Arvind Kejriwal : शराब घोटाले मामले में अरविंद केजरीवाल सरकार बेदाग साबित हुई है. अदालत ने सिर्फ फैसला ही नहीं दिया है बल्कि सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों की जम कर खिंचाई भी की है. ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है लेकिन सुधरने का नाम ये दोनों ही एजेंसियां नहीं ले रहीं जो सरकार के इशारे पर नाचती, खासतौर से, विपक्षी नेताओं को फंसाती हैं लेकिन अदालत में वे कुछ साबित नहीं कर पातीं, यानी, इन का काम भाजपाविरोधी नेताओं का मनोबल गिराना रह गया है. यही हाल सीएजी का भी है, जिस का औडिट अकसर मनगढ़ंत होता है , जो जांच में अहम रोल निभाता है.
27 फरवरी, 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआई अदालत के विशेष जज जितेंद्र सिंह के एक फैसले ने भारत के चुनावी लोकतंत्र और देश की सर्वोच्च जांच एजेंसियों की कलई एक बार फिर खोल कर रख दी. दिल्ली की पिछली केजरीवाल सरकार, जिस के खिलाफ 100 करोड़ रुपए के शराब घोटाले की जांच देश की सब से बड़ी जांच एजेंसियां सैंट्रल ब्यूरो औफ इन्वैस्टीगेशन (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) कर रही थीं, के सभी आरोपियों को कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया. कानूनी तौर पर इसे डिस्चार्ज करना कहते हैं जिस में आरोप तय होने से पहले ही आरोपमुक्त कर दिया जाता है, यानी, मामला ट्रायल पर ही नहीं आता.
पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित सभी 23 आरोपी अब इस घोटाले से मुक्त हैं. यही नहीं, कोर्ट ने सीबीआई और ईडी के काम के तरीके और उन की नीयत पर सवाल भी उठाए, कहा कि यह पूरा केस एक फ्रौड केस है, जिस में न कोई रिकवरी हुई, न पैसे के लेनदेन को कोई एजेंसी साबित कर पाई.
अदालत का फैसला गौर से देखें तो वह मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों का सटीक विश्लेषण होने के साथसाथ जांच एजेंसियों को कठघरे में खड़ा करते हुए उन के सत्ता का दलाल होने की तरफ भी इशारा करता है. सीबीआई से उम्मीद होती है कि बिना पक्षपात काम करे, खासकर, उन मामलों में जिन में किसी की आजादी और प्रतिष्ठा दांव पर हों. लेकिन इस मामले में सुबूतों के बिना केजरीवाल सरकार के खिलाफ जाल फैलाया गया और जायज राजनीतिक गतिविधियों को आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई.
सीबीआई की कार्यशैली पर तंज कसते हुए फैसले में कहा गया है कि सीबीआई मान बैठी थी कि अपराध हुआ और फिर अपनी बात साबित करने के लिए वह लोगों को फंसाती गई. कानूनी तौर पर ढिलाई और मनमानी की तरफ इशारा करते हुए फैसले में कहा गया है कि कुछ लोग संदिग्ध की सूची में थे, उन्हें गवाह भी बना लिया गया ताकि अगर वे मुकर जाएं तो उन्हें आरोपी बनाया जा सके. जो लोग नकद पैसे इधरउधर करना मान चुके थे, उन्हें आरोपी नहीं बल्कि गवाह बनाया गया, उन के बयानों के आधार पर भी लोग फंसाए गए.
इतना ही नहीं, सीबीआई की खिल्ली सी उड़ाते फैसले के ये शब्द काबिलेगौर हैं कि- सीबीआई ने चुनावप्रचार, होटल बुकिंग भुगतान की भी जांच की जो निर्वाचन आयोग का काम है, यानी, संवैधानिक सीमाएं पार की गईं. सत्ता के हाथों कठपुतली बन चुकी इस जांच एजेंसी के एक झूठ पर भी फैसले में कहा गया है कि- सीबीआई ने कहा था कि एक अभियोजक के बयान की कौपी नहीं मिली, रिकौर्ड में यह बात झूठ साबित हुई.
शराब घोटाले मामले को कैसे एक नपीतुली सियासी साजिश के तहत क्रिएट किया गया था, इस पर हैरानी जताते हुए फैसले में कहा गया है कि जांच ऐसे बढ़ी जैसे बहुत सारे लोगों को इस के दायरे में लाना हो. सुबूत के बजाय पुरानी कड़ियां खोल कर ऊपर तक जोड़ी गईं.
गौरतलब है कि 100 करोड़ रुपए के तथाकथित शराब घोटाले का मामला तब उछाला गया जब दिल्ली में चुनाव होने थे. सीबीआई ने पूरे फ्रौड मामले में राज्य के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और सरकार के सभी बड़े नेताओं को जेल में ठूंस दिया. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत नहीं दी, जमानत दी भी तो इस अलोकतांत्रिक शर्त पर कि आप चुनावप्रचार नहीं करेंगे.
