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अभी तक मैं संभोग का पूरा सुख नहीं पा सका, कृपया मेरा मार्गदर्शन करें ताकि मैं सहवास का आनंद उठा सकूं?

सवाल

मैं 25 वर्षीय विवाहित युवक हूं. शादी हुए 1 वर्ष हो चुका है. अभी तक मैं संभोग का पूरा सुख नहीं पा सका. वास्तव में मुझे सैक्स के विषय में कोई जानकारी नहीं है. मैं पत्नी से संबंध तो बनाता हूं पर बहुत जल्दी निवृत्त हो जाता हूं. मेरे यौनांग में पूरी तरह तनाव भी नहीं आता. कृपया मेरा मार्गदर्शन करें ताकि मैं सहवास का पूरापूरा आनंद उठा सकूं?

जवाब

आप सहवास में प्रवृत्त होने से पहले उस के लिए उपयुक्त माहौल बनाएं. पत्नी से प्रेमालाप करें. उस के बाद आलिंगन, चुंबन आदि कामक्रीड़ाएं करें. जब अनुभव करें कि पत्नी सहवास के लिए पूरी तरह कामोत्तेजित हो गई है तभी संबंध बनाएं. इस से आप देर तक सहवास कर पाएंगे और आप को अधिक सुखानुभूति होगी. इस के अलावा सैक्स ज्ञान के लिए आप सैक्स पर किसी अच्छे लेखक की पुस्तक से भी जानकारी ले सकते हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

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अपना घर- भाग 2: क्या बेटी के ससुराल में माता-पिता का आना गलत है?

वाणी को अपने पापा की हमेशा चिंता लगी रहती है कि कहीं उन का शुगर लैवल न बढ़ जाए, इसलिए डाक्टर की सलाह के बावजूद वह डायबिटीज़ के बारे में गूगल पर भी सर्च करती रहती थी.  जानती थी उस के पापा खानेपीने के मामले में बहुत लापरवाह हैं.  रेणु के डर से घर में तो नहीं, पर बाहर वे मिठाई खा ही लेते हैं, कंट्रोल ही नहीं होता उन से. वैसे, एक बात यह भी है कि जिस चीज के लिए इंसान को मना किया जाता है, उस का मन उसी ओर भगाता है. अरुण के डर से ही रेणु फ्रिज लौक कर के रखने लगी थी. बुरा लगता है पर क्या करे? अपने मम्मीपापा को विदा कर वाणी मन ही मन मुसकराती हुई घर आ ही रही थी कि मनोरमा मामी और अपनी सास की बातें सुन उस के कदम बाहर ही रुक गए.

“जरा भी शरम-लाज है इन्हें, देखो तो जरा. जब देखो मुंह उठाए चले आते हैं यहां. यह भी नहीं समझते कि यह उन की बेटी की ससुराल है,” मुंह बिचकाती हुई वाणी की सास मालती बोली थी.

“मैं ने तो पहली बार देखा है दीदी, बेटी की ससुराल में किसी मांबाप को गबागब खाते हुए. बड़े बेशर्म लोग हैं ये तो. एक हम हैं, बेटी के घर का पानी तक नहीं पीते हैं और एक ये लोग, हायहाय,” ज़ोर का ठहाका लगाती हुई मनोरमा मामी बोली. इस पर मालती कहने लगी कि हर 3 महीने पर डाक्टर को दिखाने के बहाने यहां पहुंच ही जाते हैं दोनों और खापी कर ही जाते हैं. मन तो करता है पूछूं कि वहां आप के शहर में डाक्टर नहीं है जो यहां दिखाने चले आते हैं. लेकिन बेटे को बुरा न लगे, इसलिए चुप लगा जाती हूं.

दोनों की बातें सुन वाणी स्तब्ध रह गई. जिस सास और मामी सास को सुबह उठ कर सब से पहले चाय बना कर पिलाती है, उन की एक आवाज पर दौड़ी चली आती है, उन के लिए मनपसंद खाना बनाती है, उन की  छोटीछोटी खुशियों का ध्यान रखती है, वही दोनों उस के मांपापा के बारे में ऐसी बातें कर रहे हैं. हां, पता है उसे कि मालती को उस के मांपापा का यहां आना जरा भी पसंद नहीं है लेकिन कम से कम बाहर वालों के सामने तो नहीं बोलना चाहिए था उन्हें? जबकि पता है उन्हें कि मनोरमा मामी एक की चार लगा कर बोलने में माहिर हैं. उन्हें इधर की उधर करने में खूब मजा आता है. फिर भी? और ऐसा क्या गलत कर दिया उस के मांपापा ने जो बाहर वालों के सामने उन की बुराई ले कर बैठ गईं? क्या कोई मांबाप अपनी बेटी के घर नहीं आ सकता? मन तो किया बोल दे कि जब लड़के के मांबाप बड़े हक से अपने बेटे के घर रह सकते हैं, तो क्या बेटी के मां-बाप आजा भी नहीं सकते?

और किस ने बनाए हैं ये रिवाज कि बेटी के घर का मांबाप पानी भी नहीं पी सकते? अरे, शर्म तो लड़के वालों को आनी चाहिए जो दहेज के नाम पर लड़की वालों के सामने अपना हाथ पसारते हैं. बेटे को बेच देते हैं एक तरह से. लेकिन फिर भी अकड़ तो देखो. यही मनोरमा मामी इसलिए अपने बेटे की बरात लौटाने पर अड़ गई थीं क्योंकि लड़की वाले गाड़ी नहीं दे पाए थे. उन्होंने कहा था  कि शादी के बाद वे किसी भी तरह से गाड़ी दे देंगे, पर अभी फेरे हो जाने दीजिए नहीं तो समाज और लोगों के सामने उन की जगहंसाई हो जाएगी. पर मामी और उस के परिवार वाले नहीं माने और हार कर जाने कहां से कैसे कर उन्हें गाड़ी के पैसों का इंतजाम करना पड़ा. तब जा कर शादी हो पाई थी. और यही मामी यहां बैठ कर गाल बजा रही हैं. शर्म तो इन्हें आनी चाहिए.  लेकिन वह कुछ न बोल कर अपने कमरे की तरह बढ़ने ही लगी कि मालती ने टोका.

“गए तुम्हारे मांपापा? अब फिर कब आने वाले हैं?” मटर का दाना निकालती हुई मालती बोली.

“जी मां जी, गए. अब 3 महीने बाद फिर आएंगे.” सास के व्यवहार से वाणी को रोना आ गया.  वाणी के मांपापा जब भी यहां आते हैं, कुछ न कुछ ले कर ही आते हैं, खाली हाथ कभी नहीं आते. लेकिन फिर भी इन की बोली तो देखो, फिर कब आएंगे… क्या वे यहां खाने आते हैं या उन के घर में खाने की कमी है? अरे, वे चाहें तो दोचार को खिला कर खा सकते हैं. पैसे की कोई कमी नहीं है उन के पास. वे तो बेटी के मोह वश यहां चले आते हैं.

