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बोझ नहीं रिश्ते दिल के: भाग 4

एक दिन वह भी आया जब उस का विवाह हो गया पर उस के उन के साथ संबंध सदा बने रहे. मायके आती तो अधिक से अधिक समय उन के साथ व्यतीत करने की कोशिश करती. विपुल उसे मौसी कह कर बुलाता था. उस को देख कर वह इतना खुश होता कि जब तक वह रहती, उस से ही चिपका रहता. अपने स्कूल की एकएक बात उसे बताता. वह उस के लिए ढेर सारे खिलौने ले कर आती तथा उसे भी दीदी की तरफ से उपहार मिलते. सब से ज्यादा खुशी तो इस बात की थी कि दीपेश ने भी उस के इस रिश्ते का मान रखा.

कभीकभी उसे लगता कि वे उस की बड़ी बहन जैसी ही नहीं, उस की सब से अच्छी मित्र है जिन के पास उस की हर समस्या का हल रहता है तथा वह भी अपने दिल की हर बात उन के साथ शेयर कर मन में चलते द्वंद या कशमकश से मुक्ति प्राप्त कर लेती है. एक दिन पता चला कि दीदी के मातापिता तथा भाई सरल अपने किसी रिश्तेदार की बेटी के विवाह में अपनी कार से जा रहे थे कि अचानक गाड़ी का संतुलन बिगड़ गया तथा तीनों ही पंचतत्त्व में विलीन हो गए. समाचार सुन कर अनुजा उन के पास गई. उसे आया देख कर दीदी बिलख कर रोते हुए बोलीं, ‘अनु, सब समाप्त हो गया. इस भरी दुनिया में मैं अकेली रह गई.’ 

उस समय उस के साथ आई उस की मां ने उन को गले लगा कर दिलासा देते हुए कहा, बेटा तू अकेली कहां है, हम हैं न तेरे साथ. आज से तू भी मेरी बेटी है. हमारे रहते कभी स्वयं को अकेला मत समझना.’ और सच जब तक मांपापा रहे, कभी उन्हें अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया यहां तक कि भाई अभिनव और भाभी पूजा ने भी उन्हें बहन जैसा सम्मान दिया. वह जब भी अमेरिका से इंडिया आता तो जैसे उपहार उस के लिए लाता वैसे ही उन के लिए भी लाता. विपुल के विवाह में भी वह आने वाला है भात की रस्म निभाने.

अचानक अनुजा को अपना हाथ हलका लगा, देखा, तो पाया कि उस के हाथ को पकड़ा उन का हाथ नीचे लटक गया है. उस ने घबरा कर नब्ज टटोली. कुछ न पा कर डाक्टर को आवाज लगाती बाहर दौड़ी. उस की बदहवास दशा देख कर विपुल घबरा गया. दीपेश जो डाक्टर से कंन्सल्ट कर के लौटे ही थे, उस की चीख सुन कर हतप्रभ रह गए. डाक्टर ने आते ही उन्हें मृत घोषित कर दिया.

उस के जीवन की सूत्रधार, जिस के साए में उस ने रहना, चलना, सोचना और समझाना सीखा वह अपना नश्वर कलेवर छोड़ कर इस दुनिया से विदा ले चुका था. वह समझ नहीं पा रही थी कि कैसे उन के बिना चल पाएगी, कैसे विपुल को संभालेगी? तभी कहीं पढ़े शब्द उस के दिलदिमाग में गूंज उठे- जीवन तो उस नाव की तरह है जिस में प्राणी अपनी सुविधानुसार चढ़ता और उतरता रहता है. फिर चढ़ने पर खुशी और उतरने पर गम क्यों? जीवन की नाव हिचकोले खाएगी, डराएगी. फिर भी नाव को डूबने से बचाना हर इंसान का कर्तव्य है जब तक कि वह स्वयं जर्जर हो कर टूट न जाए.

दीदी के जीवन की नाव शायद जर्जर हो गई थी. तभी वे सब चाह कर भी उन्हें बचा नहीं सके. अंतिमक्रिया के समय पूरे महल्ले के लोगों के अलावा कालेज के सभी अध्यापक और छात्रछात्राएं उपस्थित थे. सब उन की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे. यह देख कर, सुन कर गर्व से मन भर उठा. आज दीदी उसे शायर के उस कथन की पर्याय लग रही थीं- मैं तो अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग मिलते गए कारवां बनता गया… 

लड़की वाले भी इस घटना से बेहद मायूस तथा डरे हुए थे. वे हमारी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे थे. जब उन्हें दीदी की अंतिम इच्छा के बारे में बताया तो वे नतमस्तक हो गए. आखिर एक बहुत बड़ा बोझ उन के सिर से उतर गया था. उन्हें डर था कि कहीं यह घटना उन की बेटी के लिए अपशगुन बन कर न रह जाए. सच तो यह है कि हमारा समाज आधुनिक बनने को ढोंग तो करता है पर जब स्वयं पर आती है तो नाना प्रकार के अंधविश्वासों में उलझ कर रह जाता है.

कर्मकांडों से निबटने के बाद थोड़ा स्थिर होने पर उन की वार्डरोब में रखी डायरी निकाल कर पढ़ने लगी. डायरी में हर रस्म पर दी जाने वाली वस्तुएं सिलसिलेवार लिखी हुई थीं. कुछ शौपिंग जो उन्होंने कर ली थी उस पर उन्होंने टिक लगा दिया था तथा जो नहीं कर पाई थीं उस के आगे कोई निशान नहीं था. हर रस्म में देने वाली वस्तुएं एक बड़े पैकेट में डाल कर अलमारी में टैग लगा कर रख दी थीं. अपने जीवन की तरह ही पूरी तरह सुव्यवस्थित, योजनाबद्ध विवाह की तैयारी कर रही थीं. जीवन से थोड़ी मोहलत उन्होंने चाही थी पर पूरी नहीं हो पाई. सच कुदरत भी कभीकभी इतनी निर्दयी कैसे हो जाती है कि इंसान को उस के न्याय पर ही शक होने लगता है.  

