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अभी चाय, नाश्ता चल ही रहा था कि रवि भी दफ्तर से आ गए.
वैसे तो वे आते ही ब्रीफकेस वहीं रख कर टाई की गांठ ढीली कर सोफे पर ही पसर जाते थे, पर अचानक एक अपरिचिता को देख कर वे कुछ ठिठके. फिर परिचय करवाने पर नमस्ते का आदानप्रदान कर उन्होंने अंदर का रुख किया.
‘‘मीरा, मेरा तौलिया और कपड़े कहां हैं?’’ रवि ने पुकारा तो मैं चाय का प्याला छोड़ उन का ब्रीफकेस उठाते हुए अंदर चली गई.
मैं वापस आई तो मीनाक्षी उठ खड़ी हुई, ‘‘अब तुम अपने मियांजी की सेवाटहल करो, मैं चली,’’ उस ने एक आंख दबा कर कहा.
मैं एक बार भी उस से बैठने का आग्रह न कर सकी. सोचा, क्या पता सचमुच ही बैठ जाए. उस के कारण मेरी सारी दिनचर्या चौपट हो गई थी.
‘‘फिर कभी आऊंगी, तुम भी आना,’’ जातेजाते मुड़ कर वह बोली.
‘‘जरूर आऊंगी,’’ मैं भी मुसकरा पड़ी.
उस के जाते ही राहत की एक ठंडी सांस स्वत: ही निकल पड़ी, मानो सिर से मन भर का बोझ हट गया हो.
तीसरे दिन मीनाक्षी का फोन आया.
‘‘मीरा, आज 11 बजे तैयार रहना. नेहा के घर चलेंगे. वहां आज सावन के गीतों का प्रोग्राम है,’’ वह चहक रही थी.
प्रस्ताव काफी लुभावना था. ऐसी रासरंग की महफिलों में बरसते, हरियाले लोकगीतों की छमछम से तन तो क्या मन भी भीगभीग जाता है. लेकिन वास्तविकता पर मुझे कुछ संदेह हुआ. ऐसे रसीले प्रोग्राम की आड़ में न जाने कितनी सासों, ननदों के निंदापुराण खुलें, न जाने कितनी अनुपस्थित महिलाओं की खिल्ली उड़े.
एक बार झेली हुई उकताहट फिर मेरे ऊपर छाने लगी और अनचाहे ही मैं इनकार कर बैठी, ‘‘आज नहीं चल पाऊंगी. घर में थोड़ा काम है.’’
‘‘तुम तो बहुत बोर हो यार, घर के काम तो चलते ही रहते हैं,
कभी खत्म होते हैं क्या? तुम जैसी औरतों के कारण, जो हर घड़ी सीने से जिम्मेदारियां चिपकाए रहती हैं, सब गड़बड़ हो जाता है. सास तुम्हें देखते ही थक जाती हैं, पतिदेव को तौलिए और कपड़ों की जरूरत हो आती है, बच्चों को लोरी के बिना नींद ही नहीं आती. तुम तो भई, सिर पर पल्लू डाल कर सतीसावित्री बनी रहो,’’ वह बेशर्मी से हंसती जा रही थी.
गुस्से से मुझ से कुछ बोला न गया. मैं ने चुपचाप रिसीवर रख दिया.
कहना न होगा कि फिर मीनाक्षी से मिलने की इच्छा ही मर गई. उस ने भी शायद मेरा क्रोध भांप लिया था. तभी तो न स्वयं आई न ही फोन किया. मैं ने भी सोचा कि चलो, जान बची, नहीं तो ऐसी दोस्ती निभाना मेरे लिए तो मुश्किल हो जाता.ऐसे ही कई महीने बीत गए.
मीनाक्षी से फिर भेंट न हो सकी.
अचानक एक दिन यों ही किशोरावस्था के अल्हड़ मस्तीभरे दिनों की याद मन पर सावन के बादलों की भांति उमड़नेघुमड़ने लगी. अनायास ही मीनाक्षी की याद भी मन में कौंध गई. न जाने क्यों, उस से मिलने का मन किया.
बच्चे उस दिन स्कूल की तरफ से पिकनिक पर गए हुए थे. दोपहर का खाना जल्दी ही निबटा कर मैं डेढ़ बजे ही घर से निकल गई. मीनाक्षी के दिए पते पर मैं आसानी से पहुंच गई थी.
दरवाजे की घंटी बजाने पर स्थूलकाय, अस्तव्यस्त, उदास सी आंखों वाली एक अधेड़ स्त्री ने दरवाजा खोला. शायद मीनाक्षी की सास होंगी, मैं ने मन ही मन अनुमान लगाया.
‘‘मीनाक्षी घर पर है? मैं उस की सहेली मीरा हूं,’’ मैं ने मुसकरा कर पूछा.
‘‘मीनाक्षी तो बाहर गई है, शायद अभी आती होगी. तुम अंदर आ जाओ. थोड़ी देर इंतजार कर लो.’’
उन महिला के आमंत्रण पर मैं अंदर चली गई.
