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मन का दाग : सरोज को उसकी पड़ोसन किसके खिलाफ भड़का रही थी

‘‘अरे तेरी बहू अब तक सो रही है और तू रसोई में नाश्ता बना रही है. क्या सरोज, तू ने तो अपने को घर की मालकिन से नौकरानी बना लिया,’’ सरोज की पड़ोसिन सुबहसुबह चीनी लेने आई और सरोज को काम करता देख सहानुभूति दिखा कर चली गई. उस के जाने के बाद सरोज फिर से अपने काम में लग गई पर मन में कही पड़ोसिन की बात खटकने लगी. वह सोचने लगी कि पिछले 30 साल से यही तो कर रही है. सुबह का नाश्ता, दोपहर को क्या बनना है, बाजार से क्या लाना है, बच्चों को क्या पसंद है, इसी में सारा दिन निकल जाता है. घर के बाकी कामों के लिए तो बाई आती ही है. बस, बच्चों को अपने हाथ का खाना खिलाने का मजा ही कुछ और है. इतने में सोच में डूबी सरोज के हाथ से प्लेट गिर गई तो पति अशोक ने रसोई में आ कर कहा, ‘‘सरोज, जरा ध्यान से, बच्चे सो रहे हैं.’’

‘‘हांहां, गलती से गिर गई,’’ सरोज ने प्लेट उठा कर ऊपर रख दी. आज से पहले भी छुट्टी वाले दिन सुबह नाश्ता बनाते हुए कभी कोई बरतन गिरता तो अशोक यही कहते कि बच्चे सो रहे हैं. बस, फर्क इतना था तब मेरा बेटा और बेटी सो रहे होते थे और आज बेटा और बहू. आज रविवार था, इसलिए बच्चे इतनी देर तक सो रहे हैं. वरना रोज तो 8 बजे तक औफिस के लिए निकल जाते हैं.

‘‘तुम इतनी सुबहसुबह रसोई में कर क्या रही हो?’’ इन्होंने रसोई में मेरे पास आ कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं जी, आज रविवार है. अमन और शिखा की छुट्टी है. सोचा कुछ अच्छा सा नाश्ता बना दूं. बस, उसी की तैयारी कर रही हूं.’’

‘‘ओ अच्छा, फिर तो ठीक है. सुनो, मेरे लिए चाय बना दो,’’ ये अखबार ले कर बैठ गए. इन को चाय दे कर मैं फिर रसोई में लग गई. 10.30 बजे अमन जगा तो चाय लेने रसोई में आया.

‘‘मां, 2 कप चाय बना दो, शिखा भी उठ गई है. बाथरूम गई है. और हां मां, जल्दी तैयार हो जाओ. हम सब फिल्म देखने जा रहे हैं.’’

मैं ने पूछना चाहा कि चाय लेने शिखा क्यों नहीं आई और फिल्म का प्रोग्राम कब बना पर तब तक अमन अपने कमरे में जा चुका था.

‘‘अरे वाह, फिल्म, मजा आ गया. आज की छुट्टी का तो अच्छा इस्तेमाल हो जाएगा. सरोज, मैं तो चला नहाने. तुम मेरी वह नीली वाली कमीज जरा इस्तिरी कर देना,’’ अशोक फिल्म की बात सुन कर खुश हो गए और गुनगुनाते हुए नहाने चले गए. मैं अभी रसोई में ही थी कि शिखा आ गई.

‘‘अरे मम्मी, आप अभी तक यहां ही हैं, 12 बजे का शो है. चलिए, जल्दी से तैयार हो जाइए. चाय मैं बनाती हूं. मम्मी आप वह गुलाबी साड़ी पहनना. वह रंग आप पर बहुत अच्छा लगता है.’’

अमन भी अब तक रसोई में आ गया था. ‘‘शिखा, यह फिल्म का प्रोग्राम कब बना? देखा, मैं ने नाश्ते की सारी तैयारी कर रखी थी…’’ मेरी बात पूरी होने से पहले ही शिखा की जगह अमन बोल पड़ा, ‘‘मम्मी, रात को शिखा ने प्रोग्राम बनाया और फिर इंटरनैट पर ही बुकिंग भी कर ली. अब प्लीज, जल्दी चलो न, मम्मी, नाश्ता हम डिनर में खा लेंगे,’’ अमन ने मेरा हाथ प्यार से पकड़ा और कमरे तक ले आया. बचपन से ही मैं अमन को कभी किसी बात के लिए मना नहीं कर पाती थी. यहां तक कि जब उस ने शिखा को पसंद किया था तब भी मेरी मरजी न होते हुए भी मैं ने हां की ताकि अमन खुश रह सके. अमन जितना चुलबुला और बातूनी था, शिखा उतनी ही शांत थी. मुझे शादी के कुछ ही दिनों में महसूस होने लगा था कि शिखा अमन के अधिकतर फैसले खुद लेती थी, चाहे वह किसी के घर डिनर का हो या कहीं घूमने जाने का. खैर, उस दिन हम चारों ने बहुत मजा किया. फिल्म ठीक थी. पर रात को किसी ने खाना नहीं खाया और मुझे सारा नाश्ता अगले दिन काम वाली को देना पड़ा. मेरी मेहनत खराब हुई और मुझे बहुत दुख हुआ. कुछ दिन के बाद पड़ोस में मेरी सहेली माधुरी के पोते का मुंडन था. मैं ने सोचा मैं ही चली जाती हूं. मैं ने अशोक को फोन कर के बता दिया कि घर पर ताला लगा हुआ है और मैं पड़ोस में जा रही हूं. बच्चे तो रात को लेट ही आते हैं, इसलिए उन्हें बताने की जरूरत नहीं समझी. कुछ ही देर बाद मेरे फोन पर शिखा का फोन आया, ‘‘मम्मी, आप कहां हो, घर पर ताला लगा है. मैं आज जल्दी आ गई.’’

‘‘शिखा, तुम रुको, मैं आती हूं,’’ मैं घर पहुंची तो देखा कि शिखा बुखार से तप रही थी. मैं ने जल्दी से ताला खोला और उसे उस के कमरे में लिटा दिया. बुखार तेज था तो मैं ने बर्फ की पट्टियां उस के माथे पर रख दीं. थोड़ी देर बाद शिखा दवा खा कर सो गई. इतने में दरवाजे की घंटी बजी, माधुरी, जिस का फंक्शन मैं अधूरा छोड़ कर आ गई थी, मुझे मेरा पर्स लौटाने आई थी जो मैं जल्दी में उस के घर भूल आई थी.

‘‘क्या हुआ, सरोजजी, आप जल्दीजल्दी में निकल आईं?’’ माधुरी, जिन्हें मैं दीदी कहती हूं, ने मुझ से पूछा तो मैं ने कहा, ‘‘बस दीदी, बहू घर आ गई थी, थोड़ी तबीयत ठीक नहीं थी उस की.’’

