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छोटे रिश्ते बड़े काम : क्या पंडित राकेश का टूट गया भ्रम ?

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मेरी गर्लफ्रैंड बात-बात पर रूठ जाती है, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 25 वर्षीय अविवाहित युवक हूं. मेरी समस्या अपनी गर्लफ्रैंड को लेकर है, जो दिल की तो अच्छी है और मुझे प्यार भी करती है, लेकिन वह बातबेबात रूठ जाती है. वह चाहती है कि मैं उसे अकसर घुमानेफिराने ले जाऊं, मूवी दिखाऊं, शौपिंग कराऊं. वह बारबार फोन कर मुझे परेशान भी करती रहती है. कहती है कि कुछ भी करो तो बता कर. कभीकभी लगता है मैं बुरी तरह फंस गया हूं. बताएं मैं क्या करूं ?

जवाब

हर गर्लफ्रैंड यही चाहती है कि उस का बौयफ्रैंड उसे प्रेम करे, उसे समय दे, मूवी दिखाने ले जाए, शौपिंग कराए, उपहार दे. आप की गर्लफ्रैंड भी आप से यही उम्मीद रखती है. अगर आप कामकाजी हैं और आप के पास समय का अभाव है, तो सप्ताहांत या अवकाश के दिन गर्लफ्रैंड को समय जरूर दें. हां, बाकी दिनों में हालचाल लेते रहें.

वह आप को बिना वजह बारबार फोन करती है, तो इस बारे में उस से बात करें और मिलने व घूमने जाने का प्रोग्राम समय के अनुसार तय कर लें. बावजूद इस के वह नहीं मानती और आप को परेशान करे तो उस से दूरी बनाने में ही फायदा है.

सावधान : कहीं आप भी ओसीडी के शिकार तो नहीं

इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को सनक वाले खयाल आते हैं और वह अपने इस व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रख पाता, न ही स्थिर रह पाता है. जैसे कि बारबार यह सुनिश्चित करता कि घर से निकलते वक्त दरवाजा ठीक से बंद किया था या नहीं, गैस की नौब कहीं खुली तो नहीं रह गई. कहीं आग लग गई या घर में चोर घुस गए तो, जैसे खयाल उसे परेशान करते रहते हैं. इसी दुविधा के चलते वह एक ही काम को कई बार करता है. किसी चीज को छूने के बाद बारबार हाथ धोना जब तक कि वह लाल न हो जाए. ये ओसीडी के लक्षण हो सकते हैं.

यह औब्सैशन बिना मरीज की  चाहत के होता है. रोगी जानता है कि जो वह कर रहा है, वह गलत है,

फिर भी खुद को ऐसा करने से रोक नहीं पाता. अगर किसी इंसान के साथ ऐसा हो रहा है तो समझें कि मामला गंभीर है.

33 वर्षीय नीलम 2 बच्चों की मां है. पिछले 6-7 सालों से वह ओसीडी की समस्या से जूझ रही है. साफसफाई को ले कर उस की हालत यह है कि बाई के काम करने के बाद भी वह फिर से झाड़ूपोंछा करने लगती है, यह कह कर कि उस ने सही से काम नहीं किया. उस की ही वजह से उस के घर में कोई कामवाली ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाती.

पहले आसपास के लोगों से काफी मेलजोल था, पर धीरेधीरे वह भी कम होने लगा, क्योंकि अब उसे अपने घर में ही रहना ज्यादा पसंद है. अकसर वह अपने घर में कुछ धोतीपोंछती रहती है. उसे लगता है कि उस का घर अभी भी गंदा है. दिसंबरजनवरी की कड़ाके की ठंड के दिनों में भी वह अपने घरआंगन को धोने से बाज नहीं आती. उस के इस व्यवहार से उस के घर वाले काफी परेशान रहते हैं.

स्नेहा बताती है कि उस की जेठानी ओसीडी बीमारी से ग्रस्त है. घंटों नहाना, बाथरूम से आने के बाद या किसी चीज को छूने के बाद साबुन से बारबार हाथ धोना, उस के बाद फिर मिट्टी से तब तक हाथ धोते रहना जब तक कि हाथ लाल न हो जाए, धुले हुए कपड़े बारबार धोना, यह सोच कर कि उन पर कोई चिडि़या बैठ गई होगी और वे गंदे हो गए हैं, हमेशा कुछ न कुछ सोचते रहना, चेहरे पर खिन्नता दिखाई देना, किसी से खुल कर बातें न करना, उन की आदतों में शामिल है. उन के ऐसे व्यवहार से उन के पति, बच्चे और परिवार के दूसरे सभी लोग परेशान रहते हैं. डाक्टर से उन का इलाज चल रहा है, लेकिन कभी अच्छी तो कभी खराब हालत बनी रहती है.

दिल्ली के एक साइकोलौजिस्ट के अनुसार, जब कोई ऐसे विचार जिन्हें आप अपने दिमाग में आने नहीं देना चाहते हैं, पर आने से रोक भी नहीं पाते और न चाहते हुए भी अजीबोगरीब हरकतें दोहराते हैं, तो यह ओसीडी की गिरफ्त में आने का संकेत है.

अकसर ऐसे लोगों का मजाक बनाया जाता है. लोग उन्हें पागल तक करार देते हैं. लेकिन वे अपने दिल के हाथों मजबूर एक ही काम को करने के लिए मजबूर हो जाते हैं. वे ऐसा करने से खुद को रोकने की भरसक कोशिश करते हैं, पर रोक नहीं पाते. अनचाही सोच की जकड़न ऐसे मरीजों को बेचैन रखती है और उन के मन को एकाग्र नहीं होने देती. आत्मविश्वास की कमी के कारण उन की बोलचाल में भी लड़खड़ाहट दिखने लगती है.

ओसीडी के लक्षण

–    बारबार हाथ धोना, गंदगी से डरना और यह सोचना कि कहीं वह जर्म्स की चपेट में आ कर बीमार न पड़ जाए. ओसीडी के कारण मरीज में साफसफाई और बारबार हाथ धोने का खुद का दबाव होता है.

–    शंकालु होना, डरना कि कहीं उस से कोई गलती न हो जाए और उस गलती की कहीं उसे बड़ी सजा न मिले. घंटों पूजापाठ में लगे रहना और कर्मकांड का हिस्सा बनना.

–    हमेशा इस डर में जीना कि कहीं उस के कारण किसी को कोई नुकसान न हो जाए. अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा, जैसी बातें उस के मन को डराती रहती हैं.

