Indian Foreign Policy: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध को रुकवाने व सुलह करवाने की बातचीत करने के लिए इसलामाबाद को चुने जाने से भारत की विदेश नीति और कूटनीति का बाजा बज गया है. पिछले कई सालों से भारतीय मीडिया और विदेशों में बसे भारतीय मूल के कट्टर हिंदू व वहां की राजनीति में सक्रिय लोग यह साबित करने की कोशिश में लगे थे कि पाकिस्तान को आतंकवादी, अस्थिर, बिखरा हुआ गरीब देश साबित किया जा सके.

भारत के नरेंद्र मोदी ने सोचा था कि अमेरिका और इजराइल ईरान के विरुद्ध तैयारी कर रहे हैं तो वे इजराइल के माध्यम से अमेरिका पर प्रभाव डाल कर डोनाल्ड ट्रंप से अमेरिकी कस्टम ड्यूटियों में कुछ राहत पा लेंगे. उन्हें अपने को ‘विश्वगुरु’ बन जाने का गुमान कुछ ज्यादा ही था और वे यह साबित करने में लगे थे कि विदेशों में भारत की असली पहचान कराने वाले वे पहले प्रधानमंत्री हैं.

बिना इंग्लिश समझे, बिना विश्व राजनीति या इतिहास का ज्ञान रखे, बिना विदेशों की सभ्यताओं की समझ रखे कूटनीति को समझना आसान नहीं है. जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेशों में न केवल घूम चुके थे, उन्होंने उन के तौरतरीके समझे, उन के इतिहास को पढ़ा, उन की भाषा समझ, उन के युवा व वरिष्ठ नेताओं से संपर्क भी साधे थे.

सिर्फ भारतीय मूल के ऊंची जातियों के विदेशों में बसे और सफल धर्मांध लोगों की भीड़ में हाथ हिलाने, गले लगने और फोटो खींच कर समझना कि उस देश पर सिक्का जमा लिया है जहां भारतीयों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम है, नितांत मूर्खता है.

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