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प्रेम का दायरा : भाग 1

वे नए शहर में आए हैं. निशा खुश दिख रही है. कारण एक आवासीय सोसायटी में उन्हें एक छोटा सा फ्लैट भी जल्दी मिल गया था. निशा और पीर मोहम्मद पहले दिल्ली में रहते थे, जहां पीर एक छोटे से कारखाने में पार्टटाइम अकाउंटैंट की नौकरी में था. इसी तरह वह 1-2 और दुकानों में अकाउंट्स का काम देखता था. लेकिन कोरोनाकाल में वह काफी परेशानियों से गुजरा था. पीर मोहम्मद ने भी उस दौरान व्हाट्सऐप ग्रुप बना कर कुछ जरूरतमंदों की सहायता की थी. लोगों को राशन दिलाने में भी लगा रहा, लेकिन कोरोना का दूसरा वर्ष अप्रैल माह और भी भयावह था.

वजीर ए आजम के भाषण से मुल्क में इतनी आत्मनिर्भरता फैल चुकी थी, जहां प्रत्येक व्यक्ति अपनी रक्षा स्वयं करता दिखा, जहां अपनी जान की रक्षा स्वयं के कंधों पर थी. लोगों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा था. कोरोना रोकथाम का पहले साल का लौकडाउन कम भयावह न था. सड़कों पर लोग अपने परिवार के साथ मीलों पैदल चल रह रहे थे. सांसद, विधायक, पार्षद सब नदारद दिखे थे. तब पीर मोहम्मद ने अपने मित्र पैगंबर अली से कहा था,”भाई साहब, बस स्टैंड, बिजली के खंभों, चौराहों पर जो आएदिन बड़ेबड़े फ्लैक्स लगा कर लोगों को ईद, बकरीद, दीवाली, होली, रक्षाबंधन, क्रिसमस, बुधपूर्णिमा, डा.अंबेडकर जयंती की मुबारकबाद देते थे आखिर अब वे सभी कहां चले गए? मंदिर और मसजिद के नाम पर चंदा लेने वाले नहीं दिखते, जो सुबहसुबह गलियों में मंदिर निर्माण के लिए चंदा इक्कठा करते घूमते थे? ऐसे जुझारू नेता और स्वयंसेवक सामाजिक कार्यकर्ता आखिर कहां हैं इस वक्त?”

तब पैगंबर अली ने कहा था, “भाई, लगता है, सब कोरोना वायरस से निबट गए.”

मुल्क में औक्सीजन, बैड, दवाइयों के कारण लोग मर रहे थे, जिस से श्मशान और कब्रिस्तान में लंबीलंबी लाइनें लग रही थीं. हालात यह था कि श्मशान में अधजली बौडी पड़ी रहती थीं क्योंकि लोगों के पास साधन न थे, न थीं लकड़ियां. ऐसी स्थितियां लोगों को विचलित कर देती थीं. बहुतेरे मृत शरीर गंगा नदी के रेत में दफन दिख रहे थे जिन्हें जानवर खा रहे थे. बहुत भयानक मंजर. ऐसी खबरें देख कर निशा बहुत दुखी होती थी. घबराहट होता था उस के मन में.
पीर मोहम्मद जब भी फोन उठाते कोई न कोई अप्रिय घटना उसे व्हाट्सऐप से मिल ही जाती थी. अब तो उसे अपना फोन उठाने में भी डर लगने लगा था.

अप्रैल में ही पीर मोहम्मद के बहुत करीब फादर जौय का इंतकाल हो गया था. पीर मोहम्मद को उन से एक लगाव सा था. जब पीर मोहम्मद दिल्ली में था तो फादर जौय ने उस के बच्चे के स्कूल ऐडमिशन में उस की मदद की थी. फादर जौय की कोरोना से मौत की खबर सुन कर पीर मोहम्मद बहुत रोया था.

अप्रैल तक पूरे मुल्क में करोना से 2 लाख से ज्यादा लोग मर चुके थे. मई 2022 में ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा कि भारत में कोरोना से 47 लाख लोगों की मौत हुई है.

पीर मोहम्मद निशा से कहता, “समाज कितना असंवेदनशील हो गया है, तभी तो हम इन मौतों को रुपए की गिनती से देख रहे हैं. ₹2 लाख कम हो सकते हैं, लेकिन 2 लाख लोगों का मर जाना बहुत भयावह है. इन दोनों में बहुत अंतर है. कोरोना बहुत बड़ी त्रासदी बना. इस से लड़ने में हमारा सिस्टम पूरी तरह नाकाम दिख रहा है. क्या इस सिस्टम की जवाबदेही नहीं है? इस सरकार की जवाबदेही नहीं है?

जब सरकार पूरे मुल्क में लौकडाउन लगा सकती है, तो संसाधनों की उपलब्धता क्यों नहीं कर सकती? कोरोना ने दिखाया है कि हमारी सरकार और हम लोगों की नैतिकता बिलकुल समाप्त हो चुकी है. एक सांसद जिन को 1 महीने में लगभग ₹2 लाख से अधिक वेतन मिलता है, तो आखिर किसलिए? दूसरी तरफ सत्ता आंदोलनकारियों को जेलों में ठूंस चुकी थी. सरकार तानाशाही तरीके से कोरोनाकाल में ही 3 नए कृषि कानून को ले आई थी. कोरोनाकाल में ही किसान आंदोलन में सक्रिय हो गए, क्योंकि यह उन के लिए जीने और मरने की बात थी.

भारतीय समाज से लोककल्याणकारी व्यवस्था का लगभग अंत होता सा दिखा. यह तो नवउदारवाद है जहां सरकारी नीति में पूंजीपतियों जैसी सोच हावी हो जाना. जहां सरकार कहे कि हम ने मुफ्त में कोरोना के टीके लगाए हैं.

निशा और पीर मोहम्मद के लिए यह शहर तो नया था. आसपास के घरों की कुछ महिलाओं से निशा की हायहैलो तो हो ही चुकी है जबकि समाज में एक सोशल डिस्टैंस नामक तत्त्व स्थापित हो चुका था. वैसे सामाजिक दूरियां तो पहले भी थीं पर उन में कुछ कानूनी अंकुश था. लेकिन अब तो स्वस्थ्यतौर पर लोग एकदूसरे से दूरी रख सकते हैं. यहां पीर मोहम्मद को कुछ बेहतर नौकरी मिल गई थी. बेचारे ने बड़ी मेहनत की थी, लेकिन उम्र तेजी से भागता है. उस ने तो सरकारी नौकरी प्राप्त करने की बहुत दिनों तक आशा की थी. इस नए शहर में उन्होंने अपने बेटे बबलू का ऐडमिशन वहीं के एक कौन्वेंट स्कूल में करा दिया था.

निशा यहां खुश इसलिए भी थी क्योंकि लगभग 8 वर्षों बाद उसे अपना एक फ्लैट मिला था जिसे वह अपना तो कह ही सकती थी. वैसे, वह किराए पर भी खुश थी, लेकिन अपने स्वयं के फ्लैट की बात ही अलग होती है. निशा किराए के घर को भी चमका कर रखती थी. पहले वाली मकानमालकिन कहती कि अरे, पीर मोहम्मद, तेरी बींदणी बहुत अच्छी है. साफसफाई पर ज्यादा ध्यान देती है. निशा पीर मोहम्मद के प्रति एक समर्पित और शिक्षित गृहिणी थी. शादी के 9 वर्ष होने वाले थे, लेकिन निशा के चेहरे की त्वचा आज भी 24 की ही लगती थी. अब तो उस का बेटा बबलू भी 7 वर्ष का हो चुका है.

चूंकि अब वे नए शहर में आए हैं, पीर मोहम्मद की नौकरी पहले से कुछ बेहतर जरूर थी. निशा को पार्क और पेड़पौधे बड़े प्रिय लगते. वह अकसर सोचती थी कि अपना घर होने पर बागवानी करेगी. लेकिन उस ने अपने नए फ्लैट को काफी अच्छे से सजा दिया था. अब नियमित तो नहीं, लेकिन एक रोज छोड़ कर सोसायटी से कुछ दूर एक बहुत बड़े सिटी पार्क में बबलू को ले कर जाती. बबलू खुश होता. उस को दौड़नेकूदने का एक बड़ा सा स्पेस मिल जाता था. निशा के साथ कभीकभी सोसायटी की कुछ महिलाएं भी साथ जाती थीं. लेकिन उन में एक सामाजिक दूरी रहती थी. एक तो कोरोना और दूसरा धार्मिक और जातीयता का क्योंकि एक महिला ने निशा से उस के धर्म के बारे में पूछा था, तब निशा ने कहा था हम मुसलमान हैं.

एक दूसरी मुसलिम महिला ने उस से उस की धार्मिक जाति भी पूछी, तब निशा ने उसे बताया था कि हम ‘शाह’ हैं, तब उस ने उसे कमतर दृष्टि से देखा था. निशा सोचती है कि हिंदू वर्ग में मुसलमानों के नाम से भेदभाव है. लेकिन मुसलिम समुदाय में भी क्या जाति को ले कर भेद नहीं है? निशा सोचती है कि क्या पसमांदा मुसलमान दोहरी मार के शिकार नहीं हैं?

उस दिन से सोसाइटी में और भी सोशल डिस्टैंस बढ़ गया था. वैसे, कोई न कोई महिला पार्क में घूमते जाते वक्त दिख ही जाती. कुछ का साथ न सही, दूसरी तरफ कोरोनाकाल में पार्क में भीड़ भी कम ही दिखती थी.

