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माटी की गंध के परे : शुभा ने टीवी में किसे देखा

शुभा खाना खातेखाते टीवी देख रही थी, बीचबीच में नीरज से बातें भी करती जा रही थी. सहसा उसे लगा कि उस ने टीवी में गीता को देखा है. मुंह में कौर था. उंगली के इशारे से टीवी की तरफ देखती हुई शुभा बोल उठी, ‘‘देखो, देखो, गीता है वहां.’’ बच्चे चौंक कर मां को देखने लगे, फिर उस की मुद्रा पर हंस दिए. मुंह में कौर होने से शब्द अस्पष्ट से निकले. अस्पष्ट शब्दों से नीरज एकाएक समझ नहीं पाया बात को. समझ कर देखा, तब तक कोई और खबर आने लगी थी.

‘‘ए, चुप रहो तुम लोग,’’ बच्चों को डपट कर शुभा फिर नीरज से बोली, ‘‘सच नीरज, गीता ही थी, शतप्रतिशत, 2 बार क्लिप में देखा. अभी अपने अलबम में उस का फोटो दिखाऊंगी तुम्हें.’’

खाना समेटने के बाद तौलिए से हाथों को पोंछती शुभा कालेज के समय का अपना अलबम निकाल लाई. पन्ने पलटपलट कर देखने लगी, फिर एक जगह रुक कर उंगली रखती हुई नीरज को दिखाने लगी. चित्र में एक कन्या अपने होंठों के कोने पर उंगली रखे झिलमिल दांत दिखाती हंस रही थी. साधारण सी लड़की का असाधारण फोटो.

नीरज को बड़ी शोख सी लगी लड़की. ‘‘वाह, क्या पोज बनाया है तुम्हारी सहेली ने, एकदम फिल्म स्टार लग रही है.’’‘‘हां, पापा ठीक कहते हैं. हेमा मालिनी लग रही हैं, आंटी,’’ नन्ही नीता होहो कर के हंसने लगी. कुछ मजाक का पुट था उन के स्वरों में. शुभा तुनक गई.

‘‘देखो, मजाक मत करो तुम लोग. सच, इसी को टीवी पर देखा था किसी भाषण में. आई होगी भाषण सुनने.’’‘‘अरे छोड़ो, तुम्हें क्या करना है. तुम शाम के खाने की तैयारी करो. याद है न, करीब 7 लोग आएंगे खाना खाने. मैं जाता हूं औफिस.’’

नीरज चला गया था. बच्चे खेलने में व्यस्त हो गए थे. शुभा को अकेलापन मिला तो फिर गीता स्मृतियों में हलचल मचाने चली आई. अतीत की झील में वर्तमान ने कंकड़ उछाल दिया. छोटीबड़ी लहरें एकदूसरे को उलांघती उसे छूने लगीं. गीता उस की प्रिय सहेली थी. बचपन की, गुड्डेगुडि़यों की उम्र की, चुहल शरारतों की, कालेज की. बचपन तो सहज सा ही गुजरा था. कालेज के दिनों में गीता अपने में डूब गई थी. एक अलग सी दुनिया बसा ली थी उसने.

अचानक नीता के रोने की आवाज आई. नलिन, नीता के लड़ने के स्वर तो बहुत देर से सुनाई दे रहे थे, पर जैसे चेतना के दायरे में न थे. विचारों में व्यवधान पड़ने पर उसे होश आया. झपट कर बच्चों के पास पहुंची. पूरा कमरा खिलौनों से अटा पड़ा था. बस्ते इधरउधर मुंह औंधा कर पड़े थे. कपड़े अलमारी से बाहर लटक रहे थे. शुभा ने कमरा देखा तो चिल्ला पड़ी, ‘‘यह क्या हाल कर दिया कमरे का.’’

दोनों बच्चे सहम कर खड़े हो गए. नीता का रोना थम गया. डरतेडरते वह ही बोली, ‘‘मैं ने तो भैया के बाद फेंका है उन का सामान, पहले तो…’’नलिन बात काट कर खीजा, ‘‘नहींनहीं, इसी ने पहले मेरे बैग से ड्राइंग की कौपी निकाली थी.’’‘‘चुप रह कर खेलो, खबरदार जो अब आवाज सुनाई दी,’’ बच्चों को डांट कर उस का ध्यान गीता में ही उलझ गया.

कालेज के दिन, कितने ही वाकिए, बातें याद आती रहीं. इन सब में गीता कहीं न कहीं से आ टपकती. गीता एक पहेली सी लगती थी. बेबाक, शोख, शर्मलिहाज से परे, पर उद्दंड नहीं थी. कब क्या कर गुजरती, कोई जान नहीं पाता था. मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी थी, पर सपने ऐसे कि आसमान को छू कर भी आगे निकलने का प्रयास करते, गहरा असंतोष दिखाती,  कभी बड़ेबड़े लोगों से मिलने की ललक, धनवान बन जाने की चाह. आज उस की बहुत सारी बातें समझ में आ रही थीं. वरना तब तो कैसी लगती थी वह, कभी तेजतर्रार, कभी मायूस, कभी मासूम.

शुभा ने अपना ध्यान गीता की यादों से बाहर निकालने की कोशिश की तो एकदम से उस को याद आ गया कि उसे मेहमानों के लिए शाम की तैयारी करनी है, जल्दीजल्दी सारा घर सैट किया. अलबम अलमारी में रख कर शाम की व्यवस्था में लग गई. काम करते हुए हाथ अभ्यासवश चल रहे थे पर दिलदिमाग दूर, बहुत दूर उड़े जा रहे थे गीता के संगसंग. भीतर ही भीतर खदबदा रही थी शुभा.

फिर बहुत दिन निकल गए. रोजमर्रा के काम के बीच गीता के बारे में सोचना छोड़ दिया. एक शाम नीरज ने आते ही पूछा, ‘‘तुम्हारी बिनाका के पोज वाली सहेली का क्या नाम है, शुभा?’’‘‘गीता, पर क्यों, कैसे याद आई अचानक से?’’‘‘अचानक से क्यों? आज सुबह ही देखा था, हमारे बैंक में आई थी लौकर डील करने.’’ शुभा के कान उत्सुक हो उठे.

‘‘मंत्री की बीवी है वह, साथ में क्या लावलश्कर था. अर्दली, सिक्योरिटी, 3-4 कारें थीं. पूरा दफ्तर ही व्यस्त हो गया उन्हें लौकर डील कराने में. कोई दौड़ कर कुरसी ला रहा था तो कोई पानी, कोई कोल्डडिं्रक तो कोई क्लर्क फाइल ले कर उन के पीछे चुपचाप खड़ा था. लौकर वाला क्लर्क चाबी ले कर साथ चलने के इंतजार में खड़ा था. क्या शान से आई और क्या शान से चली गई. किसी की तरफ आंख उठा कर तक न देखा.’’

‘‘तुम क्या कर रहे थे, तुम भी तो कुछ कर ही रहे होगे मंत्रीजी की पत्नी को दिखाने के लिए?’’‘‘मैं तो कुछ कर ही नहीं पाया. धड़धड़ाती आई थी तो कुछ सूझा ही नहीं. बस, बारबार किसी को यह बताने का मन कर रहा था कि इस को मैं जानता हूं. यह मेरी बीवी की सहेली है. पर बाबा, अच्छा हुआ जो किसी से नहीं कहा वरना बड़ी खिंचाई करते सब के सब. कुछ भी कहो, बड़ा ठसका था उस का.’’

‘‘कौन से मंत्री हैं?’’

‘‘राज्यमंत्री हैं.’’‘‘गीता ने शादी मंत्री से की या मंत्री बाद में बने?’’‘‘अब यह जन्मपत्री मैं कैसे जान सकता हूं. तुम्हारी सहेली है, तुम्हें ज्यादा पता होना चाहिए.’’

एक झटका ही काफी था, शुभा की स्मृतियों की मुट्ठी खुल गई. कितने ही क्षण लुढ़क पड़े, अपने, बेगाने, जेहन में कितनी ही परछाइयां सी आड़ीतिरछी हो कर घूमने लगीं. गीता का शोखभरा व्यक्तित्व. अपने साधारण से कपड़ों को संवारसंवार कर पहनती, नित नए ढंग से बाल बनाती, कभी चुन्नी से सिर ढकती, कभी गले में लहरा कर चलती, अलगथलग दिखने की चाह में कसे कपड़ों पर ढीला सा मर्दाना स्वेटर पहनती. कालेज की अमीरअमीर लड़कियों से दोस्ती करती, उन के घर चली जाती फिर आ कर उन के घर का विस्तार से वर्णन खूब रस लेले कर करती.

न जाने किस भाव से उस की आंखें चमकने लगती थीं. दृष्टि में स्वप्न से उतर आते थे. एक बार तंग आ कर शुभा ने पूछा, ‘क्या वे बुलाती हैं?’

‘नहीं बुलातीं तो क्या, मुझे उन के बारे में जान कर अच्छा लगता है. मसलन, वे कैसे रहती हैं. क्या तौरतरीके हैं उन के रहनेसहने के, उन के पास क्याक्या है?’

‘तुझे क्या करना है यह सब जान कर?’‘वाह, क्यों नहीं करना मुझे. सब पता तो होना चाहिए न. जब मैं अमीर बन जाऊंगी तब मुझे सबकुछ आता होगा उन जैसा ही.’

ओह तो यह रहस्य था, फिर भी न जाने क्यों यह सब पागलपन के अलावा कुछ नहीं लगता था तब. उस की बातें कोरी गप लगती थीं पर उस के कहने का आत्मविश्वास ऐसा होता था कि लगता था शायद सच ही कह रही हो. उस का सोचने का आलम निराला ही था. कालेज की लाइब्रेरी में मैगजीन के पन्ने पलटती रहती, किसी हीरोइन के गहने देखती. किसी व्यवसायी की जीवनी पढ़ती. उस के फोटो देखती, उस का घर, ड्राइंगरूम, लौन. कितनी हरसत होती थी उस की निगाहों में, कितनी महत्त्वाकांक्षाएं टहलती होती थीं. हम फिल्म देखने जाते तो कहानी, अभिनय के बारे में कोई बात नहीं. बस, घर के भव्य सैट्स उसे लुभाते रहते, गाडि़यों की शान में उस की जान रत्तीरत्ती बस जाती. उस की बातों के विषय हमेशा गाड़ी, बंगला, नौकरचाकर, गहने, साडि़यां होते. यह शौक पागलपन की हद तक पहुंचता, कालेज के कंपाउंड में कोई अच्छी गाड़ी दिखी कि वह पहुंच जाती ड्राइवर से गाड़ी के बारे में बातें करने, उसे छू कर देखने.

शादीब्याह में भी सजीधजी, गहनेसाड़ी पहने, मौडर्न दिखती महिलाओं के आसपास मंडराती रहती. तब अजब दीवानगी थी और अब मंत्री की पत्नी. यही तो चाहिए था उसे. चलो, ठीक ही हुआ. जो वह चाहती थी, मिल गया, पर ताज्जुब है, मंत्रीजी मिले कहां से? आखिर अमीर बन ही गई, नाम भी पा ही लिया.

समय के साथसाथ बात फिर आईगई हो गई. जबतब गीता का ध्यान आता भी पर गृहस्थी की व्यस्तता में खो जाता. एक शाम महीने के प्रारंभ में गृहस्थी के सामान से लदेफंदे शुभा और नीरज सवारी की प्रतीक्षा कर रहे थे. तभी एक चमचमाती कार नजदीक आ कर रुकी. कार के काले शीशे को नीचे करता एक चेहरा झांका. शुभा को पलभर भी न लगा उसे पहचानने में, पर वह अनजान बनी सकुचाई सी चुपचाप खड़ी रही. गीता ही लपक कर आई.

‘‘पहचाना नहीं शुभा, मैं गीता हूं. मैं ने तो दूर से ही पहचान लिया था. बहुत खुश हूं तुझे देख कर. यहां कैसे, कब से?’’‘‘यहीं पर हूं 2 साल से. पतिदेव हैं नीरज, यहीं पर पोस्टेड हैं,’’ उत्तर में बचपन की अंतरंगता का लेशमात्र भी पुट न था.‘‘नमस्कार, नीरजजी. आइए, घर छुड़वा दूंगी.’’

फिर ड्राइवर को संबोधित करती हुई वह बोली, ‘‘ड्राइवर, पहले मुझे घर छोड़ देना. शुभा, मुझे पार्टी में जाना है. तैयार होऊंगी. इसलिए घर जल्दी जाना है. ड्राइवर को घर बता देना, वह छोड़ देगा.’’

शुभा अभी तक असंयत थी. सारी शाम दालमसालों और गृहस्थी की खरीदारी में निकली थी जिस से सूती साड़ी बुरी तरह मुस गई थी…गंधा रही थी. यही हाल नीरज का भी था. पैर आगे ही नहीं बढ़े.

‘‘अरे आ न, बैठ.’’

फिर सारे रास्ते गीता ही बोलती रही थी. शुभा को अभी भी छोटेपन का एहसास था, कुछ भी बोलते नहीं बन रहा था. शब्द खो गए थे. बातचीत का विषय ढूंढ़े से भी नहीं मिल रहा था. अजीब सा उतावलापन छाया हुआ था. दोनों हथेलियों को धीरेधीरे मसलती शुभा चुप ही रह गई. नीरज तो एकाध बात कर भी रहा था. बंगले के बाहर गीता उतर गई और भीतर चली गई. अब एक नजर बंगले पर डाली शुभा ने. बहुत बड़ा आधुनिक शैली का बना हुआ था, बड़ा सा लौन, उस में पड़ी रंगबिरंगी कुरसियां, लौन की छतरी, कोने में स्विमिंगपूल. हां, कुत्तों के भूंकने की आवाज भी आई थी. 2-4 तो होंगे ही. कार चल दी थी. नीरज रास्ता बताता जा रहा था.

घर आ कर भी शुभा पर कार वगैरह का रोब इतना हावी रहा कि मूड उखड़ा ही रहा.वह चिनचिनाई, ‘‘क्या जरूरत थी तुम्हें कार में जाने की.’’‘‘मैं गया था क्या कार में? आगेआगे तो तुम ही लपकी थीं,’’ नीरज तुनका.

जूड़े का पिन निकालती हुई वह बड़बड़ाई, ‘शान दिखाने को ले गई थी साथ. यह न हुआ कि घर तक छोड़ने आ जाती. गैरों की तरह ड्राइवर के साथ भेज दिया. हम भी पागल थे जो उस के बुलाते ही तुरंत चल पड़े. होगी अपने घर की बड़ी अमीर. हम तो जैसे हैं वैसे ही अच्छे,’ शुभा अपने मन की खीज उतार रही थी. शीशे में साड़ी का मुसापन और चेहरे की थकान बुरी लग रही थी.

‘‘अब बंद करो यह बड़बड़ाना. जो हो गया सो हो गया. तब क्यों नहीं बोलीं? तब बोलतीं न?’’क्या बोलती शुभा? तब तो सबकुछ भूल गई थी. एक भी बात न पूछी गीता से. न ही अपनी कही. कैसी गूंगी सी बैठी रही पूरे समय. रात तक यही बातें घूमफिर कर सालती रहीं उसे.

अगले दिन सुबह ही सादे परिवेश में लिपटी गीता आ गई मुसकराते हुए. आ कर जोर से शुभा को गले लगाया और खुद घर तक न छोड़ने की क्षमा भी मांग ली. बातचीत की सहजता ने शुभा को प्रभावित किया. फिर भी सहज होने में थोड़ा समय लिया उस ने. गीता तो सदा से अलमस्त थी. पलंग पर आलथीपालथी मार कर बैठ गई. शुभा को पास ही बिठा लिया.