पढ़तेपढ़ते एक जगह नजर ठहर गई- ‘अनुजा, बस एक ही बात मुझे बारबार कचोटे जा रही है कि मैं विपुल को परिपूर्ण जीवन नहीं दे पाई. कोई कितनी भी कोशिश कर ले पर मातापिता दोनों का प्यार कोई एक अकेला अपने बच्चे को नहीं दे सकता. मैं ने अकसर विपुल की आंखों में पिता के लिए चाहत देखी है. शायद मन ही मन मुझे कुसूरवार भी ठहराता रहा हो पर तू ही बता, मैं क्या करती? क्या पूरी उम्र उस नरक में सड़ती रहती तथा विपुल को भी उस सड़न का भागीदार बनाती?

‘अगर तुम चाहो तो इस अवसर पर उन्हें बुला सकती हो, मुझे कोई एतराज नहीं होगा. आखिर विपुल उन का भी तो अंश है. वैसे, मैं नहीं जानती वे कहां और कैसे हैं पर दुनिया इतनी बड़ी भी नहीं कि किसी को ढूंढा न जा सके. पुराना पता इसी डायरी में है. अच्छा, अब रुकती हूं, पता नहीं क्यों बहुत घबराहट हो रही है.’ 

तारीख देखी तो वही दिन था जिस दिन उन्हें अटैक आया था. अंतिम लाइनों ने उसे झकझोर कर रख दिया तो क्या ऊपर से जिंदादिल दिखने वाली सविता दी कहीं न कहीं अपराधबोध से ग्रस्त थीं? अपने लिए नहीं, शायद अपने बच्चे के प्रति पूर्ण न्याय न कर पाने के कारण. पर उन्होंने यह क्यों लिखा कि अगर तुम चाहो तो उन्हें बुला सकती हो, क्या उन्हें अपने अंतिम समय का आभास हो गया था?

दीदी का अंतिम पत्र पढ़ कर आज लग रहा था कि कहीं वे दोहरी जिंदगी तो नहीं जीती रहीं. चेहरे पर हंसी और अंदर ही अंदर एक अनकहा तूफान. पर जातेजाते वे उस तूफान को छिपा नहीं पाईं. शायद इस दुनिया से जाते समय वे अपने दिल पर कोई बोझ ले कर नहीं जाना चाहती थीं और न ही जीतेजी सब के सामने स्वीकार कर कमजोर पड़ना चाहती थीं. सच, अगर कुछ अपवादों को छोड़ दें तो साधारणतया हर हंसी के पीछे कोई भीषण दुख छिपा रहता है. सच कुछ पल भुलाए नहीं भूलता. कहीं मन में वर्षो से डंक मारता दुख आज उन के इस अटैक का कारण तो नहीं बन गया? कारण जो भी रहा हो पर हकीकत का सामना तो करना ही था. वैसे भी, अंतिम सांसें लेता व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोलता. दीदी की अंतिम इच्छा का सम्मान करना उस का कर्तव्य है पर कैसे, समझ नहीं पा रही थी. 

दीपेश को दीदी की डायरी का वह अंश दिखाया तो वे भी सोच में पड़ गए. जब समझ में नहीं आया तो विपुल से बात करने की सोची. आखिर वही तो था जिस ने मातापिता के अलगाव का दुख झेला था.

विपुल को डायरी दिखाई तो उस की आंखों से आंसू बहने लगे, बोला, “मौसी, यह सच है कि मैं ने पापा को मिस करने का दर्द सहा है पर जो दर्द ममा ने सहा है वह मेरे दर्द से बहुत ज्यादा है. उस आदमी ने ममा का तो तिरस्कार किया ही, मेरी भी परवा नहीं की तो फिर मैं उस की परवा क्यों करूं? उसे बुला कर मैं ममा के प्यार का अपमान नहीं करूंगा. मेरे ममापापा दोनों मां ही थीं. आज मैं अनाथ हो गया, मौसी. मैं अनाथ हो गया.Þ 

दीदी के जाने के बाद तू अकेला ही नहीं, हम सब ही अनाथ हो गए हैं, बेटा. वे हमारे लिए वटवृक्ष के समान थीं. हालात पर किसी का वश नहीं है, बेटा. पर उन की खुशी के लिए स्थिति के साथ समझौता करना ही पड़ेगा. न तू रोएगा, न हम रोएंगे,Þ अनुजा ने उसे अपने अंक में समेटते हुए कहा. 

दीदी तो उस समय का इंतजार नहीं कर सकीं पर विवाह टलेगा नहीं और न ही इस स्थिति के लिए कोई नई बहू को दोषी ठहराएगा. वह विपुल के साथ दीदी की भी पसंद है. वह उसी धूमधड़ाके के साथ इस घर में प्रवेश करेगी जैसा कि दीदी चाहती थीं. इस निर्णय ने अनुजा के डगमगाते इरादों को मजबूती दी. वह विवाह की तैयारी में जुट गई. आखिर उसे अपनी सविता दीदी के विश्वास की कसौटी पर खरा उतरना है.

स्पेनिश मौस: क्या गीता अपनी गृहस्थी बचा पाई?

‘‘आप यह नहीं सोचना कि मैं उन की बुराई कर रही हूं, पर…पर…जानती हैं क्या है, वे जरा…सामाजिक नहीं हैं.’’

उस महिला का रुकरुक कर बोला गया वह वाक्य, सोच कर, तोल कर रखे शब्द. ऋचा चौंक गई. लगा, इस सब के पीछे हो न हो एक बवंडर है. उस ने महिला की आंखों में झांकने का प्रयत्न किया, पर आंखों में कोई भाव नहीं थे, था तो एक अपारदर्शी खालीपन.

मुझे आश्चर्य होना स्वाभाविक था. उस महिला से परिचय हुए अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ था और उस से यह दूसरी मुलाकात थी. अभी तो वह ‘गीताजी’ और ‘ऋचाजी’ जैसे औपचारिक संबोधनों के बीच ही गोते खा रही थी कि गीता ने अपनी सफाई देते हुए यह कहा था, ‘‘माफ करना ऋचाजी, हम आप को टैलीफोन न कर सके. बात यह है कि हम…हम कुछ व्यस्त रहे.’’

