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करियर और लव लाइफ को बैलेंस करने में हो रही है परेशानी, तो अपनाएं ये 5 टिप्स

Tips to Balance Career and Love : अपने पार्टनर के साथ एक मजबूत और सुखी रिश्ता बनाना साथ ही अपने करियर को भी महत्व देना काफी मुश्किल होता है. खासतौर पर जब आप दोनों ही कामकाजी हैं. व्यस्त दिनचर्या,  बड़े लक्ष्य, अनगिनत प्रोजेक्ट्स और बहुत कुछ इन सभी के कारण आपका सम्बंध प्रभावित होने लगता है जिसके कारण आपके रिश्ते में तनाव बन सकता है. जब आप अपने करियर को काफी अहमियत देते हैं तो एक स्वस्थ रिश्ते को बनाएं रखने के लिए आपको अलग से प्रयास करने होते हैं. पूरे दिन काम करने के बाद अपने साथी के साथ आराम करने और बात करने के लिए समय निकालना भी जरुरी है. अगर आप भी अपने कैरियर और प्यार के बीच संतुलन बनाना चाहते हैं तो ये टिप्स काम आ सकते हैं.

  1. छोटी-छोटी चीजें एक साथ करें

ऐसा जरुरी नहीं है कि आप अपने साथी के साथ समय बिताने के लिए लंच प्लान करें या फिल्म देखने ही जाएं. आप अपने साथी के साथ अपना सारा समय व्यतीत नहीं कर पा रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि आप जिस समय में उनके साथ है वो बिल्कुल परियों की कहानी जैसा हो. छोटी चीजें भी आपको खुशी दे सकती है. जब आपके पास ऑफिस के ढेर सारे काम होंगे तो आप कुछ विशेष योजना बना पाएं ये थोड़ा मुश्किल है. इसलिए जरुरी है कि जब भी आप साथ में हैं तो हर मिनट को महसूस करें. एक साथ भोजन करें, घर की सफाई करते वक्त या खाना बनाते वक्त आप एक-दूसरे को समय दें. ये छोटी चीजें आपको बेफिजूल लग सकती हैं लेकिन जब आपके पास समय कम हो तो है तो यह अपने साथी से जुड़ने का यह अच्छा तरीका है.

  1. बिना शर्त के सपोर्ट करें

अपने ऑफिस में पूरे दिन काम करने के बाद अपने पति या पत्नी के करियर में रुचि दिखाना मुश्किल हो सकता है लेकिन यह जरुरी है कि आप अपने साथी के करियर से संबंधित बातचीत करें. इस बातचीत के जरिए आप उन्हें बता पाएंगे कि आप उनके काम और करियर को सपोर्ट करते हैं. उन्हें बताएं कि आप उनके लिए हमेशा मौजूद हैं और बिना शर्त उनके काम को अपना समर्थन देते हैं. अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपके साथी के मन में असंतोष की स्थिति पैदा हो सकती है. जिससे आपके रिश्ते और करियर के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाएगा.

  1. हद से ज्यादा उम्मीदें ना करें

जब आप दोनों कामकाजी है तो आप समझ सकते हैं कि ऑफिस के बाद सम्बंध को संभालना कितना मुश्किल है. इसलिए जरुरी है कि आप अपने साथी से अधिक उम्मीदें ना बांधे क्योंकि समय के अभाव में अगर वो पूरा नहीं कर पाएंगे तो आपको बुरा लगेगा और आपका दिल टूट जाएगा. आपके लिए बेहतर होगा ऐसा सोचना बंद करें कि आपका साथी आपके लिए कोई डेट, होलीडे या पार्टी प्लान करें. अगर वो ऐसा नहीं करेगा तो आपको दुख और निराशा होगी. ये सब मैनेज करने के लिए आपके साथी को समय की जरुरत होगी और वो उनके पास नहीं है. ऐसा नहीं है कि आप उम्मीदें ही ना करें. सोचने की बजाय उनसे बात कर लें कि आप क्या चाहते हैं.

  1. कोई भी फैसला लेने से पहले साथी को बताएं

अगर आप कोई भी फैसला लेते हैं तो इसके लिए दो स्टेप जरुरी है. पहला आप इसके बारे में सोचे और फिर अपने साथी से बात करें. अब आप जीवन में स्वतंत्र रूप फैसले नहीं ले सकते हैं चाहे फिर आप कितने भी बुद्धिमान क्यों ना हों. आपका हर एक व्यक्तिगत फैसला आपके साथी पर भी असर डालेगा. आपको जानने की जरुरत है कि आपका कोई भी फैसले के बारे में आपका पार्टनर क्या सोचता है. जैसे आप जॉब छोड़ने या बदलने की सोच रहे हैं तो इसके बारे में अपने साथी से बात कर लें. हो सकता ऐसे में आपको शहर बदलना पड़े या नई जगह जाना पड़े तो इसका प्रभाव आपके साथी पर भी होगा.

5. जिम्मेदारियां बांट लें

एक रिश्ते में सामंजस्य बिठाना बहुत जरुरी है. अगर आपको रिश्ते में समझौते करने पड़ रहे हैं तो ध्यान रखें कि मिलकर समझौते करें. काम के साथ अपने रिश्ते की जिम्मेदारियों को समझें. खासकर तब जब आप शादीशुदा हैं, एक साथ रहते हैं, आपके बच्चे हैं. ऑफिस जाने के साथ खाना पकाना, बच्चों को स्कूल ले जाना लेकर आना, घर के कामकाज आदि जिम्मेदारियां एक ही व्यक्ति पर ना डालें. आपके रिश्ते में कोई भी एक व्यक्ति सभी समझौते करने के लिए तैयार नहीं होगा. इसलिए सही ढंग से फैसला लें. अधिक कुशलता से काम करें और सबसे महत्वपूर्ण हैं कि हमेशा एक साथ काम करें.

एक साथी की तलाश : आखिर मधुप और बिरुवा का रिश्ता था क्या ? – भाग 5

‘‘आप…’’ वह प्रत्यक्ष बोली.

‘‘हां श्यामला, मैं… इतने वर्षों बाद,’’ उसे देख कर वे एकाएक कातर हो गए थे, ‘‘तुम्हें लेने आया हूं,’’ वे बिना किसी भूमिका के बोले, ‘‘वापस चलो, मुझ से जो गलती हुई है उस के लिए मुझे क्षमा कर दो. मैं समझ नहीं पाया तुम्हें, तुम्हारी परेशानियों को, तुम्हारे अंतर्द्वंद्व को.’’

श्यामला अपलक उन्हें निहारती रह गई. शब्द मानो चुक गए थे. बहुतकुछ कहना चाहती थी. पर समझ नहीं पा रही थी कि कहां से शुरू करे. किसी तरह खुद को संयत किया. थोड़ी देर बाद बोली, ‘‘इतने वर्षों बाद गलती महसूस हुई आप को जब खुद को जरूरत हुई पत्नी की. लेकिन जब तक पत्नी को जरूरत थी? आखिर मैं सही थी न, कि आप ने हमेशा खुद से प्यार किया. लेकिन मेरे अंदर अब आप के लिए कुछ नहीं बचा, अब मेरे दिल को किसी साथी की तलाश नहीं है.

‘‘जिन भावनाओं को, जिन संवेदनाओं को जीने की इतनी जद्दोजेहद थी मेरे अंदर, वह सब तो कब की मर चुकी है. फिर अब क्यों आऊं आप के बाकी के जीवन जीने का साधन बन कर? मुझे अब आप की जरूरत नहीं है. मैं अब नहीं आऊंगी.’’

‘‘नहीं श्यामला,’’ मधुप ने आगे बढ़ कर श्यामला की दोनों हथेलियां अपने हाथों में थाम लीं, ‘‘ऐसा मत कहो, साथी की तलाश कभी खत्म नहीं होती. हर उम्र, हर मोड़ पर साथी के लिए तनमन तरसता है, पशुपक्षी भी अपने लिए साथी ढूंढ़ते हैं. यही प्रकृति का नियम है. मुझ से गलती हुई है. इस के लिए मैं तुम से तहेदिल से क्षमा मांग रहा हूं. इस बार तुम नहीं, मैं आऊंगा तुम्हारे पास. इस बार तुम मेरे सांचे में नहीं, बल्कि मैं तुम्हारे सांचे में ढलूंगा, संवेदनाएं और भावनाएं कभी मरती नहीं हैं श्यामला, बल्कि हमारी गलतियों व उपेक्षाओं से सुप्तावस्था में चली जाती हैं, उन्हें तो बस जगाने की जरूरत है. अपने हृदय से पूछो, क्या तुम सचमुच मेरा साथ नहीं चाहतीं, सचमुच चाहती हो कि मैं चला जाऊं…’’

श्यामला चुपचाप डबडबाई आंखों से उन्हें देखती रह गई. कितने बदल गए थे मधुप. समय ने, अकेलेपन ने उन्हें उन की गलतियों का एहसास करा दिया था. पतिपत्नी में से अगर एक अपनी मरजी से जीता है तो दूसरा दूसरे की मरजी से मरता है.

‘‘बोलो श्यामला,’’ मधुप ने श्यामला को कंधों से पकड़ कर धीरे से हिलाया, ‘‘मैं अब तुम्हारे पास आ गया हूं और अब लौट कर नहीं जाऊंगा,’’ मधुप पूरे विश्वास व अधिकार से बोले.

लेकिन श्यामला ने धीरे से उन के हाथ कंधों से अलग कर दिए. ‘‘अब मुझ से न आया जाएगा मधुप. मेरे जीवन की धारा अब एक अलग मोड़ मुड़ चुकी है, कितनी बार जीवन में टूटूं, बिखरूं और फिर जुड़ूं, मुझ में अब ताकत नहीं बची. मैं ने अपने जीवन को एक अलग सांचे

में ढाल लिया है जिस में अब आप के लिए कोई जगह नहीं. मैं अब नहीं आ पाऊंगी. मुझे माफ कर दो,’’ कह कर श्यामला दूसरे कमरे में चली गई. स्पष्ट संकेत था उन के लिए कि वे अब जा सकते हैं. मधुप भौचक्के खड़े, पलभर में हुए अपनी उम्मीदों के टुकड़ों को बिखरते महसूस करते रहे. फिर अपना बैग उठा कर बाहर निकल गए वापस जाने के लिए. बेटे के आने का भी इंतजार नहीं किया उन्होंने.

जयपुर से वापसी का सफर बेहद बोझिल था. सबकुछ तो उन्होंने पहले ही खो दिया था. एक उम्मीद बची थी, आज वे उसे भी खो कर आ गए थे. घर पहुंचे तो उन्हें अकेले व हताश देख कर बिरुवा सबकुछ समझ गया. कुछ न पूछा. चुपचाप से हाथ से बैग ले कर अंदर रख आया और किचन में चाय बनाने चला गया.

उधर श्यामला खिड़की के परदे के पीछे से थके कदमों से जाते मधुप को  देखती रही थी, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए थे. दिल कर रहा था दौड़ कर मधुप को रोक ले लेकिन कदम न बढ़ पा रहे थे. जो गुजर चुका था, वह सबकुछ याद आ रहा था.

मधुप चले गए, लेकिन श्यामला के दिल का नासूर फिर से बहने लगा. रात देर तक बिस्तर पर करवट बदलते हुए सोचती रही कि जिंदगी मधुप के साथ अगर बोझिलभरी थी तो उन के बिना भी क्या है. क्या एक दिन भी ऐसा गुजरा जब उस ने मधुप को याद न किया हो. उस के मधुप से अलग होने के निर्णय का दर्द बच्चों ने भी भुगता था. बच्चों ने भी तब कितना चाहा था कि वे दोनों साथ रहें. अपने विवाह के बाद ही बच्चे चुप हुए थे. पर पता नहीं कैसी जिद भर गई थी उस के खुद के अंदर. और मधुप ने भी कभी आगे बढ़ कर अपनी गलती मानने की कोशिश नहीं की. उन दोनों का सारा जीवन यों वीरान सा गुजर गया. जो मधुप आज महसूस कर रहे हैं, काश, यही बात तब समझ पाते तो उन की जिंदगी की कहानी कुछ और ही होती.

