काकरोचों के जंतर मंतर प्रोटेस्ट ने कुछ और किया हो न किया हो लेकिन देश भर के आम लोगों के मन से यह लिहाज या डर कुछ भी कह लें खुरचने में जरुर कामयाबी हासिल कर ली है कि विप्र ही श्रेष्ठ है राज वही करेगा या उसके बैठाये मोहरे करेंगे इस गुलामी से आजादी पाना बेहद जरुरी है नहीं तो लोकतंत्र और संविधान दुआओं में ही याद रखने की चीजें रह जाएँगी.
इन टीनएजर्स ने जमकर पंडा पुरोहितवाद की तार्किक खिल्ली उड़ाते बिना विप्र के माने बदले सही मानो में भीमराव आंबेडकर को ही विप्र साबित कर दिया था.
दतिया विधानसभा उपचुनाव से इस प्रोटेस्ट का भले ही डायरेक्ट कनेक्शन न हो, लेकिन जेन जी युवाओं का मेसेज दिल्ली से महज 445 किलोमीटर दूर स्थित दतिया में भी पूरी शिद्दत से सुना और महसूसा गया था.
बिलाशक वह चुनावी मुद्दा यहाँ नहीं था लेकिन जंतर मंतर की आवाजों और फिलासफी का असर ही इसे कहा जायेगा कि थोड़ी तादाद में ही सही युवाओं ने स्थानीय पीताम्बरापीठ में विराजी बगुलामुखी देवी को सम्मान देने बाले संबोधन जय माई की जगह जय भीम बतौर अभिवादन कहना शुरू कर दिया है. और ये सारे के सारे युवा दलित पिछड़े तबकों के ही नहीं हैं बल्कि कुछ सवर्ण और ब्राह्मण युवा भी इनमे शामिल हैं.
अब नतीजे के बाद कोई यह सीना तान के नहीं कह सकता कि दतिया के चुनावी नतीजे यहाँ के 15 फीसदी ब्राह्मण या उनके स्वयंभू नेता पंडित नरोत्तम मिश्रा या आरएसएस द्वारा थोपे गए कोई आशुतोष तिवारी जैसे अनजाने चेहरे तय करते हैं.
नरोत्तम मिश्रा ने चार बार विधायक और मंत्री रहते दतिया की तकदीर में लिखा पिछड़ापन और बदहाली और बढ़ाए. ऐसा उन्होंने एक विप्र की हैसियत से ही किया जो गैर विप्रों के भाग्य लिखने का सदियों से दावा करता रहा है. ऐसा कुछ भी उन्होंने एक नेता की हैसियत से नहीं किया जिसे विकास की श्रेणी में रखा जाए. हाँ विप्रों के विकास के लिए जरुर उन्होंने एक भव्य महंगा नवग्रह मंदिर बनवा दिया जिससे पंडितों को दान दक्षिणा और रोजगार मिलते रहें
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