story in hindi
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इसी तरह इस 3 जनवरी को एक शख्स पत्नी को वीडियोकौल कर के फांसी पर लटक गया. पति ने पत्नी को वीडियोकौल किया और फिर उस के ही सामने फांसी लगा ली. पत्नी रोरो कर पति को सुसाइड नहीं करने के लिए रोकती रही. मगर पति ने उस की एक न सुनी. मृतक युवक श्याम सुंदर का पत्नी से झगड़ा हुआ था. इस के बाद उस ने सुसाइड कर लिया.
नोएडा के लौ रेजीडेंसी के टावर 2 से एक महिला ने इस 10 जनवरी को 16वें फ्लोर से नीचे छलांग लगा कर जान दे दी. उस की गोद में 6 महीने की बच्ची भी थी. मां और बच्ची की मौके पर ही मौत हो गई. महिला अपने परिवार के साथ रह रही थी और काफी दिनों से बीमारी और डिप्रैशन से जूझ रही थी. महिला का नाम सारिका था.
इसी तरह 11 जनवरी को आईआईटी कानपुर के होस्टल में एमटैक के एक छात्र ने फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली. बीते एग्जाम में परफौर्मेंस खराब होने से वह तनाव में था.
प्रयागराज निवासी 23 साल की अंशिका लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएफए कर रही थी. 10 जनवरी की शाम वह किसी युवक से फोन पर वीडियोकौल से बात कर रही थी जो उस का दोस्त था. इसी दौरान किसी बात पर गुस्सा आने के बाद उस ने फांसी लगा ली. घटना के समय वह रूम में अकेली थी.
5 नवंबर, 2023 को बस्ती में पति से वीडियोकौल पर बात करते हुए एक महिला फंदे से झूल गई थी. दुबई में रह रहे पति से वीडियोकौल पर बात करतेकरते विवाहिता ने पंखे से लटक कर जान दे दी. पत्नी को फंदा लगाते हुए लाइव देखता पति छटपटा कर रह गया. दोनों की 3 साल की बेटी है. 28 वर्षीया साधना सिंह बेटी को ले कर घर पर रहती थी. उस रात पतिपत्नी वीडियोकौलिंग के जरिए बात कर रहे थे. इसी बीच, किसी बात पर दोनों में विवाद हो गया. गुस्से में आ कर साधना सिंह ने आत्महत्या करने की बात कह कर फोन काट दिया.
आत्महत्या की ऐसी घटनाएं लगभग रोज ही सुनने को मिलती रहती हैं. कभी तनाव, कभी किसी पर गुस्सा, कभी अपेक्षा पूरी न हो पाना, कभी असफलता और कभी लाचारीवश लोग खुद अपनी जान देने का फैसला करते हैं. जान देना बहुत बड़ी बात है. मगर आजकल लोग छोटीछोटी बातों पर जान देते हैं. आप जानवरों को देखिए. वे कभी आत्महत्या नहीं करते. मनुष्य ही आत्महत्या करते हैं. मगर यहां भी एक अपवाद है. दरअसल, एक ऐसी जगह है जहां पक्षियों को आत्महत्या करते देखा जाता है.
असम के दिमा हासो जिले की पहाड़ी में स्थित जतिंगा घाटी को पक्षियों का सुसाइड पौइंट कहा जाता है. हर साल सितंबर की शुरुआत के साथ ही आमतौर पर छिपा रहने वाला जतिंगा गांव पक्षियों की आत्महत्या के कारण चर्चा में आ जाता है. यहां न केवल स्थानीय पक्षी बल्कि प्रवासी पक्षी भी इस दौरान पहुंच जाएं तो वे खुदकुशी कर लेते हैं.
इंसान अकसर ऊंची इमारतों से कूद कर या फंदा लगा कर जान देते हैं. पक्षी होने के कारण जाहिर है कि वे इमारत से कूद कर या फांसी लगा कर तो जान नहीं दे सकते. सो, वे तेजी से उड़ते हुए इमारतों या ऊंचे पेड़ों से जानबूझ कर टकरा जाते हैं और तुरंत ही उन की मौत हो जाती है. ऐसा इक्केदुक्के नहीं, बल्कि सितंबर के समय में हर साल हजारों पक्षियों के साथ होता है. ऐसी घटनाएं शाम को 7 से 10 बजे के बीच सब से ज्यादा होती हैं. पक्षी तेज गति से उड़ते हुए आते हैं और गांव में उगे पेड़ों और मकानों से टकराते हैं. उन के टकराते ही उन की मौत हो जाती है.
पक्षियों की मौत क्यों होती है, इस पर पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि इस जगह पर कोई मैग्नेटिक फोर्स है जो इन रहस्यमय मौतों की वजह बन रही है. यहां की जनजाति इस घटना को भूतप्रेतों और अदृश्य ताकतों का काम मानती है. बहुत बार इमारतों से टकरा कर घायल हुए पक्षियों का उपचार और उन्हें खाना खिलाने की भी कोशिश की गई लेकिन ऐसे पक्षियों ने खाना लेने से इनकार कर दिया और इलाज पर भी उन के शरीर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
अमावस और जिस दिन अधिक कुहरा होता है उस दिन भी यहां सब से ज्यादा पक्षियों की मौत होती है. इस घटना के पीछे सचाई क्या है, वह तो खबर नहीं मगर यह सच जरूर है कि हरेक जिंदगी मूल्यवान होती है.
इंसानों की बात करें तो वे ज्यादातर असफलता की स्थिति को न सह पाने के कारण ऐसा करते हैं. विद्यार्थियों के मामले में परीक्षा अच्छी न जाना सब से महत्त्वपूर्ण कारण होता है. आईआईटी के छात्र की आत्महत्या पर बात करें तो उस की वजह यही थी. लाखों खर्च कर जब मांबाप अपने बेटे की सफलता का समाचार सुनने को बेताब होते हैं और बेटा सही परफौर्मैंस नहीं दे पाता तो वह पेरैंट्स का सामना करने से घबराता है. उसे लगता है कि वह पेरैंट्स की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया. उस के दिमाग में तनाव हावी हो जाता है और वह इस परिस्थिति से भागने का विकल्प चुनता है.
ऐसा ही प्रेमप्रसंगों में असफलता मिलने पर भी होता है. इंसान अपने पार्टनर से अपेक्षाएं रखता है मगर वह पूरी न हो तो वह गुस्से में खुद को ही ख़त्म कर डालता है. इस तरह वह अपने पार्टनर को एहसास दिलाना चाहता है कि पार्टनर के बिना उस की जिंदगी का कोई मतलब नहीं. या फिर पार्टनर से अपनी नाराजगी इस तरह जाहिर करता है और सोचता है कि मरने के बाद उस की कीमत पार्टनर को समझ आएगी. पर भला इस से बड़ी बेवकूफी और क्या होगी कि आप ने किसी और के लिए खुद को ख़त्म कर दिया. घरवालों की वर्षों से संजोयी उम्मीदें एक झटके में किसी के लिए तोड़ दीं.
इसी तरह जब किसी अपने पर बहुत गुस्सा आए तो भी इंसान बौखला जाता है और तनाव में आ कर ऐसे कदम उठा लेता है. जीवन में आर्थिक संकट पैदा होने या कर्ज, बीमारी और बेवफाई के चक्रव्यूह में फंसे इंसान भी अक्सर आत्महत्या कर लेते हैं. उन्हें कोई रास्ता नजर नहीं आता तो वे दुनिया को ही अलविदा कह देते हैं.
धर्म ने इंसान के दिलोदिमाग में अपनी पैठ बना रखी है. धर्म ने हमें बताया है कि अपने परिजनों या जीवनसाथी व बच्चों के प्रति हमारे क्या उत्तरदायित्व हैं और यदि कोई इसे पूरा नहीं कर पाता तो उस का जीवन व्यर्थ है. ऐसा इंसान पापी कहलाता है. ऐसे में खुद को तथाकथित पाप का भागीदार बनने से बचने के लिए ऐसा इंसान जीवन को ही खत्म कर डालता है. कंपीटिशन के इस जमाने में यदि बच्चे पेरैंट्स की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते या परिवार का गुजरबसर करने के योग्य नहीं रहते तो भयवश सब खत्म कर डालते हैं. इस की वजह उन की सोच है, जिसे धर्म ने बचपन से गढ़ा है.