–    बराबर चैक करना कि उस ने दरवाजा, गैस, इंटरनैट घर से निकलते वक्त ठीक से बंद किया था या नहीं.

–    किसी चीज को गिन लेने के बाद भी उसे बारबार गिनते रहना कि कहीं उस से गिनने में गलती तो नहीं हो गई.

–    ऐसे लोग घर से निकलते वक्त शुभअशुभ के बारे में बहुत सोचते हैं. उन्हें लगता है कहीं उन के साथ कुछ बुरा तो नहीं हो जाएगा. इसी आशंका में बेकार की चीजें, जैसे पुराने अखबार, कपड़े, डब्बे आदि जमा कर घर भरते रहते हैं.

–    सड़क पर चलते हुए बिजली के खंभों और पेड़ों को गिनना और फिर उन्हें छूने की तीव्र इच्छा होना.

–    सैक्स को ले कर हिंसक सोच रखना और फिर खुद ही शर्मिंदा हो कर परेशान हो जाना.

–    खुद की तुलना दूसरों से कर के परेशान होना. किसी भी सामान को उठा कर दूसरी जगह रखना. बैठने के पहले यह सोचना कि यहां बैठे या वहां और उसी में बहुत समय लगा देना.

अगर इस तरह के लक्षण किसी इंसान में 6 महीने से ज्यादा दिखाई देने लगें और इस से उस की दिनचर्या प्रभावित होने लगे, तो समझिए की वह ओसीडी समस्या से ग्रस्त है. ओसीडी होने की कोई उम्र नहीं होती, यह किसी भी इंसान को किसी भी उम्र में हो सकता है.

ओसीडी के कारण

रिसर्च में पाया गया है कि सैरोटिन नामक न्यूरोटौस मीटर के असंतुलन के कारण ओसीडी के लक्षण विकसित होते हैं. कभीकभी यह बीमारी परिवार के कई लोगों में भी हो सकती है. सो, रोग आनुवंशिक भी हो सकता है. अभी तक तो यही माना जाता है कि कुछ मस्तिष्क की बनावट, कुछ जीन और कुछ जीवन की विषमताओं से पैदा तनावों के मिलेजुले कारणों की वजह से ओसीडी होता है.

ओसीडी का इलाज

ओसीडी के मरीजों को साइकोथेरैपी के साथ दवा दी जाती है और काउंसिलिंग भी की जाती है. यह रोग साइकोथेरैपी से भी ठीक हो सकता है, पर बिना डाक्टर की सलाह के दवाई नहीं छोड़नी चाहिए.

साइकोथेरैपी के जरिए रोगी के तर्कहीन विचारों में बदलाव लाया जाता है. रोगी को समझाया जाता है कि एक ही काम को बारबार करने से खुद को रोके. लेकिन यह प्रैक्ट्सि जारी रखनी होगी, तभी वह इस रोग से छुटकारा पा सकता है.

चाहे तो मरीज खुद अपने अजीबोगरीब व्यवहार को महसूस कर उस पर नियंत्रण पा सकता है. लेकिन इस के लिए परिवार के सदस्यों का प्यार और साथ जरूरी है. अगर वही रोगी से घृणा करेंगे, तो वह कभी ठीक नहीं हो पाएगा.

स्नेहा की जेठानी के साथ यही हो रहा है. सब उन से घृणा करते हैं बजाय उन्हें समझने के. परिवार के लोग उसे पागल कह कर हंसते हैं, उन की आलोचना करते हैं. यहां तक कि अब उन के बच्चे भी उन से दूरी बना कर रखते हैं, जोकि सही नहीं है.

मरीज खुद ही समझे कि उसे बारबार हाथ धोने या दरवाजा चैक करने की जरूरत नहीं है, वह फालतू की बातों को अपने दिमाग में नहीं आने देगा. अगर फिर भी ऐसा नहीं हो पाता है, तो अपना ध्यान दूसरी जगह ले जाए. कोई और काम करने लगे, जैसे कि अपना मनपसंद गाना सुनें या फिर किसी से बात करने लगें, तो अपनेआप उस का ध्यान बेकार की बातों से हट जाएगा.

विचारों का गुलाम न बन कर, कोई किताब पढ़ें, व्यायाम करें, वैबसर्फिंग, वीडियो गेम आदि में मन लगाएं. फालतू के विचारों को जितना टालोगे, उन का असर उतना ही कम होता जाएगा. न हो तो मन में चल रही उलझनों को डायरी में लिखें. यह भी लिखें कि दरवाजा, गैस, बिजली का स्विच बंद करने के बाद फिर कितनी बार चैक किया. हाथ धोने के बाद, दोबारा कितनी बार हाथ धोए, वह भी डायरी में लिखें और फिर उसे बाद में पढ़ें. तो पता चलेगा कि आप ने जो किया, वह गलत था और अब उसे नहीं दोहराएंगे. अपने विचारों में दृढ़ता लाएं.

ओसीडी का रोगी खुद को कमजोर और अकेला महसूस करता है, इसलिए ऐसे इंसान को परिवार का पूरा सहयोग मिलना जरूरी है. परिवार के लोग उस की आलोचना या उस का तिरस्कार न कर के उसे सपोर्ट करें, ऐसा रोगी बहुत ही भावुक किस्म का होता है. किसी की कड़वी या व्यंग्यपूर्ण बातें उस के दिल को तोड़ देती हैं और इसी कारण उस में डर, घबराहट, चिंता, व्याकुलता दिखाई देने लगती है. इसलिए परिवार वाले ऐसे लोगों का मानसिक संबल बनें.

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मध्य प्रदेश में मुसलिम राजनीति हाशिए पर, भाजपा की राह पर कांग्रेस

मध्य प्रदेश एक शांत प्रदेश रहा है, समाज हिंदूमुसलिम के बीच कभी बंटा हुआ नहीं दिखा. यही वजह रही है कि मुसलमानों की कम आबादी होने के बावजूद भी मुसलिम जनप्रतिनिधि अपनी आबादी अनुपात के हिसाब से विधानसभा पहुंचते रहे हैं. यहां तक वह बहुसंख्यक आबादी वाले क्षेत्रों का भी प्रतिनिधित्व करते रहे हैं. लेकिन हाल के कुछ वर्षों में ऐसा सामाजिक धुर्वीकरण किया गया कि मुसलिम बाहुल्य सीटों से भी मुसलमानों का चुनाव जीतना मुश्किल हो गया, जिसके चलते राजनीतिक दल उनको टिकट देने से भी परहेज करने लगे.