‘‘पहले यह बता, खाना तो नहीं बनाया तू ने?’’‘‘नहीं, अब बनाऊंगी. नीरज लंच पर घर आते हैं.’’गीता चहक उठी जैसे, ‘‘तब तो बड़ा मजा आएगा, मैं भी तेरे साथ मिल कर खाना बनाऊंगी.’’‘‘आज अमिया बड़ी, अरहर की दाल बनाएंगे, चावल भी. साथ में प्याज व बैगन का भरता और कुरकुरी मोटी रोटी. आम का अचार है क्या?’’

पुरानी मित्रता का भाव उभर आया. लाड़ से सिर हिलाती शुभा गीता के साथ रसोई में चली गई. खाना बनातेबनाते शुभा ने गीता के बारे में जानना चाहा.‘‘कैसी हो, गीता? कैसा लगता है?’’

‘‘छोड़ न, आज हमतुम बचपन की बातें करते हैं.’’‘‘तुझे याद है कैसे बड़ों से छिप कर अमराई जाते थे? पूरी दोपहरी अमिया और इमली बटोरते रहते थे.’’

‘‘हां, नमक लगा कर खाते समय तू कितने तरह के मुंह बनाती थी और कितना हंसते थे हम दोनों.’’‘‘सच शुभा, वैसी हंसी तो अब आती ही नहीं. बातबेबात कितनी हंसी आती थी, तेरी नानी बहुत डांटती थीं. क्या कहती थीं वे डांटते हुए?’’

‘‘ठट्ठा के नहीं हंसती लड़कियां, मुंह की शोभा चली जाती है,’’ मोटी आवाज में शुभा ने नानी की नकल की. देर तक गीता और शुभा हंसती रहीं फिर.

गुडि़यों के ब्याह में सीधे पल्ले की साडि़यां पहन कर गुड्डेगुडि़यों की मां होने का अभिनय करना, इकियादुकिया का खेल, छुपनछुपाई, गुट्टे तिकतिक और जो कुट्टी हो गई तो एकएक चिए का हिसाबकिताब, अमिया की गुठली के पीछे झगड़ा, गुडि़या के जेवर नोचनोच कर वापस करना. और भी न जाने कितने छोटेबड़े, सार्थकनिरर्थक प्रसंग, सारा बचपन ही दोहरा डाला. कालेज के समय की एक भी बात गीता ने नहीं की और न ही अपनी बात, न अपने पति की बात. पूरी चर्चा में गाड़ीबंगला, नौकरचाकर, अमीरी कहीं नहीं थे. था तो हुलसताहुमकता बचपन. उसे पूरे जोश के साथ याद करती रही गीता.

नीरज आए तो लंच में बहुत बेतकल्लुफ हो कर गीता ने खाना खाया. हाथ से चावलदाल का खाना, उंगलियां चाटना. रोटी की तारीफ, भरते के लिए बारबार पूछना शुभा को अच्छा लग रहा था, सहज सा.‘‘शुभा, ऐसा मनोहारी दिन फिर न जाने कब मिले. ला, 1 गिलास पानी पिला, फिर चलती हूं.’’

सुराही की मिट्टी की सोंधी गंध से युक्त पानी के 3-4 गिलास पी गई गीता. मुंह को हथेली से साफ करती गीता की आंखें स्वप्निल हो उठीं, ‘‘कितना बढि़या पानी है, कितनी सोंधी खुशबू है इस में. फ्रिज का पानी पीपी कर तो इस गंध को भूल ही गई थी. शुभा, मिट्टी से तो रिश्ता ही टूट गया मेरा. ऐसा फूल हो गई हूं जो गुलदस्ते में सजा है, फिर भी खिले रहने की भरपूर कामना करता है,’’ कहतेकहते हंस दी गीता, पर कैसी थी यह हंसी, उजड़ीउजड़ी, बियाबान सी हंसी, कितनी मरी हुई, दर्द की खनक से भरी.

‘‘सबकुछ मैं ने अपने हाथों आप ही तो बरबाद कर डाला. शादी के लिए न वर देखा, न उस की उम्र देखी, देखा तो पैसा, नौकरचाकर, बंगला, गाड़ी, हाई सोसाइटी. किसी से शिकायत भी तो नहीं कर सकती. खाली कोख उजाड़ लगती है. मातम मना कर भी क्या करूं? कौन है जो मुझे चाहते हुए भी देखे? मंत्री की पत्नी हूं, एक मुलम्मा चढ़ा रखा है अपने चेहरे पर, मेकअप का, हंसी का. अभी भी मन पूरी तरह मरा नहीं है शुभा, इसलिए फलनेफूलने की उसी चाह को सीने से लगाए मिट्टी तलाशती रहती हूं. धन पाने की चाह में क्याक्या खो दिया. शायद सबकुछ.’’

शुभा की दोनों हथेलियों को अपनी हथेलियों में भींच कर विदा ले कर गीता चल दी अपने सुविधायुक्त गुलदस्ते की ओर, कुछ दिन और खिले रहने की चाह से…माटी की गंध मन में समा कर.

मुसाफिर: ऑपरेशन से पहले उसके मन में कैसे सवाल खड़े हो रहे थे

‘‘जरूरी नहीं कि कम उम्र में आंख में मोतियाबिंद नहीं हो सकता. 7 साल के बच्चे को भी यह हुआ है. मां के गर्भ से ही कोई बच्चा अपने साथ यह ला सकता है. इसलिए जितनी जल्दी हो सके, औपरेशन करा लें.’’ नेत्र विशेषज्ञ की इस दोटूक सलाह से मुझ पर मानो वज्रपात सा हुआ. हजार मुसीबतों के दौर में यह मेरे लिए एक नई मुसीबत थी. औपरेशन के लिए पैसों का जुगाड़ और कार्यालय से छुट्टी बड़ी समस्या तो थी ही, औपरेशन की बात सुन कर परिजन कितने परेशान होंगे, यह सोच कर मेरा दिल बैठा जा रहा था. खैर, जैसेतैसे पैसों का जुगाड़ हुआ. वह दिन भी आ गया जब मुझे औपरेशन के लिए अस्पताल में भरती होना पड़ा. जीवन में पहली बार मैं अस्पताल में भरती हो रहा था. वह भी घरपरिवार से काफी दूर, अकेले. इसलिए मारे तनाव के बुरा हाल था. निर्धारित समय पर भयंकर अपराधबोध के साथ मैं दूसरे मरीजों के बीच कतार में खड़ा हो गया.

अस्पताल के एक कर्मचारी ने क्रमांक व नाम के आधार पर सभी मरीजों को उन के केबिन का ठिकाना बता दिया. मुझे जो केबिन मिला उस में 4 बैड थे. बैड पर पहुंचने के कुछ देर बाद 2 काफी वृद्ध मरीज औपरेशन के लिए मेरे बगल वाले बैड पर आए. लेकिन एक बैड देर तक खाली ही पड़ा था. सारे मरीजों में शायद मैं सब से कम उम्र का मरीज था. यह बात मुझे सब से ज्यादा कचोट रही थी. मैं मन ही मन घुटने लगा…आखिर मैं ने किसी का क्या बिगाड़ा था जो समय से काफी पहले ही यह रोग मुझे हो गया, जबकि मैं पहले ही ढेर सारी विकट समस्याओं से जूझ रहा हूं. औपरेशन के बाद परिचितों को जब पता लगेगा कि मेरी आंख का औपरेशन हुआ है तो मेरी दुर्दशा पर वे मन ही मन जरूर खुश होंगे. इस उधेड़बुन में मुझ पर उदासी और अवसाद भयंकर रूप से सवार होने लगे. इस हालत में 2 रात और 1 दिन बिताना मुझे असंभव लगने लगा.

आखिरकार केबिन में चौथे मरीज का आगमन हुआ, जो मध्य आयु के होते हुए भी काफी स्मार्ट लग रहे थे. अपने बैड पर पहुंचते ही उन्होंने साथ आई पत्नी से तुरंत घर लौट जाने और औपरेशन के दूसरे दिन सुबह जल्दी आने को कहा. सामान्य परिचय के बाद मालूम हुआ कि उन की एक आंख का पहले औपरेशन हो चुका है. इस बार वे दूसरी आंख का औपरेशन कराने आए हैं. इस से हमें अच्छा लगा कि हमारे बीच एक अनुभवी मरीज आया है. उन के व्यक्तित्व में गजब का आकर्षण था, लिहाजा केबिन का माहौल बड़ी तेजी से नकारात्मक से सकारात्मक होने लगा. हम उन से सवाल दर सवाल कर औपरेशन से जुड़ी अपनी शंकाओं का निवारण करने लगे. वे हमारे तनाव व अवसाद को अपनी बातों से यों दूर करते जा रहे थे मानो कोई धुरंधर बल्लेबाज तेज गेंदबाजों के बाउंसरों पर चौकेछक्के जड़ रहा हो. मैं ने उन से पूछा, ‘‘भाईसाहब, औपरेशन में कितना समय लगता होगा?’’ जवाब मिला, ‘‘यही कोई 5 से 10 मिनट. बस, औपरेशन खत्म.’’

एक वृद्ध मरीज ने उन से पूछा, ‘‘बाबू, सचसच बताना, क्या औपरेशन के समय बड़ा भयंकर दर्द होता है?’’ यह सुन कर वे जोर से हंसे और कहा, ‘‘अरे, बिलकुल नहीं, बल्कि शक होता है कि पैसे जमा करा कर डाक्टरों ने कुछ किया भी या नहीं.’’ इस पर सभी हंस पड़े. तभी भोजन का बुलावा आ गया. हमारा तनाव छूमंतर हो चुका था. हम इस स्थिति को एंजौय करने लगे. नकारात्मक के स्थान पर हमारे दिमाग में सकारात्मक बातें घूमने लगीं. ठीक ही तो है. औपरेशन हो जाएगा तो आंख से जुड़ी वे सारी रहस्यमय परेशानियां दूर हो जाएंगी जिन्हें हम महीनों से झेलते आ रहे थे. हम इस दुनिया को साफसाफ देख सकेंगे. अचानक हुए खुशनुमा माहौल में हमारी रात दार्शनिक अंदाज में बातें करते हुए बीत गई. सुबह हमें नाश्ता मिला और साथ में मरीजों के लिए बने कपड़े. उसे पहन कर विशाल औपरेशन कक्ष के सामने पहुंचने का आदेश हुआ.

उक्त सज्जन की बातों से हमारा डर काफी हद तक दूर हो चुका था. लिहाजा, काफी सहज रूप से हम औपरेशन थिएटर पहुंचे. तभी एक डाक्टर की नजर उक्त सज्जन की आंखों में उभरी हलकी सूजन पर पड़ी. डाक्टर ने उन से कहा, ‘‘यह सूजन कैसी, इस स्थिति में आप का औपरेशन नहीं हो सकता. आप घर लौट जाइए. सूजन ठीक होने के बाद आइएगा.’’ वे सज्जन डाक्टरों को समझाने की कोशिश करने लगे. जबकि हम औपरेशन से जुड़ी प्रक्रिया में उलझ गए. लेकिन तब तक हमारा उत्साह बढ़ाने और डर भगाने वाले सज्जन घर लौट चुके थे. हमें उन्हें औपचारिक विदाई देना तो दूर बाय तक कहने का मौका नहीं मिल सका. केबिन में लौटने पर हमें मरीजों के कपड़े उतार कर भोजनकक्ष में बुलाया गया. हम फिर उदास थे, क्योंकि हमारा डर, उदासी दूर करने वाले सज्जन हमारे बीच नहीं थे. वे घर लौट चुके थे. आंख में सूजन के चलते डाक्टरों ने उन्हें औपरेशन से मना कर दिया था. भोजन से लौटने के बाद उन का खाली पड़ा बैड बारबार हमारा ध्यान अपनी ओर खींच रहा था. हमारे दिमाग में बारबार उन की एक ही बात कौंध रही थी, हम सारे मरीज दो रात और एक दिन के साथी हैं, इस के बाद हम सभी अपनीअपनी दुनिया में लौट जाएंगे. शायद हमारी फिर कभी मुलाकात न हो.

कमजोर हो रही है विवाह संस्था – बढ़ रहे हैं तलाक के मामले

पतिपत्नी के बीच होने वाले झगड़ों के मुकदमे देशभर की अदालतों में तेजी से बढ़ रहे हैं. बीते 3 वर्षों में करीब सवा 3 लाख से अधिक मुकदमे अदालतों में दाखिल हुए हैं. तेजी से निबटारे के बावजूद पारिवारिक विवाद के लंबित मामले घट नहीं रहे हैं. अब तो पतिपत्नी छोटीछोटी बातों को ले कर भी अदालतों में पहुंचने लगे हैं.

वर्ष 2021 में देश की पारिवारिक अदालतों में 4,97,447 मामले घरेलू विवाद के दाखिल हुए थे. वर्ष 2022 में 7,27,587 मामले दाखिल हुए जबकि 2023 में यह संख्या बढ़ कर 8,25,502 हो गई. हाल ही में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में पारिवारिक विवादों से जुड़े आंकड़े प्रस्तुत किए हैं.

इन आंकड़ों के मुताबिक अदालतों द्वारा मुकदमों के अधिक निबटारे के बावजूद लंबित मामले बढ़ रहे हैं क्योंकि नए मामले अधिक दाखिल हो रहे हैं. इस की वजह पतिपत्नी के बीच अहंकार को बताया जा रहा है. हालांकि, यह सिर्फ अहंकार का मामला नहीं है. इस के पीछे कई अन्य वजहें हैं. देश की राजधानी दिल्ली में हर साल 8 से 9 हजार तलाक के मामले आते हैं, जो देश में सब से ज्यादा हैं. इस के बाद मुंबई और बेंगलुरु है, जहां 4 से 5 हजार तलाक के मामले हर वर्ष दर्ज होते हैं.

इस समय भारत में 812 पारिवारिक अदालतें कार्यरत हैं. इन में 11 लाख से अधिक मामले लंबित हैं. इन मामलों में घरेलू हिंसा, दहेज़ उत्पीड़न, तलाक, बच्चों की कस्टडी, दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना, किसी भी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति की घोषणा, वैवाहिक संपत्ति का मामला, गुजाराभत्ता, पतिपत्नी में विवाद होने पर बच्चों से मिलने के अधिकार से संबंधित मामले और बच्चों के संरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई शामिल हैं. सब से अधिक दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और तलाक के मामले दर्ज होते हैं.

भले ही भारत में पारिवारिक विवाद के मामले बढ़े हैं लेकिन अभी भी दुनियाभर में सब से कम तलाक भारत में होते हैं. भारत में रिश्ते ज्यादा चलने की वजह पितृसत्तात्मक व्यवस्था, औरतों की पुरुषों पर निर्भरता और धार्मिक-सांस्कृतिक पहलू जिम्मेदार हैं. इन में परिवार के साथ चलने पर ज्यादा जोर दिया जाता है. इस के अलावा बड़ी संख्या में मामले ऐसे भी हैं जो कानूनी प्रक्रिया में नहीं जाते और खुद पतिपत्नी ही अलग रहने लगते हैं. इस के चलते सही आंकड़ा सामने नहीं आ पाता. दुनियाभर में तलाक को ले कर शोध करने वाली एक निजी वैबसाइट के अनुसार पूरी दुनिया में तलाक की सब से कम दर भारत में लगभग एक फीसदी है, जबकि सब से अधिक तलाक मालदीव में 5.52 फीसदी होते हैं.

कमजोर होती विवाह संस्था

पश्चिमी देशों में स्त्रीपुरुष को साथ रहने और शारीरिक संबंध बनाने के लिए विवाह करना आवश्यक नहीं है. उन की संस्कृति में स्त्री विवाह करके भी बच्चा पैदा कर सकती है और बिना विवाह के भी मां बन सकती है. बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी वह उठा सकती है तो वह उठाती है वरना उस का पार्टनर उठाता है या दोनों मिल कर उठाते हैं या फिर सरकार उठाती है.