इन सब के बीच सीएजी यानी कैग की रिपोर्ट भी आई जिस में कहा गया कि केजरीवाल की शराब नीतियां गड़बड़ थीं. इस रिपोर्ट के आने के बाद सीबीआई जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो गई. लगे हाथ ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने भी 100 करोड़ रुपए का खेल बतला दिया.
और भी हैं ऐसे मामले
कैग की रिपोर्टें पहले भी ऐसे कई गुल खिला चुकी हैं. बरबस ही इस मामले ने सीडब्ल्यूजी (कामन वैल्थ गेम्स) और 2 जी स्पैक्ट्रम मामलों की याद दिला दी. उस वक्त कैग के मुखिया विनोद राय थे. इन दोनों ही मामलों पर भाजपा के होहल्ले ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने और खुद सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.
सीडब्ल्यूजी मामले में कैग ने साल 2011 की अपनी रिपोर्ट में भारी वित्तीय अनियमितताओं की तरफ इशारा किया था. इस आयोजन समिति के अध्यक्ष उड्डयन मंत्री रह चुके दिग्गज कांग्रेसी नेता सुरेश कलमाड़ी थे जो 16 साल भारतीय ओलिंपिक संघ के भी अध्यक्ष रहे थे. उन्हें 2011 में ही गिरफ्तार कर लिया गया था. कैग का एक अहम आरोप यह भी था कि कई ठेके मनचाही कंपनियों को दिए गए हैं. इस मामले की जांच भी सीबीआई और ईडी दोनों ने की थी लेकिन अधिकतर मुकदमे अभी भी सुनवाई के स्टेज पर ही हैं. किसी को सजा नहीं हुई है.
2 जी मामले ने तो देश की राजनीति की दशा और दिशा ही बदल कर रख दी थी. इस मामले में भी रिपोर्ट विनोद राय ने तैयार की थी. 2 जी मामला देश के दूरसंचार क्षेत्र से जुड़ा हुआ था जिस में साल 2008 में लाइसैंस आवंटित किए गए थे. लाइसैंस देने का अधिकार दूरसंचार मंत्रालय के पास था, जिस ने बहुत पारदर्शी तरीके से पहले आओ पहले पाओ की नीति पर तवज्जुह दी थी.
इसी नीति के तहत जनवरी 2008 में कुछ घंटों में ही लाइसैंस बंट गए थे. दूरसंचार मंत्रालय ने 2001 की कीमतों को ही लागू रखा था जबकि 2008 तक मोबाइल का बाजार काफी बढ़ चुका था.
साल 2010 में विनोद राय ने कैग की रिपोर्ट पेश की जिस में कहा गया था कि इस से सरकार को लगभग 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. इस आंकड़े ने देशभर में हलचल मचा दी थी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उस ने 2 फरवरी, 2012 को 122 लाइसैंस रद्द कर दिए. तब सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि आवंटन प्रक्रिया मनमानी और असंवैधानिक थी. उस ने आइंदा स्पैक्ट्रम नीलामी के जरिए देने के भी निर्देश दिए थे. इस मामले की जांच भी सीबीआई और ईडी ने की थी.
भाजपा ने इसे ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल करते देशभर में इतना हाहाकार मचाया था कि एक बार तो हर किसी को यह लगने लगा था कि यूपीए गठबंधन के प्रमुख घटक डीएमके के ए राजा, जो उस वक्त दूरसंचार व आईटी मंत्री थे, और डीएमके सांसद कनिमोझी बहुत बड़े घोटालेबाज हैं. यह अंतिम फैसला आने के पहले की बात है.
समाजसेवी अन्ना हजारे भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छेड़ चुके थे, जिसे देशभर से व्यापक समर्थन मिला था, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही अन्ना जंतरमंतर से छूमंतर हो गए मानो उन का मकसद पूरा हो चुका हो. दिल्ली की शराब नीति मामले में भी ऐसा ही हल्ला भारतीय जनता पार्टी द्वारा मचाया गया था कि आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल हर किसी को महाभ्रष्ट और अव्वल दर्जे के घोटालेबाज नजर आने लगे थे.
यह कहना गलत न होगा कि भगवा गैंग के संस्कार ही दुष्प्रचार के हैं, ठीक वैसे ही जैसे पौराणिककाल में हुआ करते थे. महाभारत का एक पात्र अश्वत्थामा तब के युद्ध गुरु द्रोणाचार्य का लाड़ला बेटा था. महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्य ने त्राहित्राहि मचा रखी थी. लाख कोशिशों के बाद भी वे हथियार डालने के लिए तैयार नहीं थे और पांडव पक्ष के योद्धाओं को मारते जा रहे थे. तब पांड्वों की तरफ से यह रणनीति बनी कि अगर द्रोणाचार्य को यह भरोसा दिला दिया जाए कि अश्वत्थामा मर चुका है तो वे हताश हो कर हथियार छोड़ देंगे.