यही वजह रही कि मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में राज्य के एक बड़े वर्ग यानी मुसलमानों में कतई उत्साह नहीं दिखा. पिछले ढाई दशक में मध्य प्रदेश में मुसलिम राजनीति हाशिए पर चली गई है. अपने को अल्पसंख्यक परस्त कहने वाली कांग्रेस ने साल 2014 के बाद राज्य में मुसलमानों से राजनीतिक किनारा करने की कोशिश की है. इस समय राज्य में कोई ऐसा नाम नहीं है जिसे प्रदेश स्तर पर राजनीतिक पहचान मिली हो.

चुनाव 2023 में सियासी तपिश के साथ ही कांग्रेस की मुसलिमपौलिटिक्स पूरी तरह से बदली हुई नजर आई है. एक मुसलिम नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में ओवैसी के उभार से भी अन्य दलों में मुसलमानों को राजनीतिक नुकसान पहुंचा है. ओवैसी मुसलिम बाहुल्य सीटों पर अपने मुसलिम उम्मीदवार मैदान में उतार देते हैंजिससे धर्मनिरपेक्ष दलों के मुसलिम उम्मीदवारों के मुसलिम वोट बंट जाते हैं,तो भाजपा की राह आसान हो जाती है.मुसलिम बाहुल्य सीटों पर हिंदू उम्मीदवार ज्यादा सफल रहते हैं.

मध्य प्रदेश में अनदेखी

यही वजह है कि मुसलमानों को अप्रासंगिक समझा जा रहा है और परिणामस्वरूप, उन्हें हल्के में लिया जा रहा है. हालांकि, राजनीतिक दलों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सरकार बनाने में मुसलिम वोट महत्वपूर्ण हैं.राज्य मेंकेवल 1 या 2% वोटों का स्विंग राजनीतिक परिदृश्य को महत्वपूर्ण रूप से बदल सकता है और पार्टियों के भाग्य को बदल सकता है.

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने जिस तरह से हिंदुत्व के पिच पर उतरकर सियासी बिसात बिछाई थी,उससे एक बात को साफ है कि कांग्रेस अपनी मुसलिम परस्त वाली छवि को बदलने और खुद को थोड़ा ज्यादा ‘हिंदू’ दिखाने की कोशिश में रही.कांग्रेस की ओर से राज्य में राष्ट्रीय स्तर का भी कोई मुसलिम नेता प्रचार के लिए नहीं भेजा गया.ये भी एक तथ्य है कि 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस आलाकमान की कम,क्षेत्रीय क्षत्रपों की ज्यादा चली.

मध्य प्रदेश में कमलनाथ ने भाजपा की हिंदुत्व वाली सियासी पिच पर खुल कर खेला हैलेकिन इसके उलट राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट को सेक्युलर बने रहने में कोई दिक्कत नहीं लगी.इसीलिए राजस्थान में कांग्रेस ने 14-15 मुसलमानों को टिकट देकर बड़ा दांव खेला है.ये संख्या तेलंगाना में ओवैसी की मैदान में उतारे कुल मुसलिम उम्मीदवारों से लगभग दुगुनी है.गहलोत भाजपा के बड़े मुसलिम नेता अमीन पठान को भी कांग्रेस में शामिल करने में कामयाब हो गए.

सिकुड़ती सीटें

भाजपा ने इस बार पूरी तरह से मुसलमानों से दूरी बना ली है.कहीं भी एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने भी इस बार केवल एक मुसलमान को मैदान में उतारा हैजबकि साल 2018 में छत्तीसगढ़ में 2मुसलिम उम्मीदवार मैदान में थे, जिसमें मोहम्मद अकबर राज्य में सबसे अधिक वोटों से जीतने वाले नेता थे. वह भी भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रमनसिंह के गृह जिले से 60 हजार से अधिक वोटों से जीते थे.

साढ़े 7 करोड़ की आबादी वाले मध्य प्रदेश में मुसलमान 7 प्रतिशत के आसपास हैं लेकिन कुछ ऐसी सीटें हैं जहां पर मुसलमानों के वोट निर्णायक हैं.इसके बावजूद प्रदेश की विधानसभा में समाज के इस तबके का प्रतिनिधित्व घटता ही चला जा रहा है और उनके मुद्दे दरकिनार होते जा रहे हैं.

एक समय ऐसा भी था जब राज्य में 7 मुसलिम विधायक हुए थे.यहीं नहीं मुसलिम सांसद भी मध्य प्रदेश ने दिए हैं.इस बार प्रदेश की सभी 230 सीटों पर इस बार चुनावी मुकाबला बेहद रोचक और कांग्रेस-बीजेपी के बीच कांटे की टक्कर दिख रही है.ऐसे में चुनावी लड़ाई आमनेसामने की है.

सियासी पिच बदलती हुई

दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस इस बार उसी सियासी पिच पर उतरकर खेली है,जिससे लगातार बीजेपी जीत दर्ज करती रही है.कांग्रेस को इस राह पर चलने के चलते अपने कोर वोटबैंक मुसलिम समुदाय से दूरी बनाए रखकर चलना पड़ा.

खुद को हनुमान भक्त बताने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने खुलकर हिंदुत्व कार्ड खेला. हिंदू राष्ट्र की वकालत करने वाले धीरेंद्र शास्त्री के प्रवचन छिंदवाड़ा में कराया और साथ ही शिवकथा वाचक प्रदीप मिश्रा का कार्यक्रम भी कराया.कांग्रेस ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट नवरात्र के पहले दिन जारी किया.

इस तरह उन्होंने सौफ्ट हिंदुत्व ही नहीं बल्कि बीजेपी की तरह हार्ड हिंदुत्व का दांव खेला है,जिसके चलते कांग्रेस मुसलिमों से दूरी बनाते हुए नजर आई.यहां तक कि साल 2014 के बाद खुल कर लगातार मुसलमानों का पक्ष लेने वाले दिग्विजय सिंह भी कुछ बदले हुए नजर आए.उन्होंने अपने पुराने कुछ मुसलिम सिपाहसलारों को टिकट न मांगने के लिए पहले ही मना कर दिया था,बल्कि किसी की सुनी भी नहीं.

