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कुदरती कहर के बाद अब नौकरशाही का कहर

आमतौर पर शहरों की बनावट ऐसी होती है कि बरसात के बाद अगर बाढ़ आ जाए तो भी घरों में पानी कम घुसता है. मगर इस बार केरल में जिस तरह बाढ़ आई और जिस तरह लाखों की गिनती में घरों की पहली मंजिलें डूब गईं, बहुत कम होता है. इस बाढ़ ने अरबों का नुकसान तो किया ही, लाखों की यादों और धरोहरों को भी पानी में बहा दिया. अच्छे खातेपीते लोगों को न केवल रिलीफ कैंपों में हफ्ते गुजारने पड़े, उन के पीछे उन का सामान भी भीगता रहा और उस पर मिट्टी जमती रही. पानी उतरने के बाद जो मुसीबत अब केरल की औरतें झेल रही हैं वह है हर चीज को साफ करना और अंदर तक घुस गए पानी और मिट्टी को निकालना. साथ ही घरों की नींवें कमजोर न हो गई हों, इस का भी खयाल रखना.

केरल में लोगों के घरों में फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, माइक्रोवेव आम बातें थीं, क्योंकि वहां खाड़ी के देशों में नौकरी की वजह से पैसा बहुत है. केरलवासी वैसे भी मेहनती हैं और शिक्षित भी. उन के संपन्न घरों पर अचानक आई बाढ़ ने धावा बोल डाला और शहर के शहर पानी में डूब गए. घरों की साफसफाई का चैलेंज इसलिए बड़ा है, क्योंकि इस तरह के फ्लड रोज नहीं आते और लोगों को मालूम ही नहीं होता कि क्या करें कैसे करें. मीडिया बताने की कोशिश कर रहा है कि साफसफाई कैसे करें. पर घर की हर चीज को निकालना, सुखाना और साफ करना एक आफत का काम है और आसान नहीं है.

लोगों की यादों के अलबम, फोटो, पत्र, किताबें, उपहार, सजावटी चीजें भी बाढ़ में नष्ट हो गई हैं और उन का गम पैसे से ज्यादा होता है. प्रौपर्टी के कागजात, टैक्सों की फाइलें, लाइसैंस, आईडी पू्रफ जैसे डौक्यूमैंटों का गल जाना तक नई आफत है, क्योंकि डुप्लिकेट तो डुप्लिकेट ही होता है और उसे पाने के लिए भी भारी मशक्कत करनी पड़ेगी. ऐसा नहीं लगता कि नौकरशाही सिर्फ बाढ़ की वजह से उदार हो जाएगी और हरेक का काम बिना पैसे लिए रातदिन लग कर पूरा कर देगी. जहां सरकार ने कागज रखे थे अगर वे भी पानी में भीग कर नष्ट हो गए होंगे तो उस का खमियाजा भी नागरिकों को ही भुगतना पड़ेगा, क्योंकि सरकार तो हर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगी. बाढ़ के बाद सरकारी कर्मचारी ज्यादा काम करने लगें ताकि जनता को राहत मिल सके, इस के आसार तो बहुत कम हैं.

बाढ़ का हादसा ऐसा है जो महीनोंसालों तक परेशान करता रहेगा घरों को भी, व्यापारों को भी. शायद सरकारी कर्मचारी इस का अच्छा लाभ उठाएंगे. राहत में मिली सामग्री की हेराफेरी से और पिछली व नई हेराफेरियों को छिपाने में बाढ़ से ज्यादा अच्छा और क्या हो सकता है?

…साहब बन गया

कभी मफलरमैन के खिताब से नवाजे गए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दक्षिण कोरिया गए तो एकदम बदले हुए दिखे. उन्होंने न केवल शर्ट इन कर रखी थी, बल्कि जूते भी पहन रखे थे. उन के इस मनभावन रूप की खूब चर्चा हुई जो बताती है कि केजरीवाल वाकई लोकप्रिय नेता हैं जिन का पहनावा भी चर्चा में रहता है.

नेताओं का पहनावा हमेशा ही चर्चा में रहा है. नेहरू के सूट से ले कर नरेंद्र मोदी तक के, महंगे ही सही, सूट सुर्खियों में रहे हैं. कभी संजय गांधी का कुरतापजामा और गौगल्स फैशन बन गया था तो इंदिरा गांधी की साडि़यों का बौर्डर तक डिजाइन किया जाने लगा था. लोग चाहते हैं कि उन के नेता अब स्मार्ट दिखें. ऐसे में नेताओं को भी अपने चहेतों की भावनाओं का खयाल रखना चाहिए.

दोनों हाथों में लड्डू

शिकागो में संपन्न हुए विश्व हिंदू सम्मेलन में वही परंपरागत बातें हुईं जो हिंदू धर्म के उद्भव से होती रही हैं कि हिंदू धर्म में बड़ी फूट है, इसे विश्व कल्याण के लिए एकता के सूत्र में पिरोया जाना जरूरी है. यह किसी ने नहीं कहा कि हजारों जातियों में बंटे हिंदुओं की भीड़ में असली हिंदू कौन है और हिंदू को हिंदू होने के सर्टिफिकेट बांटने के अधिकार किसे और क्यों हैं और उस के मानक क्या हैं.

इन अनुत्तरित सवालों से बचते समारोह के मुखिया गुना मगेसन ने प्रतिनिधियों को परंपरागत भारतीय व्यंजन लड्डू के 2 पैकेट दिए. एक में नरम लड्डू थे तो दूसरे पैकेट में सख्त लड्डू थे. कहा यह गया कि नरम लड्डू आज हिंदुओं की स्थिति दिखाता है, उन्हें आसानी से बांटा और निगला जा सकता है जबकि हिंदू समाज को सख्त लड्डू की तरह होना चाहिए जो मजबूती से बंधा है.

चौकलेट के इस युग में गांवदेहातों के हलवाइयों के यहां आज भी बासी सख्त लड्डू ही मिलते हैं जिन का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर हथियार की तरह भी किया जा सकता है. यह सख्त लड्डू जिस के सिर पर पड़ जाए उस का मरना नहीं तो मूर्च्छित होना तो तय रहता है. इस लिहाज से प्रतीकात्मक तौर पर दिया उदाहरण गलत तो नहीं था.

आईपीपीबी से डाकघरों में लौटेगी रौनक

आईपीपीबी यानी इंडियन पोस्ट पेमैंट बैंक सचमुच एक क्रांति है. इस परिकल्पना से न सिर्फ संचार क्रांति के युग में बेकार पड़े लाखों पोस्टऔफिसों में फिर रौनक आएगी बल्कि देश के ग्रामीण क्षेत्र में आईपीपीबी लोगों के लिए बचत जमा करने का एक सुगम स्थान भी बनेगा.

देशभर में डेढ़ लाख से ज्यादा पोस्टऔफिस हैं. लगभग हर गांव में उन की पहुंच है. इस के जरिए गांवगांव में बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं. ग्रामीण एक लाख रुपए तक की राशि आईपीपीबी में रख सकते हैं और उस से ज्यादा राशि होने पर उन का पैसा खुद ही डाकघर बचत बैंक खाते में जमा हो जाएगा. इस के लिए इसे

17 करोड़ डाकघर बचत खातों से जोड़ा गया है. यह बैंक पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा संचालित है और इस से ग्राहकों को जोड़ने के लिए डाक सेवकों को 25 प्रतिशत तक कमीशन दिया जाएगा तथा डाक विभाग का कमीशन 5 प्रतिशत होगा.

बड़ी बात यह है कि इस के खाताधारक को अपना खाता या पिन नंबर याद रखने की आवश्यकता नहीं है. इस के लिए ग्राहक के पास एक कार्ड होगा जिस को डाक सेवक के पास मौजूद बायोमीट्रिक मशीन से जोड़ कर लेनदेन हो जाएगा.

मजेदार बात यह है कि यह सेवा मोबाइल ऐप पर भी होगी. ग्राहकों को अंगूठे या उंगली का निशान लगाना होगा. इस बैंक के लिए करीब 1,450 करोड़ रुपए की लागत से मजबूत तकनीकी ढांचा उपलब्ध कराया गया है और इस का मकसद गांव में बैंकिंग सेवा देना है. इस साल के आखिर तक सभी डाक केंद्र इस प्रणाली से जुड़ जाएंगे.

पोस्टऔफिस की देश की ग्रामीण आबादी में अच्छी साख रही है. गांव के डाकखाने तक हर ग्रामीण की पकड़ होती है, इसलिए ग्रामीण इस में आसानी से अपना पैसा जमा कर सकता है. गांव में बेकार घूमने वाले डाकिया का महत्त्व फिर से बढ़ जाएगा और सूने पड़े लाल लैटरबौक्स टंगे गांव के पोस्टऔफिस में इस से रौनक लौटेगी.

क्यों न आज एक बार मन की बात की जाए

शादी करने जा रही, जस्ट मैरिड लड़कियों के लिए खासतौर से और सभी पत्नियों के लिए आमतौर से ‘मन की बात’ इसीलिए करनी पड़ रही है क्योंकि पहले जो तूतू, मैंमैं, जूतमपैजार, सिर फुटव्वल एकडेढ़ साल बाद होते थे, अब 4-5 महीनों में हो रहे हैं. ऐडवांस्ड जमाना है भई सबकुछ फास्ट है.

पतियों से बहुत प्रौब्लम रहती है हमें. उन की बात तो होती रहती है. क्यों न एक बार अपनी बात कर लें हम?

– शादी हुई है, ठीक है, अकसर सब की होती है. तो खुद को पृथ्वी मान कर और पति को सूर्य मान कर उस की परिक्रमा मत करने लगो. न यह शकवहम पालो कि उस के सौरमंडल में अन्य ग्रह या चांद टाइप कोई उपग्रह होगा ही होगा. दिनरात उसी के आसपास मंडराना, अपनी लाइफ उसी के आसपास इतनी फोकस कर लेना कि उसे भी उलझन होने लगे, ऐसा मत करो, गिव हिम अ ब्रेक (यहां स्पेस पढि़ए). अपने लिए भी एक कोना रिजर्व रखना हमेशा.

– अपने अपनों को, दोस्त, सखीसहेलियों को छोड़ कर आने का दुख क्या होता है तुम से बेहतर कौन जानता है. तो उस से भी एकदम उस के पुराने दोस्तों और फैमिली मैंबर्स से कटने को मत कहो. बदला क्यों लेना है आखिर अपना घर छोड़ने का? ‘तुम तो मुझे टाइम ही नहीं देते.’ का मतलब ‘तुम बस मुझे टाइम दो’ नहीं होता समझो वरना हमेशा बेचारगी और उपेक्षा भाव में जीयोगी.