“वहां कोई बढ़िया डाक्टर नहीं  है क्या बहू, जो तुम्हारे मांपापा को यहां इतनी दूर दिखाने आना पड़ता है?” मनोरमा मामी ने तल्खी से पूछा तो वाणी तिलमिला उठी.  मन तो किया बोल दे, वहां लखनऊ में भी तो अच्छेअच्छे डाक्टर्स हैं, फिर वह यहां महीनेभर से क्यों पड़ी है? लेकिन चुप लगा गई. बेकार में बात बढ़ाने से क्या फायदा? और जब अपने घर वाली ही उसे शह दे रही हैं तो बोलेगी ही न. वाणी  के तेवर देख दांत निपोरते हुए मनोरमा मामी कहने लगीं, “हां, नहीं होंगे वहां अच्छे डाक्टर, तभी तो यहां दिखाने आना पड़ता है, है न बहू?” लेकिन वाणी ने उस की बातों का कोई जवाब न दिया और फ्रिज से निकाल कर ठंडा पानी गटकने लगी. उस के पापा ने ही समझाया था उसे कि जब दिमाग में ज्यादा गुस्सा भर जाए तो इंसान को ठंडा पानी पी लेना चाहिए, गुस्सा ठंडा हो जाता है. चाहती तो पलट कर वह अपनी सास को जवाब दे सकती थी कि उस के मायके वाले यहां आ कर बड़े हक से रह सकते हैं जब तक मन चाहे, तो उस के मायके वाले क्यों नहीं आ सकते यहां? यह घर उस का भी तो उतना ही है जितना मालती का? लेकिन एक दिन किसी बात पर मालती ने ही कहा था, ‘यह तुम्हारी ससुराल है बहू, तुम्हारा मायका नहीं.’ यह सुन कर वाणी की आंखें भर आई थीं. वह पूछना चाहती थी कि तब उस का अपना घर कहां है? यही तो बिडंबना है लड़की के साथ कि उस का अपना कोई घर नहीं होता.  मायके में वह पराई अमानत कहलाई जाती है और विवाह के बाद उसी लड़की को ससुराल में पराए घर की लड़की बताया जाता है. बेचारी लड़की किस घर को अपना घर माने, मायके या ससुराल को? अकसर लोगों को कहते सुना है कि बेटा, तू तो पराई है. तुझे बड़े हो कर अपने असली घर जाना है. और ससुराल जा कर यह सुनना पड़ता है कि ये हमारे घर की बहू है. यह कोई नहीं कहता कि यह घर मेरी बहू का है. एक लड़की सिर्फ मायके और ससुराल की बन कर रह जाती है. उस का अपना घर कौन सा है, वह यह तलाशते जीवन गुजार देती है.

वहां अपने मायके में वाणी  हर काम अपनी मरजी से करती थी बिना किसी डर और हिचकिचाहट के. लेकिन ससुराल में तो उसे हर काम अपनी सास से पूछ कर करना पड़ता है. मन न होते हुए भी उसे सारे रीतिरिवाज निभाने पड़ते हैं.  लेकिन फिर भी उसे यह एहसास दिलाया जाता है कि वह उस का अपना घर नहीं, ससुराल है. वाणी अपने मांपापा की एकलौती संतान है. उन की भी ज़िम्मेदारी वाणी  की ही है. लेकिन घर और औफिस की ज़िम्मेदारी इतनी है कि वह उन से मिलने तक नहीं जा सकती. डाक्टर से दिखाने के बहाने ही उस के मांपापा यहां आ जाते हैं, तो उन से मिलना हो जाता है. एक दिन आलोक ने ही सजेस्ट किया था वहां अच्छे डाक्टर नहीं हैं तो क्यों नहीं अरुण यहां दिल्ली में अपना इलाज करवाते हैं? डाक्टर स्वेतांग, डायबिटीज़ स्पैशलिस्ट हैं, तो उन से ही अगर अरुण का इलाज हो, तो बेहतर रहेगा. और तब से वे इसी डाक्टर से अपना इलाज करवा रहे हैं. इसी बहाने आपस में उन का मिलना भी हो जाता है. तो, इस में बुराई क्या है?

खैर, ठंडा पानी पीने के बाद भी वाणी का गुस्सा कम नहीं हुआ आज.  तेज कदमों से अपने कमरे में जा कर उस ने अंदर से दरवाजा भिड़का दिया. मन तो किया खूब रोए, ज़ोरज़ोर से रोए मगर यहां तो रोना भी गुनाह है. तुरंत कहेंगे, ’ऐसा क्या बोल दिया जो रोने बैठ गई? हां, अब बेटे से मेरी शिकायत करेगी, घर में 2 चूल्हे करवाएगी, यही तो सिखापढ़ा कर भेजा है इस के मांबाप ने. यहां आ कर यही सब तो पट्टी पढ़ा कर जाते हैं वे लोग’ जैसे विषैले शब्द मालती अपने मुंह से निकालना शुरू कर देगी  और मनोरमा मामी तो हैं ही आग में घी डालने के लिए. खुद की बहू से तो बनती नहीं उन की, तो चाहती हैं यहां भी सासबहू के झगड़े का मजा लें. मगर वाणी उन्हें कोई मौका ही नहीं देती.  एक तो वैसे ही वाणी के पापा का शुगर लैवल बढ़ा हुआ है और ये लोग जरा सा उन के खाने पर भी आंख गड़ा रहे हैं जैसे कितना पहाड़-पर्वत खा लिया हो उन्होंने.

क्या एक मांबाप का इतना भी हक नहीं होता है कि एक दिन वे अपनी बेटी के घर आ कर रह सकें? शादी के बाद इतनी पराई हो जाती हैं बेटियां? यह सोच कर वाणी  की आंखें भर आईं.

याद है जब वह छोटी थी तब उस के पापा उस के लिए नई साइकिल खरीद कर लाए थे.  रोज वे उसे पार्क में साइकिल सिखाने के लिए ले कर जाते थे. वे साइकिल पकड़े रहते थे ताकि वाणी गिरे तो वे संभाल सकें. फिर चुपके से छोड़ भी देते साइकिल के कैरिअर को और वाणी इस भ्रम में रहती कि पापा ने पकड़ रखी है साइकिल. पापा के भरोसे के बल पर वह दूर निकल जाती थी साइकिल चलातेचलाते.  लेकिन जब पलट कर देखती और पापा नहीं होते तो वह लड़खड़ा कर गिरने ही वाली होती कि आ कर अरुण दोनों हाथों से साइकिल थाम लेते थे. कहते, ‘बेटा, तुम खूब तेज दौड़ो, जब गिरने लगोगी, मैं थाम लूंगा तुम्हें.’ उन का अपना तो कुछ था ही नहीं, उन की पूरी दुनिया तो वाणी के आसपास ही होती थी. वाणी हंसती तो उस के मांपापा हंसते, वाणी रोती तो वे उदास हो जाते थे. हर बच्चे की तरह उस ने भी जिद की होगी, गलतियां की होंगी. पर कभी उस के मांपापा ने उस पर हाथ नहीं उठाया, बल्कि प्यार से ज़िंदगी की सीख दी, संस्कार दिए अपनी बेटी को. याद नहीं कि कभी उस के पापा ने तेज आवाज में बात भी की हो उस से. हां, रेणु थोड़ी सख्त जरूर थी. पर पता है, सो जाने के बाद वह अपनी लाड़ली बेटी को जीभर कर प्यार करती थी. अपने मांपापा की जान थी वह और आज भी वाणी ही उन के लिए सबकुछ है.