नेता कैसे रंग बदलते हैं.देखिए टिकट वितरण में मुसलमान नाम से भी परहेज करने वाले दिग्विजय सिंह, छतरपुर में एक मुसलिम कांग्रेस कार्यकर्ता के मारे जाने पर अपनी पत्नी के साथ रात भर धरने पर बैठ जाते हैं.मृतक सलमान के परिवार को गोद ले लेने की बात कहते हैं लेकिन वह सदन में मुसलमानों की आवाज को बढ़ावा नहीं देते हैं.

रीवा से डाक्टर मुजीब खान को बड़ी उम्मीद थी कि दिग्गी राजा उनकी मदद करेंगेलेकिन उनको साफ मना कर दिया गया.मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में 3मुसलिम प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से 2 विधायक बनने में सफल रहे.प्रदेश में मुसलमानों की आबादी का 7 फीसदी है.1962 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 7मुसलिम विधायक चुने गए थे.

1972 और 1980 में 6-6 मुसलिम विधायक बने थे जबकि 1985 में 5 मुसलिम विधानसभा चुनाव जीते थी.हालांकि 1990 के चुनाव से मुसलिमों का प्रतिनिधित्व एमपी में घटने का सिलसिला शुरू हुआ तो आजतक नहीं उभर सका.

1993 के विधानसभा चुनाव में एक भी मुसलिम विधायक नहीं जीत सका था.तब दिग्विजय ने इब्राहिम कुरैशी को मंत्री बनाया था,लेकिन वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे. इस लिए नियमों के तहत इस्तीफा देना पड़ा.फिर साल 2003 से 2013 तक सदन में सिर्फ एकएक ही मुसलमान विधायक रहे.

इसके बाद विधायकों की संख्या दो और एक तक ही सीमित रही.वैसे कांग्रेस ने 1962 में मुसलमानों को 11और 1980 में 10 टिकट दिएलेकिन 2008, 2013 और 2018 में क्रमशः 3, 5 और 3 टिकट ही दिए गए.

जनसंख्या के तुलना में कम हिस्सेदारी
बता दें कि प्रदेश में मुसलिम मतदाता भले ही 7 फीसदी होंलेकिन 2 दर्जन से ज्यादा सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं. भोपाल, इंदौर, जबलपुर और बुरहानपुर में मुसलिमों की आबादी बड़ी संख्या में है.भोपाल की मध्य,भोपाल उत्तर,सिहौर,नरेला,देवास की सीट,जबलपुर पूर्व,रतलाम शहर,शाजापुर,ग्वालियर दक्षिण,उज्जैन नौर्थ,सागर,सतना,रीवा,खरगोन,मंदसौर, देपालपुर और खंडवा की विधानसभा की सीटों पर मुसलिम मतदाता अहम रोल अदा करते हैं.

इसके बाद भी कांग्रेस भोपाल की सीटों पर ही मुसलिमों को टिकट देने तक सीमित किए हुए हैं.कांग्रेस की मध्य प्रदेश में बदली सियासी चाल और दो ध्रवी चुनावी लड़ाई के चलते मुसलिमों के पास कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है.मध्य प्रदेश में मुसलिम मतदाता इतनी बड़ी संख्या में नहीं है.इसी कांग्रेस के नेतृत्व के लिए मुसलमानों को लेकर ज्यादा दिलचस्पी नहीं है,क्योंकि वो जानती है कि मुसलिम वोटों के सहारे सत्ता में वापसी नहीं हो सकती है.

कांग्रेस मुसलिम बहुल सीटों से हिंदू उम्मीदवार उतारती है,क्योंकि वहां से उनका जीतना बहुत आसान हो जाता है.मध्य प्रदेश की विधानसभा में पिछले 4 दशकों से मुसलमान विधायकों का प्रतिनिधित्व घटता ही चला जा रहा है.यही हाल लोकसभा में है.प्रदेश से आखिरी मुसलमान सांसद, हौकी ओलंपियन असलम शेर खान ही रहे हैं और वो भी 80 के दशक में.उनके बाद फिर कभी कोई मुसलमान प्रत्याशी लोकसभा में मध्य प्रदेश से निर्वाचित नहीं हो पाया.

दबती अल्पसंख्यक आवाजें

विधानसभा से लेकर संसद तक प्रदेश के मुसलमानों के मुद्दों को उठाने वाली आवाजें खत्म होती जा रही हैं.मध्य प्रदेश राज्य के रूप में 1956 में अस्तित्व में आया. गठन के बाद से सबसे अधिक शासनकाल कांग्रेस का रहा इसलिए मुसलमानों के घटते राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर कांग्रेस पर ही सभी ज्यादा उंगलियां उठ रही हैं.मुसलमानों का राजनीतिक हाशिये पर होना केवल भाजपा या भाजपा शासित राज्यों तक सीमित’ नहीं है.कांग्रेस या कांग्रेस शासित राज्यों में भी उनको पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है.

मुसलमान नेता को केवल वो वक्फ बोर्ड या हज कमेटी में रख लिया जाता हैऔर अगर मुसलमान विधायक मंत्री भी बन जाता है तो उसके पास वक्फ बोर्ड या अल्पसंख्यक मामलों जैसे विभाग आते हैं.उसे कोई भारी भरकम विभाग जैसे गृह,वित्त या सामान्य प्रशासन या लोक निर्माण विभाग,इस तरह के विभागों से दूर ही रखा जाता है.

साफ है कि पहले जो आवाजें मुसलमानों के अधिकारों के लिए उठा करतीं थीं,चाहे वो कांग्रेस पार्टी के अंदर से हों या समाजवादी सोच वाले नेताओं की हों,वो आवाजें अब धीमी पड़ गई हैं.

विधानसभा चुनाव 2023 में तो कांग्रेस भी अब हिंदुत्व के रास्ते पर निकल पड़ी है ये सोचते हुए कि वो भारतीय जनता पार्टी का इसके जरिए मुकाबला कर सकती हैजो धर्मनिरपेक्षता के चैंपियन होने का दम भरते थे वो या तो डर गए हैं या फिर वोटों की खातिर खामोश रहना पसंद कर रहे हैं.

आतेआते विश्व गुरु के हाथों से फिसला विश्वकप

भारत से भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी मिटाने की अंतिम आस भी आस्ट्रेलिया ले गया. विश्व कप क्रिकेट के दौरान कामधंधा छोड़, मोहमाया से इतर, राष्ट्रीयता से ओतप्रोत 140 करोड़ भारतीयों की दीवानगी और उन के सपनों पर कंगारुओं द्वारा गरम पानी डालना देख कर मेरी तो आंखें भर आई हैं. काश, इंडिया जीत जाता की कसक को दिल में समेटे हर भारतीय दर्शक आस्ट्रेलिया को ट्रौफी ले जाते हुए ऐसे देख रहा था जैसे मोहल्ले के लौंडे की सेटिंग को कोई सरकारी नौकरी वाला दुल्हा ब्याह कर ले जाता है.