स्त्रियां पढ़ीलिखी और अच्छे पदों पर कार्यरत हैं. वे आर्थिक रूप से किसी पुरुष पर निर्भर नहीं हैं. मातापिता, सासससुर के फैसलों और दबावों से मुक्त अपने जीवन के फैसले लेने के लिए वे स्वतंत्र हैं. पार्टनर के साथ उस की अच्छी बन रही है तो दोनों एक छत के नीचे रहते हैं. जब विचार नहीं मिलते तो दोनों आराम से अलग हो जाते हैं.

भारत में विवाह संस्था काफी मजबूत रही है. धर्म ने स्त्रियों को अनेकानेक नियमों में जकड़ कर स्वतंत्र रूप से विचार करने, बोलने या कोई कदम उठाने लायक नहीं रखा. स्त्री आर्थिक रूप से हमेशा पुरुष पर आश्रित रही, लिहाजा पति से न बनने के बावजूद सदियों तक औरत विवाह संस्था से बाहर नहीं निकल पाई. वह घर में पिटती रही, गालियां खाती रही, नौकरानी की तरह घर के कामों में खटती रही, मशीन बन कर बच्चे पैदा करती रही मगर शादी को तोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाई. तोड़ कर जाती भी कहां?

जिस समाज में लड़की को विदाई के वक्त यह कहा जाता रहा कि- आज से पति का घर ही उस का घर है, वहां से अब उस की अर्थी ही उठेगी, तो ऐसा समाज उस स्त्री को कैसे बरदाश्त करता जो पति से अलग रहने निकली हो या जिस ने तलाक लिया हो? आखिर कौन उस का बोझ उठाएगा, कौन खाना देगा? समाज में बेइज्जती से भी उस का अपना परिवार उस को नहीं अपनाता था. यही वजह रही कि लंबे समय तक भारत में तलाक के मामले न के बराबर रहे और आज भी दुनिया के अन्य देशों की तुलना में मात्र एक फीसदी तलाक भारत में होते हैं.

हालांकि, जैसेजैसे औरतें शिक्षित हुईं, नौकरी या व्यवसाय में आगे बढ़ीं, उन्हें अपने खिलाफ होने वाली गलत बातों पर आवाज उठाना भी आने लगा. आर्थिक मजबूती इंसान में हिम्मत लाती है. यही औरतों के साथ भी हुआ. अब पति की मारगालियां जब बरदाश्त नहीं होतीं तो वे तलाक का रास्ता अपनाने से गुरेज नहीं करतीं. मायके वालों ने नहीं अपनाया तो वे अकेले भी रह लेती हैं.

पहले पत्नी से नहीं बनती थी तो पति बाहरी औरतों से रिश्ते बना लेता था. पत्नी रोतीकलपती रहती, घुटघुट कर जीती, परिवार की देखभाल और बच्चों की परवरिश में खुद को स्वाहा करती मगर पति पर कोई असर न होता. मगर आज नौकरीपेशा पत्नी ऐसे पति को लात मर कर न सिर्फ उस से अलग हो जाती है बल्कि अनेक मुकदमों में उस की गरदन फंसा कर सालों कोर्ट में घसीटती है.

पहले संयुक्त परिवार में रहने पर धर्म-संस्कार और सामाजिक इज्जत के नाम पर पति द्वारा त्यागी और दुत्कारी गई औरत को भी ससुराल में ही बने रहने पर मजबूर किया जाता था. अब ऐसा नहीं है. संयुक्त परिवार टूट चुके हैं. एकल परिवारों में ज्यादा से ज्यादा सासससुर ही कुछ दबाव बनाते हैं, परंतु पतिपत्नी में अगर ज़्यादा मतभेद और लड़ाइयां होती हैं तो वे भी पीछे हट जाते हैं, बल्कि अलग होने की सलाह दे देते हैं.

पतिपत्नी में मतभेद और मनभेद की अनेक वजहें हैं. सिर्फ औरत का आर्थिक रूप से मजबूत होना या अपने निर्णय स्वयं करना ही वजह नहीं है. अगर पति का आचरण ठीक है तो आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ी स्त्री अपने परिवार को हरगिज तोड़ना नहीं चाहती है. आइए देखें ऐसी कौन सी वजहें हैं जो एक औरत को रिश्ता तोड़ने के लिए मजबूर करती हैं-

चीटिंग

रिलेशनशिप और शादी के बाद लोगों का चीट किया जाना बेहद दुखद होता है. तलाक के कई मामले ऐसे होते हैं जिन में पति या पत्नी में से किसी ने चीट किया. कोई बात छिपाई या बाहर अन्य से रिश्ता बनाया. ऐसे में पार्टनर द्वारा तलाक की पहल की जाती है. आजकल शादी के बाद भी दूसरी जगह अफेयर के कारण तलाक के मामले बढ़े हैं. इसलिए जरूरी है कि पतिपत्नी दोनों को अपने पार्टनर के प्रति ईमानदार रहना चाहिए.

मानसिक स्थिति सही न होना

कई बार अरेंज मैरिज में यह देखा गया है कि पति या पत्नी की मानसिक स्थिति सही नहीं रहती है. अरेंज मैरिज में घर वालों द्वारा शादी करवाने के बाद पता चलता है कि पार्टनर, मानसिक रूप से कमजोर है, जिस की वजह से वह कई तरह के गलत क्रियाकलाप करता है जिस के कारण तलाक की स्थिति बन जाती है.

धार्मिक मतभेद होना

आजकल दूसरे धर्म में शादी के कारण भी तलाक के मामलों में वृद्धि देखने को मिली है. कई बार यह देखा गया है कि प्रेम में पड़ कर दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी तो कर ली मगर बाद में दूसरे के घर में होने वाले धार्मिक क्रियाकलापों से तारतम्य नहीं बिठा पाए. कभीकभी दूसरे धर्म में शादी करने के बाद पार्टनर पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाता है. ऐसे में हमेशा एकदूसरे के धर्म को ले कर बहस बनी रहती है, जिस के कारण आगे चल कर साथ रहना मुश्किल हो जाता है और आखिरकार तलाक की नौबत आ जाती है.

मानसिक व्यवहार

शादी के बाद मानसिक व्यवहार बहुत माने रखता है. कई मामलों में देखा गया पति या पत्नी अपने पार्टनर को ले कर बेहद पजेसिव रहते हैं. वो उन पर दिनभर शक करते हैं. उन के हर काम में हस्तक्षेप करते हैं. वो औफिस में हों या अपने बौस के साथ हों, उन के पार्टनर को हर बात जाननी रहती है. इस कारण आगे चल कर दोनों के बीच खटास पैदा होने लगती है और धीरेधीरे रिश्तों में दूरी बन जाती है.

शराब का सेवन

नशे को नाश का कारण माना जाता है. कई मामलों में देखा गया है कि शराब के सेवन के कारण तलाक की नौबत आ जाती है. अधिकांश औरतों को नशेड़ी पति के साथ असुरक्षा की भावना रहती है. महिला को लगता है कि वह सारी जमापूंजी शराब में उड़ा देगा. ऐसे में अपने और बच्चों के भविष्य के लिए नशेड़ी आदमी से दूर होने में ही भलाई नजर आती है.

सासससुर का बहू से गलत व्यवहार

जिन घरों में बहू अपने सासससुर के साथ रहती हैं वहां अकसर सास बहू के बीच झगड़े होते रहते हैं. बहू के आने के बाद अकसर सास में असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है. वह अपनी स्थिति मजबूत रखने के चक्कर में बहू को अपने हुक्म का गुलाम बनाने की कोशिश में लग जाती है. हर काम में उस की गलतियां निकालती है.

कहींकहीं तो सास का रूखा व्यवहार बहू के लिए बड़ा मानसिक कष्ट बन जाता है. कहींकहीं सासें बहू-बेटे के बीच लड़ाइयां करवा देती हैं. अगर बहू कमाऊ है तो वह सास के तानेउलाहने बरदाश्त नहीं करती. अगर उस का पति अपनी मां की साइड लेता है तो बहू तुरंत उस को न सिर्फ तलाक का नोटिस थमा देती है बल्कि घरेलू हिंसा और दहेज के मामले में पूरे परिवार को फंसा भी देती है.

गर्भपात के मसलों में फैसला ‘मेरा शरीर मेरा हक’ की सोच पर हो

फ्रांस गर्भपात को संवैधानिक अधिकार देने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है. फ्रांस के सांसदों ने 1958 के संविधान में बदलाव कर महिलाओं को गर्भपात से जुड़े मामले में पूरी तरह से फैसला लेने की आजादी दे दी है. इस संविधान संशोधन के पक्ष में 780 और विरोध में महज 72 वोट पड़े.

फ्रांस का यह कदम पूरी दुनिया में एक नजीर की तरह से देखा जा रहा है. दुनियाभर में इस की चर्चा हो रही है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने संदेश में कहा कि ‘यह पूरी दुनिया को एक संदेश देगा.’ वहीं गर्भपात अधिकार के समर्थकों ने पेरिस में जुट कर इस फैसले की तारीफ की.

मौडर्न फ्रांस के संविधान में 2008 के बाद से यह 25वां संशोधन है. इस फैसले पर लोगों ने एफिल टावर पर इकट्ठा हो कर ‘मेरा शरीर, मेरा अधिकार’ के नारे लगाते हुए अपना समर्थन जताया. गर्भपात को संवैधानिक अधिकार बनाने वाले संशोधन पर वोटिंग से पहले फ्रांस के प्रधानमंत्री गैब्रियल एटल ने संसद में कहा कि ‘गर्भपात का अधिकार खतरे में था और निर्णय लेने वालों की दया पर निर्भर था. हम सभी महिलाओं को एक संदेश दे रहे हैं कि आप के शरीर पर आप का ही अधिकार है और कोई दूसरा इसे ले कर फैसला नहीं कर सकता है.’

दिल्ली प्रैस प्रकाशन की विचारोत्तेजक पत्रिका ‘सरिता’ बहुत पहले से गर्भपात के मसले पर महिलाओं की पुरजोर आवाज को उठाने का काम करती रही है. उस ने भी समयसमय पर अपने लेखों में यह समझाने का काम किया कि ‘गर्भपात डाक्टर और महिला के बीच का फैसला होना चाहिए. जैसे किसी अंग के प्रभावित होने या शरीर के साथ खतरा बनने पर उस को शरीर से अलग करने का फैसला डाक्टर और मरीज लेते हैं. वैसे ही गर्भपात का फैसला डाक्टर और महिला मिल कर लें. कानून का दखल इस में नहीं होना चाहिए.’

फ्रांस के संविधान में यह बदलाव ऐसे समय में किया गया है जब 2022 में अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात के अधिकार को खत्म कर दिया है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से अब अलगअलग राज्य अपने स्तर पर गर्भपात को रोकने के लिए बैन लगा सकते हैं. इस फैसले से लाखों महिलाओं के गर्भपात के अधिकार खत्म हो गए हैं.
फ्रांस के इस फैसले से पूरी दुनिया में यह बहस फिर से तेज होगी. देरसवेर सभी देशों को इस के बारे में विचार करना पड़ेगा. गर्भपात महिला का मौलिक और मानवीय दोनों तरह का अधिकार है.

भारत का संविधान भी आर्टिकल 21 में महिलाओं की निजता को ले कर अधिकार देता है. यह ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ की अभिव्यक्ति की वजह से है. इसलिए कानून की वैधता के आधार पर पूछताछ नहीं की जा सकती है कि यह अनुचित या अन्यायपूर्ण है.

सर्वोच्च न्यायालय ने गोपालन मामले में अपने फैसले को खारिज कर दिया और आर्टिकल 21 की व्यापक व्याख्या की. आर्टिकल 21 में लिखे गए ‘जीवन के अधिकार केवल पशु अस्तित्व या उत्तरजीविता तक ही सीमित नहीं हैं, लेकिन इस में अपने दायरे में मानव गरिमा और जीवन के उन सभी पहलुओं के साथ रहने का अधिकार शामिल है जो एक व्यक्ति के जीवन को सार्थक, पूर्ण और लायक बनाने के लिए चाहिए.’

क्या कहता है भारत का गर्भपात कानून

भारत में गर्भपात को मैडिकल टर्मिनेशन औफ प्रैगनैंसी एक्ट 1971 यानी एमटीपी एक्ट के अनुसार पालन किया जाता है. एक रजिस्टर्ड डाक्टर ही गर्भपात कर सकता है. यदि गर्भावस्था से गर्भवती महिला के मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को खतरा हो या भ्रूण के गंभीर मानसिक रूप से पीड़ित होने की संभावना हो, या प्रसव होने पर शारीरिक असामान्यताएं हो सकती हों तभी गर्भपात होता है. यदि कोई महिला 20 सप्ताह से कम समय से गर्भवती है, तो केवल एक चिकित्सक को यह तय करना होगा कि गर्भपात सुरक्षित है या नहीं.

अगर गर्भावस्था 20 से 24 सप्ताह के बीच है, तो 2 डाक्टरों को स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का आंकलन करना होता है. 20-24 सप्ताह के बीच गर्भपात के विकल्प का उपयोग केवल कुछ महिलाएं ही कर सकती हैं, जैसे बलात्कार पीड़िता, नाबालिग, मानसिक या शारीरिक रूप से बीमार महिलाएं. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि एकल महिलाओं को भी 24 सप्ताह तक गर्भपात कराने की अनुमति दी जानी चाहिए.

अगर महिला गर्भनिरोधक ले रही है. इस के बाद भी गर्भधारण हो गया है तो कानून कहता है कि ऐसे मामले में यह अपनेआप मानसिक सदमा माना जाएगा और गर्भपात की अनुमति होगी. इसी तरह 20 सप्ताह से कम के गर्भ के मामले में उन्हें आसानी से गर्भपात कराने की अनुमति होनी चाहिए, 20-24 सप्ताह के बीच, यह मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा कि अनुमति मिलती है या नहीं. बलात्कार के मामले में कानून कहता है कि 24 सप्ताह तक का गर्भपात कराया जा सकता है.

इस के अलावा अगर सरकारी मैडिकल बोर्ड को भ्रूण में पर्याप्त असामान्यताएं मिलती हैं, तो 24 सप्ताह के बाद भी गर्भपात कराया जा सकता है. इस के अलावा, ऐसे मामलों में जहां एक डाक्टर का मानना है कि गर्भवती महिला के जीवन को बचाने के लिए गर्भावस्था को तुरंत समाप्त करना आवश्यक है, ऐसे में गर्भपात की अनुमति किसी भी समय दी जा सकती है, यहां तक कि मैडिकल बोर्ड की राय के बिना भी.

कई घटनाएं ऐसी भी हो जाती हैं जहां गर्भावस्था का पता देर से चलता है. गर्भवती महिलाओं को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है जो आखिरकार गर्भपात का निर्देश देता है.

कानून से अलग हैं हालात

अगर कानून को देखेंगे तो भारत का कानून काफी बेहतर कहा जा सकता है. असल में जमीनी हालात बहुत अलग हैं. कोर्ट में जा कर फैसला लेना सरल नहीं होता है. डाक्टर खुद फैसला लेने से बचता है. स्वास्थ्य विभाग में जल्द फैसला केवल कागजों पर होता है. जहां एकएक दिन महत्त्वपूर्ण होता है वहां महिला या उस के संबंधियों को स्वास्थ्य विभाग, डाक्टर और कोर्ट के चक्कर पर चक्कर लगाने होते हैं. इस सब में पैसा और समय तो लगता ही है, महिला की निजता भी बाधित होती है. ऐसे में गर्भपात कराने के लिए देशी तरीके प्रयोग किए जाते हैं जो महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होते हैं.