ऋचा को इस वाक्य ने नहीं चौंकाया. वह जान गई कि अमेरिका में आते ही हम भारतीय व्यस्त हो जाने के आदी हो जाते हैं. भारत में होते हैं तो हम जब इच्छा हो, उठ कर परिचितों, प्रियजनों, मित्रों, संबंधियों के घर जा धमकते हैं. वहां हमारे पास एकदूसरे के लिए समय ही समय होता है. घंटों बैठे रहते हैं, नानुकर करतेकरते भी चायजलपान चलता है क्योंकि वहां ‘न’ का छिपा अर्थ ‘हां’ होता है. किंतु यहां सब अमेरिकन ढंग से व्यस्त हो जाते हैं. टैलीफोन कर के ही किसी के घर जाते हैं और चाय की इच्छा हो तो पूछने पर ‘हां’ ही करते हैं क्योंकि आप ने ‘न’ कहा तो फिर भारतीय भी यह नहीं कहेगा, ‘‘अजी, ले लो. एक कप से क्या फर्क पड़ेगा आप की नींद को,’’ बल्कि अमेरिकन ढंग से कंधे उचका कर कहेगा, ‘‘ठीक है, कोई बात नहीं,’’ और आप बिना चाय के घर.

अमेरिका आए ऋचा को अभी एक माह ही हुआ था. घर की याद आती थी. भारत याद आता था. यहां आने पर ही पता चलता है कि हमारे जीवन में कितनी विविधता है. दैनिक जीवन को चलाने के संघर्ष में ही व्यक्ति इतना डूब जाता है कि उसे कुछ हट कर जीवन पर नजर डालने का अवसर ही नहीं मिलता. यहां जीवन की हर छोटी से छोटी सुखसुविधा उपलब्ध है और फिर भी मन यहां की एकरसता से ऊब जाता है. अजीब एकाकीपन में घिरी ऋचा को जब एक अमेरिकन परिचिता ने ‘फार्म’ पर चलने की दावत दी तो वह फूली न समाई और वहीं गीता से परिचय हुआ था.

शहर से 20-25 किलोमीटर दूर स्थित इस ‘फार्म’ पर हर रविवार शाम को ‘गुडविल’ संस्था के 20-30 लोग आते थे, मिलते थे. कुछ जलपान हो जाता था और हफ्तेभर के लिए दिमाग तरोताजा हो जाता था. यह अनौपचारिक ‘मंडल’ था जिस में विविध देशों के लोगों को आने के लिए खास प्रेरित किया जाता था. सांस्कृतिक आदानप्रदान का एक छोटा सा प्रयास था यह.

यहीं उन गोरे चेहरों में ऋचा ने यह भारतीय चेहरा देखा और उस का मन हलका हो गया. वही गेहुआं रंग, काले घने बाल, माथे पर बिंदी और साड़ी का लहराता पल्ला. दोनों ने एकदूसरे की ओर देखा और अनायास दोनों चेहरों पर मुसकान थिरक गई. फिर परिचय, फिर अतापता, टैलीफोन नंबर का लेनदेन और छोटीमोटी, इधरउधर की बातें. कई दिनों बाद हिंदी में बातचीत कर अच्छा लगा.

तब गीता ने कहा था, ‘‘मैं टैलीफोन करूंगी.’’

और दूसरे सप्ताह मिली तो टैलीफोन न कर सकने का कारण बतातेबताते मन में लगी काई पर से जबान फिसल गई. उस के शब्द ऋचा ने पकड़ लिए, ‘‘वे सामाजिक नहीं हैं…’’ शब्द नहीं, मर्म को छूने वाली आवाज थी शायद, जो उसे चौंका गई. सामाजिक न होना कोई अपराध नहीं, स्वभाव है. गीता के पति सामाजिक नहीं हैं. फिर?

बातचीत का दौर चल रहा था. हरीहरी घास पर रंगबिरंगे कपड़े पहने लोग. लगा वातावरण में चटकीले रंग बिखर गए थे. ऋचा भी इधरउधर घूमघूम कर बातों में उलझी थी. अच्छा लग रहा था, दुनिया का नागरिक होने का आभास. ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की एक नन्ही झलक.

यहां मलयेशिया से आया एक परिवार था, कोई ब्राजील से, ये पतिपत्नी मैक्सिकन थे और वे कोस्टारिका के. सब अपनेअपने ढंग से अंगरेजी बोल रहे थे. कई ऋचा की भारतीय सिल्क साड़ी की प्रशंसा कर रहे थे तो कई बिंदी की ओर इशारा कर पूछ रहे थे कि यह क्या है? क्या यह जन्म से ही है आदि. कुल मिला कर ऐसा समां बंधा था कि ऋचा की हफ्तेभर की थकान मिट गई थी. तभी उस की नजर अकेली खड़ी गीता पर पड़ी. उस का पति बच्चों को संभालने के बहाने भीड़ से दूर चला गया था और उन्हें गाय दिखा रहा था.

ऋचा ने सोचा, ‘सचमुच ही गीता

का पति सामाजिक नहीं है. पर फिर यहां क्यों आते हैं? शायद गीता के कहने पर. किंतु गीता भी कुछ खास हिलीमिली नहीं इन लोगों से.’

‘‘अरे, आप अकेली क्यों खड़ी हैं?’’ कहती हुई ऋचा उस के पास जा खड़ी हुई.

‘‘यों ही, हर सप्ताह ही तो यहां आते हैं. क्या बातचीत करे कोई?’’ गीता ने दार्शनिक अंदाज से कहा.

‘‘हां, हो सकता है. आप तो काफी दिनों से आ रही हैं न?’’

‘‘हां.’’

‘‘तुम्हारे पति को अच्छा लगता है यहां? मेरा मतलब है भीड़ में, लोगों के बीच?’’

‘‘पता नहीं. कुछ कहते नहीं. हर इतवार आते जरूर हैं.’’

‘‘ओह, शायद तुम्हारे लिए,’’ ऋचा कब आप से तुम पर उतर आई वह जान न पाई.

‘‘मेरे लिए, शायद?’’ और गीता के होंठों पर मुसकान ठहर गई, पर होंठों का वक्र बहुत कुछ कह गया. ऋचा को लगा, कदाचित उस ने किसी दुखती रग पर हाथ रख दिया था, अनजाने ही अपराधबोध से उस ने झट आंखें फेर लीं.