‘‘क्या बात है सरोज, तू भी कमाल करती है, बहू घर जल्दी आ गई तो तू सबकुछ बीच में छोड़ कर चली आई. अरे उस से कहती कि 2 घर छोड़ कर माधुरी के घर में हूं. आ कर चाबी ले जा. सरोज, तेरी बहू को आए अभी सिर्फ 2 महीने ही हुए हैं और तू ने तो उसे सिर पर बिठा लिया है. मुझे देख, 3-3 बहुएं हैं, उन की मजाल है कि कोई मुझे कुछ कह दे. सिर से पल्ला तक खिसकने नहीं देती मैं उन का. पर तू भी क्या करेगी? बेटे की पसंद है, सिर पर तो

बिठानी ही पड़ेगी,’’ माधुरी दीदी न जाने मुझे कौन सा ज्ञान बांट कर चली गईं. पर उन के जाते ही मैं सोच में पड़ गई कि उन्होंने जो कहा वह ठीक था. हर लड़की को शादी के बाद घर की जिम्मेदारियां भी समझनी होती हैं. यह क्या बात हुई, मुझे क्या समझ रखा है शिखा ने. पर अगर शिखा की जगह मेरी बेटी नीति (मेरी बेटी) होती तब भी तो मैं सब छोड़ कर आ जाती. लेकिन बहुओं को घर का काम तो करना ही होता है. शिखा के ठीक होते ही मैं उस से कहूंगी कि सुबह मेरे साथ रसोई में मदद करे. पर वह तो सुबह जल्दी जाती है और रात को देर से आती है और मैं सारा दिन घर पर होती हूं. बहू की मदद के बिना भी काम आराम से हो जाता है. फिर क्यों उस को परेशान करूं. इसी पसोपेश में विचारों को एक ओर झटक कर मैं रात के खाने की तैयारी में जुट गई. बहू की तबीयत ठीक नहीं है उस के लिए कुछ हलका बना देती हूं और अमन के लिए बैगन का भरता. उसे बहुत पसंद है. फिर दिमाग के किसी कोने से आवाज आई 2-2 चीजें क्यों बनानी, बहू इतनी भी बीमार नहीं कि भरता न खा सके. पर दिल ने दिमाग को डांट दिया-नहीं, तबीयत ठीक नहीं है तो हलका ही खाना बनाती हूं. रात को अमन शिखा के लिए खाना कमरे में ही ले गया. मुझे लगा तबीयत कहीं ज्यादा खराब न हो जाए, इसलिए मैं पीछेपीछे कमरे में चली गई. शिखा सोई हुई थी और खाना एक ओर रखा था. अमन लैपटौप पर कुछ काम कर रहा था.

‘‘क्या हुआ, अमन? शिखा ने खाना नहीं खाया?’’

‘‘नहीं, मम्मी, उस को नींद आ रही थी. मैं कुछ देर में खाना रखने आ रहा था. आप आ गई हो तो प्लीज, इसे ले जाओ.’’ अमन फिर लैपटौप पर काम करने लगा. मुझे बहुत गुस्सा आया, एक तो मैं ने उस की बीमारी देखते हुए अलग से खाना बनाया और शिखा बिना खाए सो गई. श्रीमती शर्मा ठीक ही कहती हैं, मैं कुछ ज्यादा ही कर रही हूं. मुझे शिखा की लगाम खींचनी ही पड़ेगी, वरना मेरी कद्र इस घर में खत्म हो जाएगी. अगले दिन मैं रसोई में थी तभी शिखा तैयार हो कर औफिस के लिए निकलने लगी, ‘‘मम्मी, मैं औफिस जा रही हूं.’’

‘‘शिखा, तुम्हारी तो तबीयत ठीक नहीं है, औफिस क्यों जा रही हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मम्मी, बहुत जरूरी मीटिंग है, टाल नहीं सकती. कल भी जल्दी आ गई थी तो काम अधूरा होगा…’’ अपनी बात खत्म किए बिना ही शिखा औफिस चली गई. मुझे बहुत गुस्सा आया कि कैसी लड़की है, अपने आगे किसी को कुछसमझती ही नहीं. घर में हर किसी को अपने तरीके से चलाना चाहती है. घर की कोई जिम्मेदारी तो समझती नहीं, ऊपर से घर को होटल समझ रखा है…पता नहीं मैं क्याक्या सोचती रही. फिर अपने काम में लग गई. काम खत्म कर के मैं माधुरी दीदी के घर चली गई, जिन के पोते के मुंडन का कार्यक्रम मैं अधूरा छोड़ आई थी. सोचा एक बार जा कर शगुन भी दे आऊं. उन की बहू ने बताया कि माताजी की तबीयत ठीक नहीं है, वे अपने कमरे में हैं. मैं उन के कमरे में ही चली गई. माधुरी दीदी पलंग पर लेटी थीं और उन की दूसरी बहू उन के पैर दबा रही थी. मुझे देख कर उन्होंने अपनी बहू से कहा, ‘‘चल छुटकी, आंटी के लिए चाय बना ला.’’ उन की एक आवाज पर ही उन की बहू उठ कर रसोई में चली गई.

‘‘क्या हुआ, दीदी, आप की तबीयत खराब है क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अरे नहीं…कल की थकान है, बस. यों समझ लो कि आज आराम का मन है मेरा,’’ वह मुसकराते हुए बोलीं, ‘‘तेरी बहू की तबीयत कैसी है?’’

‘‘ठीक है, दीदी. औफिस गई है,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्या, औफिस गई? देखो तो जरा, कल तक तो इतनी बीमार थी कि 2 घर छोड़ कर चाबी तक लेने नहीं आ पाई. अपनी सास को भगाया और आज औफिस चली गई. सब तेरी ही गलती है, सरोज. तू ने उसे बहुत ढील दे रखी है.

‘‘अरे देख, मेरी बहुओं को, मजाल है कि आवाज निकल जाए इन की मेरे सामने.’’

इतने में छोटी बहू चायपकोड़े रख गई. माधुरी दीदी ने बात आगे शुरू की, ‘‘देख सरोज, मैं ने दुनिया देखी है. इन बहुओं को सिर पर बैठाएगी तो पछताएगी एक दिन. तेरे बेटे को तुझ से दूर कर देगी.’’ तब से वे बोली जा रही थीं और मैं मूक श्रोता बन उन की बातें सुने जा रही थी. दर्द से सिर फटने लगा था. वे बोले जा रही थीं, ‘‘सरोज, मेरी बहन भी तेरी तरह ही बड़ी सीधी है. आज देख उस को, बहुओं ने पूरा घर अपने हाथ में ले लिया.’’ उन्होंने चाय पीनी शुरू कर दी. मुझे कुछ अजीब सा लगने लगा. सिर बहुत भारी हो गया. मैं ने जैसे ही कप उठाया वह छलक कर मेरे कपड़ों पर गिर गया.