कई बार महिला गर्भपात वाली गोली खा लेती है. कई बार वह झोलाछाप दाई के पास जाती है. इस से उस के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. कई मामलों में महिला की मौत तक हो जाती है. ऐसे में गर्भपात कानून इस तरह का होना चाहिए कि डाक्टर और महिला जो फैसला लें, उसे सही माना जाए.

इस में परिवार और पति की सहमति की जरूरत न हो. भारत में अभी भी गर्भपात के ऐसे बहुत सारे मसले हैं जो लिंग की जांच के बाद चोरीछिपे कराए जाते हैं. यह काम शहर में बैठे झोलाछाप डाक्टर करते हैं. इसलिए कानून के साथ जागरूकता भी जरूरी है.

खर्चीली शादियां: सफल दांपत्य की गारंटी नहीं

Anant Ambani Pre Wedding: जितनी फीस मुकेश अंबानी ने अपने बेटे अनंत अंबानी के प्री वेडिंग समारोह में एक डांसर सिंगर रोबिन रिहाना फेंटी को दी उतने में 10-10 लाख रुपए वाली 540 शादियां हो जातीं और कुल जितनी दौलत इस खर्चीली शादी, जो इसी साल जूनजुलाई में कभी होगी, में खर्च होगी उतने में यह और वह हो जाता जैसी बातें करने वाले लोग दोटूक यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे कि मुकेश अंबानी जो दिखावा अपनी दौलत का कर रहे हैं वह एक किस्म की कुंठा ही है जो अब से कोई 20 साल पहले विनिशा मित्तल की शादी में भी दिखी थी.

मुकेश अंबानी की ही तरह लक्ष्मी निवास मित्तल का नाम किसी सुबूत का मुहताज नहीं जिन के नाम के मुताबिक लक्ष्मी उन पर मेहरबान रही, उन्होंने भी अपनी बेटी विनिशा की शादी में पैसा पानी की तरह बहाया था.

23 वर्षीया विनिशा की शादी दिल्ली के बिजनैसमैन अमित भाटिया से साल 2004 में फ्रांस में हुई थी. 6 दिनों तक चली इस शादी में अंदाजा है कि तब कोई 240 करोड़ रुपए खर्च हुए थे. जिन की कीमत आज 720 करोड़ रुपए के लगभग है. इस ऐतिहासिक शादी में दुनियाभर की एक हजार हस्तियों ने हाजिरी दी थी जिन का पूरा खर्च लक्ष्मी निवास मित्तल ने ही उठाया था.

इस ऐतिहासिक और भव्य शादी के दिन पेरिस को दुलहन की तरह सजाया गया था. वहां के बोक्स ले वियोकोम्टे महल की रौनक पौराणिक शादियों की भव्यता को भी मात करती हुई थी. यह लक्ष्मी निवास मित्तल की शान और पहुंच की ही बानगी थी कि बेटी विनिशा की शादी से एक साल पहले हुई सगाई में फ्रांस की रौयल फैमिली ने भी शिरकत की थी. सगाई भी कोई ऐसी वैसी जगह पर नहीं, बल्कि रौयल पैलेस में संपन्न हुई थी जिसे पैलेस औफ वर्साइल कहा जाता है.

अनंत अंबानी की प्री-वैडिंग की तरह ही बौलीवुड की नामी हस्तियों ने विनिशा की शादी में शिरकत की थी. मशहूर अमेरिकन सिंगर काइली मिनाग ने करोड़ों रुपए की फीस ले कर परफौर्म किया था तो कोरियोग्राफी के लिए मुंबई से सरोज खान अपनी पूरी टीम ले कर पेरिस पहुंची थीं. अंबानीज की तरह ही पूरे फैमिली ड्रामे का भी इंतजाम था. संगीत सेरेमनी के लिए गीतकार जावेद अख्तर ने खासतौर से एक नाटक लिखा था जिस पर मित्तल फैमिली ने अभिनय किया था. ऐश्वर्या राय, रानी मुखर्जी, सैफ अली खान, जूही चावला और शाहरुख खान जैसे दिग्गज कलाकारों ने तगड़ी फीस ले कर ठुमके लगाए थे यानी परफौर्म किया था. अनंत अंबानी की प्रीमैरिज सेरेमनी में एकता कपूर छाप धारावाहिकों सा माहौल था जिस में हंसीखुशी और नाचगाने के साथसाथ भावुकता भी इफरात से थी.

अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की शादी में भी, बस, कमी इतनी ही है कि ऊपर से देवीदेवता पुष्पवर्षा नहीं कर रहे हालांकि आजकल यह कमी हैलिकौप्टर से फूल बरसा कर पूरी कर ली जाती है. विनिशा और अमित की शादी में पेरिस सजाया गया था तो इस शादी में अंबानीज ने जामनगर को दुलहन की तरह सजा दिया. बाकी सब तामझाम इफरात से हैं जिन में तीनों खानों ने ठुमके लगाए, बच्चन और तेंदुलकर फैमिलीज पहुंचीं, इवांका ट्रंप और बिलगेट्स व फलांफलां भी तशरीफ लाए.

तलाक में तबदील हुई शादी

विनिशा-अमित की शादी की गिनती दुनिया की महंगी शादियों में शुमार की जाती है जो कुल 10 साल चली और दोनों में साल 2014 में तलाक हो गया. इस दरम्यान इन के 3 बच्चे हुए. अब दौलत के ढेर पर बैठी विनिशा के पास तनहाई है और अपनी खर्चीली शादी की यादें हैं, जो, तय है, उन्हें सालती भी होंगी. हालांकि अपने पिता और भाई आदित्य के कारोबार में वे हाथ बंटाती है लेकिन अब पैसे से वे वह सुख नहीं खरीद सकतीं जो हर महिला चाहती है.

उद्योगपति घरानों में हुई ऐसी कई शादियां हैं जो महंगी होने के बाद असफल रहीं. इन में से एक चर्चित नाम पंजाब के विक्रम चटवाल का भी है जिन की शादी प्रिया सचदेव से उदयपुर के जगमंदिर पैलेस में 2006 में हुई थी. इस शादी पर कोई 100 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे. खास बात यह भी कि इस शादी में प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के अलावा लक्ष्मी निवास मित्तल जैसे दर्जनों उद्योगपति शामिल हुए थे. विक्रम के पिता संतसिंह चटवाल अमेरिका स्थित एक नामी होटल के मालिक हैं, उन्हें साल 2010 में पद्मभूषण से नवाजा गया था.

दौलत और रुतबा विक्रम की शादीशुदा जिंदगी को कामयाब नहीं बना पाया और उन का व प्रिया का भी 2011 में तलाक हो गया. इस के बाद प्रिया ने एक और नामी कारोबारी संजय कपूर से शादी कर ली जो अभिनेत्री करिश्मा कपूर के भूतपूर्व पति हैं.

मिडिल क्लास की भी त्रासदी

जो हश्र विनिशा, अमित और विक्रम, प्रिया की महंगी शादियों का हुआ, उस के छोटे संस्करण हर कहीं देखने मिल जाते हैं कि हम ने तो बेटे की शादी में 75 लाख रुपए का खर्च किया था जिस से वह सुखी रहे. कोई यह कहता भी मिल जाता है कि बेटी की शादी में हैसियत से ज्यादा खर्च कर हमें क्या मिला. उस की शादी में 25 तोला सोना और 18 लाख की कार दी थी लेकिन 2 साल भी वह पति और ग्रहस्थी का सुख नहीं भोग पाई और तलाक हो गया.

जाहिर है, महंगी शादियों के टूटने और असफल रहने के दुखदर्द में खर्च किया गया पैसा भी बड़ा फैक्टर होता है तो फिर शादियों में हैसियत से ज्यादा क्यों खर्च किया जाए, यह हर किसी के सोचने की बात है. झूठी शान अकसर फुजूलखर्ची को जन्म देती है और शादियों में तो यह देखते ही बनती है. लोग भीड़ इकट्ठा करने के लिए उन लोगों को भी आमंत्रित कर लेते हैं जिन्हें न बुलाने पर भी शादी पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. जिस शादी में 1000-500 लोग हों वही शादी शादी करार दी जाती है. जबकि एक अच्छी शादी में नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा पारिवारिक मित्रों की मौजूदगी ही काफी होती है.

बेकार का नाचगाना शादियों को फूहड़ बना देता है. भोज में दर्जनों किस्म के पकवान फिंकते ज्यादा हैं, खाए कम जाते हैं. और जरूरत से ज्यादा भीड़ तो खुद मेहमानों के लिए ही परेशानी का सबब बन जाती है. अब हर कोई तो अंबानी होता नहीं जो सैकड़ों एकड़ में पंडाल लगा पाए. होटलों और मैरिज हौल की शादियों में मेहमान भिखारियों की तरह हाथ में खाने की प्लेट लिए इस से उस स्टाल तक घूमते और खीझते नजर आते हैं तब वे पूरे दिल से मेजबान को कोस रहे होते हैं.

कौन सा आदर्श अंबानी का

अपने बेटे की शादी के पहले ही बेतहाशा पैसा बहा कर मुकेश अंबानी ने कोई आदर्श पेश नहीं किया है. यह ठीक है कि पैसा जिस के पास हो उसे अपने हिसाब से खर्च करने का हक भी हर किसी को होना चाहिए लेकिन अगर वह फुजूलखर्ची और बरबादी हो तो उस पर एतराज जताया जाना भी जरूरी है ठीक वैसे ही जब आप किसी भीड़भाड़ वाली शादी से निकलते यह कह रहे हों कि बेकार में ही इतना पैसा फूंका, काम तो इस से कम में भी चल सकता था.

अनंत-राधिका की शादी के इस समारोह में जो सैलिब्रिटीज थे उन के न होने से कोई पहाड़ न टूट पड़ता. यह सोचना भी बेमानी है कि इन में से एकाध को छोड़ कर सभी की आत्मीयता और हरदिल लगाव अंबानी परिवार से होगा. दरअसल, वे यह बताने व जताने आए थे चूंकि मैं नामी हस्ती हूं, इसलिए मुझे देश के सब से बड़े रईस ने बेटे की शादी में आमंत्रित किया है. यही मानसिकता मुकेश अंबानी की भी थी कि मैं सब से बड़ा अमीर और सैलिब्रेटी हूं, इसलिए मेरे बेटे की शादी में भी सब ऐसे ही होना चाहिए फिर भले ही उन्हें अभी या बाद में कभी ‘कैश या काइंड’ में उपकृत करना पड़े.

पररूपण : क्या था एसपी भंडारी का राज?

मैं और पत्नी पिक्चर देख कर घर लौटे तो मेरी माताजी ने बताया कि जोधपुर के एक महानुभाव मुझ से मिलने के लिए करीब 6 बजे आए थे. मैं ने माताजी से पूछा, ‘‘उस आदमी का क्या नाम था और किसलिए आया था?’’ माताजी ने कहा, ‘‘नाम तो हम ने पूछा नहीं लेकिन जीप में आया और बोला कि पंवार साहब से मिलना है.’’ मैं ने बहुत सोचा लेकिन मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा और सोचतेसोचते शाम का खाना खा कर सो गया. दूसरे दिन सवेरे 7 बजे निवृत्त हो कर मैं पत्नी से बातें कर रहा था कि एक जीप मेरे बंगले के सामने आ कर रुकी. मैं समझ गया कि वही महानुभाव आए होंगे. यही हुआ जीप में से एक अजनबी उतरा और पीछे के हिस्से में से एक सबइंस्पैक्टर वरदी पहने उतरा. जीप का ड्राइवर भी पुलिस की वरदी पहने हुए था. बंगले के ड्राइंगरूम में घुसते ही उस ने हाथ मिलाते हुए अपना परिचय दिया.

‘‘मैं उदयपुर का एसपी के एल भंडारी हूं. शायद आप डा. डी एस कोठारी, चेयरमैन, यूजीसी को जानते होंगे. मैं उन का जमाई हूं. मैं सीबीआई के एक केस की तहकीकात करने के लिए कोलकाता आया था. सोचा, इस बार इंफाल घूम कर आते हैं. मेरी पत्नी एक डाक्टर है. उस ने बताया कि यहां के नागा दोशाले और रजाइयां बहुत सुंदर बनती हैं. सोचा, उस के लिए कुछ खरीदारी भी कर लूंगा और इस क्षेत्र को देख भी लूंगा.’

‘‘आप कहां पर ठहरे हुए हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं सर्किट हाउस में कमरा नं. 7 में ठहरा हुआ हूं,’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘आप से मिल कर बड़ी प्रसन्नता हुई. मैं आप के लिए क्या कर सकता हूं?’’ मैं ने प्रश्न किया. ‘‘मेरा आप से कोई विशेष काम नहीं है. मैं कल मारवाड़ी ढाबे में खाना खाने गया था. वहां पर बैठे हुए लोगों से पूछा कि इंफाल में कोई जोधपुर का रहने वाला है? उन्हीं लोगों ने बताया कि केंद्रीय विद्यालय के प्रिंसिपल पंवार साहब जोधपुर के रहने वाले हैं. पंवार साहब, मैं भी नवचौकिया महल्ला, जोधपुर का रहने वाला हूं,’’ उस ने कहा और वह जोधपुर की मारवाड़ी भाषा में बातें करने लगा. मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि वह जोधपुर का ही रहने वाला था. थोड़ी देर बाद वह पूछने लगा, ‘‘आप इंफाल के एसपी साहब को तो जानते ही होंगे?’’

‘‘नहीं, मैं उन्हें नहीं जानता,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘बड़े भले आदमी हैं. मैं ने इंफाल में एअरपोर्ट पर उतरते ही उन्हें फोन किया, तो उन्होंने मेरे लिए जीप भिजवा दी और सर्किट हाउस में ठहरने का बंदोबस्त करवा दिया. चलिए, आप को भी एसपी साहब से मिलवा दूंगा,’’ उस ने कहा. नाश्ते का समय था. मैं ने उन से नाश्ता करने के लिए अनुरोध किया. उन्होंने और सबइंस्पैक्टर ने मेरे साथ नाश्ता किया और चाय पी. भंडारी साहब के अनुरोध पर मैं उन के साथ इंफाल के एसपी साहब से मिलने के लिए जीप में चला गया. दफ्तर में पहुंचे तो भंडारी ने मेरा परिचय इंफाल के एसपी से करवाया. मैं उन से हाथ मिला कर उन के सामने कुरसी पर बैठ गया. एसपी इंफाल ने कहा, ‘‘हम ने आप के गुमशुदा सूटकेस के लिए सिल्चर एअरपोर्ट पर वायरलैस मैसेज करवा दिया है लेकिन उस का कोई उत्तर अभी नहीं मिला है.’’ भंडारी धन्यवाद देते हुए उन से पुलिस विभाग की बातें करने लगे. एसपी इंफाल भी बातों में व्यस्त हो गए और मैं उन दोनों की बातों को सुनता रहा.