एक रोज निशा बबलू को ले कर पार्क गई थी. बबलू अन्य बच्चों के साथ लुकाछिपी खेलने लगा. कुछ बच्चों की मांएं आवश्यक काम होने की वजह से घर चली गईं. लेकिन बबलू घर चलने को तैयार नहीं था. वह कहता, “मम्मी, खेलो न…”

निशा ने कहा, “ठीक है, छिप जाओ.” इस तरह वह खेलने लगी.

जब निशा की दोबारा बारी आई और वह बबलू को खोजने लगी, तो पता नहीं कहां जा कर छिप गया, मिल ही नहीं रहा था.

बबलू कहां हो…बबलू…बबलू… लेकिन कहीं से कोई आवाज ही नहीं आई. शाम ढलने लगी थी. निशा ने देखा कि बगल में एक पार्क और है, जो कुछ छोटा है और जिस में बंदर, शेर, हिरन, भालू की आकृति भी बनी हुई थी. निशा सोचने लगी कि क्या पता उस के अंदर तो नहीं चला गया है. निशा ने उस छोटे पार्क में जा कर आवाज लगाई “बबलू… बबलू…” लेकिन कुछ पता नहीं.

अब उसे बहुत घबराहट होने लगी थी. सोचने लगी कि पीर मोहम्मद को फोन करूं या न करूं. पीर मोहम्मद तो काफी गुस्सा होंगे और वह रोने लगी क्योंकि पार्क भी खाली हो रहा था. वैसे ही उस में कम लोग थे. पार्क में सन्नाटा पसर रहा था जहां कुछ देर पहले कुछ शोरगुल और बच्चों की किलकारियां वातावरण में गूंज रही थीं, वहीं शाम ढलने को थी. लाइटें कुछ कुछ दूरी पर थीं. एक बड़ी ऊंची लाइट भी थी पर पार्क में सन्नाटा पसर गया था.

निशा ने सब जानवरों की आकृतियों के पास जा कर देखा, लेकिन बबलू नहीं मिला. अब वह रोने लगी. तभी पीछे से किसी आदमी ने आवाज दी कि क्या हुआ मैडम? निशा ने उसे बताया कि मैं अपने बेटे बबलू को खोज रही हूं, जो उस बड़े पार्क में खेल रहा था, मिल ही नहीं रहा है.

कठघरे में प्यार : भाग 1

“प्यार की व्याख्या हमारा समाज शुरू से ही गलत ढंग से करता आया है. प्यार में विवाह की परिणति नहीं हुई या एकदूसरे के मिलने में बाधाएं आईं या कोई और वजह रही हो, प्यार करने वालों का मिलन नहीं हो पाया तो अपनी जान दे दी. जहर खा कर मर जाने या दरिया में डूब कर मर जाने या मजनूं बन दीवाना हो जाना कोई प्यार नहीं है. प्रेमी या प्रेमिका ने प्यार में धोखा दे दिया तो जान दे दी या उस की याद में घुलघुल कर जिंदगी बिता दी. मैं इसीलिए रोमियो-जूलियट, शीरीं-फरहाद, लैला-मजनूं, हीर-रांझा के प्यार को प्यार नहीं मानता हूं. उन की गाथाओं को प्रेमकथा नाम दे पढ़ा और पढ़ाया जाता है. फेमस क्लासिक के रूप में वे बरसों से हमारे घरों, पुस्तकालयों और दुकानों में अपनी जगह बनाए हुए हैं. और तुम युवा लोग तो खासतौर पर उन्हें खूब पढ़ना पसंद करते हो और मुझे भी मजबूरी में उन्हें पढ़ाना पढ़ता है क्योंकि वे तुम्हारे कोर्स का हिस्सा हैं.” प्रो. विवेक शास्त्री बोल रहे थे और उन के स्टूडैंट्स मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुन रहे थे. उन की आवाज में एक जादू था और शब्दों का प्रस्तुतीकरण इतना सुंदर होता था कि घंटों उन्हें सुना जा सकता था और पलभर के लिए भी बोरियत महसूस नहीं होती थी.

इंग्लिश लिटरेचर के प्रो. विवेक शास्त्री स्टूडैंट्स के चहेते प्रोफैसर थे. कालेज खत्म होने के बाद शाम को कुछ स्टूडैंट्स उन के घर आ कर जमा हो जाते थे. इंग्लिश लिटरेचर पढ़ाने के साथसाथ प्रो. शास्त्री नाटक लिखते थे और खुद उस का मंचन करते थे. अकसर नाटकों की रिहर्सल उन के घर पर ही हुआ करती थी. इस समय भी नाटक की रिहर्सल करने के लिए स्टूडैंट्स का जमावाड़ा उन के घर में लगा हुआ था. पर अचानक बात रोमियो-जूलियट पर आ कर अटक गई थी. कालेज में वे आजकल शेक्सपियर के नाटक रोमियो-जूलियट को ही पढ़ा रहे थे.

40-42 साल के प्रो. विवेक शास्त्री हमेशा सफेद कुरतापाजामा पहनते थे, एकदम कलफदार. आंखों पर काले फ्रेम का मोटा चश्मा, कंधे पर झूलता जूट का बैग और पैरों में कोल्हापुरी चप्पल…एकदम सादा पहनावा…इंग्लिश लिटरेचर के प्रोफैसर के बजाय वे हिंदी के किसी साहित्यकार की तरह लगते थे. लेकिन वे अपनी ही दुनिया में मस्त रहने वाले और पौजिटिव सोच के साथ चलने वालों में से थे. प्रो. शास्त्री दुनिया की बातों से परे और अपनी आइडियोलौजी को शिद्दत से फौलो करने वालों में से थे.

उन के हुलिए और सादगी पर अकसर उन की पत्नी रीतिका उन्हें छेड़ा करती थी, ‘इंग्लिश लिटरेचर पढ़ाने वाला तो कोई मौडर्न और स्टाइलिश व्यक्ति होना चाहिए. तुम तो झोलाटाइप महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद की कविताओं को पढ़ाने वाले बोर से दिखने वाले प्रोफैसर लगते हो. निराला की ‘मैं पत्थर तोड़ती’ कविता अगर तुम पढ़ाओ तो वह तुम्हारी पर्सनैलिटी के साथ ज्यादा सूट करेगी. कहां तुम शेक्सपियर, जौन मिल्टन, जौर्ज इलियट पढ़ा रहे हो…’

प्रो. शास्त्री तब ठहाका लगाते, अपने कुरते की बांह की सिलवटें ठीक करते हुए रीतिका के गालों को सहलाने के साथ महादेवी वर्मा की कविता का अंश सुना देते, ‘तारक-लोचन से सींच सींच नभ करता रज को विरज आज, बरसाता पथ में हरसिंगार केशर से चर्चित सुमन-लाज;

कंटकित रसालों पर उठता है पागल पिक मुझ को पुकार! लहराती आती मधु बयार !!

‘तुम हो न मेरी महादेवी…घर में एक ही इंसान कवि हो, वही ठीक है, वरना ‘मैं नीर भरी दुख बदली…’ का कोरस चलता रहता हमारा.’

रीतिका के गाल तब आरक्त हो जाते. वह कविता लिखने का शौक रखती थी और प्रो. शास्त्री उसे अपनी प्रेरणा मानते थे. रीतिका ने एमए हिंदी औनर्स में किया था, पर प्रो.शास्त्री के बहुत कहने पर भी वह कभी नौकरी करने को तैयार नहीं हुई. घर के काम करना और तरहतरह की डिशेज बनाना उस का शौक था. खुशमिजाज, सांवले रंग वाली रीतिका बहुत ही नफासत से साड़ी पहनती थी. कौटन की साड़ी, गोल चेहरे वाले माथे पर लाल गोल बड़ी सी बिदी, कानों में लटकते झुमके और हाथों में दोदो सोने की चूड़ियां…हमेशा सलीके से रहती थी वह.

प्रो. शास्त्री के स्टूडैंट्स अपनी रीतिका दीदी को रोल मौडल की तरह देखते थे. उस के हाथ के बने व्यंजन खाने के लिए वे कभीकभी यों भी उन के घर चले आते थे. फूलों से झरती मुसकान के साथ वह बिना झुंझलाए हमेशा उन का स्वागत करती और उन की फरमाइशें पूरी करती. उन का अपना कोई बच्चा नहीं था, इसलिए इन स्टूडैंट्स को अपने बच्चे मानते.

स्टूडैंट्स उन दोनों को परफैक्ट कपल कहा करते थे और दोनों थे भी परफैक्ट कपल…मेड फौर इच अदर.

“सर, अगर रोमियो-जूलियट का प्यार, प्यार नहीं था या आप उसे प्रेम नहीं मानते तो वे अमरप्रेम के दायरे में कैसे आते हैं? लोग उन की मिसाल क्यों देते हैं? क्यों हमें उन्हें पढ़ना पढ़ता है? लंबे समय से प्यार करने वाले उन्हें अपना आइडियल मान प्यार में नाकाम हो जाने पर जान दे रहे हैं,” वैभव ने पूछा. लंबे कद का वैभव अत्यधिक सैंसिटिव व गंभीर प्रकृति का लड़का था. पढ़ना उस का ध्येय था और वह एक बेहतरीन अभिनेता बनना चाहता था. उस के अभिनय का लोहा प्रो. शास्त्री भी मानते थे, इसलिए उन के द्वारा मंचित हर नाटक में उस की अहम भूमिका होती थी. खादी का कुरता और जींस उस की स्टाइल स्टेटमैंट थी. एक कान में बाली भी पहनता था. मिडिल क्लास फैमिली का था और हर चीज को बहुत सीरियसली लेता था, खासकर प्रोफैसर की बातों के तो मर्म तक पहुंचना चाहता था. इसलिए कोई और सवाल करे न करे, वह जरूर करता था.