– जो काम हाउसहैल्प/घर के अन्य सदस्य कर रहे हों उन्हें जबरदस्ती हाथ में लेना यह सोच कर कि इन से परफैक्ट कर के दिखाओगी, कतई समझदारी नहीं है. अगर सास का दिल जीतने टाइप कोई मसला न हो तो इन से गुरेज करें, क्योंकि पुरुष आमतौर पर इन मसलों में बौड़म होते हैं और आप को जब वे ताबड़तोड़ तारीफें न मिलें जो आप ने ऐक्सपैक्ट कर रखी हैं, तो डिप्रैशन होगा. बिना बात थकान और वर्कलोड अलग बढ़ेगा. तो जितने से काम चल रहा हो उतने से ही चलाओ.

– लीस्ट ऐक्सपैक्टेशंस पालो. जितनी कम अपेक्षाएं उतना सुखी जीवन. अगर ऐक्सपैक्टेशन या बियौंड ऐक्सपैक्टेशन कुछ मिल गया तो बोनस.

– न अपने खुश रहने का सारा ठेका पतिपरमेश्वर को दे दो न अपने दुखी होने का ठीकरा उस के सिर फोड़ो. अपनी खुशियां खुद ढूंढ़ो. अपनी हौबीज की बलि मत चढ़ाओ और न अपनी प्रतिभा को जंग लगाओ. बिजी रहोगी, खुश रहोगी तो वह भी खुश रहेगा. याद रखो तुम उस के साथ खुश हो, यह मैटर करेगा उसे. उसी की वजह से खुश हो नहीं. मैं कैसी दिख रही हूं, कैसा पका रही हूं, सब की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही हूं, कहीं इन का इंट्रैस्ट मुझ में कम तो नहीं हो रहा ये ऐसी चीजें हैं, जिन में कई औरतें मरखप कर ही बाहर निकल पाती हैं, जबकि पतियों के पास और भी गम होते हैं जमाने के.

– शक का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था. उम्मीद है ऐसी सर्जरी जो ब्रेन के उस हिस्से को काट फेंके जो शक पैदा करता है, जल्दी फैशन में आ जाए. तब तक ओवर पजैसिव और इनसिक्योर होने से बचो. कहीं का टौम क्रूज नहीं है वह जो सब औरतें पगलाती फिरें उस के पीछे. हो भी तो तुम्हारे खर्चे पूरा कर ले वही बहुत है. फिर फैमिली का भी तो पालन करना है. औलरैडी टौम है, तो बेचारे की संभावनाओं के कीड़े औलमोस्ट मर ही चुके समझो.

– लड़ाईझगड़े, चिड़चिड़ाना कौमन और एसैंशियल पार्ट हैं मैरिड लाइफ के. फिर बाद में वापस सुलह हो जाना भी उतना ही कौमन और एसैंशियल है. बस करना यह है कि जब अगला युद्ध हो तो पिछले के भोथरे हथियारों को काम में नहीं लाना है. पिछली बार भी तुम ने यही किया/कहा था, तुम हमेशा यही करते हो, रिश्तों में कड़वाहट घोलने में टौप पर हैं. जो बीत गई सो बात गई.

– हम लोग परेशान होने पर एकदूसरे से शेयर कर के हलकी हो लेती हैं, जबकि पुरुषों को ज्यादा सवालजवाब नहीं पसंद. कभी वह परेशान दिखे और पूछने पर न बताना चाहे तो ओवर केयरिंग मम्मा बनने की कोशिश मत करो. बताओ मुझे, क्या हुआ, क्यों परेशान हो, क्या बात है, मैं कुछ हैल्प करूं, प्यार नहीं खीझ बढ़ाते हैं. बेहतर है उसे एक कप चाय थमा कर 1 घंटे को गायब हो जाओ. फोकस करेगा तो समाधान भी ढूंढ़ लेगा. लगेगा तो बता भी देगा परेशानी की वजह. दोनों का मूड सही रहेगा फिर.

– कितनी भी, कैसी भी लड़ाई हो, शारीरिक हिंसा का एकदम सख्ती और दृढ़ता से प्रतिरोध करो. याद रखो एक बार उठा हाथ फिर रुकेगा नहीं. पहली बार में ही मजबूती से रोक दो. साथ ही बेइज्जती सब के सामने, माफीतलाफी अकेले में, यह भी न हो. अपनी सैल्फ रिस्पैक्ट को बरकरार रखो, हमेशा हर हाल में ईगो और सैल्फ रिस्पैक्ट के फर्क को समझते हुए.

– आदमी चेहरा और ऐक्सप्रैशंस पढ़ने में औरतों की तरह माहिर नहीं होते. इसलिए मुंह सुजा कर घूमने, भूख हड़ताल आदि के बजाय साफ बताओ क्या दिक्कत है.

– किसी भी मतलब किसी भी पुरुष से स्पष्ट और सही उत्तर की अपेक्षा हो तो सवाल एकदम सीधा होना चाहिए, जिस का हां या न में जवाब दिया जा सके. 2 उदाहरण हैं-

पहला

‘‘क्या हम शाम को मूवी चल सकते हैं?’’

‘‘हम्म, ठीक है, कोशिश करूंगा, जल्दी आने की, काम ज्यादा है.’’

दूसरा

‘‘क्या हम शाम को मूवी चलें? आ जाओगे टाइम पर?’’

‘‘नहीं, मीटिंग है औफिस में, लेट हो जाऊंगा तो चिढ़ोगी स्टार्टिंग की निकल गई. कल चलते हैं.’’

जब पुरुष का मस्तिष्क ‘सकना’ टाइप के कन्फ्यूजिंग शब्द सुनता है तो उत्तर भी कन्फ्यूजिंग देता है. अब पहली स्थिति में उम्मीद तो दिला दी थी. तैयार हो कर बैठने की मेहनत अलग जाती, टाइम अलग वेस्ट होता और पति के आने पर घमासान अलग. कभी किसी पुरुष को कहते नहीं सुना होगा कि क्या तुम मुझ से प्यार कर सकती हो या मुझ से शादी कर सकती हो? वे हमेशा स्पष्ट होते हैं, डू यू लव मी, मुझ से शादी करोगी? तो स्पष्ट सवाल की ही अपेक्षा भी करते हैं.

लास्ट बट नौट लीस्ट, अगर वह आप के साथ खड़ा है जिंदगी के इस सफर में, आप का साथ दे रहा है, तो यह सब से जरूरी बात है. आप इसलिए साथ नहीं हैं कि बुढ़ापे में अकेले न पड़ जाओ, न इसलिए कि इन प्यारेप्यारे बच्चों के फ्यूचर का सवाल है, बस इसलिए साथ हैं कि दोनों ने एकदूसरे का साथ चुना है, आखिर तक निभाने को…

इन मौडर्न गैजेट्स को अपनाएं और लजीज डिशेज बनाने का लुत्फ उठाएं

पुराने किचन टूल्स को लगातार प्रयोग करते रहने से वे पुराने तो हो ही जाते हैं, उन में कुछ न कुछ गंदगी भी जमा हो जाती है फिर चाहे कितनी ही सफाई कर ली जाए, वे उतने हाइजीनिक नहीं रहते जितना उन्हें रहना चाहिए. पर नए टूल्स के साथ ऐसा नहीं होता है.

अब शायद आप सोचेंगी कि इस महंगाई के जमाने में बारबार नया किचन का सामान खरीदें तो कैसे. इस सोच से बाहर निकलें क्योंकि औनलाइन शौपिंग के इस जमाने में समयसमय पर ऐक्सचेंज औफर आते रहते हैं. तो इन औफर्स पर नजर रखें और इन का फायदा उठाएं.

हां, यदि कुछ टूल्स बिलकुल ही काम के नहीं रहे, तो उन की जगह ये मौडर्न और मल्टीपर्पज कुकिंग टूल्स ले सकती हैं:

हैंड ब्लैंडर: यह एक मल्टीपर्पज गैजेट है, जिस से आप मलाई फेंट कर घी निकाल सकती हैं और सूप, लस्सी आदि अच्छी तरह से बना सकती हैं. यह आप के कुकिंग के स्टाइल को आसान कर देता हैं.

माइक्रोवेव: अगर आप को अपने परिवार के स्वास्थ्य की चिंता है तो माइक्रोवेव घर ले आइए. इस का फायदा यह है कि इस में न सिर्फ खाना जल्दी पकता है, पौष्टिक भी होता है. इस में कई टेस्टी डिशेज भी बनाई जा सकती हैं.

ईकोफ्रैंडली इंडक्शन चूल्हा: आप चाहें तो इंडक्शन चूल्हा ले कर लेटैस्ट टेक्नोलौजी की धाक लोगों पर जमा सकती हैं इस से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता है और यह पैसे की बचत भी करता है. यह खाना बनाने का एक लेटैस्ट चूल्हा है और उन घरों के लिए बैस्ट है जहां जगह कम होती है. इसे किचन के अलावा कहीं भी रखा जा सकता है.इस में न तो लपटें और न ही धुआं होता है.

नाइफ सैट: फलों और सब्जियों की पोषकता व गुणवत्ता बनी रहे इस के लिए जितना बेहतर नाइफ सैट होता है, उतना ही बेहतर काटने का अनुभव होता है. छीलने वाले नाइफ से ले कर बोनिंग नाइफ तक, हर तरह की कटिंग के लिए बैस्ट नाइफ होते हैं.

कटिंग बोर्ड: सब्जी काटने के लिए आप लकड़ी का चौपिंग बोर्ड ले सकती हैं. इस पर सब्जी काटने का मजा ही कुछ खास होता है.

टेफलौन शीट: टेफलौन शीट वाले बरतन अब जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं. ये नौनस्टिक पैन टेफलौन कोटिंग वाले फास्ट टु कुक, इजी टु क्लीन इमेज वाले होते हैं, जो देखने में बेहद आकर्षक लगते हैं.

ग्रिलिंगपैन: आप यूरो कुक ग्रिलिंगपैन के साथ ग्रिल्ड फूड का मजा ले सकती हैं. यह एक अच्छा कुकवेयर है, जिस में टेफलौन ड्राफ्ट कोटिंग का उपयोग किया गया है. सामान्य कुक वेयर की तुलना में इस में कम घी, तेल के साथ भी खाना पकाया जा सकता है.

कटलरी सैट: अब मार्केट में कई अच्छी क्वालिटी के कटलरी सैट मिलते हैं, जिन्हें आप अपनी पसंद के अनुसार खरीद सकती हैं.

फूड प्रोसैसर: यह आप के किचन का एक अहम हिस्सा है, जो आप की कुकिंग प्रक्रिया को बेहतर बनाता है. यह सब्जी काटने से ले कर सलाद बनाने, आटा गूंधने, चटनी बनाने तक सक्षम है.

फ्लैट बौटम होब्स (चूल्हा): मार्केट में गैस चूल्हे के बर्नर्स की भी काफी वैराइटी है. अब ऐसे बर्नर्स आ रहे हैं, जो काले नहीं पड़ते. ये एलोय के बने होते हैं.

आजकल की बिजी लाइफ में जब हर काम के लिए आपाधापी का माहौल रहता है तब ये ऐडवांस किचन टूल्स आप के बेहद काम आएंगे.