‘‘मैं आप के लिए एक टोपी और कुछ खाने के पैकेट को आप के कमरे में भेज दूंगा. मैं कभी उदयपुर जाऊंगा. सुना है उदयपुर बहुत सुंदर शहर है. हां, कोलकाता के लिए आप का एअर टिकट बुक करवा दिया है,’’ एसपी इंफाल ने बताया. मेरे स्कूल जाने का समय हो गया तो मैं ने उन लोगों से माफी मांगी और उठ कर जाने लगा तो भंडारी मेरे साथ हो लिए. जीप में बैठ कर मैं और भंडारी अपने स्कूल के कमरे में आ कर बैठ गए. मुझे दूसरे दिन तेजपुर में नया केंद्रीय विद्यालय शुरू करने जाना था. मैं ने अपने चपरासी को बुला कर चैकबुक से चैक काट कर दिया और चपरासी को बैंक से नकद पैसे ला कर इंफाल से गुवाहाटी का हवाई जहाज का टिकट खरीदने के लिए कहा. इतने में भंडारी बोल पड़े, ‘‘पंवार साहब, आप को तो पता है कि मेरा सूटकेस सिल्चर में खो गया है, उस में मेरे 4 हजार रुपए थे. अभी मेरे पास बहुत कम रुपए हैं जिन से मैं सामान नहीं खरीद सकता. क्या आप मुझे 400 रुपए उधार दे सकते हैं? सूटकेस मिलते ही मैं आप को 400 रुपए वापस लौटा दूंगा.’’

यह बात भंडारी ने बड़ी तकलीफ को दर्शाते हुए कही. मैं ने मजबूर हो कर 400 रुपए का एक चैक और काटा और चपरासी को नकद लाने के लिए बैंक भेज दिया. थोड़ी देर जोधपुर शहर की बातें मारवाड़ी भाषा में चलती रहीं. इस बीच चपरासी मेरा एअर टिकट इंफाल से गुवाहाटी तक का और 400 रुपए ले कर आ गया. मैं ने 400 रुपए भंडारी को दे दिए. भंडारी ने धन्यवाद देते हुए 400 रुपए ले लिए. थोड़ी देर बातों ही बातों में मैं ने भंडारी को डिनर का निमंत्रण दिया. बाद में भंडारी मुझे स्कूल में काम करने के लिए छोड़ कर डिनर पर आने का वादा कर के चले गए. मैं स्कूल के काम में लग गया. छुट्टी होने के बाद घर आ कर लंच किया और आराम करने के लिए सो गया. शाम को चाय पीने के थोड़ी देर बाद करीब 5 बजे जीप आई और भंडारी बहुत सारे दोशाले, रजाई और साडि़यां खरीद कर लाए. खरीदे हुए सामान के बारे में बातें होने लगीं. पत्नी भी ड्राइंगरूम में आ गई. पुलिस के सबइंस्पैक्टर के साथ होने से उन्हें कपड़े बहुत सस्ते भाव में मिल गए. बातों ही बातों में उन्होंने मेरी पत्नी को मुंहबोली बहन बना लिया. शाम को खूब छक कर डिनर खाया, अगले दिन जाने का प्रोग्राम बनाया. एअरपोर्ट जाते वक्त मुझे जीप में ले जाने का वादा कर के वे सर्किट हाउस चले गए.

अगले दिन सवेरे वे मेरे घर आए, चाय नाश्ता किया. फिर मुझे जीप में बैठा कर एअरपोर्ट की ओर रवाना हो गए. करीब 20 मिनट तक जीप से सफर करने के बाद हम ने देखा कि एअरपोर्ट से हवाई जहाज ने उड़ान भर ली थी. हम दोनों सोचने लगे यह हवाई जहाज कौन सा था? मैं ने कहा, ‘‘यहां से इस वक्त सिर्फ एक उड़ान कोलकाता ही जाती थी.’’ खैर, हम एअरपोर्ट पहुंचे तो पता चला कि जहाज ने मौसम खराब होने पर 10 मिनट पहले उड़ान भर ली. भंडारी और मैं दोनों बड़े असमंजस में पड़ गए कि समय के पहले कैसे हवाई जहाज उड़ सकता था. इंडियन एअरलाइंस वालों ने कहा कि आप अपने टिकट के पैसे वापस ले सकते हैं. 10 मिनट पहले उड़ान भरना मजबूरी थी क्योंकि मौसम ज्यादा खराब होने वाला था.

भंडारी गुस्से में आ कर चिल्लाने लगे, ‘‘अब मैं कैसे कोलकाता जाऊंगा. खैर, मेरा सूटकेस जो सिल्चर पर गुम हुआ, उस का क्या हुआ?’’ ‘‘आप का सूटकेस मिल गया है और यह रखा हुआ है,’’ इंडियन एअरलाइंस के कर्मचारी ने संकेत करते हुए कहा.

‘‘इस सूटकेस को मैं खोल कर लूंगा,’’ भंडारी ने कहा.

‘‘हम इस को तोल लेते हैं. इस का वजन आप के टिकट में बताए वजन के बराबर 11 किलोग्राम है. अंदर क्या है यह हम नहीं जानते,’’ इंडियन एअरलाइंस के कर्मचारी ने कहा. भंडारी के पास उस सूटकेस की चाबी थी. सूटकेस खोला और चिल्लाने लगे, ‘‘इस सूटकेस में मेरी पुलिस की वरदी नहीं है और उस वरदी में एसपी के सोने के पिप्स थे वे गायब हैं. सूटकेस में 1,200 रुपए थे, वे भी गायब हैं. मैं आप के अफसर से शिकायत करूंगा और जिस ने चोरी की है उसे जेल भिजवा कर रहूंगा.’’ ‘‘साहब, आप जो भी हैं, इस तरह गुस्सा मत करिए और अपने व्यवहार व गुस्से को काबू में रखिए वरना हम गवर्नर से आप की शिकायत करेंगे,’’ इंडियन एअरलाइंस के कर्मचारी ने सज्जनतापूर्वक कहा.

‘‘जाइएजाइए, आप किसी से शिकायत करिए. मैं सूटकेस नहीं लूंगा,’’ भंडारी बोले. झगड़ा करने के बाद भंडारी ने आखिरकार सूटकेस ले लिया और हम लोग वापस इंफाल शहर की तरफ लौटने लगे. रास्ते में भंडारी के जाने की व्यवस्था के बारे में सोचते रहे. उन्हें कोलकाता जाने की जल्दी थी और दूसरे दिन फ्लाइट नहीं थी. भंडारी सड़क के रास्ते से जाने की सोचने लगे. जीप हमें मेरे घर पर ले आई. करीब 1 बजे हम लोगों ने दिन का खाना खाया और थोड़ा आराम किया. शाम को करीब 8 बजे घूमतेघूमते डिप्टी सुपरिंटैंडैंट अशोक खन्ना (मेरे दोस्त) के घर चले गए. बातें होती रहीं, फिर उन्होंने भंडारी से पता लिखने के लिए कहा. भंडारी ने कागज पर अपना पता लिखा- ‘‘के एल भंडारी, आईएएस, एसपी उदयपुर.’’ खन्ना ने कहा कि उन्होंने आईएएस कैसे लिखा है. इस पर भंडारी ने अपनी गलती का एहसास कर के आईएएस को आईपीएस बना दिया. वहां से लौट कर मैं अपने पड़ोसी डीएसपी प्रवीण सरदाना के घर पर गपशप करने गए. वहां से बातें कर के शाम को 6 बजे घर लौटे और बातचीत करते रहे.

थोड़ी देर बाद डीएसपी सरदाना मेरे घर आए और मुझे अलग ले जा कर पूछा कि क्या मैं भंडारी को पर्सनली जानता था? मैं ने कहा कि मैं भंडारी को नहीं जानता था. इस पर सरदाना ने कहा कि उन्हें शक था कि भंडारी कोई पुलिस का अफसर था. खैर, मेरे साथ सरदाना, भंडारी के पास गए तो भंडारी कहने लगे कि क्या उन्हें कोई शक था? सरदाना ने कहा कि नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. और वे चले गए. थोड़ी देर बाद पुलिस की जीप आई जिस में डीएसपी सरदाना थे. वे घर में आए और कहा, ‘‘भंडारी साहब, आप को एसपी इंफाल ने बुलाया है. पंवार साहब, आप भी साथ चलें.’’ हम तीनों जीप में बैठ कर एसपी इंफाल के दफ्तर में पहुंच गए. बातचीत होती रही. शक का वातावरण देख कर भंडारी घबराते हुए कहने लगे, ‘‘आप को अगर शक है तो आप उदयपुर ट्रंककौल कर के पूछ लीजिए. मैं एसपी भंडारी ही हूं.’’

‘‘आप एसपी हैं तो आप का आईडैंटिटी कार्ड कहां है?’’ एसपी इंफाल ने पूछा. ‘‘कार्ड तो मेरी वरदी में था और वरदी मेरे सोने के पिप्स के साथ सूटकेस में से गायब हो गई,’’ भंडारी ने जवाब दिया. ‘‘हम लोगों ने आईपीएस औफिसरों की लिस्ट में आप का नाम ढूंढ़ा लेकिन आप का नाम नहीं मिला. हम कैसे मान लें कि आप एसपी उदयपुर हैं?’’ एसपी इंफाल ने पूछा.

‘‘मुझे नहीं मालूम, मेरा नाम क्यों नहीं है? लेकिन मैं एसपी उदयपुर हूं,’’ भंडारी ने जवाब दिया.

‘‘आप के पास कोई सुबूत तो होगा. आप की पर्सनल डायरी तो होगी?’’ एसपी इंफाल ने पूछा. मैं ने भंडारी की पर्सनल डायरी उन के पास देखी थी. वह मेरे घर की मेज पर उन के ब्रीफकेस के पास रखी थी. मैं ने एसपी इंफाल से कहा, ‘‘इन की डायरी मेरे घर पर टेबल पर पड़ी थी, मंगवाइए.’’ फौरन पुलिस का आदमी भेजा गया और वह डायरी ले कर आया. एसपी इंफाल ने डायरी देखी. उस डायरी में कहीं भी भंडारी नाम नहीं था और उस से कुछ पता नहीं चला. एसपी साहब ने भंडारी की डायरी मुझे दे दी. मैं ने उन की डायरी को उलटपलट कर देखा. अंतिम तारीख को ध्यान में रखते हुए डायरी के पन्ने को ध्यान से देखने लगा. उस पन्ने पर लिखा था, ‘फेयर फ्रौम कोलकाता, टू इंफाल-रु. 375’ मैं ने फेयर की स्पैलिंग देखी और भंडारी से पूछा, ‘‘क्या ‘फेयर फ्रौम कोलकाता, टू इंफाल’ अपनी डायरी में आप ने लिखा है?’’

भंडारी ने कहा, ‘‘हां, मैं ने लिखा है.’’ मैं डायरी का पन्ना एसपी इंफाल के सामने रख कर बोला, ‘‘भंडारी अगर आईपीएस औफिसर हैं, फेयर की स्पैंलिग को गलत नहीं लिख सकते.’’ एसपी इंफाल को पूरा विश्वास हो गया और उन्होंने भंडारी को डांट कर कहा, ‘‘आप एसपी नहीं, फरेबी हैं, झूठे हैं. सैल्फस्टाइल एसपी बने हुए हैं.’’

भंडारी फिर भी कहे जा रहा था, ‘‘मैं पक्का एसपी हूं, आप कहीं से पता लगाइए.’’ एसपी इंफाल ने डीएसपी सरदाना से कहा कि उन्हें अंदर ले जा कर पूछताछ करें. थोड़ी देर बाद भंडारी, सरदाना के औफिस में आए. सरदाना ने कहा कि भंडारी एसपी उदयपुर नहीं है. भंडारी ने भी कहा कि वह एसपी नहीं है. एसपी इंफाल ने भंडारी को हिरासत में ले लिया. उन्हें 6 महीने की कैद की सजा हो गई. पता चला भंडारी का धंधा हेराफेरी करना है. बड़ौदा की पुलिस उन का पीछा कर रही थी. वे भागतेभागते कोलकाता पहुंचे और इंफाल आ गए. 3 महीने की सजा भुगतने के बाद उन्हें बड़ौदा की पुलिस को सौंप दिया गया. इंफाल की जेल में 3 महीने रहे और मेरे 400 रुपए बड़ी मुश्किल से लौटाए. जोधपुर के लोगों से पता लगाया तो पता चला कि भंडारी आदतन ‘श्री 420’ थे. वे भीनमाल के सरकारी कालेज में झूठे सर्टिफिकेट दिखा कर कैमिस्ट्री के लैक्चरर (टैम्परेरी) बन गए और उन्होंने 3 महीने तक बिना पढ़ाए तनख्वाह उठाई. वे कक्षा 7वीं पढ़े हुए थे लेकिन अंगरेजी फर्राटे से बोलते थे और किसी भी बड़े अधिकारी की ऐक्ंिटग बड़े आत्मविश्वास से कर लेते थे. सुना है वे अभी तक यही धंधा करते हैं, पकड़े जाते हैं, जेल काट कर बाहर आ जाते हैं. उन्होंने ‘श्री 420’ का धंधा जो अपना रखा था.

स्वीकृति: एक बहू को कैसे मिली ससुराल में उसकी सही जगह

‘आजकल धरम तो रहा ही नहीं. जातबिरादरी जैसी बातें भी भूल गए. अब क्या बिना नहाएधोए नौकर चौके में घुसेंगे?’

इस पर विभू का स्वर ऊंचा हो गया था, ‘अम्मां, दोनों भाभियां मुझ से उम्र में बड़ी हैं, इसलिए उन के बारे में कुछ नहीं कहता पर मीता तो थोड़ाबहुत घरगृहस्थी के कामों में हाथ बंटा सकती है. कभी आप ने सोचा है, आप के लाड़- प्यार से वह कितनी बिगड़ती जा रही है. इसे भी तो दूसरे घर जाना है. क्या यह ठीक है कि घर की सभी औरतें हाथ पर हाथ धरे बैठी रहें और बेचारी नीरा ही घर के कामों में जुटी रहे?’

‘तो किस ने कहा है इसे नौकरी करने के लिए. घर में इतना कुछ है कि आने वाली सात पुश्तें खा सकती हैं?’

‘वैसे मां, है तो यह छोटे मुंह बड़ी बात पर हम भी मीता को इसीलिए पढ़ा रहे हैं न कि वह स्वावलंबी बने. अगर उस की ससुराल के लोग भी उस के साथ  वैसा ही सलूक करें जैसा आप लोग नीरा के साथ करते हैं तो कैसा लगेगा आप को?’

‘मीता की तुलना नीरा से करने का अधिकार किस ने दे दिया तुझे. वह किसी छोटे घर की बेटी नहीं है,’ बेटे के सधे हुए आग्रह के स्वर को तिरस्कार की पैनी धार से काटती हुई अम्मां चीखीं.

विभू उस के बाद एक पल भी नहीं रुके थे. स्तंभित नीरा को लगभग घसीटते हुए घर से चले गए थे.

बैंक से कर्ज ले कर नया घर बनवाया और एक नई गृहस्थी बसा ली दोनों ने. एक मारुति जेन गाड़ी भी किस्तों पर ले ली. लेकिन नीरा खुश नहीं थी. बारबार यही कहती, ‘मेरी वजह से तुम्हारा घर छूटा.’

विभू उसे समझाते, ‘जहां तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं वहां अपनी जगह बनाने के लिए क्यों परेशान होती हो?’

6 महीने बीत गए. प्रसव पीड़ा से छटपटाती नीरा अस्पताल पहुंची. ससुराल से कोई नहीं आया. सहकर्मी डाक्टरों ने देखभाल में कोई कमी नहीं रखी थी. मां, पापा और रोहित एक पल के लिए भी वहां से नहीं हटे थे. फिर भी नीरा के मन में एक कसक सी थी कि कितना अच्छा  होता अगर विभू के घर से भी कोई आता, उस के सिरहाने खड़ा होता.

नामकरण वाले दिन उमा दीदी अपने दोनों बेटों के साथ आई थीं. उम्र में वह विभू से 10 साल बड़ी थीं फिर भी वह नीरा से हमउम्र सहेलियों की तरह ही मिलीं. पर जब अम्मां, भाभीभैया में से कोई नहीं आया तो नीरा की रुलाई का बांध फूट पड़ा. वह उमा दीदी के कंधे पर सिर रख बोली, ‘दीदी? मैं तो सोचती थी बच्चे के आने  के बाद सारी दूरियां अपनेआप मिटती चली जाएंगी पर ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ.’