तब भी थे तो सब के सब एक नंबर के झुठेले ही लेकिन सिर्फ युधिष्ठिर झूठ नहीं बोलते थे, इस पर किसी को शक नहीं था, यहां तक कि द्रोणाचार्य को भी नहीं. सत्यवादी युधिष्ठिर झूठ बोलने को तैयार नहीं हुए. इस धर्मसंकट से बचने के लिए कृष्ण द्वारा तय यह किया गया कि एक हाथी का नाम अश्वत्थामा रखा जाए और युधिष्ठिर इस का ऐलान करें कि अश्वत्थामा मर गया लेकिन हाथी.
प्लान कामयाब रहा. जैसे ही युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा मर गया कहा तो पांड्वों ने इतना शोरशराबा किया कि हाथी कोई नहीं सुन पाया. द्रोणाचार्य ने जैसे ही युधिष्ठिर के मुंह से यह सुना कि अश्वत्थामा मर गया वैसे ही उन के हाथपैर ढीले पड़ गए और उन्होंने हथियार फेंक दिए. बस, फिर क्या था, पांड्वों की तरफ से दयुम्न ने उन्हें मार डाला.
यही शोर भगवा गैंग ने दिल्ली की शराब नीति के वक्त मचाया था और यही 2 जी स्पैक्ट्रम और सीडब्ल्यूजी मामले के वक्त मचा कर जीत हासिल कर ली थी. सुरेश कलमाड़ी, ए राजा, कनिमोझी और अरविंद केजरीवाल इतने बदनाम कर दिए गए कि जनता की निगाह से ही उतर गए. इन से भी ज्यादा और निर्णायक नुकसान कांग्रेस को हुआ जिस के हाथ से सत्ता खिसकी, तो वापस आने का नाम ही नहीं ले रही. हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे उसे उम्मीद बंधाते हुए हैं.
सो, इस तरह इन मामलों में भी जनता ने द्रोणाचार्य की तरह अश्वत्थामा मर गया तो सुना लेकिन हाथी नहीं सुना क्योंकि भगवा शोर ने उस के कान बंद कर दिए थे. बहरहाल, 2 जी मामला सीबीआई की विशेष अदालत में चला तो उस ने ए राजा और कनिमोझी सहित दूसरे आरोपियों को बरी कर दिया. विशेष न्यायाधीश ओ पी सोनी ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा था कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सुबूत पेश नहीं कर पाया, पूरा मामला अनुमानों और धारणाओं पर आधारित था. यह फैसला 21 दिसंबर, 2017 को आया था, तब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 3 साल गुजर चुके थे.
ए राजा को 2010 में इस्तीफा देना पड़ा था और सवा साल तिहाड़ जेल में सजा भी उन्होंने काटी थी, लेकिन उस गुनाह की जो उन्होंने किया ही नहीं था, बल्कि तकनीकी तौर पर इस के जिम्मेदार विनोद राय थे जिन्होंने, तय है, जानबूझ कर ऐसी रिपोर्ट तैयार की थी जो यूपीए की इमेज बिगाड़े जिस से फायदा एनडीए को मिले और ऐसा हुआ भी तो सहज समझ में आता है कि खासतौर से भाजपा साम, दाम, दंड और भेद सबकुछ अपनाती व आजमाती है. 2011 में ही गिरफ्तार हो कर 6 महीने जेल की सजा कनिमोझी ने भी भुगती थी और सुरेश कलमाड़ी भी 9 महीने जेल में रहे थे, मार्च 2025 में उन की मौत हो गई थी.
इन की हुई सियासी मौत
ए राजा, कनिमोझी, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के बारे में बेहिचक कहा जा सकता है कि उन्हें सियासी तौर पर कैग, सीबीआई और ईडी की तिकड़ी ने मार डाला है.
सीबीआई, ईडी और कैग न जाने कितने राजनेताओं का कैरियर उन पर झूठे आरोप लगाकर बरबाद कर दिया. एवज में उन के अधिकारियों को सत्तारूढ़ दल का संरक्षण, कृपा और बख्शिश मिली. कांग्रेस के दौर में भी ऐसा होता था और भाजपा के 12 साल के राज में तो कुछ ज्यादा ही हो रहा है.
अरविंद केजरीवाल आरोपमुक्त होने के बाद भाजपा, अमित शाह और नरेंद्र मोदी पर हमलावर जरूर हैं, वे मोदी को मनोरोगी तक कह रहे हैं लेकिन अब उन की पहले सी वापसी शक के दायरे में है. उन की हालत तो उस कथित बलात्कार पीड़िता सरीखी हो गई है जिसे समाज आसानी से स्वीकार नहीं करता. जबकि जानते सब हैं कि वह सीता की तरह पवित्र है पर हकीकत तो यह भी है कि लोगों ने बख्शा तो सीता को भी नहीं था, तो इन की क्या बिसात.
इस के बाद भी राजनीति में कुछ नहीं कहा जा सकता. कभी भी कुछ भी होने के लिए इस का चरित्र कुख्यात तो है. दिल्ली की मूडी जनता को अगर भगवा गैंग की बदमाशी समझ में आ गई और उस ने बेईमानी का सबक सिखाने की ठान ली तो अरविंद केजरीवाल खुद ही साबित कर देंगे कि उन के दामन में बदनामी के दाग साहब ने लगवाए थे. अगले साल गोवा, गुजरात और पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं. इन तीनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी का खासा प्रभाव है. पंजाब में तो वह सरकार चला ही रही है. ‘आप’ को इस फैसले का फायदा मिल सकता है.
