वे सब के सब नौजवान थे जिनकी आखो में आने वाली जिंदगी को लेकर तरह तरह के सपने थे कि बड़ा होकर ये करूंगा, वो करूंगा, ये बनूंगा, वो बनूंगा लेकिन अब उन सभी का दाह संस्कार हो गया है और पीछे रह गए हैं तो रोते बिलखते मां बाप और परिजन जो किस्मत और उस घड़ी को कोस रहे हैं कि क्यों उन्होंने अपने घर के लाडले चिरागों को गणेश विसर्जन में जाने दिया. लेकिन ये ही नहीं बल्कि कोई उस भगवान गणेश को नहीं कोस पा रहा जिसकी मूर्ति विसर्जित करने ये लोग ढ़ोलढ़मांके के साथ नाचते , गाते, गुलाल उड़ाते इस उम्मीद के साथ गए थे कि बप्पा मोरिया उनकी मुराद पूरी करेगा .

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