तभी गीता ने उस के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘सच मानो, ऋचा. मैं तो यहां आना बंद ही करने वाली थी कि पिछली बार तुम मिल गईं. बड़ा सहारा सा लगा. इस बार बस, तुम्हारी वजह से आई हूं.’’

‘‘मेरी वजह से?’’

‘‘हां, सोचा दो बातें हो जाएंगी. वरना हमारे न कोई मित्र हैं, न घर आनेजाने वाले. सारा दिन घर में अकेले रह कर ऊब जाती हूं. शाम को कभी बाजार के लिए निकल जाते हैं पर अब तो इन बड़ीबड़ी दुकानों से भी मन ऊब गया है. वही चमकदमक, वही एक सी वस्तुएं, वही डब्बों में बंद सब्जियां, गत्तों के चिकने डब्बों में बंद सीरियल, चाहे कौर्नफ्लैक लो या ओटबार्न, क्या फर्क पड़ता है.’’

गीता अभी बहुत कुछ कहना चाहती थी पर अब चलने का समय हो गया था. उस के पति कार के पास खड़े थे. वह उठ खड़ी हुई. ऋचा को लगा, गीता मन को खोल कर घुटन निकाल दे तो उसे शायद राहत मिलेगी. इस परदेस में इनसान मन भी किस के सामने खोले?

वह अपनी भावुकता को छिपाती हुई बोली, ‘‘गीता, कभी मैं तुम्हारे घर आऊं तो? बुरा तो नहीं मानेंगे तुम्हारे पति?’’

‘‘नहीं. परंतु हां, वे कभी कार से लेने या छोड़ने नहीं आएंगे, जैसे आमतौर पर भारतीय करते हैं. इन से यह सामाजिक औपचारिकता नहीं निभती,’’ वह चलते- चलते बोली. फिर निकट आ गई और साड़ी का पल्ला संवारते हुए धीरे से बोली, ‘‘तभी तो नौकरी छूट गई.’’

और वह चली गई, ऋचा के शांत मन में कंकड़ फेंक कर उठने वाली लहरों के बीच ऋचा का मन कमल के पत्ते की भांति डोलने लगा.

इस परदेस में, अपने घर से, लोगों से, देश से हजारों मील दूर वैसे ही इनसान को घुटन होती है, निहायत अकेलापन लगता है. ऊपर से गीता जैसी स्त्री जिसे पति का भी सहारा न हो. कैसे जी रही होगी यह महिला?

अगली बार गीता मिली तो बहुत उदास थी. पिछले पूरे सप्ताह ऋचा अपने काम में लगी रही. गीता का ध्यान भी उसे कम ही आया. एक बार टैलीफोन पर कुछ मिनट बात हुई थी, बस. अब गीता को देख फिर से मन में प्रश्नों का बवंडर खड़ा हो गया.

इस बार गीता और अधिक खुल कर बोली. सारांश यही था कि पति नौकरी छोड़ कर बैठ गए हैं. कहते हैं भारत वापस चलेंगे. उन का यहां मन नहीं लगता.

‘‘तो ठीक है. वहां जा कर शायद ठीक हो जाएं,’’ ऋचा ने कहा.

गीता की अपारदर्शी आंखों में अचानक ही डर उभर आया.

ऋचा सिहर गई, ‘‘नहीं. ऐसा न कहो. वहां मैं और अकेली पड़ जाऊंगी. इन के सब वहां हैं. इन का पूरा मन वहीं है और मेरा यहां.’’

तब पता चला कि गीता के 2 भाई हैं जो अब इंगलैंड में ही रहते हैं, पहले यहां थे. मातापिता उन के पास हैं. बहन कनाडा में है.

‘‘हमारी शादियां होने तक तो हम सब भारत में थे. फिर एकएक कर के इधर आते गए. मैं सब से छोटी हूं. मेरी शादी के बाद मातापिता भी भाइयों के पास आ गए.’’

गीता एक विचित्र परिस्थिति में थी. पति भारत जाना चाहते थे,वह रोकती थी. घर में क्लेश हो जाता. वे कहते कि अकेले जा कर आऊंगा तो भी गीता को मंजूर नहीं था क्योंकि उसे डर था कि मांबाप, भाईबहनों के बीच में से निकल कर वे नहीं आएंगे.

‘‘बच्चों की खातिर तो लौट आएंगे,’’ ऋचा ने समझाया.

‘‘बच्चों की खातिर? हुंह,’’ स्पष्ट था कि गीता को इस बात का भी भय था कि उन्हें बच्चों से भी लगाव नहीं है. ऋचा को अजीब लगा क्योंकि हर रविवार को बच्चों के साथ वे घंटों खेलते हैं, उन्हें प्यार से रखते हैं.

ऋचा कई बार सोचती, ‘आखिर कमी कहां रह गई है, वह तो सिर्फ गीता का दृष्टिकोण ही जान पाई है. उस के पति से बात नहीं हुई. वैसे गीता यह भी कहती है कि उस के पति बहुत योग्य व्यक्ति हैं और नामी कंप्यूटर वैज्ञानिक हैं. फिर यह सब क्या है?’

अब तो जब मिलो, गीता की वही शिकायत होती. पति ने फिलहाल अकेले भारत जाने की ठानी है. 3-4 महीने में वे चले जाएंगे. तत्पश्चात बच्चों की छुट्टियां होते ही वह जाएगी और फिर सब लौट आएंगे. पिछले 2 रविवारों को ऋचा फार्म पर गई नहीं थी. तीसरे रविवार गई तो गीता मिली. वही चिंतित चेहरा.

गीता के चेहरे पर भय की रेखाएं अब पूरी तरह अंकित थीं.

‘‘उन के बिना यहां…’’ गीता का वाक्य अभी अधूरा ही था कि ऋचा बोल पड़ी.

‘‘उन से इतना लगाव है तो लड़ती क्यों हो?’’

गीता चुप रही. फिर कुछ संभल कर बोली, ‘‘हमारा जीवन तो अस्तव्यस्त हो जाएगा न. बच्चों को स्कूल पहुंचाना, हर हफ्ते की ग्रौसरी शौपिंग, और भी तो गृहस्थी के झंझट होते हैं.’’

