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बच्चों को बेसहारा बनाते अपराधी मांबाप

मातापिता बच्चे की परवरिश की रीढ़ होते हैं. मातापिता के किसी अपराध में संलिप्त होने से उस का बच्चों पर सीधा असर पड़ता है. वे बेसहारा हो जाते हैं, दरदर भटकना पड़ता है उन्हें. आखिर ऐसी नौबत ही क्यों?

27 फरवरी, 2022 को कमल अहिरवार अपनी पत्नी नारायणी को उस के मायके पूनमखेड़ी से ससुराल बांसखेड़ी ले कर आया था. खाना खाने के बाद 17 साल की रजनी और छोटी बहन सुरक्षा घर पर ही थीं. एक भाई और 2 छोटी बहनें सो चुके थे. रात में रजनी और सुरक्षा बैठ कर बातें कर रही थीं, तभी किसी बात को ले कर मम्मीपापा झगड़ने लगे. पापा मां के साथ मारपीट करते हुए कह रहे थे, ‘तुम एक साल से घर क्यों नहीं आईं?’

उन को झगड़ते देख हम दोनों बहनें हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए पापा से कहने लगीं, ‘पापा, मत लड़ो, मम्मी को मत मारो.’ लेकिन पापा ने हम लोगों की एक न सुनी. इस के बाद मां को घर के अंदर ले गए और लाठीडंडों से पीटने लगे.

मां ने बचाव की बहुत कोशिश की. उस की चूडि़यां भी टूट गईं. जब वह थक कर गिर गई तो पापा उस के पेट पर बैठ गए और किचन से मसाला कूटने वाली पत्थर की लुढि़या ले कर आए और मां के सिर पर मारने लगे. पापा ने गुस्से में कई वार किए. मां के सिर से खून निकल रहा था. देखते ही देखते मां मर चुकी थी.

17 साल की रजनी अहिरवार उस रात की कहानी सुनाते हुए सिसकने लगती है, कहती है, ‘‘काश, पापा ने हमारा गिड़गिड़ाना सुन लिया होता, हम 5 भाईबहन आज अनाथ जैसी जिंदगी न जी रहे होते.’’

मातापिता में किसी का भी सहारा नहीं होने से रिश्तेदारों की मेहरबानी पर 5 बच्चों की जिंदगी गुजर रही है. नारायणी की हत्या के बाद कमल अहिरवार को जेल हो चुकी है. अब 17 साल की रजनी अहिरवार अपने साथ 3 छोटी बहनों और एक भाई की परवरिश कर रही है.

ऐसे ही दूसरे मामले में मां की हत्या के जुर्म में पिता को उम्रकैद हो गई. गुना जिले में ही 17 अगस्त, 2022 को धरनावदा इलाके के महू गांव का रहने वाला शैतान सिंह लोधा अपनी ससुराल पठार महल्ला आरोन में था. उस की पत्नी प्रीति लोधा भी वहीं पर थी. शैतान सिंह अपनी पत्नी के चरित्र को ले कर शक करता था.

17 अगस्त की रात को शैतान सिंह ने गला दबा कर पत्नी की हत्या कर दी. कोर्ट ने 1 मार्च, 2023 को 6 साल के बेटे की गवाही पर पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई है. अब मासूम अपनी बहन और बुजुर्ग नानी के साथ आर्थिक सहायता के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है.

एक तीसरे मामले में अशोक नगर में अक्तूबर 2022 में मुंगावली की अजीज कालोनी में एक महिला रिंकी पाल की संदिग्ध अवस्था में मौत हो गई थी. पुलिस ने जब सख्ती से पूछताछ की तो पति लेखराज पाल ने चरित्र पर संदेह के चलते हत्या करने का गुनाह कुबूल कर लिया. बताया जाता है कि वह पत्नी का मोबाइल चैक करना चाहता था. इसी को ले कर दोनों में विवाद हो गया.

मोबाइल छुड़ाते हुए पति ने महिला का गला दबा दिया. घटना के 6 दिनों पहले ही महिला ने बच्ची को जन्म दिया था. मां की हत्या होने से 6 दिन की मासूम बेटी के सिर से मां का साया हट गया. अब पिता जेल में है और 5 महीने की बच्ची की परवरिश का संकट खड़ा हो गया.

गलती मातापिता की

पिछले कुछ महीनों में ऐसे मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं जिन में मातापिता की गलती की वजह से अपराध होने से बच्चे बेसहारा हो रहे हैं. मध्य प्रदेश के गुना जिले में ही ऐसे 44 केस हैं. वहीं, अशोक नगर जिले में 15 और शिवपुरी जिले में 30 केस इस तरह के हैं. गुना में हाल ही में 2 ऐसे मामलों में कोर्ट का फैसला आया जिन में पति अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में जेल जा चुके हैं. अब उन के बच्चे दरदर की ठोकरें खा रहे हैं.

गांवकसबों के बड़ेबुजुर्गों से यह कहते कई बार सुना है कि औलाद अगर गलत रास्ते पर चल पड़े तो उस की शादी कर देनी चाहिए. शादी के बंधन में बंधते ही उसे घरगृहस्थी दिखने लगती है. गलत काम करने से पहले वह एक दफा अपने बीवीबच्चों के बारे में जरूर सोचता है. इंसान की सहनशीलता, बुद्धि और धैर्य उसे जीवन जीने की कला सिखाते हैं. कई बार देखने को मिला है कि छोटीछोटी बातों पर गुस्से में आ कर ऐसे अपराध हो जाते हैं जिन से जीवनभर जेल की चारदीवारी में रह कर पछताना पड़ता है. बिना सोचेविचारे किए गए अपराध बीवीबच्चों को यतीम बना देते हैं. अपराधियों के ये बच्चे अपने रिश्तेदारों के रहमोकरम पर अपना जीवन बिताने को मजबूर होते हैं.

माना जाता है कि अपराध की जड़

3 चीजें हैं- जर यानी धनसंपदा, जोरू यानी औरत और जमीन. धनदौलत की चाह में लोग बड़े से बड़ा अपराध करने से नहीं हिचकते, भले ही अंजाम कुछ हो. जमीनजायदाद पाने के लिए भाई भाई के खून का प्यासा हो जाता है.

इन में से जर और जमीन के मामलों में अपराध भले ही कम होते हैं लेकिन औरत के नाजायज संबंध की वजह से अपराध ज्यादा होते हैं. जब पुरुष को पता चलता है कि उस की पत्नी के किसी के साथ नाजायज ताल्लुकात हैं तो वह मरनेमारने पर उतारू हो जाता है. मौजूदा दौर में नाजायज संबंधों की वजह से होने वाले अपराधों की बाढ़ सी आ गई है.

पीछे रह जाता पछतावा

महिला अपराधों की एक खास वजह धर्म भी है. धार्मिक कथाकहानियों में यह सीख दी गई है कि महिलाओं पर पुरुष कितना ही जुल्म करे, मगर उसे पति को परमेश्वर मान कर चुप रहना चाहिए. आज की पढ़ीलिखी, कामकाजी नारी जब पुरुषों के अत्याचारों का विरोध करती है तो पुरुष का स्वाभिमान आड़े आ जाता है.

पुरुष भले ही दोतीन औरतों के साथ संबंध बना ले लेकिन औरत के किसी के साथ संबंध बनाने पर पुरुष इसे पचा नहीं पाता और अपराधी बनने से भी नहीं डरता. महिलाओं को भी जब पति से प्रेम नहीं मिलता तो वे कहीं और ठौर तलाश लेती हैं और वक्त आने पर पति को भी रास्ते से हटा देती हैं.

अपराध की वजह जो भी हो लेकिन परिवार में मातापिता द्वारा किए गए अपराध से बच्चे अनाथ हो जाते हैं. बच्चों की सही परवरिश न होने से वे भी नशे के शिकार हो सकते हैं और अपराध की दुनिया की तरफ उन के कदम भी मुड़ सकते हैं. किसी के किए गए गलत कामों पर तुरंत निर्णय करने के बजाय सोचविचार कर निर्णय लेना चाहिए.

अपराधी कितनी ही सफाई से अपराध की घटना को अंजाम दें मगर पुलिस की नजरों और कानून के लंबे हाथों से वे बच नहीं पाते और फिर जीवनभर पछतावा हाथ रह जाता है. किसी को खुद सजा देने की जगह कानून का सहारा लेना चाहिए. जल्दबाजी में कोई निर्णय लेने के बजाय अपने दिमाग का इस्तेमाल कर समस्या का हल खोजने में ही अपनी भलाई है. ऐसा करने से अपराध की संभावना भी कम होगी और बच्चे भी यतीम होने से बचेंगे.

मेरी बहू अड़ियल रवैये की है, समझ नहीं आता मैं उससे कैसे बात करूं?

सवाल

मेरी उम्र 54 साल की है और मैं सास बन गई हूं. बेटे ने लवमैरिज की है. एक ही बेटा है, इसलिए हम ने बड़े चाव से शादी की उस की. बड़े अरमान से बहू को घर लाई लेकिन हमारे सारे अरमान धरे के धरे रह गए. मैं ने हर तरह से एडजस्टमैंट कर के देख लिया पर बहू अपने अंदर कोई बदलाव नहीं लाना चाहती, उलटा झगड़ने लगती है.

जवाब

सब से पहले तो आप को अपनी बहू से पूछना होगा कि उसे दिक्कत किस बात की है. वह चाहती क्या है. क्या बात है जो उसे बुरी लगती है. खुल कर बात करने से ही इस समस्या का हल निकलेगा. यह समझाने की कोशिश करें कि आखिर क्यों कुछ चीजों को ले कर बहू अडि़यल रुख दिखा रही है. आखिर क्यों वह बदलना नहीं चाह रही है. हो सकता है कि वह जो कर रही है उस के पीछे कोई भावनात्मक वजह छिपी हो. एक बार आप उस का पक्ष भी सम?ा जाएंगी तो चीजें सामान्य करना आसान हो जाएंगी.