अपना घर- भाग 1: क्या बेटी के ससुराल में माता-पिता का आना गलत है?

डायबिटीज़ के मरीज अरुण की भूख जब बरदाश्त के बाहर होने लगी और वे आवाज दे कर बोलने ही जा रहे थे कि रेणु ने आंखें तरेरीं, “शर्म है कि नहीं कुछ आप को? बेटी के घर आए हो और भूखभूख कर रहे हो, जरा रुक नहीं सकते? यह आप का अपना घर नहीं है, बेटी की ससुराल आए हैं हम,  समझे?”

“अरे, तो क्या हो गया? क्या बेटी के घर में भूख नहीं लग सकती? भूख तो भूख है, कहीं भी लग सहती है,” अरुण ने ठहाका लगाया, “तुम भी न रेणु, कुछ भी सोचती हो. यह हमारी बेटी का घर है, किसी पराए का नहीं.”

यह सुन कर रेणु भुनभुनाते हुए कहने लगी कि इसलिए वह यहां आना नहीं चाहती है. मगर वाणी  है कि समझती ही नहीं. जाने क्या सोचते होंगे इस की ससुराल वाले?

“अब क्या सोचने बैठ गईं? यही तुम्हारी बड़ी खराब आदत है. किसी भी बात को सोचतेसोचते पता नहीं उसे कहां से कहान ले जाती हो. ऐसा कुछ नहीं है रेणु. कोई कुछ नहीं सोचता,” अरुण बोल ही रहे थे, तभी खाने की प्लेट लिए वाणी ने कमरे में प्रवेश किया.

“सौरी पापा, वह मम्मी जी, पापा जी को खाना खिला रही थीं. आप लोगों को भी भूख लगी होगी. आप खा लो. मम्मी आप भी पापा के साथ ही बैठ जाओ. मैं तब तक और फुलके ले कर आती हूं,” कह कर हड़बड़ाई सी वाणी फिर किचन में भागी. लेकिन रेणु कहने लगी कि बेकार में  बेटी परेशान हो रही है.  क्या वे लोग कहीं बाहर नहीं खा सकते थे? कितने तो होटल हैं शहर में. जाने क्या सोचते होंगे इस की ससुराल वाले कि जब देखो इस के मांबाप यहां आ जाते हैं.

“अरे, मम्मी कैसी बातें कर रही हो आप. क्या मेरा घर आप लोगों का घर नहीं है? मेरे रहते आप लोग किसी होटल में खाने जाओगे, अच्छा लगेगा क्या? कोई कुछ नहीं सोचता. प्लीज, आप ज्यादा मत सोचो,“ प्लेट में गरम फुलके डालती हुई वाणी बोली.

“हां, मैं भी यही समझा रहा हूं तुम्हारी मां को, पर इन्हें है कि शर्म ही बहुत आती है. अरे भई, ये रिश्तेदार हैं हमारे, तो आनाजाना तो लगा ही रहेगा? वैसे, बेटा कढ़ी बहुत अच्छी बनी थी. मजा आ गया,” डकार लेते हुए अरुण बोले तो रेणु कहने लगी कि चलो अब यहां से, नहीं तो घर पहुंचतेपहुंचते रात हो जाएगी. “हांहां, चलोचलो” अपनी पैंट को ऊपर चढ़ाते हुए अरुण बोले, “अच्छा बेटा, अब हम निकलते हैं.”

“ओके पापा, लेकिन आप अपना ध्यान रखिएगा और मम्मी, आप भी. पापा, आप थोड़े अजीब हो, पर आप दुनिया के बेस्ट पापा हो” अरुण के दोनों गालों को खींचती हुई वाणी बोली तो रेणु भी हंस पड़ी. बापबेटी का प्यार देख रेणु मन ही मन मुसकरा पड़ी, सोचने लगी कि कितना प्यारा रिश्ता है इन दोनों का. एकदम पारदर्शी, कोई दुरावछिपाव नहीं. दोनों राजनीतिक से ले कर फिल्मों तक पर खुल कर बातें करते हैं और अपना पक्ष भी रखते हैं.  और एक उस के जमाने में, पिता से बात करना तो दूर, उन के सामने खड़े भी नहीं हो सकते थे.

“पापा प्लीज, आप ज्यादा मीठा मत खाया करो, चिंता होती है मुझे. देखा न डाक्टर ने भी आप को मीठा खाने से मना किया है.  प्लीज पापा,  वादा करिए मुझ से, आप मिठाई छुएंगे भी नहीं,” वाणी बोली, तो बड़बड़ाते हुए रेणु कहने लगी कि इन्हें समझाने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि इन से बरदाश्त ही नहीं होता. मिठाई देखते ही उस पर ऐसे टूट पड़ते हैं, जैसे कभी खाया न हो.  “ठीक है, तो फिर मैं भी सीटबेल्ट नहीं लगाऊंगी गाड़ी चलाते समय,” वाणी ने डराया. जानती है वह उस के पापा उसे ले कर बहुत फिक्ररमंद रहते हैं.

“नहींनहीं बेटा, ऐसा मत करना. ठीक है, मैं मीठा नहीं खाऊंगा, पर अपनी मम्मी से बोलो, वह मुझे ज्यादा डांटा न करे. बहुत डांटती है ये मुझे,” बच्चा सा मुंह बनाते हुए अरुण बोले तो वाणी को हंसी आ गई.

“मम्मी, आप भी पापा को मत डांटा करो और पापा, आप भी मम्मी की बात माना करो,” एक गार्जियन की तरह अपने मांपापा को समझाती हुई वाणी बोली, ”3 महीने बाद फिर से डायबिटीज़ जांच करा कर डाक्टर से दिखाने यहां आ जाना. ज्यादा देर करोगे तो फिर डाक्टर से डांट पड़ेगी.”

ऐसे बनाएं रेस्टोरेंट जैसे चिकन पकौड़े

आज आपको चिकन पकौड़े बनाने की रेसिपी बताते हैं. इसे आप काफी कम समय में बहुत आसानी से बना सकते हैं. तो आइए जानते हैं चिकन पकौड़े बनाने की रेसिपी.

सामग्री:

बोनलेस चिकन- 400 ग्राम,

लाल मिर्च- 2 टीस्पून,

धनिया पाऊडर- 1 टीस्पून,

अदरक-लहसुन पेस्ट- 1/2 टीस्पून,

नमक- 1 टीस्पून,

गरम मसाला- 1 टीस्पून,

सौंफ- 1 टीस्पून,

हल्दी- 1/4 टीस्पून,

नींबू का रस- 1 टीस्पून,

करी पत्ता- 5-6,

बेसन- 80 ग्राम,

चावल का आटा- 1 टेबलस्पून,

पानी- 70 मि.ली.,

तेल- तलने के लिए

बनाने की विधि:

चिकन पकौड़ा बनाने के लिए एक कटोरी में 400 ग्राम बोनलेस चिकन ले लें. अब इसमें दो चम्मच लाल मिर्च, एक चम्मच धनिया पाउडर, आधा चम्मच अदरक लहसुन का पेस्ट, आधा चम्मच नमक, एक चम्मच गरम मसाला, एक चम्मच जीरा व आधा चम्मच हल्दी डालकर अच्छे से मिक्स करें.