लेकिन अब जो तार टूट चुके हैं, क्या फिर से जुड़ सकते हैं और जुड़ कर क्या उतने मजबूत हो सकते हैं. एक कोशिश मधुप ने की, एक कदम उन्होंने बढ़ाया तो क्या एक कोशिश उसे भी करनी चाहिए, एक कदम उसे भी बढ़ाना चाहिए. कहीं आज निर्णय लेने में उस से कोई गलती तो नहीं हो गई. इसी ऊहापोह में करवटें बदलते सुबह हो गई.

पूरी रात वह सोचती रही थी, फिर अनायास ही अपना बैग तैयार करने लगी. उस को तैयारी करते देख बेटेबहू आश्चर्यचकित थे पर उन्होंने कुछ न पूछना ही उचित समझा. मन ही मन सब समझ रहे थे. खुशी का अनुभव कर रहे थे. श्यामला जब जाने को हुई तो बेटे ने साथ में जाने की पेशकश की. पर श्यामला ने मना कर दिया.

उधर, उस दिन जब दोपहर को सोए हुए मधुप की शाम को नींद खुली तो वह शाम और दूसरी शाम की तरह ही थी, पर पता नहीं मधुप आज अपने अंदर हलकी सी तरंग क्यों महसूस कर रहे थे. तभी बिरुवा चाय बना कर ले आया. उन्होंने चाय का पहला घूंट भरा ही था कि डोरबेल बज उठी.

‘‘देखना बिरुवा, कौन आया है?’’

‘‘अखबार वाला होगा, पैसे लेने आया होगा. शाम को वही आता है,’’ कह कर बिरुवा बाहर चला गया. लेकिन पलभर में ही खुशी से उमंगता हाथ में बैग उठाए अंदर आ गया. मधुप आश्चर्य से उसे देखने लगे, ‘‘कौन है बिरुवा, कौन आया है और यह बैग किस का है?’’

‘‘बाहर जा कर देखिए साहब, समझ लीजिए पूरे संसार की खुशियां चल कर आ गई हैं आज दरवाजे पर,’’ कह कर बिरुवा घर में कहीं गुम हो गया. वे जल्दी से बाहर गए, देखा, दरवाजे पर श्यामला खड़ी थी. वे आश्चर्यचकित, किंकर्तव्यविमूढ़ से उसे देखते रह गए.

‘‘श्यामला तुम.’’ उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था.

‘‘हां मैं,’’ वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘अंदर आने के लिए नहीं कहोगे?’’

‘‘श्यामला,’’ खुशी के अतिरेक में उन्होंने आगे बढ़ कर श्यामला को गले लगा लिया, ‘‘मुझे माफ कर दो.’’

‘‘बस, अब कुछ मत कहो. आप भी मुझे माफ कर दो. जो कुछ हुआ वह सब भूल कर आई हूं.’’

दोनों थोड़ी देर एकदूसरे को गले लगाए ऐसे ही खड़े रहे. तभी पीछे कुछ आवाज सुन कर दोनों अलग हुए, मुड़ कर देखा तो बिरुवा फूलों के हार लिए खड़ा था. मधुप और श्यामला दोनों हंस पड़े.

‘‘आज तो बहुत खुशी का दिन है, साहब.’’

‘‘हां बिरुवा, क्यों नहीं. आज मैं तुम्हें किसी बात के लिए नहीं रोकूंगा,’’ कह कर मधुप श्यामला की बगल में खड़े हो गए और बिरुवा ने उन दोनों को एकएक हार थमा दिया. दोनों आज खुशी का हर पल जीना चाहते थे. बहुत वक्त गंवा चुके थे, पर अब नहीं. बस अब और नहीं.

मन के दीये : राधिका की उदासी का क्या कारण था ?

राधिका बैड के सामने खुलने वाली खिड़की से दिखाई देने वाले उस बंद गेट को मायूसी से देख रही थीं जहां से उन के बेटे उन्हें यहां परायों की भीड़ में शामिल करवा गए थे. उन का चुप रहना, खाने की प्लेट को बिन छुए सरका देना, बैड पर पड़ेपड़े कमरे की छत को देखते रहना जैसे यहां रहने वालों के लिए खास माने नहीं रखता था. 5 दिन से राधिका ऐसी ही गुमसुम थीं, कभी उठ कर बस नहाधो लेतीं, कभी चुपचाप खड़ी बाहर देखती रहतीं. किसी ने उन से बात करने की कोशिश की भी तो उन्होंने मुंह फेर लिया था. किसी ने उन्हें आग्रहपूर्वक कुछ खिलाने की कोशिश की भी तो यह सबकुछ राधिका को सहज नहीं कर पाया था. छठे दिन वे चुपचाप लेटी छत निहार रही थीं कि जैसे कमरे के शांत वातावरण में उत्साहित स्वर गूंज उठा, ‘‘राधिका, तुम्हें रंगोली बनानी आती है? कुछ ही दिनों बाद दीवाली है, सारा काम पड़ा है.’’

राधिका चुप रहीं.

नंदिनी हंसीं, ‘‘गूंगी हो क्या?’’

राधिका करवट बदल कर लेट गईं. उन का जरा भी मन नहीं हुआ जवाब देने का. फिर नंदिनी उन्हें कंधे से सीधा करती हुई बोलीं, ‘‘अरे सौरी, मैं ने अपना परिचय तो दिया ही नहीं. मैं नंदिनी, तुम्हारी रूममेट, यह दूसरा बैड मेरा ही है.’’ राधिका ने अब भी कुछ न कहा तो नंदिनी उन्हें ध्यान से देखते हुए अपना बैड और सामान ठीक करने लगीं. सुबह हुई, राधिका ने नंदिनी पर जैसे ही नजर डाली, नंदिनी ने कहा, ‘‘गुडमौर्निंग राधिका, आंखों से लग रहा है रात को सोईं नहीं ठीक से.’’ राधिका ने जवाब तो नहीं दिया, आंखें भरती चली गईं, बस जैसे खुद से मन ही मन बात की, कैसे आए नींद, जीवन भर पति और दोनों बेटों के आगेपीछे घूमती रही, पति अचानक साइलैंट हार्टअटैक में चले गए तो दोनों बेटों की गृहस्थी के कामों में लगा दिया खुद को, पोतेपोतियों, भरेपूरे परिवार की मालकिन आज मैं यहां पड़ी हूं, इन परायों के बीच, इस वृद्धाश्रम में. क्या गलती की मैं ने, विदेश जाते हुए दोनों ने घर बेच कर मुझे यहां छोड़ दिया, वीजा की समस्या का यही हल ढूंढ़ा उन्होंने, नहीं, वीजा का बहाना था. एक बार भी नहीं सोचा मैं कैसे रहूंगी परायों के बीच.

संतान का मोह भी कैसा मोह है जिस के सामने सभी मोह हथियार डाल देते हैं परंतु यही संतान कैसे इतनी निर्मोही हो जाती है कि अपने मातापिता का मोह भी उसे बंधन जान पड़ता है और वह इस स्नेह और ममता के बंधन से मुक्त हो जाना चाहती है. पिछली दीवाली पर चारों पोतेपोतियों के साथ कितना अच्छा लगा था. कहां विलुप्त हो गए वे क्षण. किस जादूगर ने अपनी छड़ी घुमा कर समेट लिए. सब मेरे साथ ही रहने आ गए थे. वह तो बाद में पता चला कि मकान बेच कर साथ रहने का जो सपना मुझे दिखाया था उस में सिर्फ उन का स्वार्थ और छल था. राधिका बेजान बुत बन कर पड़ी बस, यही सोचे जा रही थीं कि जब बेटे छोटे थे तब उन्हें मातापिता की जरूरत थी. तब हम उन पर स्नेह और ममता लुटाते रहे और उम्र के इस पड़ाव पर जब मुझे उन की जरूरत है तो वे इतने स्वार्थी हो गए कि उन के बुढ़ापे को बोझ समझ कर अकेले ही उसे ढोने के लिए छोड़ दिया, अपनी मां को अकेले, बेसहारा छोड़ देने में उन्हें जरा भी हिचकिचाहट नहीं हुई? उन के दिल पर पड़े फफोले अचानक फूट पड़े, वे जोरजोर से रोने लगीं. नंदिनी ने उन्हें सहारा दे कर बिठाया, उन्हें गले से लगा कर चुप करवाया, फिर बहुत ही स्नेह से कहा, ‘‘चुप हो जाओ, राधिका, तुम फ्रैश हो जाओ, मैं तुम्हारे लिए चाय यहीं लाती हूं, लेकिन बस आज, कल से वहीं सब के साथ पीनी है.’’

राधिका ने पहली बार आंसुओं से भरी आंखें उठा कर नंदिनी को देखा, उस से उम्र में बड़ी ही थीं वे, शांत चेहरा, कोमल स्नेहिल स्पर्श, वे अचानक छोटी बच्ची की तरह नंदिनी से लिपट गईं और कई दिनों से उन के दुखी मन का विलाप नंदिनी के स्नेहिल आगोश में सिमटता चला गया. उसी शाम को राधिका आश्रम की एक बेंच पर चुपचाप बैठी दूर से ही नंदिनी और बाकी रहने वालों को अंत्याक्षरी खेलते देख रही थीं. नंदिनी के स्वर में स्नेहभरा आदेश था जिसे वे चाह कर भी नकार नहीं पाई थीं और अब सब को हंसतेमुसकराते देख रही थीं और सोच रही थीं कि अपने घर व बच्चों से दूर ये लोग इतना खुश किस बात पर हो रहे हैं, क्या बच्चों की याद इन्हें नहीं आती? पुरुषस्त्रियां सब दिल खोल कर गा रहे थे. अब तक राधिका को पता चल गया था, नंदिनी को सब यहां दीदी ही कहते हैं, वे ही यहां उम्र में सब से बड़ी थीं और हैरत की बात यह थी कि वे ही सब से चुस्त और खुशमिजाज थीं. फिर नंदिनी उठ कर राधिका के पास ही बैठ गईं, पूछा, ‘‘राधिका, क्या सोच रही हो?’’

‘‘यही कि मैं ने क्या गलती की जो मेरे बेटे मुझे यहां छोड़ गए. मैं ने अपने पति का बनाया हुआ इतना सुंदर घर अपने बेटों के कहने पर बेच दिया.’’ ‘‘हां, यही गलती तो की तुम ने. मेरे पति ने अपनी बीमारी के अंतिम दिनों में बैंक में घर गिरवी रख दिया था, इस बात पर दोनों बेटे नाराज भी हुए पर बैंक ही हर महीने अच्छा पैसा देता है मुझे. जब मन होता है घर भी चली जाती हूं, उस घर में मैं ने भी सारी उम्र बिताई है. वहां रहने में अलग ही खुशी मिलती है मुझे पर अकेलापन तो वहां भी है. जब तुम आईं, मैं वहीं गई हुई थी. दीवाली पर वहां की भी थोड़ी सफाई करवा लेती हूं.’’ नंदिनी इधरउधर घूम कर सब के साथ मिल कर दीवाली की साफसफाई करवाने लगीं. मुंबई के ठाणे में ‘यऊर हिल’ के पास यह ‘स्नेह कुटीर’ बनी थी. हर तरफ हरियाली ही हरियाली थी. शहर के शोरशराबे से दूर शांत जगह ऐसा लगता था मानो कोई हिल स्टेशन है, फिर राधिका को यह भी पता चला कि यह ‘स्नेह कुटीर’ नंदिनी ने ही बनवाई है. वे मुंबई यूनिवर्सिटी में ही प्रोफैसर रही हैं, खुश रहती हैं, सब को खुश रहना ही सिखाती हैं.शाम को टहलते हुए नंदिनी ने कहा, ‘‘राधिका, तुम से पूछा था मैं ने, रंगोली बनानी आती है क्या?’’