भारत और पड़ोसी देश पाकिस्तान तक दर्शकों का क्रिकेट के प्रति पागलपन ऐसा लग रहा था कि विश्व कप ट्रौफी आने से देश में खुशहाली और समृद्धि आ जाएगी और विजेता राष्ट्र विश्वगुरू बन जाएगा. वर्तमान डिजिटल वर्ल्ड में जहां प्रत्येक तीसरा मनुष्य वायरल होने के लिए व्यथित और व्यग्र नजर आ रहा है, समाजसेवी नेता की बजाय स्वयंसेवी के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना रहा है तो इस वर्ल्ड कप और दर्शकों की खुमारी देख कर मेरे मन में भी एक इच्छा ने गर्भधारण कर लिया.

इच्छाओं का प्रजनन एक सतत और अनवरत मानसिक प्रक्रिया है. एक दबीदबी सी इच्छा मनमस्तिष्क में कुकुरमुत्ते की तरह पनप आई जो इस जीवन में पूर्ण होने से रही. ऐक्टर अथवा पौलिटिकल कैरेक्टर की बजाय मैं अगले जन्म में भारतीय क्रिकेटर बनना चाहता हूं. राष्ट्रीय मिठाई जलेबी की तरह गोलगोल घुमाने की बजाय इस इच्छा के पनपने का कारण भी बता देता हूं.

दरअसल, बचपन से ही हमें ‘पढ़ोगेलिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगेकूदोगे बनोगे खराब…” की जन्मघुट्टी श्लोक पिलाया गया और हम ने खेल और खेलने वाले मित्रों से दूरी बनाते हुए सिर्फ कागज और कलम में जीवन को खपा दिया. जब हम मैट्रिक बोर्ड में स्टेट टौपर बनने के लिए ढिबरी की ज्योति और नेत्र ज्योति के साथ संघर्ष कर रहे थे तो पढ़ाईलिखाई से कोसों दूर खराब बनने की पथ पर अग्रसर हमउम्र के लड़के अंडर-17 के लिए तैयारी कर रहे थे.

हम ग्रेस मार्क पर बोर्ड पास हो कर किसी तरह इज्जत बचा पाए, तो उधर वे स्टेट लेवल पर खेल रहे थे. बहरहाल, संघर्षमय जीवन में अभिभावक के मेहनत की गाढ़ी कमाई और स्वयं के बहुमूल्य 25 वसंत के इन्वेस्टमैंट के पश्चात बड़ी मुश्किल से सरकारी मुलाजिम बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.

निजी पहचान के तौर पर पढ़लिख कर मेरे नवाबी का दायरा समाज, सरकारी कार्यालय और ससुराल तक सिमट कर रह गया.

एक दिन स्पोर्ट्स चैनल पर भारतीय टीम को मैच खेलते हुए देखा. दर्शकों की शोर के बीच पढ़लिख कर नवाब बनने से वंचित बचपन का कोई खराब लड़का बल्लेबाजी कर रहा था. स्टेडियम और घर के डाइनिंग हौल में सिनेमा हौल के शोर और सीटी से ज्यादा दर्शकों का पागलपन देख मैं हतप्रभ रह गया.

सुंदर लड़कियों की क्रिकेट के प्रति दीवानगी, अध्ययनरत छात्रों के स्टडीरूम में पढ़ाई के लिए रूटीन चार्ट के स्थान पर आईपीएल, वर्ल्डकप, सीरीज मैच आदि का शैड्यूल चार्ट की उपलब्धता देखा.

आज शिक्षित बेरोजगारों को प्रतियोगिता परीक्षा की तिथि याद हो न हो लेकिन मैच के सेमीफाइनल और फाइनल का डेट याद है. मरने तक की फुरसत नहीं होने वाले अति व्यस्त भारतीय जीवन में क्रिकेट का मैच देखने और उस पर चर्चा करने के लिए समय की उपलब्धता, खेल देखने के लिए स्टेडियम में वीवीआईपी की उपस्थिति, अखबारों में खिलाड़ियों का महिमामंडन आदि दैनिक घटनाओं ने मेरी अंतरात्मा को दहाड़ मारमार कर रोने को मजबूर कर दिया है. ‘पढ़ोगेलिखोगे बनोगे…’ वाले बचपन के गलत पाठ को जीवन का आधार बना कर चलने के कारण मेरा यह जन्म और कुदरती कृति निष्फल और निरुद्देश्य रह गई. सरकारी कार्यालय में बौस और घर में बीवी के आगे घिग्घी बंधी जिंदगी बेजार, बेनूर सी हो गई है.

भारतीय रेल की तरह विलंब से ही सही किंतु उम्र के चौथे दशक में मुझे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो गई है कि देश में खेले जा रहे अन्य खेल (महिला क्रिकेट सहित) और खिलाड़ी मनोरंजन के साधन मात्र हो सकते हैं, जबकि क्रिकेट तो कोई खेल है ही नहीं. क्रिकेट तो अंतर्राष्ट्रीय समीकरण है. यह देश को जोड़ने का सूत्र है, देशभक्ति का हौलमार्क है. माया के वशीभूत समस्याग्रस्त मानव जीवन में परम सुख और आनंद प्रदाता है. क्रिकेट समस्या है तो समाधान भी है. साधन है, साधना है और सम्मान भी है.

क्रिकेट मैच गरीबी, बेरोजगारी, पारिवारिक और सामाजिक हर तरह की समस्याओं में झंडुबाम की तरह काम करता है. पड़ोसी मुल्क को पीच पर हराने का सुख युद्धोपरांत लाहौर पर तिरंगा लहराने जैसा है.

मीडिया और कौरपोरेट जगत भी नेमफेमक्लेम की चाशनी में डूबो कर रखे गए क्रिकेट की गुगली से आच्छादित है. क्रिकेटर विज्ञापन और रील्स का सरताज होता है. सुंदर युवती से अभिनेत्रियों में खिलाड़ी कुमार अक्षय की बजाय क्रिकेट खिलाड़ी का ही क्रेज देखा जा रहा है.