‘‘अरे सरोज, आराम से. जा, जल्दी इस को पानी से धो ले वरना निशान पड़ जाएगा.’’

दीदी के कहने पर मैं खुद को संभाल कर बाथरूम की ओर चल पड़ी. बाथरूम की दीवार रसोई के एकदम साथ थी. बाथरूम में खड़े हुए मुझे रसोई में काम कर रही दीदी की बहुओं की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं. ‘‘देखा बुढि़या को, कल सारा वक्त पसर के बैठी थी और फिर भी थक गई,’’ यह आवाज शायद छोटी बहू की थी.

‘‘और नहीं तो क्या, पता नहीं कब यह बुढि़या हमारा पीछा छोड़ेगी. पूरे घर पर कब्जा कर के बैठी है. जल्दी ये मरे और हम घर का बंटवारा कर लें.’’

‘‘हां दीदी, आप के देवर भी यही कहते हैं. कम से कम अपनी मरजी से जी तो पाएंगे. इस के रहते तो हम खुल कर सांस तक नहीं ले सकते.’’

‘‘चल, धीरे बोल. और काम खत्म कर. अगर इस बुढि़या ने सुन लिया तो बस,’’ दोनों दबी आवाज में हंस दीं.

उन दोनों की बात सुन कर मुझे मानो एक धक्का सा लगा, यह कैसी सोच थी उन दोनों की अपनी सास के लिए. पर ठीक ही था, दीदी ने कभी इन दोनों को अपने परिवार का हिस्सा नहीं माना. हाय, मैं भी तो यही करने की सोच रही थी. घर पर अपना ऐसा भी क्या कब्जा कर के रखना कि सामने वाला तुम्हारे मरने का इंतजार करता रहे. अगर मैं दीदी की बातों में आ कर शिखा को बंधन में रखने की कोशिश करती तो घर की शांति ही खत्म हो जाती और कहीं शिखा भी तो मेरे लिए ऐसा ही नहीं सोचने लगती. न न, बिलकुल नहीं, शिखा तो बहुत समझदार है.’’

‘‘क्या हुआ, सरोज, दाग गया या नहीं?’’ बाहर से दीदी की आवाज ने मुझे विचारों से बाहर निकाल दिया.

मैं ने तुरंत बाहर आ कर कहा, ‘‘हां दीदी, सब दाग निकल गए,’’ मैं ने मन में सोचा, ‘साड़ी के भी और मन के भी.’

मैं ने तुरंत घर आ कर शिखा को फोन किया. उस का हालचाल पूछा और उस से जल्दी घर आ कर आराम करने को कहा. फिर मैं रसोई में चली गई रात का खाना बनाने.

आज शिखा के लिए अलग से खाना बनाते हुए मैं ने एक बार भी नहीं सोचा. ऐसा लगा मानो कि अपनी बेटी की बीमारी से परेशान एक मां उस के औफिस से घर आने का इंतजार कर रही हो ताकि वह घर आ कर आराम कर सके.

हवा का झोंका

मेरे माता पिता मुझ पर ऐसे चिल्लाते हैं मानो मैं छोटा बच्चा हूं, समझ नहीं आ रहा है क्या करूं?

सवाल

मेरे पिता ऐसी नौकरी नहीं करते जिसे वे घर बैठे जारी रख सकें. सो, घर का सारा खर्च मेरे कंधों पर है. मेरी तनख्वाह से जो पैसा आता है वह मैं घर में दे देता हूं. लेकिन मुझे लगता है जैसे मेरे इतना सब करने पर भी मेरे माता-पिता को मेरी बिलकुल कद्र नहीं है. वे मुझ पर किसी भी बात के लिए ऐसे चीख पड़ते हैं जैसे मैं अब भी छोटा बच्चा हूं. कभी-कभी तो इतना गुस्सा आता है कि मन करता है नौकरी छोड़ कर बैठ जाऊं, शायद तब उन्हें समझ आए कि उन्हें कम से कम अब मुझ से इस तरह पेश नहीं आना चाहिए.

जवाब

आप जानते हैं कि इस समय आप के माता-पिता को आप की जरूरत है और इस समय आप का इस तरह बातें करना बेहद दुखी करता है.माना आप के माता-पिता का आप पर इस तरह चिल्लाना सही नहीं लेकिन आप का भी इस तरह की बात करना सही नहीं है. आखिर वे आप के मातापिता हैं और उन्हें आप की इस समय सब से ज्यादा जरूरत है. आप उन से कह दीजिए कि उन का इस तरह पेश आना आप को पसंद नहीं व इस से आप को गुस्सा आता है, यकीनन वे समझेंगे. लौकडाउन में आज जहां देश आर्थिक संकट की तरफ अग्रसर है वहां यदि आप नौकरी छोड़ देंगे तो यह अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा. किसी भी स्थिति में गुस्से में कोई फैसला मत लीजिए.

गृहस्थी की डोर

लेखक- एन. के. सोमानी 

मनीष उस समय 27 साल का था. उस ने अपनी शिक्षा पूरी कर मुंबई के उपनगर शिवड़ी स्थित एक काल सेंटर से अपने कैरियर की शुरुआत की, जहां का ज्यादातर काम रात को ही होता था. अमेरिका के ग्राहकों का जब दिन होता तो भारत की रात, अत: दिनचर्या अब रातचर्या में बदल गई.

मनीष एक खातेपीते परिवार का बेटा था. सातरस्ते पर उस का परिवार एक ऊंची इमारत में रहता था. पिता का मंगलदास मार्केट में कपड़े का थोक व्यापार था. मनीष की उस पुरानी गंदी गलियों में स्थित मार्केट में पुश्तैनी काम करने में कोई रुचि नहीं थी. परिवार के मना करने पर भी आई.टी. क्षेत्र में नौकरी शुरू की, जो रात को 9 बजे से सुबह 8 बजे तक की ड्यूटी के रूप में करनी पड़ती. खानापीना, सोनाउठना सभी उलटे हो गए थे.

जवानी व नई नौकरी का जोश, सभी साथी लड़केलड़कियां उसी की उम्र के थे. दफ्तर में ही कैंटीन का खाना, व्यायाम का जिमनेजियम व आराम करने के लिए रूम थे. उस कमरे में जोरजोर से पश्चिमी तर्ज व ताल पर संगीत चीखता रहता. सभी युवा काम से ऊबने पर थोड़ी देर आ कर नाच लेते. साथ ही सिगरेट के साथ एक्स्टेसी की गोली का भी बियर के साथ प्रचलन था, जिस से होश, बदहोश, मदहोश का सिलसिला चलता रहता.