सीजन के अनुसार आप को बदलना होगा मेकअप का तरीका

आने वाले सीजन का मेकअप ट्रैंड बहुत ही लाइट और सादगीभरा होगा. ऐसे में आप किस तरह परफैक्ट मेकअप लुक पा सकती हैं, आइए जानते हैं:

– अगर आप की स्किन क्लीयर है, तो आप को हैवी फाउंडेशन लगाने की जरूरत नहीं है. उस की जगह लाइट फाउंडेशन में थोड़ा सा शिमर मिला कर लगाएं. यह आप की स्किन को ग्लोइंग टच देगा.

– फेस की कंटूरिंग हमेशा लाइट ही करनी चाहिए. इस के लिए पीच पिंक ब्लश जो आजकल काफी ट्रैंड में है का इस्तेमाल कर काफी अच्छा लुक पा सकती हैं.

– लाइट आई मेकअप करने की कोशिश करें यानी आंखों को सौफ्ट टच देने की जो आप के डे और ईवनिंग लुक दोनों पर जंचेगा.

– स्मोकी आंखों के लिए ब्लैक ही नहीं, बल्कि ग्रीन, ब्लू, ग्रे, बैरीज कलर्स ट्राई कर सकती हैं.

– लिप्स को भी अट्रैक्टिव बनाना न भूलें, क्योंकि इस बार के फैशन में इन का अहम रोल है. इस के लिए या तो आप अपने लिप्स को न्यूड पिंक या फिर गोल्डन टच जिस में शिमरी लुक हो से बहुत ही बेहतरीन लुक पा सकती हैं.

– आजकल फैशन में बैरीज, डीप ब्राउन और मैटेलिक फिनिश में पिंक कलर है, फिर भी आंखों और चेहरे पर इस का कम ही इस्तेमाल करें, क्योंकि यह आप के रूप को बिगाड़ने का काम करेगा.

यों संवारें खुद को

न्यूड लिप्स ऐंड आईज: न्यूड शेड लिपस्टिक के साथ आप अपनी पलकों को मसकारे की मदद से कर्ल करने के साथ इनर लिड्स पर हलका सा व्हाइट काजल लगा कर अमेजिंग लुक हासिल कर सकती हैं. इसी के साथ आंखों के नीचे की झुर्रियों को कंसीलर की मदद से दूर कर के परफैक्ट दिखें.

स्मोकी आंखें: इस स्प्रिंग आप ब्लू, पर्पल, यलो, पिंक जैसे आईशैडो से आंखों को दें स्मोकी लुक, साथ ही लाइट लिप शेड्स ट्राई करें. भले ही आप न बोलें आप की आंखें सब बयां कर देंगी.

ग्लोइंग स्किन: स्किन को चार्मिंग व ग्लोइंग दिखाने के लिए पीची ब्लश और लाइट लिक्विड फाउंडेशन या फिर सीसी क्रीम का इस्तेमाल करें. साथ ही लिपस्टिक के न्यूड शेड्स ट्राई करना न भूलें.

ग्लिटर आईलाइनर्स, लिप टिंट्स: अब बोरिंग ब्लैक लाइनर्स के बजाय गोल्ड, सिल्वर लाइनर का इस्तेमाल कर के आंखों को अट्रैक्टिव बनाइए. लिप टिंट्स लिप्स को मौइश्चर तो देगा ही, साथ ही ग्रेस भी अलग आएगी.

हाईलाइटर: हाईलाइटर जो सिर्फ चीक्स को शाइन देने का ही काम नहीं करेगा, बल्कि इसे आंखों के कौनर्स पर लगाने से आंखों बड़ीबड़ी दिखेंगी. इसी के साथ आप इसे लिपस्टिक पर गोल्डन फिनिश के रूप में भी इस्तेमाल कर सकती हैं यानी मल्टी वर्क.

लाइट कंटूरिंग लुक: लाइट कंटूरिंग स्टिक का इस्तेमाल कर ग्लैमरस लुक पा सकती हैं.

– मौना लाल, सैलिब्रिटी मेकअप आर्टिस्ट

लौटती बहारें (प्रथम किस्त) : मीनू के मायके वालों में क्या बदलाव आया

अचानकशेखर को जल्दी घर आया देख मैं चौंक गई. साहब 8 बजे से पहले कभी पहुंचते नहीं हैं. औफिस से तो 6 बजे छुट्टी हो जाती है, पर घर पहुंचने में समय लग जाता है. मगर आज एक मित्र ने गाड़ी में लिफ्ट दे दी. अत: जल्दी आ गए. बड़ा हलकाफुलका महसूस कर रहे थे.

मैं जल्दी से 2 कप चाय ले कर अम्मांजी के कमरे में पहुंची. औफिस से आ कर शेखर की हाजिरी वहीं लगती है. पापा का ब्लडप्रैशर, रवि भैया का कालेज सभी की जानकारी लेने के बाद आखिर में मेरी खोजखबर ली जाती और वह भी रात के डिनर का मैन्यू पता करने के लिए. पापाजी भी शाम की सैर से आ गए थे. उन के लिए भी चाय ले कर गई. जल्दी में पोहे की प्लेट रसोई में ही रह गई. बस अम्मां झट से बोल उठीं, ‘‘बहू इन की पोहे की प्लेट कहां है?’’

मैं कुछ जवाब देती उस से पहले ही शेखर का भाषण शुरू हो गया, ‘‘मीनू, 2 महीने हो गए हमारे घर आए पर तुम अभी तक एक भी नियमकायदा नहीं सीख पाई हो. कल अम्मां का कमरा साफ नहीं हुआ था. उस से पहले रवि के कपड़े प्रैस करना भूल गई थी.’’

अम्मां ने जले पर नमक बुरकते हुए कहा, ‘‘पराए घर की लड़कियां हैं, ससुराल को अपना घर कहां समझती हैं.’’

मैं मन मसोस कर रह गई. कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया. मैं सुबह से ले कर देर रात तक इस घर में सब की फरमाइशें पूरी करने के लिए चक्करघिन्नी की तरह घूमती हूं, फिर भी पराया घर, पराया खून बस यही उपाधियां मिलती हैं.

मैं बोझिल कदमों से रसोई में आ कर रात के डिनर की तैयारी में जुट गई. खाना तैयार कर मैं दो घड़ी आराम करने के लिए अपने कमरे में जा रही थी तो अम्मांपापाजी को कमरे में अपने श्रवण कुमार बेटे शेखर से धीमे स्वर में बतियाते देखा तो कदम सुस्त हो गए.

ध्यान से सुनने पर पता चला शेखर 8 दिनों के लिए मुंबई टूअर पर जा रहे हैं. इसीलिए आज जल्दी घर आ गए थे. मन में टीस सी उठी कि जो खबर सब से पहले मुझे बतानी चाहिए थी, उसे अभी तक इस बात का पता ही नहीं.

अभी 2 महीने पहले ही आंखों में सपने लिए ससुराल आई थी, पर अपनापन कहीं दूरदूर तक दिखाई नहीं देता. सब ने एक बेगानेपन का नकाब सा ओढ़ रखा है. हां, रवि भैया को जब कोई काम होता है तो अपनापन दिखा कर करवा लेते हैं. शेखर के प्यार की बरसात तभी होती है जब रात को हमबिस्तर होते हैं.

मैं ने जल्दी से मसाले वाला गाउन बदल हाथमुंह धो कर साड़ी पहन ली. बाल खोल कर सुलझा रही थी कि शेखर सीटी बजाते हुए बड़े हलके मूड में कमरे में आ गए. मुझे तैयार होते देख मुसकराते हुए अपनी बांहों के घेरे में लेने लगे तो मैं ने पूछा, ‘‘आप ने जल्दी आने का कारण नहीं बताया?’’

शेखर बोले, ‘‘अरे, कुछ खास नहीं. 8 दिनों के लिए मुंबई टूअर पर जा रहा हूं.’’

मैं ने शरमाते हुए कहा, ‘‘मैं 8 दिन आप के बिना कैसे रहूंगी? मेरा मन नहीं लगेगा आप के बिना… मुझे भी साथ ले चलो न… वैसे भी शादी के बाद कहीं घूमने भी तो नहीं गए.’’

यह सुनते ही इन का सारा रोमांस काफूर हो गया. मुझे बांहों के बंधन से अलग करते हुए बोले, ‘‘मेरी गैरमौजूदगी में अम्मांपापा का खयाल रखने के बजाय घूमनेफिरने की बात कह रही हो… अम्मां सही कहती हैं कि बहुएं कभी अपनी नहीं होती… पराया खून पराया ही होता है.’’

यह सुन कर मैं ने चुप रहना ही ठीक समझा.

शेखर भी अनमने से प्यारमुहब्बत का ऐपिसोड अधूरा छोड़ डिनर के लिए अम्मांपापा को बुलाने चले गए. रवि भैया भी आ पहुंचे थे. मैं पापा की पसंद के भरवां करेले और सब की पसंद की अरहर की दाल व चावल परोस कर गरमगरम रोटियां सेंकने लगी.

सब डिनर कर कुरसियां खिसका कर उठ खड़े हुए. मुझे न तो किसी ने खाना खाने के लिए कहा न कोई मेरे लिए खाना परोसने खड़ा हुआ. मैं ने भी लाजशर्म छोड़ जल्दी से हाथ धो कर अपनी थाली लगा ली. बचा खाना मेरी प्रतीक्षा में था. भूख ज्यादा लगी थी, इसलिए खाना कुछ जल्दी खा लिया.

अम्मां के कमरे के बाहर लगे वाशबेसिन में हाथ धो रही थी कि अम्मांजी की व्यंग्यात्मक आवाज कानों में पड़ी, ‘‘शेखर के पापा, देखा आप ने नई बहू वाली तो कोई बात ही नहीं है मीनू में… मैं जब आई थी तो सासननद से पूछे बिना कौर नहीं तोड़ती थी. यहां तो मामला ही अलग है.’’

यह सुन कर मन वितृष्णा से भर उठा कि यह क्या जाहिलपन है. नई बहू यह नहीं करती, पराए घर की, पराया खून बस यही सुनसुन कर कान पक गए.

अम्मां की बातों को दरकिनार कर मैं अपने कमरे में चली गई. वहां शेखर अपने कपड़े फैलाए बैठे थे. पास ही सूटकेस रखा था. समझ गई साहब जाने की तैयारी में लगे हैं. मैं बड़े प्यार से उन का हाथ पकड़ उन्हें उठाते हुए बोली, ‘‘हटिए, मैं आप का सूटकेस तैयार कर देती हूं…’’

‘‘अब आप को यह जहमत उठाने की जरूरत नहीं है,’’ शेखर ने हाथ झटकते हुए कहा, ‘‘अरे यार, कनफ्यूज न करो. तुम्हें मेरी पसंदनापसंद का कुछ पता भी है.’’

