्म से छुटकारा मिले.

अफसोस की बात है कि भारत में सिंगल मदर यानी कि अकेली मां और उसके बेटे को लेकर एक अति बेहतरीन भावनात्मक फिल्म बनाने से प्रदीप सरकार चूक गए. कितनी मजेदार बात है कि मां अपने बेटे की ही कक्षा में जाकर पढ़ती है. इसी तरह से फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ में भी था, पर ‘निल बटे सन्नाटा’ की मां अनपढ़ थी और बेटी स्कूल में थी.

जहां तक संगीत का सवाल है, तो लोगों को नब्बे के दशक की याद आएगी, जब ‘एमटीवी’ का उदय हो रहा था. जहां तक अभिनय का सवाल है तो राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त बंगला अभिनेता रिद्धि सेन कामिक टाइमिंग की कमी के चलते निराश ही करते हैं. काजोल इंटरवल के बाद युवा बेटे की मां के रूप में सिर्फ खूबसूरत लगी हैं. तोता राय चौधरी का अभिनय ठीक ठाक है.

दो घंटे दस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हेलीकोप्टर ईला’’ का निर्माण अजय देवगन व जयंतीलाल गाड़ा की कंपनी ने किया है. निर्देशक प्रदीप सरकार, लेखक मितेश शाह व आनंद गांधी, कैमरामैन सिरसा रे, संगीतकार अमित त्रिवेदी व राघव  सचर तथा कलाकार हैं – काजोल, रिद्धि सेन, नेहा धूपिया, तोतारौय चौधरी, अतुल कुलकर्णी, मुकेष ऋषि, अमिताभ बच्चन, अलिशा चिनौय, शान, इला अरूण, अनु मलिक व अन्य.

दिल्ली सरकार के अफसरों पर केंद्र सरकार का कंट्रोल

सरकार किस की और अधिकारी किस के, यह सवाल अपने आप में जवाब लिए हुए है कि जिस की सरकार, उस के ही अधिकारी. लेकिन दिल्ली सरकार के साथ ऐसा नहीं है. लोकतंत्र में सरकार के मुखिया जनहित का सारा सरकारी काम अधिकारियों के जरिए ही करते/करवाते हैं.

देशवासियों के लिए यह ताज्जुब की बात होगी कि दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री का अपने अधिकारियों पर कंट्रोल करने का अधिकार नहीं है. ऐसे में स्वाभाविक है कि अधिकारीगण अपने मुख्यमंत्री की सुनेंगे तो, लेकिन करेंगे नहीं. वे करेंगे वही जो उन को अपने बौस की तरफ से निर्देश मिलेंगे.

सवाल यह है कि ऐसा क्यों है? इस का जवाब यह है कि संविधान के तहत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार को मिले अधिकारों की व्याख्या स्पष्ट नहीं है. इस बाबत मामला कोर्ट में चल रहा है.

फिलहाल केंद्र में सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि दिल्ली सरकार में तैनात अधिकारी उस के नियंत्रण और निगरानी में हैं, इस शक्ति का इस्तेमाल राष्ट्रपति की ओर से दी गई शक्तियों के तहत उपराज्यपाल यानी एलजी करते हैं.

दिल्ली में तैनात ब्यूरोक्रेट्स के ट्रांसफर और कंट्रोल को ले कर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच कन्फ्यूजन है.

मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय खंडपीठ ने पहले के फैसले में कहा था कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं, बल्कि केंद्र शासित प्रदेश है, जो खुद में एक वर्ग है. कोर्ट का यह भी कहना था कि उपराज्यपाल को दिल्ली की मंत्रिपरिषद की सहायता और सुझाव के साथ कार्य करना होगा.

दरअसल, भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार नहीं चाहती कि आम आदमी पार्टी व उस के मुखिया व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जनप्रिय बने रहें. वह उन की लोकप्रियता को खत्म कर देना चाहती है. सो, केंद्र सरकार अपने मंत्रालयों के जरिए दिल्ली सरकार के जनहित के कामों में अडंगा लगाती रहती है.