27 फरवरी के फैसले के बारे में सभी विपक्षी नेताओं ने कुछ न कुछ कहा लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस की सटीक व्याख्या की. बकौल सिब्बल, अगर पूरा मामला एक फ्रौड केस था तो ये जो 126 दिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जेल में बिताए उस का खमियाजा कौन भुगतेगा? 503 दिन दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने जेल में बिताए, उस का खमियाजा कौन भुगतेगा? आखिर किसी की जवाबदेही तो होनी चाहिए.
सिब्बल ने कहा- मोदी सरकार कहती थी 100 करोड़ रुपए का घोटाला है मगर उन की एजेंसी न कोई रिकवरी कर पाईं, न कोई फाइनैंशियल ट्रेड साबित हुआ. जज ने कहा कि पहले यह तय किया गया कि इन को फंसाना है. फिर उन्होंने यह सोचा कि कैसे फंसाना है. सबकुछ प्रीमेडीटेटेड था. यह क्या तरीका है?
ऐसे फंसी केजरीवाल सरकार
दिल्ली में भाजपा चुनाव जीत जाए, सिर्फ इसलिए देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सक्रिय हो गए क्योंकि तीन चुनावों में तमाम हथकंडे अपना कर भी भाजपा केजरीवाल का कुछ नहीं बिगाड़ पाई थी. सो, उस ने इस बार चरित्र हनन का दांव खेला. तमाम बड़ी जांच एजेंसियों जिन में सीबीआई सब से आगे थी, को केजरीवाल सरकार के एकएक नेता के पीछे छोड़ दिया गया. अदालतों को सैट किया गया. लिहाजा, अदालतें उन्हीं के साथ चल पड़ीं. केजरीवाल ने गोवा चुनाव में 44 करोड़ रुपए खर्च किए, गोदी मीडिया में इस का बढ़चढ़ कर प्रचार किया गया. लेकिन 27 फरवरी, 2026 को जब अदालत ने कहा- सबकुछ झूठ है. पूरा केस ही फ्रौड है, तब बीजेपी की साजिश खुली और उस की साजिश में संलिप्त सीबीआई और ईडी की असलियत जनता ने देखी.
कोर्ट ने कहा- शराब घोटाले का कोई सुबूत नहीं, कोई साक्ष्य नहीं, पूरा केस साजिशन बनाया लगता है. ऐसी परिस्थिति इस देश में कभी नहीं थी. जज ने यहां तक कह दिया कि सीबीआई के उस अधिकारी के खिलाफ तुरंत जांच की जाए जो पूरे मामले की जांच कर रहा था.
अदालत द्वारा केस को आधारहीन या त्रुटिपूर्ण ठहराने और जांच अधिकारी के खिलाफ जांच के आदेश देने से यह प्रश्न और तीखा हो गया है कि क्या हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में सत्ता और संस्थाओं के बीच संतुलन सही दिशा में है भी?
भारत में सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां शुरू से ही विवादों में रही हैं. विपक्षी आरोप लगाते हैं कि इन जांच एजेंसियों का इस्तेमाल सत्ता पक्ष अपने विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए करता है. वहीं, सरकार का तर्क होता है कि कानून अपना काम कर रहा है.
देश में सीबीआई का गठन भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और गंभीर आर्थिक अपराधों की जांच के लिए किया गया था, जिस के तार कई राज्यों में फैले हों ताकि केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सार्वजनिक संस्थानों में बढ़ते भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके. मगर देखा यह गया कि अपने मूल काम से हट कर सीबीआई उन मामलों में सुर्खियां बटोरने लगी जो हत्या से जुड़े थे. जैसे, नोएडा का निठारी कांड, आरुषि हत्याकांड, किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट, मधुमिता शुक्ल हत्याकांड, प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड या कविता रानी हत्याकांड, जबकि इन मामलों की जांच राज्य पुलिस, सीआईडी, सीबीसीआईडी आदि को करनी चाहिए थी.
परंतु इन मामलों को सीबीआई ने अपने ऊपर ओढ़ कर अखबारों की सुर्खियां बटोर लीं, जबकि असल और बड़े वित्तीय घोटालों से नजरें हटा लीं. सीबीआई ने सत्ता के इशारे पर उन वित्तीय घोटालों के मामलों, जिन में देश के बड़ेबड़े मंत्रीअधिकारी लिप्त हैं और जिन की वजह से देश की आम जनता महंगाई के बोझ तले दबती चली जा रही है, की ऐसी लचर जांचें कीं कि असली अपराधी कभी जेल की सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा. जबकि, विपक्षी दलों के नेताओं को खूब प्रताड़ित किया.