‘‘मेरा त्योहार मनाने का कोई दिल नहीं है, बच्चों से दूर वृद्धाश्रम में कैसा त्योहार?’’

‘‘मेरी ‘स्नेह कुटीर’ को वृद्धाश्रम क्यों कह रही हो? यहां सब को एकदूसरे का स्नेह मिलता है, खूब महफिलें जमती हैं, यहां बस स्नेह ही लेना है, स्नेह ही बांटना है,’’ कहतेकहते नंदिनी राधिका का हाथ पकड़ कर उसे हौल में ले आईं, वहां भी कोई कह रहा था :‘‘हमेशा बच्चों की हर फरमाइश पूरी की और यही कहते रहे कि सब तुम्हारा ही है.’’

एक स्त्री ने हंसते हुए छेड़ा, ‘‘बस, उन्होंने सब ले लिया.’’ पहले बोलने वाले पुरुष को भी हंसी आ गई थी. राधिका चुपचाप बातें सुन रही थीं. नंदिनी ने उन्हें वहीं एक कुरसी पर बिठा दिया, फिर कहने लगीं, ‘‘यहां अपनी उम्र के लोगों से बात कर के एक अजीब सा सुकून मिलता है. एक जैसी समस्याएं, एक जैसी खुशियां, सबकुछ शेयर करना बहुत अच्छा लगता है. ऐसा लगता है हम अकेले नहीं हैं, हम एकदूसरे के दर्द को आसानी से समझ सकते हैं. सामने वाले के पास हमारी बात को सुनने का समय है, वह हमें गंभीरता से ले रहा है, यह एहसास ही इस उम्र में खासा सुकून देने वाला है,’’ कह कर नंदिनी ने राधिका का कंधा थपथपाया.

राधिका ने उन्हें देखा, आंखों की आंखों से बात हुई मानो मौन ही मुखर हो कर भावनाओं को बांच रहा हो. इतने में सामने बैठे एक शख्स ने कहा, ‘‘और बेटों के साथ रहने से रहने के अलावा कौन सा संरक्षण मिल रहा था मुझे. अवांछित सा इधरउधर घूमता रहता था. और अगर वे अच्छे भी होते तो क्या हो जाता, मेरे पास रातदिन तो न बैठे रहते न. उन की भी पत्नी है, बच्चे हैं, वहां भी अकेले ही खाता था. यहां तो सब के साथ हंसतेबोलते खाता हूं,’’ फिर उन्होंने राधिका से पूछा, ‘‘राधिकाजी, आप को किस चीज का शौक रहा है?’’राधिका को अभी तक किसी का नाम नहीं पता था, उसे कोई रुचि ही नहीं थी इन लोगों में, इतना ही कहा, ‘‘मैं ने हमेशा पति और बच्चों की पसंद के अलावा कभी कुछ सोचा ही नहीं.’’ नंदिनी ने स्नेहभरी फटकार लगाई, ‘‘महेशजी तुम्हारा शौक पूछ रहे हैं, कुछ न कुछ तो अपने लिए अच्छा ही लगता रहा होगा.’’

‘‘बस मुझे हमेशा परिवार के लिए कुछ न कुछ किचन में बनाना पसंद रहा है, सो कुकिंग ही शौक कह सकती हूं अपना.’’ एक महिला जोर से हंसी, ‘‘वाह, शुक्र है, खाना बनाने का शौकीन कोई तो आया, नहीं तो यहां सब को खाने का ही शौक है, किचन में हमारे श्याम काका और उन की पत्नी सरला काकी को जरा नईनई रेसिपी बता देना, कुछ अलग स्वाद होगा फिर और मजा आएगा.’’ राधिका ने ठंडी गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘नहीं, अब मेरा कुछ भी करने का मन नहीं है.’’ नंदिनी ने बात बदल दी, ‘‘ठीक है, चलो अब बताओ, बाजार से क्याक्या मंगवाऊं, अंजू आज फ्री है. वह शाम को लिस्ट लेने आएगी या अजय भी आ सकता है.’’ इतने में नंदिनी का मोबाइल बजा. वह बात करती हुई हौल से बाहर चली गई. राधिका ने पूछा, ‘‘अजय, अंजू कौन हैं?’’

‘‘इन का छोटा बेटा, बड़ा बेटा तो विदेश में है, अंजू इन की बेटी है.’’ राधिका को जैसे करंट लगा, ‘‘इन के बच्चे? और ये यहां रहती हैं?’’ ‘‘हां, उन्हें हम सब के साथ अच्छा लगता है, कभीकभी अपने घर भी जाती हैं, तुम आईं तो गई हुई थीं न, नहीं तो तुम्हें इतने दिन रोने थोड़े ही देतीं, यहां हर नए आने वाले का बैड उन के रूम में ही लगता है, इन्हें आता है हम जैसों को तसल्ली दे कर खुश रखना, रिटायरमैंट के बाद इन का काम है, अपने बच्चों से उपेक्षित, उदास, अकेले इंसान को फिर जीवन नए सिरे से जीना,’’ इतने में नंदिनी अंदर आ गईं तो बात वहीं रुक गई. अजय आया और आ कर जिस तरह सब से मिला, राधिका हैरान रह गईं, नंदिनी कह रही थीं, ‘‘अजय, यह रही लिस्ट, कल तक सामान पहुंचा देना और हां, मैं इस बार दीवाली पर यहीं रहूंगी.’’ ‘‘नहीं मां, दीवाली पर तो आप को हमारे पास आना ही है.’’ ‘‘नहीं, अजय, इस बार नहीं,’’ कह कर नंदिनी ने राधिका को देखा, वे कुछ हैरान सी थीं.

अजय लिस्ट ले कर चला गया. अजय अपने साथ गरमगरम कचौरी और जलेबी लाया था. श्याम काका ने नाश्ता प्लेटों में ला कर रखा, सब शुरू हो गए, किसी ने किसी को खाने के लिए नहीं कहा, सब वाहवाह करते हुए खाते रहे. उन 15 लोगों के चेहरों पर छाई शांति देख कर राधिका को अपने अंदर अचानक कुछ पिघलता सा महसूस हुआ, उन्होंने अपने बहते आंसू खुद ही पोंछ लिए थे. बेहद शांत आवाज में वे बोलीं, ‘‘दीदी, रंगोली कहांकहां बनानी है?’’ नंदिनी ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘तुम्हें आती है बनानी? कब से पूछ रही हूं, यहां किसी को नहीं आती, देखने का शौक सब को है. दीवाली वाले दिन मेरे एनजीओ के साथी भी आ रहे हैं यहां.’’ ‘‘रंग हैं? कुछ सामान चाहिए, और किचन में कुछ स्पैशल बनाऊंगी दीवाली वाले दिन, जो आप सब को पसंद हो, बता दें.’’ नंदिनी ने राधिका को गले लगा लिया, बोलीं, ‘‘अभी अजय का फोन मिला कर देती हूं, उसी को बता दो क्याक्या चाहिए.’’ राधिका ने पहली बार अपने आसपास के लोगों के स्वभाव, व्यवहार पर ध्यान दिया. सोच रही थीं, ये सब भी तो उसी के जैसे हैं, ये भी तो जीना सीख ही गए न. मैं भी सीख ही जाऊंगी, निर्मोही बेटों के बिना अकेले. पर अकेली कहां हूं, इतने तो साथी हैं यहां.

पिछली दीवाली पर उन अपनों के लिए क्याक्या बनाती रही जो गैर हो गए, इस बार उन गैरों के लिए बनाऊंगी जो अब हमेशा अपने रहेंगे. इन परायों को अपना मानने के अलावा रास्ता भी क्या है. फिर क्यों न खुशी से ही इस परिवार का हिस्सा बन जाऊं. बहुत दिनों बाद राधिका को अपने मन पर छाया अंधेरा दूर होता सा लगा, दीवाली से पहले ही मन के दीये जो जल उठे थे.

एक गृहिणी की आउटिंग : शोभा जी के विचार से लोग क्यों परेशान हो रहे थे ?

“थक गई मैं घर के काम करते-करते. वही एक जैसी दिनचर्या सुबह से शाम, शाम से सुबह.” “घर का सारा टेंशन लेते-लेते मैं परेशान हो चुकी हूँ, अब मुझे भी चेंज चाहिए कुछ.”

शोभा जी अक्सर ये बातें किसी न किसी से कहती रहती थीं. एक बार अपनी बोरियत भरी दिनचर्या से अलग, शोभा जी ने अपनी दोनों बेटियों के साथ इतवार को फ़िल्म देखने और घूमने का प्लान किया. शोभा जी ने तय किया इस आउटिंग में वो बिना कुछ चिंता किये सिर्फ़ और सिर्फ़ आनन्द उठाएँगी. मध्यमवर्गीय गृहिणियों को ऐसे इतवार कम ही नसीब होते हैं, जिसमें वो घरवालों पर नहीं बल्कि अपने ऊपर समय और पैसे दोनों ख़र्च करें, इसीलिए इस इतवार को लेकर शोभा जी का उत्साहित होना लाज़िमी था. ये उत्साह का ही कमाल था कि इस इतवार की सुबह, हर इतवार की तुलना में ज़्यादा जल्दी हो गई थी.

उनको जल्दी करते-करते भी, सिर्फ़ नाश्ता करके तैयार होने में ही साढ़े बारह बज गए. शो डेढ़ बजे का था, वहाँ पहुँचने और टिकट लेने के लिए भी समय चाहिए था. ठीक समय वहाँ पहुँचने के लिए बस की जगह ऑटो ही एक विकल्प दिख रहा था. और यहीं से शोभा जी के मन में ‘चाहत और ज़रूरत’ के बीच में संघर्ष शुरू हो गया. अभी तो आउटिंग की शुरुआत ही थी, तो ‘चाहत’ की विजय हुई.

ऑटो का मीटर बिल्कुल पढ़ी लिखी गृहिणियों की डिग्री की तरह, जिससे कोई काम नहीं लेना चाहता पर हाँ जिनका होना भी ज़रूरी होता है, एक कोने में लटका था. इसीलिए किराये का भाव-ताव तय करके सब ऑटो में बैठ गए.

शोभा जी वहाँ पहुँचकर, जल्दी से टिकट काउन्टर में जाकर लाइन में लग गयीं. जैसे ही उनका नम्बर आया तो उन्होंने अन्दर बैठे व्यक्ति को झट से तीन उँगली दिखाते हुए कहा- “तीन टिकट” कि बाहर के शोरगुल से भाई तुम सुन न पाओ तो उँगलियों को तो गिन ही सकते हो. अन्दर बैठे व्यक्ति ने भी बिना गर्दन ऊपर किये, नीचे पड़े काँच में उन उँगलियों की छाया देखकर उतनी ही तीव्रता से जवाब दिया-“बारह सौ”.

शायद शोभा जी को अपने कानों पर विश्वास नहीं होता यदि वो साथ में, उस व्यक्ति के होंठों को बारह सौ बोलने वाली मुद्रा में हिलते हुए नहीं देखतीं. फिर भी मन की तसल्ली के लिए एक बार और पूछ लिया- “कितने”? इस बार अन्दर बैठे व्यक्ति ने सच में उनकी आवाज़ नहीं सुनी पर चेहरे के भाव पढ़ गया. अब उसने ज़ोर से कहा- “बारह सौ”. शोभा जी की अन्य भावनाओं की तरह, उनकी आउटिंग की इच्छा भी मोर की तरह निकली जो दिखने में तो सुन्दर थी पर ज़्यादा ऊपर उड़ नहीं सकी, और धप्प करके ज़मीन पर आ गई. पर फिर एक बार दिल कड़ा करके उन्होंने अपने परों में हवा भरी और उड़ीं, मतलब बारह सौ उस व्यक्ति के हाथ में थमा दिये. हाथ में टिकट लेकर वो थिएटर की तरफ़ बढ़ गईं.