अब इसमें आधा चम्मच नींबू का रस डालकर 15 से 20 मिनट तक ढक कर रख दें. जिससे ये अच्छे से मैरीनेट हो जाए.

अब एक दूसरे कटोरे में 80 ग्राम बेसन, एक चम्मच चावल का आटा व 70 मिलीलीटर पानी डालकर पेस्ट बना लें. अब एक पैन में औयल गर्म करके चिकन को बेसन के पेस्ट में लपेटकर डीप गोल्डन ब्राउन फ्राई करें.

अब इसे प्लेट में निकाल कर चटनी व टमाटो सौस के साथ गर्मागर्म सर्व करें.

सिसकी- भाग 2: रानू और उसके बीच कैसा रिश्ता था

Writer- कुशलेंद्र श्रीवास्तव

सहेंद्र शाम को घर लौटते, तो अपने दोनों बच्चों को साथ ले कर घुमाने ले जाते. बच्चे उन के आने की राह देखते रहते. कई बार उन की पत्नी भी साथ हो लेती पर अकसर ऐसा नहीं हो पाता था.  रीना घर में ठहर जाती और बच्चों के लिए खाना बनाने लगती. शाम का खाना सभी लोग मिल कर खाते. रानू को खाना खिलाना रीना के लिए बड़ी चुनौती होती. वह पूरे घर में दौड़ लगाती रहती और हाथों में कौर पकड़े रीना उस के पीछे भागती रहती. रीना जानती थी कि रानू का यह खेल है, इसलिए वह कभी झुंझलाती नहीं थी. चिन्टू पापा के साथ बैठ कर खाना खा लेता.

रीना तो पिताजी को खाना खिलाने के बाद ही खुद खाना खाती. पिताजी के लिए खाना अलग से बनाती थी. रीना स्वंय सामने खड़ी रह कर पिताजी को खाना देती और फिर उन की दवाई भी देती. वह अपने पल्लू से पिताजी का चेहरा साफ करती और उन्हें सुला देती. तब तक सहेंद्र अपने बच्चों का होमवर्क करा देते.

सहेंद्र के परिवार में कोई समस्या न थी. पर एक दिन अचानक सहेंद्र बीमार हो गए. औफिस से लौटे तो उन्हें तेज बुखार था. हलकी खांसी भी चल रही थी. वे रातभर तेज बुखार में पड़े रहे. उन्हें लग रहा था कि मौसम के परिवर्तन के कारण ही उन्हें बुखार आया है. हालांकि शहर में कोरोना बहुत तेजी से फैल रहा था. इस कारण से रीना भयभीत हो गई थी.

‘आप डाक्टर से चैक करा लें,’ रीना की आवाज में भय और चिंता साफ झलक रही थी.

‘नहीं, एकाध दिन देख लेते हैं, थकान के कारण बुखार आ गया हो शायद.’

वे उस दिन औफिस नहीं गए. उन्होंने अपने साहब को फोन कर औफिस न आ पाने के बारे में बता दिया था. रीना ने बच्चों को उन के पास नहीं जाने दिया. चिन्टू दूर से ही पापा से बातें करता रहा. पापा के बगैर उस का मन लगता कहां था. रानू  तो दौड़ कर उन के बिस्तर पर चढ़ ही गई. बड़ी मुश्किल से रीना ने उसे उन से अलग किया. सहेंद्र दोतीन दिनों तक ऐसे ही पड़े रहे. इन दोतीन दिनों में रीना ने कई बार उन से डाक्टर से चैक करा लेने को बोला. पर वे टालते रहे.

रीना की घबराहट बढ़ती जा रही थी. रीना ने अपने देवर महेंद्र को फोन कर सहेंद्र की बीमारी के बारे में बता दिया था. पर महेंद्र देखने भी नहीं आया.

उस दिन रीना ने फिर महेंद्र को फोन लगाया, ‘भाईसाहब, इन की तबीयत ज्यादा खराब लग रही है. हमें लगता है कि इन्हें डाक्टर को दिखा देना चाहिए.’

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‘अरे, आप चिंता मत करो, वे ठीक हो जाएंगे.’

‘नहीं, आज 5 दिन हो गए, उन का बुखार उतर ही नहीं रहा है. आप आ जाएं तो इन्हें अस्पताल ले जा कर दिखा दें,’ . रीना के स्वर में अनुरोध था.

‘अरे, मैं कैसे आ सकता हूं, भाभी. यदि भाई को कोरोना निकल आया तो?’’

‘पर मैं अकेली कहां ले कर जाऊंगी. आप आ जाएं भाईसाहब, प्लीज.’

‘नहीं भाभी, मैं रिस्क नहीं ले सकता.’ और महेंद्र ने फोन काट दिया था.

रीना की बेचैनी अब बढ़ गई थी. उस ने खुद ही सहेंद्र को अस्पताल ले जाने का निर्णय कर लिया.

रीना ने सहेंद्र को सहांरा दे कर औटो में बैठाला और खुद उसे पकड़ कर बाजू में ही बैठ गई. बड़ी मुश्किल से एक औॅटो वाला उन्हें अस्पताल ले जाने को तैयार हुआ था, ‘एक हजार रुपए लूंगा बहनजी.’

‘एक हजार, अस्पताल तो पास में ही है. 50 रुपए लगते हैं. और आप एक हजार रुपए कह रहे हो?’

‘कोरोना चल रहा है बहनजी. और आप मरीज को ले जा रही हैं. यदि मरीज को कोरोना हुआ तो… मैं तो मर ही जाऊंगा न फ्रीफोकट में.’ औटो वाले ने मजबूरी का पूरा फायदा उठाने की ठान ही ली थी.

‘पर भैया, ये तो बहुत ज्यादा होते हैं.’

‘तो ठीक है, आप दूसरा औटो देख लो,’ कह कर औटो स्टार्ट कर लिया. रीना एक तो वैसे ही घबराई हुई थी, बड़ी मुश्किल से औॅटो मिला था, इसलिए वह एक हजार रुपए देने को तैयार हो गई. उस ने सहेंद्र को सहारा दिया. सहेंद्र 5 दिनों के बुखार में इतने कमजोर हो गए थे कि स्वंय से चल भी नहीं पा रहे थे. रीना के कंधों का सहारा ले कर वे औटो में बैठ पाए. औॅटो में भी रीना उन्हें जोर से पकड़े रही. बच्चे दूर खड़े हो कर उन्हें अस्पताल जाते देख रहे थे.

सहेंद्र को कोरोना ही निकला. उस की रिपोर्ट पौजिटिव आई. डाक्टरों ने सीटी स्कैन करा लेने की सलाह दी. उस की रिपोर्ट दूसरे दिन मिल पाई. फेफड़ों में इन्फैक्शन पूरी तरह फैल चुका था. सहेंद्र को किसी बड़े अस्पताल में भरती कराना आवश्यक था. रीना बुरी तरह घबरा चुकी थी. वह अकेले दूसरे शहर कैसे ले कर जाएगी. उस ने एक बार फिर महेंद्र से बात की, ‘भाईसाहब, इन्हें कोरोना निकल आया है और सीटी स्कैन में बता रहे हैं कि फेफड़ों में इन्फैक्शन बहुत फैल चुका है, तत्काल बाहर ले जाना पड़ेगा.’