तभी गीता की परिचिता एक अमेरिकी महिला आ कर उस से कुछ कहने लगी. गीता का रंग उड़ गया. ऋचा ने उस की ओर देखा. गीता अंगरेजी में जवाब देने के प्रयास में हकला रही थी. ऋचा ने गीता की ओर से ध्यान हटा लिया और दूर एक पेड़ की ओर ध्यानमग्न हो देखने लगी. कुछ देर बाद अमेरिकन महिला चली गई. ऋचा को पता तब चला जब गीता ने उसे झकझोरा.

‘‘तुम ऋचा, दार्शनिक बनी पेड़ ताक रही हो. मैं इधर समस्याओं से घिरी हूं.’’

ऋचा ने उस की शिकायत सुनी- अनसुनी कर दी.

‘‘गीता, यह तुम्हारी अमेरिकी सहेली है. है न?’’

‘‘हां. नहीं. सच पूछो ऋचा, तो मैं कहां दोस्ती बढ़ाऊं? कैसे? अंगरेजी बोलना भी तो नहीं आता. मांबाप ने हिंदी स्कूलों में पढ़ाया.’’

‘‘ऐसा मत कहो,’’ ऋचा ने बीच में टोका, ‘‘अपनी भाषा के स्कूल में पढ़ना कोई गुनाह नहीं.’’

‘‘पर इस से मेरा हाल क्या हुआ, देख रही हो न?’’

‘‘यह स्कूल का दोष नहीं.’’

‘‘फिर?’’

‘‘दोष तुम्हारा है. अपने को समय व परिस्थिति के मुताबिक ढाल न सकना गुनाह है. बेबसी गुनाह है. दूसरे पर अवलंबित रहना गुनाह है. यही गुनाह औरत सदियों से करती चली आ रही है और पुरुषों को दोष देती चली आ रही है,’’ ऋचा तैश में बोलती चली गई. चेहरा तमतमाया हुआ था.

‘‘तुम कहना क्या चाहती हो, ऋचा?’’

‘‘बताती हूं. सामने पेड़ देख रही हो?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन पेड़ों की टहनियों से ‘लेस’ की भांति नाजुक, हलके हरे रंग की बेल लटक रही है. है न?’’

‘‘हां. पर इन से मेरी समस्या का क्या ताल्लुक?’’

‘‘अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों में ये बेलें प्रचुर मात्रा में मिलती हैं…’’

‘‘सुनो, ऋचा. इस वक्त मैं न कविता के मूड में हूं, न भूगोल सीखने के,’’ गीता लगभग चिढ़ गई थी.

ऋचा के चेहरे पर हलकी मुसकराहट उभर आई. फिर अपनी बात को जारी रखते हुए कहने लगी, ‘‘इन बेलों को ‘स्पेनिश मौस’ कहते हैं. इन की खासीयत यह है कि ये बेलें पेड़ से चिपक कर लटकती तो हैं पर उन पर अवलंबित नहीं हैं.’’

‘‘तो मैं क्या करूं इन बेलों का?’’

‘‘तुम्हें स्पेनिश मौस बनना है.’’

‘‘मुझे? स्पेनिश मौस?’’

‘‘हां, ‘अमर बेल’ नहीं, स्पेनिश मौस. ’’

‘‘पहेलियां न बुझाओ, ऋचा,’’ गीता का कंठ क्रोध और अपनी असहाय दशा से भर आया.

‘‘गीता, तुम्हारी समस्या की जड़ है तुम्हारी आश्रित रहने की प्रवृत्ति. पति पर निर्भर रहते हुए भी तुम्हें अपना अस्तित्व स्पेनिश मौस की भांति अलग रखना है. उन के साथ रहो, प्यार से रहो, पर उन्हें बैसाखी मत बनाओ. अपने पांव पर खड़ी हो.’’

‘‘कहना आसान है…’’ गीता कड़वाहट में कुछ कहने जा रही थी. पर ऋचा ने बात काट कर अपने ढंग से पूरी की, ‘‘और करना भी.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘पहला कदम लेने भर की देर है.’’

‘‘तो पहला कदम लेना कौन सिखाएगा?’’

‘‘तुम्हारा अपना आत्मबल, उसे जगाओ.’’

‘‘कैसे जगाऊं?’’

‘‘तुम्हें अंगरेजी बोलनी आती है, जिस की यहां आवश्यकता है, बोलो?’’

‘‘नहीं?’’

‘‘कार चलानी आती है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘यहां आए कितने वर्ष हो गए?’’

‘‘8.’’

‘‘अब तक क्यों नहीं सीखी?’’

‘‘विश्वास नहीं है अपने पर.’’

‘‘बस, यही है हमारी आम औरत की समस्या और यहीं से शुरू करना है तुम्हें. मदद मैं करूंगी,’’ ऋचा ने कहा.

गीता के चेहरे पर कुछ भाव उभरे, कुछ विलीन हो गए.

‘स्पेनिश मौस,’ वह बुदबुदाई. दूर पेड़ों पर स्पेनिश मौस के झालरनुमा गुच्छे लटक रहे थे. अनायास गीता को लगा कि अब तक उस ने नहीं जाना था कि स्पेनिश मौस की अपनी खूबसूरती है.

‘‘यह सुंदर बेल है ऋचा, है न?’’ आंखों में झिलमिलाते सपनों के बीच से वह बोली.

‘‘हां, गीता. पर स्पेनिश मौस बनना और अधिक सुंदर होगा.’’

शापित: पूनम के सामने क्यों छलक पड़े रश्मि के आंसू?

“रश्मि, रश्मि, कहां हो तुम?  भई, यह करेले का मसाला तो कच्चा ही रह गया हैं,” फिर हंसते हुए भूपिंदर बोला, “सतीश जी, जिस  दिन कुक नहीं आती है, ऐसा ही कच्चापक्का खाना बनता है.”

ये सब बातें करते भूपिंदर यह भी भूल गया था कि आज रश्मि कोई नईनवेली दुलहन नहीं है बल्कि सास बनने वाली है और आज खाने की मेज पर जो मेहमान  बैठे हैं वे उस की होने वाली बहू के मातापिता हैं.