दस मिनट पहले दरवाज़ा खुला तो हॉल में अन्दर जाने वालों में शोभा जी बेटियों के साथ सबसे आगे थीं. अपनी-अपनी सीट ढूँढकर सब यथास्थान बैठ गए. विभिन्न विज्ञापनों का अम्बार झेलने के बाद, मुकेश और सुनीता के कैंसर के क़िस्से सुनकर साथ ही उनके वीभत्स चेहरे देखकर तो शोभा जी का पारा इतना ऊपर चढ़ गया कि यदि ग़लती से उन्हें अभी कोई खैनी, गुटखा या सिगरेट पीते दिख जाता तो दो चार थप्पड़ उन्हें वहीं जड़ देतीं और कहतीं कि सालों मज़े तुम करो और हम अपने पैसे लगाकर यहाँ तुम्हारा कटा-फटा लटका थोबड़ा देखें. पर शुक्र है वहाँ धूम्रपान की अनुमति नहीं थी.

लगभग आधे मिनट की शान्ति के बाद सभी खड़े हो गए. जो कान सिर्फ़ घरवालों की फ़रमाइशें सुनते थे वो राष्ट्रगान सुन रहे थे. साल में दो या तीन बार ही एक गृहिणी के हिस्से में अपने देश के प्रति प्रेम दिखाने का अवसर प्राप्त होता है और जिस प्रेम को जताने के अवसर कम प्राप्त होते हैं उसे जब अवसर मिले तो वो हमेशा आँखों से ही फूटता है. शोभा जी के रोम-रोम में देशप्रेम और आखों में आँसू साफ़ झलक रहे थे. राष्ट्रगान ख़त्म होने के बाद किसी ने “भारत माता की..” के नारे लगाने शुरू कर दिए पर “..जय” बोलने वालों में शोभा जी की आवाज़ सबसे बुलन्द थी.

जो आँखें थोड़ी ही देर पहले वीभत्स रस से सराबोर थीं, वही आँखे अब वीर रस में इतनी डूबी हुई थीं कि यदि शोभा जी को इस समय दुश्मनों के बीच खड़ा कर दिया जाता तो वो बिना किसी बन्दूक, गोली के, कलछी बेलन से ही उन्हें मार गिरातीं. देशप्रेम तो सभी में समान ही होता है चाहे सरहद पर खड़ा सिपाही हो या एक गृहिणी, बस किसी को दिखाने का अवसर मिलता है किसी को नहीं. इस समय शोभा जी वीर रस में इतनी डूबी हुईं थीं कि उनको अहसास ही नहीं हुआ कि सब लोग बैठ चुके हैं और वो ही अकेली खड़ी हैं तो बेटी ने उनको हाथ पकड़ कर बैठने को कहा.

थोड़ी ही देर में फ़िल्म शुरू हुई, शोभा जी कलाकारों की अदायगी के साथ भिन्न भिन्न भावनाओं के रोलर कोस्टर से होते हुए इन्टरवल तक पहुँचीं. चूँकि, सभी घर से सिर्फ़ नाश्ता करके निकले थे तो इंटरवल तक सबको बहुत भूख लग चुकी थी. तो  क्या-क्या खाना है, उसकी लंबी लिस्ट बेटियों ने तैयार करके शोभा जी को थमा दीं. शोभा जी एक बार फिर लाइन में खड़ीं थीं. उनके पास बेटियों द्वारा दी गयी खाने की लिस्ट लम्बी थी तो सामने खड़े लोगों की लाइन भी कम लम्बी न थी. जब शोभा जी के आगे तीन या चार लोग बचे होंगे तब शोभा जी की नज़र ऊपर लिखे मेन्यू पर पड़ी, जिसमें खाने की चीज़ों के साथ उनके दाम भी थे. उनके दिमाग़ में ज़ोरदार बिजली कौंध गयी और अगले ही पल बिना कुछ समय गँवाये वो लाइन से बाहर थीं. चार सौ के सिर्फ़ पॉपकॉर्न, समोसा पछत्तर का एक, सैंडविच सौ की एक और कोल्ड ड्रिंक डेढ़ सौ की एक. एक गृहिणी जिसने अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी ज़्यादा रसोई में ही गुज़ारी हो उन्हें ये एक टब पॉपकार्न की क़ीमत चार सौ बता रहे थे. शोभा जी के लिए वही बात थी कि रतन टाटा को एक सुई की क़ीमत सौ रुपये बताए और उसे खरीदने को कहे.

उन्हें क़ीमत देखकर चक्कर आने लगे, मन ही मन उन्होंने मोटा मोटा हिसाब लगाया तो लिस्ट के खाने का ख़र्च, आउटिंग के ख़र्च की तय सीमा से पैर पसार कर पर्स के दूसरे पॉकेट में रखे बचत के पैसों, जो कि मुसीबत के लिए रखे थे वहाँ तक पहुँच गया था. उन्हें एक तरफ़ बेटियों का चेहरा दिख रहा था तो दूसरी तरफ़ पैसे. इस बार शोभा जी अपने मन के मोर को ज़्यादा उड़ा न पाईं और आनन्द के आकाश को नीचा करते हुए लिस्ट में से सामान आधा कर दिया. ज़ाहिर था, कम हुआ हिस्सा माँ अपने हिस्से ही लेती है. अब शोभा जी को एक बार फिर लाइन में लगना पड़ा.

सामान लेकर शोभा जी जब अन्दर पहुँची इंटरवल ख़त्म होकर फ़िल्म शुरू हो चुकी थी. कहते हैं, कि यदि फ़िल्म अच्छी होती है तो वो आपको अपने साथ समेट लेती है, लगता है मानो आप भी उसी का हिस्सा हों. और शोभा जी के साथ हुआ भी वही. बाकी की दुनिया और खाना सब भूलकर शोभा जी फ़िल्म में बहती गईं और तभी वापस आईं जब सामने ‘दी एन्ड’ लिखा हुआ देखा. और जब अपनी दुनिया में वापस आईं तो उन्हें भूख सताने लगी.

थिएटर से बाहर निकलीं तो थोड़ी ही दूरी पर उन्हें एक छोटी सी चाट भण्डार की दुकान दिखाई दी. और सामने ही अपना गोल गोल मुँह फुलाये गोलगप्पे नज़र आए. गोलगप्पे की ख़ासियत होती है कि उनसे आपको कम पैसों में ज़्यादा स्वाद मिल जाता है और ख़ुशी-ख़ुशी पानी से आपका पेट भर देते हैं . सिर्फ़ साठ रुपये में तीनों ने पेट भर गोलगप्पे खा लिए. घर वापस पहुँचने की कोई जल्दी नहीं थी तो शोभा जी ने अपनी बेटियों के साथ पूरे शहर का चक्कर लगाते हुए घूमकर जाने वाली बस पकड़ी.

बस में बैठी-बैठी शोभा जी के दिमाग़ में बहुत सारी बातें चल रही थी. कभी वो ऑटो के ज़्यादा लगे पैसों के बारे में सोचतीं तो कभी फ़िल्म के किसी सीन के बारे में सोचकर हँस पड़तीं, कभी महँगे पॉपकॉर्न के बारे में सोचतीं तो कभी महीनों या सालों बाद उमड़ी देशभक्ति के बारे में सोचकर रोमांचित हो उठतीं. उनका मन बहुत भ्रमित था क्या यही वो ‘चेंज’ है जो वो चाहतीं थीं. वो सोच रहीं थीं कि क्या सच में वो ऐसा ही दिन बिताना चाहती थीं जिसमें दिन ख़त्म होने पर उनके दिल में ख़ुशी के साथ कसक भी रह जाए.

तभी छोटी बेटी ने हाथ हिलाते हुए अपनी माँ से पूछा-“माँ अगले संडे हम कहाँ चलेंगे?”वो एक पल शोभा जी के लिए बेहद मुश्किल, ‘चाहत और ज़रूरत’ में से किसी एक को चुनने का था. शोभा जी ने भी सबकी ‘ज़रूरतों’ का ख़याल रखते हुए साथ ही अपनी ‘चाहत’ का भी तिरस्कार न करते हुए कहा- “आज के जैसे बस से पूरा शहर देखते हुए ‘बीच’ चलेंगे और ‘सनसेट’ देखेंगे.”

शोभा जी सोचने लगीं अच्छा हुआ जो प्रकृति अपना सौन्दर्य दिखाने के पैसे नहीं लेती. और प्रकृति से बेहतर ‘चेंज’ कहीं और से मिल सकता है भला!

Valentine’s Day 2024 : काश – श्रीकांत किसे देखकर हैरान हो गया था ?

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हनक : पुराने दिनों को याद करके सुमन क्यों उदास हो जाती थी ?

सुमन ने करीम से कहा, “अरे देखो तो रिसेप्शन के सामने वाले सोफे पर चेटियार साहब बैठे हुए हैं क्या?’’ करीम की नजदीक की नजर कमजोर थी और उस का चश्मा बाइफोकल नहीं था, इसलिए उस ने चश्मा निकाल कर सोफे की तरफ ध्यान से देखने के बाद कहा, ‘‘हां यार, चेटियार सर ही हैं, लेकिन उन के चेहरे पर न तो घमंड दिख रहा है और न ही पुरानी ठसक, बल्कि हार और उदासी साफसाफ दिखाई दे रही है.”
सुमन और करीम दोनों चेटियार सर के साथ लंबे समय तक काम कर चुके थे. इसलिए, दोनों उन के चेहरे के हर भाव को पढ़ सकते थे. सुमन भी करीम की बातों से सहमत लग रहा था.

करीम ने सुमन से कहा, “क्या मिला जाए, चेटियार सर से.” सुमन ने कहा, “एकदम नहीं, ऐसे मक्कार, धूर्त, चालबाज और कमीने आदमी से मिलने के लिए कह रहे हो, जो बातबात पर हमें गालियां देता था, हर वक्त नीचा दिखाने की कोशिश करता था, तुम्हें तो याद ही होगा, हम ने इन की वजह से विभाग बदलवाने की कितनी कोशिश की थी, लेकिन अपने उद्देश्य को पाने में हम सफल नहीं हो सके थे.सभी ने हमें सांत्वना दी थी, लेकिन किसी ने मदद नहीं की, सभी चेटियार सर से डरते थे.”

एक सांस में पूरा वाक्य बोलने के कारण सुमन का गला सूख गया, तो उस ने थूक से गले को तर करने के बाद पुनः कहा, “चेटियार सर के सामने से अभीअभी गुजरने वाले कई लोगों को मैं जानता हूं, जिन्होंने उन के साथ काम किया था, लेकिन उन के कमीनेपन की वजह से वे उन की अनदेखी कर रहे हैं.”

ऐसा नहीं था कि चेटियार सर अपने पुराने सहकर्मियों को नहीं देख रहे थे, लेकिन लगता है कि उन के मन में भी डर हावी था, क्योंकि अब वे बैंक के चेयरमैन नहीं थे और वे अपनी काली करतूतों से भी वाकिफ थे, इसलिए कहीं न कहीं उन के मन में भी इस बात का डर था कि कहीं कोई उन की बेइज्जती न कर दे.

सुमन ने फिर से कहा, “खुदगर्ज इनसानों की औकात कुरसी से उतरने के बाद कुत्ते से भी बदतर हो जाती है, इस सच को भोगते हुए मैं ने कई लोगों को देखा है. हो सकता है, चेटियार सर भी अब इस दौर से गुजर रहे हों, क्योंकि वे तो कमीनों के बाप थे.”

करीम ने प्रयुत्तर में कहा, “चेटियार सर को ही क्यों गालियां रहे हो? आजकल हमारे बैंक में अधिकांश शीर्ष प्रबंधक, अपने मातहतों से कहां सीधे मुंह बात करते हैं, सभी गालीगलौज और डंडे के बलबूते अपना काम करवाना चाहते हैं, ताकि बिना प्रतिरोध के उन के मातहत गलत काम करने से मना नहीं करें, जबकि प्यार से भी काम करवाया जा सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबे अधिकांश शीर्ष कार्यपालक काम करवाने के लिए गुंडों व बदमाशों की तरह आतंक और खौफ का रास्ता अख्तियार करते हैं, ताकि वे नीचे वालों को मार कर या उन की जिंदगी को तबाह कर के पैसे और प्रमोशन पाते रहें.”