शोभना एक आम मध्यम आय वाले परिवार की लड़की थी. हैदराबाद से शिक्षा पूरी कर मुंबई आई थी और मनीष के ही काल सेंटर में काम करती थी. वह 3 अन्य सहेलियों के साथ एक छोटे से फ्लैट में रहती थी. फ्लैट का किराया व बिजलीपानी का जो भी खर्च आता वे तीनों सहेलियां आपस में बांट लेतीं. भोजन दोनों समय बाहर ही होता. एक समय तो कंपनी की कैंटीन में और दिन में कहीं भी सुविधानुसार.

रात को 2-3 बजे के बीच मनीष व शोभना को डिनर बे्रक व आराम का समय मिलता. डिनर तो पिज्जा या बर्गर के रूप में होता, बाकी समय डांस में गुजरता. थोड़े ही दिनों में दफ्तर के एक छोटे बूथ में दोनों का यौन संबंध हो गया. मित्रों के बीच उन के प्रेम के चर्चे आम होने लगे तो साल भर बीतने पर दोनों का विवाह भी हो गया, जिस में उन के काल सेंटर के अधिकांश सहकर्मी व स्टाफ आया था. विवाह उपनगर के एक हालीडे रिजोर्ट में हुआ. उस दिन सभी वहां से नशे में धुत हो कर निकले थे.

दूसरे साल मनीष ने काल सेंटर की नौकरी से इस्तीफा दे कर अपने एक मित्र के छोटे से दफ्तर में एक मेज लगवा कर एक्सपोर्ट का काम शुरू किया. उन दिनों रेडीमेड कपड़ों की पश्चिमी देशों में काफी मांग थी. अत: नियमित आर्डर के मुताबिक वह कंटेनर से कोच्चि से माल भिजवाने लगा. उधर शोभना उसी जगह काम करती रही थी. अब उन दोनों की दिनचर्या में इतना अंतराल आ गया कि वे एक जगह रहते हुए भी हफ्तों तक अपने दुखसुख की बात नहीं कर पाते, गपशप की तो बात ही क्या थी. दोनों ही को फिलहाल बच्चे नहीं चाहिए थे, अत: शोभना इस की व्यवस्था स्वयं रखती. इस के अलावा घर की साफसफाई तो दूर, फ्लैट में कपड़े भी ठीक से नहीं रखे जाते और वे चारों ओर बिखरे रहते. मनीष शोभना के भरोसे रहता और उसे काम से आने के बाद बिलकुल भी सुध न रहती. पलंग पर आ कर धम्म से पड़ जाती थी.

मनीष का रहनसहन व संगत अब ऐसी हो गई थी कि उसे हर दूसरे दिन पार्टियों में जाना पड़ता था जहां रात भर पी कर नाचना और उस पर से ड्रग लेना पड़ता था. इन सब में और दूसरी औरतों के संग शारीरिक संबंध बनाने में इतना समय व रुपए खर्च होने लगे कि उस के अच्छेभले व्यवसाय से अब खर्च पूरा नहीं पड़ता.

किसी विशेष दिन शोभना छुट्टी ले कर मनीष के साथ रहना चाहती तो वह उस से रूखा व्यवहार करता. साथ में रहना या रेस्तरां में जाना उसे गवारा न होता. शोभना मन मार कर अपने काम में लगी रहती.

यद्यपि शोभना ने कई बार मनीष को बातोंबातों में सावधान रहने व पीने, ड्रग  आदि से दूर रहने के संकेत दिए थे पर वह झुंझला कर सुनीअनसुनी कर देता, ‘‘तुम क्या जानो कमाई कैसे की जाती है. नेटवर्क तो बनाना ही पड़ता है.’’

एक बार मनीष ने एक कंटेनर में फटेपुराने चिथड़े भर कर रेडीमेड के नाम से दस्तावेज बना कर बैंक से रकम ले ली, लेकिन जब पोर्ट के एक जूनियर अधिकारी ने कंटेनर खोल कर तलाशी ली तो मनीष के होश उड़ गए. कोर्ट में केस न दर्ज हो इस के लिए उस ने 15 लाख में मामला तय कर अपना पीछा छुड़ाया, लेकिन उस के लिए उसे कोच्चि का अपना फ्लैट बेचना पड़ा था. वहां से बैंक को बिना बताए वापस मुंबई शोभना के साथ आ कर रहने लगा. बैंक का अकाउंट भी गलत बयानी के आधार पर खोला था. अत: उन लोगों ने एफ.आई.आर. दर्ज करा कर फाइल बंद कर दी.

इस बीच मनीष की जीवनशैली के कारण उस के लिवर ने धीरेधीरे काम करना बंद कर दिया. खानापीना व किडनी के ठीक न चलने से डाक्टरों ने उसे सलाह दी कि लिवर ट्रांसप्लांट के बिना अब कुछ नहीं हो सकता. इस बीच 4-6 महीने मनीष आयुर्वेदिक दवाआें के चक्कर में भी पड़ा रहा. लेकिन कोई फायदा न होता देख कर आखिर शोभना से उसे बात करनी पड़ी कि लिवर नया लगा कर पूरी प्रक्रिया में 3-4 महीने लगेंगे, 12-15 लाख का खर्च है. पर सब से बड़ी दुविधा है नया लिवर मिलने की.

‘‘मैं ने आप से कितनी बार मना किया था कि खानेपीने व ड्रग के मामले में सावधानी बरतो पर आप मेरी सुनें तब न.’’

‘‘अब सुनासुना कर छलनी करने से क्या मैं ठीक हो जाऊंगा?’’

सारी परिस्थिति समझ कर शोभना ने मुंबई के जे.जे. अस्पताल में जा कर अपने लिवर की जांच कराई. उस का लिवर ऐसा निकला जिसे मनीष के शरीर ने मंजूर कर लिया. अपने गहनेजेवर व फ्लैट को गिरवी रख एवं बाकी राशि मनीष के परिवार से जुटा कर दोनों अस्पताल में इस बड़ी शल्यक्रिया के लिए भरती हो गए.

मनीष को 6 महीने लगे पूरी तरह ठीक होने में. उस ने अब अपनी जीवन पद्धति को पूरी तरह से बदलने व शोभना के साथ संतोषपूर्वक जीवन बिताने का निश्चय कर लिया है. दोनों अब बच्चे की सोचने लगे हैं, ताकि उनकी गलती की सजा बच्चों को न मिले.