मम्मी के हाथों में करेले पकड़ाते हुए आदित्य बोला, “क्या जरूरत थी  सोनाक्षी के मम्मीपापा को घर पर बुलाने की. आप को पता है न, पिताजी कैसे हैं?”

रश्मि बोली, “आदित्य, मूड मत खराब कर, जा कर बाहर बैठ.”

जैसे ही आदित्य बाहर आया, भूपिंदर बोला, “भई, यह आदित्य तो अब तक मम्माबौय है, सोनाक्षी को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.”

आदित्य बिना लिहाज किए बोल पड़ा, “मैं ही नहीं पापा, सोनाक्षी भी मम्मागर्ल ही बनेगी.”

तभी रश्मि खिसियाते हुई डाइनिंग टेबल पर फिर से करेला की प्लेट  ले कर आ गई थी.

नारंगी और हरी तात कौटन की साड़ी में रश्मि बहुत ही सौम्य व सलीकेदार लग रही थी. खाना अच्छा ही बना हुआ था और डाइनिंग टेबल पर बहुत सलीके से लगा भी हुआ था. लेकिन भूपिंदर  फिर भी कभी नैपकिन के लिए तो कभी नमकदानी के लिए रश्मि को टोकता ही रहा था.

माहौल में इतना अधिक तनाव था कि अच्छेखासे खाने का जायका खराब हो गया था.

खाने के बाद भूपिंदर, सतीश को ले कर ड्राइंगरूम में चला गया, तो पूनम मीठे स्वर में रश्मि से बोली, “खाना बहुत अच्छा बना हुआ था और बहुत सलीके से लगा भी हुआ था. लगता है भाईसाहब कुछ ज्यादा ही परफेक्शनिस्ट हैं.”

रश्मि की बड़ीबड़ी शरबती आंखों में आंसू दरवाजे पर ही अटके हुए थे, उन्हें पीते हुए धीरे से बोली, “पूनम जी, पर  मेरा आदित्य अपने पापा से एकदम अलग है. आप की सोनाक्षी को कोई तकलीफ नहीं होने देंगे.”

पूनम अच्छे से समझ सकती थी कि रश्मि के मन पर क्या बीत रही होगी.

आदित्य और सोनाक्षी दोनों रोहिणी के जयपुर गोल्डन आई हौस्पिटल में डाक्टर हैं. दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं और जैसे कि आजकल होता हैं, परिवार ने उन की पसंद पर सहमति की मुहर लगा दी थी. आज विवाह की आगे के बातचीत के लिए पूनम और सतीश, आदित्य के घर खाने पर आए थे. भूपिंदर का यह रूप उन्हें  अंदर तक हिला गया था. आदित्य का गुस्सा भी उन से छिपा नहीं था.

रास्ते में पूनम से रहा न गया, इसलिए सतीश से बोली, “सबकुछ ठीक हैं, पर क्या तुम्हें लगता है कि आदित्य ठीक रहेगा अपनी सोनाक्षी के लिए? उस के पापा उस की मम्मी को कितना बेइज़्ज़त करते हैं. लड़का ये सब देख कर बड़ा हुआ है. ऐसे में मुझे डर है कि कहीं आदित्य भी सोनाक्षी के साथ ऐसा ही व्यवहार न करे.”

सतीश बोला, “देखो, हम सोनाक्षी को सब बता देंगे, उस की जिंदगी हैं, फ़ैसला भी उसी का होगा.”

उधर रश्मि को लग रहा था कि कही भूपिंदर के व्यवहार के कारण सोनाक्षी और आदित्य के विवाह में रुकावट न आ जाए.

आदित्य सोनाक्षी के मम्मीपापा के जाते ही भूपिंदर पर उबल पड़ा, “क्या जरूरत थी आप को सोनाक्षी के मम्मीपापा के सामने ऐसा व्यवहार करने की?”

भूपिंदर बोला, “घर मेरा है, मैं जैसे चाहूं, करूंगा. इतनी ही दिक्कत है, तो अलग रह सकते हो.”

आदित्य ने दरवाजे पर खटखट की. रश्मि मुसकराते हुए बोली, “अज्जू, अंदर आ जा, खटखट क्यों कर रहा है.”

आदित्य बोला, “मम्मी, पापा के यह व्यवहार और तुम्हारा चुपचाप सब सहन करना, मुझे अंदर तक आहत कर जाता है. आज मैं सोनाक्षी के मम्मीपापा के सामने आंख भी नहीं उठा पाया हूं. गुलाम बना कर रखा हुआ हैं उन्होंने हमें.”

रश्मि आदित्य के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “अज्जू, शिखा, तेरी छोटी बहन, तो गोवा में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है और तू, बेटा,  शादी के बाद अलग घर ले  लेना.”

आदित्य बोला, “मम्मी, और आप?  मैं क्या इतना स्वार्थी हूं कि आप को अकेला छोड़ कर चला जाऊंगा.”

रश्मि उदासी सी बोली, “अज्जू, मैं तो शापित हूं  इसे साथ के लिए बेटा, पर मैं बिलकुल नहीं चाहती कि तुम या सोनाक्षी ऐसे डर के साथ जिंदगी व्यतीत करो.”

आदित्य का हौस्पिटल जाने का समय हो गया था. आज उस की नाइट शिफ़्ट थी.

रश्मि आंखे बंद कर के सोने का प्रयास करने लगी. पर नींद थी कि आंखों से कोसों दूर. आदित्य की शादी की उस के मन में कितनी उमंगें थीं. लेकिन वह अच्छे से जानती थी, हर बार गहनेकपड़ों के लिए उसे भूपिंदर के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा. भूपिंदर कितनी लानतमलामत भेजेगा और साथ  ही साथ, वह यह भी जोड़ेगा कि उस ने आदित्य की मेडिकल की पढ़ाई में 25 लाख रुपए खर्च किए हैं.

रश्मि का  कितना मन करता था कि वह अपनी पसंद से कपड़े ले. लेकिन भूपिंदर ही उस के लिए कपड़े ख़रीदता था क्योंकि भूपिंदर के हिसाब से रश्मि को तमीज़ ही नही हैं अच्छे कपड़े खरीदने की. रश्मि के वेतन की पाईपाई का हिसाब भूपिंदर ही रखता था.