सुमन ने कहा, “ठीक ही कह रहे हो तुम, लेकिन कुरसी की हनक में वे भूल जाते हैं, उन की कुरसी स्थायी नहीं है, एक दिन उस का जाना तय है, जब सेवानिवृत्त होंगे, फिर क्या करेंगे, ये सोचने की कोई कोशिश नहीं करता है, ऐसे ही लोगों का बुढ़ापा खराब होता है, क्योंकि उन के पुराने व्यवहार व स्वभाव के कारण सेवानिवृत्ति के बाद हर कोई उन्हें दुत्कारता है, कहींकहीं लतिया भी दिए जाते हैं ऐसे लोग.”

करीम ने कहा, “सहमत हूं, मैं ने सुना है कि चेटियार सर की माली हालत आजकल बहुत ज्यादा खराब है, मुझे लगता है कि ये आज यहां दवाएं लेने के लिए आए हैं, मैडिकल डिपार्टमैंट पेंशनरों को फ्री में दवा मुहैया कराता है, साथ ही, डाक्टरों का कंसल्टेशन भी यहां फ्री मिल जाता है, तुम भी जानते हो, बैंकर को पेंशन, राज्य या केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तुलना में बहुत ही कम मिलती है, इस कारण इन का गुजारा बमुश्किल हो पा रहा है, बेटा बेरोजगार है, बेटी का भी तलाक हो गया है, कभी मर्सिडीज पर घूमते थे, आज रिकशे पर जाने के लिए मजबूर हैं, कभीकभी इन के पास रिकशे के भी पैसे नहीं होते हैं. सुना है, अब ये अपनी गलतियों के लिए रोज अफसोस जताते हैं, ईश्वर से माफी मांगते हैं.”

सुमन ने कहा, “लेकिन, क्या ईश्वर को ऐसे पापियों को माफ करना चाहिए?”

“नहीं, एकदम नहीं,” करीम ने कहा.

सुमन ने फिर कहा, “पता नहीं क्यों, आज अधिकांश इनसान जानवर बनना पसंद कर रहे हैं. ऐसे लोगों को अपने कुकर्मों पर कभी पछतावा नहीं होता है, लेकिन जैसे ही पैसे और पावर उन के हाथों से रेत की मानिंद फिसलने लगते हैं, वैसे ही, वे सीधेसादे और ईमानदार बन जाते हैं और यह भी अपेक्षा करने लगते हैं कि सभी लोग उन्हें माफ कर देंगे और इज्जत से नवाजेंगे.”

करीम ने कहा, “लेकिन, ऐसे लोगों के पाप का घड़ा इतना ज्यादा भर चुका होता है और इतनी बद्दुआ मिल चुकी हुई होती है कि बाद में किया गया कोई भी अच्छा काम उन के कुकर्मों की भरपाई नहीं कर पाता है.”

थोड़ी देर में रिसेप्शन पर भीड़ कम हुई, तो चेटियार सर ने रिसेप्शनिस्ट से एंट्री पास बनाने के लिए कहा. बातचीत के दौरान बड़े विनीत लग रहे थे वे. यह देख कर सुमन ने कहा, “सचमुच, बड़े से बड़े हिटलर भी समय के सामने विवश हो जाते हैं, लेकिन क्या विनीत या निरीह बनने से ऐसे लोगों की सजा पूरी हो जाती है, कतई नहीं. ऐसे लोगों को फांसी की सजा भी दी जाए तो कम है, क्योंकि ऐसे लोग हमारे समाज में बिना खून बहाए रोज कत्ल कर रहे हैं.”

Article 370 : पूरा का पूरा कश्मीर भारत का हिस्सा था, है और रहेगा

यह चुनावी वर्ष है. वर्तमान सरकार आम चुनावों में 400 से अधिक सीटें जीतने के दावे के साथ हर तरह का प्रोपगंडा करने से पीछे नहीं है. इसी चुनावी वर्ष में तथाकथित प्रोपगंडा फिल्मों की भी बाढ़ आई हुई है. ऐसी ही फिल्मों में से एक है ‘‘आर्टिकल 370.’ 23 फरवरी को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘आर्टिकल 370’ का निर्माण आदित्य धर ने किया है, जो अतीत में ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ का निर्देशन कर शोहरत बटोर चुके हैं. इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया था. देश के प्रधानमंत्री व तत्कालीन रक्षामंत्री ने भी इस फिल्म की प्रशंसा में कसीदे पढ़े थे. पर इस बार वे सिर्फ निर्माता हैं और निर्देशक आदित्य सुभाष जांभले हैं.

फिल्म में यामी गौतम के साथ प्रिया मणि, अरुण गोविल, वैभव तत्ववादी, स्कंद ठाकुर, अश्विनी कौल, किरण करमरकर, दिव्या सेठ शाह, राज जुत्सी, सुमित कौल, राज अर्जुन, असित गोपीनाथ रेडिज, अश्विनी कुमार और इरावती हर्षे मायादेव भी हैं. फिल्म के निर्माण में आदित्य धर के साथ ही मुकेश अंबानी की कंपनी जियो स्टूडियो भी जुड़ी हुई है.

ट्रेलर लौंच से पहले नेवल ब्रास बैंड ने गाया राष्ट्गीत

यह पहली बार हुआ जब किसी फिल्म के ट्रेलर लौंच के अवसर पर नेवल ब्रास बैंड ने राष्ट्गीत गा कर देशभक्ति का माहौल पैदा किया. उस के बाद फिल्म का ट्रेलर लौंच किया गया था. ट्रेलर में कहा गया कि यह फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है. तो वहीं फिल्मकार का दावा है कि उन की यह फिल्म उन घटनाओं पर आधारित है जिन के कारण जम्मूकश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द कर दिया गया था. अब सच क्या है, यह तो फिल्म देखने पर ही पता चलेगा.

क्या संकेत देता है फिल्म का ट्रेलर ?

फिल्म का ट्रेलर यह स्पष्ट संकेत देता है कि यह फिल्म विवेक रंजन अग्निहेत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के ही ढर्रे पर बनी है, जिसे सरकार ने बौक्सऔफिस पर जबरदस्त सफलता दिला दी थी. ट्रेलर से यह फिल्म जोरदार हिंसक व अतिउग्र संवादों से युक्त नजर आती है. फिल्म के ट्रेलर में साफ कहा गया है- ‘पूरा का पूरा कश्मीर भारत देश का हिसा था, है और रहेगा’. इतना ही नहीं, 2 मिनट और 40 सैकंड के ट्रेलर में खुफिया अधिकारी को जम्मूकश्मीर की विशेष स्थिति के चलते भारतीय सेना के सामने आने वाली चुनौतियों व राजनीतिक तबाही के बीच फंसा हुआ दिखाया गया है.

इस राजनीतिक फिल्म को आम चुनाव से दोतीन माह पहले प्रदर्शित करने से भी काफीकुछ समझा जा सकता है. फिल्म एक गहन कथा का वादा करती है, जो भारत सरकार द्वारा 5 अगस्त, 2019 को जम्मूकश्मीर की विशेष स्थिति से प्रेरित है. इस कदम ने जम्मूकश्मीर को जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया.

ट्रेलर में खुफिया अधिकारी बनी यामी गौतम का चरित्र कहता है- ‘आतंकवाद कश्मीर में एक व्यवसाय है. इस का स्वतंत्रता से कोई लेनादेना नहीं है. लेकिन इस का सबकुछ पैसे से है. अनुच्छेद 370 के तहत पूर्ववर्ती राज्य की विशेष स्थिति को रद्द करना भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए महत्त्वपूर्ण है.’

आदित्य धर इसे प्रोपगंडा फिल्म नहीं मानते

फिल्म ‘आर्टिकल 370’ को प्रोपगंडा फिल्म कहे जाने पर एतराज जताते हुए फिल्म के निर्माता आदित्य धर ने कहा- ‘‘मैं ऐसा नही मनता. मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री को चुनाव जीतने या वोट बटोरने के लिए हमारी फिल्म की जरूरत है. जहां तक फिल्म के प्रदर्शन के समय का सवाल है, तो यह निर्णय हम ने फिल्म एक्जीबीटरों संग बातचीत कर एक साल पहले ही लिया था. मेरा मानना है कि देश को जानने की जरूरत है कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के मिशन को कैसे अंजाम दिया गया. इस मिशन को गुप्त तरीके से अंजाम दिया गया था और मिशन का सब से महत्त्वपूर्ण लक्ष्य यह था कि किसी निर्दोष का खून न बहे और यही इसे एक महान ओपस औपरेशन बनाता है. इसलिए बहुत सारी जानकारी सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं है.’’

आदित्य धर आगे कहते हैं, ‘‘हम ने महीनों तक शोध किया. इस मिशन में बहुत सारा ड्रामा शामिल है जो 2014 में शुरू हुआ और आखिरकार 2019 में समाप्त हुआ. प्रोटोकौल में मदद के लिए सैट पर हमारे कानूनी सलाहकार थे ताकि हम वास्तविक कहानी से भटक न जाएं. सभी संवेदनशील विवरणों को 2 घंटे के सिनेमाई अनुभव में संकलित करने के लिए हमें कदम दर कदम आगे बढ़ना था, जो एक बड़ी चुनौती थी.
जी हां, ‘आर्टिकल 370‘ एक ऐक्शन प्रधान राजनीतिक ड्रामा है जो अनुच्छेद को निरस्त करने और कश्मीर की स्थिति के प्रामाणिक चित्रण के इर्दगिर्द घूमती है.

खुफिया अधिकारी बनी यामी गौतम

यामी गौतम ने फिल्म में एक खुफिया अधिकारी की भूमिका निभाई है, जो व्यक्तिगत नुकसान से गुजर रही है. फिर उसे फ्री हैंड दे कर एक खास मिशन का नेतृत्व करने के लिए कश्मीर में तैनात किया जाता है.

निर्देशक ने दावा कि इस में सबकुछ सच बयां किया गया है. वे कहते हैं, ‘‘फिल्म में सभी घटनाएं प्रामाणिक हैं और यथार्थवादी रूप से चित्रित की गई हैं, जो कि फिल्म के लिए हम सभी का एक लक्ष्य था और हम इसे हासिल करने में सक्षम थे.‘‘

फिल्म के ट्रेलर लौंच के बाद अभिनेता अक्षय कुमार ने एक्स पर लिखा- “कश्मीर भारत का हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा. पूरा देश जोश से भरा हुआ लग रहा है. शुभकामनाएं, जय हिंद.’

तो वहीं एक अन्य शख्स ने एक्स पर लिखा- ‘अविश्वसनीय कहानी जो भारतीय इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय को प्रतिध्वनित करती है. यह एक सिनेमाई जीत है जो सभी की सराहना की पात्र है.’

बिहार में बहुमत मामला: क्यों खास होता है विधानसभा अध्यक्ष ?

Nand Kishore Yadav : गठबंधन सरकारों को चलाने की बात हो या दलबदल की या फिर कमजोर बहुमत की, इन हालात में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका ख़ास हो जाती है. बिहार में जब जदयू नेता नीतीश कुमार को 9वीं बार बहुमत साबित करने का समय आया तो सब से पहले विधानसभा के पहले वाले अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी को हटाने का प्रस्ताव पेश हुआ. पुराने विधानसभा अध्यक्ष राजद के समर्थक माने जाते थे. उन की जगह पर नए विधानसभा अध्यक्ष के रूप मे नंद किशोर यादव को चुना गया. इस के बाद नीतीश कुमार का बहुमत साबित होना पक्का हो गया था. नंद किशोर यादव 7 बार के विधायक है. मंत्री रहे हैं. वे आरएसएस के करीबी भी हैं.