कई बार बहू के मन में यही भाव बना रहता है कि घर का कंट्रोल तो सास के हाथ में ही है. ऐसे में वह अपनी जिम्मेदारियों पर ध्यान देने में रुचि नहीं दिखाती. वहीं अगर बहू को महत्ता दी जाए, उसे कुछ अहम जिम्मेदारियां पूरी करने को दी जाएं तो उसे लगेगा कि ससुराल में उस की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है. अगर बहू अपनी जिम्मेदारी या सौंपे गए काम को अच्छे से पूरा करती है तो उस की तारीफ करना न भूलें.

अगर आप ये सारे तरीके अपना कर देख चुकी हैं और नतीजा कुछ नहीं निकला तो यह न भूलें कि आप की मैंटल पीस और घर की शांति ज्यादा जरूरी है. इकलौता बेटा है, फिर भी आप को अपना मन कड़ा करना पड़ेगा क्योंकि अंत में बेहतर विकल्प यही बचता है कि आप दोनों अलगअलग घरों में रहें ताकि आप दोनों अलगअलग अपनेअपने मुताबिक जिएं. जरूरी नहीं कि अलग रहने से चीजें बदल जाएंगी लेकिन रोजरोज की चिकचिकबाजी से नजात जरूर मिल जाएगी.

घातक है फेफड़ों का कैंसर

फेफड़ों का कैंसर एक खतरनाक रोग होता है. यह जानलेवा हो सकता है और साधारण तौर पर यह महीनों, सालों तक अस्थायी लक्षणों के बिना विकसित होता है. इस के कारण इस कैंसर की पहचान और उपचार में देरी हो जाती है.

कुछ कारणों से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. जैसे, तंबाकू का उपयोग, धूल और एनवायरमैंटल प्रदूषण का अधिक संपर्क, परिवार में कैंसर का इतिहास और अन्य उपयोगकर्ता जैसे कारकों से यह जुड़ा होता है.

फेफड़ों के कैंसर को उस के प्रारंभिक चरण में पहचाना और उपचार किया जाता है तो सफल उपचार की संभावना बढ़ जाती है.

फेफड़ों के प्राइमरी कैंसर की 2 मुख्य श्रेणियां होती हैं-

स्मौल सैल लंग कैंसर : यह कैंसर फेफड़ों की छोटी कोशिकाओं में शुरू होता है. यह तेजी से बढ़ता है और अकसर शरीर के दूसरे क्षेत्रों में फैल सकता है.

नौन स्मौल सैल लंग कैंसर : यह कैंसर फेफड़ों की थोड़ी बड़ी कोशिकाओं में शुरू होता है और इस के अंदर कई उपश्रेणियां होती हैं, जैसे कि एडेनोकार्सिनोमा, स्क्वेमस सैल कार्सिनोमा और लार्ज सैल कार्सिनोमा.

इन 2 मुख्य श्रेणियों के अलावा कई अन्य भिन्न प्रकार के फेफड़ों के कैंसर भी हो सकते हैं, जैसे कि कैविटी तंत्रिका एडेनोकार्सिनोमा, अल्वियोलर कैंसर और क्रायडर कैंसर. इन प्रकार के कैंसर का इलाज और रोग की प्रगति का अनुसरण भिन्न होता है.

कैंसर के लक्षण

फेफड़ों के कैंसर के लक्षण व्यक्ति से व्यक्ति में भिन्न हो सकते हैं. इन में से कुछ लक्षण शुरुआत में हलके हो सकते हैं लेकिन समय के साथ वे गंभीर और परेशानीदायक हो सकते हैं. फेफड़ों के कैंसर के कुछ प्रमुख लक्षण ये हो सकते हैं :

खांसी और थूकना : लगातार खांसी और बलगम के साथ थूकना, जो दिन या रात में बढ़ सकता है.

दुर्बलता और वजन में कमी : फेफड़ों के कैंसर के मरीज में दुर्बलता और वजन की कमी हो सकती है.

छाती में दर्द : छाती के बीच में दर्द या दबाव की अवस्था एक लक्षण है जो बढ़ सकता है और सांस लेने में कठिनाइयों का कारण बन सकता है.

खूनी खांसी : फेफड़ों के कैंसर के चलते किसी में खूनी खांसी के लक्षण का होना भी है.

सांस लेने में कठिनाई : सांस लेने में कठिनाइयां या सांस लेने में तकलीफ हो सकती है.

छाती के आकार में परिवर्तन : छाती के आकार में बदलाव होना भी इस कैंसर का एक लक्ष्ण है.

फेफड़ों के कैंसर के अधिक विकसित चरण में एक्सरे, सीटी स्कैन और ब्रोंकोस्कोपी की जा सकती है.

यदि इन लक्षणों में से कुछ दिखाई देते हैं तो तुरंत चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए क्योंकि फेफड़ों के कैंसर के समय पर निदान और उपचार के लिए जल्दी उपाय आवश्यक होता है.

फेफड़ों के कैंसर के जोखिम कारक

सिगरेट स्मोकिंग : सिगरेट स्मोकिंग फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है.

पैसिव स्मोकिंग : सिगरेट स्मोकिंग करने वाले व्यक्ति के पास सिगरेट के धुएं का संपर्क भी कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है.

प्रदूषण : जलवायु प्रदूषण और कार्बन मोनोक्साइड की अधिक सामर्थ्यपूर्ण बाह्य एकाग्रता भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ा सकती है.

कार्सिनोजेनिक अधिकारियों का संपर्क : कार्सिनोजेनिक रेडिएशन, यातायात के धुएं, एसबेस्टोस और अन्य कार्सिनोजेनिक रसायनों के संपर्क का भी खतरा हो सकता है.

पारिवारिक इतिहास : किसी व्यक्ति के परिवार में फेफड़ों के कैंसर के मालूम होने की स्थिति भी उन के लिए जोखिम बढ़ाती है.

फेफड़ों के कैंसर का उपचार

कीमोथेरैपी : कीमोथेरैपी का इस्तेमाल कैंसर के सैल्स को खत्म करने के लिए किया जाता है. कीमोथेरैपी के दौरान कैंसर को खत्म करने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. इन दवाओं से कैंसर ट्यूमर सिकुड़ जाते हैं और फैलते नहीं हैं.

रेडिएशन थेरैपी : यह कैंसर को बरबाद करने के लिए उच्च ऊर्जा विकिरण का उपयोग करती है, जो कैंसर को नष्ट कर सकती है.

सर्जरी : फेफड़ों के कैंसर के उपचार के एक हिस्से के रूप में कैंसर के आक्रमण का निकास करने को सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है.

टारगेटेड थेरैपी : यह दवाओं का उपयोग करती है जो कैंसर को विशेष तरीके से प्रभावित करने में मदद कर सकती है.

इम्यूनोथेरैपी : इस का उपयोग व्यक्ति की खुद की प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्षम करने के लिए किया जाता है ताकि वह कैंसर के खिलाफ लड़ सके.

उपचार का चयन रोग के स्थान, प्रकार और प्रगति पर निर्भर करेगा और चिकित्सक द्वारा सिफारिश किया जाएगा. कैंसर के प्रारंभिक चरण में जब कैंसर हलका होता है, उस समय उपचार की सफलता की संभावना अधिक होती है, इसलिए जल्दी निदान और उपचार की जरूरत होती है.

(लेखक फोर्टिस हौस्पिटल, दिल्ली में ओंकोलौजी विभाग में सीनियर कंसल्टैंट हैं.)

परिंदा : भाग 1

‘‘सुनिए, टे्रन का इंजन फेल हो गया है. आगे लोकल ट्रेन से जाना होगा.’’

आवाज की दिशा में पलकें उठीं तो उस का सांवला चेहरा देख कर पिछले ढाई घंटे से जमा गुस्सा आश्चर्य में सिमट गया. उस की सीट बिलकुल मेरे पास वाली थी मगर पिछले 6 घंटे की यात्रा के दौरान उस ने मुझ से कोई बात करने की कोशिश नहीं की थी.

हमारी टे्रन का इंजन एक सुनसान जगह में खराब हुआ था. बाहर झांक कर देखा तो हड़बड़ाई भीड़ अंधेरे में पटरी के साथसाथ घुलती नजर आई.

अपनी पूरी शक्ति लगा कर भी मैं अपना सूटकेस बस, हिला भर ही पाई. बाहर कुली न देख कर मेरी सारी बहादुरी आंसू बन कर छलकने को तैयार थी कि उस ने अपना बैग मुझे थमाया और बिना कुछ कहे ही मेरा सूटकेस उठा लिया. मेरी समझ में नहीं आया कि क्या कुछ क हूं.

‘‘रहने दो,’’ मैं थोड़ी सख्ती से बोली.

‘‘डरिए मत, काफी भारी है. ले कर भाग नहीं पाऊंगा,’’ उस ने मुसकरा कर कहा और आगे बढ़ गया.

पत्थरों पर पांव रखते ही मुझे वास्तविकता का एहसास हुआ. रात के 11 बजे से ज्यादा का समय हो रहा था. घनघोर अंधेरे आकाश में बिजलियां आंखें मटका रही थीं और बारिश धीरेधीरे जोश में आ रही थी.

हमारे भीगने से पहले एक दूसरी टे्रन आ गई लेकिन मेरी रहीसही हिम्मत भी हवा हो गई. टे्रन में काफी भीड़ थी. उस की मदद से मुझे किसी तरह जगह मिल गई मगर उस बेचारे को पायदान ही नसीब हुआ. यह बात तो तय थी कि वह न होता तो उस सुनसान जगह में मैं…

आखिरी 3-4 स्टेशन तक जब टे्रन कुछ खाली हो गई तब मैं उस का नाम जान पाई. अभिन्न कोलकाता से पहली बार गुजर रहा था जबकि यह मेरा अपना शहर था. इसलिए कालिज की छुट्टियों में अकेली ही आतीजाती थी.