मीनाक्षी से मिलने की आतुरता में मैं यह भूल बैठी थी
कि वह महिला मंडली के साथ भी व्यस्त हो सकती है. अब न जाने कब लौटेगी. पर इतनी दूर से आ कर यों दरवाजे से ही लौटने की भी इच्छा न हुई.
अंदर हौल में सोफे पर पत्रिकाएं और कैसेट बिखरे पड़े थे. दीवान पर धुले कपड़ों का ढेर लगा था.
‘‘मैं मीनाक्षी की सास हूं,’’ उन महिला ने अपना परिचय दिया तो मैं ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया.
‘‘आज कामवाली आई ही नहीं, सब काम ऐसे ही पड़ा है,’’ उन्होंने अस्तव्यस्त, बिखरे हुए सामान के विषय में शायद सफाई दी. कपड़ों का ढेर उठाते हुए उन्होंने मेरे बैठने की जगह बनाई. फिर कपड़े उठा कर वे अंदर चली गईं. घर का मुख्यकक्ष ही गृहिणी की घर के प्रति उदासीनता की कहानी कह रहा था. कमरे की हर वस्तु में एक सुगृहिणी के स्पर्श का अभाव खटक रहा था.
हौल के साथ बाहर बालकनी में रखे गमलों में पौधे मुरझाए हुए थे. शायद उन में पानी नहीं डाला गया था. मैले परदे, कुशन कवर, धूल की परत से अटा फर्नीचर, यानी शानोशौकत की हर वस्तु होने के बावजूद कमरा बेजान और शुष्क लग रहा था.
‘‘तुम्हें पहले कभी नहीं देखा,’’ वे मेरे लिए पानी का गिलास ले आई थीं.
‘‘मैं मीनाक्षी से कुछ महीने पहले ही मिली हूं. असल में हम दोनों कालेज में एक साथ पढ़ती थीं,’’ मैं ने उन की समस्या का समाधान किया.
‘‘अच्छाअच्छा,’’ वे मुसकरा पड़ीं.
इतने में उढ़के हुए दरवाजे को जोर से धकेलते दो बच्चे भीतर आ गए. स्कूल से बच्चों के आगमन के साथ ही हंसी, चुहल, शोर, खिलखिलाहट का जो एक झोंका घर में अचानक ही घुस आता है, ऐसा वहां कुछ भी न था.
थके, उदास बच्चों में घर वापस पहुंचने पर कोई उत्साह न था. दोनों ने बस्ते वहीं सोफे पर पटक दिए और वहीं अपने लिए जगह बनाते हुए पत्रिकाओं के पन्ने उलटने लगे.
‘‘नंदा, नीरज, अपनी मौसी को नमस्ते करो,’’ मीनाक्षी की सास ने आदेश दिया, पर वे सुनाअनसुना करते हुए निर्विकार भाव से यों ही बैठे रहे, मां की अनुपस्थिति से उदासीन, एक अपरिचिता की उपस्थिति से तटस्थ.
‘‘कुछ खाने को दो, दादीमां, भूख लगी है.’’
‘‘अच्छा,’’ कह कर वे उठ गईं. रसोई में पहुंच कर उन्होंने तुरंत आवाज दी, ‘‘नंदा बेटी, इधर आना तो.’’
बच्ची उठ कर पैर घसीटती हुई रसोई में चली गई. हौल से ही सटी रसोई में हो रही खुसुरफुसुर साफ सुनाई दे रही थी.
‘‘तेरी मां तो आई नहीं, तू जा, यह डब्बा ले कर और सामने वाले होटल से डोसे व सांभर ले आ,’’ मीनाक्षी की सास की आवाज में याचना थी.
‘‘क्या दादीमां, रोजरोज ऐसे ही करती हो. मैं बहुत थक गई हूं. मैं नहीं जाती. कितनी जोर से तो भूख लग रही है.’’
‘‘अच्छाअच्छा, धीरे बोल, मैं तेरे दादाजी को बोलती हूं,’’ उन की आवाज में अकारण ही गुस्सा झलकने लगा था.
जब वे हौल में आईं तो उन का चेहरा और भी उदास व परेशान था.
‘‘अच्छा मांजी, अब मैं चलूंगी. बहुत देर हो गई है,’’ मैं ने उन्हें असमंजस की स्थिति से उबारने के लिए प्यारभरी मुसकराहट से देखा.
‘‘अच्छा बिटिया, फिर आना,’’ उन का स्वर थकाहारा था.
इस से पहले कि उस घर की उदासी मेरे तनमन को जकड़ लेती, मैं बाहर निकल आई. बाहर आ कर बहुत अच्छा लगा. सोचा, अगर नारी मुक्ति आंदोलन का ध्येय पारिवारिक दायित्वहीनता से है तो मैं परतंत्र ही भली. अगर आजादी का तात्पर्य परिवारजनों के क्लांत, उदास चेहरे हैं तो मैं तो घर की दासी ही भली.
बहुत ही अजीब लगा सुन कर. पति की बहन कुछ समय के लिए भाई के पास आए और भाभी अपने में मगन रहे. कब और कैसे बदल गए हमारे पारिवारिक मूल्य, सोच कर मैं हैरान हुई.

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