यह नजरिया बिलकुल भी उचित नहीं. जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है. जिंदगी में कुछ गलत होता है, कोई रास्ता बंद होता है तो दूसरा रास्ता खुल भी जाता है. बस, जरूरत है नए रास्ते तलाशने की, अपने हौसलों को मजबूत बनाए रखने की. आप हर किसी को खुश नहीं रख सकते. हो सकता है आप अपनों की अपेक्षाओं पर खरे न उतर पाएं. मगर इस से हारने के बजाय नई मंजिल तलाश करें. वक्त बदलते देर नहीं लगती. हिम्मत रखी जाए तो हर समस्या का समाधान मिल जाता है. आवेश में आ कर अपनी कीमती जिंदगी गंवाना कतई सही नहीं है.
Ira Nupur Wedding : हाल ही में आमिर खान की बेटी आयरा खान ने लौंग टर्म बौयफ्रैंड और फिटनैस एक्सपर्ट नूपुर शिखरे से राजस्थान के उदयपुर में शादी की. दोनों ने पहले रजिस्टर्ड मैरिज की और बाद में क्रिश्चियन वैडिंग की. आमिर ने बेटी की शादी में रंग जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. आयरा खान और नूपुर शिखरे ने क्रिश्चियन वैडिंग के दौरान ‘वोउज’ सेरेमनी में हमेशा एकदूसरे का साथ निभाने की शपथ ली. उस दौरान आमिर खान खूब इमोशनल हुए.
बौलीवुड के मिस्टर परफैक्शनिस्ट उस दिन रूमाल से अपने आंसू पोंछते हुए कई बार नजर आए. वहीं, उन की एक्स वाइफ रीना भी बेटी की शादी में इमोशनल नजर आईं. अब आमिर खान ससुर बन गए हैं और अपनी बेटी की अच्छी मैरिड लाइफ देख कर खुश हैं. वे खुद को एक प्राउड फादर महसूस कर रहे हैं क्योंकि एक सही जीवनसाथी का किसी भी लड़के या लड़की के जीवन में मिलना वे कठिन मानते हैं.
एक गेटटुगेदर में वे अपनी फीलिंग को शेयर करते हुए कहते हैं कि, ‘जब मेरी लड़की आयरा, नुपुर शिखरे को डेट कर रही थी तो मैं ने उस से कभी डायरैक्ट नहीं पूछा कि वह किसे डेट कर रही है क्योंकि आज के यूथ इसे पसंद नहीं करते लेकिन मुझे पता चल रहा था कि वह किसी को पसंद करती है. बाद में जब उन्होंने नूपुर की बात कही तो मुझे खुशी मिली, क्योंकि मैं उसे सालों से जानता हूं. वह एक नेकदिल का अच्छा इंसान है और उस का परिवार भी बहुत अच्छा है. आज की तारीख में एक लड़की को अच्छे जीवनसाथी का मिलना बड़ी बात होती है.
अपनी फीलिंग्स के बारे में आमिर ने कहा कि उन्हें एक शहनाई की धुन की तरह महसूस हो रहा है क्योंकि शहनाई में थोड़ी खुशी और गम वाला संगीत होता है और कुछ ऐसा ही उन के साथ भी हुआ है. इस समारोह में उन्होंने एक मेडली गाना अपनी आवाज में गाया, जिसे वे अधिकतर अपनी बेटी को सुनाया करते थे. बता दें कि आयरा खान, आमिर खान और उन की पहली एक्स वाइफ रीना दत्ता की बेटी हैं और बेटी की शादी में रीना ने भी बहुत बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया है. शादी को अरेंज करने की भी पूरी जिम्मेदारी रीना और किरण राव ने ली है, जिस की वजह से आमिर खान कुछ रिलीफ महसूस कर रहे हैं.
देखा जाए तो ऐसी इंटरकास्ट शादियां आजकल अधिकतर लड़के और लड़कियां पसंद कर रहे हैं जिस में रजिस्टर्ड मैरिज मुख्य होती है. शादी का रजिस्ट्रेशन करवाना बेहद जरूरी है. भारत में अब सभी धर्मों (सिख धर्म को छोड़ कर) के लोगों के लिए शादी का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है.
रजिस्टर्ड मैरिज के फायदे को अगर देखा जाए तो शादी के बाद पतिपत्नी बैंक में जौइंट अकाउंट खुलवाने, स्पाउज वीजा हासिल करने, जौइंट प्रौपर्टी लेने जैसे तमाम कार्यों के लिए शादी के प्रमाणपत्र का प्रयोग कर सकते हैं. मैरिज सर्टिफिकेट कई तरह की परेशानियों से भी मुक्त कर सकता है. इस का सब से ज्यादा फायदा स्त्रियों को है. शादी में धोखाधड़ी, बालविवाह और तलाक जैसे तमाम मामलों में मैरिज सर्टिफिकेट होने से स्त्री के अधिकार सुरक्षित रह पाते हैं.
कुछ सालों पहले तक भारत में हिंदू मैरिज एक्ट और मुसलिम विवाह अधिनियम के तहत विवाह का पंजीकरण अनिवार्य नहीं समझा जाता था. पारंपरिक रीतिरिवाजों या आर्य समाज से शादी कर लेना ही काफी था. मगर कई बार पारंपरिक विवाहों में कुछ रस्में नहीं निभाई जातीं या गवाह की जरूरत पड़ने पर उन की संख्या कम हो जाती है, ऐसे कई मामलों में विवाह से मुकरने जैसी घटनाएं भी सुनने में आई हैं.
मंदिर में पुजारी के सामने किए गए आर्य समाज के गंधर्व विवाह या प्रेम विवाह को भी कई बार अमान्य घोषित किया गया है, इसलिए रजिस्टर्ड शादी ही प्रेमीजोड़े को करनी चाहिए ताकि उन के विवाह को कानूनी मान्यता मिले.
मोदी सरकार में भारत की विदेश नीति इतनी ज्यादा कमजोर हो गई है कि आज हमें मालदीव जैसा पिद्दी सा देश आंखें दिखा रहा है. कितनी हास्यास्पद है कि सोशल मीडिया का सहारा ले कर जनता के जरिए विदेश मंत्रालय में ताकत भरी जा रही है. कोई खुल कर यह बात बोल दे तो उस की जबान बंद करने के लिए उसे देशद्रोही बता दिया जाता है, घुसपैठिया या पाकिस्तानी करार दे दिया जाता है.
नकशे पर नजर दौड़ाएं तो आज कोई भी पड़ोसी देश भारत का सगा नहीं रह गया है. भारत से समुद्री सीमा साझा करने वाला मालदीव, जिस से कभी हमारे रणनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंध काफी घनिष्ठ थे, जो कभी हमारे देश के अमीरों और बौलीवुड हस्तियों के लिए छुट्टियां बिताने के लिए बेस्ट डैस्टिनेशन था, अब वहां जाने के लिए भारतीयों को सोचना पड़ेगा.
भारत-नेपाल के बीच सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक संबंधों का एक विस्तृत इतिहास रहा है. नेपाल भारत के आर्थिक और सामरिक हितों के लिए महत्त्वपूर्ण है. नेपाल से हमारे रिश्ते कभी रोटीबेटी के थे. भारत के 5 राज्य नेपाल के साथ अपनी सीमाएं साझा करते हैं. इन में बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, और सिक्किम शामिल हैं. इन क्षेत्रों की सीमाओं से लोग रोटीरोजगार के लिए प्रतिदिन इधर से उधर जाते हैं.
मगर आज जबकि नेपाल पूरी तरह चीन के प्रभाव में है, हमें अपनी सीमाओं की चौकसी और सुरक्षा बढ़ानी पड़ी है. नेपाल में चीन का बढ़ता हस्तक्षेप, नेपाल की आंतरिक राजनीति और भारत की पड़ोस नीति की समस्या कुछ ऐसे पहलू हैं जो दोनों देशों में मतभेद के कारण बन रहे हैं.
नेपाल में चीन का दबदबा बहुत तेजी से बढ़ रहा है और भारत का प्रभाव वहां नगण्य हो चुका है. नेपाल ने हाल ही में अपना बंदरगाह चीन के इस्तेमाल के लिए खोल दिया है. भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को ले कर विवाद बढ़ता जा रहा है. नेपाल का दावा है कि महाकाली नदी के पूर्वी हिस्से में स्थित ये क्षेत्र 1816 की सुगौली संधि के तहत नेपाल का हिस्सा हैं.