कठघरे में सजा की दर
आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि ईडी ने जिन नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए उन में सजा की दर न के बराबर है. खुद वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने संसद में स्वीकारा था कि ईडी ने अप्रैल 2015 से ले कर फरवरी 2025 के बीच 193 लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे जिन में से केवल दो मामलों में ही सजा हुई यानी सजा की दर 1 फीसदी रही. जो दो नेता दोषी पाए गए वे दोनों ही झारखंड के थे. वहां के पूर्व मंत्री हरिनारायण राय को 7 साल की कैद और 5 लाख रुपए के जुर्माने की सजा हुई जबकि एक और पूर्व मंत्री एनोस एक्का को 7 साल की कैद और 2 करोड़ रुपए के जुर्माने की सजा हुई.
इस खामी या साजिश पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार मनीलौंड्रिंग के मामलों में कम दोषसिद्धि पर कमैंट किए हैं. टीएमसी विधायक पार्थ चटर्जी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी की थी कि ईडी की दोषसिद्धि की दर खराब है. कोर्ट ने यह सवाल भी किया था कि आखिर किसी व्यक्ति को कितने समय तक विचाराधीन रखा जा सकता है. इस गंभीर मसले पर देश के मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान 7 अगस्त, 2025 को यह कहते हुए तंज कसा था कि ईडी बिना दोष सिद्ध किए लोगों को सालों तक जेल में रखने में सफल रही है.
यह एजेंसी कितने मनमाने ढंग से सरकार के इशारे पर नाचती हुई काम करती है, इस पर टीएमसी नेता साकेत गोखले की मानें तो ईडी द्वारा राजनेताओं के खिलाफ दर्ज किए 98 फीसदी मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ थे. महज 2 फीसदी भाजपा नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए गए. ये 2 फीसदी भी भाजपा वाशिंगमशीन में शामिल हो गए. जाहिर है, उन का इशारा हिमंत बिस्वा सरमा, नारायण राणे और शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं की तरफ था.
बकौल साकेत गोखले, पिछले 11 सालों में 1,000 मामलों में से केवल 7 को ही दोषी पाया गया. यानी, 993 को महज जेल में ठूंसने के लिए मामले दर्ज किए गए क्योंकि सख्त पीएमएलए (प्रिवैंशन औफ मनीलौंड्रिंग एक्ट 2002) के तहत जमानत मिलना कठिन है. यही हाल सीबीआई का है जो राजनेताओं और दूसरे अपराधियों के आंकड़े अलगअलग पेश नहीं करती लेकिन विपक्ष का यह आरोप आंकड़ों और हकीकत के बेहद नजदीक है कि उस ने भी 95 फीसदी मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ दर्ज किए और उस की भी दोषसिद्धि और सजा दर 3 फीसदी के लगभग ही है.
सत्ता से सीबीआई का गठजोड़ नया नहीं है. इतिहास गवाह है कि पहले कि सरकारों, खासकर कांग्रेस के शासनकाल, में भी सीबीआई को ‘कांग्रेस ब्यूरो औफ इन्वैस्टिगेशन’ कहा जाता था. सीबीआई की तसवीर और तासीर ऐसी है कि 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कह दिया. यह टिप्पणी बताती है कि राजनीतिक हस्तक्षेप सीबीआई के कामकाज पर कितना प्रभावकारी है.
2014 में जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो सीबीआई और ईडी सत्ता की कठपुतली बन कर नाचने लगीं. मोदीशाह के इशारे पर तमाम विपक्षी नेताओं पर छापे, गिरफ्तारियां और जांचों में तेजी आ गई. सीबीआई का इस्तेमाल, बस, राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने, राज्य सरकारों को अस्थिर करने और चुनावी फायदे के लिए होने लगा. चुनाव के समय विपक्षी नेताओं के चुनावप्रचार में व्यवधान डालने के लिए सीबीआई और ईडी का सीधा इस्तेमाल मोदीशाह ने किया, यह कोई ढकीछिपी बात नहीं है.
याद होगा जब 2022 में उत्तर प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बजी थी तब कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा की चुनावी यात्राओं में व्यवधान डालने के लिए उन के पति रौबर्ट वाड्रा को ईडी ने कई बार अपने औफिस में पूछताछ के लिए तलब किया. प्रियंका गांधी सुबह रौबर्ट वाड्रा को ईडी औफिस छोड़ कर चुनावप्रचार के लिए निकलती थीं. चुनाव समाप्त हुए और ईडी की पूछताछ भी खत्म हो गई. जमीन घोटाले में रौबर्ट वाड्रा के खिलाफ ईडी कुछ भी साबित नहीं कर पाई. दरअसल, साबित तो कुछ करना भी नहीं था. मकसद तो, बस, विपक्षी नेताओं को प्रताड़ित और हतोत्साहित करने भर का था. जिस के लिए इन एजेंसियों में बैठे बड़ेबड़े अधिकारी जनता की गाढ़ी कमाई से बड़ीबड़ी तनख्वाह पा रहे हैं और बीजेपी की उंगलियों पर नाच रहे हैं.