जब कोई भी रश्मि के कपड़ों की तारीफ़ करता तो भूपिंदर छूटते ही बोलता, “मैं जो ख़रीदता हूं, वरना ये तो अजीब कपड़े ही खरीदती और पहनती है.”

रिश्तेदार और पड़ोसियों को लगता था कि भूपिंदर जैसा शाहखर्च कौन हो सकता हैं जो अपनी बीवी का वेतन उस के गहनेकपड़ों पर ही खर्च करता है.   आजकल के ज़माने में  ऐसे पतियों की कमी नहीं हैं जो अपनी पत्नियों के वेतन से घरखर्च चलाते हैं. रश्मि कैसे समझाए किसी को कि गहनेकपड़ों से अधिक महत्त्व सम्मान का होता है.

यह जरूर था  कि भूपिंदर अपने काम का पक्का था, इसलिए दिनदूनी  और रातचौगुनी तरक्की कर रहा था. तरक़्क़ी के साथसाथ उस का अहं भी सांप के फन की तरह फुम्फकारने लगा था. शादी के कुछ वर्षों बाद ही रश्मि के कानों में भूपिंदर के अफेयर की भनक लगने लगी थी. पर जब भी अलग होने की सोचती, तो अज्जू और शिखा का भविष्य दिखने लगता. कैसे पढ़ा पाएगी वह दोनों बच्चों को दिल्ली जैसे शहर की इस विकराल महंगाई में. नालायक ही सही, पर सिर पर बाप का साया तो रहेगा.

रश्मि के हथियार डालते ही  भूपिंदर उस पर  और हावी हो गया था. रातदिन वह रश्मि को कोंचता रहता था. पर अब उस हिमशिला पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था.

घर 3 कोणों  में बंट गया था- एक पाले मे थे रश्मि, अज्जू और दूसरे पाले में था भूपिंदर. शिखा आज के दौर की स्मार्ट लड़की थी, इसलिए वह किस भी पाले में नहीं थी. वह अपने हिसाब से पाले बदलती रहती थी. आदित्य बेहद ही संवेदनशील युवक था. रातदिन के तनाव का  प्रभाव आदित्य पर पड़ रहा है. 30 वर्ष की कम उम्र में ही आदित्य को हाइपरटेंशन रहने लगी थी.

आदित्य जैसे ही अस्पताल पहुंचा, सोनाक्षी वहीं खड़ी थी. सोनाक्षी धीमे स्वर में बोली, “आदित्य, कल डयूटी के बाद मुझे तुम से जरूरी बात करनी है.”

आदित्य को पता था कि सोनाक्षी क्या कहना चाहती है.

सुबह आदित्य और सोनाक्षी जब कैंटीन में आमनेसामने थे, तो सोनाक्षी बोली, “आदित्य, देखो, मुझे गलत मत समझना पर मैं ऐसे माहौल में एडजस्ट नहीं कर सकती. क्या हम विवाह के बाद अलग फ्लैट ले कर रह सकते हैं?”

आदित्य बोला, “सोना, मुझे मालूम है, तुम अपनी जगह सही हो  पर मैं अपनी मम्मी को अकेले उस  घर  में नही छोड़ सकता हूं”

सोनाक्षी बोली, “अगर तुम्हारी मम्मी हमारे साथ रहना चाहती हों, तो मुझे कोई प्रौब्लम नहीं हैं.”

जब आदित्य ने यह बात घर पर बताई तो भूपिंदर गुस्से से आगबबूला हो उठा था. गुस्से में बोला, “तुम्हारा तो यह ही होना था गोबरगणेश. जो लड़का मां का पल्लू पकड़ कर चलता है वह बीवी के इशारों पर ही नाचेगा.”

आदित्य बोला, “पापा, आप चिंता न करो. आप को मुझ से और मम्मी से बहुत प्रौब्लम है न, तो मैं मम्मी को भी अपने साथ ले कर जाऊंगा. ऐसा लगता है ,घर घर नहीं हैं बल्कि एक जेल हैं और हम सब कैदी हैं.”

भूपिंदर दहाड़ उठा, “हां, यह जेल है न, तो रिहाई की भी कीमत है. अपनी मम्मी को क्या ऐसे ही ले कर  चला जाएगा, वह मेरी पत्नी है. और सुन लड़के, तेरी पढ़ाई पर 25 लाख रुपए खर्च हुए हैं, पहले 25 लाख वापस दे देना और फिर अपनी मम्मी को रिहा कर ले जाना.”

आदित्य के विवाह की तिथि निश्चित हो गई थी और भूपिंदर न चाहते हुए भी जोरशोर से तैयारियों में जुटा  हुआ था.

जब नवयुगल हनीमून से वापस आ जाएंगे तो वे अलग फ्लैट में शिफ्ट हो जाएंगे. आदित्य किसी भी कीमत पर अपनी मम्मी को अकेले उस यातनागृह में नहीं छोड़ना चाहता था, इसलिए आदित्य ने किसी तरह से 20 लाख रुपयों का बंदोबस्त कर लिया था.

विवाह धूमधाम से संपन्न हो गया था. 14 दिनों बाद आदित्य और सोनाक्षी सिंगापुर से घूम कर लौट आ गए थे. आदित्य ने रश्मि को सूचित कर दिया था कि वह अपना सारा साजोसामान ले कर उन के पास आ जाए.

लेकिन, रश्मि का फ़ोन आया कि आदित्य रविवार को एक बार घर आ जाए. उस के बाद ही रश्मि आदित्य के पास रहने आ जाएगी. आदित्य को लग रहा था कि शायद मम्मी को निर्णय लेने में मुश्किल हो रही है या फिर पापा उन्हें ताने मार रहे होंगे.

जब आदित्य और सोनाक्षी घर पहुंचे तो देखा घर पर मरघट सी शांति छाई हुई थी. आदित्य ने देखा, रश्मि बहुत थकीथकी लग रही थी. आदित्य बोला, “मम्मी, कमाल करती हो, तुम आज भी पापा के कारण निर्णय नहीं ले पा रही हो? आप चिंता मत करो, मैं ने 20 लाख रुपयों का बंदोबस्त कर लिया है.”