चीन काफी लंबे समय से नेपाल, श्रीलंका, बंगलादेश, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान और मालदीव में अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है. वह सभी सार्क देशों को आर्थिक सहायता का लालच दे कर अपने प्रभाव में लाना चाहता है. नेपाल में चीन द्वारा भारी निवेश इसी का एक पहलू है. ऐसे में भारत को अपनी विदेश नीति की समीक्षा करने की जरूरत है. जिस तरह से नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है, उस से भारत को अपने पड़ोस में आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करने से पहले रणनीतिक लाभहानि पर विचार करना चाहिए. भारत को अपने खिलाफ बन चुके चीन-नेपाल-पाकिस्तान गठजोड़ की काट भी ढूंढनी चाहिए, जो दक्षिण एशिया में भारत के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.
श्रीलंका के साथ भारत के रिश्ते अब वैसे नहीं रहे जैसे पहले थे. चीन ने श्रीलंका की आर्थिक मदद कर कर और उस पर कर्ज का बोझ लाद कर उसे ऐसे अपने पक्ष में कर लिया है कि भारत कहीं पीछे छूट गया है. हाल ही में जब श्रीलंका गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था, वहां लोगों के पास जरूरी सामान और राशन की किल्लत हो गई थी, तब भारत ने उस को आर्थिक मदद पहुंचा कर रिश्तों को कुछ ठीक करने का प्रयास किया था. मगर यह कोशिश चीन की साजिशों के सामने बहुत कम मालूम पड़ती है.
चीन की डैब्ट ट्रैप डिल्पोमेसी का सब से बड़ा शिकार आज श्रीलंका है. आज श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट पर चीन कब्जा जमाए बैठा है. हंबनटोटा बंदरगाह दक्षिणी श्रीलंका में पूर्व-पश्चिम समुद्री मार्ग के करीब स्थित है. चीन ने 99 वर्षों की अवधि के लिए हंबनटोटा बंदरगाह के संचालन और प्रबंधन का नियंत्रण अपनी कंपनियों के माध्यम से अपने हाथ में ले लिया है. अब इस बंदरगाह पर चीनी सैनिक कदमताल करते हैं.
जिस चीनी कंपनी चाइना मर्चेंट्स ग्रुप (सीएमजी) ने श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को बनाया था, अब उसी चीनी कंपनी ने श्रीलंका में एक और बंदरगाह को विकसित करने का ऐलान किया है. यही नहीं, चीन की एक अन्य सरकारी कंपनी ने ऐलान किया है कि वह श्रीलंका में एक प्रमुख लौजिस्टिक हब का निर्माण करने जा रही है.
इस निर्माण के साथ श्रीलंका में चीन की इस सरकारी कंपनी का निवेश 2 बिलियन डौलर के पार पहुंच जाएगा. चीन के उपकारों के चलते श्रीलंका वही करेगा जो चीन उस से कहेगा. श्रीलंका में चीनी सेना की बढ़ती मौजूदगी से तमिलनाडु चिंतित है. राज्य की खुफिया एजेंसी ने अलर्ट जारी किया है कि पोर्ट पर चीन के हाईटैक गैजेट्स और पीपल्स लिबरेशन आर्मी की तैनाती से हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है, मगर केंद्र के कान पर जूं नहीं रेंग रही, वह रामभजन में लीन है.
श्रीलंका के कोलंबो पोर्ट पर भी चीन का कब्जा है. यह पोर्ट भारत के दक्षिणी सिरे से कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर ही है. इस से चीन को भारतीय उपमहाद्वीप के लिए अपना प्रवेशद्वार मिल गया है. चीन की सिल्क रोड परियोजना के लिए कोलंबो बंदरगाह काफी अहम है. हाल ही में भारत के विरोध के बावजूद श्रीलंका ने चीन के रीसर्च शिप शी यान 6 को कोलंबो बंदरगाह पर रुकने की अनुमति दी. अब यह चीनी जहाज रिसर्च के नाम पर हिंद महासागर में जासूसी का काम कर रहा है.
उधर, पाकिस्तान हमारा सौ फीसदी दुश्मन है और चीन का गहरा दोस्त. अफगानिस्तान जिस से कभी भारत के रिश्ते बहुत अच्छे थे, अब तालिबान के कब्जे में आने के बाद वह भाईचारा भी खत्म हो चुका है. इसी तरह भूटान भी कभी हमारा मित्र देश था मगर अब वह चीन के इशारे पर चल रहा है.
हाल ही में भूटान के विदेश मंत्री टांडी दोरजी चीन गए और सुनने में आ रहा है कि जमीन की अदलाबदली में वे डोकलाम चीन को देने पर राजी हो गए हैं. यह भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है. चीन अवैध तरीके से भूटान में घुसपैठ कर चुका है. उत्तरी भूटान की जकारलुंग घाटी में चीन ने कई निर्माण किए हैं. उस ने सिर्फ चौकियां ही नहीं बनाई हैं बल्कि गांव भी बसा दिया है.
दोनों देशों के अफसरों के बीच बौर्डर लाइन तय करने को ले कर बैठकों के बीच कुछ सैटेलाइट तसवीरें सामने आई हैं, जिन से साफ है कि चीन की निर्माण गतिविधियां भूटान की सीमा में लगातार जारी हैं.
भारत के पड़ोसी देश म्यांमार में 2 वर्षों पहले तख्तापलट हो चुका है. म्यांमार, जो धीरेधीरे लोकतांत्रिक परिपक्वता की ओर बढ़ रहा था, तख्तापलट के बाद दशकों पीछे चला गया है. वहां की लोकप्रिय नेता और स्टेट काउंसलर आंग सान सू और राष्ट्रपति विन मिंट समेत कई नेता अब जेल में हैं और सत्ता मिलिट्री के हाथों में है.
मिलिट्री लीडर जनरल मिन आंग हलिंग ने खुद को देश का प्रधानमंत्री घोषित कर दिया है. जनरल मिन आंग हलिंग भारत से खार खाता है. भारत और म्यांमार के बीच 1,600 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी जमीनी सीमा और बंगाल की खाड़ी में एक समुद्री सीमा है. भारत के 4 उत्तरपूर्वी राज्य- अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम की सीमा म्यांमार से लगती है.
तख्तापलट के दौरान इन सीमाओं से भारत और बंगलादेश में अवैध घुसपैठ बढ़ी है. इस से देश की सुरक्षा पर भी सवाल उठ रहे हैं. मणिपुर में हालिया दंगाफसाद, आगजनी, बलात्कार, ड्रग्स का बढ़ता व्यापार आदि सब के पीछे कहीं न कहीं म्यांमार की अस्थिरता से उपजा पलायन भी एक कारण है.
ईरान इजराइल का दुश्मन है, मगर आज हम इजराइल को दोस्त बनाने के चक्कर में ईरान को नाराज कर रहे हैं. मीडिया हमें विश्वगुरु बनाने दंभ भर रहा है. मगर दुनिया के नकशे पर नजर दौड़ाएं और देखें कि एशिया में क्या हो रहा है, तो हम पाएंगे कि आज भारत चारों ओर से जिन देशों से घिरा हुआ है उन में से कोई भी अब हमारा अच्छा दोस्त नहीं है. इन सभी देशों का सरगना अब चीन है. ये सभी अब चीन के कहने पर चलते हैं.
चीन ने नेपाल से ले कर श्रीलंका और पाकिस्तान होते हुए अफगानिस्तान तक एक त्रिभुजाकार पिंजड़े में भारत को कस दिया है. हंबनटोटा, लाओस, ग्वादर हर जगह चीन बहुत गहरी पैठ बना चुका है.
चीन के पास न पैसे के कमी है न टैक्नोलौजी की. उस ने अपनी सेना का एक हिस्सा भारत पर निगरानी के लिए लगा रखा है और एक हिस्सा अमेरिका पर नजर रख रहा है. इस के अलावा, उस की रिजर्व आर्मी अपने आसपास के छोटेछोटे देशों पर नजर रखती है. चीन ने दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में अपने दखल को गंभीर रूप से बढ़ा लिया है. हमारी विदेश नीति सिर्फ पाकिस्तान के मामले में गब्बर है, बाकी चीन की बात उठने पर बगलें झांकने लगती है.