धर्म का कांटा : सुरभि अचानक रात को क्यों डर गई

रात को साढ़े 10 बजे जब आलोक का मोबाइल बजा, सुरभि चौंकी, बोली, ‘‘इस समय कौन है?’’ तब तक ‘हैलो’ कहते हुए आलोक बात करना शुरू कर चुका था. आलोक की एकतरफा बात ही सुरभि के कानों में पड़ रही थी, ‘हां, हां, एकदम बढि़या, ठीक रहेगा, आ जाओ सब, बोल दो सबको, ठीक है, मिलते हैं, ओके.’ फिर आलोक उत्साहित हो कर सुरभि से बोला, ‘‘परसों संडे को अपनी मंडली यहीं घर में लंच करेगी. पूरा महीना हो गया सब से मिले हुए. चलो, कल भी छुट्टी है, कल ही डिस्कस करेंगे कि क्याक्या बनाना है.’’ आलोक स्वभाव से शांत और मृदुभाषी था. वह सुरभि का भी खयाल रखता था. पर उस की एक कमजोरी यह भी थी कि वह अपने दोस्तों के बिना नहीं रह सकता था. पर सुरभि उन के दोस्तों से घुलमिल नहीं पा रही थी.सुरभि का मन बुझ गया, पर फिर भी ‘‘हां, ठीक है, कल डिस्कस करेंगे,’’ कह कर वह सोने के लिए लेट गई. पर हमेशा की तरह आलोक की बात से उस की नींद उड़ गई थी.

क्या करे वह, क्यों वह आलोक के बचपन के ग्रु्रप में सहज नहीं रह पाती. पर किस से कहे और क्या कहे.आलोक से विवाह हुए एक साल ही तो हुआ था. आलोक और सुरभि मुंबई के गौरीपड़ा इलाके में शादी के बाद एक अपार्टमैंट में रहने आ गए थे. मेरठ से मुंबई आने पर आलोक के दोस्तों के इस गु्रप ने ही तो उस की गृहस्थी जमाने में मदद की थी. विवाह के एक महीने बाद ही तो आलोक का मुंबई ट्रांसफर हो गया था. सुरभि के मातापिता ने ही आलोक को पसंद किया था. आलोक के स्वभाव, व्यवहार पर सुरभि को अपनी पसंद पर गर्व ही हुआ था. सुरभि ने अच्छीखासी शिक्षा ले रखी थी. वह समय के साथ आधुनिक तो दिखती थी लेकिन धर्म के  मामले में असहज हो जाया करती थी. जिस कारण वह दूसरों से ज्यादा घुलनामिलना पसंद नहीं करती थी.सुरभि अपने वैवाहिक जीवन से पूरी तरह खुश थी, पर आलोक की इन दोस्तों ने उस का चैन लूट रखा था. बचपन से ले कर आज तक आलोक के ये तीनों दोस्त एक परिवार की तरह ही रहते आए थे. सब एकएक कर के मुंबई आ गए थे. चारों एक ही सोसायटी में अलगअलग बिल्डिंग में रहते थे. सुयश और मेघा, विपिन और रिया, टोनी और जेनिस, सब जब उस के विवाह में आए थे.

, सब की मस्ती देखते ही बनती थी. इन की मस्ती, शरारतों से दोनों के घर वाले आनंद उठाते रह गए थे. उस समय तो सुरभि ने ध्यान नहीं दिया था, पर यहां आने के कुछ दिनों बाद ही उसे सब की दोस्ती बोझ लगने लगी थी.सब से बड़ी बात जो थी वह यह कि सुरभि के कट्टरपंथी मातापिता ने उस के दिल में धर्मांधता कूटकूट कर भरी थी. उसे टोनी और जेनिस के घर जा कर खानापीना या उन का अपने घर खानापीना बिलकुल नहीं सुहाता था. पर मजबूर थी. इस चौकड़ी को तो धर्मजाति से बिलकुल मतलब ही नहीं था.मेघा और रिया कामकाजी थीं. दोनों सुरभि की उम्र की ही थीं. दोनों बड़ी खुशमिजाज थीं. आज में जीती थीं.  घर और बाहर के काम में निपुण थीं. जेनिस सुरभि की तरह हाउसवाइफ थी. लेकिन उस की स्मार्टनैस भी मेघा और रिया से कम नहीं थी. अकसर लौंग स्कर्ट पहनती थी जो उस पर बहुत फबती थी. हर 15 दिनों में सब किसी एक के घर लंच या डिनर जरूर करते थे. अभी सिर्फ मेघा की ही 4 साल की बेटी चारू थी. मेघा टीचर थी. उस ने चारू का ऐडमिशन अपने स्कूल में ही करवा दिया था. सुरभि स्वभाव से अंतर्मुखी थी ही, टोनी और जेनिस के कारण इस गु्रप में अपनेआप को बिलकुल अनफिट पाती थी. अब तो उसे इस मंडली से छुटकारा दूरदूर तक मिलता नहीं दिख रहा था.वह शुरूशुरू में काफी चुप रही तो सुयश ने पूछ भी लिया था, ‘सुरभि, यह चौकड़ी पसंद नहीं आई क्या?’ सुरभि झेंप गई थी, ‘नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं है. आप सब तो बहुत अच्छे हैं.’ आलोक ने भी कई बार उस का उखड़ापन नोट किया था, पूछा भी था,

‘सुरभि, तुम इन लोगों के आने पर इतना सीरियस क्यों हो जाती हो?’‘नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं है.’‘कुछ तो है, बताओ.’‘शायद मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा है,’ सुरभि ने कह तो दिया था पर आलोक के चेहरे पर तनाव छा गया था. वह वहां से उठ कर चला गया था.दोस्तों के लिए उस के मन में एक अलग ही जगह थी. सुरभि का उन को ले कर रूखापन उसे कुछ अच्छा न लगा.उस के बाद जब भी सब के इकट्ठे होने की बात हुई, आलोक ने बहाना कर दिया कि वह बहुत व्यस्त है. सुरभि को आत्मग्लानि तो हुई, फिर उस ने स्वयं को समझा लिया कि ठीक है, सब को थोड़े दिनों में आदत हो जाएगी. उसे इतनी भीड़ के साथ नहीं रहना है. इस के बाद आलोक उसे कई बार उदास और गंभीर लगा तो सुरभि को दुख तो हुआ पर बोली कुछ नहीं. उस ने सोचा, एकदम से यह सब बंद नहीं होगा, टाइम लगेगा.वह आलोक के सामने टोनी और जेनिस के प्रति अपनी भावनाएं भी स्पष्ट नहीं करना चाह रही थी, इसलिए उस ने बहुत सोचसमझ कर आलोक से सब को बुलाने के लिए हां कह दी थी. आलोक ने सब को मिलने के लिए फोन कर दिया था. अब चौकड़ी उस के घर जमने वाली थी. फिर टोनी और जेनिस के बारे में खयाल आया. सुरभि की तो नींद ही उड़ गई थी. टोनी और जेनिस ईसाई दंपती थे और आलोक के सब से खास मित्रों में से एक. उन के लिए धर्म महज सांस्कृतिक चोगा था जिसे बस पहना ही जा सकता है. उसे आत्मसात कर लीन होने की जरूरत उन्हें कभी महसूस नहीं हुई.अगले दिन सवेरे ही आलोक नाश्ते के बाद उत्साह से सुरभि के साथ बैठ कर संडे का मैन्यू बनाने लगा. सुरभि भी झूठा उत्साह दिखाती रही. वह नहीं चाहती थी कि आलोक का मूड खराब हो.संडे को सब 12 बजे आ गए, चारू तो अपने खिलौने ही उठा लाई थी. जिस का जहां मन किया, बैठ गया. किसी को कोई फौर्मेलिटी आती ही नहीं थी. सब मस्त और खुशमिजाज थे. मेघा और रिया किचन में सुरभि के साथ व्यस्त हो गईं. टोनी और जेनिस चर्च गए हुए थे. वे थोड़ी देर बाद आने वाले थे. सुरभि उन्हें अनुपस्थित देख कर मन ही मन खुश हुई थी. पर जब उसे पता चला कि वे थोड़ी देर बाद आएंगे, उस का मूड खराब हो गया. उस के संस्कार, उस की परवरिश, आलोक के क्रिश्चियन दोस्तों से घुलनेमिलने में दीवार बन कर खड़े थे. वह उन्हें देख कर कुढ़ती ही रहती थी.