मैं चुप लगा कर बाहर बालकनी में आ कर खड़ी सड़क की रौनक देखने लगी. मन बहुत खिन्न था. पहली बार विवाह के बाद बाहर जा रहे हैं… अकेली कैसे रहूंगी… होने को भरापूरा घर है… ऐसा कोई कष्ट भी नहीं है, परंतु ससुराल में जो सब की अलगाव की भावना मुझे अंदर ही अंदर सालती थी.

मैं पेड़ से टूटी डाली की तरह एक ओर पड़ी थी. कुछ दिन पहले की ही बात है. इन की बहन नीलम जीजी आई थीं. मेरी हमउम्र भी थीं. मैं मन ही मन बहुत उत्साहित थी कि नीलम जीजी से खुल कर बातें करूंगी. इतने दिनों से लाज, संकोच ही पीछा नहीं छोड़ता था कि कहीं कुछ गलत न बोल जाऊं. नईनवेली थी. जबान खुलती ही न थी. मैं अल्पभाषी थी. मगर अब सोच लिया था कि नीलम जीजी को अपनी दहेज में मिली साडि़यों और उपहारों को दिखाऊंगी. वे कुछ लेना चाहेंगी तो उन्हें दे दूंगी. उन का उन की ससुराल में मान बढ़ेगा.

मैं ने बड़े चाव से रवि भैया से उन की खानेपीने की पसंद पूछ कर उन की पसंद का मटरपनीर, भरवां भिंडी, मेवे वाली खीर बना दी. मैं हलका सा मेकअप कर तैयार हो नीलम जीजी का बेकरारी से इंतजार करने लगी.

नीलम जीजी नन्हे राहुल को ले कर अकेली ही आई थीं. उन्हें देख कर मैं बहुत उत्साह से आगे बढ़ी और उन्हें गले लगा लिया. मुझे लगा जैसे मेरी कोई बचपन की सहेली हैं पर नीलम जीजी तुरंत मुझे स्वयं से अलग करते हुए एक औपचारिक सी मुसकान दे कर अम्मांअम्मां करते हुए कमरे में चली गईं.

मुझे ठेस सी लगी पर मैं सब कुछ भूल कर ननद की सेवा में जुट गई. मांबेटी को एकांत देने के लिए मैं रसोई में ही बनी रही.

छुट्टी का दिन था. सब घर में ही थे. अम्मां के घुटनों का दर्द बहुत बढ़ा हुआ था, इसलिए उन्होंने मुझे आदेश दिया, ‘‘बहू खाना मेरे कमरे में ही लगा दो.’’

एक अतिरिक्त टेबल रख कर मैं खाना रखने की व्यवस्था कर किचन में चली गई. किचन में जा कर मैं ने जल्दीजल्दी चपातियां बनाईं. अम्मां के कमरे में खुशनुमा महफिल जमी थी. ठहाकों की आवाजें आ रही थीं. मैं जैसे ही खाना ले कर कमरे में पहुंची सब चुप हो गए मानो कमरे में कोई अजनबी आ गया हो. हंसने वाले चुप हो गए, बोलने वालों ने बातों का रूख बदल दिया. खाना टेबल पर लगा कर मैं जल्दीजल्दी चपातियां देने लगी.

खाना खाने के बाद नीलम जीजी और रवि बरतन समेट कर रसोई में रखने आ गए. किचन से निकलते समय वे बिना मेरी ओर देखे बोले, ‘‘आप भी हमारे साथ खा लेतीं भाभी.’’

मैं कोई जवाब देती उस से पहले ही रवि व जीजी किचन से जा चुके थे. एक बार फिर महफिल जम गई. मैं शांता बाई के साथ मिल कर रसोई संभालने लगी. बड़ा मन कर रहा था कि मैं भी उन के साथ बैठूं, घर के और सदस्यों की तरह हंसीमजाक करूं, पर न मुझे किसी ने बुलाया और न ही मेरी हिम्मत हुई. शाम की चाय के बाद नीलम जीजी जाने को तैयार हो गईर्ं. रवि औटो ले आया. शेखर और पापाजी आंगन में खड़े जीजी से बतिया रहे थे. मैं भी वहीं पास जा कर खड़ी हो गई. औटो आते ही मैं लपक कर आगे बढ़ी पर जीजी सिर पर पल्ला लेते हुए ‘‘भाभी बाय’’ कह कर औटो में जा बैठीं. देखतेदेखते औटो चला गया. मैं ठगी सी वहीं खड़ी रही. अलगाव की पीड़ा ने मुझे बहुत उदास कर दिया था.

रवि की आवाज मुझे एक बार फिर वर्तमान में खींच लाई. रवि ने बताया कि आप के मायके से पापा का फोन आया है. मैं ने रवि से मोबाइल ले कर पापा से कुशलमंगल पूछा तो उन्होंने बताया कि 31 मार्च को उन का रिटायरमैंट का आयोजन है. मुझे सपरिवार आमंत्रित किया.

तब पापाजी (मेरे ससुरजी) ने, मेरे पापा से न आ पाने के लिए क्षमायाचना करते हुए मुझे भेजने की बात कही. तय हुआ कि रवि मुझे बस में बैठा देगा. वहां सहारनपुर बसअड्डा से राजू मुझे ले लेगा.

सहारनपुर अपने मायके जाने की बात सुन कर मुझे तो जैसे खुशियों के पंख लग गए. पगफेरे के बाद मैं पहली बार वहां अकेली रहने जा रही थी. मैं भी अपना सूटकेस तैयार करने के लिए उतावली हुई जा रही थी.

शेखर प्यार से छेड़ने लगे, ‘‘चलो, अब तो हमारी जुदाई का गम न झेलना पड़ेगा?’’

शेखर बहुत रोमांटिक मूड में थे. मैं भी फागुनी बयार की तरह बही जा रही थी. पूरे मन से शेखर की बांहों में समा गई. कब रात बीती पता ही नहीं चला.

पड़ोस के घर बजे शंख से नींद खुली. 5 बज गए थे. जल्दी से उठ कर नहा कर नाश्ते की तैयारी में जुट गई. इन्हें भी आज जाना था. मुझे कल सवेरे निकलना था. अत: जल्दीजल्दी काम निबटाने लगी. महीने भर का राशन आया पड़ा था. उसे जल्दीजल्दी डब्बों में भरने लगी. मैं सोच रही थी मेरे जाने के बाद किसी को सामान ढूंढ़ने में दिक्कत न हो.

तभी अम्मांजी किसी काम से किचन में आ गईं. मुझे ये सब करते देख बोलीं,

‘‘बहू, तुम यह सब रहने दो. मैं कामवाली शांता से कह कर भरवा दूंगी… तुम मां के यहां जाने

की खुशी में, सूजी में बेसन और अरहर में चना दाल मिला दोगी. यह काम तसल्ली से करने के होते हैं.’’

मेरे मन में जो खुशी नृत्य कर रही थी उसे विराम सा लगा. बिना कुछ कहे मैं उठ खड़ी हुई. मन में सोचने लगी कि अब तो यही मेरा घर है…कैसे इन सब को विश्वास दिलाऊं.

अपने कमरे में जा कर शेखर ने जो समान इधरउधर फैलाया था उसे यथास्थान रखने लगी. शेखर नहाने गए हुए थे.

अचानक दिमाग में आया कि पापा के रिटायरमैंट पर कोई उपहार देना बनता है. छोटी बहन रेनू और भाई राजू को भी बड़ी होने के नाते कुछ उपहार देना पड़ेगा. सोचा शेखर नहा कर आ जाएं तो उन से सलाह करती हूं. वैसे उन के जाने में 1 घंटा ही शेष था. वे मुझे उपहारों की शौपिंग के लिए अपना साथ तो दे नहीं पाएंगे, हां क्या देना है, इस की सलाह जरूर दे देंगे. मैं आतुरता से उन का इंतजार करने लगी.

शेखर नहा कर निकले तो बहुत जल्दीजल्दी तैयार होने लगे. उन की जल्दबाजी देख कर मुझे समझ नहीं आ रहा था अपनी बात कैसे शुरू करूं? जैसे ही वे तैयार हुए मैं ने झट से अपनी बात उन के सामने रखीं.

सुन कर झल्ला उठे. बोले, ‘‘अरे मीनू, तुम भी मेरे निकलने के समय किन पचड़ों में डाल रही हो? इस समय मैं उपहार देनेलेने की बातें सुनने के मूड में नहीं हूं. तुम जानो और तुम्हारे पापा का रिटायरमैंट,’’ कह कर अपना पल्ला झाड़ उठ खड़े हुए और अम्मां के कमरे में चले गए. जातेजाते अपना सूटकेस भी ले गए यानी वहीं से विदा हो जाएंगे.

मैं जल्दी से नाश्ता लगा कर ले गई. मेरे मन के उत्साह पर शेखर की बातों ने पानी सा डाल दिया था. मुझे लगा जाते समय शेखर मुझे कुछ रुपए अवश्य दे जाएंगे पर नाश्ता कर के हटे ही थे कि गाड़ी आ गई, ‘‘अच्छा, बाय मीनू,’’ कह कर गाड़ी में जा बैठे.

मैं देखती ही रह गई. परेशान सी खड़ी रह गई. सोचने लगी उपहारों के लिए पैसे कहां से लाऊं… जिस पर हक था वह तो अनदेखा कर चला गया. अम्मांपापाजी से रुपए मांगने में लज्जा और स्वाभिमान दीवार बन गया.

अचानक याद आया विदाई के समय कनाडा वाली बुआ ने कुछ नोट हाथ में थमाए थे, जिन्हें उस ने बिना देखे संदूक के नीचे तल में डाल दिए थे. जल्दी से कमरे में जा कर संदूक की तलाशी लेने लगी. एक साड़ी को झाड़ने पर कुछ नोट गिरे. ऐसे लगा कोई कुबेर का खजाना हाथ लग गया. लेकिन गिने तो फिर निराशा ने घेर लिया.

केवल 3000 रुपए ही थे. उन में अच्छे उपहार आना कठिन था. रवि भैया से हिम्मत कर के साथ चलने के लिए मिन्नत की तो वे मान तो गए पर बोले, ‘‘भाभी आप का बजट कितना है? उसी अनुसार दुकान पर ले चलता हूं.’’

मैं ने जब धीमी आवाज में बताया कि 3000 रुपए हैं तो रवि भैया ने व्यंग्य में मुसकरा कर कहा, ‘‘भाभी फिर तो आप पटरी वालों से ही खरीदारी कर लें.’’

मुझे कुछ पटरी वाले आवाज देने लगे तो मैं कुछ कपड़े देखने लगी. कपड़े वास्तव में कामचलाऊ थे. जींस, टौप वगैरह सभी कुछ था.

रेनू और छोटे भाई राजू के लिए सस्ते से कपड़े खरीद कर पापा और मम्मी के लिए कुछ ठीकठाक ही लेना चाहती थी. किसी तरह मां के लिए एक सस्ती सी साड़ी और पापा के लिए एक शौल ले कर घर लौट आई. औटो के पैसे रवि भैया ने ही दिए.