मैं समझ गया कि जो कोई नहीं होता वह क्रिकेटर होता है यानी वह सैलिब्रेटी होता है, वीवीआईपी होता है और पता नहीं क्याक्या होता है. सब से बड़ी बात पढ़ेलिखे इंसान का बिकना शर्मनाक माना जाता है क्योंकि वह जीवनकाल में या तो शादी के समय दहेज के लिए अथवा सरकारी कार्यालय में रिश्वत लिए बिकता है जबकि हर सीजन में बिकने वाला खिलाड़ी प्रतिष्ठित और सम्माननीय होता है. यह जीवन तो पढ़नेलिखने में बरबाद चला गया. अब अगले जन्म तो सिर्फ और सिर्फ भारतीय क्रिकेटर बन कर विश्व, विज्ञापन, बौलीवुड अभिनेत्री और सुंदर बालाओं के दिलों पर राज कर मानव जीवन धन्य करना चाहता हूं.

बिना जानकारी हर्बल दवा जान पर भारी

हर्बल औषधियों से जुड़ा ज्ञान दुनिया की हर मानवजाति, संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा रहा है. कई जड़ीबूटियों को तो सोने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण माना गया है. अदरक, सेमल लहसुन, अश्वगंधा, हलदी, लौंग, धनिया, आंवला, अमरूद और ऐसी हजारों जड़ीबूटियों के प्रभावों की प्रामाणिकता आधुनिक विज्ञान साबित कर चुका है.

कई जड़ीबूटियों को आधुनिक औषधि विज्ञान ने बाकायदा दवाओं के तौर पर आधुनिक अमलीजामा पहनाया भी है. सिनकोना नामक पेड़ से प्राप्त होने वाली छाल से क्वीनोन नामक दवा तैयार की गई और इसे मलेरिया के लिए रामबाण माना गया.

दुनिया के तमाम देश शोधों और उन के परिणामों से प्रोत्साहित हो कर कई हर्बल दवाओं के वैज्ञानिक प्रमाण खोजने के प्रयास कर रहे थे. आज डंडेलियान नामक पौधे से कैंसर रोग के इलाज की दवा खोजी जा रही है, तो कहीं किसी देश में सदाबहार और कनेर जैसे पौधों से त्वचा पर होने वाले संक्रमण के इलाज पर अध्ययन हो रहा है.

परंपरागत ज्ञान का वैज्ञानिक प्रमाणन जरूरी है ताकि हम यह हकीकत समझ पाएं कि किस जड़ीबूटी से कौन सा रोग वाकई में ठीक होता है और ऐसा कैसे संभव हो पाता है. लेकिन मैं जड़ीबूटियों में खास रसायनों को अलग कर के औषधियों को कृत्रिम रूप से तैयार करने का पक्षधर नहीं.

पौधों में होते हैं रसायन

औषधीय पौधों में सिर्फ एक नहीं, हजारों रसायन और उन के समूह पाए जाते हैं. और कौन जाने, कौन सा रसायन प्रभावी गुणों वाला होता है. इसलिए मार्कर कंपाउंड (किसी जड़ीबूटी में पाए जाने वाला खास रसायन) शोध पर कई जानकार सवालिया निशान खड़े करते हैं. जड़ीबूटियों में से महत्त्वपूर्ण रसायनों को अलग कर के उन्हें कृत्रिम रूप से तैयार करने की कोशिश असरकारक न होगी. इस बात को साबित करने के लिए एस्पिरिन से बेहतर उदाहरण क्या होगा.

एस्पिरिन टेबलेट्स में मार्कर कंपाउंड के नाम पर सौलिसिलिक एसिड होता है जिसे सब से पहले व्हाइट विल्लो ट्री नामक पेड़ से प्राप्त किया गया. सौलिसिलिक एसिड को कृत्रिम तौर पर तैयार किया गया और एस्पिरिन नामक औषधि बाजार में लाई गई. दर्दनिवारक गुणों के लिए मशहूर इस दवा के सेवन के बाद कई रोगियों को पेट में गड़बड़ी और कइयों को पेट में छालों की समस्याओं से जूझना पड़ा. जबकि व्हाइट विल्लो ट्री की छाल का काढ़ा कई हर्बल जानकार दर्दनिवारण के लिए सदियों से देते आएं हैं और रोगियों को कभी किसी तरह की शिकायत नहीं हुई. क्या नतीजा निकालेंगे आप?

दरअसल, छाल के काढ़े में वे रसायन भी हैं जो छालों की रोकथाम के लिए कारगर माने गए हैं और कई रसायन ऐसे भी हैं जो पेटदर्द और दस्त रोकने आदि के लिए महत्त्वपूर्ण हैं. सब से बड़ा सवाल दवाओं या जड़ीबूटियों की गुणवत्ता को ले कर बनता है. अधिकांश वैद्य, जानकार और कई फार्मा कंपनियां भी दवाओं को तैयार करने वाली जड़ीबूटियों (कच्चे माल) को बाजार से खरीदते हैं. ऐसे में कच्चे माल की गुणवत्ता पर सवाल उठना लाजिमी है.

दूसरी सब से बड़ी चिंता की

बात झोलाछाप और गैरप्रामाणिक जानकारियों का इंटरनैट या सोशल साइट्स व ढोंगी बाबाओं की ओर से संचारित होना है. आधीअधूरी जानकारी पा कर लोग खुद चिकित्सक बन जाते हैं और घर पर ही इलाज कर बैठने की सोच लेते हैं सिर्फ यह मान कर कि हर्बल दवाएं हैं, कोई दुष्प्रभाव या साइडइफैक्ट तो होगा नहीं.

हर्बल दवाओं से नुकसान

कई बार हम जानेअनजाने किसी डाक्टर को अपनी समस्याएं बताए बगैर मैडिकल स्टोर से दवाएं खरीद लाते हैं और मुफ्त में समस्याएं भी घर ले आते हैं. हर्बल लैक्सेटिव्स (विरेचक औषधि) बाजार में ओवर द काउंटर यानी ओटीसी के रूप में कहीं भी मिल जाती हैं. हम में से ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें इन से जुड़े दुष्प्रभावों की जानकारी तक नहीं. ये विरेचक औषधियां न सिर्फ शरीर में इलैक्ट्रोलाइट संतुलन को बिगाड़ सकती हैं बल्कि कई तरह के विटामिंस और वसीय पदार्थों का विघटन भी कर देती हैं.