उस के सवाल का जवाब देते हुए प्रो. शास्त्री बोले, “प्यार का मतलब होता है अपने जीवन की सारी समस्याओं, सारी परेशानियों और दुख में एकदूसरे का साथ देना, एकदूसरे की गलतियों को माफ करना, उसे सपोर्ट करना और सहयोग देना. कभी कोई भूल हो जाए तो उसे नजरअंदाज कर देना. आखिर जीवन उसी के साथ तो काटना है.” प्रो. शास्त्री ने भावपूर्ण नजरों से रीतिका की ओर देखा तो उस के गाल आरक्त हो गए. होंठों से झरती मुसकान का उजास उस के चेहरे पर फैल गया.

“प्यार को हमेशा जताते रहना, प्यार के कसीदे पढ़ते रहना या जान दे देना…यह प्यार नहीं, बल्कि बाहरी प्रक्रियाएं हैं. आंतरिक अनुभूति शब्दों से व्यक्त नहीं होती, वह भावों से प्रकट होती है; साथी के प्रति विश्वास से प्रकट होती है. प्यार नहीं मिला या बेवफा निकला या उस से कोई गलती हो गई तो उस पर जान दे दी या उस की जान ले ली…तो प्यार बचा कहां…” पलभर के लिए चुप हो कर उन्होंने सब की ओर एक दृष्टि डाली, फिर वैभव के कंधे को थपथपाते हुए पूछा, “समझ में आया कुछ तुम लोगों को?”

“कुछ आया कुछ नहीं आया,” अंजुम ने अपना सिर खुजलाते हुए बहुत ही मासूमियत से कहा तो उस की शक्ल देख सब को हंसी आ गई.

पहलापहला प्यार : भाग 1

“यह लो, आ गए हम दूरदूर तक अपने अस्तित्व का विस्तार किए, तुम्हारे सपनों के समंदर के पास. देखो न, सुमित, संगमरमर सी सफेद फेन वाली कलकल बहती लहरें मानों आसमान की ऊंचाईयों को भी छू लेने को व्याकुल हैं,’’ मुंबई के जुहू बीच पर उल्लास से सराबोर बिलकुल छोटे बच्चों की तरह सुमी अपने दोनों हाथों को फैला कर जोरजोर से सागर की लहरों की असीमित ऊंचाइयों और सौंदर्य का बखान कर रही थी.

‘’आज मानों मेरा बरसों का सपना सच हो गया, सुमी. बचपन में जब भी समुद्र के बारे में पढ़ा करता था तो हमेशा सोचता था कि बड़े हो कर मैं भी एक दिन समुद्र देखूंगा, मगर…” कहतेकहते सुमित रुक से गए.

‘’सुमित, भविष्य में नहीं, वर्तमान में जिओ और इस पल को मेरे साथ ऐंजौय करो. चलो, हम किनारे पर चल कर समुद्र की लहरों से अठखेलियां करते हैं.”

“अठखेलियां और मैं…क्यों मजाक कर रही हो सुमी. इस उम्र में यहां तक आ गया हूं, यह क्या कम है. मैं यहीं बैठा हूं तुम जाओ,” सुमित ने सुमी को प्यार से थपथपाते हुए कहा.

“मैं हमेशा तुम्हें कहती हूं कि उम्र सिर्फ एक नंबर होता है. इंसान अपनी सोच से बूढ़ा होता है, शरीर और दिमाग से नहीं, इसलिए चुपचाप चलो हम भी लहरों के साथ मस्ती करते हैं. समुद्र को देखना, महसूस करना हमेशा से ही तुम्हारा सपना था, तुम मेरे साथ आगे चलो,” और फिर सुमी जबरदस्ती सुमित को अपने साथ लहरों के बीच में ले ही आई थी…लहरें कभी अपने तीव्र प्रवाह से उन्हें आगे धकेल देतीं और कभी पीछे पर वे दोनों एकदूसरे का हाथ थामे समुद्र का भरपूर आनंद ले रहे थे.

कुछ देर बाद दोनों किनारे आ कर गीली रेत पर बैठ गए. सुमी ने आहिस्ता से सुमित के कंधे पर सिर टिका दिया.

“कहां खो गईं सुमी, मुझे आज में रहने का ज्ञान दे कर,” सुमी को एकदम शांत देख कर सुमित ने कहा.

“कुछ नहीं सोच रही थी. अगर शमाजी ने उस दिन तुम से मिलवाया न होता तो मेरी जिंदगी का रूप ही कुछ और होता.”

“तुम्हारा तो ठीक है पर मेरा… मेरा क्या होता…शायद अब तक जिंदा ही न बचता और बचता भी तो न जाने किस हाल में, किस की दया पर…पर हां, तुम्हारे उस एक निर्णय ने मेरी जिंदगी तो बदल ही दी,” सुमित ने सुमी का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा.

“ऐसा न कहो, सुमित. केवल तुम्हारी ही नहीं बल्कि मेरी भी जिंदगी कैसी होती मुझे भी नहीं पता. मुझे तो लगता है कि मुझे तुम्हारे लिए ही बनाया गया है. हां, मैं तो वैसे भी सारे जमाने से लड़ कर तुम्हें पाई हूं और अब मैं तुम्हें अपने से दूर नहीं जाने दूंगी, चाहे जो भी तकलीफ आए,” सुमी ने मजबूती से सुमित का हाथ अपनी दोनों हथेलियों में दबा लिया.

उम्र के दूसरे पड़ाव की दहलीज पर खड़े, कुछ दिनों पूर्व ही अपनी इकलौती बेटी के हाथ पीले कर चुके सुमी और सुमित की प्यार और समर्पण से भरी इन रोमांटिक बातों के साक्षी थे गोधूलि बेला. सागर की लहरें, जुहू बीच की बेशुमार भीड़ और सुमी सुमित की ही भांति उम्र की ढलान की ओर जाता सूरज. अस्त होते सूर्य के प्रतिबिंब को समुद्र की लहरों पर अपलक देखती सुमी का मन सालों पीछे पहुंच गया, जब वह अंगरेजी भाषा से स्नातकोत्तर कर रही थी और आगे चल कर एमफिल कर कालिज में प्रोफैसर बनना चाहती थी.

उस की मेहनत रंग लाई. पीएचडी कर शीघ्र ही एक कालेज में प्रोफैसर भी बन गई. जौब लगने के साथसाथ अब मातापिता को उस के विवाह की चिंता होने लगी. खूब कुंडलियां मिलाई गईं और अपनी ही जाति के रीतिरिवाजों के बाद एक दिन वह प्रशांत की दुलहन बन कर दिल्ली आ गई.

प्रशांत, उस के पापा की दूर की मौसी के रिश्तेदार थे इसलिए मातापिता आश्वस्त थे कि उन की बेटी पति के साथ पूरी तरह सुखी रहेगी. प्रशांत एक बैंक में प्रोबैशनरी औफिसर थे. चूंकि प्रशांत और उस की पोस्टिंग दिल्ली में ही थी इसलिए दोनों को एक ही जगह रहने में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं आई. शादी के शुरुआती दिन रोमांस से भरे और मौजमस्ती से कटे पर धीरेधीरे प्रशांत का स्वभाव उसे परेशान करने लगा.

शाम को जब वह कालेज से आती तो प्रशांत को उस के दिन के बारे में पूरी जानकारी चाहिए होती थी, मसलन आज क्या किया, किस से मिली और किस ने क्या कहा? शुरू में उस ने इन सब को बहुत ही हलका लिया पर एक दिन जब उस के कालेज में एक प्रोग्राम था और उसे आने में 8 बज गए, तो उस दिन जैसे ही वह घर में घुसी, प्रशांत व्यंग्य से बोला,” कौन सा कालेज है मैडम, जो रात के 8 बजे तक चलता है?”

“अरे प्रशांत, तुम भूल गए, मैं ने तुम्हें बताया तो था कि हमारे कालेज में ऐनुअल प्रोग्राम है,” उस ने बड़ी ही सहजता से उत्तर दिया.

टीनऐजर्स लव : भाग 1

‘‘आसमानी ड्रैस में बड़ी सुंदर लग रही हो, अस्मिता. बस, एक काम करो जुल्फों को थोड़ा ढीला कर लो.’’ अस्मिता कोचिंग क्लास की अंतिम बैंच पर खाली बैठी नोट बुक में कुछ लिख रही थी कि समर ने यह कह कर उन की तंद्रा तोड़ी. यह कह कर वह जल्दी ही अपनी बैंच पर जा कर बैठ गया और पीछे मुड़ कर मुसकराने लगा. किशोर हृदय में प्रेम का पुष्पपल्लवित होने लगा और दिल बगिया की कलियां महकने लगीं. भीतर से प्रणयसोता बहता चलता गया. उस ने आंखों में वह सबकुछ कह दिया था जो अब तक पढ़ी किताबें ही कह पाईं.