इतना घटिया सामान खरीदा. फिर रवि को कुछ खिलानापिलाना तो दूर उलटे औटो तक के पैसे ले लिए. मैं शर्म से गड़ी जा रही थी. कैसे बताती अपनी पसंद के बारे में. कभीकभी इंसान हालात के हाथों मजबूर सा हो जाता है.

अगले दिन रवि भैया ने मुझे सहारनपुर जाने वाली बस में बैठा दिया. अम्मां ने एक मिठाई का डब्बा दे कर अपना कर्त्तव्य निभा दिया.

शादी के बाद पहली बार अकेली मायके जा रही थी. दिल खुशी से धड़क रहा था.

पिछली बार तो पगफेरे के समय वे साथ थे. मम्मीपापा, भाईबहन से ज्यादा बातें करने का अवसर ही नहीं मिला, क्योंकि शेखर हर समय साथ रहते थे. अगले दिन वापस भी आ गए थे.

मन रोमांचित हो रहा था कि इस बार अपनी प्यारी सहेली चित्रा से भी मिलूंगी. रेनू और राजू मेरे बाद कितने अकेले हो गए होंगे. उन दोनों की चाहे पढ़ाई से संबंधित समस्या हो या कोई और, हल अपनी मीनू दीदी से ही पूछते थे. मम्मी का भी दाहिना हाथ मैं ही थी. पापा मुझे देख गर्व से फूले न समाते. यही सोचतेसोचते समय कब बीत गया पता ही नहीं चला.

झटके से बस रूकी. मैं ने देखा सहारनपुर आ गया था. मैं पुलकित हो उठी. बस की खिड़की से झांका तो राजू तेज कदमों से बस की ओर आता दिखा. बस से उतरते ही राजू ने मेरा सूटकेस थाम लिया. उसे देख खुशी से मेरी आंखें भर आईं. 2 ही महीनों में राजू बहुत स्मार्ट हो गया था. नए स्टाइल में संवरे बाल, आंखों पर काला चश्मा लगा था.

घर पहुंचते ही ऐसे लगा मानो कोई खोई हुई चीज अचानक मिल गई हो. मैं सब से टूट कर मिली. मम्मीपापा ने पीठ पर हाथ फेर कर दुलारा. मुझे लगा कि मैं इस प्यार के लिए कितना तरस गई थी. मेरा और ससुराल का हालचाल

पूछ मम्मी किचन में चली गईं. मैं पापा की सेहत और रेनू व राजू की पढ़ाई के बारे में पूछताछ करने लगी.

बड़े अच्छे माहौल में खाना खत्म हुआ. राजू और रेनू मेरी अटैची के आसपास घूमने लगे. बोले, ‘‘बताओ दीदी, दिल्ली से हमारे लिए क्या लाई हो?’’

मैं शर्म से गड़ी जा रही थी कि किस मुंह से उपहार दिखाऊं. मैं अनिच्छा से ही उठी और उन दोनों के पैकेट निकाल कर दे दिए. पैकेट खोलते ही रेनू और राजू के मुंह उतर गए. दोनों मेरी ओर देखने लगे.

रेनू बोली, ‘‘आप कमाल करती हैं दीदी… पूरी दिल्ली में यही घटिया चीजें आप को हमारे लिए मिलीं.’’

राजू भी बोल उठा, ‘‘दीदी, ऐसे चीप कपड़े तो हमार कामवाली बाई के बच्चे भी नहीं पहनते हैं.’’

शर्म और अपमान से मैं क्षुब्ध हो उठी. यह सही था. कपड़े उन के स्तर के नहीं थे, परंतु ऐसा व्यवहार तो मैं ने उन का पहली बार देखा था. दोनों पैकेटों को पलंग पर रख कमरे से बाहर निकल गए. मैं हैरानपरेशान उन्हें देखती रह गई.

जो भाईबहन मुझे इतना आदर और मान देते थे वही सस्ते से उपहारों के लिए इतना सुना गए. मन खिन्न हो उठा. बहुत थकी थी. वहीं पलंग पर लेट गई. न जाने कब आंख लग गई.

शाम को आंख खुली तो कानों में रेनू की आवाज सुनाई दी.

मैं ने बालकनी से नीचे देखा तो रेनू एक लड़के से बातें करती दिखाई दी. लड़का बाइक पर बैठा था. हावभाव और बातचीत से किसी निम्नवर्गीय परिवार का लग रहा था. अचानक उस ने बाइक स्टार्ट की और रेनू को फ्लाइंग किस देता हुआ तेज गति से चला गया.

यह सब देख मैं हैरान रह गई. अभी तो कालेज में रेनू का पहला वर्ष ही है. उस ने अपनी आयु के 18 वर्ष भी पूरे नहीं किए. अपरिपक्व है. अभी से यह किस रास्ते चल पड़ी? फिर मैं ने सोचा कि मौका देख कर बात करूंगी.

मम्मी कमरे में चाय ले कर आ गईं. मैं ने मम्मी का हाथ पकड़ कर, ‘‘मम्मी, आप यहीं बैठो,’’ कह कर मैं ने उन के लिए लाई साड़ी और पापा की शौल का पैकेट उन्हें पकड़ा दिया. मेरी आंखें शर्म से झुकी जा रही थीं.

उन्होंने साड़ी और शौल को उलटपुलट कर देखा, फिर बोलीं, ‘‘इस की क्या जरूरत थी. अभी तेरे पापा ने रिटायरमैंट के अवसर पर महंगी साडि़यां दिलवाई हैं,’’ और फिर पैकेट वहीं छोड़ किचन में चली गईं.

मैं शर्मिंदगी से उबर नहीं पा रही थी. मैं ने सारे तोहफे समेटे और अलमारी के कोने में रख दिए.

बड़ा नौर्मल सा दिखने का अभिनय करते हुए मैं मम्मी के पास किचन में चली गई.

मुझे देखते ही मम्मी बोली, ‘‘अरे, तू कमरे में ही आराम कर यहां कहां चली आई. अब तो तू हमारी मेहमान है.’’

यह सुन कर मेरी आंखें भर आईं. मैं मुंह फेर कर बरतनों को उलटपलट कर रखने लगी. मुझे वे दिन याद आने लगे, जब मेरे किचन में जाने पर मम्मी आश्वस्त हो बाहर निकल जाती थीं. दो घड़ी आराम कर लेती थीं. कल तो मौसियां, चाची, बूआ सब मेहमान आ जाएंगे. फिर तो मम्मी को जरा सी भी फुरसत नहीं मिलेगी. बड़ा मन कर रहा था कि मां की गोद में सिर रख कर खूब रो लूं, मन हलका कर लूं पर मां तो लगातार काम करती जा रही थीं. बीचबीच में ससुराल के मेरे अनुभव भी पूछती जा रही थीं. मुझे जो भी सूझता जवाब देती जा रही थी.

मम्मी ने रसोई में पड़ा स्टूल मेरी तरफ खिसका दिया और बोलीं, ‘‘थक जाएगी, बैठ जा.’’

उन का यह मेहमानों वाला व्यवहार मेरे सीने में किसी कांटे की तरह चुभ रहा था.

अगले दिन बहुत चहलपहल रही. घर में खूब रौनक हो गई थी. सब की केंद्र बिंदु मैं थी. सभी ससुराल के अनुभव, पति, घर वालों के स्वभाव के बारे में पूछ रहे थे. मैं दिल में टीस छिपाए रटेरटाए उत्तर देती जा रही थी. कैसे बताती कि मैं पेड़ से टूटी शाखा और शाखा से

टूटे पत्ते जैसी जिंदगी गुजार रही हूं. अपनापन पाने की कई परीक्षाएं दे चुकी पर हर बार असफल होती रही.

पापा का सेवानिवृत्ति का आयोजन बहुत अच्छी तरह संपन्न हो गया. सभी लोगों

ने उन की ईमानदारी की खूब प्रशंसा की. मैं ने देखा पापा ने चेहरे पर कृतिम खुशी का जो मुखौटा लगा रखा था वह कई बार खिसक जाता तो चेहरे पर चिंता की रेखाएं दिखने लगतीं. मैं जानती थी कि ये चिंताएं रेनू और राजू को ले कर हैं, जो अभी कहीं सैटल नहीं हैं. उन की शिक्षा, विवाह, नौकरी सभी कुछ बाकी है. यह तो पापा की दूरदर्शिता थी कि समय पर यह मकान बनवा लिया था, जिस की छत्रछाया में उन का परिवार सुरक्षित था. अब तो फंड और पैंशन से गुजारा चलाना था.

अगले दिन पापा कैटरिंग वालों का हिसाब कर रहे थे. उधर मेहमानों की विदाई भी हो रही थी.

मेहमानों के जाते ही घर में सन्नाटा सा छा गया. सब थके हुए थे. दोपहर को थकान उतारने के लिए आराम करने लगे.

मैं ने इस आयोजन के दौरान एक बात और नोट की कि पूरे आयोजन में रेनू और राजू का सहयोग नगण्य था. रेनू काफी समय तो पार्लर में लगा आई बाकी समय मौसी, चाची और बूआ से गपशप करती रही. राजू भी मेहमानों के साथ मेहमान बना घूम रहा था. 1-2 बार तो मैं ने उसे बिलकुल पड़ोस वाली टीना, जो उस की ही हमउम्र थी, से इशारेबाजी करते भी देखा. देखने में ये बातें इस उम्र में नौर्मल होती है, परंतु इन्हें अपनी पढ़ाईलिखाई और जिम्मेदारी का पूरा ध्यान रखना चाहिए. उपहारों को ले कर किए इन दोनों के कटाक्ष एक बार फिर मेरी वेदना को बढ़ा गए. मन उचाट हो गया. मैं उठ कर अपने कमरे में चली गई.

रेनू और राजू घर पर नहीं थे. मम्मीपापा सोए हुए थे. मैं ने देखा पूरे कमरे की काया पलट हो चुकी थी. दीवारों पर आलिया भट्ट, वरुण धवन के पोस्टर लगे हुए थे.

फिर मैं ने अपनी अलमारी खोली. इस में मेरी बहुत सी यादें जुड़ी थी. अलमारी में रेनू के कपड़े और सामान रखा था. इधरउधर देखा, रेनू की अलमारी पर ताला लगा था. अचानक अलमारी के ऊपर रखी 2 गठरियां दिखाई दीं. उतार कर देखीं तो एक में मेरे कपड़े थे और एक में किताबें बंधी थीं. मैं उन्हें कहां रखूं, यह सोच ही रही थी कि रेनू के बाय कहने की आवाज आई.

बालकनी में जा कर देखा, रेनू उसी लड़के की बाइक से उतर कर

ऊपर आ रही थी. मुझे सामने पा कर चौंक गई. फिर नजरें बचा कर अंदर जाने लगी.

उसी समय राजू भी किसी से मोबाइल पर बातें करता ऊपर आ गया. मुझे देख मोबाइल छिपाते हुए अपने कमरे की ओर जाने लगा. मैं ने उसे आवाज दी तो वह अनसुना कर गया.