सवा महीने बाद मुन्ने को ले कर उसी चौखट पर पहुंची नीरा, जहां से कभी अपमानित हो कर वह लौटी थी. विभू ने उसे रोकना चाहा पर वह नहीं मानी, ‘देरसवेर, बेटे के लिए तो मोह जाग सकता है. बहू तो पराए घर की होती है. उसे तो स्वयं ही परिवार में जगह बनानी होती है.’ यही विचार था मन में.

वह ससुराल पहुंची तो अम्मां घर  पर नहीं थीं. दरवाजे पर ही बड़ी भाभी की 6 साल की बिटिया सोनाली और  ननद मीता मिल गईं. देखते ही अपरिचय के भाव तिर आए थे. मीता तो अंदर चली गई, सोनाली वहीं खड़ी नीरा का चेहरा ताकने लगी.

‘पहचाना नहीं क्या, सोनू. मैं तुम्हारी चाची… नीरा.’

नाम सुनते ही वह डर कर और पीछे हट गई तो उस ने स्वयं मुन्ने को पलंग पर लिटा दिया और सोनाली को पुकारा, ‘नन्हे मुन्ने से नहीं खेलोगी?’

सोनाली अब सहज हो कर मुसकराने लगी थी. मुन्ने को सोनाली के पास लिटा कर नीरा पूरे घर का चक्कर लगा आई. पूरा घर बेतरतीब पड़ा था. भाभी पलंग पर लेटी कराह रही थीं. उन्हें तेज बुखार था. नीरा ने केमिस्ट को फोन कर दवाइयां मंगवाईं. फ्रिज से ठंडा पानी निकाल कर भाभी के माथे पर ठंडी पट्टियां रखने लगी. कुछ देर बाद भाभी का बुखार उतरने लगा. नीरा इस बीच चौके में जा कर दलिया बना लाई. घर के अन्य सदस्यों के लिए भी दालसब्जी छौंक दी. अब भी उसे याद था, महाराजिन के हाथ का पका खाना अम्मां नहीं खाती हैं.

12 बज चुके थे. भाभी की तबीयत थोड़ी सुधरने लगी थी. अम्मां अभी तक लौटी नहीं थीं. नीरा ने डोंगे में दलिया पलट कर उस में दूध डाला और भाभी के पास जा बैठी. भाभी की आंखों में स्नेह छलक आया था. मीता अब भी तुनकी हुई थी. नीरा ने कुरेदकुरेद कर उस की परीक्षा की तैयारी के बारे में पूछा तो वह सहज हो उठी  थी. सोनाली, मुन्ने के  साथ खेल रही थी. तनाव के बादल छंटते जा रहे थे. इतने में अम्मां आती दिखाई दीं.

अम्मां की बेरुखी अब भी पहले की तरह कायम थी. उन्होंने एक उड़ती सी नजर मुन्ने और नीरा पर डाली. नीरा ने खुद उन की गोद में मुन्ने को डाल दिया था. उसे अब भी विश्वास था कि स्नेह  की आंच से, मन  में  ठोस  हुई  भावनाओं को पिघलाया जा सकता है.

‘पोते को आशीर्वाद नहीं देंगी?’ उस ने अम्मां की आंखों में झांका.

उन्होंने सोने का सिक्का पोते की हथेली पर रख तो दिया पर वैसा अपनापन अम्मां ने नहीं दिखाया जैसा नीरा चाहती थी. घर लौटने के बाद भी नीरा बराबर बड़ी भाभी का हाल पूछती रही. परहेज और दवा के बारे में भी बताती रही. उस की सद्भावना के आगे बड़ी भाभी नतमस्तक हो उठी थीं. फोन पर ही सिसक उठीं और बोलीं, ‘नीरा हमें माफ कर दो. बड़ी ही बदसलूकी की मैं ने तुम से.’

भाभी बात कर ही रही थीं कि तभी मीता ने फोन छीन लिया था.

‘भाभी, मुन्ना कैसा है? भैया कैसे हैं?’

‘वहीं बैठीबैठी, सब के बारे में पूछती रहोगी या घर आ कर मिलोगी भी?’

उस दिन के बाद से मीता और सोनाली जब भी समय मिलता, मुन्ने से खेलने पहुंच जातीं. भाभी फोन पर ही मुन्ने की परवरिश की हिदायतें देती रहतीं. कभीकभी अम्मां से छिप कर, मुन्ने के लिए सौंफमिश्री की भुगनी और नीरा के लिए पिस्तेबादाम की कतली भी बच्चों के हाथ भिजवा देतीं.

धीरेधीरे विभू के परिजनों से नीरा की दूरियां सिमटने लगी थीं, पर उसे तो अम्मां के पास पहुंचना था. परिवार की धुरी तो वही थीं.

सचानक अम्मां की कराहट ने नीरा को अतीत के झरोखे से खींच कर वर्तमान में ला पटका. सामने ई.सी.जी. मशीन का मानिटर उन के हृदय की धड़कनों का संकेत दे रहा था. एकाएक अम्मां की सांस फूलने लगी. शरीर पसीनेपसीने हो गया. घर के सभी सदस्य घबरा गए थे. मीता जोरजोर से रोने लगी. तीनों भाई उसे सहारा दे रहे थे. मझली भाभी भी 2 दिन पहले ही पहुंची थीं.

डाक्टर ने नीरा को कमरे में बुला कर बताया, ‘‘स्थिति नाजुक है. फौरन आपरेशन करना पड़ेगा. पैसे जमा करवा दीजिए.’’

अगले कुछ पलों में नीरा डाक्टर शेरावत के साथ आपरेशन थिएटर में थी. विभू दोनों भाइयों के साथ बाहर चहलकदमी कर रहे थे. बड़ी भाभी मुन्ने को गोद में लिए हैरानपरेशान सी इधरउधर डोल रही थीं. मां के दूध पर पलने वाला बच्चा तीन घंटे से सिसक रहा था.

कुछ ही देर में तीनों भाई, दोनों भाभियां, उमा दीदी, मीता बाहर लगे पेड़ की छाया में बैठ गईं. भाभी गहरे मौन सागर में डूब सी गईं. मीता उन्हें सचेत करती हुई बोली, ‘‘क्या सोच रही हो, भाभी?’’

लंबी सांस ले कर भाभी बोलीं, ‘‘कहने को तो अम्मां की 3 बहुएं हैं, पर हर जगह, हर समय नीरा अपनी जगह खुद बना लेती है. बेचारी, बिना रुके, हर वक्त दौड़भाग करती रहती है. फिर भी उठतेबैठते अम्मां उसे कोसती रहती हैं. सच, हम सब ने उस के बारे में कितनी गलत धारणा बनाई हुई थी.’

आपरेशन थिएटर से जब अम्मां को स्पेशल वार्ड में लाया गया तब तक सांझ घिर आई थी. नीरा मुन्ने को ले कर घर चली गई थी. भूख से बिलबिलाता बच्चा रोरो कर हलकान हो उठा था.

संक्रमण की वजह से किसी को भी अम्मां से मिलने की अनुमति नहीं थी. गहरी नींद के नशे में भी, उन के जागते दिमाग में विचारों के बादल उमड़घुमड़ रहे थे. अम्मां ने लड़खड़ाती आवाज में नीरा का नाम लिया तो सभी उन के इर्दगिर्द सिमट आए थे.

टूटते स्वर में वह बोलीं, ‘‘नीरा कहां है?’’ कमजोरी से फिर आंखें मुंदने लगी थीं.

अगले दिन थोड़ी हालत सुधरी तो उन्होंने विभू से कहा, ‘‘मैं नीरा से मिलना चाहती हूं. मैं ने उस का बड़ा ही अनादर किया,’’ और उन की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे, ‘‘द्वार पर आई सुहागिन का निरादर किया,’’ अम्मां दुखी मन से कहने लगीं, ‘‘मैं ने तो उसे आशीर्वाद तक नहीं दिया और उस ने मुझे जीवनदान दे दिया.’’

‘‘मां की बातों का उस की संतान कभी बुरा नहीं मानती,’’ विभू बोला, ‘‘इन 3 सालों में मुझ से ज्यादा तो वह तुम्हारे लिए छटपटाती रही है, अम्मां.’’

उस रात अम्मां को बहुत अच्छी नींद आई. सुबह की किरण के साथ जब कमरे का परदा सरका तो पूरा कमरा, गुलाब की सुगंध से महक उठा. खिड़की के परदे सरका कर नीरा ने पूछा, ‘‘अम्मां, अब कैसी हैं?’’

आंखें मूंद कर उन्होंने गरदन को थोड़ा हिलाया. फिर इशारे से उसे अपने पास आ कर बैठने को कहा. दिन के उजाले में नीरा के ताजगी भरे चेहरे को अम्मां अपलक निहारती रह गईं, ‘सुंदर तो तू पहले से ही थी. मां बन कर और भी निखर गई.’

तभी मझली भाभी मुन्ने को ले कर कमरे में आईं और बोलीं, ‘‘दादी को प्रणाम करो.’’

अम्मां उसे आशीर्वाद देती रहीं, सहलाती रहीं, पुचकारती रहीं.

‘‘क्या नाम रखा है?’’

‘‘ऐसे कैसे नाम रखते, अम्मां. वह तो आप को ही रखना है,’’ नीरा ने आदर भरे भाव से कहा तो अम्मां खुद को अपराधिन समझने लगीं. हृदय की पीड़ा के तिनकों को आंसुओं से बुहारते हुए वह दृढ़ स्वर में बोलीं.

‘‘इस रविवार को मुन्ने का नामकरण समारोह हम सब मिल कर अपने घर पर मनाएंगे. जिस चौखट से तुम अपमानित हो कर निकली थीं वहीं पर आशीष पाने के लिए लौटोगी.’’

अम्मां की आंखें नम हो उठीं. न जाने कब आंसू के दो कतरे टपक कर नीरा की हथेली पर टपके आंसुओं से मिल गए. नीरा को महसूस हुआ कि ससुराल की देहरी पर उस ने आज पहला कदम रखा है.

किसकी कितनी गलती : नेहा बार-बार क्या सवाल पूछ रही थी

नेहा को अस्पताल में भरती हुए 3 दिन हो चुके थे. वह घर जाने के लिए परेशान थी. बारबार वह मम्मीपापा से एक ही सवाल पूछ रही थी, ‘‘डाक्टर अंकल मुझे कब डिस्चार्ज करेंगे? मेरी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है. 15 सितंबर से मेरे इंटरनल शुरू हो जाएंगे. अभी मैं ने तैयारी भी नहीं की है. अस्पताल में भरती होने की वजह से मैं पूजा के साथ खेल भी नहीं पा रही हूं. मेरा मन उस के साथ खेलने को कर रहा है. यहां मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता, इसलिए मुझे जल्दी से घर ले चलो.’’

नेहा की इन बातों का कोई जवाब उस के मम्मीपापा के पास नहीं था. मम्मीपापा को चुप देख कर उस ने पूछा, ‘‘मम्मी पूजा आ गई क्या?’’

‘‘नहीं बेटा, अभी तो 7 बजने में 10 मिनट बाकी हैं, वह तो 7 बजे के बाद आती है. आप आराम से नाश्ता कर लीजिए.’’

‘‘जी मम्मी.’’ नेहा ने बडे़ ही इत्मीनान से कहा.

नेहा इंदौर में जीजीआईसी में 6वीं में पढ़ती थी. वह अपनी सहेली पूजा के साथ स्कूल जाती थी. पूजा उस के पड़ोस में ही रहती थी. दोनों में गहरी दोस्ती थी. कभी नेहा पूजा के घर जा कर होमवर्क करती तो कभी पूजा उस के घर आ जाती. होमवर्क के बाद दोनों साथसाथ खेलतीं.

उस दिन जब हिंदी के टीचर विनोद प्रसाद पढ़ा रहे थे तो उन की नजर नेहा पर चली गई. वह चुपचाप सिर झुकाए बैठी थी. उन्हें लगा कि नेहा को कोई परेशानी है तो उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है नेहा?’’

विनोद प्रसाद के इस सवाल पर नेहा चौंकी. उस ने धीरे से कहा, ‘‘कुछ नहीं सर, थोड़ा पेट में दर्द है.’’

‘‘नेहा बेटा… आप को पहले बताना चाहिए था. अभी आप के लिए औफिस से दवा मंगवाता हूं.’’

विनोद प्रसाद ने औफिस से दवा मंगा कर खिलाई तो नेहा को थोड़ा आराम मिल गया. दोपहर एक बजे छुट्टी हुई तो वह पूजा के साथ घर आ गई. घर आ कर उस ने स्कूल बैग एक ओर फेंका और सोफे पर लेट गई. उस की मम्मी राधिका ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, कपड़े बदल कर हाथमुंह धो लो, उस के बाद खाना खा कर आराम कर लेना.’’

‘‘मुझे भूख नहीं है मम्मी. अभी कुछ भी खाने का मन नहीं हो रहा है.’’ नेहा ने कहा.

‘‘बेटा, थोड़ा ही खा लो. आज मैं ने आप की पसंद का खाना बनाया है.’’

‘‘कहा न मम्मी मुझे भूख नहीं है, प्लीज मम्मी जिद मत कीजिए. मेरे पेट में दर्द हो रहा है, इसलिए खाने का मन नहीं हो रहा है.’’

‘‘बेटा, जब आप के पेट में दर्द हो रहा है तो आप को स्कूल नहीं जाना चाहिए था. पापा आते ही होंगे, उन से आप के लिए दवा मंगवाती हूं.’’

‘‘मम्मी, स्कूल में विनोद सर ने दवा दी थी. दवा खाने के बाद थोड़ा आराम मिल गया था. लेकिन अभी फिर दर्द होने लगा है. मम्मी मेरे पेट में कई दिनों से इसी तरह रुकरुक कर दर्द हो रहा है. कभी हल्का दर्द होता है तो कभी अचानक बहुत तेज दर्द होने लगता है.’’ नेहा ने पेट दबा कर कहा.

नेहा अपनी बात कह ही रही थी कि उस के पापा राकेश उस के पास आ कर खड़े हो गए, ‘‘हैलो नेहा बेटा, मेरी बच्ची कैसी है?’’

‘‘लो पापा का नाम लिया और वह आ गए.’’ राधिका ने नेहा के बाल सहलाते हुए कहा.

‘‘हैलो पापा.’’ नेहा ने धीमी आवाज में पापा का स्वागत किया.

‘‘राधिका नेहा को कुछ हुआ है क्या, जो इतनी सुस्त लग रही है? परेशान होने की कोई बात नहीं है, इस के पेट में थोड़ा दर्द है.’’

राकेश ने नेहा को गोद में बिठा कर प्यार से उस की नाक पकड़ कर हिलाई तो कुछ कहने के बजाय नेहा ने मुसकरा दिया. रात को होमवर्क करने के बाद वह सिर्फ एक गिलास दूध पी कर सो गई.

अगले दिन सुबह नेहा स्कूल जाने के लिए नहीं उठ सकी. राधिका उसे जगाने आई तो वह उदास लेटी छत को एकटक ताक रही थी. नेहा के मासूम चेहरे पर आंखों से बहे आंसू सूख कर अपने वजूद की गवाही दे रहे थे. मम्मी कब उस के पास आ कर बैठ गईं, नेहा को पता ही नहीं चला था.