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनवरी 2024 तक दुनिया के 6 महाद्वीपों पर कोई 52 विदेश यात्राएं की हैं और 59 देशों की यात्रा की हैं. लेकिन खालिस विदेश घूमने को विदेश नीति नहीं कहते हैं. नेपाल भी आंखें दिखा रहा है.
चीन के साथ उन्होंने खूब दोस्ती निभाई, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को खूब झूला झुलाया पर साथ घूमनेफिरने या झूला झूलने से कोई दोस्त नहीं बन जाता. अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नेता, जो सदैव अपना हित देखते हैं, के गले लग कर, समोसाचटनी खिला कर यदि हमारे प्रधानमंत्री यह सोचते हैं कि वे दोस्त बन गए, जो उन की विदेश नीति का हिस्सा भी है, तो फिर इस देश का क्या होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है.
ट्रंप के स्वागत में मोदी ने कोरोना महामारी के खतरे को नजरअंदाज किया. कोरोना ने देश में कितनी लाशें गिराईं, उन का सटीक आंकड़ा आज तक जनता को नहीं पता चला. उसी ट्रंप को जब हम कमी के कारण कोरोना वैक्सीन नहीं दे पाए तो वह दोस्ती को किनारे रख आंख दिखने लगा. उस ने h1b वीजा के लिए मना कर दिया. आप ‘नमस्ते ट्रंप’ करते रहे, यही आप की विदेश नीति है, आखिर यह कैसी विदेश नीति है?
Ghee Health Benefits : सर्दियों के मौसम में स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां होना आम बात है. इस मौसम में जहां कई लोग सर्दि, जुकाम, खांसी और नाक बहने की समस्या से परेशान रहते हैं, तो वहीं कुछ लोगों को जोड़ो के दर्द की समस्या सताने लगती है. ऐसे में जरूरी है कि आप अपनी डाइट में उन चीजों को शामिल करें, जिससे इम्यून सिस्टम तो मजबूत हो ही. साथ ही मौसमी बीमारियों के होने का खतरा भी बहुत कम हो जाए. आइए जानते हैं एक ऐसे उपाय के बारे में, जिसे अपनी डाइट में शामिल करके आप विंटर में भी निरोगी रह सकते हैं.
सर्दियों का मौसम घी के बिना अधूरा माना जाता हैं. लोग खाने की हर चीज में ऊपर से घी ड़ालकर खाते है, जिससे खाने का स्वाद तो बढ़ता ही है. साथ ही उनकी सेहत भी अच्छी बनी रहती है. इसके अलावा इससे न सिर्फ याददाशत बढ़ती है, बल्कि हड्डियां भी मजबूत होती हैं, तो चलिए जानते हैं सर्दी के मौसम में घी (Ghee Health Benefits) खाने से शरीर को क्या-क्या फायदा होता है.
डाइट में घी (Ghee Health Benefits) को शामिल करने से इम्यून सिस्टम मजबूत होता है, जिससे सर्दी, जुकाम, खांसी और नाक बहने आदि जैसी मौसमी बीमारियों से छुटकारा मिलता है. इसके अलावा जिन लोगों को चलने-फिरने व उठने-बैठने में दिक्कत रहती है, उन्हें तो अपने खाने में घी को जरूर शामिल करना चाहिए. इससे हड्डियों में मजबूती आती है.
घी में विटामिन ए, विटामिन के, विटामिन ई, फैटी एसिड, ओमेगा-3 और ओमेगा-9 जैसे पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है. इसलिए रोजाना घी खाने से पेट मजबूत रखता है, जिससे कब्ज, एसिडिटी और गैस आदि की समस्याओं से छुटकारा मिलता है.
विंटर में रोजाना घी खाने से स्किन पर नमी आने लगती है, जिससे कुछ ही समय में चेहरे की चमक दोगुनी हो सकती है.
सर्दियों में अगर आपके बाल रूखे व बेजान हो गए है, तो ऐसे में घी (Ghee Health Benefits) को डाइट में शामिल करना बहुत ज्यादा फायदेमंद होता है. दरअसल, घी में मौजूद पोषक तत्व बालों में नमी लाने का काम करते है. इसके अलावा इस मौसम में बालों में घी की मालिश करने से डैंड्रफ की समस्या भी कम हो सकती है.
आपको बता दें कि, सर्दियों में घी खाने से शरीर को गर्माहट मिलती है, जिससे ठंड नहीं लगती है.
अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.
Vitamin-K Deficiency : आज के समय में शरीर को स्वस्थ और फिट रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है. जहां कई लोग खराब लाइफस्टाइल को फॉलो करते हैं, तो वहीं कुछ अपने खान-पान पर ही ध्यान नहीं देते. इससे ना चाहते हुए भी उन्हें कई बीमारियां अपने चपेट में ले लेती है. हालांकि नियमित रूप से पौष्टिक चीजों के सेवन से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से स्वस्थ रहा जा सकता है. इसके अलावा शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है कि आप अपनी डाइट में आवश्यक पोषक तत्वों से युक्त चीजों को शामिल करें. इसी में से एक हैं विटामिन-के.
विटामिन-के बॉडी में अलग-अलग तरह के प्रोटीन बनाने में सहायक होता है. इससे न सिर्फ हमारी बॉडी सही से काम करती है बल्कि कई गंभीर बीमारियों के होने का खतरा भी कम हो जाता है. आइए अब जानते हैं कि विटामिन-के (Vitamin-K Deficiency) शरीर के लिए क्यों जरूरी है और किन-किन चीजों के सेवन से बॉडी को ये विटामिन मिल सकता है.
आपको बता दें कि, विटामिन-के (Vitamin-K Deficiency) मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ के साथ-साथ मानसिक सेहत के लिए भी बहुत जरूरी है. विटामिन-के से मॉर्निंग सिकनेस को कम करने में मदद मिलती है. साथ ही सोचने व समझने की क्षमता भी बढ़ती है. इसके अलावा इससे दिल से जुड़ी बीमारियों के होने का खतरा भी कम हो जाता है. इसी वजह से डॉक्टर भी विटामिन-के को डाइट में शामिल करने की सलाह देते हैं.
शरीर में विटामिन-के (Vitamin-K Deficiency) की कमी को पूरा करने के लिए डाइट में इन चीजों को शामिल किया जा सकता हैं-
अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.
Lucknow Basket Chaat : जब लखनऊ की बात चलती है तो गंजिग का जिक्र जरूर आता है. गंजिग का मतलब होता है शाम को यहां के मशहूर हजरतगंज में टहलना. इस को ‘शाम ए अवध’ भी कहा जाता है. अवध की शाम का आंनद लेने के साथ ही साथ ‘लखनवी चाट’ का स्वाद भी मजेदार होता है. ऐसे में लखनऊ की चाट के तमाम स्वाद हैं. इन्ही में से एक ‘बास्केट चाट’ है. इस का मतलब होता है बास्केट यानि कटोरी के अंदर चाट.
चाट का खाने के शौकीन जब लखनऊ आते हैं तो बास्केट चाट उन की पहली पंसद होती है. जिस तरह से हैदराबाद की बिरयानी और दिल्ली के छोले भटूरे लोगों को पंसद आते हैं उसी तरह से लखनऊ की बास्केट चाट मशहूर है. दूसरी तमाम तरह की चाट के मुकाबले लखनऊ की बास्केट चाट काफी अलग है. लखनऊ के रौयल कैफे की चाट पूरी दुनिया में मशहूर है.
करीब 30 साल पहले 1992 में रौयल कैफे से ही बास्केट चाट की शुरूआत हुई थी. धीरेधीरे यह पूरी दुनिया में मशहूर हो गई. रौयल कैफे के एमडी संदीप आहूजा कहते हैं, ‘वैसे तो रौयल कैफे की चाट सभी को बहुत पसंद आती है. बास्केट चाट हमारी खास पहचान है. चाट में स्वाद और शुद्धता का सब से अधिक महत्व होता है.’
बास्केट चाट (Lucknow Basket Chaat) का नाम कैसे पड़ा असल में इस को बनाने के लिए सब से पहले फ्राइड आलू से एक बास्केट बनाई जाती है. इस के बाद बास्केट चाट में क्रिस्पी पापड़ी, खट्टी चटनी, दही, मसाले और शानदार टौपिंग की जाती है. चाट के साथ ही साथ बास्केट को भी खा सकते हैं. इस को बनाने के लिए सब से पहले आलू की एक छोटी सी बास्केट यानी टोकरी बनाई जाती है.