अस्मिता इंतजार करने लगी कि ब्रैक हो, समर बाहर आए और मैं उस से कुछ कहूं. आधे घंटे का समय एक सदी के बराबर लग रहा था. ‘क्या कहूंगी? शुरुआत कैसे करूंगी? जवाब क्या आएगा,’ ये सब प्रश्न अस्मिता को बेचैन किए जा रहे थे. कुछ बनाती, फिर मिटाती. मन ही मन कितने ही सवाल तैयार करती, जो उसे पूछने थे और फिर कैंसिल कर देती कि नहीं, कुछ और पूछती हूं. घंटी की आवाज अस्मिता के कानों में पड़ी. जैसे मां की तुतलाती बोली सुन कर कोई बच्चा दौड़ आता है, वह तत्क्षण क्लासरूम से बाहर आ गई. सोच रही थी कि वह अकेला आएगा. मगर हुआ इच्छा और आशा के प्रतिकूल. वह अपने दोस्तों से बतियाते हुए क्लासरूम से बाहर निकला. समर दोस्तों की टोली में बैठा गपें मार रहा था और चोर नजरों से उसे अकेला देखने की कोशिश भी कर रहा था. घर जाने का समय हो रहा था और आशाइच्छा धूमिल हो रही थी.

कहते हैं न, जब सब रास्ते बंद हो जाते हैं, तब कोई न कोई रास्ता अवश्य निकलता है. अस्मिता किसी काम से अकेली क्लास में आई और समर इसी ताक में था. अस्मिता के पास मात्र 2 मिनट का समय था और कहने को ढेर सारी बातें. उस ने समर के पास आने पर कहा, ‘‘तुम भी न, बहुत स्मार्ट हो.’’ समर ने थैंक्स कहते हुए अस्मिता की हथेली के पृष्ठ भाग पर अपने हाथ से स्पर्श किया. फिर धीरेधीरे उस की पांचों उंगलियां अस्मिता की उंगलियों में समा चुकी थीं. यह थी अस्मिता के जीवन की प्रथम प्रणय गीतिका. जीवन का मृदुल वसंत प्रारंभ हो चुका था. उन दोनों ने एकदूसरे को जी भर कर देखा.

तभी अस्मिता की कुछ सहेलियां क्लासरूम में आ गईं. प्रेममयी क्षणों के चलते दोनों को न ध्यान रहा, न कोई भान. वे उन दोनों की यह हरकत देख कर मुसकराईं और बाहर चली गईं. स्कूल की छुट्टी हुई. अस्मिता घर आ गई. रातभर सो नहीं पाई, करवटें बदलती रही. कब सुबह हो गई, पता ही न चला. सुबह फिर तैयार हो, स्कूल चली गई. उस दिन समर भी जल्दी आ गया था. अस्मिता ने ध्यान से समर की तरफ देखा. समर ने स्कूलबैग क्रौस बैल्ट वाला डाला हुआ था, जोकि किसी बदमाश बच्चे की भांति इधरउधर हो रहा था. ‘‘हैलो,’’ समर ने अन्य लोगों की नजर से बचते हुए अस्मिता से कहा.

‘‘हाय समर, कैसे हो?’’ उस ने जवाब के साथ ही समर से प्रश्न किया. ‘‘मैं ठीक हूं और तुम से कुछ कहना चाहता हूं. क्या कह सकता हूं?’’

‘‘बिलकुल,’’ अस्मिता समर से मन ही मन प्यार करने लगी थी. कच्ची उम्र में ही उस ने समर को अपना सबकुछ मान लिया था. ‘‘क्या तुम्हारा मोबाइल नंबर मिल सकता है?’’ समर ने संकोच करते हुए कहा.

‘‘ओह हां, अच्छा, तो क्या करोगे नंबर का?’’ अस्मिता ने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा. ‘‘मुझे तुम से कुछ कहना है,’’ समर ने कहा.

‘‘ओके, लिखो…97….’’ अस्मिता ने नंबर दे दिया. ‘‘थैंक्स.’’

जनता भूखी मगर देश अमीर, गवाही देता हंगर इंडैक्स

ग्लोबल हंगर इंडैक्स 2023 की रिपोर्ट में भारत 4 अंक नीचे खिसक गया है. इस रिपोर्ट में कुल 125 देशों को शामिल किया गया. 2022 में भारत 107वें स्थान पर था. 2023 में भारत 111 वें स्थान पर पहुंच गया है. ग्लोबल हंगर इंडैक्स तैयार करने का काम यूरोपीय एनजीओ का समूह करता है. इसे अलायंस 2015 के नाम से जानते हैं. इस में आयरलैंड की संस्था कंसर्न वर्ल्ड वाइड और जर्मनी की संस्था वेल्ट हंगर लाइफ मुख्य भूमिका में हैं. यह रिपोर्ट अब तक कुल 16 बार जारी की जा चुकी है.

इस की शुरुआत साल 2000 में हुई थी. इस रिपोर्ट के जरिए वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भूखमरी का पता लगाने का काम होता है. इस को अलगअलग पैमानों के जरिए देखा जाता है. इस में कुपोषण को मुख्यरूप से देखा जाता है. इस में देखा जाता है कि किसी देश की आबादी के कितने हिस्से को उतना भोजन नहीं मिल पा रहा है, जो स्वस्थ रहने के लिए शरीर की जरूरत है. इसे मापने का आधार कैलोरी तय है.

चाइल्ड वेस्टिंग एवं चाइल्ड स्टनटिंग इस पैरामीटर को 5 साल के बच्चों पर लागू किया जाता है. उम्र के हिसाब से बच्चे दुबले या कमजोर हैं, जिन का वजन उम्र एवं लंबाई के हिसाब से बहुत कम है और बाल मृत्युदर क्या है ? यह देखा जाता है. बाल मृत्युदर यानि 5 साल से कम उम्र के कितने बच्चों की असमय मौत हुई है.

यह रिपोर्ट व्यापक स्तर पर छानबीन करती है. इस में बच्चों के साथ ही साथ महिलाओं के स्वास्थ्य को भी देखा जाता है. भारत में महिलाओं की एक बड़ी आबादी एनीमिया यानी खून की कमी की शिकार है.

इंडैक्स रिपोर्ट के अनुसार 15 से 24 साल की लड़कियों में एनीमिया की दर 58.1 फीसदी है. इस का सीधा असर नवजात बच्चों पर पड़ता है. अगर मां कमजोर होगी तो तय है कि बच्चा भी कमजोर होगा. मां की उम्र कम होगी यानी किशोर उम्र में शादी होने पर भी बच्चे कमजोर ही पैदा होते हैं.

ग्लोबल इंडैक्स बनाने के लिए कुल 100 नंबर तय किए गए हैं. इस का मतलब यह है कि 0-100 नंबर के बीच ही नंबर मिलेंगे. इस बार की रिपोर्ट में 125 देश शामिल किए गए है. स्कोर कम होना बेहतर स्थिति का संकेतक है और ज्यादा होना खराब हालात को दर्शाता है. साल 2023 की रिपोर्ट में भारत का स्कोर 28.7 है. खास बात यह है कि इस इंडैक्स में भारत लगातार कई सालों से पिछड़ता नजर आ रहा है.
भारत की रैंक 2021 में 101, 2022 में 107 और 2023 में 111 है. परेशानी की बात यह है कि भारत से अपेक्षाकृत गरीब देश श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल जैसे अपेक्षाकृत गरीब देश भी इंडैक्स में भारत से आगे हैं.

भारत सरकार इस रिपोर्ट को गलत बताती है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत की बड़ी आबादी, अमीर गरीब के बीच में बढ़ती खाई, ग्रामीण इलाकों में शिक्षा का अभाव, बाल विवाह, नतीजा कम उम्र में बच्चे आज भी चुनौती हैं. केंद्र सरकार कोरोना के बाद से ही करीब 81 करोड़ के अधिक लोगों को मुफ्त राशन दे रही है. अगले 5 साल के लिए इस योजना को आगे बढ़ा दिया गया है. देश की 140 करोड़ आबादी में से 81 करोड़ भूखे हो तो हंगर इंडैक्स को गलत कैसे माना जा सकता है.

गरीब जनता पर देश अमीर

भले ही भारत की 81 करोड़ जनता को मुफ्त राशन की जरूरत पड़ रही हो पर देश पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है. इस का मतलब यह है कि देश की पूंजी कुछ कारोबारी घरानों तक ही सीमित होती जा रही है, जिस से एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ रहा है, दूसरी तरफ सरकार को 81 करोड़ लोगों के लिए मुफ्त राशन की व्यवस्था करनी पड़ रही है.

जी-20 समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत मंडपम में अपने भाषण में इस बात पर जोर दिया कि 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं. एस एंड पी के नवीनतम पीएमआई आंकड़ों के अनुसार भारत 2030 तक दुनिया की तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. एस एंड पी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजैंस के अनुसार 2021 और 2022 में भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि कैलेंडर वर्ष 2023 में भी जारी रह सकती है.

आज के दौर में भारत टौप 5 अर्थव्यवस्था वाले देश की लिस्ट में पांचवे स्थान पर है. एस एंड पी ग्लोबल के मुताबिक 2030 तक 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डौलर की जीडीपी के साथ भारत, जापान को पछाड़ कर दुनिया की तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में बढ़ रहा है. एस एंड पी का अनुमान है कि साल 2030 तक भारत की जीडीपी जर्मनी से भी आगे निकल सकती है. पिछले साल ही भारत, ब्रिटेन को पछाड़ दुनिया की पांचवी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बना था.

आज अमेरिका 25.5 ट्रिलियन अमेरिकी डौलर की जीडीपी के साथ दुनिया की सब से बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है. दूसरे स्थान पर चीन है जो जिस की जीडीपी 18 ट्रिलियन अमेरिकी डौलर है. 4.2 ट्रिलियन अमेरिकी डौलर के साथ जापान तीसरे स्थान पर है. इस के बाद 4 ट्रिलियन अमेरिकी डौलर के साथ जर्मनी चैथा देश है. पांचवे नंबर पर भारत आता है. एक तरफ देश अमीर दिख रहा दूसरी तरफ जनता गरीब है. इस के लिए सारी सोच और नीतियां जिम्मेदार है.

