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बह का काम जल्दीजल्दी निबटा कर जब मैं सुपर मार्केट पहुंची तो  12 बज चुके थे. स्कूल से बच्चों के वापस आने से पहले घर भी पहुंचना था. जल्दीजल्दी सूची से सामान मिलाते हुए मैं टोकरी में डालती जा रही थी कि अचानक मीनाक्षी दिख गई.
मीनाक्षी कितनी मोटी हो गई थी
हां, मीनाक्षी ही तो थी. पर पहले से कितनी मोटी हो गई थी. फिर भरी दोपहरी में मेकअप से पुता उस का चेहरा और जोगिया रंग का रेशमी सूट आंखों को दूर से ही खटक रहा था.
उस ने भी देखा तो मेरी तरफ दौड़ पड़ी, ‘‘अरे मीरा, तुम यहां कैसे?’’ गले मिलते हुए उस ने प्रश्न किया.
‘‘शादी के बाद से तो यही शहर मेरा घर है,’’ मैं ने बताया, ‘‘पर तुम कब से यहां हो?’’
‘‘मैं भी 1 साल से यहीं डेरा डाले हूं. पर देखो, मिल आज रहे हैं,’’ वह हंस कर बोली.
कालेज के दिनों का साथ था हमारा. पढ़ाई खत्म होते ही शादी के बाद कालेज के संगीसाथी सब पीछे छूट गए थे. नया घर, नया परिवार, नया शहर सब अपने हो गए थे.
मीनाक्षी को लगभग 10 साल के बाद देखा
मीनाक्षी को लगभग 10 साल के बाद देख कर पिछले मस्तीभरे दिनों की याद ताजा हो गई. तब चाहे वह मेरी अभिन्न मित्र न रही हो पर उस से मिल कर ऐसा लगा मानो मैं अपनी अंतरंग सखी से मिल रही हूं.
चंद मिनट भूलीबिसरी यादों को ताजा कर, एकदूसरे से अपनेअपने पतों का आदानप्रदान कर के मैं अपनी खरीदारी की तरफ लपकी.
लेकिन अचानक पलट कर मीनाक्षी ने मेरा हाथ थाम लिया, ‘‘आज तुम मेरे साथ चलो,’’ हाथ में पकड़े थैले में उस ने जूस के 10-15 पैकेट रखे हुए थे.‘‘क्यों, आज घर में कोई पार्टी है क्या?’’ मैं ने जिज्ञासा प्रकट की.
महिला मंडली की मीटिंग है
‘‘नहीं, आज हमारी महिला मंडली की मीटिंग है, यहीं पास में ही वीणा के घर,’’ उस ने मेरी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा.
‘‘ओहो, तो तुम समाजसेविका बन गई हो. सच, कुछ सार्थक कार्य तो करना ही चाहिए. मुझे तो बस घर के कामों से ही फुरसत नहीं मिलती. पता नहीं क्यों, हमेशा भागमभाग लगी रहती है. अभी भी तुम्हारे साथ चलना मुश्किल है, स्कूल से बच्चों के लौटने का वक्त हो गया है. अब घर ही भागूंगी,’’ मैं जल्दी से बोली.
‘‘क्यों, घर में ताला लगा कर आई हो क्या?’’
‘‘नहींनहीं, मेरे सासससुर हैं घर में. लेकिन बच्चों को खाना देना है, फिर मां और पिताजी के खाने का भी समय हो रहा है. सब्जी बना कर आई हूं. बस, गरमगरम रोटियां सेंकूंगी और सलाद काटूंगी,’’
मैं ने अपनी व्यस्तता बताई.
‘‘अब छोड़ो भी, आज रोटियां सेंकने और सलाद काटने का काम अपनी सास को ही करने दो. फिर एक दिन उन्होंने अपने पोतेपोती की खातिर कुछ काम कर भी दिया तो कौन सी बड़ी बात हो जाएगी. वे बच्चों से लाड़प्यार कर के उन्हें बिगाड़ने के लिए ही हैं क्या?’’ मीनाक्षी ने कटाक्ष किया.
‘‘नहीं बाबा, मैं न चल पाऊंगी. मांजी देर होने से चिंता करेंगी.’’
सास का परेशान होना भी स्वाभाविक ही है.
‘‘तो यों कहो न कि घर में सासूमां की तानाशाही है. तुम अपनी मरजी से कहीं आजा नहीं सकतीं,’’ उस ने बिना किसी लागलपेट के मेरी सास पर सीधा आक्षेप किया और मेरी स्वतंत्रता को चुनौती दी.
पता नहीं, सखी सरीख सास पर लगे आक्षेप के कारण या अपने स्वतंत्र अस्तित्व के आगे प्रश्नचिह्न को मिटाने के लिए मैं उस के साथ चलने को तैयार हो गई. वैसे उसे यह समझाना मुश्किल ही लग रहा था कि जिस तरह बेटी के देर से घर लौटने पर मां चिंतित हो जाती हैं, उसी भांति बहू के बिना बताए अधिक देर बाहर रुकने पर सास का परेशान होना भी स्वाभाविक ही है.
सुपर मार्केट से निकल कर 10 मिनट लगे वीणा के घर तक पहुंचने में.  इस बीच मीनाक्षी का एकतरफा संवाद जारी रहा, ‘‘मैं तो भई, चौबीस घंटे घरपरिवार की हो कर, बंध कर बैठ नहीं सकती. हर नई जगह पर देरसवेर अपना एक गु्रप बन ही जाता है. फिर समाजसेवा तो एक शगल है. छोटीमोटी सामाजिक समस्याओं पर भाषण देने के बाद हम सभी गपबाजी करती हैं, साथ मिलबैठ कर खातीपीती हैं. फिर ताश की बाजी जम जाती है और इस तरह सूरज ढलने के बाद ही घर पहुंचते हैं.’’
पारिवारिक मूल्य? सोच कर मैं हैरान हुई.
मीनाक्षी ने बिना किसी झिझक के सचाई से अवगत कराते हुए आगे भाषण जारी रखा, ‘‘फिर घर में जितना ज्यादा काम करो, अपेक्षाएं उतनी अधिक होती जाती हैं. मैं तो मस्ती में दिन काटती हूं. घर में सासससुर तो हैं ही. खुद भी खाएंगे, मेरे बच्चों को भी खिला देंगे. फिर आजकल तो मेरी दिल्ली वाली ननद भी आई हुई हैं, सबकुछ मिलजुल कर निबटा ही लेंगे ठीकठाक.’’
बहुत ही अजीब लगा सुन कर पति की बहन कुछ समय के लिए भाई के पास आए और भाभी अपने में मगन रहे. कब और कैसे बदल गए हमारे पारिवारिक मूल्य? सोच कर मैं हैरान हुई.
मीनाक्षी ने अपनी सखियों से परिचय कराया, ‘‘यह रीना, यह शीला, यह मधु, यह सुमेधा, यह गायत्री, यह राधिका वह सब से मिलवाती जा रही थी. मैं अपने पारंपरिक विचारों को परे झटक बदले में हाथ जोड़ कर मुसकराती रही.
‘‘यह है कालेज के दिनों की मेरी सहेली, मीरा,’’ अंत में उस ने मेरा भी सब को परिचय दिया.
मेकअप में सजेसंवरे चेहरे, रंगीन परिधान, विदेशी इत्र की भीनीभीनी महक, ऐसे वातावरण में मैं अचानक अपनी सूती साड़ी के प्रति ज्यादा सचेत हो ठी.

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