हावड़ा पहुंच कर अभिन्न को पता चला कि उस की फ्लाइट छूट चुकी है और अगला जहाज कम से कम कल दोपहर से पहले नहीं था.

‘‘क्या आप किसी होटल का पता बता देंगी?’’ अभिन्न अपने भीगे कपड़ों को रूमाल से पोंछता हुआ बोला.

हम साथसाथ ही टैक्सी स्टैंड की ओर जा रहे थे. कुली ने मेरा सामान उठा रखा था.

लगभग आधे घंटे की बातचीत के बाद हम कम से कम अजनबी नहीं रह गए थे. वह भी कालिज का छात्र था और किसी सेमिनार में भाग लेने के लिए दूसरे शहर जा रहा था. टैक्सी तक पहुंचने से पहले मैं ने उसे 3-4 होटल गिना दिए.

‘‘बाय,’’ मेरे टैक्सी में बैठने के बाद उस ने हाथ हिला कर कहा. उस ने कभी ज्यादा बात करने की कोशिश नहीं की थी. बस, औपचारिकताएं ही पूरी हुई थीं मगर विदा लेते वक्त उस के शब्दों में एक दोस्ताना आभास था.

‘‘एक बात पूछूं?’’ मैं ने खिड़की से गरदन निकाल कर कुछ सोचते हुए कहा.

एक जोरदार बिजली कड़की और उस की असहज आंखें रोशन हो गईं. शायद थकावट के कारण मुझे उस का चेहरा बुझाबुझा लग रहा था.

उस ने सहमति में सिर हिलाया. वैसे तो चेहरा बहुत आकर्षक नहीं था लेकिन आत्मविश्वास और शालीनता के ऊपर बारिश की नन्ही बूंदें चमक रही थीं.

‘‘यह शहर आप के लिए अजनबी है और हो सकता है आप को होटल में जगह न भी मिले,’’ कह कर मैं थोड़ी रुकी, ‘‘आप चाहें तो हमारे साथ हमारे घर चल सकते हैं?’’

उस के चेहरे पर कई प्रकार की भावनाएं उभर आईं. उस ने प्रश्न भरी निगाहों से मुझे देखा.

‘‘डरिए मत, आप को ले कर भाग नहीं जाऊंगी,’’ मैं खिलखिला पड़ी तो वह झेंप गया. एक छोटी सी हंसी में बड़ीबड़ी शंकाएं खो जाती हैं.

वह कुछ सोचने लगा. मैं जानती थी कि वह क्या सोच रहा होगा. एक अनजान लड़की के साथ इस तरह उस के घर जाना, बहुत अजीब स्थिति थी.

‘‘आप को बेवजह तकलीफ होगी,’’ आखिरकार अभिन्न ने बहाना ढूंढ़ ही निकाला.

‘‘हां, होगी,’’ मैं गंभीर हो कर बोली, ‘‘वह भी बहुत ज्यादा यदि आप नहीं चलेंगे,’’ कहते हुए मैं ने अपने साथ वाला गेट खोल दिया.

वह चुपचाप आ कर टैक्सी में बैठ गया. इंसानियत के नाते मेरा क्या फर्ज था पता नहीं, लेकिन मैं गलत कर रही हूं या सही यह सोचने की नौबत ही नहीं आई.

मैं रास्ते भर सोचती रही कि चलो, अंत भला तो सब भला. मगर उस दिन तकदीर गलत पटरी पर दौड़ रही थी. घर पहुंच कर पता चला कि पापा बिजनेस ट्रिप से एक दिन बाद लौटेंगे और मम्मी 2 दिन के लिए रिश्तेदारी में दूसरे शहर चली गई हैं. हालांकि चाबी हमारे पास थी लेकिन मैं एक भयंकर विडंबना में फंस गई.

‘‘मुझे होटल में जगह मिल जाएगी,’’ अभिन्न टैक्सी की ओर पलटता हुआ बोला. उस ने शायद मेरी दुविधा समझ ली थी.

‘‘आप हमारे घर से यों ही नहीं लौट सकते हैं. वैसे भी आप काफी भीग चुके हैं. कहीं तबीयत बिगड़ गई तो आप सेमिनार में नहीं जा पाएंगे और मैं इतनी डरपोक भी नहीं हूं,’’ भले ही मेरे दिल में कई आशंकाएं उठ रही थीं पर ऊपर से बहादुर दिखना जरूरी था.

कुछ देर में हम घर के अंदर थे. हम दोनों बुरी तरह से सहमे हुए थे. यह बात अलग थी कि दोनों के अपनेअपने कारण थे.

मैं ने उसे गेस्टरूम का नक्शा समझा दिया. वह अपने कपड़ों के साथ चुपचाप बाथरूम की ओर बढ़ गया तो मैं कुछ सोचती हुई बाहर आई और गेस्टरूम की कुंडी बाहर से लगा दी. सुरक्षा की दृष्टि से यह जरूरी था. दुनियादारी के पहले पाठ का शीर्षक है, शक. खींचतेधकेलते मैं सूटकेस अपने कमरे तक ले गई और स्वयं को व्यवस्थित करने लगी.

‘‘लगता है दरवाजा फंसता है?’’ अभिन्न गेस्टरूम के दरवाजे को गौर से देखता हुआ बोला. उस ने कम से कम 5 मिनट तक दरवाजा तो अवश्य ठकठकाया होगा जिस के बारे में मैं भूल गई थी.

‘‘हां,’’ मैं ने तपाक से झूठ बोल दिया ताकि उसे शक न हो, पर खुद पर ही यकीन न कर पाई. फिर मेरी मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं.

किचन से मुझे जबरदस्त चिढ़ थी और पढ़ाई के बहाने मम्मी ने कभी जोर नहीं दिया था. 1-2 बार नसीहतें मिलीं भी तो एक कान से सुनी दूसरे से निकल गईं. फ्रिज खोला तो आंसू जमते हुए महसूस होने लगे. 1-2 हरी सब्जी को छोड़ कर उस में कुछ भी नहीं था. अगर घर में कोई और होता तो आसमान सिर पर उठा लेती मगर यहां खुद आसमान ही टूट पड़ा था.

एक बार तो इच्छा हुई कि उसे चुपचाप रफादफा करूं और खुद भूख हड़ताल पर डट जाऊं. लेकिन बात यहां आत्मसम्मान पर आ कर अटक गई थी. दिमाग का सारा सरगम ही बेसुरा हो गया था. पहली बार अफ सोस हुआ कि कुछ पकाना सीख लिया होता.

‘‘मैं कुछ मदद करूं?’’

आवाज की ओर पलट कर देखा तो मन में आया कि उस की हिम्मत के लिए उसे शौर्यचक्र तो मिलना ही चाहिए. वह ड्राइंगरूम छोड़ कर किचन में आ धमका था.

‘दफा हो जाओ यहां से,’ मेरे मन में शब्द कुलबुलाए जरूर थे मगर प्रत्यक्ष में मैं कुछ और ही कह गई, ‘‘नहीं, आप बैठिए, मैं कुछ पकाने की कोशिश करती हूं,’’ वैसे भी ज्यादा सच बोलने की आदत मुझे थी नहीं.

‘‘देखिए, आप इतनी रात में कुछ करने की कोशिश करें इस से बेहतर है कि मैं ही कुछ करूं,’’ वह धड़धड़ा कर अंदर आ गया और किचन का जायजा लेने लगा. उस के होंठों पर बस, हलकी सी मुसकान थी.

मैं ठीक तरह से झूठ नहीं बोल पा रही थी इसलिए आंखें ही इशारों में बात करने लगीं. मैं चाह कर भी उसे मना नहीं कर पाई. कारण कई हो सकते थे मगर मुझे जोरदार भूख लगी थी और भूखे इनसान के लिए तो सबकुछ माफ है. मैं चुपचाप उस की मदद करने लगी.

10 मिनट तक तो उस की एक भी गतिविधि समझ में नहीं आई. मुझे पता होता कि खाना पकाना इतनी चुनौती का काम है तो एक बार तो जरूर पराक्रम दिखाती. उस ने कढ़ाई चढ़ा कर गैस जला दी. 1-2 बार उस से नजर मिली तो इच्छा हुई कि खुद पर गरम तेल डाल लूं, मगर हिम्मत नहीं कर पाई. मुझे जितना समझ में आ रहा था उतना काम करने लगी.

‘‘यह आप क्या कर रही हैं?’’

मैं पूरी तल्लीनता से आटा गूंधने में लगी थी कि उस ने मुझे टोक  दिया. एक तो ऐसे काम मुझे बिलकुल पसंद नहीं थे और ऊपर से एक अजनबी की रोकटोक, मैं तिलमिला उठी.

‘‘दिखता नहीं, आटा गूंध रही हूं,’’ मैं ने मालिकाना अंदाज में कहा, पर लग रहा था कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. मैं ने एक बार उस की ओर नजर उठाई तो उस की दबीदबी हंसी भी दुबक गई.

‘‘आप रहने दें, मैं कर लूंगा,’’ उस ने विनती भरे स्वर में कहा.

आटा ज्यादा गीला तो नहीं था मगर थोड़ा पानी और मिलाती तो मिल्क शेक अवश्य बन जाता.

हाथ धोने बेसिन पर पहुंची तो आईना देख कर हृदय हाहाकार कर उठा. कान, नाक, होंठ, बाल, गाल यानी कोई ऐसी जगह नहीं बची थी जहां आटा न लगा हो. एक बार तो मेरे होंठों पर भी हंसी फिसल गई.

मैं जानबूझ कर किचन में देर से लौटी.

‘‘आइए, खाना बस, तैयार ही है,’’ उस ने मेरा स्वागत यों किया जैसे वह खुद के घर में हो और मैं मेहमान.