अब मेरा धैर्य भी जवाब देने लगा था.

फिर भी मैं ने यथासंभव खुद को सामान्य करते हुए बड़े प्यार से दोनों को पुकारा. रेनू तो अभी वहीं खड़ी थी. राजू मुंह फुलाए आकर खड़ा हो गया.

मैं ने बड़े प्यार से दोनों की पढ़ाईलिखाई के बारे में पूछा तो दोनों ने संक्षिप्त उत्तर दिए और जाने लगे.

मैं ने राजू से पूछा, ‘‘यह मोबाइल तुम ने नया खरीदा क्या?’’

‘‘पापा ने ले कर दिया?’’

राजू मुंह बना कर बोला ‘‘पापा क्या ले कर देंगे, यह मुंबई वाली मौसी का बेटा रजत अपना पुराना मोबाइल दे गया. मैं ने अपनी सिम डलवा ली.’’

मैं ने कहा, ‘‘ऐसे एकदम किसी से कोई चीज नहीं लेते. कम से कम मुझ से ही एक बार पूछ लेते. पापा को तो तुम ने कहा ही नहीं होगा. वरना क्या वे मना कर देते.’’

यह सुन कर राजू ने बहुत अवज्ञा से मुंह बनाया. यह देख मुझे गुस्सा आया. मैं ने कहा, ‘‘देख रही हूं तुम दोनों 2 महीनों में ही बहुत बदल चुके हो,’’ कह मैं ने रेनू की ओर मुखातिब हो कर पूछा, ‘‘रेनू यह लड़का कौन है जिस की बाइक पर तुम आई थीं?’’

यह सुन कर रेनू गुस्से से फट पड़ी, ‘‘क्या हो गया दीदी… वह रोमी है. कालेज में मेरे साथ पढ़ता है… क्या हो गया अगर मुझे छोड़ने घर तक आ गया?’’

मैं ने उसे शांत करते हुए कहा, ‘‘रेनू, इन बातों के लिए तुम अभी बहुत छोटी हो, भोली हो, अभी तुम दोनों को अपनी पढ़ाईलिखाई पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए… राजू, रात मैं पानी पीने उठी तो तुम्हारे कमरे की लाइट जल रही थी. मैं ने सोचा तुम अभी तक पढ़ रहे होगे. लेकिन खिड़की से देखा तो पाया कि तुम रात को 1 बजे तक टीवी देख रहे थे. तुम दोनों जानते हो कि पापा को तुम दोनों से बहुत उम्मीदे हैं. उन्हें यह सब जान कर बुरा लगेगा. अभी पढ़ाई पर पूरा ध्यान लगाओ.’’

यह सुन कर राजू बोला, ‘‘दीदी, हम लोगों ने ऐसा क्या दुनिया से अलग कर दिया है जो तुम हमें ताने मार रही हो?’’

रेनू बोली, ‘‘हमें यह बेकार की रोकटोक पसंद नहीं… आप अपना बहनजीपन हम पर

मत थोपो… अपनी ससुराल में जा कर यह रोब दिखाना.’’

मैं यह सब सुन कर सन्न रह गई कि क्या ये वही रेनू और राजू हैं, जो हर काम मेरे से पूछ कर करते थे? दोनों मैथ और अंगरेजी में कमजोर थे. मैं अपनी पढ़ाई खत्म कर दोनों को रात 1-2 बजे तक पढ़ाती थी. तब जा कर पास होने योग्य नंबर जुटा पाते थे. मैं इन का आदर्श थी.

हम सब की तेज अवाजें सुन मम्मी भागती हुई चली आईं. हम सब को आपस में उलझते देख हैरान रह गईं. मुझ से पूछने लगीं, ‘‘क्या बात हो गई?’’

मैं कुछ कहती, उस से पहले ही रेनू चिल्लाने लगी, ‘‘होना क्या है मम्मी… मीनू दीदी जब से आईं हैं हमारी जासूसी में लगी हैं कि कहां जाते हैं क्या पहनते हैं, हमारे कौनकौन दोस्त हैं… हमारी छोटीछोटी खुशियां इन से बरदाश्त नहीं हो रही है.’’

राजू बोला, ‘‘मम्मी, जमाना बदल रहा है. हम भी बदल रहे हैं. इन्हें हम से क्या परेशानी है, समझ नहीं आता.’’

मेरा इतना अपमान होते देख मम्मी बौखला गईं. मेरा हाथ खींचते हुए बोलीं, ‘‘तू चल यहां से… काहे को चौधराइन बन रही है… अब तू इन की चिंता छोड़ अपनी ससुराल देख.’’

मुझे किसी ने कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया. मैं अपमानित सी खड़ी थी. शोर सुन कर पापा भी आ गए. बिना कुछ पूछे धीरगंभीर पापा मेरा हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गए. अपमान ने मेरे मुंह पर चुप्पी का ताला लगा दिया. पापा ने भी मुझे इस घटना से उबरने का मौका दिया. वे चुप रहे.

थोड़ी देर बाद मैं उठ कर लिविंग रूम के सोफे पर जा लेटी. कब आंख लग गई, पता ही न चला. रात को डिनर के लिए मम्मी और पापा बारीबारी से मुझे बुलाने आए पर मैं ने भूख नहीं है कह कर मना कर दिया. रेनू और राजू के अलावा किसी ने भी खाना नहीं खाया. मुझे रात भर नींद नहीं आई. यही सोचती रही कि यह मैं ने क्या किया? आई थी इन सब की खुशियों में शामिल होने पर सारे माहौल को तनावयुक्त कर दिया.

अगले दिन मैं जल्दी उठ कर नहा कर तैयार हो गई. मैं ने सब के लिए चाय बनाई. रेनू और राजू को आवाज दे कर उन के कमरे में चाय दे कर आई. मम्मी और पापा की चाय उन के कमरे में ले गई. होंठों पर नकली मुसकान लिए मैं ने बिलकुल नौर्मल दिखने का अभिनय किया. अपनी चाय पीतेपीते मैं अपनी ससुराल के बारे में बिना उन के पूछे बातें शेयर करने लगी. अपने देवर की शैतानियों के बारे में हंसहंस कर झूठी कहानियां सुनाने लगी.

मम्मीपापा भी मेरे द्वारा बनाए माहौल को बनाए रखने में मेरा साथ देने लगे. यह देख मैं सोचने लगी कि हम हिंदुस्तानी औरतों को घरगृहस्थी की गाड़ी सुचारु रूप से चलाने के लिए अभिनय घुट्टी में पिलाया जाता है. कभी मायके की इज्जत रखने को तो कभी ससुराल का मानसम्मान बनाए रखने के लिए अच्छा अभिनय कर जाती हैं?

तभी रेनू कालेज के लिए तैयार हो कर आ गई. उसे देख कर मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘अरे रेनू, आज इतनी जल्दी कालेज जा रही है… 5 मिनट रुक मैं मेरे लिए नाश्ता बना रही हूं… तुझे गोभी के परांठे पसंद हैं. वही बना देती हूं.’’ मगर रेनू मेरी बात अनसुनी कर मम्मी की ओर देखते हुए बोली, ‘‘मम्मी, आज कालेज में देर हो जाएगी,’’ और फिर सीढि़यां उतर गई.

मम्मी और मैं देखते रह गए. मैं ने बिना समय नष्ट किए जा कर किचन संभाली. सोचा रेनू तो बिना कुछ खाए निकल गई कहीं राजू भी भूखे पेट न निकल जाए. जल्दी सभी की पसंद ध्यान में रखते हुए नाश्ता बनाया और डाइनिंगटेबल पर लगा दिया.

नाश्ता तैयार है की आवाज लगा कर माहौल को तनावमुक्त करने की कोशिश की. मम्मीपापा तो तुरंत आ गए पर राजू अनमना सा थोड़ी देर बाद आया. उस ने किसी से बात नहीं की. जल्दीजल्दी खा कर खड़ा हो गया. बोला, ‘‘मम्मी, कालेज जा रहा हूं… आज दीदी को बस में बैठाने तो नहीं जाना?’’ और फिर जवाब का इंतजार किए बिना चला गया.

मैं रेनू और राजू के व्यवहार से मन ही मन क्षुब्ध हो रही थी. मैं दकियानूसी स्वभाव की बहन नहीं थी, परंतु इस कच्ची उम्र में हुई कुछ गलतियां सारी जिंदगी के लिए घातक हो जाती हैं. अपरिपक्व दिमाग, भोलेपन या नासमझी के चलते कुछ लोग गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं. फिर वहां से लौटना कठिन हो जाता है. बस इसी उलझन में पड़ गई थी. मेरे दिल में भाईबहन के लिए प्यार, ममता, सहानुभूति की भावनाएं प्रबलता से हिलोरें ले रही थीं, परंतु स्वाभिमान और फैला तनाव मुझे चुप रहने का संकेत दे रहा था.

लखनऊ का कालगर्ल डौटकौम : छोटे शहरों तक फैला देह व्यापार

‘‘नेहा न तो ये देह व्यापार है और न ही तुम कोई कालगर्ल. यह तो जस्ट अ फन है, जिस में रात के कुछ घंटे किसी के साथ गुजारने हैं. ऐसे ही किसी के साथ भी नहीं, बल्कि जिसे तुम पसंद करो उस के साथ. पहले तुम उस की फोटो को पसंद कर लो, फिर वह तुम्हारी फोटो पसंद करेगा.’’ विपिन ने नेहा को समझाते हुए कहा.

‘‘फिर भी रिस्क तो है न, पकड़े गए तो क्या होगा?’’ नेहा को इस काम से इनकार नहीं था, वह तो बस बदनामी से डर रही थी. वह ऐसा लफड़ा नहीं चाहती थी, जिस से वह पकड़ी जाए.

‘‘नेहा, कोई रिस्क नहीं है, यह तो केवल गेम है. हम लोग तुम्हें होटल में छोड़ेंगे, वहां से तुम्हें हम ही पिक भी करेंगे. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. कई बार तो होटल की जगह किसी का घर भी हो सकता है.’’

‘‘यह सब केवल रात में ही करना होगा.’’ नेहा ने पूछा.

‘‘हां, केवल रात, वह भी पूरी नहीं. रात में 11 से सुबह 4-5 बजे तक. किसी को कानोंकान खबर नहीं होगी.’’

‘‘यार, कुछ गड़बड़ न हो बस.’’

‘‘कोई गड़बड़ नहीं होगी. तुम्हारे साथ रहने वाली प्रिया तो सब जानती है. एक रात का 10 हजार मिलेगा. आराम से 3-4 रात यह काम करो, इस के बाद महीना भर आराम से रहो. किसी तरह का कोई रिस्क नहीं, यह सारा काम इंटरनेट और वाट्सऐप पर चलता है.’’

ये सारी बातें नेहा और दलाल टाइप के युवक के बीच हो रही थीं. युवक उस गिरोह का हिस्सा था, जो सोशल मीडिया के माध्यम से देह व्यापार चला रहा था.