सीबीआई द्वारा जिन इनेगिने मामलों में नेताओं को सजा हुई है उन में से एक प्रमुख बिहार का चारा घोटाला है जिस के लीडर पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव हैं. यह बहुचर्चित घोटाला साल 1996 में उजागर हुआ था. यह साल राजनीतिक अस्थिरता और उठापटक वाला था. तब केंद्र में पी वी नरसिम्हा राव वाली कांग्रेस सरकार थी. उस ने कोई दखल इस में नहीं दिया था क्योंकि सीबीआई जांच पटना हाईकोर्ट के आदेश पर शुरू हुई थी जिस के चलते लालू यादव को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. तब उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को कुरसी सौंप दी थी.
लालू यादव के चारा घोटाले से ताल्लुक रखते मुकदमे अभी कोर्टों में चल रहे हैं लेकिन यह भी दिख रहा है कि घोटाले तो उन्होंने किए हैं. अब यह और बात है कि उन के वकील बचाव सलीके से नहीं कर पाए और खुद लालू भी अतिआत्मविश्वास के शिकार रहे. इन दिनों खराब सेहत के चलते वे जमानत पर हैं. यहां यह सवाल मौजूद है कि भ्रष्ट तो सौ फीसदी नेता हैं लेकिन अधिकतर अपने कुकर्म ढकने और कमाई को मैनेज करने की कला जानते हैं. लालू की हालत देख तो सभी एहतियात से कमानेखाने लगे हैं. कोई कम खाता है तो कोई ज्यादा खाता है. राजनीति काजल की कोठरी है जिस में से बिना कालिख के तो किसी का बाहर आना शायद मुमकिन नहीं. ऐसे में जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपनी जांचों में निष्पक्ष रहें और सत्ता के तलवे चाटने से दूर रहें.
गैरों पे सितम और अपनों पर रहम
मजे की बात यह है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई की जांचें चुनावी मौसम में तेज होती रहती हैं और जब विपक्षी नेता बीजेपी में शामिल हो जाते हैं तो मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं. उदाहरण के लिए, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, जो पहले कांग्रेस में थे, पर शारदा चिट फंड घोटाले के आरोप थे, लेकिन बीजेपी में शामिल होने के बाद जांच रुक गई. इस पैटर्न ने ही सीबीआई की अहमियत खाक में मिला दी है हालांकि, मोदी सरकार इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि जांचें कानूनी आधार पर होती हैं. लेकिन तथ्य क्या कहते हैं? आइए कुछ प्रमुख उदाहरणों पर नजर डालें.
पहला प्रमुख उदाहरण है सीबीआई डायरैक्टर आलोक वर्मा मामला. आलोक वर्मा 2018 में सीबीआई के निदेशक थे, जिन्होंने राफेल लड़ाकू विमान सौदे में हुई अनियमितताओं की जांच शुरू करने की तैयारी की थी. तभी मोदी सरकार ने वर्मा के कार्यालय को सील कर दिया और उन्हें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में पद से हटा दिया गया. आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने इसे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ा और कहा कि यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि वर्मा के पास राफेल घोटाले से जुड़े दस्तावेज थे. अगर आलोक वर्मा यह जांच शुरू करते तो बीजेपी के शीर्ष पद पर आसीन माननीयों के चेहरे बेनकाब हो जाते.
यह घटना सीबीआई की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है, क्योंकि वर्मा को हटाने के बाद उन की पैंशन और अन्य लाभ भी रोक दिए गए. विपक्ष ने इसे ‘संस्थागत हत्या’ करार दिया, जबकि सरकार ने इसे सीबीआई का ही आंतरिक विवाद बताया. लेकिन इस मामले ने साफ कर दिया कि सीबीआई के शीर्ष पदों पर नियुक्तियां और बर्खास्तगी राजनीतिक इच्छाशक्ति से अपने फायदे के लिए होती हैं.
दूसरा उदाहरण है पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का केस. वर्ष 2015 में एयरसेल-मैक्सिस मामले में पहली चार्जशीट दाखिल हुई थी, लेकिन 4 साल बाद, 2019 में बीजेपी सरकार के दौरान नई चार्जशीट दाखिल की गई. यह राजनीतिक बदला था, क्योंकि चिदंबरम कांग्रेस के प्रमुख नेता हैं. इसी तरह, आईएनएक्स मीडिया मामले में चिदंबरम को गिरफ्तार किया गया, जो कई महीनों तक जेल में रहे. फिर उन्हें जमानत मिल गई. मामला अभी तक लंबित है. ईडी ने कहा- मनीलौंड्रिंग के सुबूत हैं मगर 11 साल हो गए, अदालत में वे सुबूत पेश नहीं किए गए. जो अधिकारी इस केस को देख रहे थे वे अब बीजेपी में एमएलए हैं.