वे दोनों जब आए, तब सब ने खाना खाया. दोनों सुरभि की आंखों में खटकते रहे, पर वह आलोक की खुशी के आगे मजबूर थी. दीवाली की छुट्टियों में सुयश और मेघा, विपिन और रिया दिल्ली जाने की तैयारी कर रहे थे. आलोक को औफिस का जरूरी काम था. सो, वे दोनों दीवाली पर मुंबई में ही थे. दीवाली की शाम सब लोग मिल कर नीचे पटाखे छोड़ते थे. दीवाली की शाम बच्चों का हर तरफ शोर था. शाम को ही टोनी और जेनिस भी उन के घर आ गए थे. सुरभि का फ्लैट तीसरी फ्लोर पर था. बच्चे खूब धमाचौकड़ी कर रहे थे. जैसे ही आलोक सीढि़यों से नीचे उतर रहा था, ऊपर से बच्चे भागते हुए उतरे. उन में से ही किसी का भागते हुए आलोक को तेज धक्का लगा. जब तक वह खुद को संभालता तब तक उस का संतुलन बिगड़ गया. कई सीढि़यों से लुढ़कता हुआ वह काफी नीचे तक गिर गया. सिर फट गया, खून की धारा बह चली और पैर के तेज दर्द से वह कराह उठा. उस के पीछे ही टोनी, जेनिस और सुरभि उतर रहे थे.सुरभि की चीख निकल गई. आलोक खून से लथपथ हो गया. सुरभि घबरा गई. पलभर की देर किए बिना टोनी ने आलोक को बांहों में उठाया और तेज आवाज में बोला, ‘‘जेनिस, जल्दी से कार निकालो, भागो.’’जेनिस 2-2 सीढि़यां एकसाथ कूदती हुई भागी. आलोक का दर्द से बुरा हाल था. बांहों में आलोक को उठाए हुए टोनी ने सुरभि से कहा, ‘‘सुरभि, जल्दी गाड़ी में बैठो, हौस्पिटल चल रहे हैं.’’ पीछे की सीट पर आलोक को लिटा कर टोनी ने ड्राइविंग सीट संभाली और गाड़ी दौड़ा दी. सुरभि के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

यह क्या हो गया, वह तो यहां किसी को जानती भी नहीं. क्या करेगी अकेली. आलोक के सिर पर चोट गहरी थी. 8 टांके लगे थे. पैर में भी फ्रैक्चर था, यह जान कर सुरभि का तो सिर ही चकरा गया. अब आलोक क्या करेगा.पैर पर प्लास्टर चढ़ गया था. डाक्टर ने 2 दिनों बाद डै्रसिंग के लिए बुलाया था.सुरभि तो खाली हाथ ही हौस्पिटल भाग आई थी. पेमैंट के समय उस ने खुद को बहुत असहज महसूस किया. टोनी ही सब कर रहा था. टोनी ने ही सहारा दे कर आलोक को गाड़ी में बिठाया और सब घर आ गए.जेनिस ने बहुत ही स्नेहपूर्वक सुरभि का कंधा थपथपाया, ‘‘चिंता मत करो, सुरभि, सब ठीक है.’’ रात काफी हो गई थी, हर तरफ दीवाली की धूमधाम थी. जो डिनर सुरभि ने बनाया था, सब रखा था. टोनी ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘बहुत तेज भूख लगी है, सुरभि, कुछ खाने को मिलेगा?’’सुरभि झट से सब के लिए खाना लगाने लगी. टोनी ने फिर आलोक को छेड़ा, ‘‘बड़े भारी हो गए हो यार, तुम्हें उठा कर लानेलेजाने में हालत खराब हो गई.’’ आलोक को हंसतेबोलते देख सुरभि की जान में जान आई. आलोक को अपने हाथ से खिला कर सुरभि ने टोनी और जेनिस के साथ ही थोड़ाबहुत खाया. रात एक बजे के करीब आलोक के सोने के बाद ही टोनी और जेनिस घर गए. सुरभि पूरी घटना को सोचते हुए रातभर सोतीजागती रही. अगले दिन सुबह 7 बजे ही टोनी आ गया. आलोक को सहारा दे कर बाथरूम तक ले गया. आलोक से कुछ नंबर ले कर आलोक के औफिस में कुछ लोगों को इस दुर्घटना के बारे में बता दिया. थोड़ी देर में जेनिस सब के लिए सैंडविच बना कर ले आई, बोली, ‘‘लो सुरभि, तुम रातभर ठीक से सो नहीं पाई होगी. सब यहीं साथ खा लेंगे.’’नाश्ता करते हुए टोनी ने कहा, ‘‘मैं ने आज की छुट्टी ले ली है आलोक. सेवा करवा लो बच्चू. सब को बताऊंगा कैसे तुम ने हमारी दीवाली की शाम खराब की है, उन लोगों को भी आने दो लौट कर.’’ आलोक जोर से हंस पड़ा, सुरभि को अच्छा लगा.सुयश और विपिन को भी टोनी ने फोन पर बता दिया था. उन लोगों के फोन आते रहे. आलोक ने अपने घर बताने के लिए मना कर दिया था क्योंकि उस की मम्मी की तबीयत कुछ खराब चल रही थी, वे परेशान ही होतीं. आलोक के कपड़े बदलने में टोनी ने ही उस की मदद की. लंच जेनिस ने सुरभि के साथ मिल कर ही बना लिया. फिर आलोक ने ही जबरदस्ती दोनों को आराम करने के लिए भेज दिया. दवाइयों के असर से आलोक की आंख लग गई थी.6 बजे टोनी फिर आ गया, ‘‘सुरभि, शाम को आलोक के कलीग्स उसे देखने जरूर आएंगे. तुम व्यस्त रहोगी. इसलिए जेनिस ही डिनर बना कर लाएगी.’’सुरभि सोचती रह गई कि इन दोनों को बिना कुछ कहेसुने एकदूसरे के सुखदुख का एहसास कैसे हो जाता है. शाम को यही तो हुआ. आलोक के कलीग्स और कुछ पड़ोसी आतेजाते रहे. सुरभि पूरी शाम सब के चायनाश्ते में ही व्यस्त रही. उसे बहुत थकान भी हो गई थी. 9 बजे सब के जाने के बाद चारों ने जेनिस का लाया हुआ शानदार डिनर किया. पूरा खाना आलोक की पसंद का था.