2024 के लिए बढ़ी मुफ्त राशन की योजना

लोकतंत्र में सरकार चलाने के लिए वोट की जरूरत होती है. वोट तभी मिलता है जब जनता यह समझती है कि सरकार उस के लिए कुछ कर रही है. यही वजह है कि चुनाव के समय मुफ्त वाली योजनाओं की संख्या बढ़ जाती है.

सरकार चाहती है कि अमीरों से टैक्स ले, चुनावी चंदा ले उसे ज्यादा से ज्यादा जनता को दे और बदले में वोट ले कर सत्ता पर कब्जा करे. इस नीति के चलते ही देश भले अमीर दिख रहा हो पर जनता गरीब है और भुखमरी में जी रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुये मोदी सरकार ने मुफ्त राशन की योजना को आगे बढ़ा दिया है. अब यह योजना 2029 तक जारी रहेगी.

2014 में जब लोकसभा चुनाव हो रहे थे नरेंद्र मोदी ने देश से वादा किया था कि कालेधन की वापसी होगी उस से इतना पैसा आएगा कि हर भारतीय के हिस्से में 15-15 लाख रूपए आ जाएंगे. वादा तो 15 लाख का था और जब जनता ने वोट दे दिया तो उस के हिस्से में हर माह 5 किलो राशन ही आ रहे हैं. हर किसान को साल भर के लिए 6 हजार रूपये देने पड़ रहे हैं. 81 करोड़ से अधिक को खाने की परेशानी को देखते हुए 5 किलो मुफ्त राशन देना पड़ रहा है.

किसानों से सरकार का वादा था कि 2022 तक उन की आय दोगुनी हो जाएगी. अगर आय दोगुनी हो गई होती तो किसान सम्मान निधि के पैसे क्यों देने पड़ रहे हैं. 81 करोड़ मुफ्त राशन पाने वालों में सब से बड़ी संख्या खेतिहरों की है. इस का अर्थ है कि देश के अन्नदाता की यह हालत है कि उसे खाने के लिये 5 किलो मुफ्त राशन की जरूरत है फिर किस के लिए हम विश्व की 5वीं सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बने हैं. इस नजरिए से देखें तो हंगर इंडैक्स के आंकड़े सही हैं.

भारी पड़ेगी मुफ्त की रेवड़ी

चुनाव जीतने अमीरों से पैसे की वसूली और गरीबों को मुफ्त की रेवड़ी देने की योजना भारी पड़ेगी. 2004 में कांग्रेस की यूपीए सरकार भी इसका शिकार हो चुकी है. रोजगार गांरटी कानून के तहत मनरेगा को चलाया गया. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने के लिए इस के बजट में कटौती की गई. जिस का प्रभाव 2014 के लोकसभा चुनाव के समय देखने को मिला. मुफ्त की रेवड़ी पा रहे लोगों को लगा कि अगर आगे कांग्रेस जीती तो मनरेगा बंद कर देगी जिस से लोगों का मोह मनरेगा से भंग हो गया और कांग्रेस चुनाव हार गई.

भाजपा ने इस बात को समझा और जनता के कल्याण के नाम पर मुफ्त की रेवड़ी वाली योजनाएं शुरू की. 2019 में कोविड ने मौका दिया और मुफ्त राशन की योजना शुरू हो गई. जिस का प्रभाव यह हुआ कि 2022 में भाजपा उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनाव जीतने में सफल हो गई.

इस योजना को पहले 2 साल के लिए शुरू किया था. इस के बाद फिर 2 साल के लिए बढ़ाया. अब सीधे 5 साल के लिये बढ़ा दिया है. जिस से जनता को यह न लगे कि 2024 के चुनाव जीतने के बाद इस को खत्म किया जा सकता है.

मुफ्त की योजना जनता को हमेशा लुभाती रही है. समाजवादी पार्टी ने 2012 में मुफ्त लैपटौप और टेबलेट के सहारे चुनाव जीता. दक्षिण भारत में जयललिता की ‘अम्मा कैंटीन’ बहुत मशहूर रही है. दिल्ली में आप पार्टी ने मुफ्त बिजली और पानी दे कर सरकार बना ली. तेलंगाना में मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने तमाम इस तरह की योजनाएं चला रखी है. इन में ‘रायथु बंधू’ प्रमुख है जो मोदी के किसान सम्मान निधि जैसी योजना है. राजस्थान सरकार भी इंदिरा कैंटीन जैसी योजनाएं चला रखी है.

मुफ्त की योजना पर रिजर्व बैंक से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक अपनी टिप्पणी कर चुकी है. इस के बाद भी नेता मानने को तैयार नहीं है. इस का प्रभाव देश के आर्थिक स्तर पर पड़ रहा है. देश में अमीर और गरीब के बीच की खांई चौड़ी होती जा रही है.

देश अमीर हो रहा है और जनता गरीब होती जा रही है. जिस देश में अमीर और गरीब में बहुत अंतर होता है वह कभी खुशहाल नहीं होता. वहां अपराध बढ़ते हैं. हिंसा होती है. इस तरह से सब का साथ सब का विकास नहीं हो सकता. ऐसे में केवल कारोबारी घराने तरक्की करते हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कारोबारी घरानों के साथ साठगांठ के आरोप इन्ही कारणो से सच लगते हैं.

सिख अलगाववादियों की हत्या पर कनाडा के बाद अमेरिका का अभियोग

अमेरिका के न्याय विभाग ने 52 साल के एक भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता पर खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया है. अमेरिका ने दावा किया है कि निखिल गुप्ता उर्फ निक भारतीय खुफिया एजेंसी के एक अधिकारी के इशारे पर काम कर रहा था और यही व्यक्ति कनाडा में हरदीप सिंह निज्जर की ह्त्या के प्लान में भी शामिल था.

दावा किया गया है कि निखिल गुप्ता पर गुजरात में एक आपराधिक मामला चल रहा है जिस में मदद के बदले वह एक भारतीय ख़ुफ़िया अधिकारी के कहने पर कनाडा में निज्जर और न्यूयौर्क में एक अलगाववादी नेता की हत्या करवाने के लिए तैयार हुआ था. (अभियोग में अधिवक्ता और सिख अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू का नाम नहीं लिया गया है मगर इशारा उसी की तरफ है.)

अभियोग में कहा गया है कि 12 मई को निखिल गुप्ता को बताया गया कि उन के खिलाफ गुजरात में चल रहे आपराधिक मामले को देख लिया गया है. उस से कहा गया कि गुजरात पुलिस की तरफ से अब उसे कोई कौल नहीं आएगा. भारतीय खुफिया अधिकारी ने निखिल गुप्ता की एक डीसीपी से भी मुलाकात की व्यवस्था की ताकि वह आश्वस्त हो जाए. अधिकारी से भरोसा मिलने के बाद गुप्ता ने न्यूयौर्क में पन्नू की हत्या करवाने की योजना को आगे बढ़ाया.

अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने निखिल गुप्ता और उस अज्ञात भारतीय खुफिया अधिकारी के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर लिया है. उल्लेखनीय है कि निखिल गुप्ता को 30 जून को चेक रिपब्लिक में अरेस्ट कर लिया गया था. अभियोग के मुताबिक निखिल गुप्ता ने 30 जून को भारत से चेक गणराज्य की यात्रा की और इसी दिन चेक पुलिस ने अमेरिका के आग्रह पर उसे गिरफ्तार कर लिया. अब उस को जल्दी ही अमेरिका प्रत्यर्पित किया जाएगा. जो आरोप उस पर लगे हैं, उन के तहत गुप्ता को 20 साल तक की सजा हो सकती है.

न्यूयौर्क में अमेरिकी वकील डेमियन विलियम्स ने बयान जारी करते हुए कहा है कि आरोपी ने एक भारतीय खुफिया अधिकारी के इशारे पर न्यूयौर्क शहर में भारतीय मूल के एक अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश रची, जो सार्वजनिक रूप से सिखों के लिए एक अलग देश बनाने की वकालत करता है. अज्ञात भारतीय खुफिया अधिकारी, जिसे सीसी-1 का नाम दिया गया है, को यह पता था कि निखिल गुप्ता नशीले पदार्थों और हथियारों की अंतर्राष्ट्रीय तस्करी करता है और उस के खिलाफ गुजरात में एक आपराधिक मामला भी चल रहा है, जिस को ले कर वह परेशान है. गुप्ता की कमजोरी पकड़ कर उस को इस काम के लिए तैयार किया गया.

कौन है गुरपतवंत सिंह पन्नू’

गुरपतवंत सिंह पन्नू, जिसे अमेरिकी मीडिया ने लक्षित लक्ष्य के रूप में पहचाना है, वह सिख अलगाववादी खालिस्तान आंदोलन का एक प्रमुख सदस्य है और पंजाब को भारत से अलग करने की वकालत करता है. भारत में वह एक नामित आतंकवादी है. भारतीय खुफिया अधिकारी सीसी – 1 ने निखिल गुप्ता को लक्ष्य के बारे में जून 2023 में विस्तृत व्यक्तिगत जानकारी दी थी.