मूत्र संबंधित विकारों के भी दुष्प्रभावों की भी बात करनी जरूरी है जिन की वजह से विटामिन बी-1, बी-6, विटामिन सी, सीओक्यू 10 और शरीर के इलैक्ट्रोलाइट्स कम होने लगते हैं. शरीर में कैफीन की मात्रा ज्यादा होने से विटामिन ए, विटामिन बी कौंप्लैक्स, लौह तत्त्वों और पोटैशियम जैसे पोषण तत्त्वों में कमी आने लगती है.

अकसर हर्बल दवाओं को दुष्प्रभावहीन बताया जाता है और इसी कारण लोग बगैर सोचेसमझे इन दवाओं को अपना लेते हैं. वे इस बात को भूल जाते हैं कि इन की असंतुलित मात्रा या किसी प्रशिक्षित चिकित्सक की सलाह लिए बगैर इन का उपयोग गलत असर भी डाल सकता है.

वैज्ञानिक एल्विन लेविस के शोध के अनुसार, एलोवेरा के जैल की अधिक मात्रा, जिसे अकसर लोग बगैर जानकारी के तमाम रोगोपचार के लिए इस्तेमाल करते हैं, शरीर के लिए नुकसानदायक भी हो सकती है. इस के चलते पेटदर्द, पेचिस जैसी आम समस्याओं के अलावा हृदय से संबंधित कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. पेड़पौधों में जो रसायन पाए जाते हैं, उन का कई बार सीधा सेवन घातक साबित होता है.

फ्लेवेनौइड नामक रसायन की अधिकता होने से मानव शरीर में कई दुष्परिणाम देखे जा सकते हैं. अमेरिकन जर्नल औफ मैडिसिंस में वैज्ञानिक अर्नस्ट के रिव्यू लेख की मानी जाए तो फ्लेवेनौइड एनीमिया जैसी समस्याओं के अलावा आप की किडनी को भी क्षतिग्रस्त कर सकते हैं.

जरूरी है चिकित्सकीय सलाह

हर्बल दवाएं किसी प्रैस्क्रिप्शन के बिना आसानी से बाजार में मिल जाती हैं लेकिन मेरी समझ से आप को हर्बल दवाओं के सेवन के वक्त चिकित्सकीय सलाह (मैडिकल गाइडैंस) लेना जरूरी है, क्योंकि अकसर हर्बल दवाओं की उपयोगिता के बारे में सभी लोग बात करते हैं लेकिन किन्हीं दूसरी दवाओं के साथ होने वाले रिऐक्शन के बारे में ज्यादा लोगों को समझ नहीं है. यही बात उन डाइटीशियंस को भी समझनी चाहिए जो चिकित्सा विज्ञान की समझ के बगैर खानपान में खासे परिवर्तन जरूर करा देते हैं लेकिन किसी खास तत्त्व की अधिकता या कमी के दुष्परिणामों की फिक्र नहीं करते.

शरीर में किसी पोषक तत्त्व की कमी है तो पोषक तत्त्व की पूर्ति के लिए औषधियों की तरफ दौड़ लगाने के बजाय तत्वों की कमी होने के कारणों को खोजा जाए और इन कारणों का प्राकृतिक रूप से निवारण किया

जाए. यदि अनियंत्रित खाद्यशैली, भागदौड़ और तनावग्रस्त जीवन में हम अपने शरीर को ढाल लेते हैं तो शरीर बीमारियों की चपेट में आता है.

हर्बल ज्ञान को सब से बड़ा नुकसान पहुंचाया है इस के अंधाधुंध बाजारीकरण और झोलाछाप जानकारियों ने. कई जानकार जड़ीबूटियों के बारे में इतनी सारी बातें बोल जाते हैं कि ऐसा लगने लगता है कि मानो कुछ जड़ीबूटियां अमृत तो हैं. तथाकथित जानकार इस तरह की वनस्पतियों को हिमालय से ले कर सुदूर पूर्वी राज्यों के पहाड़ी इलाकों से लाने और फिर दवा बनाने का दावा करते हैं. दरअसल, हर वनस्पति की एक खासीयत होती है. हरेक वनस्पति असरदार है. इस बात को सही जानकार भी अच्छी तरह जानते हैं.

औषधियों का बाजार करोड़ों रुपयों का है किंतु प्राकृतिक रूप से शरीर स्वस्थ रखना लगभग मुफ्त है और इस मुफ्त इलाज के लिए किसी चिकित्सक की जरूरत भी नहीं, सिर्फ अपना जीवनयापन, खाद्यशैली, और रोजमर्रा की जिंदगी को सटीक कर लिया जाए तो शरीर खुद ही अपनी रक्षा कर सकता है. रोगों का उपचार बिलकुल संभव है, किंतु यह तभी होगा जब रोगों के कारणों को हम समझ पाएं और फिर कारणों के निवारणों पर अमल किया जाए.

मेरा मेरे तलाकशुदा पति से अभी भी रिश्ता है, क्या हमें एक बार फिर एक हो जाना चाहिए ?

सवाल

मैं अपने पति से तलाक ले चुकी हूं मगर हमारे बीच अभी भी रिश्ता कायम है. आज भी उन के जीवन में कोई और महिला आती है तो मुझे बरदाश्त नहीं होता. इसी तरह मेरी जिंदगी में आने वाले शख्स के साथ वे भी बदसलूकी कर चुके हैं. मेरी मां हमारे रिश्ते से कभी खुश नहीं रही थीं. उन के कहने पर ही मैं ने तलाक लिया था. दरअसल, मेरे पति थोड़े दिलफेंक किस्म के इंसान हैं और मेरी मां इस बात पर उन से बेहद नाराज रहती थीं. हमारा एक 8 साल का बेटा है और वह मेरे साथ है. बेटा अकसर अपनी यह इच्छा जाहिर करता रहता है कि वह अपने मम्मीपापा को एकसाथ देखना चाहता है. कभीकभी मुझे भी लगता है कि हमें वापस एक हो जाना चाहिए. क्या यह ठीक रहेगा ?

जवाब

आप अपने पति से अलग रह कर खुश हैं या नहीं, इस का फैसला तो आप को ही करना पड़ेगा. वैसे, बच्चे के भविष्य की दृष्टि से सोचें, तो आप दोनों का साथ रहना ही बेहतर है. जैसा कि आप ने कहा कि तलाक लेने के बावजूद आप दोनों एकदूसरे का खयाल रखते हैं. जाहिर है कि आप दिल से अब भी एकदूसरे के साथ जुड़े हुए हैं.