अगर राजद के 3 विधायक विधानसभा अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान करते तो विशवास मत में पड़े वोटों की संख्या 122 हो जाती. वैसी स्थिति में राजग के 5 विधायकों के अलावा राजद पक्ष के 2-3 विधायक पाला बदल लेते तो सरकार बहुमत हासिल नहीं कर सकती थी. राजद के 3 विधायकों- चेतन आनंद, नीलम देवी और प्रहलाद यादव के पाला बदलते ही राजग के आधा दर्जन नाराज चल रहे विधायक नरम पड़ गए. उन को लगा कि अब उन के बिना भी सरकार बन जाएगी इन विधायकों ने सदन का रुख कर लिया. जदयू के एक विधायक दिलीप राय इस के बाद भी मतदान में शमिल नहीं हुए.

राजग यानी एनडीए का विधानसभा अध्यक्ष बनते ही जदयू के नाराज विधायकों को यह पता चल गया कि अब वे जदयू को तोड़ नहीं पाएंगे. ऐसे में पार्टी के साथ रहने में ही भलाई है. जब इस तरह का बहुमत साबित करना होता है तब विधानसभा अध्यक्ष की अहमियत बढ़ जाती है. इसीलिए बहुमत साबित करने वाला दल अपनी पसंद का विधानसभा अध्यक्ष चाहता है. उत्तर प्रदेश में जब मायावती यानी बसपा-भाजपा की गठबंधन वाली सरकार बनती थी तब भाजपा केशरी नाथ त्रिपाठी को ही विधानसभा अध्यक्ष बनाती थी. वे दलबदल कानून के सब से बड़े जानकार और वकील थे. वे पार्टी को संकट से निकालने का काम करते थे. ऐसे उदाहरण देशभर में भरे पड़े हैं.

महाराष्ट्र में शिवसेना के 16 विधायकों की अयोग्यता मामले में फैसला सुनाते हुए विधानसभा स्पीकर राहुल नार्वेकर ने शिंदे गुट को सही ठहराया. उस के बाद उद्धव ठाकरे ने स्पीकर पर तंज कसा और कहा कि आज लोकतंत्र की हत्या हुई है. महाराष्ट्र में असली शिवसेना कौन है, इसे ले कर पिछले डेढ़ साल से चल रही दावेदारी की लड़ाई में एक बड़ा मोड़ तब सामने आया जब महाराष्ट्र के विधानसभा स्पीकर राहुल नार्वेकर ने सुप्रीम कोर्ट की बारबार की फटकार के बाद दी गई मोहलत के आखिरी दिन यानी 10 जनवरी को अपना फैसला सुनाया.

स्पीकर राहुल नार्वेकर ने चुनाव आयोग का हवाला देते हुए एकनाथ शिंदे गुट को राहत दी है. नार्वेकर ने अपने फैसले में कहा कि असली शिवसेना शिंदे गुट ही है और उद्धव ठाकरे गुट ने नियमों को ताक पर रख कर विधायकों को सस्पैंड किया था.

स्पीकर के फैसले पर पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा कि हम जनता को साथ ले कर लड़ेंगे और जनता के बीच जाएंगे. स्पीकर का आज जो आदेश आया है, वह लोकतंत्र की हत्या है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी अपमान है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राज्यपाल ने अपने पद का दुरुपयोग किया है और गलत किया है. अब हम इस लड़ाई को आगे भी लड़ेंगे और हमें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है. सुप्रीम कोर्ट जनता और शिवसेना को पूरा न्याय दिए बिना नहीं रुकेगा.

शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने स्पीकर के फैसले पर सवाल उठाते हुए बीजेपी पर षडयंत्र करने का आरोप लगाया. शिवसेना के पास यही विकल्प भी बचा क्योंकि इस से पहले चुनाव आयोग भी शिंदे गुट के पक्ष में ही फैसला सुना चुका था.

न्याय मिलना सरल नहीं :

महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर के फैसले से शिवसेना संतुष्ट नहीं है. इस के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है. संवैधानिक संस्थाओं को इसलिए बनाया गया था कि वे ज्यादा प्रभावी फैसला कर सकती हैं. हाल के कुछ सालों में संवैधानिक संस्थाओं ने ऐसे फैसले दिए जो विवादित रहे हैं. महाराष्ट्र के इस मसले में चुनाव आयोग और विधानसभा स्पीकर दोनों के फैसलों से शिवसेना उद्धव गुट संतुष्ट नहीं रहा. यह पहली बार नहीं है कि विधानसभा स्पीकर के फैसले पर सवाल उठे हों. जब भी राजनीतिक दलों में दलबदल या तोड़फोड़ होती है, विधानसभा स्पीकर का फैसला मान्य होता है.

लोकसभा और राज्यसभा से लेकर विधानसभाओं तक एकजैसा ही दस्तूर चल निकला है. लोकसभा में अभी 142 सांसदों को निलंबित किया गया. वहां भी सवाल खड़े हो रहे हैं. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ काफी चर्चा में रहे हैं. अब सदन में सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन रखना सरल नहीं रह गया है. फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना सरल हो गया है. संवैधानिक संस्थाओं के फैसले जिस तरह से विवादों में आ रहे हैं उस से न्याय में देरी होगी और अब यह फैसले सरल नहीं होंगे.

क्यों खास है विधानसभा स्पीकर :

विधानसभा के अध्यक्ष किसी भी राज्य में राजनीतिक उठापटक को देखते हुए साल 1985 में पास किए गए दलबदल कानून का सहारा ले सकते हैं. इस कानून के तहत सदन के अध्यक्ष कई हालात में फैसला ले सकता है, जैसे अगर कोई विधायक खुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, कोई निर्वाचित विधायक पार्टी लाइन के खिलाफ जाता है, कोई विधायक पार्टी व्हिप के बावजूद मतदान नहीं करता है, कोई विधायक विधानसभा में अपनी पार्टी के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता है आदि. संविधान की 10वीं अनुसूची में निहित शक्तियों के तहत विधानसभा अध्यक्ष फैसला ले सकता है.

बदलबदल कानून के तहत विधायकों की सदस्यता रद्द करने पर विधानसभा अध्यक्ष का फैसला आखिरी हुआ करता था. 1991 में सुप्रीम कोर्ट ने 10वीं सूची के 7वें पैराग्राफ को अवैध करार दिया. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फैसले की कानूनी समीक्षा हो सकती है.

विधानसभा स्पीकर को ले कर होते थे समझौते :

सरकार चलाने में विधानसभा स्पीकर की भूमिका बहुत प्रभावी होती है. ऐसे में गठबंधन की सरकार चलाने में दल यह चाहते थे कि स्पीकर उन का हो. उत्तर प्रदेश में 1995 से 2004 तक गठबंधन की सरकारों का दौर चल रहा था. बसपा और भाजपा का गठबंधन होता था. जिस में यह तय होता था कि पहले 6 माह बसपा नेता मायावती मुख्यमंत्री रहेंगी, उस के बाद भाजपा नेता कल्याण सिंह मुख्यमंत्री होंगे. मायावती पहले मुख्यमंत्री बनीं. जब कल्याण सिंह का नंबर आया तो उन्होंने विधानसभा भंग करने का फैसला किया. उधर, भाजपा ने मायावती के पैतरे का जवाब देने के लिए बहुजन समाज पार्टी में दलबदल करा दिया. यहां पर विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका खास हो जाती थी.

भाजपा ने उस दौर में केशरीनाथ त्रिपाठी को अपना विधानसभा स्पीकर बनवाया था. केशरीनाथ त्रिपाठी अच्छे वकील थे. उन के फैसले ऐेसे होने लगे जिन का लाभ भाजपा को मिलता था. वे जो फैसला देते थे उस की काट कोर्ट में भी नहीं हो पाती थी. इस के बाद यह परिपाटी शुरू हो गई कि गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री एक गुट का होता था तो विधानसभा स्पीकर दूसरे गुट का. इस से यह पता चलता है कि गठबंधन सरकारों में विधानसभा स्पीकर का महत्त्व कितना और क्यों होता है.

साल 2011 में कर्नाटक में भी इसी तरह का मामला सामने आया था. तब कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष ने बीजेपी के 11 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी. जब यह मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तो विधायकों की सदस्यता रद्द किए जाने के पक्ष में फैसला आया. लेकिन जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने विधायकों की सदस्यता रद्द नहीं करने का फैसला सुनाया.

साल 1992 में एक विधायक की सदस्यता रद्द किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट और मणिपुर के विधानसभा अध्यक्ष एच बोडोबाबू के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी. कई बार ऐसे मौके आए जब विधानसभा अध्यक्षों की भूमिका और उन के अधिकारों को ले कर अदालतों में बहसें हुई हैं. संविधान ने जिस तरह से विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को अधिकार दिए थे, अब ये उस तरह से फैसले नहीं कर रहे.

इस वजह से इन संस्थाओं के भरोसे पर सवाल उठने लगे हैं. न्याय कठिन हो गया है. हर व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट से ही राहत की उम्मीद करने लगा है. वहां तक पहंचना सरल नहीं रह गया है. खर्च वाला काम है. संवैधानिक संस्थाओं के फैसले लोगों को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं.

सहने से नहीं जवाब देने से बनेगी बात

7 फरवरी को पटना के एक एसएचओ सुदामा सिंह पर रेप करने और अश्लील वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने का आरोप लगा है. पीड़ित महिला दारोगा ने थाने में केस दर्ज करा कर बताया कि उस की न्यूड वीडियो बना कर थानेदार उसे ब्लैकमेल करता था.

पीड़ित महिला दरोगा ने आरोप लगाया कि थानेदार सुदामा सिंह उसे प्रताड़ित करता रहता था. अपने आवास पर आने के लिए दबाव बनाता था और धमकी देता था कि उस के कहने के अनुसार काम करो वरना काम में लापरवाही के आरोप में सस्पैंड करवा दूंगा. पीड़ित महिला दरोगा नौकरी बचाने के डर से एक दिन उस के आवास पर चली गई. वहां पर थानेदार ने उस को कौफी पीने को दिया जिस में बेहोशी की दवा मिला दी. जब महिला दरोगा को होश आया तो वह थानेदार के घर पर न्यूड हालत में थी. थानेदार ने अश्लील वीडियो बना लिया और ब्लैकमेल कर शारीरिक संबंध बनाता रहा. इस दौरान वह प्रैग्नैंट हुई तो उस का गर्भपात भी करवा दिया.

5 फरवरी को शाहजहांपुर में एक युवक ने दहेज के लिए हद पार कर दी. उस ने अपनी पत्नी के अश्लील फोटो और वीडियो वायरल कर दिए. विवाहिता को जब इस का पता चला तो उसे गहरा सदमा लगा. उस की शिकायत पर थाना पुलिस ने सुनवाई नहीं की. बाद में सीओ के आदेश पर 5 आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली गई है.

3 जून, 2023 को लुधियाना में रहने वाली मीनाक्षी (37) ने अपने ससुराल वालों से तंग आ कर जहरीला पदार्थ निगल लिया. इलाज के दौरान उस की मौत हो गई. मीनाक्षी की शादी करीब 5 साल पहले आरोपी बिट्टू वर्मा के साथ हुई थी. आरोपी नशा करने का आदी था और नशे की हालत में मीनाक्षी के साथ मारपीट करता था. इसी से तंग आ कर उस ने खुद को ही खत्म कर लिया.

कुछ महीने पहले पहले देशभर के मीडिया में एक खबर छपी कि यूपी के आगरा में रहने वाली एक 19 साल की लड़की ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. उस के चचेरे भाई ने घर में ही बाथरूम में नहाते हुए उस का न्यूड वीडियो बना लिया. फिर वीडियो दिखा कर उसे ब्लैकमेल करने लगा. गैरवाजिब डिमांड की और न मानने पर उस वीडियो को इंटरनैट पर डाल देने व वायरल कर देने की धमकी दी.

