भागदौड़ वाली जिंदगी थम सी गई है. दिल्लीमुंबई जैसे भीड़ वाले इलाके भी गांव सरीखे प्रतीत हो रहे हैं क्योंकि सभी अपने घरों में रह रहे हैं. न गलियों में मोटरसाइकिल की आवाज सुनाई दे रही है, न सड़कों पर कारों का तेज हार्न कानों को चुभो रहा है. वहीं पुलिस की मुस्तैदी भी वाकई काबिलेतारीफ है.

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