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‘तो मैं क्या कर सकता हूं, भाभी?’

‘मैं अकेली कहां ले कर जाऊंगी, आप साथ चलते, तो मुझे मदद मिल जाती.’

‘ऐसा कैसे हो सकता है, भाभी, कोरोना मरीज के साथ मैं कैसे चल सकता हूं?’

‘मैं बहुत मुसीबत में हूं, भाईसाहब. आप मेरी मदद कीजिए, प्लीज.’

‘देखो भाभी, इन परिस्थितियों में मैं आप की कोई मदद नहीं कर सकता.’

‘ये आप के भाई हैं भाईसाहब, यदि आप ही मुसीबत में मदद नहीं करेंगे तो मैं किस के सामने हाथ फैलाऊंगी.’  रीना रोने लगी थी. पर रीना के रोने का कोई असर महेंद्र पर नहीं हुआ.

‘नहीं भाभी, मैं रिस्क नहीं ले सकता. आप ही ले कर जाएं,’ और महेंद्र ने फोन काट दिया.

हताश रीना बिलख पड़ी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

दोतीन अस्पताल में भटकने के बाद आखिर एक अस्पताल में सहेंद्र को भरती कर ही लिया गया. उसे सीधे आईसीयू में ले जाया गया जहां किसी को आने की अनुमति न थी. रीना को एम्बुलैंस बहुत मुश्किल से मिल पाई थी. उस ने सहेंद्र के औफिस में फोन लगा कर साहब को बोला था. साहब ने ही एम्बुलैंस की व्यस्था कराई थी. हालांकि, एम्बुलैंसवाले ने उस से 20 हजार रुपए ले लिए थे. उस ने कोई बहस नहीं की. इस समय उसे पैसों से ज्यादा फिक्र पति की थी. एम्बुलैंस में बैठने के पहले उस ने एक बार फिर अपने देवर को फोन लगाया था, ‘इन के साथ मैं जा रही हूं. घर में बच्चे और पिताजी अकेले हैं. आप उन की देखभाल कर लें.’

महेंद्र ने साफ इनकार कर दिया. उस ने अपनी ननद को भी फोन लगाया था. ननद पास के ही शहर में रहती थी. पर ननंद ने भी आने से मना कर दिया. रीना अपने साथ बच्चों को ले कर नहीं जा सकती थी और उन्हें ले भी जाती तो पिताजी… उन की देखभाल के लिए भी तो कोई चाहिए. उस ने अपनी कामवाली बाई को फोन लगाया, ‘‘मुन्नीबाई, मुझे इन्हें ले कर अस्पताल जाना पड़ रहा है, घर में बच्चे और पिताजी अकेले हैं. तुम उन की देखभाल कर सकती हो?’ रीना के स्वर में दयाभाव थे हालांकि, उसे उम्मीद नहीं थी कि मुन्नी उस का सहयोग करेगी. जब उस के सगे ही मदद नहीं कर रहे हैं तो फिर कामवाली बाई से क्या अपेक्षा की जा सकती है. पर उस के पास कोई और विकल्प था ही नहीं, इसलिए उस ने एक बार मुन्नी से भी अनुरोध कर लेना उचित समझा.

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‘ज्यादा तबीयत खराब है साहब की?’

‘हां, दूसरे शहर ले कर जाना पड़ रहा है.’

‘अच्छा, आप बिलकुल चिंता मत करो, मैं आ जाती हूं आप के घर.’

मुन्नीबाई ने अपेक्षा से परे जवाब दिया था.

अजोला: पौष्टिकता से भरपूर जलीय चारा

हमारे देश की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्त्वपूर्ण स्थान है. हमारे यहां जोत का आकार दिनप्रतिदिन छोटा होता जा रहा है और किसान चाह कर भी हरे चारे की खेती करने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं. यही वजह है कि देश में हरे चारे की उपलब्धता बहुत कम होती जा रही है.

झांसी स्थित भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान के एक अनुमान के मुताबिक, साल 2025 में हरे चारे की आवश्यकता 1,170 मिलियन टन होगी, जबकि उपलब्धता महज 411 मिलियन टन तक ही होगी. इस प्रकार हरे चारे की उपलब्धता तकरीबन 65 फीसदी कम रहेगी. इसी कमी को पूरा करने के लिए हमें हरे चारे के वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे, ताकि उन की सहायता से पशुओं को कुछ मात्रा में हरा चारा उपलब्ध कराया जा सके.

पशुओं के लिए वैकल्पिक हरे चारे के रूप में अजोला का नाम सब से ऊपर आता है. अजोला उगाने के लिए हरे चारे की फसलों को उगाने की तरह उपजाऊ भूमि की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है. इसे किसी भी प्रकार की भूमि में गड्ढा खोद कर और उस में पानी भर कर जलीय चारे के रूप में उगाया जा सकता है. रेतीली जमीन में भी गड्ढे में प्लास्टिक की शीट बिछा कर पानी भर कर अजोला को उगाया जा सकता है.

अजोला वास्तव में समशीतोष्ण जलवायु में पाया जाने वाला एक जलीय फर्न है. वैसे तो इस की कई प्रजातियां होती हैं, मगर इन में अजोला पिन्नाटा सब से प्रमुख है.

अजोला हरे चारे की आवश्यकता को पूरी तरह तो प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है, मगर अपने पोषक गुणों के कारण यह पशुओं के लिए हरे चारे में एक उत्तम विकल्प के रूप में जाना जाता है. अजोला गाय, भैंस, मुरगियों व बकरियों के लिए आदर्श चारा है.

अजोला खिलाने से दुधारू पशुओं के दूध उत्पादन में बढ़ोतरी होती है. जो मुरगी सामान्य रूप से साल में 150 अंडे देती है, अजोला आहार में देने से वह साल में 180-190 अंडे तक दे सकती है. इतना ही नहीं, मछली उत्पादन में भी अजोला लाभकारी साबित हुआ है.

अजोला पोषक तत्त्वों से भरपूर होने के साथसाथ कम लागत में बेहतर परिणाम देने में सक्षम है. इसे उगाने के लिए अलग से जमीन की भी आवश्यकता नहीं होती. इसे सीमेंट की क्यारियों में भी तैयार किया जा सकता है. गुणवत्ता, पाचनशीलता और प्रचुर मात्रा में प्रोटीन का स्रोत होने के कारण अजोला किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.

अजोला की पत्तियों में एनाबीना नामक साइनोबैक्टीरिया होता है, जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद करता है, इसीलिए धान के खेतों में रोपनी के एक सप्ताह बाद अजोला की खेती करने पर धान की भरपूर पैदावार हासिल होती है. अजोला पशुपालन से ले कर फसल उत्पादन बढ़ाने तक किसानों के लिए बड़ा लाभकारी हो सकता है.