जाहिर है, छिप कर न्यूड वीडियो लड़के ने बनाया था. ब्लैकमेल लड़का कर रहा था. वीडियो वायरल करने की धमकी लड़का दे रहा था. और इन सब के जवाब में अपनी जिंदगी खत्म कर ली लड़की ने. उस ने अपने घरवालों को सच नहीं बताया. वह पुलिस के पास भी नहीं गई. खुद बचने या लड़के को दंडित करने का प्रयास भी नहीं किया और किसी से मदद भी नहीं मांगी. वह सिर्फ शर्मिंदा हुई और डरी. वह शर्मिंदा हुई वीडियो में दिख रहे अपने नग्न शरीर पर, अपने बदनाम हो जाने के खयाल पर और इन सारी शर्मिंदगियों से मुक्ति पाने का एक ही रास्ता उसे समझ में आया कि अपनी जिंदगी खत्म कर लो. उस ने यह नहीं सोचा कि अपराधी यानी दोषी लड़के को ही खत्म कर दो या ऐसी कोई सजा दो कि वह किसी और के साथ ऐसा करने के लायक न रहे.

ऐसा ही कुछ अमेरिका के फ्लोरिडा में हुआ. एक स्टौकर ने एक लड़की के न्यूड फोटो इंटरनैट पर वायरल कर दिए. सुबह जब वह सो कर उठी तो देखा कि पूरा सोशल मीडिया उस की नग्न तसवीरों से भरा पड़ा है. उस दिन नई कंपनी में उस की जौइनिंग थी. लड़की पुलिस के पास गई. मगर काफी सारा समय गुजर गया. पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. स्टौकर मजे से घूमता रहा. फिर टैक्नोलौजी की मदद से उस लड़की और उस की जुड़वां बहन ने मिल कर उस स्टौकर को खोज निकाला.

इंटरनैट पर अपनी न्यूड फोटोज देख कर सदमा तो इस लड़की को भी लगा था, दुख भी हुआ था और थोड़ा डर, थोड़ी शर्मिंदगी भी, लेकिन उस ने मरने का रास्ता नहीं चुना. उस ने लड़ने और स्टौकर को सबक सिखाने का रास्ता चुना.

दरअसल नंगा है यह पूरा का पूरा समाज जो लड़कों को ऐसा करने को प्रोत्साहित करता है और लड़कियां फांसी लगा कर या जहर खा कर अपनी जान देती हैं. अश्लील वीडियो बनाने और उसे इंटरनैट पर डालने वाले लड़के सीना चौड़ा कर के घूमते रहते हैं जबकि लड़कियां शर्म से जान दे देती हैं. समाज लड़कियों को सिखाता है कि इज्जत बचा कर रखो लेकिन लड़कों को कोई नहीं सिखाता कि लड़की की इज्जत वे कैसे करें.

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल 22,372 गृहिणियों ने आत्महत्या की थी. इस के अनुसार हर दिन 61 और हर 25 मिनट में एक आत्महत्या हुई है. देश में 2020 में हुईं कुल 153,052 आत्महत्याओं में से गृहिणियों की संख्या 14.6 प्रतिशत है और आत्महत्या करने वाली महिलाओं की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है.

यह स्थिति केवल पिछले साल की नहीं है. हर साल कमोबेश यही हालत रही है. रिपोर्ट में इन आत्महत्याओं के लिए ‘पारिवारिक समस्याओं’ या ‘शादी से जुड़े मसलों’ को जिम्मेदार बताया गया है. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस का एक प्रमुख कारण बड़े पैमाने पर घरेलू हिंसा है.

हाल ही में हुए एक सरकारी सर्वे में 30 प्रतिशत महिलाओं ने बताया था कि उन के साथ पतियों ने घरेलू हिंसा की है. ऐसे घरों में महिलाओं का दम घुटता है. महिलाएं बहुत सहनशील होती हैं लेकिन सहने की भी एक सीमा होती है.

दुनिया की कुछ महिलाएं हैं जिन्होंने अपने पति को रूह कंपा देने वाली मौत दी है. जितना उन्हें पति ने सताया उतना ही पति को टौर्चर कर उन्होंने हिसाब बराबर किया.

वर्ष 2000 में कैथरीन ने अपने एक्स हसबैंड जौन चार्ल्स थौमस प्राइस पर कसाई वाले चाकू से 37 बार हमला किया. इस के बाद उस की बौडी से स्किन खरोंच कर अपने लाउंज रूम में लगे मीट हुक में टांग दिया. उस ने मरे हुए हसबैंड के सिर को कुकर में पकाया और सब्जी के साथ बच्चों को परोस दिया. जब वह ऐसा कर रही थी तभी पुलिस ने उसे अरेस्ट कर लिया था.

इसी तरह दिसंबर 2008 में आस्ट्रेलिया में रहने वाली रजनी नारायण ने अपने सोते हुए हसबैंड के प्राइवेट पार्ट में पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. अचानक हुए इस अटैक से उस का पति सतीश नारायण घबरा गया और पास रखी स्पिरिट की बोतल अपने ऊपर उड़ेल ली. इस से आग भड़क गई और वह बुरी तरह झुलस गया. हादसे के 20 दिनों के बाद उस की मौत हो गई.

ऐसा ही कुछ लंदन में रहने वाली भारतीय मूल की किरण अहलूवालिया ने किया. 1989 में किरणजीत अहलूवालिया ने अपने पति दीपक के ऊपर कास्टिक सोडा और पैट्रोल का मिक्सचर डाल कर आग लगा दी. किरण का आरोप था कि दीपक उस को काफी टौर्चर करता था. उस के साथ मारपीट करना और हर दिन रेप करना दीपक के लिए आम बात थी. 10 साल तक किरण ने सब बरदाश्त किया. लेकिन फिर सोते हुए दीपक को जिंदा जला दिया. इस हमले के बाद दीपक की मौत हो गई.

दरअसल किरण अहलूवालिया की 1979 में 24 साल की उम्र में अरेंज मैरिज हुई. वह अपने पति दीपक के परिवार के साथ ब्रिटेन में रहने आई तो वह बहुत कम इंग्लिश बोलती थी. दीपक ने उस के साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया. वह किरण को धक्का देता, बालों को खींचता, मारता और उस के पैरों पर भारी तवे गिरा देता. उस के साथ गुलामों जैसा व्यवहार करता. पसंद की चीजें न खाने देता. वह उस से इतना डरती थी कि कुछ न कहती. वह रात में सोने से भी बहुत डरती थी क्योंकि दीपक उस से यह कह कर अकसर दुष्कर्म करता रहता कि यह उस का अधिकार है. उसे अपने परिवार से कोई मदद नहीं मिली.

इसी दौरान किरण अहलूवालिया के 2 बेटे हुए जो अकसर हिंसा के गवाह बने. एक रात जब वह दीपक के लिए खाना बनाने के बाद सोने चली गई तो उस ने उसे जगाया और पैसे की मांग की. जब किरण ने इनकार कर दिया तो उस ने किरण की एड़ियां मरोड़ कर तोड़ने की कोशिश की. फिर एक गरम लोहा उठाया और बालों को पकड़ते हुए गरम लोहे को उस के चेहरे पर रख दिया. किरण दर्द से चीख उठी. थोड़ी देर बाद दीपक चैन से सोने चला गया और किरण के मन में दर्द व गुस्से का लावा फूट पड़ा जो उस ने 10 साल से अपने अंदर दबा रखा था.

वह पैट्रोल की एक कैन ले कर उस के पास आई और पति के पैरों पर छिड़क कर आग लगा दी. वह पति को दिखाना चाहती थी कि कितना दर्द होता है. कई बार उस ने भागने की कोशिश भी की थी लेकिन वह उसे पकड़ लेता था और जोर से पीटता भी था. इसलिए किरण ने उस के पैर जलाने का फैसला किया ताकि वह पीछे न भाग सके.

घटना के 5 दिनों बाद दीपक की मृत्यु हो गई और अहलूवालिया पर हत्या का आरोप लगाया गया. उस ने खुद को बेकुसूर बताया लेकिन उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. जेल में उस की मुलाकात एक अंगरेज दोस्त से होती है जो उस के साथ सहानुभूति दिखाता है. धीरेधीरे यह मामला एक एनजीओ के सामने आता है जो उस की रिहाई की मांग करता है. यह बात साबित की गई कि जब उस ने अपने पति की हत्या की तो वह गंभीर अवसाद में थी. बाद में हालात पर विचार करते हुए उसे रिहा कर दिया गया.

सच तो यह है कि अत्याचार करने वाले से ज्यादा दोषी अत्याचार सहने वाला होता है. महिलाओं के साथ भी ऐसी ही स्थिति है. इसे बदलना किसी और के नहीं, बल्कि खुद महिलाओं के हाथ में है. हमारी फिल्मों में भी कभीकभी इस विषय को उठाया गया है. ऐसी कुछ फिल्में हैं जिन में महिलाओं ने अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई और लड़ाई लड़ी.

किरण के जीवन पर आधारित एक फिल्म ‘प्रोवोक्ड’ बनाई गई थी. एक एब्यूसिव रिलेशनशिप का अंजाम क्या हो सकता है और चुप्पी रखने का नतीजा क्या होता है, यह सब फिल्म ‘प्रोवोक्ड’ में बखूबी दिखाया गया था. 2006 में रिलीज हुई यह फिल्म सच्ची घटना पर आधारित थी. इस फिल्म में ऐश्वर्या राय बच्चन लीड रोल में थीं. ऐश्वर्या ने ऐसी महिला का किरदार निभाया जिस का पति उसे क्रूरता के साथ टौर्चर करता है और आखिर में वह उस की जान ले लेती है.

तापसी पन्नू स्टारर फिल्म ‘थप्पड़’ में भी दिखाया गया कि घरेलू हिंसा और मारपीट के खिलाफ आवाज उठाना कितना जरूरी है. 2020 में रिलीज हुई इस फिल्म में एक ऐसी महिला की कहानी दिखाई गई जो पति द्वारा हाथ उठाए जाने पर उस के खिलाफ ऐक्शन लेती है और रिश्ता तोड़ लेती है. फिल्म में तापसी पन्नू ने अमृता नाम की एक ऐसी महिला का किरदार निभाया जो एक परफैक्ट पत्नी, बहू और बेटी है. वह कमाल की डांसर भी है और चाहती तो उस में कैरियर भी बना सकती थी. लेकिन घरपरिवार के आगे अमृता खुद को कुरबान कर देती है. वह पति की खुशी में ही खुश होना सीख लेती है. लेकिन जब उस का पति सरेआम उसे जोर का थप्पड़ मारता है तो अमृता की आंखें खुल जाती हैं. जहां उस के परिवार वाले और रिश्तेदार थप्पड़ को भूल कर आगे बढ़ने की सलाह देते हैं वहीं अमृता पति के खिलाफ जाने का फैसला करती है. अमृता किसी भी तरह की घरेलू हिंसा और एब्यूसिव रिलेशनशिप के खिलाफ है और इसलिए उसे एक थप्पड़ से भी आपत्ति होती है.

इसी अवधारणा पर कुछ समय पहले एक वैब सीरीज बनाई गई थी- ‘क्रिमिनल जस्टिस: बिहाइंड क्लोज्ड डोर्स’. यह वैब सीरीज घरेलू हिंसा का वह भयावह पक्ष दिखाता है कि घरेलू हिंसा क्या हो सकती है और अगर महिला की परिस्थितियों और मानसिक स्थिति पर विचार नहीं किया गया तो उस के साथ कितना घोर अन्याय हो सकता है.