मध्यप्रदेश के बहुचर्चित व्यापमं घोटाले में सीबीआई की सब से ज्यादा किरकिरी हुई. मध्य प्रदेश का बहुचर्चित व्यापमं घोटाला देश के सब से बड़े भरती और प्रवेश परीक्षा घोटालों में गिना जाता है. मैडिकल कालेजों में दाखिला, सरकारी नौकरियों की भरती और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में फर्जीवाड़े के आरोपों ने वर्षों तक राज्य और देश की राजनीति को हिला कर रखा. व्यापमं यानी मध्य प्रदेश प्रोफैशनल एग्जामिनेशन बोर्ड पर आरोप था कि उस ने पैसे ले कर फर्जी अभ्यर्थियों को परीक्षाओं में बैठाया, ओएमआर शीट्स बदलीं और अयोग्य उम्मीदवारों को चयनित कराया. जब मामले की छानबीन शुरू हुई तो बीजेपी के कई प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए. इस के बाद मौतों की एक लंबी श्रृंखला चालू हो गई. इन में सब से संदिग्ध मौत चिकित्सा शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की थी जिन के बारे में कहा जाता है कि भगवा गैंग ने ही उन्हें फंसाया था.
2015 में, लगातार विवाद, हाईकोर्ट की निगरानी और संदिग्ध मौतों की लंबी श्रृंखला के बीच जांच राज्य पुलिस से ले कर सीबीआई को सौंपी गई. मगर व्यापमं में लिप्त कई आरोपियों, केस से जुड़े गवाहों की मौतों का सिलसिला रुका नहीं. सीबीआई से लोगों को उम्मीद थी कि वह दूध का दूध, पानी का पानी कर देगी. मगर सीबीआई ने अधिकांश मौतों में ‘प्राकृतिक कारण’ या ‘आत्महत्या’ की बात कही, जिस से विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए.
सीबीआई ने निचले स्तर के दलालों और अभ्यर्थियों पर तो कार्रवाई की लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर के बड़े चेहरों तक जांच की आंच नहीं पहुंची. अदालत में सीबीआई की कमजोर पैरवी, सुबूतों की कमी और गवाहों के मुकर जाने के कारण आरोपियों को राहत मिली. यह मामला वर्षों तक चलता रहा. हजारों पन्नों की चार्जशीट, सैकड़ों आरोपी, लेकिन अंतिम नतीजे ढाक के तीन पात. अनेक आरोपियों को सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया और इस तरह ‘बड़ी मछलियां’’ बच गईं. इन बड़ी मछलियों में एक चर्चित और संदिग्ध नाम पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भी है.
व्यापमं घोटाला केवल एक भरती घोटाला नहीं था; यह भारत की जांच प्रणाली, राजनीतिक जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया की परीक्षा भी था. सीबीआई को मामला सौंपे जाने के बाद जनता को बहुत उम्मीदें थीं कि उन के साथ न्याय होगा. मगर जांच की दिशा, गति और परिणामों को जिस बुरी तरह प्रभावित किया गया उस ने एजेंसी के मुंह पर कालिख पोत दी.
चौथा उदाहरण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से जुड़ा है. 2014 में शारदा चिट फंड घोटाले में सीबीआई ने जांच शुरू की, लेकिन ममता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में कर रही है. उन्होंने कहा, “अन्य चिट फंड कंपनियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या सीबीआई सरकार का औजार है?”
2019 में हाल यह हुआ कि सीबीआई अधिकारियों को कोलकाता पुलिस ने हिरासत में ले लिया, जो एक बड़ा राजनीतिक विवाद बना. ममता ने सीबीआई की कार्रवाइयों को ‘संघीय ढांचे पर हमला’ बताया.
इस के बाद 2023 में तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी को सीबीआई ने पूछताछ के लिए बुलाया, जिसे तृणमूल कांग्रेस ने ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ करार दिया. ये घटनाएं दिखाती हैं कि सीबीआई का उपयोग राज्य सरकारों को अस्थिर करने के लिए किस तरह होता है.
पांचवा उदाहरण उन्नाव रेप केस में कुलदीप सिंह सेंगर का है. सेंगर बीजेपी का पूर्व विधायक, जो रेप और हत्या का दोषी पाया गया. सीबीआई ने शुरुआत में मामले को दबाने की कोशिश की लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव में कार्रवाई की. हाल ही में सेंगर को जमानत मिली, जिस पर राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि पीड़िता को प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि आरोपी को राहत दी जा रही है. यह मामला भी दिखाता है कि सीबीआई की जांचें राजनीतिक दबाव के अनुसार चलती हैं.
गौरतलब है कि बीजेपी नेता और वर्तमान में देश के गृहमंत्री अमित शाह ने 2010 में खुद सीबीआई को ‘केंद्र का औजार’ कहा था, जब वे गुजरात के गृहमंत्री हुआ करते थे. उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी और शाह पर लोगों के एनकाउंटर के आरोप थे. आज वही बीजेपी केंद्रीय सत्ता में है, और विपक्ष उसी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है.
1989 में इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि सीबीआई ‘सत्तारूढ़ पार्टी का राजनीतिक औजार’ बन चुकी है. इसी तरह, 2013 में ओपन मैगजीन ने सीबीआई को ‘कांग्रेस ब्यूरो औफ इन्वैस्टिगेशन’ कहा था. यह दिखाता है कि हर सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करती आई है.