सुरभि यह देख कर मुसकरा दी.रात को आलोक के सोने के बाद उस के बराबर में लेटी सुरभि के मन में तो नए विचारों ने हलचल मचा रखी थी. कल से अब तक एक बार भी सुरभि के दिल में टोनी और जेनिस का दूसरे धर्म का होने का विचार भी नहीं आया था. वह तो पूरी तरह से दोनों के स्नेह में आकंठ डूबी हुई थी. यह क्या किया उस के मातापिता ने, क्यों उस की इतनी कट्टरपंथी सोच के साथ परवरिश की कि धर्म का कांटा उस के दिल में ऐसे चुभता रहा और वह इतने प्यारे दोस्तों से कभी खुल कर मिल नहीं पाई. कितने दिन उस ने इस सोच पर खराब कर दिए. आलोक का भी दिल दुखाया. वह स्वयं सुशिक्षित थी, उस ने क्यों आंखें बंद कर अपने मातापिता की पुरातनपंथी सोच का अनुसरण किया. उसे अपनी सोच पर आत्मग्लानि होती रही. सुबह का उजाला सुरभि के मन में बहुत सा स्नेह, सम्मान, अपनापन ले कर आया.

वह फ्रैश हो कर बैठी ही थी कि आलोक भी उठ गया. आलोक उस के कंधे का सहारा ले कर बाथरूम तक गया. 8 बजे के आसपास टोनी और जेनिस भी आ गए. जेनिस ने एक टिफिन सुरभि को देते हुए कहा, ‘‘तुम बस चाय बना लो, पोहा बना कर ले आई हूं.’’आलोक को पोहा इतना पसंद था कि वह इसे रोज खा सकता था. सब एकदूसरे की पसंद कितनी अच्छी तरह जानते हैं, यह देख कर सुरभि को मन ही मन हंसी आ गई.नाश्ता करते हुए टोनी ने कहा, ‘‘जेनिस, यह गलत बात है, इस के ठीक होने तक क्या इसी की पसंद की चीजें खानी पड़ेंगी?’’ जेनिस ने भी शरारत से जवाब दिया, ‘‘हां, सही समझे.’’ टोनी ने फिर पूछा, ‘‘आलोक, छुट्टी ले लूं या औफिस चला जाऊं?’’ जवाब सुरभि ने दिया, ‘‘छुट्टी ही ले लो आप, दिन में साथ बैठेंगे, खाएंगेपीएंगे, ताश खेलेंगे, क्यों जेनिस?’’ जेनिस मुसकरा दी. सुरभि का यह अपनापन शायद जेनिस के दिल को छू गया था.आलोक ने हैरानी से सुरभि को देखा, सुरभि मुसकरा दी तो आलोक के चेहरे पर एक अलग ही चमक आई जिसे सिर्फ सुरभि ने महसूस किया था.

मौडल्स और एक्ट्रैसेस जो वार्डरोप मालफंक्शन की हुईं शिकार

दुनिया के किसी भी फैशन शोज में वार्डरोप मालफंक्शन के बारे में पढ़ा और सुना जाता रहा है, जिस में कई बार मौडल्स या अभिनेत्रियां रैम्प पर वाक करते हुए किसी प्रकार की मालफंक्शन की शिकार हो जाती हैं. ये उन के लिए कभी शर्मनाक तो कभी पब्लिसिटी स्टंट होती है, क्योंकि हजारों की संख्या में लोगों की नजरें उस मौडल पर टिकी हुई होती है, जो उस समय रैम्प पर चल रही होती है, ऐसे में अचानक मालफंक्शन से वे खुद भी चकित हो जाती है और खुद को संभालते हुए अपनी वौक को पूरा करती है.

संभालती हैं खुद को

वार्डरोप मालफंक्शन शब्द बौलीवुड और हौलीवुड से जुड़ी खबरों में पढ़ने को मिलता है और इस शब्द से जुड़ी खबरों में प्रकाशित और प्रसारित फोटो या वीडियो भी लोग खूब दिलचस्पी के साथ देखा करते हैं, ऐसे समाचारों की विशेषता यह होती है कि जिस व्यक्ति से जुड़ी यह खबर होती है, उसे शिकार हुए के रूप में दर्शाया जाता है. इस में अधिकतर महिलाएं ही होती हैं और वे भी अभिनेत्रियां और मौडल्स ही होती हैं, क्योंकि आम जनजीवन में कोई भी सामान्यत इस तरह शिकार नहीं बनतीं.

कई बार ऐसे किसी संवेदनशील ऐक्टर्स और मौडल्स को वार्डरोब मालफंक्शन का शिकार होने पर वे शर्मसार भी हो जाती हैं, लेकिन कई ऐसी भी मौडल्स होते हैं, जो इस तरह की स्थिति में आने के बाद भी बहुत सुझबूझ से सामना कर खुद को संभाल लेती हैं ताकि देखने वालों को लगे कि कुछ हुआ ही नहीं है.

पब्लिसिटी स्टंट

वार्डरोब मालफंक्शन को ले कर कई बार यह भी कहा जाता है कुछ सैलिब्रिटियां पब्लिसिटी स्टंट के लिए जानबूझ कर ऐसा शिकार बनने को आतुर होती हैं, तो कुछ अनजाने में भी इस तरह का शिकार बन जाती हैं. वार्डरोब मालफंक्शन के शाब्दिक अर्थ के साथ वास्तविकता को अगर जोड़ा जाए तो स्पष्ट है कि अलमारी में खराबी या खोट हो, जिस से पहनने वाले को असहजता का सामना करना पड़ा हो. इस में जिम्मेदारी ड्रैस को पहनने वाले और उसे बनाने वाले दोनों का समान रूप से भागीदारी होती है.

इस बारे में डिजाइनर श्रुति संचेती कहती हैं, “रैंप शो बहुत सुंदर दिखता है, लेकिन उस के पीछे बहुत छोटी जगह पर बहुत सारे मौडल्स और दो से तीन डिजाइनर्स होते हैं. कपड़ों के लिए उन के लुक को भी बारबार बदलना पड़ता है. रैंप के पीछे का पूरी एरिया बहुत केयोटिक होता है. रैंप वौक के समय एकएक मौडल को एक मिनट से भी कम समय एक ड्रैस को बदलना पड़ता है. ऐसे में डिजाइनर्स को हर बात का बहुत ध्यान देना पड़ता है. पोशाकों को पहन कर पहले ट्रायल लेना पड़ता है और जो भी गलतियां होती हैं उसे ठीक करना पड़ता है. जो नहीं कराते, वहां मालफंक्शन होता है.”