इतनी शर्मिंदगी मुझे जीवन में कभी नहीं हुई थी. मैं उस पल को कोसने लगी जिस पल उसे घर लाने का वाहियात विचार मेरे मन में आया था. लेकिन अब तीर कमान से निकल चुका था. किसी तरह से 5-6 घंटे की सजा काटनी थी.

मैं फ्रिज से टमाटर और प्याज निकाल कर सलाद काटने लगी. फिलहाल यही सब से आसान काम था मगर उस पर नजर रखना नहीं भूली थी. वह पूरी तरह तन्मय हो कर रोटियां बेल रहा था.

‘‘क्या कर रही हैं आप?’’

‘‘आप को दिखता कम है क्या…’’ मेरे गुस्से का बुलबुला फटने ही वाला था कि…

‘‘मेरा मतलब,’’ उस ने मेरी बात काट दी, ‘‘मैं कर रहा हूं न,’’ उसे भी महसूस हुआ होगा कि उस की कुछ सीमाएं हैं.

‘‘क्यों, सिर्फ काटना ही तो है,’’ मैं उलटे हाथों से आंखें पोंछती हुई बोली. अब टमाटर लंबा रहे या गोल, रहता तो टमाटर ही न. वही कहानी प्याज की भी थी.

‘‘यह तो ठीक है इशिताजी,’’ उस ने अपने शब्दों को सहेजने की कोशिश की, ‘‘मगर…इतने खूबसूरत चेहरे पर आंसू अच्छे नहीं लगते हैं न.’’

मैं सकपका कर रह गई. सुंदर तो मैं पिछले कई घंटों से थी पर इस तरह बेवक्त उस की आंखों का दीपक जलना रहस्यमय ही नहीं खतरनाक भी था. मुझे क्रोध आया, शर्म आई या फिर पता नहीं क्या आया लेकिन मेरा दूधिया चेहरा रक्तिम अवश्य हो गया. फिर मैं इतनी बेशर्म तो थी नहीं कि पलकें उठा कर उसे देखती.

उजाले में आंखें खुलीं तो सूरज का कहीं अतापता नहीं था. शायद सिर पर चढ़ आया हो. मैं भागतीभागती गेस्टरूम तक गई. अभिन्न लेटेलेटे ही अखबार पलट रहा था.

‘‘गुडमार्निंग…’’ मैं ने अपनी आवाज से उस का ध्यान खींचा.

‘‘गुडमार्निंग,’’ उस ने तत्परता से जवाब दिया, ‘‘पेपर उधर पड़ा था,’’ उस ने सफाई देने की कोशिश की.

‘‘कोई बात नहीं,’’ मैं ने टाल दिया. जो व्यक्ति रसोई में धावा बोल चुका था उस ने पेपर उठा कर कोई अपराध तो किया नहीं था.

‘‘मुझे कल सुबह की फ्लाइट में जगह मिल गई है,’’ उसे यह कहने में क्या प्रसन्नता हुई यह तो मुझे पता नहीं लेकिन मैं आशंकित हो उठी, ‘‘सौरी, वह बिना पूछे ही आप का फोन इस्तेमाल कर लिया,’’ उस ने व्यावहारिकतावश क्षमा मांग ली, ‘‘अब मैं चलता हूं.’’

‘‘कहां?’’

आखिरी लोकल : भाग 1

शिवानी और शिवेश दोनों मुंबई के शिवाजी छत्रपति रेलवे स्टेशन पर लोकल से उतर कर रोज की तरह अपने औफिस की तरफ जाने के लिए मुड़ ही रहे थे कि शिवानी ने कहा, ‘‘सुनो, आज मुझे नाइट शो में ‘रईस’ देखनी ही देखनी है, चाहे कुछ भी हो जाए.’’ ‘‘अरे, यह कैसी जिद है?’’

शिवेश ने हैरान हो कर कहा. ‘‘जिदविद कुछ नहीं. मुझे बस आज फिल्म देखनी है तो देखनी है,’’ शिवानी ने जैसे फैसला सुना दिया हो.  ‘‘अच्छा पहले इस भीड़ से एक तरफ आ जाओ, फिर बात करते हैं,’’ शिवेश ने शिवानी का हाथ पकड़ कर एक तरफ ले जाते हुए कहा.

‘‘आज तो औफिस देर तक रहेगा. पता नहीं, कितनी देर हो जाएगी. तुम तो जानती हो,’’ शिवेश ने कहा.  ‘‘मुझे भी मालूम है. पर जनाब, इतनी भी देर नहीं लगने वाली है. ज्यादा बहाना बनाने की जरूरत नहीं है. यह कोई मार्च भी नहीं है कि रातभर रुकना पड़ेगा. सीधी तरह बताओ कि आज फिल्म दिखाओगे या नहीं?’’

‘‘अच्छा, कोशिश करूंगा,’’ शिवेश ने मरी हुई आवाज में कहा.

‘‘कोशिश नहीं जी, मुझे देखनी है तो देखनी है,’’ शिवानी ने इस बार थोड़ा मुसकरा कर कहा. शिवेश ने शिवानी की इस दिलकश मुसकान के आगे हथियार डाल दिए.

‘‘ठीक है बाबा, आज हम फिल्म जरूर देखेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए.’’  शिवानी की इसी मुसकान पर तो शिवेश कालेज के जमाने से ही अपना दिल हार बैठा था. दोनों ही कालेज के जमाने से एकदूसरे को जानते थे, पसंद करते थे.  शिवानी ने उस के प्यार को स्वीकार तो किया था, लेकिन एक शर्त भी रख दी थी कि जब तक दोनों को कोई ढंग की नौकरी नहीं मिलेगी, तब तक कोई शादी की बात नहीं करेगा.

शिवेश ने यह शर्त खुशीखुशी मान ली थी. दोनों ही प्रतियोगिता परिक्षाओं की तैयारी में जीजान से लग गए थे. आखिरकार दोनों को कामयाबी मिली. पहले शिवेश को एक निजी पर सरकार द्वारा नियंत्रित बीमा कंपनी में क्लर्क के पद पर पक्की नौकरी मिल गई, फिर उस के 7-8 महीने बाद शिवानी को भी एक सरकारी बैंक में अफसर के पद पर नौकरी मिल गई थी.

मुंबई में उन का यह तीसरा साल था. तबादला तो सरकारी कर्मचारी की नियति है. हर 3-4 साल के अंतराल पर उन का तबादला होता रहा था. 15 साल की नौकरी में अब तक दोनों 3 राज्यों के  4 शहरों में नौकरी कर चुके थे.  शिवानी ने इस बार तबादले के लिए मुंबई आवेदन किया था. दोनों को मुंबई अपने नाम से हमेशा ही खींचती आई थी. वैसे भी इस देश में यह बात आम है कि किसी भी शहर के नागरिकों में कम से कम एक बार मुंबई घूमने की ख्वाहिश जरूर होती है. कुछ लोगों को यह इतनी पसंद आती है कि वे मुंबई के हो कर ही रह जाते हैं.

केलिकुंचिका : भाग 1

दीनानाथजी बालकनी में बैठे चाय पी रहे थे. वे 5वीं मंजिल के अपने अपार्टमैंट में रोज शाम को इसी समय चाय पीते और नीचे बच्चों को खेलते देखा करते थे. उन की पत्नी भी अकसर उन के साथ बैठ कर चाय पिया करती थीं. पर अभी वे किचन में महरी से कुछ काम करा रही थीं. तभी बगल में स्टूल पर रखा उन का मोबाइल फोन बजा. उन्होंने देखा कि उन की बड़ी बेटी अमोलिका का फोन था. दीनानाथ बोले, ‘‘हां बेटा, बोलो, क्या हाल है?’’

अमोलिका बोली, ‘‘ठीक हूं पापा. आप कैसे हैं? मम्मी से बात करनी है.’’

‘‘मैं ठीक हूं बेटा. एक मिनट होल्ड करना, मम्मी को बुलाता हूं,’’ कह कर उन्होंने पत्नी को बुलाया.

उन की पत्नी बोलीं, ‘‘अमोल बेटा, कैसी तबीयत है तेरी? अभी तो डिलीवरी में एक महीना बाकी है न?’’

‘‘वह तो है, पर डाक्टर ने कहा है कि कुछ कौंप्लिकेशन है, बैडरैस्ट करना है. तुम तो जानती हो जतिन ने लवमैरिज की है मुझ से अपने मातापिता की मरजी के खिलाफ. ससुराल से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलने वाली है. तुम 2-3 महीने के लिए यहां आ जातीं, तो बड़ा सहारा मिलता.’’

‘‘मैं समझ सकती हूं बेटा, पर तेरे पापा दिल के मरीज हैं. एक हार्टअटैक झेल चुके हैं. ऐसे में उन्हें अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा.’’

‘‘तो तुम दुर्गा को भेज सकती हो न? उस के फाइनल एग्जाम्स भी हो चुके हैं.’’

‘‘ठीक है. मैं उस से पूछ कर तुम्हें फोन करती हूं. अभी वह घर पर नहीं है.’’

दुर्गा अमोलिका की छोटी बहन थी. वह संस्कृत में एमए कर रही थी. अमोलिका की शादी एक माइनिंग इंजीनियर जतिन से हुई थी. उस की पोस्टिंग झारखंड और ओडिशा के बौर्डर पर मेघाताबुरू में एक लोहे की खदान में थी. वह खदान जंगल और पहाड़ों के बीच में थी, हालांकि वहां सारी सुविधाएं थीं. बड़ा सा बंगला, नौकरचाकर, जीप आदि. कंपनी का एक अस्पताल भी था जहां सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध थीं. फिर भी अमोलिका को बैडरैस्ट के चलते कोई अपना, जो चौबीसों घंटे उस के साथ रहे, चाहिए था. अमोलिका के मातापिता ने छोटी बेटी दुर्गा से इस बारे में बात की. दुर्गा बोली कि ऐसे में दीदी का अकेले रहना ठीक नहीं है. वह अमोलिका के यहां जाने को तैयार हो गई. उस के जीजा जतिन खुद आ कर उसे मेघाताबुरू ले गए.