नेहा ने अपनी साथी प्रिया से पूछा तो उस ने बताया कि कई लड़कियां इस तरह ही अपना खर्च उठा रही हैं. इस के लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है. नेहा ने बात मान ली.

पहली बार नेहा को डर लगा लेकिन धीरेधीरे यह डर खत्म हो गया. अब नेहा और प्रिया एक साथ ही जाने लगीं. होटल और ग्राहक के बीच घूमते हुए नेहा को मजा आने लगा. लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के जरिए उन्हें जो ग्राहक मिलते थे, वे अलग थे. उन से मिले पैसों पर कमीशन नहीं देना पड़ता था.

कई बार प्रिया अपने लिए खुद भी ग्राहक खोज लेती थी. ऐसे में उसे किसी को पैसा भी नहीं देना होता था. प्रिया ने यह गुर नेहा को भी बताया, ‘‘कुछ दिन इन लोगों के साथ काम कर लो. उस के बाद हर हफ्ते 1-2 ग्राहक बना लो, अच्छा पैसा मिलने लगेगा. पता है, खुद को तैयार करने के लिए मेकअप से ले कर ड्रैस तक खुद ही खरीदनी पड़ती है.’’

प्रिया ने आगे बताया, ‘‘हर ग्राहक को हर बार नई लड़की की जरूरत होती है. ऐसे में हम दोनों अपने ग्राहकों में अदलाबदली कर लेंगे. इस में हमें किसी और को पैसे नहीं देने होंगे.’’

नेहा ने पूछा, ‘‘जब सब हम ही लोग कर लेंगे तो इन लड़कों को क्यों साथ रखें?’’

प्रिया ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, हर ग्राहक शरीफ नहीं होता. कई बार जब उसे लगता है कि अकेली लड़की है तो वह अपनी मनमरजी करने लगता है. ग्राहक के साथसाथ लड़की को अकेली जान कर पुलिस भी परेशान करती है. ऐसे में लड़कों का सहारा होता है तो ठीक रहता है. यह हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है.’’

नेहा और प्रिया की तरह दरजनों लड़कियां लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के माध्यम से देह व्यापार कर रही थीं. ये लड़कियां लालच दे कर नई लड़कियों को देह व्यापार के लिए तैयार भी करती थीं. वैसे ही जैसे एक दलाल और प्रिया ने नेहा को तैयार किया था.

कोठे, कोठियों, रेडलाइट एरिया और मसाज पार्लरों से होता हुआ देहव्यापार अब इंटरनेट तक पहुंच चुका है. अब कई ग्राहक वाट्सऐप पर लड़कियों के फोटो और वीडियो देख कर उन्हें पसंद करने लगे हैं. इंटरनेट से देहधंधे में सुविधाएं बढ़ गई हैं. लड़की को अपने अड्डे से ले कर होटल तक ले जाया जा सकता है.

होटल की भी इंटरनेट से बुकिंग होने लगी है, जहां पहले जैसी छानबीन का खतरा नहीं होता. कालोनियों के घरों जैसे बने कुछ कमरों में ही होटल चलने लगे हैं. ऐसे होटलों में खानेपीने की सुविधाएं नहीं होतीं, वहां केवल ठहरने की सुविधा होती है. खानेपीने की सुविधा के लिए होटल के बाहर बनी दुकानों पर निर्भर होना पड़ता है.

इस तरह के रैकेट चलाने वाले पेशेवर लड़कियों के दलाल नहीं होते. यहां धंधा करने वाली लड़कियां भी जबरन नहीं लाई जातीं. वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए ही इन को बुलाया जाता है.

कई तो हौलीडे पैकेज मान कर 4 से 6 दिन के लिए आती हैं और बाकी बचे महीने भर इस धंधे से दूर रहती हैं. इन में कुछ पढ़ने वाली लड़कियां हैं तो कुछ प्राइवेट जौब करने वाली. कुछ तो डांस, मौडलिंग और एक्टिंग के क्षेत्र में काम करने का दावा तक करती हैं. देह के इस धंधे में इस तरह की लड़कियों की डिमांड ज्यादा होती है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर जैसे पौश एरिया में एक ऐसे ही सैक्स रैकेट को पकड़ा गया. यह सैक्स रैकेट लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के नाम से चलता था. गिरोह को चलाने वाले लड़के लड़कियों को ग्राहकों के कमरों तक पहुंचाने और वहां से सुरक्षित लाने का काम भी करते थे.

कई बार ग्राहक पैसे देने में आनाकानी और लड़कियों से जोरजबरदस्ती करने की कोशिश करता है तो उस के लिए गिरोह चलाने वाले अपने पास रिवौल्वर रखते हैं ताकि ऐसे लोगों को धमकाया जा सके.

लखनऊ पुलिस को इस बात की सूचना लगी तो उस ने इस गिरोह का राजफाश करने का बीड़ा उठाया. पुलिस ने देर रात चलने वाले वाहनों पर नजर रखनी शुरू कर दी.

9 जून, 2018 को रात करीब ढाई बजे सीओ गोमतीनगर चक्रेश मिश्रा के निर्देश पर पुलिस कठौथा झील के पास आनेजाने वाले वाहनों की चैकिंग कर रही थी, तभी लाल रंग की कार में कुछ लोग आते दिखे. पुलिस ने जब उन्हें रुकने का इशारा किया तो वे तेजी से भागने लगे.

पुलिस द्वारा पीछा करने पर कार से उतर कर भाग रहे विपिन नाम के लड़के को पकड़ा गया तो पता चला कि वे लोग सैक्स रैकेट का संचालन कर रहे थे. कार सवार लड़के तो भाग गए लेकिन कार से उतरने वाले लड़के को पुलिस ने पकड़ लिया.

पुलिस ने उस के पास से आधार दरजन मोबाइल, 13 हजार रुपए, एक पिस्टल और एक कार बरामद की. पुलिस की छानबीन में उस ने अपना नाम विपिन शर्मा बताया. विपिन ने अपने फरार साथियों के नाम अंकित, अतुल और गोलू बताए. उस ने पुलिस को बताया कि वे लोग देह व्यापार का धंधा करते हैं.

बरामद पिस्टल के बारे में विपिन ने बताया कि कुछ ग्राहक बिगड़ैल किस्म के होते हैं. ऐसे लोग पेमेंट को ले कर लड़ाईझगड़ा तो करते ही हैं, लड़कियों को सैक्स के दौरान परेशान भी करते हैं. पिस्टल ऐसे ग्राहकों को डराने के काम आती है.

विपिन के पास से बरामद पिस्टल गैरलाइसेंसी थी. विपिन ने उस रात 3 लड़कियां ग्राहकों के पास भेजी थीं. वे लड़कियां वापस आने वाली थीं, ये लोग उन्हीं को लेने के लिए आए थे.

यह जानकारी मिलते ही एसएसआई अमरनाथ सरोज ने थाने से 2 महिला सिपाही चारू मलिक और रुचि मांगट को बुला लिया. विपिन के दिए बयान के अनुसार पुलिस वहां आने वाली लड़कियों का इंतजार करने लगी. सुबह करीब 6 बजे कार से 4 युवक विकास यादव, कर्मदेव यादव, सतवंत सिंह और आदित्य वर्मा वहां आए. पुलिस ने इन्हें पकड़ लिया.

इन लोगों ने पुलिस को बताया कि 3 लड़कियों को होटल के पास छोड़ा था. वे अभी आ रही होंगी. कुछ ही देर में 3 लड़कियां पैदल आती दिखीं. इन्हें महिला सिपाहियों ने पकड़ लिया. पुलिस की तलाशी में रीना, प्रिया और नेहा के पास पर्स से नकदी, मोबाइल और कुछ आपत्तिजनक चीजें मिलीं. इस में 2 लड़कियां प्रिया और नेहा हावड़ा की रहने वाली थीं. ये चिनहट के पास एक महिला हौस्टल में रह रही थीं.

रीना गोरखपुर की थी और एमबीए की पढ़ाई करने के लिए हौस्टल में रह रही थी. पुलिस जब लड़कियों को ले कर होटल गई तो वहां कोई ग्राहक नहीं मिला. ग्राहकों के नाम अहसान अली और दुर्गेश कुमार थे, जो पहले ही जा चुके थे.

पुलिस को पता चला कि इस रैकेट को विपिन कुमार अपने साथियों के साथ मिल कर चलाता था. ये लोग एक कमरा ले कर किराए पर रहते थे. विपिन बीकौम में पढ़ता है, जबकि विकास और आदित्य प्राइवेट जौब करते हुए यह काम करते थे.

विभूतिखंड थाने के प्रभारी बृजेश कुमार राय ने बताया कि पुलिस को पता चला है कि ये लोग बड़ेबड़े लोगों को भी लड़कियां सप्लाई करते थे. इस की जांच होगी. पुलिस के सहयोग के लिए साइबर क्राइम पुलिस को भी सहयोग देने के लिए कहा गया है.

पूरा मामला इंटरनेट से जुड़ा होने के कारण साइबर पुलिस की उपयोगिता बढ़ गई थी. उस के सहयोग से ही पुलिस इंटरनेट पर ठिकाना बना कर देह व्यापार कराने वाले रैकेट को पकड़ सकी. पुलिस भी मानती है कि ऐसे धंधों का खत्म होना संभव नहीं है. धरपकड़ कर के केवल इन्हें सीमित भर किया जा सकता है.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. पहचान छिपाने के लिए कुछ नाम बदल दिए गए हैं

कालगर्ल से दोस्ती प्रोफेसर की भूल

महाराष्ट्र के जिला जलगांव के अमलनेर सिटी के रहने वाले दीपक पाटील जययोगेश्वर कालेज में प्रोफेसर थे. अपने सुखी वैवाहिक जीवन में मशगूल प्रो. दीपक पाटील का एक विद्यार्थी था सागर मराठे. सागर होनहार छात्र था. लेकिन एक दोस्त के माध्यम से उस की जानपहचान राबिया बानो नाम की एक कालगर्ल से हो गई थी. सागर राबिया से मिलनेजुलने लगा, जिस से उस के भी राबिया से शारीरिक संबंध बन गए थे.

वैसे तो राबिया के कई ग्राहक थे लेकिन उन सब में वह सागर को बहुत चाहती थी. राबिया का जब मन होता वह सागर को फोन कर के बातें कर लेती थी. एक बार की बात है. सागर और राबिया एक रेस्टोरेंट में बैठे थे. तभी इत्तफाक से प्रो. दीपक पाटील भी वहां आ गए.

सागर ने राबिया को अपनी दोस्त बताते हुए उस की मुलाकात प्रो. दीपक पाटील से कराई. पहली ही मुलाकात में राबिया की खूबसूरती और बातों से प्रो. दीपक बहुत प्रभावित हुए. हालांकि वह शादीशुदा थे, इस के बावजूद भी राबिया को उन्होंने अपने दिल में बसा लिया.