पन्नू का न्यूयौर्क शहर में घर का पता, फोन नंबर और उस के दैनिक आचरण की विस्तृत जानकारी गुप्ता को भेजी गई थी. ये जानकारी निखिल गुप्ता ने सुपारी किलर को भेजी, जिसे उस ने इस काम के लिए हायर किया था. हालांकि जिसे वह सुपारी किलर समझ रहा था वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी का अंडरकवर एजेंट था जो इस साजिश के बारे में अमेरिकी पुलिस को लगातार अपडेट कर रहा था.

भारत और अमेरिका के बीच वार्ता

अमेरिका का आरोप है कि निखिल गुप्ता और भारतीय अधिकारी सीसी – 1 के बीच इलेक्ट्रौनिक कम्युनिकेशन के जरिए वार्ता हो रही थी. इस के अलावा दिल्ली में दोनों ने मुलाकात भी की थी. तमाम गतिविधियों की जानकारी होने के चलते ही अमेरिका ने न्यूयौर्क में पन्नू की हत्या की साजिश को विफल किया.

गौरतलब है कि पन्नू ने सार्वजनिक रूप से अलग खालिस्तान देश बनाने की अपील की है. हाल ही में उस ने एयर इंडिया की फ्लाइट को भी बम से उड़ाने की धमकी दी थी.

अमेरिका ने आरोप लगाया है कि कनाडा में हुई हरदीप निज्जर की हत्या में भी भारत सरकार का हाथ है. अमेरिकी दस्तावेज में कहा गया है कि 18 जून, 2023 को नकाबपोश बंदूकधारियों ने कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में एक सिख मंदिर के बाहर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की.

निज्जर के चलते भारतकनाडा रिश्तों में खटास

निज्जर सिख अलगाववादी आंदोलन का नेता और पन्नू का करीबी सहयोगी था. वह भारत सरकार का मुखर आलोचक था. उस की हत्या के कुछ ही घंटों बाद सीसी-1 ने निखिल गुप्ता से एक वीडियो क्लिप शेयर किया जिस में निज्जर का खून से लथपथ शरीर उस के वाहन में गिरा हुआ दिखाया गया था. इस वीडियो को देखने के बाद निखिल गुप्ता ने अपने हायर किए गए किलर को फोन कर के कहा कि हरी झंडी मिल गई है.

कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का कहना है कि भारत को हमारे आरोपों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है. ट्रूडो ने कहा, “अब अमेरिका का भी आरोप है कि भारत सरकार के एक अधिकारी ने अमेरिकी धरती पर एक खालिस्तानी नेता की हत्या की साजिश रची. उस ने निखिल को हायर किया और निखिल ने जिसे सुपारी किलर समझ कर ह्त्या का जिम्मा सौंपा और उस के लिए बड़ा पेमेंट किया वह अमेरिकी खुफिया का अंडरकवर एजेंट है.”

निखिल गुप्ता ने पन्नू की हत्या के लिए किलर को एक लाख डौलर देने की बात कही थी. अमेरिका का दवा है कि उस में से 15 हजार डौलर का एडवांस पेमेंट उस ने 9 जून 2023 को कर दिया था. अमेरिकी खुफिया एजेंट, जिसे निखिल सुपारी किलर समझता था, ने निखिल गुप्ता की सभी गतिविधियों और बातचीत को रिकौर्ड किया, जिस के आधार पर ही उस के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया और उस की गिरफ़्तारी हुई.

गौरतलब है कि कनाडा की सुरक्षा एजेंसियां भारत सरकार और कनाडा के नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बीच की कड़ी की सक्रियता से जांच कर रही हैं. ट्रूडो का कहना है कि कनाडा की धरती पर कनाडा के नागरिक की हत्या में किसी विदेशी सरकार की संलिप्तता बर्दाश्त नहीं की जाएगी. यह हमारी संप्रभुता का उल्लंघन है और पूरी तरह से अस्वीकार्य है.

प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू

हालांकि पहले भारत ने कनाडा के आरोपों को खारिज करते हुए सख्त रुख अख्तियार किया था, लेकिन अब अमेरिका के सामने वह इस तरह का रवैया नहीं अपना सकता, वो भी तब जब अमेरिका ने हत्या की इस साजिश को ले कर भारत को पहले ही चेताया हो? यही वजह है कि भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने बयान जारी कर कहा है कि भारत इन आरोपों को गंभीरता से ले रहा है.

बागची ने कहा है, “हम पहले ही बता चुके हैं कि अमेरिका के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग पर वार्ता के दौरान, अमेरिकी पक्ष ने कुछ इनपुट साझा किए थे जो संगठित अपराधियों, आतंकवादियों, हथियारों के कारोबारियों और अन्य के नेक्सस के बारे में थे. भारत ने इस मुद्दे की जांच के लिए विशेष जांच समिति गठित की है जो भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और आंतरिक सुरक्षा के लिए किसी भी प्रभाव को संबोधित करने के उस के संकल्प का प्रदर्शन करता है.”

हत्या की साजिश के अभियोग की खबर के बाद भारत और अमेरिका के बीच प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो चुका है. पश्चिमी देशों में सिख अलगाववाद की बढ़ती सोच भारत के लिए अहम मुद्दा है. हाल के महीनों में भारत ने कई मंचों पर सिख अलगाववाद के मुद्दे को उठाया है.

नई दिल्ली में अमेरिका और भारत के मंत्री स्तर की हालिया बैठक में भारत ने अमेरिका के समक्ष सिख अलगाववाद का मुद्दा रखा तो नवंबर में ही आस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान भी बढ़ते सिख चरमपंथ का मुद्दा उठाया गया. लेकिन पश्चिमी देश जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हैं, उन के लिए सिख अलगाववाद अहम मुद्दा नहीं है क्योंकि यह सीधे तौर पर उन्हें प्रभावित नहीं करता है.

अलगाव की आग से तबाही

विदेशी धरती पर किसी साजिश के तहत सिख अलगाववादी नेताओं को, जिन्होंने उस देश के नागरिकता ले रखी हो, चुनचुन कर खत्म कराना जहां गलत है, वहीं भारत की अखण्डता और सम्प्रभुता को बनाए रखने के लिए ऐसे सभी आतंकवादियों और अलगाववादियों को भारत को सौंपने की भी जरूरत है ताकि उन पर भारतीय क़ानूनों के तहत मुक़दमा चलाया जा सके.

भारत विरोधी आतंकवादियों को अन्य देश अपनी जमीन पर जगह दें और उन का संरक्षण करें, ये भी ठीक नहीं है. आतंकवाद और अलगाववाद के बीज चाहे कहीं भी और किसी भी देश में पनप रहे हों, उन्हें तुरंत समाप्त करना जरूरी है, लेकिन इस के लिए अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और नियमों के तहत कदम उठाने की जरूरत है. विदेशी धरती पर सिख नेताओं की हत्या से भारत में रह रहे सिखों में गलत संदेश जाने का अंदेशा है, जो भारत की अंदरूनी शान्ति और सुरक्षा के लिए ठीक नहीं होगा.

यह भी जरूरी है कि भारत में ऐसा वातावरण बने कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या पूर्व नागरिक, भारत को अपना हितरक्षक और पैतृक देश समझना न छोड़े. उस की जाति, धर्म और राज्य कुछ भी क्यों न हो. धर्म के नाम पर अलगाव की आग बुरी तरह फैलती है.

धार्मिक शोर पर गुजरात अदालत की खामोशी क्यों ?

क्या याचिकाकर्ता यह दावा कर सकता है कि किसी मंदिर में आरती के दौरान घंटियों और घड़ियाल का शोर बाहर सुनाई नहीं देता है, आप के मंदिर में ढोल और संगीत के साथ सुबह की आरती भी सुबह 3 बजे शुरू होती है क्या आप यह कह सकते हैं कि घंटे और घड़ियाल का शोर केवल मंदिर परिसर में ही रहता है. मंदिर के बाहर नहीं फैलता.

इस और ऐसे कई सवालों का जवाब याचिकाकर्ता उस के वकील और अधिसंख्य हिंदुओं के पास भी नहीं होगा जिन्हें मस्जिदों की अजान के शोर पर एतराज है लेकिन मंदिरों की आरती और घंटे घड़ियालों का शोर उन्हें सुहाना कर्णप्रिय लगता है. 28 नवंबर को गुजरात हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद अपने फैसले में यह भी कहा कि किसी भी धर्म में पूजापाठ के लिए सीमित समय की आवश्यकता होती है इस याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता.

मांग को सिरे से किया खारिज

यह याचिका गुजरात बजरंग दल के एक नेता शक्ति सिंह झाला की तरफ से दायर की गई थी जिस में कहा गया था कि सुबह लाउडस्पीकर के माध्यम से अजान देने वाली मानव आवाज ध्वनि प्रदूषण पैदा करने के स्तर यानी डेसीबल तक पहुंच जाती है जिस से बड़े पैमाने पर जनता के स्वास्थ को खतरा हो सकता है.

हाईकोर्ट ने इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए दो टूक कहा कि हम इस तरह की जनहित याचिका पर विचार नहीं कर रहे हैं. यह वर्षों से चली आ रही आस्था और प्रथा है जो पांच दस मिनट के लिए होती है.

लेकिन देशभर के आम लोगों को पूजापाठ और इबादत का वह वक्त भारी पड़ता है जब मंदिरों और मस्जिदों से आती कर्कश आवाजें उन के कानों में घुसती हैं. उन की दिनचर्या और कामकाज को प्रभावित करती हैं और एक खास तरह की बेबसी और खीझ भी पैदा करती हैं.

मसला पुराना है

आस्था के इस फूहड़ प्रदर्शन पर कबीर दास 900 साल पहले ही तुक की बात कह गए थे कि ‘कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय.’