दुर्गा के वहां पहुंचने के 2 हफ्ते बाद ही अमोलिका को पेट दर्द हुआ. उसे अस्पताल ले जाया गया. डाक्टर ने उसे भरती होने की सलाह दी और कहा कि किसी भी समय डिलीवरी हो सकती है. अमोलिका ने भरती होने के तीसरे दिन एक बेटे को जन्म दिया. पर बेटे को जौंडिस हो गया था, डाक्टर ने बच्चे को एक सप्ताह तक अस्पताल में रखने की सलाह दी. जतिन और दुर्गा प्रतिदिन विजिटिंग आवर्स में अस्पताल आते और खानेपीने का सामान दे जाते थे. एक दिन जतिन ने जीप को कुछ जरूरी सामान, दवा आदि लेने के लिए शहर भेज दिया था. दुर्गा मोटरसाइकिल पर ही उस के साथ अस्पताल आई थी. उस दिन मौसम खराब था. अस्पताल से लौटते समय बारिश होने लगी. दोनों बुरी तरह भीग गए थे. दुर्गा मोटरसाइकिल से उतर कर गेट का ताला खोल रही थी. उस के गीले कपड़े उस के बदन से चिपके हुए थे जिस के चलते उस के अंगों की रेखाएं स्पष्ट झलक रही थीं. जतिन के मन में तरंगें उठने लगी थीं.

ताला खुलने पर दोनों अंदर गए. बिजली गुल थी. दुर्गा सीधे बाथरूम में गीले कपड़े बदलने चली गई. इस बात से अनजान जतिन तौलिया लेने के लिए बाथरूम में गया. वह रैक पर से तौलिया उठाना चाहता था. दुर्गा साड़ी खोल कर पेटीकोट व ब्लाउज में थी. उस ने नहाने की सोच कर हैंडशावर हाथ में ले रखा था. उस ने दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था ताकि कुछ रोशनी अंदर आ सके. अचानक किसी की उपस्थिति महसूस होने पर उस ने पूछा, ‘‘अरे आप, जीजू, अभी क्यों आए? निकलिए, मैं बंद कर लेती हूं.’’ इतना कह कर उस ने खेलखेल में हैंडशावर से जतिन को गीला कर दिया. जतिन बोलता रहा, ‘‘यह क्या कर रही हो? मुझे पता नहीं था कि तुम अंदर हो़’’

‘‘मुझे भी पता नहीं, अंधेरे में पानी किधर जा रहा है,’’ और वह हंसने लगी. ‘‘रुको, मैं बताता हूं पानी किधर छोड़ा है तुम ने. यह रहा मैं और यह रही तुम,’’ इतना बोल कर जतिन ने उसे बांहों में भर लिया. दुर्गा को भी लगा कि उस का गीला बदन तप रहा है.

‘‘क्या कर रहे हैं आप? छोडि़ए मुझे.’’

 

‘‘अभी कहां कुछ किया है मैं ने?’’

दुर्गा को अपने भुजबंधन में लिए हुए ही एक चुंबन उस के होंठों पर जड़ दिया जतिन ने. इस के बाद तपिश खत्म होने पर ही अलग हुए वे दोनों. दुर्गा बोली, ‘‘जो भी हुआ, वह हरगिज नहीं होना चाहिए था. क्षणिक आवेश में आ कर हम दोनों ने अपनी सीमाएं तोड़ डालीं. जरा सोचिए, दीदी को जब कभी यह बात मालूम होगी तो उस पर क्या गुजरेगी.’’

जतिन बोला, ‘‘अब जाने दो, जो हुआ सो हुआ. उसे बदला तो नहीं जा सकता. ठीक तो मैं भी नहीं समझता हूं, पर बेहतर होगा अमोलिका को इस बारे में कुछ भी पता न चले.’’

इस घटना के एक सप्ताह बाद अमोलिका भी अस्पताल से घर आई. उस का बेटा बंटी ठीक हो गया था. घर में सभी खुश थे. दुर्गा भी मौसी बन कर प्रसन्न थी. वह अपनी दीदी और भतीजे की देखभाल अच्छी तरह कर रही थी. जतिन ने शानदार पार्टी दी थी. अमोलिका के मातापिता भी आए थे. एक सप्ताह रह कर वे लौट गए. लगभग 2 महीने तक सबकुछ सामान्य रहा. दुर्गा की तबीयत ठीक नहीं रह रही थी. अमोलिका ने जतिन से कहा, ‘‘इसे थोड़ा डाक्टर को दिखा लाओ.’’

दुर्गा को अपने अंदर कुछ बदलाव महसूस होने लगा था. पीरियड मिस होने से वह अंदर से डरी हुई थी. जतिन दुर्गा को ले कर अस्पताल गया. वहां लेडी डाक्टर ने चैक कर कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है, सबकुछ नौर्मल है. दुर्गा मां बनने वाली है. जतिन और दुर्गा एकदूसरे को आश्चर्य से देख रहे थे. पर डाक्टर के सामने बनावटी मुसकराहट दिखाते रहे ताकि डाक्टर को सबकुछ नौर्मल लगे.

अपनी अपनी नजर : भाग 1

अभी थोड़ी देर पहले मेरी बेटी सुरभि जो बात मुझे सुना कर गई वह मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकती थी. वह तो कह कर जा चुकी थी, लेकिन उस के शब्दों की मार मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी, ‘‘सारी गलती आप की है मम्मी, आप ही इन बातों की जिम्मेदार हैं,’’ और उस की आखिरी कही बातें तो मुझे अंदर तक तोड़ गई थीं, ‘‘आप लाइफ में बैलेंस नहीं रख सकीं, मम्मी.’’

सालों पहले का दृश्य मेरी आंखों के सामने किसी फिल्म के दृश्य की तरह घूम गया. मेरे पापा डा. सुमित बंसल के अस्पताल की गिनती शहर के बड़े अस्पतालों में होती थी. वह आर्थिक और सामाजिक स्तर पर जितने सफल थे, उन का वैवाहिक जीवन मुझे उतना ही असफल लगता था. सुनंदा के नाम से मैं डा. सुमित की इकलौती बेटी थी. बचपन से मातापिता के बीच लड़ाई- झगड़ा देखते रहने के बावजूद मैं कभी यह नहीं समझ पाई कि उन दोनों में गलत कौन था. मम्मी को पापा से एक ही शिकायत थी कि वह घर को समय नहीं देते और उन की यह शिकायत बिलकुल सही थी. तब मेरी समझ में यह नहीं आता था कि आखिर पापा इतने व्यस्त क्यों रहते हैं? आखिर सारी दुनिया के पुरुष काम करते हैं पर वे तो इतने व्यस्त नहीं रहते. पापा के पास किसी फंक्शन पार्टी में जाने का समय नहीं होता था. वह हम दोनों मांबेटी को साथ जाने के लिए कहते लेकिन मम्मी उन के साथ जाने पर अड़ जातीं और जाने का कार्यक्रम कैंसिल हो जाता. मम्मी के आंसू बहने शुरू हो जाते तो पापा चिढ़ कर वहां से उठ जाते. एकदूसरे की बातें सुनना और समझना तो दूर उन दोनों को अपनी बात कहने का ढंग भी नहीं था.

दोनों की जिद में मैं दोनों की तरफ से पिस जाती थी. धीरेधीरे मैं मम्मीपापा से दूर होती जा रही थी. पापा के पास मेरे लिए समय नहीं था मगर मैं मम्मी से भी दूर होती जा रही थी जबकि ऐसी स्थितियों मेें बेटी आमतौर पर मां की दोस्त बन जाती है. मैं ने भी थोड़ीबहुत कोशिश की थी मम्मी को समझाने की, ‘मम्मी, सब जानते हैं कि पापा बहुत व्यस्त हैं लेकिन अगर वह नहीं जा सकते तो इस का यह मतलब नहीं है कि हम भी कहीं न जाएं.’

मम्मी भड़क जातीं, ‘हां, हां, पूरा देश तुम्हारे पापा के कंधों पर ही तो खड़ा है. आखिर सारी दुनिया के पुरुष काम करते हैं, कोई तेरे पापा अकेले तो हैं नहीं. बात इतनी सी है कि उन की नजर में मेरा कोई महत्त्व नहीं है. वैसे भी घर में मेहमान की तरह आते हैं.’ मैं समझ नहीं पा रही थी कि मम्मी हर बात को नेगेटिव तरह से क्यों देखती हैं. पापा के व्यवसाय को देखते हुए उन की मजबूरियों को क्यों नहीं समझतीं. मैं मम्मी के पास बैठी उन्हीं के खिलाफ सोचती रहती. ऐसा नहीं था कि मैं पापा को सही समझती थी. मुझे खुद यही लगता था कि पापा को घर में कोई रुचि नहीं और न ही उन्हें मेरे और मम्मी के होने या न होने से कोई फर्क पड़ता है लेकिन समय के साथसाथ मुझे ऐसा लगने लगा था कि पापा के उस ठंडे व्यवहार का कारण मम्मी का अपना ही व्यवहार है.

