धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-1

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-2

अब आगे पढ़ें- 

संजीव के घर के दरवाजे पर पहुंच कर निकहत ने धड़कते दिल से कौलबेल पर उंगली रखी. थोड़ी देर में एक नौकर ने दरवाजा खोला.

‘जी… मेमसाहब…?’ उसने निकहत को प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा.

‘मुझे संजीव से मिलना है….’ निकहत ने जवाब दिया.

‘जी, वो तो अपनी नयी वाली कोठी में हैं…’ नौकर ने कहा.

‘नयी वाली कोठी में…?’  निकहत  ने आश्चर्य से पूछा, ‘क्या तुम वहां का पता बता सकते हो…?’

‘जी हां… तिलक रोड पर तीसरे नम्बर की सफेद रंग की कोठी है…’ वह बोला.

‘ठीक है…’ संक्षिप्त सा उत्तर देकर वह पलट पड़ी.

टैक्सीवाले को उसने तिलक रोड चलने के लिए कहा. तिलक रोड  पर स्थित तीसरे नम्बर की कोठी बहुत शानदार थी. गेट पर खड़े गार्ड ने जब निकहत को गेट की तरफ आते देखा तो सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया.

‘किससे मिलना है मेमसाहब…?’ उसने पूछा.

‘क्या संजीव यहीं रहते हैं…?’ निकहत ने हिचकिचाते हुए पूछा.

‘जी हां… संजीव साहब का ही बंगला है…’ उसने गर्दन अकड़ाकर जवाब दिया.

‘मुझे उनसे मिलना है…’ निकहत ने कहा.

‘आप अपना विजिटिंग कार्ड दे दीजिए… मैं अन्दर पहुंचाये देता हूं….’

‘नहीं, कार्ड तो नहीं है… तुम उनको बता दो कि निकहत मिलना चाहती है… वह समझ जाएंगे….’ निकहत ने गार्ड से कहा.

‘जी, आप यहीं ठहरें, मैं अन्दर पूछता हूं…’ कह कर गार्ड अन्दर की तरफ चला गया.

निकहत बेचैनी से गेट के पास ही इधर-उधर टहलने लगी. उसके ऊपर हर लम्हा जैसे भारी होता जा रहा था. आंखों में बार-बार आंसू उमड़ रहे थे. जो कुछ हो चुका था उस पर विश्वास कर पाना उसके लिए असम्भव हो रहा था.

‘काश कि यह मेरा संजीव न हो…’ वह अपने मन को फरेब देने लगी. चंद मिनटों बाद उसने दूर से गार्ड को अपनी तरफ आते देखा.

‘आइये, साहब ने ड्राइंगरूम में बैठने को बोला है…’ वह गेट खोलकर निकहत को साथ लिए अन्दर की ओर चल दिया.

निकहत बोझिल कदमों से अन्दर की ओर बढ़ रही थी. विशाल ड्रॉइंगरूम में प्रवेश करते हुए उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था. ड्रॉइंगरूम खाली था. कमरे का जायजा लेते हुए उसकी नजरें दीवार पर टंग गयीं, जहां संजीव और उसकी पत्नी की शादी की बड़ी सी तस्वीर एक सुन्दर से फ्रेम में जड़ी टंगी हुई थी. उसकी नजरें उस तस्वीर पर चिपक कर रह गयीं.

‘यस…?’ अचानक एक जानी-पहचानी आवाज ने उसे चौंका दिया. वह झटके से पलटी. सामने संजीव एक कीमती रेशमी गाउन पहने खड़ा था. संजीव… उसका अपना संजीव…

निकहत उसे एकटक देखती रह गयी. मुंह से कोई बोल नहीं फूटा. और दिल… उसने तो जैसे धड़कना ही बन्द कर दिया.

ये भी पढ़ें- दो जून की रोटी

‘कहिए… मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं…?’ खामोशी तोड़ते हुए संजीव ने पूछा.

‘संजीव… मैं निकहत हूं…’ वह उसके अजनबीपन से घबरा उठी.

‘जानता हूं… कैसे आना हुआ…?’ संजीव ने मेज पर झुक कर हाथ में पकड़ी सिगरेट ऐश-ट्रे में बुझाते हुए पूछा. बेरुखी की स्पष्ट झलक उसके चेहरे पर प्रकट हो रही थी.

निकहत सकते की हालत में थी. उसको संजीव से ऐसे व्यवहार की कतई कोई उम्मीद नहीं थी.

‘संजीव… क्या तुमने… शादी…?’ उसने हकलाते हुए संजीव से पूछना चाहा.

‘देखो निकहत… अब तुम यहां तक आ पहुंची हो तो तुम्हें यह बात भी अच्छी तरह पता होगी…’ वह बड़ी ढिठाई से बोला.

‘तो क्या… जो कुछ तुमने मेरे साथ किया वह सिर्फ… सिर्फ एक खेल था…?’ निकहत की सांसें लौटने लगीं.