इस में स्पैशल छोले, दही बड़ा, आलू की टिक्की, पापड़ी, कुटी धनिया, कुटी हुई मिर्च, चाट मसाला, जीरा, मुरमुरे, तीखी चटनी, मीठी चटनी और अनार के दाने डाले जाते हैं. इतना ही नहीं, इस में हाजमोला चटनी भी डाली जाती है.
रायल कैफे की बास्केट चाट अब पूरे लखनऊ में हैं मिलने लगी है. बड़ी बास्केट चाट इतनी ज्यादा मात्रा में होती है कि इस को एक आदमी खा नहीं सकता. ऐसे में अब मिनी बास्केट चाट भी बनने लगी है.
लखनऊ रौयल कैफे की बास्केट चाट इतना मशहूर है कि यहां आने वाले पर्यटक लखनऊ घूमने के साथ ही साथ यहां की बास्केट चाट (Lucknow Basket Chaat) खाना नहीं भूलते हैं. लखनऊ आने वाले फिल्म स्टार इस का स्वाद लेने जरूर आते हैं.
Royal Dish of Lucknow Sheermal History : लखनऊ की शीरमाल वाली गली में दूर तक जो एक खुशबू फैली होती है, वह आप की भूख को कई गुना बढ़ा देती है. यह खुशबू है गलावटी कबाब, निहारी और शीरमाल की. मुगलकालीन व्यंजनों में शीरमाल की जगह काफी खास थी. मुगल बादशाहों और लखनऊ के नवाबों के दस्तरखान पर इस केसरी रंग की रोटी के बिना मटन सालन या कबाब का कोई स्वाद भी फीका था.
लखनऊ में शीरमाल के साथ गलावटी कबाब या निहारी खाने का चलन है. कहते हैं गलावटी कबाब लखनऊ के एक दंतहीन राजा के लिए उनके खानसामे ने तैयार किए थे, जिसे एक दिन उस ने शीरमाल के अंदर भर के नवाब साहब के सामने परोसा. नारंगी रंग के मुलायम और लजीज रोटी के बीच जब नवाब साहब ने कबाब खाया तो जैसे निवाला मुंह में रखते ही गल गया. फिर क्या था खानसामे को आर्डर हुआ कि अब से सारी रोटियां-पराठे एक तरफ, उन की दस्तरखान पर सिर्फ शीरमाल ही आए.
शीरमाल की उत्पत्ति के बारे में एक और कथा प्रचलित है. लखनऊ में 1827 से ले कर अगले 30 साल तक नवाब नसीरुद्दीन हैदर का शासन था. उस समय पुराने लखनऊ में एक फिरंगी महल हुआ करता था जो आज भी है. वहां पर ईरान से आए महमूद नाम के एक शख्स ने अपनी खानपीने की दुकान खोली और उस ने यहां एक बेहद नरम रोटी बनानी शुरू की जिस को उस ने शीरमाल का नाम दिया. उस की रोटी इतनी मशहूर हो गई कि उसे खाने के लिए नवाब नसीरुद्दीन हैदर खुद उस की दुकान पर पहुंचने लगे.
देखते ही देखते यह रोटी नेशनल रोटी बन गई. उस वक्त कहा जाता था कि अगर दावतों में शीरमाल न हो तो दावत अधूरी है. खैर यह तो तय है कि मैदे, दूध, घी और तरह तरह के मेवे से बनी शीरमाल रोटी नवाबी समय की ईजाद है, जिसे अब तक लोग बहुत पसंद करते हैं. इसे खासतौर पर कबाब और मटन के सालन के साथ खाया जाता है. गर्मागर्म तंदूर से निकली यह रोटी बहुत ही मुलायम और सुगंधित होती है.
लखनऊ में एक गली शीरमाल वाली गली के नाम से विख्यात है. यह पूरी सड़क बेकरियों से भरी हुई है जो ताजा पके हुए ब्रेड की सुगंध देती है. यह सड़क अन्य प्रकार की फ्लैटब्रेड जैसे नान, बाकर खानी और ताफ्तान का भी घर है. एक फारसी कहावत है, “नान-ए-लखनऊ, शीरी अस्त” अर्थात “लखनऊ की शीरमाल सबसे मीठी रोटी है”.
एक समय था जब शीरमाल को ‘अमीरों की रोटी’ कहा जाता था. क्योंकि शीरमाल बनाने में ज्यादातर सभी महंगी सामग्री का इस्तेमाल होता है. लेकिन धीरेधीरे यह शाही बावर्ची खाने और दस्तरखान से निकल कर आम लोगों के बीच पहुंच गई.
विभिन्न भारतीय शहरों में शीरमाल के विभिन्न संस्करण हैं और यह आमतौर पर पुराने क्षेत्रों में बनती है. आधुनिक होटलों के शेफ या रसोइए इन रोटियों को उस तरह नहीं बना पाते जैसी परंपरागत रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी सीख कर आने वाले पुराने इलाके के लोग इन्हें बनाते हैं.
भारतीय शीरमाल आमतौर पर गोल और थोड़ी मोटी होती है. इस में मैदे की कई परतें होती हैं और इन्हें ऊपर से केसर के धागों और मेवों से सजाया जाता है. हालांकि, भोपाल में, यह रोटी आयताकार शेप में बनाई जाती है. भैंस का दूध जो एक प्राकृतिक स्वीटनर है, का प्रयोग शीरमाल के लिए नरम आटा तैयार करने में किया जाता है. इस में केवड़ा एसेंस भी मिलाया जाता है और भोपाल में लौंग भी मिलाई जाती है.
शीरमाल को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली हर सामग्री शीरमाल को एक नया अंदाज देती है. जैसे केसर से इसे नारंगी रंग दिया जाता है, दूध से इस की मिठास बढ़ती है, केवड़ा और इत्र से इसे एक अलग खुशबू मिलती है और घी के कारण इसे टेक्सचर मिलता है.
शीरमाल का मुलायम होना, इस बात पर निर्भर करता है कि आप इस के लिए मैदे को गूंथ कैसे रहे हैं और इस के ऊपर कितना घी डाल रहे हैं. शीरमाल को तंदूर में डालने से पहले इस पर छोटेछोटे छेद किए जाते हैं, ताकि तंदूर में सेंकने पर ये फूले नहीं. क्योंकि अगर रोटियां फूलने लगेंगी तो तंदूर में नीचे गिर जाएंगी.
एक खास बात यह भी है कि शीरमाल को लोहे से बने तंदूर में ही पकाया जाता है. अगर इसे मिट्टी से बने तंदूर में पकाएंगे तो मिट्टी इस का सारा घी सोख लेगी. शीरमाल की एक और खास बात यह है कि एक बार तैयार होने के बाद आप इसे लगभग 15 दिन तक रख कर खा सकते हैं, यह खराब नहीं होती और न ही इस का टेस्ट बदलता है. यही वजह है कि लखनऊ की शीरमाल वाली गली में जो दुकानदार इन्हें बनाते हैं, उन के पास मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और कोलकाता तक से आर्डर आते हैं.
सामान्य शीरमाल के अलावा जाफरानी और जैनबिया शीरमाल मुहर्रम के मौके पर बनाए जाते हैं. मोहर्रम के 9 दिन तक मजलिसों का दौर चलता है ऐसे में लोग खाना नहीं बना पाते हैं इसलिए शीरमाल, रोटी-सालन, कबाब व दाल उन्हें तबर्रुक के तौर दिए जाते हैं. शुरुआती दौर में यह तबर्रुक थाल में सजा कर नवाबों के घरों तक भी पहुंचाया जाता था. रमजान के दौरान भी गरीबों में बांटने के लिए भी बड़ी मात्रा में शीरमाल बनाया जाता है.
