Politics: पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं. 9 अप्रैल से 29 अप्रैल के बीच मतदान होगा और 4 मई को मतगणना है. इन चुनावों में मुकाबले में एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए मतदाताओं से वोट मांग रहे हैं तो दूसरी तरफ विपक्षी दल अलगअलग रणनीति बना कर मुकाबला कर रहे हैं. भाजपा के पास न केवल चुनाव लड़ने के साधन अधिक हैं बल्कि केंद्र सरकार में होने का मनोवैज्ञानिक लाभ भी उस के पास है.

प्रधानमंत्री के अंगूठे के नीचे काम करते चुनाव आयोग और दूसरी केंद्रीय संस्थाओं पर केंद्र सरकार के साथ मिल कर काम करने के आरोप विपक्षी दल लगातार लगा रहे हैं. एसआईआर इस में एक प्रमुख मुद्दा है जिस के जरिए ऊपर से तो वोटर लिस्ट में सुधार की बात की जा रही है जबकि इस आड़ में विपक्षियों के समर्थक वोटरों के नाम वोटरलिस्ट से हटाए जा रहे हैं, ऐसा आरोप विपक्षी दल लगा रहे हैं.
5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में एक तरफ भारतीय जनता पार्टी का भारीभरकम अमला है. व्यक्तिपूजा के नाम पर प्रधानमंत्री का चेहरा है. प्रधानमंत्री जब चुनावप्रचार करने जाते हैं तो उन के साथ भारीभरकम अमला चलता है. जिस का खर्च प्रतियात्रा 3 से 5 करोड़ रुपए के बीच आता है. यहां एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का अपनी पार्टी के लिए चुनावप्रचार करना चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है.

देश का संविधान आम नागरिक और किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति को एकजैसा अधिकार देता है. ऐसे में भाजपा का सदस्य होने के नाते प्रधानमंत्री को चुनाव में अपनी पार्टी के प्रचार करने का अधिकार देता है. यहां इस बात को ले कर एक शर्त रखी गई है. इस के अनुसार प्रधानमंत्री अपने पद और ताकत का इस्तेमाल कर के चुनावप्रचार करेंगे तो यह बात नियम के अनुसार नहीं है. चुनावप्रचार में प्रधानमंत्री सरकारी संपत्ति का प्रयोग नहीं कर सकते. इस का मतलब यह है कि सरकारी खर्च पर प्रचार नहीं होगा, लेकिन, ऐसा हो नहीं रहा.

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