कहानी की शुरुआत एक उर्दू मैगजीन के औफिस से होती है. एक हसीन नौजवान शायरा नीलोफर गुस्से में तमतमाई औफिस में दाखिल होती है और एक कर्मचारी से एडीटर का पताठिकाना पूछती है. उस कर्मचारी के मुंह में पान की पीक भरी थी. वह इशारा कर के उसे चपरासी के साथ एडीटर के कमरे की तरफ भेज देता है.

चपरासी जब नीलोफर का विजिटिंग कार्ड एडीटर को देता है तो वह एक मुलाजिम पर किसी बात पर गुस्सा हो रहा होता है और उसी गुस्से में कार्ड अंगुलियों पर घुमाते हुए बोलता है, ‘‘जाओ, कह दो मेरे पास वक्त नहीं है.’’

बाहर खड़ी नीलोफर यह सब सुनती है तो उस का पारा और चढ़ जाता है और वह गुस्से में धड़ाम से दरवाजा धकेलने की बेअदबी करने से खुद को नहीं रोक पाती और कमरे में पहला कदम रखते ही लगभग चिल्लाती है, ‘‘वक्त तो मेरे पास भी नहीं है जनाब.’’

हैदर जैसे ही उस गुस्ताख आवाज और लड़की को देखने के लिए नजर उठाता है तो ऐसे चौंकता है, मानो बिच्छू ने डंक मार दिया हो. ठीक यही हालत नीलोफर की भी था, जो गुस्सा भूल कर हैदर को इस तरह अपलक देख रही थी, मानो उसे यकीन न हो रहा हो.

चंद लमहे दोनों सुधबुध खो कर बिना पलक झपकाए एकदूसरे को देखते रहते हैं. और जब खुद पर यकीन हो जाता है कि वे कोई ख्वाब नहीं देख रहे हैं तो सहज होने की कोशिश करते हैं. हैदर मुलाजिम को कमरे से बाहर भेज देता है और चपरासी को चायनाश्ता लाने का हुक्म देता है. इस दौरान उस की हड़बड़ाहट देखने काबिल होती है.

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