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कहा और स्वतंत्रता के लिए सुधार सुझाए हैं. 1997 के विनीत नारायण मामले में कोर्ट ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए समिति बनाई, लेकिन आज भी इन जांच एजेंसियों पर सरकार का प्रभाव बना हुआ है. केंद्र की सत्ता में मोदी सरकार के आने के बाद भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम में 2018 के संशोधन ने सीबीआई की शक्तियों को और कमजोर किया है.
सवाल यह है कि यदि अदालत जांच एजेंसियों की किसी जांच को त्रुटिपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण बताती है, तो क्या एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी? क्या संस्थागत सुधार की आवश्यकता है? और क्या जांच प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है?
लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है, वह देश की उन तमाम संस्थाओं की विश्वसनीयता पर टिका होता है जिन से आम आदमी निष्पक्षता की उम्मीद लगाए बैठा है. यदि जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते रहे, तो यह लोकतंत्र की बुनियाद को हिला देगा.
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के बारे में कब क्या कहा :
1. सभी संस्थाओं को तोड़ दिया गया है. कुछ भी स्वतंत्र नहीं बचा है. जब अभियुक्त अपने बचाव की कोशिश करता है तो सीबीआई उसे असहयोग करना कह कर कठघरे में खड़ा करती है.
– जस्टिस अमानुल्ला – नवंबर 2025 के विमल नेगी के मामले में.
2. आप सब कोर्ट्स को विद्वेषपूर्ण मान रहे हो क्योंकि कोर्ट्स ने बिना आप की सुने आरोपियों को जमानत दे दी. आप का यह मानना न्यायपालिका का अपमान है.
– जस्टिस अमन ओझा और पंकज मित्तल की सीबीआई के 42 मामलों की सुनवाई पश्चिमी बंगाल त्रिणमूल कांग्रेस शासित राज्य पश्चिम बंगाल से बाहर भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य में ट्रांसफर करने की याचिका पर टिप्पणी सितंबर 2024 में.
3. आलोक कुमार वर्मा को सीबीआई के निदेशक के पद से हटाए जाने के मामले में सरकार की सिफारिश पर सैंट्रल विजिलैंस कमीशन को फटकार लगाई गई और अक्तूबर 2018 का आदेश निरस्त किया गया. हालांकि आलोक कुमार वर्मा फिर पद पर बहाल नहीं हुए पर सीबीआई और सरकार की खिंचाई हुई.
4. अनिल अंबानी की कंपनियों द्वारा 40,000 करोड़ रुपए के बैंकों से किए गए घपले पर सीबीआई द्वारा पैर घसीटने पर फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच न्यायिक, तुरंत और बिना भेदभाव वाली होनी चाहिए. यानी, सुप्रीम कोर्ट मानती है कि सीबीआई अपनी जांच में अकसर न फेयर होती है, न प्रौम्प्त होती है और न डिसपैशनेट होती है. सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बावजूद अनिल अंबानी का कुछ खास बिगड़ेगा, इस के आसार कम हैं क्योंकि सीबीआई मामले में ढीलढाल ही रखेगी.
5. सीबीआई के जिन मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट कर रही होती है उन में कोशिश होती है कि मामला ऐसे वक्त के पास सामने लाया जाए जो सत्ता का हमदर्द हो. दिसंबर 2023 के आसपास 8 विपक्षी नेताओं के बारे में मामले दूसरी बैंचों से ले कर जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की कोर्ट में ट्रांसफर कर दिए गए.
इन में दिल्ली के उमर खालिद की जमानत, तमिलनाडू के पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पाडी करप्पा पलानीसामी, आंध्र प्रदेश में तब पूर्व मुख्यमंत्री पर भाजपा सहयोगी चंद्रबाबू नायडू, कांग्रेस के कर्नाटक के नेता डी के शिवकुमार और भाजपा विरोधी डीएमके सरकार के मंत्री सेंथिल बालाजी के मामले हैं.
जस्टिस बेला एम त्रिवेदी गुजरात हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट आई हैं. वे नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री शासन के दौरान विधि सचिव रही हैं.
सीबीआई का गठन दिल्ली स्पैशल पुलिस एस्टैब्लिशमैंट एक्ट 1946 के अंतर्गत हुआ था. लेकिन यह अब प्रधानमंत्री सचिवालय द्वारा नियंत्रित है. सैंट्रल विजिलैंस कमिशन, जो प्रिवैंशन औफ करप्शन एक्ट 1988 के अंतर्गत गठित हुआ है, इस की निगरानी करता है. इस का निदेशक प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की एक कमेटी करती है. हालांकि, सीबीआई पूरी तरह से प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के इशारे पर काम करती है.
इस का मुख्य कार्यालय दिल्ली में लोधी रोड पर सीजीओ कौम्पलैक्स में है. इस के अधिकारी आमतौर पर राज्यों की पुलिस सेवाओं से आते हैं. Arvind Kejriwal