कबीर का इशारा सिर्फ मस्जिदों और मुसलमानों की तरफ नहीं था बल्कि उन के निशाने पर हिंदू भी रहते थे. वे भी धर्म के नाम पर तरहतरह के ढोंग पाखंड आज भी करते रहते हैं. आप कहीं भी रहते हो धार्मिक शोर के दायरे और गिरफ्त से बाहर नहीं हो सकते क्योंकि वही धर्म की ब्रांडिंग और इश्तिहार होता है. अगर आप को अजान की आवाज शोर लगती है तो आरती और घंटे घड़ियाल की आवाजें क्यों नहीं चुभती. इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि असल झगड़ा दुकानदारी और अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करते उसे थोपने का है.

इस के लिए जरुरी है कि दूसरे धर्मों के रीति रिवाजों और पूजा पद्धतियों पर उंगली उठाई जाती रहे. शक्ति सिंह ने कोई नई बात नहीं कही है. यह विवाद या फसाद भी सदियों पुराना है जिस की आलोचना तो की जा सकती है लेकिन कोई फैसला नहीं लिया या दिया जा सकता और जो किया जा सकता है वह यह है कि सभी धर्मों के शोर पर कानूनी बंदिश लगाईं जाएं जिस से आम लोग सुकून से रह सकें.

लेकिन ऐसा हो पाएगा इस में शक है क्योंकि कट्टरवाद हर दौर की तरह आज भी है. दूसरे की आवाज को शोर और खुद की आवाज को संगीत कहना एक तरह की साजिश और दूसरे पहलू से देखें तो बहुत बड़ी कमजोरी है. कमजोरी इस लिहाज से कि धर्म ने सिखा रखा है कि कोई भी मुसीबत आए तो झट से उपर वाले के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जाओ, अपना रोना शुरू कर दो वह सुनेगा और तुम्हारी आफत दूर करेगा.

धार्मिक शोर दिनरात

अब कोई यह दलील नहीं देता कि जब ऐसा ही है और उपर वाला अपने भक्तों को चाहता है, उन का भला करता है तो ये आफतें आती ही क्यों हैं. जाहिर है अगर वह कहीं है तो मुसीबतें भी वही भेजता होगा. वह ऐसा क्यों करता है इस के पीछे तरहतरह के बैसर पैर के किस्से कहानी दलालों ने गढ़ रखे हैं.

रही बात धार्मिक शोर की तो वह दिनरात होता रहता है. अजान और आरती दोनों मुंह अंधेरे शरू हो जाते हैं और देर रात तक चलते हैं. गुजरात हाई कोर्ट ने हिंदुओं को अपनी गिरहबान में झांकने का इशारा कर बात तो तुक की है लेकिन वह आम लोगों की तरह धार्मिक शोर पर अपने कान बंद कर लेने जैसी बात भी है कि कौन इस पचड़े में पड़े.

इलाहाबाद हाई कोर्ट का महिला प्रतिनिधियों को ले कर दिए निर्णय पर उठते सवाल

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि महिलाओं को चुनाव लड़ने के समय यह हलफनामा देना पड़ेगा कि वह अपने काम खुद करेंगी उन के पति नहीं. इस का सीधा प्रभाव पंचायती राज में चुनाव लड़ने वाली महिलाओं पर पड़ेगा. पार्षद का चुनाव लड़ने वाली महिलाएं भी इस से प्रभावित होंगी. बिना परिवार के मदद के तो अधिकांश सांसद और विधायक भी काम नहीं रही है. वहां भी पति, पिता और पुत्र चुनाव लड़ने से ले कर जीतने के बाद कामकाज देखने का काम करते हैं.सांसद विधायक बड़े पद हैं तो वह सवालों से बच जाते हैं. पार्षद और प्रधान इस में बदनाम हो जाते हैं.

‘महिला प्रधान कोई रबर स्टैंप हैं?’ – हाई कोर्ट

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में महिला प्रधानों के स्थान पर उन के पतियों के काम करने की प्रथा की आलोचना करते कहा, ‘ऐसी दखलअंदाजी राजनीति में महिलाओं को आरक्षण देने के मकसद को कमजोर करती है.’

बिजनौर जिले की नगीना तहसील के मदपुरी गांव की ग्राम सभा ने अपनी प्रधान कर्मजीत कौर के पति सुखदेव के द्वारा एक याचिका दायर की थी. याचिका में पति को इस याचिका के लिए अधिकृत किया गया हो इस का कोई हलफनामा संलग्न नहीं था.

कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि ‘उस का ग्राम सभा के कामकाज से कोई लेनादेना नहीं होता.’ अदालत ने कहा, ‘प्रधान के तौर पर याचिकाकर्ता को अपने निर्वाचित पद से अधिकार, कर्तव्य आदि अपने पति या किसी अन्य व्यक्ति को सौंपने का कोई अधिकार नहीं है. यहां पैरोकार यानी प्रधानपति का गांव सभा के कामकाज से कोई लेनादेना नहीं है.

हाईकोर्ट ने कहा ‘प्रधानपति’ शब्द उत्तर प्रदेश में काफी लोकप्रिय है और व्यापक स्तर पर इस का उपयोग किया जाता है. इस का उपयोग एक महिला प्रधान के पति के लिए किया जाता है. अधिकृत प्राधिकारी नहीं होने के बाद भी प्रधानपति आमतौर पर एक महिला प्रधान यानी अपनी पत्नी की ओर से कामकाज करता है.

‘ऐसे कई उदाहरण हैं जहां एक महिला प्रधान सभी व्यवहारिक उद्देश्यों के लिए केवल एक रबड़ स्टैंप की तरह काम करती है तथा सभी प्रमुख निर्णय तथाकथित प्रधानपति द्वारा लिए जाते हैं एवं निर्वाचित प्रतिनिधि महज मूक दर्शक की तरह कार्य करती है. यह रिट याचिका ऐसी स्थिति का एक ज्वलंत उदाहरण है.’

जानकारी के मुताबिक कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को आदेश दिया है कि महिला ग्राम प्रधान प्रत्याशियों से नामांकन के समय हलफनामा लें कि वे खुद काम करेंगी. उन के काम में प्रधानपति या किसी अन्य का हस्तक्षेप नहीं होगा.

गले में अटकेगा हलफनामा :

हमारे देश में महिलाओं की शिक्षा और उन की आजादी कितनी है यह सभी को पता है. पढ़ीलिखी महिलाओं में भी ज्यादातर अपने घर के आर्थिक फैसले नहीं ले पाती. लड़कालड़की को किस स्कूल में पढ़ाना है यह महिलाएं नहीं तय करती. जमीन प्लाट खरीदते समय महिलाओं को रजिस्ट्री फीस में छूट भले मिलती है पर कौन की जमीन प्लौट खरीदना है यह तय करने का काम वह नहीं करती. गांवदेहात में महिलाओं को शिक्षा के बेहद कम अवसर है. जब पढ़ीलिखी महिलाएं घरपरिवार के बड़े मसले खुद नहीं तय करती तो कम पढ़ीलिखी या अनपढ़ महिला इतनी बड़ी ग्राम सभा, विधानसभा और लोकसभा के फैसले कैसे ले सकती है ?

बात केवल गांव की ही नहीं है, पंचायतों में आरक्षण मिलने के बाद शहरी निकाय चुनावों में भी महिलाएं पार्षद, पालिका अध्यक्ष और मेयर जैसे पदों के लिए भी चुनी जा रही हैं. वहां भी उन के काम पति, पुत्र या पिता देखते हैं. सही मायने में देखें तो छोटे चुनाव से ले कर बड़े चुनाव तक में चुनाव संचालन की जो प्रक्रिया है उस में अकेली महिला कभी चुनाव लड़ कर जीत ही नहीं सकती. उन का घरपरिवार चुनाव संचालन में पूरी जिम्मेदारी लेता है. पतियों के भी चुनाव प्रचार में पत्नियों की अहम भूमिका होती है.

अगर चुनाव के समय आयोग इस तरह का हलफनामा लेने लगेगा कि वह खुद की अपना काम करेंगी तो अधिकांश महिलाएं चुनाव नहीं लड़ेंगी. वह अपने कदम वापस खींच लेंगी. चुनाव और चुनाव जीतने के बाद सरकारी सिस्टम के साथ काम करना कम पढ़ीलिखी, कम समझदार महिला के लिए संभव ही नहीं है. छोटेछोटे चुनावों में जिस तरह का धनबल और बाहुबल प्रयोग किया जा रहा उस का सामना करना अकेली महिला के लिए सरल नहीं है.

हलफनामा की शर्त महिलाओं को चुनाव लड़ने वाली होगी. खासकर कमजोर वर्ग की महिलाएं इस का शिकार होंगी क्योंकि उन के हिस्से अभी बहुत कम अधिकार आए हैं. पंचायती राज चुनाव में मिले आरक्षण ने एक उम्मीद की किरण दिखाई थी. 1985 में जब यह पंचायती राज लागू हुआ था उस समय ज्यादा महिलाएं अपने पिता, पुत्र और पति पर निर्भर रहती थी.
आज ज्यादातर महिलाएं अपने काम खुद कर रही हैं. उन में सुधार आया है. जैसेजैसे शिक्षा का प्रसार होगा लड़कियां पढ़ेंगीलिखेंगी, वैसेवैसे खुदबखुद हालात में सुधार आएगा. हलफनामा ने डर कर महिलाएं चुनाव लड़ने से कदम वापस खींच लेंगी जिस से चुनावी राजनीति में वह कमजोर पड़ जाएंगी. उन की तादाद घट जाएगी.