शीरमाल को नहारी के साथ खाना लोग पसंद करते हैं. बकरे के पाए की निहारी जिसे रात भर बड़े से देग में पकाया जाता है, पुराने लखनऊ और पुरानी दिल्ली दोनों ही जगह बड़े स्वाद से शीरमाल रोटी के साथ खाई जाती है. लखनऊ के लोग शीरमाल पर कबाब रख कर खाना पसंद करते हैं. साथ में लच्छेदार प्याज और हरी चटनी स्वाद को और बढ़ा देती है. दिल्ली के निजामुद्दीन में भी कुछ रेस्त्रां शीरमाल बनाते हैं. कुछ लोग बड़े थाल के आकार का शीरमाल भी यहां बनाते हैं, जिस के टुकड़े वे हलवे के साथ परोसते हैं.
अच्छा शीरमाल बनाने वाले कारीगर अब बहुत कम रह गए हैं. पुराने लखनऊ के कुछ खानदान जो पीढ़ियों से इस काम में लगे हैं, उन के हाथ के शीरमाल और आधुनिक होटलों में बने शेफ के हाथ के शीरमाल के स्वाद में जमीन आसमान का अंतर है. पुराने लखनऊ का शीरमाल आप ले आएं. इस को आप जब भी गरम कर के खाएंगे वह ताजाताजा तंदूर से निकला ही लगेगा, मगर किसी महंगे होटल से आया शीरमाल रखने के बाद बेस्वाद हो जाता है.
महिलाओं के घेरे में थोड़ा दूर उपेक्षित सी बैठी आंसू बहाती शैली को देख कर आज दामिनी के मन में नफरत के नहीं, बल्कि दया और सहानुभूति के भाव उभर कर आए. हालांकि, यह वही चेहरा है जिस ने पहलेपहल उस का परिचय नफरत की अनुभूति से करवाया था. शैली से परिचय होने से पहले तक वह मन के इस भाव से अनजान थी. कोरे मन को तो सिर्फ प्रेम के निश्च्छल भाव का ही एहसास था.
अरे हां. वह यह कैसे भूल सकती है कि शैली ने ही तो जानेअनजाने उसे यह भी महसूस करवाया था कि प्रेम किया नहीं जाता बल्कि हो जाता है. मानव को तो उस की जिंदगी में आना ही था. उसे तो शैली का शुक्रगुजार होना चाहिए. विवाह से पहले तो उसे यही बात गांठ बांध कर सिखाई गई थी कि अपने पति से प्यार करना ही स्त्री का धर्म और कर्म है. फिर चाहे पति के कर्म कुछ भी हों. इसी सीख को साथ बांध कर उस ने ससुराल की दहलीज के भीतर कदम रखा था.
महिलाओं की भीड़ में से जगह बनाती दामिनी शैली के निकट जा पहुंची. उस ने शैली को सांत्वना देने के लिए उस के कंधे पर हाथ रखा. देखते ही एक बार तो शैली की आंखों में आश्चर्य के भाव आए, दूसरे ही पल उस की रुकी रुलाई फूट पड़ी. दामिनी की सास सुमित्रा आंखें फाड़े इस मिलन को देख रही थी. शोक संतिप्त औरतों और सहयोगियों में कानाफूसी शुरू हो गई.
‘भई कलेजा हो तो दामिनी जैसा. सौत को कितने प्यार से गले लगाया है,’ एक स्वर फुसफुसाया.
‘घायल की गति घायल जाने. यह भी तो उसी मंजिल की मुसाफिर है,’ दबीदबी सी सरसराती हुई यह बात दामिनी तक पहुंची. उस ने अपने, शैली के और मानव के सहयोगियों व रिश्ते के झुंड की तरफ देखा, वह कोई तीखा सा जवाब देना चाहती थी लेकिन मौके की नजाकत को देखते हुए चुप्पी साध गई.
घर के आंगन में पति विनय का पार्थिव शरीर पड़ा है. कल एक अनियंत्रित कार ने विनय को कुचल दिया था. अभी कुछ देर पहले ही उस की डैडबौडी को हौस्पिटल से लाया गया है. दामिनी के बेटे सिद्ध का इंतजार हो रहा है. उसे आने में अभी एक घंटा और लगने की संभावना है. कोई आंसू भी बहाए तो आखिर कितनी देर. पुरुष बाहर गलियारे में और महिलाएं घर के बरामदे में बैठी बातचीत में मशगूल हो गईं.
‘विनय के पीएफ और ग्रेच्युएटी का पैसा किसे मिलेगा. दामिनी को या शैली को,’ पुरुषों के बीच चर्चा का विषय था.
‘नियम और हिसाब से तो दामिनी ही इस की हकदार है. वही असल ब्याहता है. यह अलग बात है कि इस रिश्ते को न तो दामिनी मानती है और न ही कभी विनय ने माना,’ बात आगे बढ़ी. कमोबेश यही चर्चा महिलाओं के ग्रुप में भी थी जो दामिनी और शैली के कानों तक भी पहुंच रही थी.
‘हां है, दामिनी विनय की ब्याहता और यह भी सच है कि दामिनी ने अपनी इच्छा से गठबंधन की गांठ खोल दी थी. न, न खोली नहीं थी. बस, उसे ढीला भर किया था. इतना ही कि वे दोनों अपनीअपनी परिधि में स्वेच्छा से विचरण कर सकें. तभी तो सामाजिक व कानूनी दृष्टि से दोनों आज भी पतिपत्नी हैं,’ एक और स्वर गूंजा.
वैसे भी देखा जाए तो गठबंधन एक रस्सी ही तो है जिस के दोनों सिरों से 2 अनजान जनों को बांध दिया जाता है. अब यदि दोनों के चलने की दिशा एक ही हो तो ठीक है वरना वह रस्सी दोनों के ही गले का फंदा बन जाती है. अलगअलग दिशा में चलने पर यह बंधन गरदन पर घाव देने के अलावा कुछ नहीं करता. इस रस्सी की ऐसी ही रगड़न दामिनी ने अपने गले पर ससुराल में अपने पहले ही दिन महसूस की थी.
सालों पहले ससुराल की चौखट पर द्वार रुकाई. रिश्ते की ननदों का नेग मांगना. चुहल और शरारत से भरी अल्हड़ हंसी के बीच दामिनी को उस के कमरे में पहुंचाना. सबकुछ दामिनी की आंखों के सामने से गुजरने लगा. तभी अचानक इस तसवीर में शैली का आना मानो खाने में किरकिरी. सबकुछ बेस्वाद सा हो गया था.
दामिनी आज भी उस रात को कहां भूल सकी है जब उस के अरमानों के फूल खिलने से पहले ही मसल दिए गए थे. शादी की वह पहली रात जब वह आंखों की गुस्ताखियों को पलकों के पीछे, चेहरे की लाज को चुनरी की झीनी परत से और खुद से बेवफाई कर विनय के जाते हुए दिल की बेकाबू धकधक को छिपाने की नाकाम कोशिश करती हुई विनय की राह देख रही थी.
कमरे में फुल एसी चलने के बावजूद पसीनेपसीने हो रही दामिनी खिड़की के रास्ते कमरे में झांकते सितारों से गुफ्तगू करने लगी. तभी उसे छत के दूसरे कोने पर 2 मानव आकृतियां दिखाई दीं. एक पुरुष और एक स्त्री को आपस में उल झते देख कर उसे जिज्ञासा तो हुई लेकिन अनजान घर में पहले दिन की ि झ झक ने उसे ताका झांकी करने से रोक दिया. उस ने सितारों की तरफ से अपनी आंखें हटा लीं और अपने कान उस जोड़े की बातचीत पर लगाने की कोशिश की.
‘सम झने की कोशिश करो शैली. मैं ऐसा नहीं कर सकता. समाज की निगाहों में वह मेरी पत्नी है. किस आधार पर उसे छोड़ने का दावा करूं. फिर मैं तो तुम्हारा ही हूं न. भरोसा करो मु झ पर,’ पुरुष स्वर फुसफुसाया.
‘अरे, यह तो विनय की आवाज लग रही है. लेकिन साथ में यह शैली क्या बला है. क्या यह बातचीत मेरे संदर्भ में हो रही है? क्या विनय ने यह शादी केवल दिखावे के लिए की है?’ दामिनी के मन में विचारों का झं झावात उठा. भारीभरकम शादी का जोड़ा. ऊपर से इतने जेवर. इन सब से भी अधिक कष्टदायी वह वार्त्तालाप. दामिनी चक्कर खा कर गिर पड़ी. सुबह होश में आई तो विनय को सोफे पर सोता पाया.
