लेखक- --शैलेंद्र सिंह के साथ रोहित और शाहनवाज

अमेरिका में जिस तरह ‘क्यूएनन’ बड़ी तेजी से बढ़े उसी तरह भारत में कट्टर अंधभक्तों की संख्या में, 2014 के बाद, तेजी आई. और यह पूरी प्रक्रिया लगभग समानरूप से चलाई गई जिस में इंटरनैट और सोशल मीडिया का बहुत बड़ा हाथ रहा है. आज यह हाथ इतना बड़ा हो चुका है कि इस के फंदे में लोकतंत्र की गरदन फंसी पड़ी है. फौरीतौर पर थोड़ी राहत देने वाली इकलौती बात यह है कि भारत में सोशल मीडिया, लड़खड़ाते ही सही, कट्टरवाद का विरोध कर रहा है क्योंकि यहां का नियमित मीडिया अलोकतांत्रिक टूल बना हुआ है.

अमेरिकी प्रैसिडैंशियल इलैक्शन से ठीक 10 दिनों पहले 23 अक्तूबर, 2020 को वहां ऐक्टर सचा बैरन कोहेन की विवादित फिल्म ‘बोरत-2’ प्रदर्शित की गई. यह फिल्म मौजूदा अमेरिकी पौलिटिक्स और अमेरिकी लोगों के भीतर रूढि़वादी विचारधारा पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष करती है. फिल्म में बोरत नाम का एक किरदार है जिस ने कजाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों को अतीत में खराब किया था और अब उसे कजाकिस्तान सरकार से हुक्म मिला है कि वह वापस अमेरिका जा कर उन बिगड़े हुए संबंधों को फिर से ठीक करे. बोरत अमेरिका जाता है, कोरोना के चलते वहां लौकडाउन लग जाता है.

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वह वहां पर एक घर में पनाह लेता है, जिस के सदस्य ट्रंप समर्थक होते हैं. बोरत खुद भी रूढि़वादी होता है, सो, घर के सदस्यों के साथ घुलमिल जाता है. इसी घर के भीतर एक दिलचस्प किस्सा बनता है जब बोरत उन से अमेरिका में लौकडाउन लगने का कारण पूछता है, जिस के जवाब में वे कहते हैं कि यहां एक वायरस फैला है जिसे डैमोक्रेटिक पार्टी की पूर्व प्रैसिडैंशियल कैंडिडेट हिलेरी क्ंिलटन ने फैलाया है जो बच्चों का गला चीर कर उन का खून पी जाता है, वह नरभक्षी है.

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