जीवन रुटीन पर चल रहा था. मेरा बी.काम. पूरा होने वाला था. उन्हीं दिनों देश के कई भागों में आए भूकंप ने पूरे देश को थर्रा दिया था. टेलीविजन पर लोगों से रक्तदान की अपील की जा रही थी. पापा के अस्पताल में रक्तदान का काम चल रहा था. मैं भी अचानक पहुंच गई. पापा मुझे देख कर हैरान रह गए. बस, इतना ही बोले, ‘तुम यहां कैसे?’ मेरे कुछ कहने से पहले ही वहां जूनियर डाक्टरों का एक गु्रप आया और पापा उन से बातें करने में व्यस्त हो गए और मैं कोने में खड़ी थी. मैं ने पलट कर देखा तो पाया कि पापा लोगों की भीड़ में झुंझलाए हुए खड़े थे. मैं सोचने लगी कि एक तो पापा पर इतना काम का बोझ है ऊपर से काम करने के बजाय लोग उन का समय खराब कर रहे हैं. ऐसे में पापा का दिमागी तनाव आसमान से बातें करने लगता होगा.

मैं बेखयाली में पापा की तरफ बढ़ी तो उन की नजर भी मुझ पर पड़ी और उन्होंने किसी को आवाज दे कर कहा, ‘अरे, समीर, यह मेरी बेटी सुनंदा है और सुनंदा, यह डाक्टर समीर हैं,’ इस छोटे से परिचय के साथ उन्होंने मुझे रक्तदान के लिए डा. समीर के साथ भेज दिया.

प्यार का तीन पहिया : भाग 1

‘‘जी मैडम, कहिए कहां चलना है?’’

‘‘कनाट प्लेस. कितने रुपए लोगे?’’

‘‘हम मीटर से चलते हैं मैडम. हम उन आटो वालों में से नहीं हैं जिन की नजरें सवारियों की जेबों पर होती हैं. जितने वाजिब होंगे, बस उतने ही लेंगे.’’

मैं आटो में बैठ गई. आटो वाला अपनी बकबक जारी रखे हुए था, ‘‘मैडम, दुनिया देखी है हम ने. बचपन का समय बहुत गरीबी में कटा है, पर कभी किसी सवारी से 1 रुपया भी ज्यादा नहीं लिया. आज देखो, हमारे पास अपना घर है, अपना आटो है.’’

‘‘आटो अपना है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘बिलकुल मैडम, किस्तों पर लिया था. साल भर में सारी किस्तें चुका दीं. अब जल्द ही टैक्सी लेने वाला हूं.’’

‘‘इतने रुपए कहां से आए तुम्हारे पास?’’

‘‘ईमानदारी की कमाई के हैं, मैडमजी. दरअसल, हम सिर्फ आटो ही नहीं चलाते विदेशी सैलानियों को भारत दर्शन भी कराते हैं. यह देखो, हर वक्त हमारे आटो में दिल्ली के 3-4 मैप तो रखे ही होते हैं. विदेशी सैलानी एक बार हमारे आटो में बैठते हैं, तो शाम से पहले नहीं छोड़ते. मैं सारी दिल्ली दिखा कर ही रुखसत करता हूं उन्हें. इस से मन तो खुश होता ही है, अच्छीखासी कमाई भी हो जाती है. कुछ तो 10-20 डौलर अतिरिक्त भी दे जाते हैं. लो मैडम, आ गई आप की मंजिल. पूरे 42 रुपए, 65 पैसे बनते हैं.’’

‘‘50  रुपए का नोट है मेरे पास. बाकी लौटा दो,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैडम चेंज नहीं है हमारे पास? आप देखो अपने पर्स में.’’

‘‘नहीं है मेरे पास. बाकी 500-500 के नोट ही हैं.’’

‘‘तो फिर छोड़ो न मैडमजी, बाद में कभी बैठ जाना. तब हिसाब कर लेंगे और वैसे भी इतना तो चलता ही है,’’ वह बोला.

‘‘ऐसे कैसे चलता है? पैसे वापस करो.’’

‘‘क्या मैडम, 5-6 रुपयों के लिए इतनी चिकचिक? 5-6 रुपए छोड़ने पर कौन सा आप गरीब हो जाओगी?’’

‘‘बात रुपयों की नहीं, नीयत की है.’’

‘‘क्या बात करती हो मैडम? कोई और आटो वाला होता तो 60-70 रुपए से कम में बैठाता ही नहीं.’’

‘‘हद करते हो,’’ कह कर मैं गुस्से में आटो से उतर गई और वह खीखी कर हंसता रहा.

औफिस आ कर भी काफी देर तक मेरा मूड अजीब सा रहा. क्या करूं? औफिस आते वक्त हड़बड़ी में आटो लेना ही पड़ता है पर इस तरह का कोई अनुभव हो जाए तो सारा दिन ही खराब हो जाता है.

शाम को जब मैं औफिस से निकली तो काफी थक चुकी थी. तबीयत भी ठीक नहीं थी. चलने का बिलकुल मन नहीं कर रहा था. मैट्रो स्टेशन औफिस से दूर है, इसलिए आटो ही देखने लगी. पास ही एक खाली आटो वाला दिखा. मैं ने जल्दी से उसे हाथ दिया. पर यह क्या, सामने वही आटो वाला था, जिस ने सुबह मेरा दिमाग खराब किया था.

मजबूरी थी, इसलिए मैं ने उसे चलने को कहा तो वह रूखे अंदाज में बोला, ‘‘मुझे नहीं जाना मैडम. आप दूसरा आटो देख लो.’’

मेरा मन किया कि उस का सिर फोड़ दूं. पर किसी तरह खुद पर कंट्रोल कर मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ चली.

तभी उस की तेज, भद्दी आवाज सुनाई दी, ‘‘ओ वसुधाजी, अरे ओ वसुधाजी, आओ बैठो, मैं आप को छोड़ दूं.’’

मेरा मन गुस्से से जल उठा कि मैं ने कहा तो साफ इनकार कर गया और अब किसी लड़की को आवाजें लगा रहा है. फिर मैं ने पलट कर देखा तो पाया कि वह आटो ले कर जिस लड़की की तरफ बढ़ रहा है, वह वसुधा थी, जो एक पैर से अपाहिज थी और धीरेधीरे मैट्रो की तरफ बढ़ रही थी. वसुधा और मेरा परिचय मैट्रो में ही हुआ था. वह आटो वाले को इनकार करते हुए मेरे साथ मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ चली.

लगभग साल भर में हम कई बार मिले थे. वह बहुत बतियाती थी और घरबाहर की बहुत बातें हम लोग शेयर कर चुके थे. अपाहिज होने के बावजूद उस में गजब का आत्मविश्वास था. वह जौब करती थी और दिल्ली में अपनी बूआ के साथ अकेली रहती थी. सीपी में उस का औफिस और घर करोलबाग में था, जहां मैं भी रहती थी. सफर में ही हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी.

अगले दिन हम दोनों औफिस से एक ही वक्त पर निकले. वह आटो वाला लपक कर आगे बढ़ा और हमारे करीब आटो रोकते हुए बोला, ‘‘वसुधाजी, बैठिए न… छोड़ दूंगा आप को.’’

वसुधा ने नकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘नहीं. तुम जाओ, मैं चली जाऊंगी.’’

आटो वाला अड़ा रहा, ‘‘आप ऐसा क्यों कह रही हैं? मैं इतना बुरा इंसान नहीं. बैठ जाओ, घर तक सलामत पहुंचा दूंगा.’’

वसुधा ने प्रश्नवाचक नजरों से मेरी तरफ देखा. मैं समझ नहीं सकी कि आखिर माजरा क्या है? फिर बोली, ‘‘चलो बैठ जाते हैं प्रीति. वैसे भी देर हो रही है.’’

मैं ने इनकार किया, ‘‘तू बैठ, मैं किसी और में चली जाऊंगी.’’

‘‘तो फिर मैं तेरे साथ ही चलती हूं,’’ और वह मेरे साथ हो ली.

तभी आटो वाला मुझ से बड़ी नम्रता से बोला, ‘‘बहनजी, प्लीज आप भी बैठ जाओ, वसुधाजी तभी बैठेंगी. किराया भी जितना मन करे दे देना. न भी दोगी तो भी चलेगा,’’ और फिर मेरी तरफ मुसकरा कर देखा.

उस की मुसकान मुझे व्यंग्यात्मक नहीं, सहज सरल लगी अत: मैं आटो में बैठ गई. रास्ते भर तीनों खामोश रहे. मैं सोच रही थी, आज इस की बकबक कहां गई. उस ने सीधे वसुधा के घर के आगे आटो रोका.

सिसकता इश्क़ : भाग 1

जब से रशिका की मुलाकात हनीफ से हुई है उस के दिल में एक अजीब सी हलचल मची हुई है. हनीफ की शख्सियत रशिका के अंदर क‌ई सवाल खड़े कर रही है. औफिस में लोगों के बीच होती कानाफूसी रशिका को और अधिक विचलित कर देती है. कोई कहता है कि अरे, इन के तो खून में ही बेवफाई होती है, तो कोई कहता, इन लोगों को तो दूसरों की भावनाओं संग खेलने और फिर उसे पूरी तरह से तबाह कर छोड़ देने की बचपन से तालीम दी जाती है. जिहाद…जिहाद…जिहाद कहकह कर इन्हें जिहादी बना दिया जाता है.

रशिका के कानों पर जब भी ये बातें पड़तीं, वह तिलमिला उठती. लेकिन कहती किसी से कुछ नहीं. उसे अभी इस औफिस में जौइन किए हुए केवल एक ही महीना हुआ था. लेकिन इस एक ही महीने में उस ने इतनी दफे हनीफ के बारे में गलत सुन लिया था कि उस के लिए यह तय कर पाना मुश्किल हो गया था कि वह जो सुन रही है उस पर यकीन करे या फिर जो देख रही है उस पर.