‘क्या था जो रात में घटित हुआ था. कोई सपना या फिर हकीकत.’ दामिनी हड़बड़ा कर अपने कपड़े ठीक करती हुई उठ बैठी. तभी दरवाजे पर खटखट हुई. दामिनी ने दरवाजा खोला. सामने चचेरी ननद विभा चाय के 2 कप लिए खड़ी थी.
‘कैसी हो भाभी. रात ठीक से नींद आई न?’ विभा ने पूछा. दामिनी केवल मुसकरा दी. उन की बातचीत सुन कर विनय भी उठ गया. उस ने एक कप उठाया और कमरे से बाहर निकल गया. अब विभा और दामिनी ही थीं.
‘दीदी, यह शैली का क्या किस्सा है. कल रात विनय से झगड़ रही थी,’ दामिनी ने अपने मन में फंसे कांटे को निकालने की कोशिश की.
‘कुछ नहीं, भाभी. शैली जरा नकचढ़ी टाइप की लड़की है. सुमित्रा चाची की सहेली की बेटी शैली के मांपापा एक ऐक्सिडैंट में खत्म हो गए थे. उन दोनों ने अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ यह शादी की थी जिस में चाची ने उन की बहुत मदद की थी. उन की मृत्यु के बाद चाची शैली को अपने साथ ले आई. विनय और शैली बचपन के साथसाथ खेलेबढ़े हैं न, इसलिए वह विनय पर अपना पूरा अधिकार सम झती है. नासम झ लड़की है, सम झ जाएगी. तुम फिक्र मत करो.’ विभा ने उसे सम झाने की कोशिश की लेकिन दामिनी की छठी इंद्रिय उसे अनिष्ट का संकेत दे रही थी.
2 दिनों बाद दामिनी अनछुई ही मायके वाले घर आ गई क्योंकि अगले ही महीने उस के मास्टर्स के एग्जाम थे. अब उसे 2 महीने यहीं रहना था. लेकिन 2 महीने के बाद? तब क्या होगा. तब क्या होगा, ससुराल तो जाना ही पड़ेगा. बिना किसी ठोस आधार के वह विनय और शैली को दोषी भी तो नहीं ठहरा सकती न.
‘चलो, जो होगा देखा जाएगा, अभी से बवाल मचाना ठीक नहीं,’ सोचती हुई दामिनी अपनी पढ़ाई में जुट गई.
इन 2 महीनों के दौरान विनय ने उस से कोई खास संपर्क नहीं रखा था. नईनवेली शादी जैसा कोई उत्साह उस की बातचीत में नहीं होता था. बस, एक औपचारिकता थी जिसे वह किसी तरह निभा रहा था.
‘लगता है खुल कर बात करनी पड़ेगी,’ निर्णय ले कर दामिनी फिर से पति के घर आ गई. बात करने पर हालांकि विनय ने शैली से अपना कोई रिश्ता स्वीकार नहीं किया लेकिन दामिनी से उस की दूरी अब भी बरकरार थी. दामिनी ने गौर किया कि शैली का पूरे घर पर नियंत्रण है. सभी बड़े फैसलों में उस की सहमति आवश्यक होती थी. सुमित्रा उसे अपनी बेटी सा ही मानती थी लेकिन दामिनी सम झ गई थी कि वह बेटी नहीं बल्कि बहू बनने का सपना पाल रही थी जो दामिनी के आने से चूरचूर हो गया.
अचानक बाहर गलियारे में हलचल हुई. दामिनी यथार्थ में आ गई. शायद सिद्ध आ गया है. श्मशानगृह जाने की तैयारी होने लगी. एक बार फिर से घर का माहौल गमगीन हो गया. परिजनों के क्रंदन के बीच विनय अपने आखिरी सफर पर निकल गया. दामिनी बिलकुल निर्विकार भाव से बैठी थी. घर की महिलाओं के लाख जोर देने के बावजूद उस ने अपनी चूड़ीबिंदी नहीं उतारी. मंगलसूत्र तो उस ने कभी का उतार कर विनय को थमा दिया था.
हां, उसी दिन जब उस ने विनय का घर छोड़ा था. जब उसे बैंक में पोस्ंिटग मिली थी. बैंक में नौकरी भी उसे कहां इतनी आसानी से मिली थी. उसे याद है वे सब कड़वे दिन. वे कसैली रातें. उसे कहां पता था कि जीवन ने उस के लिए क्याक्या सोच रखा है. वह तो शैली की शादी करवा कर अपनेआप को विजेता महसूस कर रही थी. शैली की शादी करवाना भी कहां आसान रहा था उस के लिए.
सवाल
मेरी शादी को 20 वर्ष हो गए हैं और मेरे 2 बच्चे हैं. कुछ दिनों पहले मुझे पता चला कि मेरे पति का किसी दूसरी औरत से अफेयर चल रहा है जिस कारण वे अब घर पर ध्यान नहीं देते हैं, यहां तक कि कईकई दिन घर भी नहीं आते हैं. मैं उन्हें टोकती हूं तो वे मेरी पिटाई कर देते हैं. आप ही बताएं कि क्या मुझे उन्हें छोड़ देना चाहिए ?
जवाब
आजकल ऐसी समस्याएं समाज में कुछ ज्यादा ही बढ़ रही हैं. आप की पीड़ा समझी जा सकती है. आप यह सोचने के बजाय कि मुझे उन्हें छोड़ देना चाहिए, इस बात पर विचार करें कि कैसे उन्हें दूसरी औरत के मोह से मुक्त करा कर वापस लाएं.
इस के लिए आप उन से लड़ाई न करें, न ही उन पर शक करें, बल्कि उन्हें खुला छोड़ कर उन्हें खूब प्यार दें. यदि इस पर भी न मानें तो फिर अपने अधिकारों के लिए दबाव डालें. घर चाहे पति का ही हो, आप उन्हें देर से आने पर घर में घुसने ही न दें. इस से आर्थिक कठिनाइयां तो होंगी पर समस्या
‘रखैल, जिसे अंगरेजी भाषा में ‘कैप्ट’ कहा जाता है, शब्द सुनते ही किसी भी पत्नी के तेवर टेढ़े हो जाने स्वाभाविक हैं क्योंकि कोई भी औरत किसी पुरुष की पत्नी का दरजा हासिल करने में गरिमामय रहती है और रखैल बनते ही शर्मिंदगी का दूसरा नाम बन जाती है. फिर, आखिर क्या हो जाता है कि एक पति, पत्नी के स्थान पर एक अन्य महिला को दिल दे बैठता है या उस का दिल खुदबखुद उस ओर खिंच जाता है?
रखैल यानी वह औरत जिसे किसी भी पति ने अपनी पत्नी के अलावा अपने लिए रखा है. उस पुरुष के भावनात्मक व शारीरिक सभी अधिकार उस की रखैल को स्वत: मिल जाते हैं. वह उस के पास जाता है और शायद वहां जा कर उसे वह सुकून मिलता है जिस की उसे तलाश रहती है.
आमतौर पर भारतीय समाज में स्त्रियां शांत मानी जाती हैं और पुरुष को चंचल प्रवृत्ति का माना जाता है. यह बात भी विचारणीय है कि दिल कब किसी की ओर झुक जाता है, यह पता ही नहीं चलता और कब एक पुरुष की जिंदगी में पत्नी के स्थान पर उस की प्रेमिका या रखैल अपनी जगह बना लेती है, इस से पुरुष स्वयं अनजान रहता है.
प्रश्न यह उठता है कि आखिर क्यों एक पुरुष का झुकाव परस्त्री की ओर हो जाता है? क्यों वह अपनी पत्नी से अधिक सुकून रखैल के पास जा कर महसूस करता है? क्या इस के लिए पत्नी ही पूरी तरह से उत्तरदायी है? इस बाबत हर उम्र की शिक्षित व अल्पशिक्षित कुछ महिलाओं से बात की गई.
देखिए, क्या कहती हैं ये महिलाएं-
कांता तिवारी जीवन के 48 वसंत पार कर चुकी हैं. वे कहती हैं, ‘‘इस के लिए पूरी तरह से स्त्री ही दोषी है क्योंकि यह तब होता है जब कोई आदमी घर के माहौल या घर के लोगों से परेशान रहता है और घर में उसे वह सुकून नहीं मिलता जिस की उसे तलाश है. ऐसे में जब कोई उसे समझने वाला मिल जाता है तो उस का झुकाव उधर हो जाता है.’’