अजोला की प्रमुख प्रजातियां

* अजोला माइक्रोफिला

* अजोला पिन्नाटा

* अजोला फिलिक्लोइड्स

* अजोला रुबरा

* अजोला कैरोलिनियाना

अजोला उगाने का तरीका

सब से पहले एक छोटी ट्रे में अजोला का प्योर कल्चर तैयार करते हैं. फिर 2 मीटर 3 2 मीटर 3 30 सैंटीमीटर का एक गड्ढा खोद कर इस में प्लास्टिक शीट बिछा देते हैं, ताकि पानी मिट्टी में अवशोषित न हो सके. इस के बाद गड्ढे में 10-12 किलोग्राम मिट्टी भर देते हैं. फिर इस में 10 लिटर पानी + 2 किलोग्राम गाय का गोबर + 30 ग्राम सुपर फास्फेट का मिश्रण डालते हैं. अब इस में 0.5 से 1 किलोग्राम शुद्ध अजोला कल्चर समान रूप से फैला देते हैं.

अजोला बहुत तेजी से फैलता है और 8-10 दिनों में गड्ढे को पूरा ढक देता है. जब गड्ढा पूरा ढक जाए तो उस में से प्रतिदिन 1 से 1.5 किलोग्राम अजोला निकाला जा सकता है.

अजोला को बांस की छलनी की सहायता से क्यारी से निकाल लेते हैं और 3-4 बार साफ पानी से धो कर ही पशु को चारे के साथ मिला कर नियमित रूप से खिलाते हैं.

बेहतर उत्पादन के लिए हर 5वें दिन तालाब में 20 ग्राम सुपर फास्फेट+1 किलोग्राम गोबर का मिश्रण डालते हैं. इस प्रकार एक वर्ग फुट तालाब से प्रतिदिन 200 से 250 ग्राम अजोला का उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा सकता है.

अजोला उत्पादन के लिए 25 डिगरी सैल्सियस से ऊपर का तापमान, पानी का पीएच मान 5.5-7 व आंशिक धूप इष्टतम स्थिति कहलाती है. सीधी धूप शैवाल के बनने में सहायक हो कर अजोला फर्न के उत्पादन में बाधक हो सकती है, इसलिए अजोला की क्यारियों के ऊपर थोड़ी छाया कर देते हैं.

अजोला कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन व लाभकारी फाईटोकैमिकल्स का अच्छा स्रोत होने के कारण पशुओं के शारीरिक विकास के लिए अच्छा है. गायों को चारे के साथ अजोला देने से उन के दूध उत्पादन में 15 फीसदी तक की वृद्धि देखी गई है.

वृंदा वर्मा, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या

कार्तिकेय वर्मा, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ

डा. संजीव कुमार वर्मा, भाकृअनुप-केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान, मेरठ

Winter 2022: सर्दियों में घर पर बनाइएं टेस्टी तवा नान

 सामग्री

– मैदा (150 ग्राम)

– आटा ( 100 ग्राम)

– दही (1/4 कप)

– तेल (1 बड़ा चम्‍मच)

– बेकिंग सोडा (1/2 छोटा चम्मच)

– शक्‍कर (1 छोटा चम्मच)

– नमक (1/2 छोटा चम्मच)

तवा नान बनाने की विधि :

– सबसे पहले मैदा और आटा को छान लें.

– फिर दही में शक्कर, बेकिंग सोडा और नमक डाल कर मिक्‍स कर लें.

– इसके बाद दही के मिश्रण को आटे में डाल कर मिला लें.

– इसके बाद गुनगुने पानी मी मदद से आटा गूंथ लें.

– ये आटा एकदम नरम रहना चाहिए.

– अब हथेली में थोड़ा सा तेल लगाएं.

– और आटे को मसल-मसल कर अच्‍छी तरह से गूंथ कर चिकना कर लें.

– इसके बाद आटे को ढक कर किसी गरम जगह पर 3 घंटे के लिए रख दें.

– तब तक आटा फूल जाएगा और नान के लिए तैयार हो जाएगा.

– आटा तैयार होने पर एक बार उसे और हल्‍के हाथ से गूंथ लें.

– अब उसकी लोई बना लें.

– फिर उन्‍हें सूखे आटे में लपेट लें और कपड़े से ढक कर रख दें.

– अब तवा को गैस पर रख कर गरम करें.

– जब तक तवा गरम हो रहा है एक लोई लेकर उसे आटे में लपेटें और बेल लें.

– बेली हुई लोई हल्‍की मोटी रहनी चाहिए, तभी वह नान की तरह बन पाएगी.

– अब हाथ में थोड़ा सा पानी लेंकर बेली हुई लोई की ऊपरी लेयर पर लगाएं.

– और उसे बराबर से फैला दें.

– इसके बाद लोई को पानी वाली से साइड से तवे पर रखें और मीडियम आंच पर सेकें.

– लोई में पानी लगे होने की वजह से वह तवा से चिपक जाएगी, इसे छुड़ाए नहीं.

– जब नान की ऊपर की लेयर हल्‍की सी सिक जाए, तवे का हैंडल पकड उसे उठाएं और तवा को उलटा कर   लें.

– अब तवे में चिपकी हुई लोई को गैस की आंच पर ले जाएं और घुमा-घुमा कर चित्‍तीदार होने तक सेंक लें.

– सिंकने के बाद तवा को सीधा कर लें और कलछी की मदद से नान को तवे से अलग कर लें.

– इसी तरह से सारी नान सेंक लें और तंदूरी नान रोटी  में देशी घी लगाकर ग्रेवी वाली सब्‍जी के साथ आनंद लें.

आत्मनिर्णय

मैं सोचती रह गई कि आज की नई पीढ़ी क्या हम बड़ों से ज्यादा समझदार हो गई है? आन्या ने जो फैसला लिया, शायद ठीक ही था, जबकि परिपक्व होते हुए भी आत्मनिर्णय लेने में मैं ने कितनी देर लगा दी थी.

मैं ने आन्या के पापा को उस के पैदा होने के महीनेभर बाद ही खो दिया था. हरीश हमारे पड़ोसी थे. वे विधुर थे और हम एकदूसरे के दुखसुख में बहुत काम आते थे. हरीश से मेरा मन काफी मिलता था. एक बार हरीश ने लिवइन रिलेशनशिप का प्रस्ताव मेरे सामने रखा तो मैं ने कहा, ‘यह मुमकिन नहीं है. आप के और मेरे दोनों के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. पति को तो खो ही चुकी हूं, अब किसी भी कीमत पर आन्या को नहीं खोना चाहती. हम दोनों एकदूसरे के दोस्त हैं, यह काफी है.’ उस के बाद फिर कभी उन्होंने यह बात नहीं उठाई.

धीरेधीरे समय का पहिया घूमता रहा और आन्या अपनी पढ़ाई पूरी कर के नौकरी करने लगी. उसे बस से औफिस पहुंचने में करीब सवा घंटा लगता था. एक दिन अचानक आन्या ने आ कर मुझ से कहा, ‘‘मम्मी, बहुत दूर है. मैं बहुत थक जाती हूं. रास्ते में समय भी काफी निकल जाता है. मैं औफिस के पास ही पीजी में रहना चाहती हूं.’’

एक बार तो उस का प्रस्ताव सुन कर मैं सकते में आ गई, फिर मैं ने सोचा कि एक न एक दिन तो वह मुझ से दूर जाएगी ही. अकेले रह कर उस के अंदर आत्मविश्वास पैदा होगा और वह आत्मनिर्भर रह कर जीना सीखेगी, जोकि आज के जमाने में बहुत जरूरी है. मैं ने उस से कहा, ‘‘ठीक है बेटा, जैसे तुम्हें समझ में आए, करो.’’