इस वैब सीरीज की कहानी एक ऐसी महिला के इर्दगिर्द घूमती है जो एक रात अपने ‘परफैक्ट’ पति का मर्डर कर देती है और अपना अपराध भी कुबूल कर लेती है. पहली नजर में यह एक सीधासाधा मामला प्रतीत होता है लेकिन जब बचाव पक्ष के वकील केस की तह तक जाते हैं तो असली कहानी सामने आती है. आरोपी महिला के साथ निरंतर यौन और मानसिक शोषण का मामला सामने आता है. इस में महिला की दुविधा, घुटन और दर्द को महसूस किया जा सकता है जो स्थिति की शिकार होने के बावजूद लगातार आंतरिक अपराधबोध से लड़ रही है.

अत्याचार सहना है गलत

चाहे पतिपत्नी हो या फिर गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड, हर रिश्ता आपसी प्यार, विश्वास और इज्जत पर टिका होता है. जब किसी रिश्ते में ये तीनों ही चीजें खत्म हो जाएं तो उसे खत्म कर देना ही बेहतर है क्योंकि ये तीनों चीजें खत्म होते ही रिश्ते में तकरार के साथसाथ मारपीट व गालीगलौज शुरू हो जाती है और रिश्ता जहरीला हो जाता है. बहुत सी महिलाएं घरेलू हिंसा, एब्यूसिव रिलेशनशिप और मारपीट की शिकार होती हैं. जहां कुछ महिलाएं इस के खिलाफ आवाज उठा लेती हैं तो वहीं बहुत सी महिलाएं समाज व परिवार के डर से चुप रह कर जुल्म सहती रहती हैं. अंत में नतीजा भयावह आता है.

औरतें कमजोर नहीं

औरतें कमजोर कैसे हैं? अगर ताकत की बात की जाए तो शारीरिक रूप से औरतें कहीं ज्यादा ताकतवर और मजबूत होती हैं. वे एक बच्चे को अपने पेट में बड़ा करती हैं, 9 महीने तक उसे ले कर हर जगह घूमती हैं और फिर उसे जन्म देती हैं. पुरुष क्या करते हैं? स्त्री तो मन से भी बहुत मजबूत होती है. अगर वह चाहे तो दोचार लड़कों को यों ही पटक दे. मगर वह ऐसा करती नहीं क्योंकि समाज में उसे यह सिखाया जाता है कि वह कमजोर है. उसे पुरुषों, खासकर अपने पति, की पूजा करनी चाहिए. पति परमेश्वर है. उसे अपशब्द नहीं बोलना है. उस का विरोध नहीं करना है. वह जो कहे वैसा करना है.

इसी वजह से वह पति के आगे कुछ बोलती नहीं. पति मारपीट सकता है. हिंसा कर सकता है. मगर सोचने वाली बात है कि अगर कोई स्त्री किसी पुरुष की पत्नी है और साथ रहती है तो क्या उस के पास ऐसे मौकों की कमी है जब वह पुरुष को उस के किए की सजा दे सके या उसे मजा चखा सके. अगर किसी पुरुष या पति ने सालों से परेशान कर रखा है तो ऐसे में क्या पत्नी के पास इतना मौका नहीं कि वह सोए हुए पति का सिर फोड़ दे या उस के खाने में कुछ डाल दे.

जो स्त्री जिंदगीभर प्रताड़ना सहती है उसे पता होना चाहिए कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब वह पति द्वारा खत्म कर दी जाएगी. पति उसे जान से मार सकता है तो क्या स्त्री के पास यह हक नहीं कि वह ऐसे पति की जान ले कर अपना पीछा छुड़ाए और अपनी जान बचाए. यह एक तरह से सैल्फ डिफैंस ही है क्योंकि अगर वह पति की जान नहीं लेगी तो उस की खुद की जान जाएगी.

स्त्रियां खुद ही स्त्रियों की दुश्मन भी होती हैं. एक सास अपने बेटे को पत्नी के खिलाफ भड़काती है. खुद भी उस के साथ नाइंसाफी ही करती है. गालीगलौज करती है और उसे प्रताड़ित करती है. सास को समझना चाहिए कि कल को जब वह बूढ़ी और कमजोर होगी तब उसे बहू के आसरे ही रहना है. अगर वह बहू के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करेगी तो कल को उस के साथ भी बुरा ही होगा.

इसी तरह पुरुष सोचते हैं कि स्त्री को दबा कर रखो, मारपीट करो. लेकिन पुरुष को यह समझना होगा कि अगर कोई उस की देखभाल और उस का खयाल रख सकता है तो वह उस की पत्नी ही है. कभी वह बीमार पड़ा या उस के साथ कुछ गलत हुआ, वह अपंग हो गया तो हर स्थिति में स्त्री ही उस का साथ देगी. अगर वह स्त्री के साथ खराब व्यवहार कर रहा है तो इस का नतीजा भी उसे खुद ही भोगना होगा. स्त्री समाज का गठन करती है. परिवार को बनाती है. स्त्री को नीचा या कमजोर समझना समाज की सब से बड़ी भूल है.

परीक्षा से पहले सोना क्यों है जरूरी, जानें एक्सपर्ट से

Sleeping Before Exam Benefits : बोर्ड के एग्जाम नजदीक है ऐसे में “बच्चों को एग्जाम की चिंता और नींद का गहरा संबंध होता है क्योंकि एग्जाम में अच्छे नंबर के दबाव में सोने के पैटर्न पर बड़ा असर हो सकता है.

डॉ. श्रद्धा मलिक – मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और एथेना बिहेवियरल हेल्थ की सीईओ का कहना है कि एग्जाम से जुड़ी गहरी चिंता और मानसिक दबाव के कारण टेंशन हॉर्मोन्स जैसे कॉर्टिसोल के स्तर में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे सामान्य सोने-जागने की चक्र को बिगाड़ा जा सकता है. सोने की गुणवत्ता रेसिंग थॉट्स, बेचैनी, और प्रत्याशीता चिंता के कारण प्रभावित हो सकती है? बहुत अधिक एग्जाम की चिंता से कम और लंबे समय तक सोने में डिस्टर्बेंस हो सकता है.

केस स्टडीज ने दिखाया है कि हाई लेबल (उच्च स्तर) के एग्जाम से जुड़े तनाव में होने वाले छात्रों को अक्सर सोने में कठिनाई, बार-बार जागना से सोने की समस्या हो सकती है. यह न केवल उनके तत्कालीन प्रदर्शन को प्रभावित करता है बल्कि बढ़ते हुए तनाव और कमजोर एकेडेमिक रिजल्ट (अकादमिक परिणामों) के चक्र में योगदान कर सकता है.

स्ट्रेस मैनेजमेंट टेक्निक (तनाव प्रबंधन तकनीकों) को लागू करना, एक सुहावने सोने का माहौल बनाना, और संतुलित जीवनशैली को बनाए रखना, परीक्षा की चिंता के सोने पर प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है, जिससे चुनौतीपूर्ण अकादमिक दौरों में समग्र कल्याण को बढ़ावा मिल सकता है.

जबकि अधिकांश छात्रों की सोने की कमी से शिकायत है, विद्यार्थियों में हाई स्कूल के छात्रों को अधिक असुविधा महसूस होती है. इसके पीछे के संभावित कारण क्या हो सकते हैं? जानते है.

उच्च स्कूल के छात्र सोने की कमी के कई कारणों से बढ़ी हुई असुविधा महसूस कर सकते हैं. पहली बात तो, उच्च स्कूल में शैक्षणिक दबाव बढ़ता है, जिसमें कठिन पाठ्यक्रम, परीक्षाएँ, और कॉलेज की तैयारी उनके तनाव को और बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा, अतिरिक्त गतिविधियों, पार्ट-टाइम नौकरियों, और सामाजिक वचनों के कारण उनका समय पर्याप्त आराम के लिए सीमित हो जाता है. इसके अलावा, किशोरावस्था के दौरान हार्मोनल परिवर्तन सोने के पैटर्न को विघटित कर सकते हैं.

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज का उपयोग – 

उच्च स्कूल के छात्रों के बीच इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज का उपयोग बढ़ता जा रहा है, खासकर सोने से पहले, जो उनके सोने की गुणवत्ता को नकारात्मक प्रभावित कर सकता है. अनियमित सोने की अनुसूचित गतिविधियाँ, स्कूल की शुरुआत के समय, और सामान्यत: व्यस्त जीवनशैली इस समस्या को बढ़ा सकती हैं. इस समस्या को कम करने के लिए स्वस्थ नींद की आदतें प्रोत्साहित करके, स्कूल की अनुसूचितियों को समायोजित करके, और एक समर्थनसूचक वातावरण को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है.

परीक्षा के दौरान नींद की कमी का बच्चों पर असर –

परीक्षा के दौरान नींद की कमी बच्चों के मानसिक क्षमताओं पर काफी बड़ा प्रभाव डाल सकती है. शारीरिक रूप से, नींद की कमी थकान, कमजोर इम्यून सिस्टम, और बढ़ी हुई रोग प्रतिरोधशक्ति की ओर बढ़ सकती है. मानसिक रूप से, यह ध्यान, स्मृति, और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है. परीक्षा की अवधि में नींद की चरम कमी अधिकतम तनाव और चिंता के स्तरों में वृद्धि कर सकती है, जिससे दबावों का समृद्धि के दिशा में बढ़ सकता है, जो स्थायी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं जैसे अवसाद की ओर जाने की संभावना है.
शारीरिक रूप से, अधूरी नींद से सिरदर्द, चक्कर, और संक्रमणों से लड़ने की क्षमता में कमी हो सकती है. मानसिक रूप से बच्चे जानकारी रखने में कठिनाई, समस्याएँ हल करने की क्षमता में कमी, और बढ़ा हुआ चिढ़चिढ़ापन महसूस कर सकते हैं. दीर्घकालिक नींद की कमी एक बच्चे की भावनात्मक सहनशीलता को प्रभावित कर सकती है.

उदाहरण के लिए, परीक्षा के लिए रात भर जागकर पढ़ाई करने वाला छात्र मानसिक थकान और उच्च तनाव के कारण परीक्षा के दौरान ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई महसूस कर सकता है, जिससे उसके अकादमिक प्रदर्शन में कमी हो सकती है.

बच्चों के लिए डोज़ :

1. एक स्टडी शेड्यूल बनाएं: सभी विषयों को धीरे-धीरे कवर करने के लिए एक वास्तविक और व्यवस्थित स्टडी रूटीन बनाएं.
2. स्वस्थ आहार और पर्याप्त नींद: ध्यान और समग्र कल्याण को बढ़ावा देने के लिए संतुलित आहार और पर्याप्त नींद सुनिश्चित करें.
3. नियमित ब्रेक्स: पढ़ाई के सत्रों के दौरान बर्नआउट से बचने और ध्यान बनाए रखने के लिए छोटे-छोटे रेस्ट लेछोटी छुटियाँ शामिल करें.
4. हाइड्रेटेड रहें: जागरूकता को समर्थन करने और चेतावनी बनाए रखने के लिए हाइड्रेटेड रहें.
5. विषयों को प्राथमिकता दें: कमजोर विषयों पर ध्यान केंद्रित करें, लेकिन स्ट्रांग विषयों को भी दोहराएं.
6. पिछले पेपर्स के साथ अभ्यास करें: बेहतर तैयारी के लिए पिछले पेपर्स को हल करके परीक्षा के स्वरूप से परिचित हो जाएं.
7. सकारात्मक रहें: सकारात्मक मानसिकता बनाए रखें, अपनी क्षमताओं में विश्वास करें, और आत्मसंदेह से बचें.

बच्चों के लिए डोन्ट्स :

1. क्रैमिंग से बचें: अंतिम क्षण की क्रैमिंग से दूर रहें; यह अप्रभावी और तनावपूर्ण होता है.
2. ध्यान को सीमित करें: पढ़ाई के समय इलेक्ट्रॉनिक विघटन, जैसे कि सोशल मीडिया या अत्यधिक टीवी, को कम से कम रखें.
3. टालमटोल से बचें: तनाव से बचने के लिए पहले से ही में ही तैयारी शुरू करें.

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