राधिका ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए उस के मासूम चेहरे को ध्यान से देखा. उन्हें लगा कि नेहा कुछ ज्यादा ही परेशान है तो उन्होंने पूछा, ‘‘बेटा मम्मा को बताओ ना क्या बात है? आप ने होमवर्क नहीं किया क्या या फिर स्कूल के टीचर आप को डांटते हैं?’’

‘‘मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं अपना सारा काम कम्पलीट रखती हूं. इसलिए मुझे कोई टीचर नहीं डांटता.’’ नेहा ने दबी आवाज में कहा.

‘‘तो फिर क्या बात है बेटा?’’

‘‘मम्मी, कुछ दिनों से मेरे पेट में दर्द रहता है. मेरा पेट भी पहले से बड़ा हो गया है.’’

राधिका ने नेहा की फ्रौक को ऊपर की ओर खिसका कर उस के पैर को गौर से देखा तो उन्हें लगा कि शायद नेहा के पेट में सूजन आ गई है. उन्होंने यह बात राकेश को बताई तो उन्होंने पत्नी को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘चलो, आज इसे डाक्टर को दिखा देते हैं. लापरवाही करना ठीक नहीं है. राधिका, तुम इसे नाश्ता कराओ, तब तक मैं नहाधो कर तैयार हो जाता हूं.’’

ठीक 11 बजे राकेश राधिका और नेहा को ले कर अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने नंबर लिया और डा. राहुल जैन के चैम्बर के सामने पड़े सोफे पर बैठ गए. नंबर आने पर वह नेहा को ले कर अंदर गए, जबकि राधिका बाहर ही बैठी रही. डा. राहुल जैन ने नेहा से कई सवाल किए. इस के बाद उन्होंने कहा, ‘‘पहले आप बच्ची का सोनोग्राफी करा लीजिए. उस के बाद जो रिपोर्ट आएगी, उस के अनुसार ही इलाज होगा.’’

डाक्टर की पर्ची और नेहा को साथ ले कर राकेश अस्पताल में उस ओर बढ़ गए, जिधर सोनोग्राफी होती थी.

सोनोग्राफी की रिपोर्ट 2 घंटे बाद मिल गई. राकेश राधिका और नेहा को सोफे पर बैठा कर अकेले ही डाक्टर की केबिन में दाखिल हो गए. रिपोर्ट देख कर डा. जैन सन्न रह गए. उन के चेहरे से लगा, जैसे रिपोर्ट पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ हो. उन्होंने एक बार फिर रिपोर्ट को गौर से देखा. उस के बाद दबे स्वर में कहा, ‘‘मि. राकेश, नेहा इज प्रेग्नेंट.’’

यह सुन कर राकेश अवाक रह गए. वह जिस तरह बैठे थे, उसी तरह बैठे रह गए. मानो कुछ सुना ही न हो. वह डा. जैन को बिना पलक झपकाए देखते रह गए. जबकि उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. उन की आंखों के सामने अंधेरा छा गया था.

‘‘मिस्टर राकेश, खुद को संभालिए.’’ डा. जैन ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा.

राकेश पसीने से पूरी तरह तर हो चुके थे. एकबारगी उठ कर बाहर आ गए. उन का हाल देख कर राधिका सहम उठी. डरतेडरते उन्होंने पूछा, ‘‘रिपोर्ट देख कर क्या बताया डाक्टर ने.’’

राकेश किस तरह बताते कि उन की कली जैसी बेटी मां बनने वाली है. वह निढाल हो कर सोफे पर बैठ गए.

‘‘क्या बात है जी?’’ राधिका ने बेचैनी से पूछा, ‘‘आप बताइए न, क्या हुआ है मेरी बच्ची को, आप बताते क्यों नहीं हैं?’’

राकेश की खामोशी राधिका के दिल में नश्तर की तरह चुभ रही थी. पत्नी को बेचैन देख कर राकेश ने रुंधी आवाज में कहा, ‘‘घर चल कर बताता हूं.’’

2 किलोमीटर का सफर पूरा होने में जैसे युग लग गया. इस बीच राधिका के मन में न जाने कितने खयाल आए. तरहतरह की आशंकाएं उसे परेशान करती रहीं. घर पहुंच कर राकेश ने नेहा को बिस्तर पर लिटा कर आराम करने को कहा.

लेटने के बाद नेहा ने पूछा, ‘‘पापा, डाक्टर अंकल ने क्या बताया, मेरे पेट का दर्द कब ठीक होगा? मेरे टेस्ट होने वाले हैं. आप डाक्टर अंकल से कहिए कि मुझे जल्दी से ठीक कर दें, वरना पूजा के नंबर मुझ से ज्यादा आ जाएंगे.’’

राकेश ने नेहा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, आप जल्दी ठीक हो जाओगी. घबराने की कोई बात नहीं है.’’

राधिका बड़ी बेसब्री से राकेश का इंतजार कर रही थी. जैसे ही राकेश उन के पास आए, उन्होंने बेचैनी से पूछा, ‘‘डा. साहब ने क्या बताया है, क्या हुआ है मेरी बच्ची को?’’

राधिका की बांह पकड़ कर राकेश ने कहा, ‘‘आप को किस मुंह से अपनी बरबादी की कहानी सुनाऊं. हम लोग लुट गए राधिका. बर्बाद हो गए. हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. डाक्टर ने बताया है कि नेहा 6 महीने की गर्भवती है.’’

राकेश का इतना कहना था कि राधिका को ऐसा लगा कि सब कुछ घूम रहा है. आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा है. वह गिरी और बेहोश हो गई.

राकेश उस के मुंह पर पानी के छींटे मारते हुए उसे होश में लाने की कोशिश करने लगे. कभी वह उन का मुंह पकड़ कर हिलाते तो कभी कहते, ‘‘उठो राधिका, उठो खुद को संभालो. वरना नेहा का क्या होगा?’’

कुछ देर में राधिका उठी और पति के गले लग कर फफकफफक कर रोने लगी, पतिपत्नी की समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हुआ, किस ने नेहा के साथ यह गंदा काम किया? रोतेरोते राधिका ने कहा, ‘‘हमारी बेटी के साथ यह नीच हरकत किस ने की, किस ने मासूम कली को बेरहमी से मसल दिया? उस कमीने को हमारी मासूम बेटी पर जरा भी तरस नहीं आया. उस ने हमें समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

इस के बाद आंचल से आंखें साफ कर के राधिका नेहा के पास आ गई. प्यार से उस के सिर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटी नेहा, अब तबीयत कैसी है?’’

‘‘मम्मी अब थोड़ा ठीक है, लेकिन बीचबीच में दर्द होने लगता है.’’ नेहा ने मासूमियत से कहा.

‘‘डाक्टर अंकल ने कहा है कि नेहा बहुत जल्दी ठीक हो जाएगी.’’ राकेश ने दिल पर पत्थर रख कर मुश्किल से बेटी को समझाया.

पतिपत्नी में से किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि नेहा से किस तरह से इस मुद्दे पर बात करें. लेकिन बात तो करनी ही थी. आखिर राधिका ने नेहा से बड़े प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आप के साथ स्कूल में किसी ने गलत काम किया है क्या?’’

‘‘नहीं मम्मी, किसी ने मेरे साथ कोई गलत काम नहीं किया है.’’

एक मांबाप के लिए शायद दुनिया में सब से बुरा सवाल यही होगा. खैर, काफी समझानेबुझाने पर नेहा ने बताया, ‘‘पवन भैया मेरे साथ गंदा काम करते थे.’’

पवन नेहा की बुआ यानी राकेश की बहन का बेटा था. इसलिए उस के घर आनेजाने में किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं थी. नेहा के इस जवाब से पतिपत्नी सिर थाम कर बैठ गए. घर का भेदी लंका ढाए. नेहा को गले लगा कर राधिका ने उस के कान के पास अपना मुंह ले जा कर लगभग फुसफुसाते हुए पूछा, ‘‘बेटा, आप के साथ पवन कब से यह गंदा काम कर रहा था? आप ने मम्मीपापा को यह बात पहले क्यों नहीं बताई.’’

नेहा के आंसू नाजुक गालों से होते हुए राधिका के कंधे को भिगो रहे थे. उस ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मम्मी, आप को कैसे बताती. पवन भैया मुझे मार देते. वह मेरे साथ गलत काम करते थे. उस के बाद कहते थे कि किसी को कुछ बताया तो तेरा गला दबा कर जान ले लूंगा.’’

नेहा अभी भी उस वहशी को भइया कह रही थी. राधिका ने पूछा, ‘‘बेटा, आप के साथ यह गंदा काम कब से हो रहा था?’’

‘‘मम्मी जब आप घर का सामान लेने बाजार जाती थीं, उसी बीच भैया आ कर मेरे साथ जबरदस्ती करते थे. उस के बाद चौकलेट देते. मैं चौकलेट लेने से मना करती तो मुझे मारने की धमकी देते. किसी से कुछ बताने को भी मना करते थे. मम्मी, मैं बहुत डर गई थी, इसलिए आप लोगों को कुछ नहीं बता पाई.’’

‘‘कोई बात नहीं बेटा.’’ राकेश ने खुद को झूठी दिलासा देते हुए कहा.

‘‘सुनिए जी, अब क्या किया जाए?’’ राधिका ने पूछा.

‘‘अब क्या होगा. कुछ भी हो मैं इस वहशी को जिंदा नहीं छोड़ूंगा, इस के लिए चाहे मुझे जेल ही क्यों न जाना पड़े.’’ राकेश ने कहा.

‘‘नहीं, पहले आप नेहा के बारे में सोचिए. चलो डा. जैन को एक बार और दिखाएं और नेहा का अबौर्शन कराना जरूरी है. उस के बाद आगे की काररवाई करेंगे.’’

‘‘यह भी ठीक रहेगा,’’ राकेश ने मरजी के विपरीत हामी भरी.

इस के बाद अस्पताल जा कर डा. जैन से नेहा का गर्भ गिराने के लिए कहा तो डा. जैन ने कहा, ‘‘देखिए, मिस्टर राकेश, यह पुलिस केस है, इसलिए पहले आप एफआईआर कराएं, उस के बाद ही कुछ हो सकता है.’’

‘‘डाक्टर साहब, ऐसा अत्याचार मुझ पर मत कीजिए. मैं वैसे ही बहुत परेशान हूं, अब आप भी परेशान न करें.’’ राकेश ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘देखिए, आप समझने की कोशिश कीजिए राकेशजी. आप की बेटी 6 महीने की गर्भवती है. इसलिए उस का अबौर्शन नहीं किया जा सकता. उस की जान को खतरा हो सकता है.’’

‘‘डाक्टर साहब, अब हम इस पाप का क्या करें. हम तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’

‘‘राकेशजी, आप समझने की कोशिश कीजिए. ऐसा करने से नेहा की जान जा सकती है. फिर यह गैरकानूनी भी है, सो आई एम सौरी.’’ डा. राहुल जैन ने हाथ खड़े कर दिए.

नेहा 3 दिनों से अस्पताल में भरती थी. वह मम्मीपापा से बारबार पूछ रही थी कि अस्पताल से उसे कब छुट्टी मिलेगी. उस की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है. 15 तारीख से उस के इंटरनल शुरू होने वाले हैं. जबकि उस ने अभी तैयारी भी नहीं की है. उसे पूजा के साथ खेलना है.

राकेश ने कोर्ट से नेहा का गर्भपात कराने की इजाजत मांगी, लेकिन फिलहाल अभी उन्हें इस में कामयाबी नहीं मिली है. पवन के खिलाफ थाने में विभिन्न धाराओं के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करा दिया गया है, उस की धरपकड़ के लिए पुलिस जगहजगह छापे मार रही है. लेकिन अभी वह पकड़ा नहीं जा सका है. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी के लिए उस का फोन नंबर ही नहीं, उस के दोस्तों, रिश्तेदारों और घर वालों के फोन नंबर सर्विलांस पर लगा रखे हैं.

अब देखना यह है कि क्या कोर्ट राकेश की फरियाद पर नेहा का गर्भपात कराने की इजाजत देता है. इस के लिए कोर्ट पहले डाक्टरों के पैनल से रिपोर्ट मांगेगा कि गर्भपात कराने से 12 साल की बच्ची को कोई नुकसान तो नहीं पहुंचेगा. इस रिपोर्ट के बाद कोर्ट कोई फैसला देगा. लेकिन फैसला आने तक राकेश और राधिका के लिए एकएक पल गुजारना वर्षों गुजारने के बराबर है, जो उन्हें हर एक पल बर्बादी का अहसास दिलाता है.

राधिका ने राकेश से उलाहना देते हुए कहा, ‘‘मैं आप से हमेशा कहती थी कि पवन पर आंख मूंद कर के इतना भरोसा मत करो, लेकिन आप को उस पर बड़ा नाज था. आप हमेशा मेरी बातों को नजरअंदाज करते थे.’’

‘‘राधिका अब बस भी करो, मैं वैसे ही बहुत परेशान हूं, मुझे क्या पता था कि वह मेरे भरोसे का इतना बुरा सिला देगा. चलो, मैं तुम्हारी बात मानता हूं कि अगर पवन को इतनी छूट न देता तो आज हमें यह दिन देखना न पड़ता.’’

इस के बाद एक लंबी सांस ले कर राकेश ने आगे कहा, ‘‘चलो, मान लिया मेरी गलती से यह हुआ, लेकिन तुम्हारी भी गलती कम नहीं है. नेहा को प्रैग्नेंट हुए आज पूरे 6 महीने हो गए हैं और तुम्हें इस की जरा भी भनक नहीं लग सकी. राधिका, मैं तो पूरा दिन औफिस में रहता हूं, लेकिन तुम भी तो नेहा का ध्यान नहीं रख पाईं. उस दरिंदे के भरोसे नेहा को अकेली छोड़ कर क्यों बाजार चली जाती थीं? तुम्हें नेहा से हर तरह की पूछताछ करनी चाहिए थी. तुम उस की मां होेने के साथ, उस की सखीसहेली भी हो, सुनो राधिका, होनी को कोई नहीं टाल सकता, लेकिन सावधानी जरूरी है. हर किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए चाहे कोई कितना ही सगा रिश्तेदार क्यों न हो.’’

घर वापसी- कहां गायब हो रही थीं नाबालिग लड़कियां?

नैशनल हाईवे 33 पटना को रांची से जोड़ता है. रांची से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर बसा एक गांव है सिकदिरी. इसी गांव में फूलन रहता था. उस के परिवार में पत्नी छमिया के अलावा 3 बच्चे थे. बड़ा लड़का पूरन और उस के बाद 2 बेटियां रीमा और सीमा.

फूलन के कुछ खेत थे. खेतों से तो परिवार का गुजारा मुश्किल था, इसलिए वह कुछ पैसा मजदूरी से कमा लेता था. कुछ कमाई उस की पत्नी छमिया की भी थी. वह भी कभी दूसरों के खेतों में मजदूरी करती, तो कभी अमीर लोगों के यहां बरतन मांजने का काम करती थी.

फूलन के तीनों बच्चे गांव के स्कूल में पढ़ते थे. बड़े बेटे पूरन का मन पढ़ने में नहीं लगता था. वह मिडिल पास कर के दिल्ली चला गया था. पड़ोसी गांव का एक आदमी उसे नौकरी का लालच दे कर अपने साथ ले गया था.

पूरन वहां छोटामोटा पार्टटाइम काम करता था. कभी स्कूटर मेकैनिक के साथ हैल्पर, तो कभी ट्रक ड्राइवर के साथ  क्लीनर का काम, पर इस काम में पूरन का मन लग गया था. ट्रक के साथ नएनए शहर घूमने को जो मिलता था.

इस बीच एक बार पूरन गांव भी आया था और घर में कुछ पैसे और एक मोबाइल फोन भी दे गया था.