अगले दिन सागर जब कालेज आया तो उन्होंने किसी बहाने से सागर से राबिया का फोन नंबर ले लिया. प्रो. पाटील का मन राबिया से बात करने के लिए आतुर था.

ड्यूटी पूरी करने के बाद उन्होंने राबिया को फोन कर के उसे अपने बारे में बताया. राबिया भी समझ गई कि यह मोटी आसामी है, इसलिए वह भी उन से रसभरी बातें करने लगी.

इस के बाद आए दिन प्रोफेसर साहब की राबिया से फोन पर बातें होने लगीं. घर में खूबसूरत बीवी होने के बावजूद वह राबिया को चाहने लगे थे. इतना ही नहीं, उस से मुलाकातें भी करने लगे थे.

प्रो. दीपक पाटील का जब मन होता वह राबिया को होटल में बुला लेते और अपनी हसरतें पूरी करते. लेकिन इस के बदले में वह उसे पैसे कम देते थे. राबिया 2-4 बार तो उन से होटल में मिली लेकिन बाद में उस ने उन से मिलने के लिए मना कर दिया. इस पर प्रो. दीपक उसे बारबार फोन कर के तंग करने लगे.

उन के बारबार तंग करने से राबिया परेशान हो गई. उस ने इस की शिकायत सागर मराठे से की क्योंकि उसी ने उस की मुलाकात प्रो. दीपक से कराई थी. सागर ने भी प्रोफेसर को समझाया लेकिन वह नहीं माने.

जब राबिया ने उन की काल रिसीव करनी बंद कर दी तो वह दूसरे नंबरों से उसे काल करने लगे. उस ने कई बार प्रो. दीपक को झिड़क भी दिया था, पर वह अपनी हरकत से बाज नहीं आए.

अमलनेर की ही म्हाडा कालोनी में रहने वाली राबिया का एक प्रेमी था राज चव्हाण. वह हिस्ट्रीशीटर था. अलगअलग पुलिस थानों में उस पर दर्जनों केस दर्ज थे. बता दें राबिया शादीशुदा युवती थी. उस की शादी सूरत में हुई थी. शादी के कुछ ही दिनों में राबिया ने पति का घर छोड़ दिया था. बाद में वह अमलनेर में अपनी मां के यहां आ कर रहने लगी थी. पति को छोड़ने के बाद राबिया पूरी तरह आजाद हो गई थी.

राबिया का अमलनेर के रेलवे परिसर में आनाजाना लगा रहता था. इसी इलाके में राज चव्हाण भी रहता था. हर रोज दोनों की नजरें मिलने लगी थीं. कुछ ही दिनों में दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया था.

अपराध के सिलसिले में राज चव्हाण को लंबे समय के लिए दूसरी जगहों पर जाना पड़ता था. कभी पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने पर उसे जेल जाना पड़ता तो राबिया के सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो जाती थी. अपने प्रेमी राज चव्हाण की गैरमौजूदगी में वह जिस्मफरोशी का धंधा करती थी.

राबिया को प्रो. दीपक का बारबार फोन करना पसंद नहीं था. प्रोफेसर के अलावा उसे सागर मराठे पर भी गुस्सा आता था. एक दिन उस ने प्रोफेसर दीपक और सागर की शिकायत राज चव्हाण से कर दी. अपनी प्रेमिका की शिकायत सुन कर राज का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने दोनों को सबक सिखाने की ठान ली.

राज चव्हाण का एक दोस्त था विजय डेढ़े. विजय बदलापुर मुंबई में रहता था. राज और विजय ने राबिया को परेशान करने वाले प्रोफेसर दीपक और उन के विद्यार्थी सागर को मारपीट कर सीधा करने का प्लान बनाया.

वे दोनों को एक साथ बुलाना चाहते थे. यह काम राबिया ही कर सकती थी इसलिए राज ने राबिया के माध्यम से प्रो. दीपक और सागर को साथसाथ बुलाने की योजना बनाई.

राज के इशारे पर राबिया ने दोनों को 3 मार्च, 2018 की रात के 10 बजे साथसाथ अमलनेर के प्रताप महाविद्यालय के पास स्थित स्टेडियम के पास पहुंचने को कह दिया. राबिया का फोन आने पर प्रोफेसर साहब फूले नहीं समा रहे थे.

चूंकि दोनों को राबिया ने बुलाया था, इसलिए प्रो. दीपक और सागर मराठे का आना निश्चित था. उन के आने से पहले ही राज चव्हाण और विजय रात के अंधेरे में स्टेडियम के पास छिप कर बैठ गए.

रात 10 बजे के करीब प्रो. दीपक और सागर मराठे स्टेडियम के पास पहुंचे तो उन्हें वहां राबिया मिल गई. तभी अचानक सागर मराठे का ध्यान अंधेरे में छिप कर बैठे राज चव्हाण की तरफ चला गया. सागर उसे पहचानता था, इसलिए वहां से भाग गया.

कहीं प्रोफेसर साहब भी न भाग निकलें, इसलिए छिपे बैठे राज चव्हाण और विजय ने दीपक पाटील को दबोच लिया. उन्होंने उस समय प्रोफेसर साहब से कुछ नहीं कहा, बल्कि उन्हें एक ढाबे पर ले गए, वहां पर दोनों ने मिल कर प्रो. दीपक को जबरन जरूरत से ज्यादा मात्रा में शराब पिलाई.

छात्रों को पढ़ाने वाला प्रोफेसर अय्याशी के चक्कर में 2 गुंडों के बीच बैठा जबरदस्ती शराब पी रहा था. कुछ ही देर में प्रोफेसर पर नशा छा गया, उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था. इस दौरान उन का बैंक एटीएम कार्ड दोनों गुंडों ने छीन लिया. उस का पासवर्ड भी विजय ने मारपीट कर पूछ लिया.

एटीएम कार्ड हासिल करने के बाद दोनों ने उन की डंडे से पिटाई करनी शुरू कर दी. इस मारपीट में प्रो. दीपक बुरी तरह से घायल हो गए. उन्हें पता था कि बदनामी से बचने के लिए प्रोफेसर मारपीट की बात किसी को नहीं बताएंगे.

बाद में दोनों हमलावरों ने जख्मी प्रोफेसर को उन्हीं की बाइक से शहर के डा. हजारे के क्लीनिक तक पहुंचाया. तब तक काफी रात हो चुकी थी. उन्होंने डा. हजारे को काफी आवाजें दीं, लेकिन किसी ने गेट नहीं खोला.

आखिर राज और विजय ने जख्मी प्रोफेसर को उसी हालत में क्लीनिक के पास छोड़ दिया और उन की मोटरसाइकिल से वहां से भाग निकले. प्रोफेसर का एटीएम कार्ड उन के पास ही था, जिस से उन्होंने करीब 40 हजार रुपए निकाल लिए.

अस्पताल के बाहर लहूलुहान पड़े प्रो. दीपक को इलाज नहीं मिला तो उन्होंने दम तोड़ दिया. रात लगभग 2 बजे उन की लाश पर किसी की नजर पड़ी तो उस ने इस की सूचना अमलनेर पुलिस थाने में दी. खबर मिलने पर थानाप्रभारी अनिल बड़गूजर पुलिस टीम के साथ डा. हजारे के क्लीनिक के पास पहुंची.

सुबह करीब साढ़े 3 बजे इस घटना की खबर मृतक प्रो. दीपक की पत्नी तथा रिश्तेदारों को मिली तो वे सब वहां पहुंच गए. सुबह होने पर पुलिस ने जब उन की लाश का निरीक्षण किया तो उन के शरीर पर चोटों के गहरे घाव थे.

लोग इसे एक सड़क दुर्घटना मान कर चल रहे थे लेकिन उन की बाइक वहां नहीं थी. इस से पुलिस उन की मौत को संदेहात्मक मान रही थी. प्रो. दीपक की पत्नी को यह हत्या का मामला लग रहा था, इसलिए उन्होंने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा दिया.

इस घटना को ले कर अमलनेर शहर में खलबली मच गई थी. पुलिस अधीक्षक दत्तात्रेय कराले ने पूरे मामले को ध्यान में रखते हुए इस केस की जांच पर क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर सुनील कुराड़े को भी लगा दिया था. मामले की जांच थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच के इंचार्ज सुनील कुराडे और उन की टीम भी कर रही थी.

अपराध करने के बाद राज चव्हाण, विजय डेढे और राबिया फरार हो चुके थे. इधरउधर घूमतेघूमते वे सूरत पहुंचे. सूरत में राबिया की बहन का बेटा रहता था, जिस का नाम अजीज था. कुछ दिनों तक वे अजीज के पास रहे. वहीं पर राज को पैसों की जरूरत पड़ी तो उस ने अजीज को अपना मोबाइल बेच दिया.

जलगांव क्राइम ब्रांच की टीम को जांच के दौरान यह जानकारी मिल गई थी कि दीपक पाटील का राज चव्हाण की प्रेमिका राबिया के पास आनाजाना था, इसलिए यह आशंका जताई जाने लगी कि उन की हत्या में बदमाश राज चव्हाण का हाथ हो सकता है. ऐसे में पुलिस का राज चव्हाण से पूछताछ करना जरूरी था.

पुलिस को राज चव्हाण का मोबाइल नंबर मिल चुका था, जो सर्विलांस पर लगा दिया था. पुलिस को उस के मोबाइल की लोकेशन सूरत की मिली. क्राइम ब्रांच की टीम तुरंत सूरत के लिए रवाना हो गई. चूंकि राज अपना फोन अजीज को बेच चुका था, इसलिए पुलिस ने अजीज को हिरासत में ले लिया. उस ने बताया कि राज और राबिया सूरत से जा चुके हैं.

राज कोई दूसरा फोन प्रयोग करने लगा था. उस से उस ने 1-2 बार अजीज को भी फोन किया था. पुलिस ने उस के दूसरे नंबर की जांच की. वह नंबर उस समय बंद आ रहा था, जिस से उस की लोकेशन नहीं मिल रही थी.

जब अजीज पुलिस हिरासत में था, उसी दौरान उसे राज चव्हाण ने फोन किया. अजीज ने मोबाइल का स्पीकर औन कर के पुलिस के सामने ही उस से बात की. बातचीत के दौरान राज ने अजीज को बताया कि वह इस समय राबिया के साथ वाशीम जिले के कारंजा गांव में रह रहा है.

यह जानकारी मिलने पर क्राइम ब्रांच की टीम 16 मई, 2018 को कारंजा के लिए रवाना हो गई. पुलिस ने कारंजा से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक झुग्गी बस्ती में रह रहे राज और राबिया को हिरासत में ले लिया.

दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि प्रो. दीपक की हत्या विजय डेढे के साथ मिल कर की थी. क्राइम ब्रांच ने यह जानकारी अपने अधिकारियों को दी तो अमलनेर पुलिस ने विजय डेढे को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने राबिया, उस के प्रेमी राज चव्हाण और विजय डेढे से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. मामले की जांच थाना अमलनेर के प्रभारी अनिल बड़गूजर कर रहे हैं.

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