3-4 महीने बाद उस ने मुझे फोन कर के अपने पास आने के लिए कहा तो मैं मान गई, और जब उस के दिए ऐड्रैस पर पहुंच कर दरवाजे की घंटी बजाई तो दरवाजे पर एक सुदर्शन युवक को देख कर भौचक रह गई. इस से पहले मैं कुछ बोलूं, उस ने कहा, ‘‘आइए आंटी, आन्या यहीं रहती है.’’

यह सुन कर मैं थोड़ी सामान्य हो कर अंदर गई. आन्या सोफे पर बैठ कर लैपटौप पर कुछ लिख रही थी. मुझे देखते ही वह मुझ से लिपट गई और मुसकराते हुए बोली, ‘‘मम्मी, यह तनय है, मैं इस से प्यार करती हूं. इसी से मुझे शादी करनी है. पर अभी ससुराल, बच्चे, रीतिरिवाज किसी जिम्मेदारी के लिए हम मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से परिपक्व नहीं हैं. अलग रह कर रोजरोज मिलने पर समय और पैसे की बरबादी होती है. इसलिए हम ने साथ रह कर समय का इंतजार करना बेहतर समझा है. मैं जानती हूं अचानक यह देख कर आप को बहुत बुरा लग रहा है, लेकिन आप मुझ पर विश्वास रखिए, आप को मेरे निर्णय से कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.

‘‘और मैं यह भी जानती हूं, आप पापा के जाने के बाद बहुत अकेला महसूस कर रही हैं. आप हरीश अंकल से बहुत प्यार करती हैं. आप भी उन के साथ लिवइन में रह कर अपने अकेलेपन को दूर करें. फिर मुझे भी आप की ज्यादा चिंता नहीं रहेगी.’’

यह सब सुनते ही एक बार तो मुझे बहुत झटका लगा, फिर मैं ने सोचा कि आज के बच्चे कितने मजबूत हैं. मैं तो कभी आत्मनिर्णय नहीं ले पाई, लेकिन जीवन का इतना बड़ा निर्णय लेने में उस को क्यों रोकूं. तनय बातों से अच्छे संस्कारी परिवार का लगा. अब समय के साथ युवा बदल रहे हैं, तो हमें भी उन की नई सोच के अनुसार उन की जीवनशैली का स्वागत करना चाहिए. उन पर हमारा निर्णय थोपने का कोई अर्थ नहीं है. और यह मेरी परवरिश का ही परिणाम है कि वह मुझ से दूसरे बच्चों की तरह छिपा कर कुछ नहीं करती. मैं ने तनय को अपने गले से लगाया कि उस ने आन्या के भविष्य की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मुझे मुक्त कर दिया है. मैं संतुष्ट मन से घर लौट आई और आते ही मैं ने हरीश के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी.

Winter 2022: जानिए, क्यों जरूरी है डाइटरी फैट्स

अकसर जब भी हमारा वजन बढ़ता है तो हम सबसे पहले अपनी डाइट से फैट को आउट कर देते हैं, क्योंकि हमें यही अपना सबसे बड़ा दुश्मन जो नजर आता है. जबकि ऐसा नहीं है. क्योंकि सभी फैट्स बेकार नहीं होते हैं. कुछ फैट्स हमारी हेल्थ के लिए फायदेमंद होते हैं, जिनमें डाइटरी फैट्स मुख्य हैं.

क्या है डाइटरी फैट्स

डाइटरी फैट्स हमें पशु व पौधों से प्राप्त होता है. आपको बता दें कि डाइटरी फैट्स फैटी एसिड से बना है और फैटी एसिड 2 तरह के होते हैं, सैचुरेटेड और अनसैचुरेटेड.

सैचुरेटेड vs अनसैचुरेटेड फैट

सैचुरेटेड फैट – सैचुरेटेड फैट्स हेल्थ के लिए अच्छे नहीं होते, क्योंकि ये बैड केलोस्ट्रोल के स्तर को बढ़ाने का काम करते हैं, जिससे हार्ट सम्बंधित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

अनसैचुरेटेड फैट – अनसैचुरेटेड फैट्स आपके शरीर के लिए बेस्ट है. यह कमरे के तापमान में तरल होते हैं और इसे सब्ज़ियों व मछली से प्राप्त किया जाता है.

जानिए क्यों जरूरी है फैट्स

  1. ऊर्जा का स्रोत

खाने के जरिए जो वसा हम लेते हैं वो कार्बोहाइड्रेट्स व प्रोटीन के साथ मिलकर हमें ऊर्जा प्रदान करने का काम करती है. जिससे हमारा शरीर एक्टिव रहने के कारण हम काम में मन लगा पाते हैं.

  1. विटामिन का वाहक

खाने में फैट विटामिन ए , डी , इ और के को आंतो में अवशोषित करने में मदद करता है. जो फैट सोल्युबल विटामिन्स होते है.

  1. हड्डियों को रखे मजबूत

जब भी हम कोई भारी एक्सरसाइज करते हैं तो हमारी हड्डियों व मांसपेशियो को नुकसान पहुंचने का डर बना रहता है. जबकि एक शोध में यह साबित हुआ है कि अगर शरीर में फैटी एसिड्स को बढ़ाते हैं तो इससे हमारी हड्डियों में कैल्शियम की मात्रा बढ़ने से हड्डियां मजबूत होती हैं.

  1. मस्तिष्क के प्रौपर कार्य करने में सहायक

वसा माइलिन का एक हिस्सा है, जो हमारी तंत्रिका कोशिकाओं के चारों ओर लिपटा रहता है. यह प्रोटीन और वसा युक्त प्राधातो से मिलकर बनता है. जिससे वह इलेक्ट्रॉनिकल संदेशों को भेजने में सफल हो पाता है.

  1. ऊर्जा को संग्रहित करना

कई बार हम ऐसा भोजन खा लेते हैं, जिससे शरीर में अतिरिक्त कैलोरीज चली जाती है, जिसकी हमें अभी जरूरत ही नहीं होती. लेकिन ये उन्हें भविष्य के लिए स्पेशल फैट सेल्स में जमा रखने का काम करता है.

  1. टेस्टोस्टेरोन लेवल में बढ़ोतरी

टेस्टोस्टेरोन हार्मोन्स मसल्स की ग्रोथ के लिए जरूरी है. विभिन शोध में यह साबित हुआ है कि हाई फैट डाइट से टेस्टोस्टेरोन लेवल में बढ़ोतरी होती है. इसलिए अगर आप हैवी एक्सरसाइज करते हैं तो बाकी लोगों की तुलना में आप ज्यादा फैट वाली डाइट लें.

  1. पाएं हैल्दी स्किन

हैल्दी शरीर के लिए हैल्दी फैट और हैल्दी स्किन के लिए फैटी एसिड की जरूरत होती है. फैटी एसिड जैसे ओमेगा 3s और ओमेगा 6s हैल्दी सेल्स का निर्माण करते हैं. ये पाली अनसैचुरेटेड फैट्स स्किन को हाइड्रेट रखने के साथ यंग और ग्लोइंग दिखाने का काम करते हैं. और अगर शरीर में इसकी कमी हो जाती है तो स्किन रूखी, बेजान व ब्लैकहेड्स जैसी समस्या भी उत्पन हो जाती है. इसलिए गुड़ फैट्स को डाइट से न निकालें.