दरअसल, दिल के रिश्ते होते ही ऐसे हैं. पति का दिलफेंक होना ज्यादा बड़ी बात नहीं. इस उम्र में अकसर पुरुषों की नजरें दूसरी महिलाओं की तरफ चली ही जाती हैं. इस का मतलब यह नहीं कि आप उन्हें खराब चरित्र वाला समझें. बच्चे की खातिर पति को एक और मौका दे कर देखें. संभव है कि आप की जिंदगी में खुशियां फिर से लौट आएं.

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खेल को खेल रहने दें इसे जंग का मैदान न बनाएं

विश्वकप में भारत की पराजय हो गई है इसी बानगी पर हम दृष्टिपात करते हुए बता रहे हैं कि भारत की आम जनता हो या फिर विशेष वर्ग और साथ ही देश का मीडिया एक बार इन्होंने यह दिखा दिया है कि भारत जैसे महान देश की आज दृष्टि कितनी संकुचित हो गई है कि भारत के लोगों को अपने सिवा कुछ दिख ही नहीं देता.

विश्वकप के खुमार पर अभी हम जब पीछे पलट कर अवलोकन करते हैं तो देखते हैं कि किस तरह विश्वकप क्रिकेट के संपूर्ण माहौल को एक तरफ कर दिया गया. कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां क्रिकेट पर चर्चा न हो रही हो और कोई यह मानने को तैयार ही नहीं था कि भारत यह मैच फाइनल में हार जाएगा. यही राज मीडिया फैला रहा था और लोग इस में नाच कर झूम रहे थे यहां तक कि देश की सत्ता भी क्रिकेट को भुनाने में लग गई.

आननफानन में अंतिम मैच को अहमदाबाद के स्टेडियम में शिफ्ट किया गया जो कि सभी जानते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने अपने नाम पर रखवाया है. शायद सत्ता भी यही समझ रही थी कि क्रिकेट का यह फाइनल भारत जीत जाएगा और उस का सारा श्रेय हम लूट ले जाएंगे.

दरअसल, जब हम अपनी सोच को संकुचित कर लेते हैं तो सब से पहले हमारी स्वयं से हार हो जाती है. भारत को विश्व गुरु मानने वाले कितने लोग अपनी पीठ थपथपाते हैं अगर हमें सच्चे अर्थों में विश्व गुरु बनना है और कभी भी छोटी सोच दृष्टि नहीं रखनी चाहिए.

दरअसल, विश्वकप को ले कर के भारत में जैसा माहौल दिखाई दिया मानो भारत ही विजयी होगा. यह सभी कह रहे थे कि खेल भावना की कमी है हमारे देश में. हमें खेलों को खेल की तरह लेना चाहिए. यह सूत्र वाक्य भारत का आम से आम आदमी, खेल प्रेमी, राजनीतिज्ञ और पत्रकार भूल जाते हैं और अंधभक्त बन जाते हैं.

यही आज विश्वकप क्रिकेट के फाइनल मैच में दिखाई दिया जब भारत और आस्ट्रेलिया आमनेसामने आए. यह खेद का विषय है कि यही आजकल राजनीति में होता है. यही धर्म में हो रहा है और यही समाज में है. अगर हम निष्पक्ष भावना के साथ विवेचना करें तो पाते हैं कि यह दृष्टिकोण देश को पीछे ले जाएगा और समाज को पीछे ले जा रहा है.

राजनीति, समाज में भी अंधभक्त

विश्वकप क्रिकेट के परिपेक्ष्य में अगर हम आज देश की सोच दृष्टि और कार्य पद्धति पर विचार करें तो पाते हैं कि विगत कुछ वर्षों से भारत की राजनीति और समाज में एक बड़ा परिवर्तन आया है कि एक बड़ा तबका अंधभक्त की तरह व्यवहार करने लगा है.

दरअसल, यह समझ होनी चाहिए कि अगर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं तो उन्हें देश की सेवा करने का मौका मिला है. देश को ऊंचाइयों पर ले जाने का अवसर प्राप्त हुआ है. यह कोई लड़ाई, युद्ध से सत्ता प्राप्ति नहीं है. हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिस के तहत चुनाव होते हैं और देश का बहुमत जिस पार्टी के साथ होता है, उसे सत्ता प्राप्त होती है.

यह एक सामान्य सी प्रक्रिया है जो लगभग 75 वर्षों से चली आ रही है. मगर आज देखा जा रहा है कि देश में नरेंद्र मोदी के हर एक काम को चाहे वह कितना ही गलत क्यों न हो बहुत सारे लोग आंख बंद कर के समर्थन करते हैं. हम ने नीर क्षीर विवेचना की शक्ति होनी चाहिए.

अगर ऐसा नहीं है तो फिर हम गदह पचीसी की उम्र में जी रहे हैं. नरेंद्र मोदी की अंधभक्ति का सब से बड़ा उदाहरण अगर हम यहां बताएं तो वह था करोना कल में ‘थाली और घंटी’ बजवाना. प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने जाने किस सोच में देश की जनता से आह्वान कर दिया की थाली और घंटी बजाने से करोना भाग जाएगा और सारे देश ने आंख बंद कर के उन का कहना मानना शुरू कर दिया और घंटियां और तालियां बजने लगीं. लोग फोटो शेयर करने लगे.

आज समय है जब हम यह विवेचना करें कि देश का बड़ा सा बड़ा आदमी भी अगर कोई बात कर रहा है तो हमें उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आकलन करना चाहिए सिर्फ कोई हमारा अपना या जिसे हम पसंद करते हैं वह कुछ कह दे तो आंख बंद कर के उस पर चलना अपने साथसाथ देश को भी कमजोर बनाने जैसा है.

आज राजनीति में यह अपने चरम सीमाओं को छू रहा है और देश को पतन की ओर ले जाने का काम कर रहा है जिसे हमें रोकना चाहिए. राजनीति के साथसाथ अगर हम धर्म और समाज को भी देखें तो यहां भी अंधभक्तों की कमी नहीं है. धर्मगुरु अगर कुछ कह देते हैं तो हमें आंख बंद कर के उस का अनुसरण नहीं करना चाहिए बल्कि अपनी आंख कान खुले रख कर के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसे पर विचार कर के उस का समर्थन करना चाहिए या फिर खुल कर विरोध करना चाहिए ताकि समाज में जागृति पैदा हो.

यही हालत समाज में है. समाज के मुखिया अगर किसी गलत चीज को बढ़ावा दे रहे हैं तो उसे रोकने का दायित्व आप का है भले ही आप अकेले क्यों न हों, अकेली आवाज क्यों न हो और इस के लिए चाहे आप को कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े.

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