बचपन से रशिका यह सुनती आई है कि जो दिखता है वह हमेशा सच नहीं होता है. इस के अलावा उसे अपने परिवार द्वारा यह सबक भी कंठस्थ करा दिया गया है कि हनीफ जैसों को क़ौम के लोगों से दूर ही रहना चाहिए क्योंकि ये किसी के भी सगे नहीं होते. इसलिए तो उस ने अपनी सब से अच्छी व प्यारी सखी गजाला की दोस्ती पर दाग लगा दिया था. आज भी उस के स्मृतिपटल पर अंकित है वह वाकेआ जो उस के दिल में दास्तां ए दर्द बन कर दफन है और जिसे वह अब तक कभी भुला नहीं पाई. आज भी उसे ऐसा लगता है जैसे उस के अपने ही दकियानूसी सोच और परिवार वालों के दबाव की वजह से उस ने अपनी अभिन्न सहेली और शुभचिंतक गजाला को खो दिया है.

इस एक महीने में बमुश्किल रशिका का हनीफ से केवल 2 दफे ही आमनासामना हुआ था. लेकिन दोनों ही बार जब भी उस की मुलाकात हनीफ से हुई, उस के कुशल व्यवहार ने रशिका को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि औफिस के लोग जो हनीफ के पीठपीछे कहते हैं उस में कोई सचाई है भी या नहीं. जब वह पहली बार इंदौर से यहां हैदराबाद आई तो औफिस गेट पर उस की पहली मुलाकात हनीफ से ही हुई थी और हनीफ ने इतनी शालीनतापूर्वक रशिका को एचआर डिपार्टमैंट का रास्ता बताया था कि एक पल के लिए रशिका की निगाह हनीफ पर थम गई थी.

दूसरी बार जब रशिका को औफिस एकोमोडेशन के लिए औनलाइन फार्म भरना था और जिस के लिए उसे अपनी ही औफिस बिल्डिंग के तीसरे फ्लोर पर एडमिनिस्ट्रेटिव औफिस जाना पड़ा, वहां उस का हनीफ से मिलना हुआ और एक बार फिर हनीफ से मिल कर उसे हनीफ सज्जन, सभ्य और दूसरों की मदद करने वाला व्यक्ति ही लगा.

औफिस जौइन करने के बाद से ही रशिका के कानों में पड़ती हनीफ के विरुद्ध क‌ई गलत बातें सुनने की वजह से रशिका ने उस दिन हनीफ को देख कर भी अनदेखा कर दिया था लेकिन हनीफ ने सामने से आ कर उस का फौर्म भरने से ले कर उसे सबमिट करने तक में उस की मदद की. रशिका का दिल इन एकदो मुलाकातों में ही हनीफ का होने लगा था. लेकिन रशिका दुविधा में थी कि वह कैसे उस इंसान से प्यार कर सकती है जो उस की जाति तो दूर, उस के धर्म का भी नहीं है और जो अपनी पहली पत्नी को तलाक दे चुका है. वह भी उस पत्नी को जिस से उस ने प्रेमविवाह किया था और उन का एक बेटा भी है.

रशिका खुद को समझाने लगी और उस ने हनीफ से एक दूरी बना ली ताकि कभी गलती से भी उस का हाल ए दिल हनीफ के समाने उस की नज़रों से बयां न हो जाए. इस बीच कंपनी की ओर से एक ग्रुप प्रोजैक्ट में रशिका, हनीफ और उन के साथ औफिस के 3 और स्टाफ को 15 दिनों के लिए बैंगलुरु जाने का और्डर हुआ.

अम्मा : भाग 1

आफिस से फोन कर अजय ने नीरा को बताया कि मैं  आनंदधाम जा रहा हूं, तो उस के मन में विचारों की बाढ़ सी आ गई. आनंदधाम यानी वृद्धाश्रम. शहर के एक कोने में स्थित है यह आश्रम. यहां ऐसे बेसहारा, लाचार वृद्धों को शरण मिलती है जिन की देखभाल करने वाला अपना इस संसार में कोई नहीं होता. रोजमर्रा की सारी सुविधाएं यहां प्रदान तो की जाती हैं पर बदले में मोटी रकम भी वसूली जाती है.

बिना किसी पूर्व सूचना के क्यों जा रहा है अजय आनंदधाम? जरूर कोई गंभीर बात होगी.

यह सोच कर नीरा कार में बैठी और अजय के दफ्तर पहुंच गई. उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, सब खैरियत तो है?’’

‘‘नीरा, अम्मां, पिछले 1 साल से आनंदधाम में रह रही हैं. आश्रम से महंतजी का फोन आया था. गुसलखाने में फिसल कर गिर पड़ी हैं.’’

अजय की आवाज के भारीपन से ही नीरा ने अंदाजा लगा लिया था कि अम्मां के अलगाव से मन में दबीढकी भावनाएं इस पल जीवंत हो उठी हैं.

‘‘हम चलते हैं, अजय. सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘अच्छा होगा मां को यदि किसी विशेषज्ञ को दिखाएं.’’

‘‘ठीक है, रुपए बैंक से निकलवा कर चलते हैं. पता नहीं कब कितने की जरूरत पड़ जाए,’’ सांत्वना के स्वर में नीरा ने कहा तो अजय को तसल्ली हुई.

‘‘मैं तो इस घटना को सुनने के बाद इतना परेशान हो गया था कि रुपयों का मुझे खयाल ही नहीं आया. प्राइवेट अस्पताल में रुपए की तो जरूरत पड़ेगी ही.’’

कुछ ही समय में नीरा रुपए ले कर आ गई. कार स्टार्ट करते ही पत्नी की बगल में बैठे अजय की यादों में 1 साल पहले का वह दृश्य सजीव हो उठा जब तिर्यक कुटिल दृष्टि से नीरा ने अम्मां को इतना अपमानित किया था कि वह चुपचाप अपना सामान बांध कर घर से चली गई थीं.

जातेजाते भी अम्मां की तीक्ष्ण दृष्टि नीरा पर टिक गई थी.

‘अजय, मेरी जिंदगी बची ही कितनी  है? मेरे लिए तू अपनी गृहस्थी में दरार मत डाल,’ अम्मां की गंभीर आवाज और अभिजात दर्पमंडित व्यक्तित्व की छाप वह आज तक अपने मानसपटल से कहां मिटा पाया था.

‘जाना तो अम्मां सभी को है… और रही दरार की बात, तो वह तो कब की पड़ चुकी है. अब कहीं वह दरार खाई में न बदल जाए. यह सोच लीजिए,’ अम्मां के सधे हुए आग्रह को तिरस्कार की पैनी धार से काटती हुई नीरा बोली. वह तो इसी इंतजार में बैठी थी कि कब अम्मां घर छोडे़ं और उसे संपूर्ण सफलता हासिल हो.

कहीं अजय की भावुकता अम्मां के पैरों में पुत्र प्रेम की बेडि़यां डाल कर उन्हें रोक न ले, इस बात का डर था नीरा को इसलिए भी वह और अधिक तल्ख हो गई थी.

अगले ही दिन अजय ने फोन पर कुटिल हंसी की खनक में डूबी और बुलंद आवाज की गहराई में उभरते दंभ की झलक के साथ नीरा को किसी से बात करते सुना:

‘जिंदगी भर अब पास न फटकने देने का इंतजाम कर लिया है. कुशलक्षेम पूछना तो दूर, अजय श्राद्ध तक नहीं करेगा अम्मां का.’

उस दिन पत्नी के शब्दों ने अजय को झकझोर कर रख दिया था. समझ ही नहीं पाया कि यह क्या हो गया. पर जब आंखों से परदा हटा तो उस ने निर्णय लिया कि किसी भी हाल में अम्मां को जाने नहीं देगा. रोया, गिड़गिड़ाया, हाथ जोडे़, पैर छुए, पर अम्मां रुकी नहीं थीं. दयनीय बनना उन की फितरत में नहीं था. स्वाभिमानी शुरू से ही थीं.

अम्मां के जाने के बाद उन के तकिए के नीचे से एक लिफाफा मिला था. लिखा था, ‘इनसान क्यों अपनेआप को परिवार की माला में पिरोता है? इसीलिए न कि परिवार का हर संबंधी एकदूसरे के लिए सुखदुख का साथी बने. लेकिन जब वक्त और रिश्तों के खिंचाव से परिवार की डोर टूटने लगे तो अकेले मोती की तरह इधरउधर डोलने या अपने इर्दगिर्द बने सन्नाटे में दुबक जाने के बजाय वहां से हट जाना बेहतर होता है.

‘हमेशा के लिए नहीं, कुछ समय के लिए ही जा रही हूं पर यह समय, कुछ दिन, कुछ महीने या फिर कुछ सालों का भी हो सकता है. दिल से दिल के तार जुड़े होते हैं और ये तार जब झंकृत होते हैं तो पता चल जाता है कि हमें किसी ने याद किया है. जिस पल हमें ऐसा महसूस होगा, हम जरूर मिलेंगे, अम्मां.’

तेज बारिश हो रही थी. गाड़ी से बाहर देखने की कोशिश में अजय ने अपना चेहरा खिड़की के शीशे से सटा दिया. बाहर खिड़की के कांच पर गिर रही एकएक बूंद धीरेधीरे एकसाथ मिल कर पूरे कांच को ढक देती थी. जरा सा कांच पोंछने पर अजय को हर बार एक चेहरा दिखाई देता था. ढेर सारा वात्सल्य समेटे, झुर्रियों भरा वह चेहरा, जिस ने उसे प्यार दिया, 9 माह अपनी कोख में रखा, अपने रक्तमांस से सींचा, आंचल की छांव दी. उस का स्वास्थ्य, उस की पढ़ाई, उस की खुशी, अम्मां की पूरी दुनिया ही अजय के इर्दगिर्द सिमटी थी.

जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में नीरा और अजय विवाह सूत्र में बंधे थे उन हालात में नीरा को परिवार का अंश बनने के लिए अम्मां को न जाने कितना संघर्ष करना पड़ा था.