यह खुला सच है कि नरेंद्र मोदी के देश की सत्ता हासिल करने के बाद दिल्ली विधानसभा में हुए चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने मोदी व उन के मंत्रिमंडल को असहनीय चोट दी थी. उक्त चुनाव में मोदी सहित उन का मंत्रिमंडल जुटा था लेकिन फिर भी मोदी की पार्टी यानी भाजपा मात्र 3 सीटों पर ही विजय पा सकी थी जबकि केजरीवाल की आप 67 सीटों पर विजयी हुई थी. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मोदी तक की दयनीय हार का बदला केजरीवाल से ले रहे हैं, जिसे दिल्लीवासियों को भुगतना पड़ रहा है.

मी टू से डर रही कंपनियां

हौलीवुड दिग्गज हार्वे विंसटीन के सैक्सुअल हैरासमैंट स्कैंडल सामने आने के बाद अब भारत में तेजी से ऐसे स्कैंडल सामने आ रहे हैं. बौलीवुड और मीडिया से जुड़ी महिलाएं अपने साथ हुए यौनशोषण को दुनिया को बता रही हैं.

विदेशी की धरती से शुरू हुआ महिलाओं का मी टू मूवमैंट भारत की धरती पर फैल रहा है. यह महिलाओं में जागरुकता आने का साफ इशारा है. हालांकि, यौनशोषण की मारी कितनी ही महिलाएं खामोश हैं.

अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अभिनेता नाना पाटेकर व फिल्मलाइन से जुड़े दूसरे लोगों पर यौनशोषण के आरोप लगाए तो महिला पत्रकार प्रिया रमानी ने पत्रकार रहे राजनेता व मौजूदा केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री एम जे अकबर पर यौनशोषण के आरोप लगाए. इस के अलावा कई और महिलाओं ने इन हस्तियों व दूसरी और हस्तियों पर भी ऐसे आरोप लगाए हैं.

दिलचस्प यह भी है कि बड़ी कंपनियां डर रही हैं कि कहीं वे न मी टू की चपेट में आ जाएं. वे अपने उच्च अधिकारियों के खिलाफ की गई महिला कर्मियों द्वारा यौनशोषण की शिकायतों को भीतरी तौर पर निबटाने की जुगत में लग गई हैं.

दरअसल, महिला कर्मचारियों में अपने यौनशोषण किए जाने की बाबत जागरुकता बढ़ रही है. वर्कप्लेस पर सैक्सुअल हैरासमैंट से निबटने के लिए बने कानून के बारे में महिलाएं चौकन्ना हो गई हैं. सो, कंपनियां ऐसे मामलों को निबटाने की व्यवस्था अपने यहां कर रही हैं. वहीं, कंपनियों के पास कर्मचारियों को सावधान करने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं होता, क्योंकि उन्हें बाद में इस की भारी कीमत चुकानी पड़ती है.

यौनशोषण के खिलाफ तकरीबन हर कंपनी जीरो टौलरेंस पौलिसी अपनाती है. ऐसा मी टू मूवमैंट शुरू होने से पहले से ही हो रहा है. लेकिन, यह और बात है कि घटनाएं घटती रहती हैं.

एक कंपनी की महिला एम डी का कहना है कि हालात बदल गए हैं. महिलाओं को लगता है कि वे सैक्सुअल हैरासमैंट पर खुल कर बात कर सकती हैं, उस की रिपोर्ट दर्ज करा सकती हैं.

बीएसई की टौप 100 कंपनियों (इन्हें यौनशोषण की शिकायतों के बारे में सूचना देनी होती है) से मिले डेटा के मुताबिक, आर्थिक वर्ष 2018 में उन के यहां यौनशोषण की शिकायतों में 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. यह खुलासा यौनशोषण को रोकने की विशेषज्ञ संस्था कंप्लाईकरो सर्विसेज की तरफ से इन कंपनियों की वार्षिक रिपोर्ट पर किए गए विश्लेषण से हुआ है.