मंजू सिंह एक गृहिणी, विवाहित बेटी की मां और रिटायर्ड कर्नल की पत्नी हैं. वे कहती हैं, ‘‘विवाह के बाद एक पत्नी को समझना चाहिए कि उस का पति उस से क्या चाहता है. जब पत्नी अपने पति को समझने में भूल कर देती है तो ऐसे में आदमी को भावनात्मक सहयोग जिस से भी मिलता है वह उस की ओर खिंच जाता है, फिर चाहे वह नातेरिश्ते की कोई भाभी, बहन हो या औफिस की कोई सहकर्मी. इसलिए जब यह सहयोग घर से बाहर अधिक मिलता है तो घर यानी पत्नी गौण हो जाती है.’’
कीर्ति दुबे एक स्कूल में शिक्षिका हैं, कहती हैं, ‘‘घर आने पर जब रोजरोज चिकचिक और ताने मिलते हैं, एकदूसरे से शिकवाशिकायतें होती हैं तो आदमी घर क्यों आएगा, वह तो वहां जाएगा न, जहां उसे ठंडी बयार यानी प्यार और अपनापन मिलेगा. घर ऐसा हो जहां आ कर आदमी को सुकून का एहसास हो और घर वालों से मिलने के लिए वह लालायित रहे.’’
वीणा नागर, 2 बहुओं और 2 पोतियों की दादी हैं, ने स्वयं इस दंश को झेला है. वे कहती हैं, ‘‘कम उम्र में शादी हो गई. अपने पति के बारे में कुछ नहीं जानती थी. मैं गांव की बहुत सीधीसादी और साधारण रूपरंग की थी. वे राजनीति में अच्छा दखल रखते थे. उन्हें मौडर्न, शिक्षित पत्नी चाहिए थी जो उन की हाई प्रोफाइल सोसाइटी में फिट हो सके. मैं उन की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही थी. एक बार बीमारी के कारण वे अस्पताल में भरती रहे. वहीं पर न जाने कब वे एक नर्स को दिल दे बैठे. पानी सिर के ऊपर से निकल चुका था. शुरू में बहुत झगड़ा किया पर उस से कुछ हासिल नहीं हुआ. क्या करते, समझौता कर लिया. घरबाहर सभी को पता है. पर जब उन्हें वहां ही जाना पसंद है तो फिर क्या. हां, हमारा ध्यान भी पूरा वे रखते हैं. सामाजिक व पारिवारिक रूप से मैं ही उन की पत्नी हूं पर…’’
उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि यदि किसी पुरुष की रखैल है तो पूरी तरह तो नहीं, परंतु आंशिक रूप से पत्नी भी दोषी है, फिर चाहे उस के कारण प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष.
पति के प्रति लापरवाही
पतिपत्नी 2 अलगअलग परिवार और परिवेश से आते हैं. उस के बाद भी प्रारंभ के दिनों में पतिपत्नी में एकदूसरे के प्रति बहुत आकर्षण रहता है. किंतु बच्चे होने और परिवार की जिम्मेदारी बढ़ने के साथसाथ इस झुकाव में कमी होने लगती है. महिलाएं घर और परिवार में इतनी अधिक व्यस्त हो जाती हैं कि वे अपने पति की ओर से लापरवाह हो जाती हैं. जब औफिस से आ कर पति अपनी परेशानी या खुशी अपनी पत्नी के साथ बांटना चाहता है तो पत्नी के पास समय ही नहीं होता. ऐसे में पति का झुकाव कई बार घर से बाहर दूसरी महिला के प्रति हो जाता है.
पति को न समझ पाना
पति को न समझना भी पतिपत्नी के रिश्ते में रखैल नाम के रिश्ते को जन्म देता है. इस का एक अहम कारण है. कई बार देखा जाता है कि पति अपनी पत्नी को स्मार्ट और मौडर्न ड्रैसेज में देखना चाहता है और इस के लिए वह प्रयास भी करता है. परंतु पत्नी अपनेआप में कोई परिवर्तन नहीं करती. एक पति ने अपनी पत्नी को सूट पहनने, गाड़ी चलाने, स्वतंत्ररूप से कंप्यूटर आदि चलाने की पूरी छूट दे रखी है परंतु पत्नी अपनेआप को परिवर्तित करने को ही तैयार नहीं. ऐसे में जब उसे कोई मनपसंद मिलता है तो भी कई बार पति का मन भटक जाता है.
घर का वातावरण
निर्मेश जब भी औफिस से घर आते, बस चाय का प्याला थमाते ही नमिता दिनभर का पूरा ब्योरा देने के बाद, अधूरे कामों की लंबी लिस्ट गिनाती और फिर बच्चे को निर्मेश को थमा निकल जाती अपने दोस्तों के साथ. कई बार तो घर आए मेहमानों के सामने भी वह निर्मेश की बेइज्जती करने से नहीं चूकती थी. ऐसे में जब निर्मेश की औफिस असिंस्टैंट ने उसे तरजीह देनी शुरू की तो निर्मेश कब उस की ओर झुक गया, उसे खुद ही पता नहीं चला.
यौन जरूरतें
चिकित्साशास्त्र ने यह प्रमाणित किया है कि महिलाओं को जहां अपने पति से भावनात्मक लगाव की आवश्यकता होती है वहीं पुरुषों को पत्नी से शारीरिक संबंधों की आवश्यकता अधिक होती है. ऐसे में जबजब पति को पत्नी से शारीरिक संबंधों की जरूरत होती है और पत्नी की ओर से बारबार न की जाती है तो अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पुरुष का झुकाव कहीं और हो ही जाता है.
स्वयं के प्रति लापरवाही
आमतौर पर विवाह के बाद महिलाएं अपने प्रति बहुत जागरूक, साफसुथरी और स्मार्ट हो कर जीती हैं. परंतु बच्चा होने और घरपरिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले अपने शरीर और व्यक्तित्व के प्रति लापरवाह हो जाती हैं और यह लापरवाही कभीकभी उन के पतिपत्नी के रिश्ते पर भारी पड़ जाती है.
बेमेल विवाह
कई बार कम उम्र में या बच्चे की पसंद पूछे बिना ही विवाह कर दिया जाता है. एक पिता ने अपने बेटे की शादी, बेटे के मना करने के बाद भी, अपने एक मित्र की अल्पशिक्षित बेटी से कर दी. नतीजा, शादी चली ही नहीं और बेटे का, इस बीच, अपने औफिस की सहकर्मी से लगाव हो गया. बाद में पूर्व पत्नी से तलाक ले कर उस ने उस सहकर्मी से विवाह कर लिया.
मनोवैज्ञानिक काउंसलर निधि तिवारी कहती हैं, ‘‘विवाह पतिपत्नी दोनों का रिश्ता है और उसे निभाने की जिम्मेदारी भी दोनों की होती है. यह सही है कि काफी हद तक पति की रखैल के लिए पत्नी जिम्मेदार है परंतु इसे पूरी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इस के लिए कहीं न कहीं पति का उच्छृंखल मन भी उत्तरदायी होता है.
‘‘पतिपत्नी एक ही गाड़ी के 2 पहिए होते हैं. ऐसे में यदि गाड़ी का एक पहिया पटरी से उतर जाए या टूट जाए तो दूसरे का दायित्व उस पहिए को दुरुस्त कर के संतुलन को कायम रखना है, न कि पहिए को ही बदल देना. महिला यदि घरपरिवार में उलझ कर पति की ओर या अपने प्रति लापरवाह हो जाती है तो पति को उसे सहायता और सहयोग कर के अपने संबंध को मजबूत बनाना चाहिए.’’
क्या है समाधान
कई बार ऐसे संबंधों का पता चलने पर महिलाएं बहुत अधिक क्रोधित हो जाती हैं, बातबात पर पति को ताने देना, सरेआम बेइज्जती करना और उन्हें अनदेखा करना प्रारंभ कर देती हैं. इस से समस्या कम होने के बजाय और अधिक बढ़ जाती है. इस प्रकार की समस्या का समाधान प्यार, आत्ममूल्यांकन, पति से बातचीत के द्वारा दूर करने का प्रयास करना चाहिए. यदि कोई भी समाधान नजर नहीं आए, तो काउंसलर की मदद ले कर समस्या को सुलझाने का प्रयास करना चाह