‘पीएमओ’ काम कर सकता है तो ‘प्रधानपति’ क्यों नहीं?

जनप्रतिनिधियों के लिए शिक्षा की कोई योग्यता नहीं रखी गई है. बिना पढ़ालिखा व्यक्ति भी प्रधानमंत्री बन सकता है. उस की सहायता के लिए पीएमओ काम करता है. निकाय और पंचायत के चुनाव लड़ने वाले महिला पुरूष भी बिना पढ़ेलिखे हो सकते हैं. सरकारी नियम कानून जानने समझने में उन को दिक्कत होती है. वह सरकारी नौकरों पर भरोसा नहीं कर सकती. ऐसे में अगर उस की सहायता परिवार का कोई पिता, पुत्र या पति करता है तो दिक्कत क्या है ?

तमाम ऐसी खबरें मीडिया में छपती रहती हैं जिन में किसी काम के लिए पीएमओ का जिक्र होता है. जी न्यूज हिंदी की वैबसाइट पर 2 खबरें उदाहरण के लिए देखी, जिन में यह कहा गया कि पीएमओ ने इस काम को किया. पहली खबर टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा का बयान है, जिस में उन्होंने हीरानंदानी के बारे में कहा कि ‘पीएमओ ने बंदूक की नोक पर….’

दूसरी खबर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की है. चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने लाल डायरी का जिक्र किया था. जी न्यूज हिंदी ने लिखा है कि ‘पीएमओ के जवाब में गहलोत का पलटवार’. उदाहरण यह समझाने का प्रयास करते हैं कि किसी भी नेता को सहयोग देने के लिए कोई न कोई होता है. जो उस को गलत फैसले लेने से सजग करता है. प्रधानपति, पिता और पुत्र भी इसलिए ताकि वह पढ़नेलिखने में कमजोर या राजनीति में न समझ प्रतिनिधि की मदद कर सके.

आर्टिफिशियल इंटेलिजैंस (AI) आने वाले समय में चिंताएं बढ़ा सकता है

कभी विज्ञान की कहानियों में भारतीय और दुनिया के साहित्य में ऐसी कहानी किताबों के पन्ने में तक ही सीमित थी याद करिए चंद्रकांता संतति, भूतनाथ और जाने कितनी चर्चित कहानियां जिस में क्षण भर में अपना रूप बदल कर के अपराध घटनाक्रम पारित कर के पात्र निकल जाता है और जब यह पता चलता है, कि सच्चाई क्या थी, देर हो चुकी होती है.

ऐसा ही कुछ आजकल सोशल मीडिया में देखने को मिल रहा है. विज्ञान के इस करतब से दुनियाभर के लोग हैरान परेशान हैं इसलिए कहा भी गया है कि विज्ञान मानव समाज के लिए हितकारी है तो कभीकभी विनाशकारी भी हो सकता है.यही कारण है कि हौलीवुड के इतिहास में सब से लंबी हड़ताल आर्टिफिशियल इंटेलिजैंस से उत्पन्न हालात के कारण हुई.

दरअसल, एआई के पूरी तरह से, जीवन के हर पहलू पर छा जाने के बाद मनुष्य के जीवन में भारी दुश्वार हो सकता है दुनिया के फिल्म उद्योग के लेखक और अभिनेताओं को महीनों एआई तकनीक के उपयोग विरोध में हड़ताल करनी पड़ी.

आखिरकार 8 नवंबर, 2023 को घोषणा हुई कि निर्माता कंपनियों ने यह वादा लिखित रूप में किया है कि वे फिल्म निर्माण के लिए एआई का उपयोग नहीं किया जाएगा. अब सवाल है कि क्या बौलीवुड और भारत के अन्य फिल्म निर्माण के केंद्र के केंद्र भी क्या इसे स्वीकार कर के एआई को प्रतिबंधित करेंगे.

यह तो बात हुई कानून और नैतिकता की बंधन की, मगर यह तकनीक अगर अपराधिक किस्म के लोग उपयोग करेंगे तो उन्हें कौन रोक सकता है और उस का खामियाजा क्या दुनिया को आने वाले समय में नहीं उठाना पड़ेगा?

दुनिया के लिए चिंता का सबब एआई

आज दुनिया एक छोटा सा गांव जैसा बन चुका हिया. ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजैंस अर्थात एआई से सारी दुनिया हैरान और चिंतित है जिस का सब से बड़ा उदाहरण मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एआई और ‘डीपफेक’ प्रौद्योगिकी से उत्पन्न चुनौतियों को रेखांकित करते हुए कहा कि ‘आवश्यकता है इन तकनीकों के कारण पैदा हुई चुनौतियों के बारे में लोगों को जागरूक और शिक्षित करने की.’

भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय में ‘दीपावली मिलन’ कार्यक्रम में पत्रकारों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “पिछले दिनों गरबा महोत्सव में भाग लेते हुए अपना एक वीडियो देखा, जबकि उन्होंने स्कूल के दिनों से ऐसा नहीं किया है.” उन्होंने हंसते हुए कहा, “यहां तक कि जो लोग उन्हें प्यार करते हैं, वे भी वीडियो को एकदूसरे से साझा कर रहे हैं.”

विविधतापूर्ण समाज में ‘डीपफेक’ एक बड़ा संकट पैदा कर सकते हैं और यहां तक कि समाज में असंतोष की आग भी भड़का सकते हैं क्योंकि लोग मीडिया से जुड़ी किसी भी चीज पर उसी तरह भरोसा करते हैं जैसे आम तौर पर गेरुआ वस्त्र पहने व्यक्ति को सम्मान देते हैं.

एआई के माध्यम से उत्पादित ‘डीपफेक’ के कारण कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल ‘डीपफेक’ के लिए होना चिंताजनक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजैंस के इस प्रयोग पर अपनी बात विस्तार से कही मगर सोचने वाली बात यह है कि अगर इस का विध्वंस या आपराधिक गतिविधियों में उपयोग किया जाने लगेगा तब क्या होगा?

कानून का पालन जरुरी

नरेंद्र मोदी ने इसे रेखांकित करते हुए कहा, “यह एक नया संकट उभर रहा है. समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग है जिस के पास समानांतर सत्यापन प्रणाली नहीं है. इस बारे में जागरूकता फैलाने के लिए मीडिया का सहयोग चाहिए.”

पाठकों को बताते चलें कि दरअसल यह तकनीक शक्तिशाली कंप्यूटर और शिक्षा का उपयोग कर के वीडियो, छवियों, आडियो में हेरफेर करने की एक विधि है.

यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “ऐसी फिल्मों का प्रदर्शन भी इस आधार पर मुश्किल हो जाता है कि उन्होंने समाज के कुछ तबकों का अपमान किया है, भले ही उन्हें बनाने में भारी राशि खर्च की गई. जिस तरह सिगरेट जैसे उत्पाद स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियों के साथ आते हैं, उसी तरह ‘डीपफेक’ के मामलों में भी होना चाहिए.”

मगर यह सब तो अगर कानून का पालन किया जाता है तब संभव है कुल मिला कर आर्टिफिशियल इंटेलिजैंस एक ऐसा माइग्रेन जैसा सिरदर्द है जिस का इलाज मानवता के लिए आवश्यक है.

मैं अपने बेटे का स्तनपान छुड़ाना चाहती हूं, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरा बेटा 6 महीने का होने वाला है. मैं वर्किंग वूमन हूं. 4 महीने की तो मेरी छुट्टियां थीं, 2 महीने से मैं विदआउट सैलरी पर घर पर हूं सिर्फ इसलिए कि मैं बेटे को पूरे 6 महीने तक अपना फीड देना चाहती थी. अब मैं बेटे का स्तनपान छुड़ाना चाहती हूं.

जवाब

स्तनपान छुड़ाने से पहले उसे बोतल से दूध पिलाने की आदत डालें, फिर धीरेधीरे स्तनपान कराना कम करें. बेशक बच्चे के लिए मां का दूध संपूर्ण पोषण होता है, इसलिए स्तनपान छुड़ाने से पहले उसे अन्य आहार देने की आदत डालें.जब बच्चा मां का दूध पीता है तो निप्पल काफी संवेदनशील हो जाते हैं. ऐसे में आप केवल पीठ के बल ही सोएं और ध्यान दें कि ब्रैस्ट पर ज्यादा दबाव न पड़े. ऐसा करने से स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया कम होने लगती है, जिस से बच्चा आसानी से दूध छोड़ पाता है.बच्चे का ध्यान भटकाएं. जब आप को लगे कि वह स्तनपान करना चाहता है.

आप उस के साथ खेल सकती हैं, बाहर घुमाने ले जा सकती हैं.अगर बच्चा ठोस आहार लेता है तो शाम को उसे अच्छी तरह ठोस आहार खिलाएं. इस के अलावा रात के समय सोने से कुछ देर पहले भी उसे बोतल से दूध पिलाएं.स्तनपान छुड़ाने के लिए आप बच्चे से थोड़ी दूरी बना कर सो सकती हैं. जब आप बच्चे के पास सोती हैं तो वह स्तनपान के लिए जिद करता है. आप रात के समय कुछ देर के लिए बच्चे को पैसिफायर (कृत्रिम निप्पल) चूसने के लिए दे सकती हैं. इस से स्तनपान की आदत धीरेधीरे कम होने लगती है. ध्यान रहे कि पैसिफायर का इस्तेमाल लगातार नहीं करना चाहिए.

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