अपना घर- भाग 5: क्या बेटी के ससुराल में माता-पिता का आना गलत है?

घर पहुंच कर वाणी अरुण और रेणु के लिए चाय बनाने ही लगी कि देखा चायपत्ती खत्म हो गई है. ‘ओह, पत्ती खत्म हो गई? लेकिन सुबह तो थी. वह मन ही मन भुनभुनाई. अब चाय बनाने के लिए पत्ती तो थी नहीं, इसलिए उस ने अरुण और रेणु का खाना ही परोस दिया, वैसे भी वे लोग भूखे थे. सोचा, चाय बाद में बना देगी. पास में ही एक किराना स्टोर है, फोन कर देने पर कुछ देर में ही वह सामान घर पर भिजवा देता है. वाणी किचन के छोटेमोटे सामान वगैरह उसी दुकान से मंगवाती थी.  अच्छी सर्विस देता है वह दुकान वाला.

अभी वह अपने मांपापा को खाना दे कर कमरे से बाहर निकली ही थी कि मालती कहने लगी, “बहू, ऐसा कब तक चलेगा?”

“क..क्या हुआ मां जी?” वाणी ने अचकचा कर पूछा.

“यही की हमेशा तुम्हारे मांबाप यहां चले आते हैं. क्या अच्छा लगता है बेटी के घर बारबार आना? अरे, हमारे संस्कार में तो बेटी के घर का एक बूंद पानी पीना भी पाप माना जाता है और ये लोग… क्या जरा भी शर्मलाज नहीं है तुम्हारे मांबाप को? अब तो पड़ोसी भी पूछने लगे हैं. सच कहें, तो शर्म तो अब हमें आने लगी है.”

मालती की बात सुन वाणी अवाक थी. उसे लग रहा था काटो तो खून नहीं. वह सास को चुप कराना चाहती थी कि प्लीज, चुप हो जाओ.  मगर मालती बोलती ही जा रही थी जो मन, सो.  उधर अरुण और रेणु पहला कौर मुंह में डालने ही जा रहे थे कि मालती की कड़वी बातें सुन उन का हाथ का खाना हाथ में ही रह गया. ‘कहीं मांपापा ने सुन तो नहीं लिया…’ वह भागी उधर.

“प पापा…मम्मी… आप दोनों खा क्यों नहीं रहे? खा खाइए न, खाना अच्छा नहीं बना क्या?” वाणी झेंपी. “हां, वह मम्मी जी पूछ रही थीं कि डाक्टर ने क्या कहा?” किसी तरह वाणी बात को ढापना चाहती थी.

“बस बेटा, बहुत हो गया,” हाथ का खाना थाली में झाड़ते हुए रेणु उठ खड़ी हुई, “कहा था तुम से किसी होटल में रुक जाएंगे, पर तुम…  आखिर क्यों हमारी भी बेइज्जती कराने पर तुली हो?” लेकिन रेणु को अरुण ने कस कर डपटा.

“कुछ भी बोले जा रही हो? चुप हो जाओ. नहीं बेटा, कुछ नहीं, तुम चिंता मत करो और  रिश्तेदारी में तो यह सब चलता ही रहता है. हम फिर आएंगे लेकिन अभी मुझे एक जरूरी काम याद आ गया, तो जाना पड़ेगा. हां, मेरा बच्चा…,” बेटी के कंधे पर हाथ रखते हुए अरुण बोल तो रहे थे लेकिन उन की गीली आंखों में एक बेटी के पिता की बेबसी साफसाफ दिखाई पड़ रही थी.  अपने मांपापा के गले लग वाणी सिसक पड़ी. बेटी को छोड़ कर जाते हुए रेणु फूटफूट कर रो पड़ी. सबकुछ लेदे कर शादी करने के बाद भी एक बेटी के मांबाप की कोई औकात नहीं रहती. जब लोग बेटा न होने का ताना मारते थे तब अरुण यह बोल कर लोगों का मुंह बंद कर देते थे कि उस की एक बेटी सौ बेटों के बराबर होगी, देख लेना. अकसर अरुण यह बात दोहराते कि रिटायरमैंट के बाद वे वाणी के साथ रहने आ जाएंगे. बोलो बेटा, अपने बूढ़े मांपापा को साथ रखोगी न?” और मासूम सी वाणी कहती, हां, वह अपने मांपापा को हमेशा अपने साथ रखेगी. लेकिन आज अपने उसी मांपापा की अपनी ससुराल में ऐसी बेइज्जती होते देख वाणी का रोमरोम कराह उठा. वाणी ने नहीं रोका उन्हें जाने से क्योंकि वह उन की और बेइज्जती नहीं करवाना चाहती थी. लेकिन अफसोस कि उस के मांपापा बिना खाएपिए  चले गए.

अरे, एक जानवर को भी हम रोटी देते समय सहलाते हैं, लेकिन आज मालती ने तो सारी हदें पार कर दीं. देख लिया जब वाणी के मांपापा चले गए तो मालती अपनी मित्र मंडली के साथ रोज की तरह सतसंग के लिए निकल गई. पूजापाठ, हवनकृतन और पंडेपुजारियों पर मालती लाखों रुपए लूटा देती है. लेकिन वहीं किसी गरीब की एक पैसे से मदद की हो कभी, ऐसा कभी नहीं हुआ.

‘कोई इंसान इतना पत्थर दिल कैसे हो सकता है. कल उन की भी बेटी की शादी होगी, तब पता चलेगा उन्हें कि मांबाप के लिए एक बेटी का मोह क्या होता है,’ सिसकती हुई वाणी सोच ही रही थी कि कौलबैल बजी. उसे लगा किराने वाला आया होगा सामान ले कर. लेकिन जब सामने आलोक को पाया तो उस की बरदाश्त का बांध टूट गया और वह आलोक के सीने से लग  फूटफूट कर रोने लगी. आलोक तो सब समझ ही गया था लेकिन फिर भी उस के पूछने पर वाणी ने शुरू से अंत तक एकएक बात उस के सामने खोल कर रख दी. सुन कर आलोक का खून खौल उठा, सोच लिया उस ने जो हो पर आज वह मालती को नहीं छोड़ेगा. फैसला हो कर रहेगा, चाहती क्या हैं वह? लेकिन वाणी ने उसे यह कह कर रोक दिया कि यह सब करने का कोई फायदा नहीं है. लेकिन, उसे अब वह करना होगा जो वाणी चाहती है. “आलोक, मुझे यहीं दिल्ली में ही अपना एक घर चाहिए जिसे मैं ‘अपना घर’ कह सकूं और जहां मेरे मम्मीपापा जब चाहें, हक से आ कर रह सकें. मैं तुम्हें तुम्हारे परिवार से दूर नहीं करना चाहती. तुम्हारी मरजी तुम जहां रहना चाहो. लेकिन अब मेरा फैसला अटल है.“

आलोक ने कुछ नहीं बोला लेकिन वाणी का फैसला उसे एकदम सही लगा और वह अपनी पत्नी के इस फैसले में उस के साथ है.

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