ट्रक ड्राइवर अपना दिल बहलाने के लिए कभीकभी रंगरलियां भी मनाते थे, तो एकाध बार पूरन को भी मौका मिल जाता था. इस तरह धीरेधीरे वह बुरी संगत में फंस गया था.

इधर गांव में रीमा स्कूल में पढ़ रही थी. अपनी क्लास में अच्छे नंबर लाती थी. वह अब 10वीं जमात में पहुंच गई थी. उस की छोटी बहन सीमा भी उसी स्कूल में 7वीं जमात में थी.

इधर सिकदिरी और आसपास  के गांवों से कुछ नाबालिग लड़कियां गायब होने लगी थीं. गांव के ही कुछ मर्द और औरतें ऐसी लड़कियों को नौकरी का लालच दे कर दिल्ली, चंडीगढ़ वगैरह शहरों में ले जाते थे.

शुरू में तो लड़कियों के मातापिता को कुछ रुपए एडवांस में पकड़ा देते थे, पर बाद में कुछ महीने मनीऔर्डर भी आता था, पर उस के बाद उन का कुछ अतापता नहीं रहता था.

इधर शहर ला कर इन लड़कियों से बहुत कम पैसे में घर की नौकरानी बना कर उन का शोषण होता था. उन को ठीक से खानापीना, कपड़ेलत्ते भी नहीं मिलते थे. कुछ लड़कियों को जबरन देह धंधे में भेज दिया जाता था.

इन लोगों का एक बड़ा रैकेट था.  पूरन भी इस रैकेट में शामिल हो गया था. एक दिन अचानक गांव से एक लड़की गायब हो गई, पर इस बार उस के मातापिता को कोई रकम नहीं मिली और न ही किसी ने कहा कि उसे नौकरी के लिए शहर ले जाया गया है.

इस घटना के कुछ दिन बाद पूरन के पिता फूलन को फोन आया कि गायब हुई वह लड़की दिल्ली में देखी गई है.

2 दिन बाद फूलन को फिर फोन आया. उस ने कहा कि तुम्हारा बेटा पूरन आजकल लड़कियों का दलाल बन गया है. उसे इस धंधे से जल्दी ही निकालो, नहीं तो बड़ी मुसीबत में फंसेगा.

यह सुन कर फूलन का सारा परिवार सकते में आ गया था. बड़ी बेटी रीमा ने सोचा कि इस उम्र में पिताजी से कुछ नहीं हो सकता, उसे खुद ही कुछ उपाय सोचना होगा.

रीमा ने अपने मातापिता को समझाया कि वह दिल्ली जा कर भाई को वापस लाने की पूरी कोशिश करेगी. चंद दिनों के अंदर रीमा रांची से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली पहुंच गई थी. वह वहां अपने इलाके के एक नेता से मिली और सारी बात बताई.

नेताजी को पूरन की जानकारी उन के ड्राइवर ने दे रखी थी. वह ड्राइवर एक दिन नेताजी के किसी दोस्त को होटल छोड़ने गया था, तो वहां पूरन को किसी लड़की के साथ देखा था.

ड्राइवर भी पड़ोस के गांव से था, इसलिए वह पूरन को जानता था.

ड्राइवर ने रीमा से कहा, ‘‘मैं ने ही तुम्हारे घर पर फोन किया था. तुम घबराओ नहीं. तुम्हारा भाई जल्दी ही मिल जाएगा.

‘‘मैं कुछ होटलों और ऐसी जगहों को जानता हूं, जहां इस तरह के लोग मिलते हैं. मैं जैसा कहता हूं, वैसा करो.’’

रीमा बोली, ‘‘ठीक है, मैं वैसा ही करूंगी. पर मुझे करना क्या होगा?’’

‘‘वह मैं समय आने पर बता दूंगा. तुम साहब को बोलो कि यहां का एक एसपी भी हमारे गांव का है. जरूरत पड़ने पर वह तुम्हारी मदद करे.

‘‘वैसे, मैं पूरी कोशिश करूंगा कि पुलिस की नजर में आने के पहले ही तुम अपने भाई को इस गंदे धंधे से निकाल कर अपने गांव चली जाओ.’’

इधर ड्राइवर ने भी काफी मशक्कत के बाद पूरन का ठिकाना ढूंढ़ लिया था. वह पूरन से बोला, ‘‘एक नईनवेली लड़की आई है. लगता है, वह तुम्हारे काम आएगी.’’

पूरन ने कहा, ‘‘तुम मुझे उस लड़की से मिलाओ.’’

ड्राइवर ने शाम को पूरन को एक जगह मिलने को कहा, इधर ड्राइवर रीमा को बुरका पहना कर शाम को उसी जगह ले गया.

चूंकि रीमा बुरके में थी, इसलिए पूरन उसे पहचान न सका था. ड्राइवर वहां से हट कर दूर से ही सारा नजारा देख रहा था.

पूरन ने रीमा से पूछा, ‘‘तो तुम मुसलिम हो?’’

‘‘हां, तो क्या मैं तुम्हारे काम की नहीं?’’ रीमा ने पूछा.

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मेरे काम में कोई जातपांत, धर्म नहीं पूछता. पर तुम अपना चेहरा तो दिखाओ. इस से मुझे तुम्हारी उम्र और खूबसूरती का भी अंदाजा लग जाएगा.’’

‘‘ठीक है, लो देखो,’’ कह कर रीमा ने चेहरे से नकाब हटाया. उसे देखते ही पूरन के होश उड़ गए.

रीमा ने भाई पूरन से कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती, लड़कियों की दलाली करते हो. वे भी तो किसी की बहन होगी…’’

रीमा ने कहा, ‘‘तुम्हें पता है कि अगले हफ्ते ‘सरहुल’ का त्योहार है. पहले तुम इस त्योहार को दोस्तों के साथ खूब मौजमस्ती से मनाते थे. इस बार तुम्हारी घर वापसी पर हम सब मिल कर ‘सरहुल’ का त्योहार मनाएंगे.’’

तब तक ड्राइवर भी पास आ गया था. रीमा ने जब अपने गांव से लापता लड़की के बारे में पूछा, तो उस ने कहा कि उस में उस का कोई हाथ नहीं है. लेकिन वह लड़की एक घर में नौकरानी का काम कर रही है. ड्राइवर और पूरन के साथ जा कर रीमा ने उस लड़की को भी बचाया.

रीमा अपने भाई पूरन को ले कर गांव आ गई. सब ने उसे समझाया कि सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहा जाता.

पूरन को अपनी गलती पर पछतावा था. उस की घर वापसी पर पूरे परिवार ने गांव वालों के साथ मिल कर ‘सरहुल’ का त्योहार धूमधाम से मनाया.

अब पूरन गांव में ही रह कर परिवार के साथ मेहनतमजदूरी कर के रोजीरोटी कमा रहा था.      

भाजपा की पहली ही लिस्ट में ‘प्रथम ग्रासे मक्षिका पात’

जब तक इंडिया ब्लौक का आपसी गठबंधन नहीं हुआ था तो भाजपा रोज सवाल पूछती थी कि उस के गठबंधन और टिकट वितरण में सब ठीक नहीं चल रहा है. इंडिया गठबंधन ने अपना गठबंधन बना लिया तब दबाव भाजपा पर आ गया कि वह अपने गठबंधन में क्या कर रही है? उन के बीच टिकट कैसे बंट रहे हैं.

भाजपा ने इस बीच अपनी बढ़त दिखाने के लिए अपनी पहली लिस्ट जारी कर दी. इस लिस्ट में सहयोगी दलों का कोई हिस्सा नहीं है. भाजपा ने यह कहा था कि जो 3 बार से सासंद है, जिन की उम्र 72 साल के ऊपर है और जो ठीक तरह से अपना काम नहीं कर रहे है उन के टिकट कट सकते हैं.

भाजपा ने अंदरखाने मीडिया के जरिए यह बात भी प्रचारित की कि 30 प्रतिशत मौजूदा सांसदों के टिकट कटेंगे. राज्य सरकारों के मंत्री विधायकी छोड़ कर लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे. जब भाजपा की लिस्ट सामने आई तो ये सारी बातें हवाहवाई हो गईं. उत्तर प्रदेश में 51 सीटों में से एक भी सीट पर जीते हुए सासंद का टिकट नहीं कटा. 72 साल के ऊपर वाले भी और जो सक्रिय नहीं हैं उन को भी टिकट दिया गया है.

मथुरा की सांसद हेमा मालिनी की उम्र 75 साल है. इस के बाद भी वे चुनाव लड़ेंगी. भाजपा को सब से अधिक उम्मीद उत्तर प्रदेश से है. यहां 6 सीटें सहयोगी दलों को दी हैं उस ने. इस प्रदेश में सभी पार्टी 80 सीटें जीतने का लक्ष्य ले कर चल रही है. इस लक्ष्य के डर से भाजपा ने यहां कोई फेरबदल नहीं किया है.

योगी सरकार के कुछ मंत्रियों को लोकसभा चुनाव मैदान में उतारा जा सकता था. कोई मंत्री अपनी कुरसी छोड़ कर चुनाव लड़ने को तैयार नहीं हुआ. इस की वजह यह बताई जा रही है कि मंत्रियों के सामने रीता बहुगुणा जोशी का उदाहरण मौजूद है.

2019 के लोकसभा चुनाव के समय वे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री थीं. मंत्री पद छोड़ कर लोकसभा का चुनाव लड़ा. सांसद बनीं. इस के बाद उन को कहीं पद नहीं मिला. वे सांसद बन कर रह गईं. सांसद बनने के चक्कर में मंत्री पद चला गया. इस कारण अब कोई मंत्री यह रिस्क लेने को तैयार नहीं.

उत्तर प्रदेश के एक कैबिनेट मंत्री और डिप्टी सीएम का नाम लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए चर्चा में था. रीता बहुगुणा की हालत देख कर उन्होंने हिम्मत नहीं दिखाई. इस के अलावा एक और कारण है. कांग्रेस और सपा का गठजोड़ होने के बाद भाजपा पहले जैसी ताकतवर नहीं दिखाई दे रही. इस कारण मंत्री विधायकी छोड़ सांसदी लड़ने को तैयार नहीं हैं.

पहली लिस्ट में अपनों को ही टिकट

भाजपा ने अपनी पहली लिस्ट में अपनी ही पार्टी के लोगों को टिकट दिया है. गठबंधन की सीटों को छोड़ दिया है. उस ने लोकसभा चुनाव के लिए 195 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की. 2019 में भाजपा ने कुल 303 सीटें जीती थीं. 2024 के लिए उस ने 370 सीटे जीतने की बात कही है. 195 सीटों में उत्तर प्रदेश की 51, पश्चिम बंगाल की 20, मध्य प्रदेश की 24, गुजरात और राजस्थान की 15-15 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की. इस के अलावा केरल की 12, तेलंगाना, असम, छत्तीसगढ़ और झारखंड की 11-11 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए.

भाजपा ने दिल्ली की 5 सीटों, उत्तराखंड की 3 और जम्मूकश्मीर की 2 सीटों के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. वहीं गोवा, त्रिपुरा, अंडमान और निकोबार और दमन व दीव की एक-एक सीट पर उम्मीदवारों के नाम तय किए हैं.

भाजपा की पहली सूची में प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री शाह और रक्षा मंत्री सिंह समेत कुल 34 केंद्रीय मंत्रियों के नाम हैं जिन में राज्यमंत्री भी शामिल हैं. इस के अलावा लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला और पूर्व मुख्यमंत्रियों शिवराज सिंह चौहान, बिप्लव देब और सर्वानंद सोनेवाल को भी टिकट दिया गया है.

भाजपा ने कुल 28 महिलाओं और 50 साल से कम उम्र के 47 नेताओं को टिकट दिया है. पहली सूची में 27 अनुसूचित जाति, 18 अनुसूचित जनजाति और 57 ओबीसी को टिकट दिए हैं. जिन नेताओं का टिकट कटा उन में भोपाल की सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी शामिल हैं. दिल्ली के 4 मौजूदा सांसदों को टिकट भी नहीं दिया गया. आलोक शर्मा को साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की जगह भोपाल से टिकट दिया गया है. प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने 2019 में कांग्रेस के दिग्विजय सिंह को मात दी थी.

भाजपा ने दिल्ली के सीनियर नेता हर्षवर्धन, केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी, रमेश बिधूड़ी और परवेश वर्मा को टिकट नहीं दिया है. मध्य प्रदेश के गुना से के पी सिंह यादव को टिकट नहीं दिया गया. विदिशा, ग्वालियर और मुरैना में भी चेहरे बदल दिए गए हैं. राजस्थान में 15 उम्मीदवारों के नाम का एलान किया गया है. इन में से 5 सीटों पर मौजूदा सांसदों को टिकट नहीं मिला है.

झारखंड के हजारीबाग से मनीष जायसवाल को टिकट दिया गया है. अभी यहां के सांसद जयंत सिन्हा हैं. जंयत सिन्हा ने राजनीति से सन्यास लेने की बात कही है.पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह विदिशा, केंद्रीय उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव राजस्थान के अलवर, स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया गुजरात के पोरबंदर से चुनाव लड़ेंगे. 2019 में अमेठी से राहुल गांधी को हराने वाली केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी फिर से अमेठी से उम्मीदवार होंगी. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू को अरुणाचल पश्चिम सीट से उम्मीदवार बनाया गया है.

भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता दिनेश लाल निरहुआ को आजमगढ़ से टिकट दिया गया है. बीजेपी ने अभिनेत्री हेमा मालिनी को फिर से उत्तर प्रदेश के मथुरा से टिकट दिया है. वहीं पूर्व मंत्री महेश शर्मा को गौतमबुद्धनगर से उम्मीदवार बनाया गया है. इस के अलावा साक्षी महाराज और एस पी सिंह बघेल को भी टिकट दिया गया है. लखीमपुर खीरी से अजय मिश्रा टेनी को उम्मीदवार बनाया है. लखीमपुर खीरी में प्रदर्शनकारी किसानों पर हमले में 4 लोगों की मौत के बाद टेनी विवादों में फंस गए थे. भाजपा ने उन पर फिर से भरोसा जताया है. किसान नेताओं ने टेनी को टिकट दिए जाने का विरोध किया है.

दिल्ली में नए चेहरों को टिकट दिया गया है. भाजपा की दिग्गज नेता रहीं सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी स्वराज को भी टिकट दिया गया है. उत्तरपूर्वी दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी को फिर से उम्मीदवार बनाया गया है. दिल्ली के भाजपा नेता हर्षवर्धन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा कि उन की ईएनटी यानी नाक कान गले वाली क्लीनिक अब खुलने लगेगी. यानी, अब राजनीति छोड़ कर वे अपनी क्लीनिक संभालेंगे.

मजेदार बात यह है कि गौतम गंभीर, हर्षवर्धन, जयंत सिन्हा ने राजनीति छोड़ने की बात कह दी. भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता पवन सिंह ने असानसोल से चुनाव लड़ने से मना कर दिया. इस की वजह यह है कि पवन सिंह ने बंगाली महिलाओं को ले कर भोजपुरी के ऐसे गाने गाए जिन को अश्लील माना जा सकता है.

टीएमसी ने पवन सिंह का विरोध कर दिया. पवन सिंह के सामने चिंता की दूसरी बात यह थी कि उन का मुकाबला अभिनेता शत्रुघन सिन्हा से है. ऐसे में हार के डर से पवन सिंह ने आसनसोल से चुनाव लड़ने से मना कर दिया है. अभी सहयोगी दलों के साथ रार बाकी है. देखना है, भाजपा की दूसरी लिस्ट में क्या बवाल होता है. टिकट बंटवारे से 370 सीटों तक भाजपा का पहुंचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन दिख रहा है.

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