‘देखो निकहत… प्यार और शादी में बड़ा फर्क होता है… शादी के मामले में परिवार, बिरादरी और स्टेटस हर बात का ख्याल करना पड़ता है.’ वह समझाने के अंदाज में बोला.

‘तुमने प्यार करते वक्त इन बातों को क्यों नहीं सोचा था संजीव…? तुम मुझसे झूठ बोल कर गये… तुमने मुझे धोखे में रखा…?’ निकहत उखड़ने लगी.

‘देखो… अब जो हुआ उसे खत्म करो. हमारी तुम्हारी शादी किसी कीमत पर नहीं हो सकती थी निकहत. मैं अपने परिवार वालों की मर्जी के बाहर नहीं जा सकता था. शादी-ब्याह हमेशा बराबर वालों में ही होता है… रही बात प्यार की… तो मैं उसकी कीमत चुकाने को तैयार हूं… तुम्हें जितनी भी आर्थिक मदद की जरूरत हो, मुझसे कह सकती हो…’ संजीव सौदा करने लगा.

‘संजीव….?’ निकहत की चीख कमरे में गूंज गयी.

‘निकहत, चिल्लाने की जरूरत नहीं है. यदि मैंने कुछ समय के लिए तुम्हारे प्यार से अपना दिल बहलाया था, तो मैं उसकी पूरी कीमत चुकाने को तैयार हूं…’ संजीव सोफे पर फैल गया.

‘मुझे नहीं मालूम था संजीव कि दौलत का नशा आदमी को इतना नीचे गिरा सकता है…’ उसकी आंखें भर आयीं, ‘अगर प्यार तुम्हारे लिए सिर्फ दिल बहलाने की चीज है तो आज के बाद इस बात को मैं हमेशा याद रखूंगी…’ आंखों में भरे हुए मोती उसके गालों पर लुढक आये थे. ज्यादा कुछ कहने के लिए उसके पास शब्द न बचे. उसने तेजी से आंसू पोछे और दरवाजे की ओर बढ़ गयी. उसकी चाल में तेजी आ गयी थी. लगभग भागते हुए उसने संजीव की कोठी का गेज पार किया.

‘चलो बला टली…’ संजीव ने राहत की ठंडी सांस ली. उसे उम्मीद नहीं भी कि मामला इतनी आसानी से निपट जाएगा. निकहत की जगह कोई और लड़की होती तो शायद चीख-चीख कर आसमान सिर पर उठा लेती, पुलिस में जाने की धमकी देती, मगर ये तो… बस थोड़े से आंसू बहा कर ही चली गयी… ये तो अच्छा हुआ कि इस वक्त मोनिका घर पर नहीं थी, क्लब गयी हुई थी… वरना स्थिति संभालनी मुश्किल हो जाती… खैर, चलो खामोशी से मामला खत्म हो गया. संजीव को इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि यह सन्नाटा उसकी जिन्दगी में आने वाले बड़े तूफान से पहले का सन्नाटा था. उसने जेब से नयी सिगरेट निकाल कर सुलगायी और आराम से सोफे पर पैर फैला लिये.

ये भी पढ़ें- अनमोल रिश्ता

शाम घिरने लगी थी. मोनिका अभी तक घर नहीं लौटी थी. वैसे भी वह अक्सर रात देर से ही घर लौटती थी. कभी क्लब, कभी पार्टी, तो कभी किसी दोस्त के घर पर डिनर, उसके लिए रोजमर्रा की बात थी. अक्सर संजीव उसके साथ होता था, मगर पार्टी इत्यादि में जब वह संजीव को छोड़कर बेतकल्लुफी से अपने दोस्तों की बाहों में लिपटी डांस फ्लोर पर थिरक रही होती, तो संजीव को बड़ा बुरा लगता था. शुरू-शुरू में उसने दबी जुबान में उसे टोका भी, मगर मोनिका ने सबके सामने उस पर बैकवर्ड और स्टूपिड जैसे शब्द न्योछावर कर दिये, तो वह चुप लगा गया. इतनी कीमती बीवी को वह किसी कीमत पर नाराज नहीं कर सकता था. धीरे-धीरे वह क्लब और देर रात पार्टियों से कटने लगा था. कभी सिर दर्द, कभी थकान का बहाना करके वह घर पर ही रुक जाता था. आया तो वह भी एक मध्यमवर्गीय परिवार से था. ऊंची सोसायटी में रचने-बसने और उनके तौर-तरीके सीखने में वक्त तो लगेगा ही. ऐसा सोचकर मोनिका भी उस पर क्लब या पार्टी में चलने के लिए ज्यादा जोर नहीं देती थी. संजीव के बगैर वह भी पार्टी में खुल कर इन्जौय करती थी, वरना संजीव के साथ होने पर तो वह उसकी नजरों में खुद को बंधा-बंधा सा महसूस करती थी और संजीव भी पूरे वक्त बेचैन रहता था.

(धारावाहिक के अगले अंक में पढ़िये कि संजीव के धोखे और उसकी बातों से चोट खाकर कोठी से निकली निकहत ने अपने जीवन के लिए क्या फैसला लिया.)

Tags:
COMMENT