लाखों रुपए के दहेज का प्रस्ताव ले कर, कई संपन्न परिवारों से अजय के लिए रिश्ते आए थे, पर अम्मां ने बेटे की पसंद को ही सर्वोपरि माना. अम्मां यही दोहराती रहीं कि गरीब घर की लड़की अधिक संवेदनशील होगी. घर का वातावरण सुखमय बनाएगी, अच्छी पत्नी और सुघड़ बहू साबित होगी.

पासपड़ोस के अनुभवों, किस्से- कहानियों को सुन कर अजय ने यही निष्कर्ष निकाला था कि बहू के आते ही घर का वातावरण बदल जाता है. अजय का मन किसी अज्ञात आशंका से घिरा है, अम्मां यह समझ गई थीं. बड़ी ही समझदारी से उन्होंने अजय को समझाया था :

‘बेटा, लोग हमेशा बहुओं को ही दोषी ठहराते हैं, पर मेरी समझ में ऐसा होता नहीं है. घर में जब भी कोई नया सामान आता है तो पुराने सामान को हटना ही पड़ता है. नया पत्ता तभी शाख पर लगता है जब पुराना उखड़ता है. जब भी किसी पौधे को एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह आरोपित किया जाता है तो वह तभी पुष्पित, पल्लवित होता है जब उसे पर्याप्त मात्रा में खादपानी मिलता है. सामंजस्य, समझौता, समर्पण, दोनों ही पक्षों की तरफ से होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता, तो परिवार बिखरता है.’

अजय आश्वस्त हो गया. अम्मां ने नीरा को प्यार और अपनत्व से और नीरा ने उन्हें सम्मान और कर्तव्यनिष्ठा से अपना लिया. बहू में उन की आत्मा बसती थी. उसे सजतेसंवरते देख अम्मां मुग्धभाव से हिलोरें लेतीं. नीरा की कमियों को कोई गिनवाता तो चट से मोर्चा संभाल लेतीं.

‘मेरी अपर्णा को ही क्या आता था. पर धीरेधीरे जिम्मेदारियों के बोझ तले, सबकुछ सीखती चली गई.’

1 वर्ष बीततेबीतते अजय जुड़वां बेटों का बाप बन गया. अम्मां के चेहरे पर भारी संतोष की आभा झलक उठी. इसी दिन के लिए ही तो वह जैसे जी रही थीं. अस्पताल के कौरीडोर में नर्सों, डाक्टरों से बातचीत करतीं अम्मां को देख कर कौन कह सकता था कि वह घर से बाहर कभी निकली ही नहीं.

लवकुश नाम रखा उन्होंने अपने पोतों का. 40 दिन तक उन्होंने नीरा को बिस्तर से उठने नहीं दिया. अपर्णा को भी बुलवा भेजा. ननदभौजाई गप्पें मारतीं, अम्मां चौका संभालतीं.

‘अब तो महीना होने को आया. मेरी सास तो 21 दिन बाद ही घर की बागडोर मुझे संभालने को कह कर खुद आराम करती हैं,’ अम्मां की भागदौड़ से परेशान अपर्णा ने कहा तो अम्मां ने बुरा सा मुंह बनाया.

‘तेरी ससुराल में होता होगा. थोड़ा-बहुत काम करने से शरीर में जंग नहीं लगता.’

‘थोड़ाबहुत?’ अपर्णा ने आश्चर्य मिश्रित स्वर में पूछा था.

‘संयुक्त परिवार की यही  तो परिभाषा है. जरूरत पड़ने पर एकदूसरे के काम आओ. कच्चा शरीर है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई तो जिंदगी भर का रोना.’

सवा महीना बीत गया. अपर्णा अपनी ससुराल लौट रही थी. अम्मांबाबूजी हमेशा भरपूर नेग देते थे. और इस बार तो लवकुश भी आ गए थे. अपर्णा ने मनुहार की. ‘2 दिन बाद तो मैं चली जाऊंगी. अम्मां, एक बार बाजार तो मेरे साथ चलो.’

‘ऐसा कर, अजय दफ्तर के लिए निकले तो दोनों ननदभावज उस के साथ ही निकल जाओ. जो जी चाहे, खरीद लो. पेमेंट बाबूजी कर देंगे.’

‘आप के साथ जाने का मन है, अम्मां. एक दिन भाभी संभाल लेंगी,’ अपर्णा ने मचल कर कहा तो अम्मां की आंखें नम हो आई थीं.

‘फिर कभी सही. तेरे जाने की तैयारी भी तो करनी है.’

अपर्णा समझ गई थी कि बेटी के रिक्त स्थान ने अपनी जगह शून्य तो बनाया हुआ है, पर बाबूजी और अम्मां, बहू के नाज की डोलियां भी बड़े लाड़ से उठा रहे हैं.

बाबूजी की मृत्यु के बाद बहुत कुछ बदल गया. उन 13 दिनों में ही अम्मां बेहद थकीथकी सी रहने लगी थीं. नीरा और अजय अम्मां का बेहद ध्यान रख रहे थे पर आनेजाने वाले लंबी सांस भर कर, अम्मां को चेतावनी जरूर दे जाते थे.

‘पति के जाने के बाद पत्नी का सबकुछ छिन जाता है. अधिकार, आधिपत्य सबकुछ,’ दूसरी, पहली के सुर में सुर मिला कर सर्द आह भरती.

जितने मुंह उतनी बातें. ऐसी नकारात्मक सोच से कहीं उन के हंसतेखेलते परिवार का वातावरण दूषित न हो जाए, अम्मां ने 4 दिनों में ही बाबूजी का उठाला कर दिया.

लोगों ने आलोचना में कहा, ‘बड़ी माडर्न हो गई है लीलावती,’ पर अम्मां तो अम्मां ठहरीं. अपने परिवार की खुशियों के लिए रूढि़यों और परंपराओं का त्याग, सहर्ष ही करती चली गईं.

लोगों की आवाजाही बंद हुई तो दिनचर्या पुराने ढर्रे पर लौट आई. अम्मां हर समय इसी  कोशिश में रहतीं कि घर का वातावरण दूषित न हो. उसी तरह बच्चों के साथ हंसतीखेलतीं, घर का कामकाज भी करतीं लेकिन 9 बजे के बाद वह जग नहीं पाती थीं और कमरे का दरवाजा भेड़ कर सो जातीं. अजय अच्छी तरह समझता था कि 12 बजे तक जागने वाली अम्मां 9 बजे कभी सो ही नहीं सकतीं. आखिर उन्हीं की गोद में तो वह पलाबढ़ा था.

एक रात 12 बजे, दरवाजे की दरार में से पतली प्रकाश की किरण बाहर निकलती दिखाई दी तो अजय उन के कमरे में चला गया. अम्मां लैंप के मद्धिम प्रकाश में स्वामी विवेकानंद की कोई पुस्तक पढ़ती जा रही थीं और रोती भी जा रही थीं. अजय ने धीरे से उन के हाथ से पुस्तक ली और बंद कर के पास ही स्टूल पर रख कर उन की बगल में बैठ गया. अम्मां उठ कर पलंग पर बैठ गईं और बोलीं, ‘तू सोया नहीं?’

‘आप नहीं सोईं तो मैं कैसे सो जाऊं? इस तरह से तो आप कोई बीमारी पाल लेंगी,’ अजय ने चिंतित स्वर में कहा.

‘अच्छा है, मेरे जीने का अब मकसद ही क्या रह गया है. तेरे बाबूजी ने मुझे सबकुछ दे दिया. धन, ऐश्वर्य, मानसम्मान. जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है मुझे. दोनों बच्चों की शादी हो गई. अपनीअपनी गृहस्थी में रमे हुए हो तुम दोनों. नातीपोतों का मुंह देख लिया. तेरे बाबूजी के बिना अब एकएक दिन भारी लग रहा है.’

अजय ने पहली बार अम्मां को कमजोर पड़ते देखा था, ‘और सुबहशाम मैं आप का चेहरा न देखूं तो मुझे चैन पड़ता है क्या? कभी सोचा है अम्मां कि मैं कैसे रह पाऊंगा तुम्हारे बिना?’

अम्मां ने बेटे के थरथराते होंठों पर हाथ रख दिया. बेटे की आंखों से टपका एकएक आंसू का कतरा उन्होंने अपने आंचल में समेट लिया था.

उस दिन के बाद से अजय अम्मां को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता था. मां को अकेलापन महसूस न हो, इसलिए लवकुश अम्मां के पास ही सोने लगे. वैसे भी उन्होंने ही उन्हें पाला था. अब वह बच्चों को स्कूल बस तक छोड़ने और लेने भी जाने लगीं. घर लौट कर उन का होमवर्क भी अम्मां ही करवा देती थीं. अजय हर काम अम्मां से पूछ कर या बता कर करता. यहां तक कि सुबहशाम सब्जी कौन सी बनेगी यह भी अम्मां से ही पूछा जाता. शाम को अपर्णा भी पति के साथ आ जाती थी.

इस तरह घर का माहौल तो बदल गया पर नीरा को अपना अधिकार छिनता सा लगने लगा. पति का अम्मां के प्रति जरूरत से ज्यादा जुड़ाव उसे पसंद नहीं आया. उठतेबैठते अजय को उलाहना देती, ‘ऐसी भी क्या मातृभक्ति कि उठतेबैठते, सोतेजागते मां की आराधना ही करते रहो.’

‘नीरा, कुछ ही समय की बात है. समय स्वयं मरहम का काम करता है. धीरेधीरे अम्मां भी सहज होती चली जाएंगी. बाबूजी और अम्मां का साथ दियाबाती का साथ था. जरा सोचो, कैसे जीती होंगी वह बाबूजी की मृत्यु के बाद.’

‘अजी, पिताजी तो मेरे भी गुजरे थे. 2-4 दिन रह कर सामाजिकता निभाई और अपने घर के हो कर रह गए. यहां तो 6 माह से गमी का माहौल चल रहा है. ऊपर से अपर्णा दीदी अलग धमक पड़ती हैं.’

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