रिहर्सल है जरूरी

इस के आगे डिजाइनर कहती है, “ट्रायल के बाद जो भी कमी ड्रैस में थी, उसे नोट कर एक शीट लगा देना पड़ता है, ताकि हेल्पर उस ड्रैस को पहनाते वक्त उस बात का ध्यान रखें. अधिकतर हैल्पर स्कूल पास लड़कियां या लड़के होते हैं. ऐसे में उन्हें कोऔर्डिनेटर प्रशिक्षण देता है.

“इस के अलावा इनरवियर होता है, जो बौडी को पूरी तरह से ढक कर रखता है. पुराने मौडल्स सही इनरवियर पहनना जानते हैं लेकिन नए मौडल को सही इनरवियर पहनने के बारे में भी ट्रैनिंग देनी पड़ती है. सबकुछ ठीक होने पर भी अगर ड्रैस, पांव में फंस जाए या कोई स्ट्रिप फिसल जाए आदि के बारे में उन्हें क्या करना है, बताना पड़ता है.

“शो शुरू होने से पहले उस ड्रैस को पहन कर रिहर्सल कर लेना बहुत जरूरी होता है. हर ड्रैस की सही फिटिंग्स पहले देखना मौडल्स और डिजाइनर्स के लिए बहुत आवश्यक होता है. इन सभी बातों का ध्यान रखने पर मालफंक्शन कभी नहीं हो सकता. डिजाइनर किसी भी प्रकार की ड्रैस बनाए, मौडल्स को कैरी करना आता है, उन्हें अगर किसी पिंजरे में रख कर भी रैंप पर चलाया जाता है, तो वे चल सकती हैं लेकिन उन्हें प्रैक्टिस के लिए टाइम देने की जरुरत होती है.

“एक बड़ी फैशन शो में 24 से ले कर 35 पोशाक मौडल्स को पहनने पड़ते हैं. अगर मौडल्स को साड़ी या दुपट्टा पहननी होती है, तो प्री प्लीट कर रखना पड़ता है, क्योंकि उस समय समय की कमी होती है.”

होती है समस्या

मालफंक्शन कई बार अचानक ही हो जाता है. ऐसे में सही तरह से उस ड्रैस को तैयार न किया गया हो या मौडल ने उस ड्रैस को पहन कर रिहर्सल न किया हो, ऐसी कई घटनाएं होना स्वाभाविक है, जिस से मौडल और डिजाइनर दोनों को ही समस्या में पड़ना पड़ता है.

केवल कपड़े ही नहीं, उन के शूज तक समस्या देते हैं. कई बार शूज के हिल्स तक खुल जाते हैं जिस से वे कई बार रैंप पर धड़ाम से गिर भी जाती हैं. आइए जानते हैं किस एक्ट्रैस और मौडल्स को मालफंक्शन का सामना करना पड़ा और उन्होंने उसे कैसे संभाल लिया.

मंदना करीमी

ईरान से आई और बौलीवुड में काम कर रही अभिनेत्री और बिग बौस की कंटेस्टेंट मंदना करीमी को वार्डरोप मालफंक्शन का सामना करना पड़ा. फिल्म ‘क्या कूल हैं हम 3’ की शूटिंग करते वक्त मंदना बिकिनी पहन कर कर शूटिंग कर रही थीं. तभी अचानक बिकिनी फिसल गई, क्योंकि बिकिनी ढीली थी. ऐसी स्थिति में भी मंदना ने प्रेजेंस औफ माइंड दिखाई और स्थिति को बड़ी अच्छी तरह हैंडल कर लिया था.

कैरोल ग्रेसियस

वर्ष 2006 में सुपरमौडल कैरोल ग्रेस‍ियस, मालफंक्शन की श‍िकार हुई थी. एक फैशन वीक के दौरान कैरोल ने डिजाइनर बीजू सहगल का लेटैस्ट कलैक्शन को पहन कर रैंप पर उतरी थी. उन्हें हौल्टर नेकलाइन की कटआउट ड्रैस पहन कर रैंप वौक करना था. यह ड्रैस मिडिल में फैब्रिक की पतली पट्टी से नीचे के हिस्से से जुड़ी थी.

रैंप पर चलने के दौरान अचानक उन का हौल्टर नेक खुल गया और उन का ब्रेस्ट पोर्शन पूरी तरह उतर गया, लेक‍िन कैरोल ने पर‍िस्थ‍ित‍ि को संभाला और टौप को ऊपर कर उसे पकड़ लिया. उन्होंने अपने ड्रैस को पकड़ कर बेहद प्रोफेशनल तरीके से अपना रैंप वौक पूरा किया.

हालांकि यह घटना बेहद शर्मनाक थी, लेकिन इस घटना ने रातोंरात कैरोल को लाइमलाइट में ला दिया, क्योंकि इस का जिक्र मीडिया की सुर्खियों में था. इस परिस्थिति को ले कर एफआईआर भी हुई लेकिन डिजाइनर और मौडल ने इसे अचानक हुई घटना बताया और डिजाइनर इस के लिए माफी मांगी.

मौनी रौय

नागिन फेम मौनी रौय को भी वार्डरोप मालफंक्शन का सामना करना पड़ा. मौनी का एक वीडियो इंटरनेट पर वायरल हुआ था, जिस में उन्होंने हौल्टर नेक ड्रैस पहनी हुई थी, जो किसी कारणवश खुलने से वह अपनी कार की ओर भाग कर खुद को संभाल लेती है. इस के बाद डिजाईनरों ने हाल्टर नेक कपड़ों को असुविधाजनक बताया था.

नर्गिस फाखरी

बौलीवुड एक्ट्रैस नरगि‍स फाखरी रैंप पर चलते वक्त वार्डरोब मालफंक्‍शन की शिकार हो गई थी. नरगिस ने कैट वौक के दौरान ब्‍लैक गाउन ड्रैस पहनी थी जो कि बीच से अचानक फट गई, ड्रैस के लोअर पार्ट पर डिजाइनर कट था, जो चलने के दौरान ऊपर आ गया था.

गौहर खान

‘बिग बौस’ विनर गौहर खान एक फैशन वीक के दौरान उन का भी वार्डरोब मालफंक्शन भी हुआ था. रैंप पर कैट वौक करते समय गौहर की शौर्ट ब्लैक स्कर्ट पीछे से अचानक से फट गई, जिसे गौहर ने बिना किसी घबराहट के साथ वौक को पूरा किया.

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