उधर, बीएसई 100 समेत 200 कंपनियों पर हुए सर्वे के मुताबिक, सभी कंपनियां यौनशोषण की शिकायतों के मोरचे पर चिंतित तो हैं लेकिन खामोश सी दिखाई देती हैं.

इसी बीच, महिलाओं के हित के लिए बनाए गए राष्ट्रीय महिला आयोग ने अपील की है कि देशभर में कहीं भी, कभी भी, किसी भी स्तर पर महिलाएं यौनशोषण की शिकार हुई हैं तो वे लिखित में शिकायत दर्ज कराएं. जब तक पीड़ित महिलाएं औपचारिक शिकायत नहीं करती हैं तब तक आयोग के लिए कारवाही करना मुश्किल होता है. इसी मध्य, तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर के खिलाफ थाने में एफआईआर दर्ज करा दी है.

तुम्बाड़ : बेहतरीन हौरर फिल्म देखना चाहते हैं तो ये फिल्म जरूर देखें

हर इंसान लोभी होता है. इंसान के इसी लोभ और प्राचीन मिथक का ऐतिहासिक पीरियड हौरर फिल्म ‘‘तुम्बाड़’’ में बहुत बेहतरीन चित्रण है. फिल्म में कल्पनाओं व लोककथा के मिश्रण के साथ बहुत सुंदर दृश्यों को पेश किया गया है.

मराठी भाषी उपन्यासकार श्रीपाद नारायण पेंडसे के उपन्यास ‘‘तुम्बाड़चे खोट’’ पर आधारित  फिल्म ‘‘तुम्बाड़’’ की कहानी तीन अलग काल में विभाजित है. जिसकी शुरुआत होती है 1918 से. जहां महाराष्ट्र के तुम्बाड़ नामक गांव में विनायक राव (सोहम शाह) अपनी मां और भाई के साथ रहते हैं. वहां के बाड़े में एक खजाने के छिपे होने की चर्चा होती है, जिसकी तलाश विनायक के साथ साथ उसकी मां को भी है.

मगर कुछ घटनाक्रम ऐसे घटित होते हैं, जिसके चलते विनायक की मां उसे लेकर पुणे आ जाती है. 15 वर्ष बाद विनायक पुनः तुम्बाड़ जाकर खजाने की तलाश करता है. इस बीच उसकी शादी और बच्चे भी हो जाते हैं. लेकिन खजाने का लोभ उसे बार बार अनंत विनाश वाले गांव तुम्बाड़ जाने पर विवश करता रहता है.

एक बेहतरीन पटकथा पर बनी निर्देशक राही अनिल बर्वे के निर्देशन की तारीफ करनी पड़ेगी. उन्होंने इंसान के लालच की कहानी बयां करने के साथ ही इस बात का बाखूबी चित्रण किया है कि किस तहर लालच इंसान को राक्षस बना देता है. लोकेशन कमाल की है. पार्श्व संगीत उत्तम है. कैमरामैन पंकज कुमार की भी तारीफ करनी पड़ेगी.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो सोहम शाह की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है. उन्होंने विनायक के जीवन भर के संघर्ष को चुनौती के साथ स्वीकार कर इतनी सहजता से निभाया है कि दर्शक उन पर यकीन करने लगता है. उनकी आंखों में लोभ व वासना का भाव बड़ी सहजता से नजर आता है. वह कमाल के कलाकार हैं.

मगर अति घटिया प्रचार के चलते इस फिल्म को लेकर दर्शकों में कोई उत्सुकता नजर नहीं आती.

एक घंटा 44 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘तुम्बाड़’’ का निर्माण सोहम शाह, आनंद एल राय, मुकेश शाह व अमिता शाह ने किया है. निर्देशक राही अनिल बर्वे, पटकथा लेखक राही अनिल बर्वे, आदेश प्रसाद व आनंद गांधी, संगीतकार अजय अतुल व जस्पर, कैमरामैन पंकज कुमार तथा कलाकार हैं – सोहम शाह, हरीष खन्ना, अनिता दाते, दीपक दामले, ज्योति मलसे व अन्य.

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