रश्मि बोली, “बेटे, तेरे पापा को  5 दिन पहले लकवा मार गया था. रातदिन वे बिस्तर पर ही रहते हैं.  अब बता, उन्हें ऐसी स्थिति में छोड़ कर कैसे आ सकती हूं? और तुम लोगों से बात किये बिना मैं भूपिंदर को ले कर तुम्हारे घर कैसे आ सकती थी?”

इस से पहले आदित्य कुछ कहता, सोनाक्षी बोल उठी, “मम्मी, आप यहीं रहिए, हमारा फ़्लैट तो बहुत छोटा हैं. पापा की अच्छे से देखभाल  नहीं हो पाएगी.  हम एक के बजाय दो नर्स ड्यूटी पर लगा देंगे. फिर मम्मी, मैं घर पर भी हौस्पिटल जैसा माहौल नहीं चाहती हूं. आदित्य, तुम ये पैसे मम्मी को दे दो, पापा की अच्छी देखभाल हो जाएगी.”

आदित्य बोला, “मम्मी, नर्स का इंतजाम मैं कर दूंगा. आप चलो यहां से, बहुत कर लिया आप ने पापा के लिए.”

रश्मि बोली, “आदित्य बेटा, तू मेरी चिंता मत कर, पर मैं भूपिंदर को इस हाल में छोड़ कर नहीं जा सकती.”

आदित्य बोला, “मम्मी, कब तक  तुम पापा के कारण जिंदगी  से दूर रहोगी?”

रश्मि बोली, “बेटा, तू खुश रह, मैं तो इस साथ के लिए शापित हूं. पहले मानसिक यातना भोगती थी, अब अकेलापन भोगने के लिए शापित हूं.”

आदित्य बोला, “मम्मी, यह शापित जीवन आप ने खुद ही चुना है अपने लिए. सामने खुला आकाश है. पर, आप को इस पिंजरे में ही रहना पसंद है.”

यह कह कर आदित्य 20 लाख रुपए मेज पर रख कर तीर की तरह निकल गया.

हर्बल दवाएं बिना जानकारी न लें

हर्बल औषधियों से जुड़ा ज्ञान दुनिया की हर मानवजाति, संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा रहा है. कई जड़ीबूटियों को तो सोने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण माना गया है. अदरक, सेमल लहसुन, अश्वगंधा, हलदी, लौंग, धनिया, आंवला, अमरूद और ऐसी हजारों जड़ीबूटियों के प्रभावों की प्रामाणिकता आधुनिक विज्ञान साबित कर चुका है.

कई जड़ीबूटियों को आधुनिक औषधि विज्ञान ने बाकायदा दवाओं के तौर पर आधुनिक अमलीजामा पहनाया भी है. सिनकोना नामक पेड़ से प्राप्त होने वाली छाल से क्वीनोन नामक दवा तैयार की गई और इसे मलेरिया के लिए रामबाण माना गया.

दुनिया के तमाम देश शोधों और उन के परिणामों से प्रोत्साहित हो कर कई हर्बल दवाओं के वैज्ञानिक प्रमाण खोजने के प्रयास कर रहे थे. आज डंडेलियान नामक पौधे से कैंसर रोग के इलाज की दवा खोजी जा रही है, तो कहीं किसी देश में सदाबहार और कनेर जैसे पौधों से त्वचा पर होने वाले संक्रमण के इलाज पर अध्ययन हो रहा है.

परंपरागत ज्ञान का वैज्ञानिक प्रमाणन जरूरी है ताकि हम यह हकीकत समझ पाएं कि किस जड़ीबूटी से कौन सा रोग वाकई में ठीक होता है और ऐसा कैसे संभव हो पाता है. लेकिन मैं जड़ीबूटियों में खास रसायनों को अलग कर के औषधियों को कृत्रिम रूप से तैयार करने का पक्षधर नहीं.

पौधों में होते हैं रसायन

औषधीय पौधों में सिर्फ एक नहीं, हजारों रसायन और उन के समूह पाए जाते हैं. और कौन जाने, कौन सा रसायन प्रभावी गुणों वाला होता है. इसलिए मार्कर कंपाउंड (किसी जड़ीबूटी में पाए जाने वाला खास रसायन) शोध पर कई जानकार सवालिया निशान खड़े करते हैं. जड़ीबूटियों में से महत्त्वपूर्ण रसायनों को अलग कर के उन्हें कृत्रिम रूप से तैयार करने की कोशिश असरकारक न होगी. इस बात को साबित करने के लिए एस्पिरिन से बेहतर उदाहरण क्या होगा.

एस्पिरिन टेबलेट्स में मार्कर कंपाउंड के नाम पर सौलिसिलिक एसिड होता है जिसे सब से पहले व्हाइट विल्लो ट्री नामक पेड़ से प्राप्त किया गया. सौलिसिलिक एसिड को कृत्रिम तौर पर तैयार किया गया और एस्पिरिन नामक औषधि बाजार में लाई गई. दर्दनिवारक गुणों के लिए मशहूर इस दवा के सेवन के बाद कई रोगियों को पेट में गड़बड़ी और कइयों को पेट में छालों की समस्याओं से जूझना पड़ा. जबकि व्हाइट विल्लो ट्री की छाल का काढ़ा कई हर्बल जानकार दर्दनिवारण के लिए सदियों से देते आएं हैं और रोगियों को कभी किसी तरह की शिकायत नहीं हुई. क्या नतीजा निकालेंगे आप?

दरअसल, छाल के काढ़े में वे रसायन भी हैं जो छालों की रोकथाम के लिए कारगर माने गए हैं और कई रसायन ऐसे भी हैं जो पेटदर्द और दस्त रोकने आदि के लिए महत्त्वपूर्ण हैं. सब से बड़ा सवाल दवाओं या जड़ीबूटियों की गुणवत्ता को ले कर बनता है. अधिकांश वैद्य, जानकार और कई फार्मा कंपनियां भी दवाओं को तैयार करने वाली जड़ीबूटियों (कच्चे माल) को बाजार से खरीदते हैं. ऐसे में कच्चे माल की गुणवत्ता पर सवाल उठना लाजिमी है.

दूसरी सब से बड़ी चिंता की

बात झोलाछाप और गैरप्रामाणिक जानकारियों का इंटरनैट या सोशल साइट्स व ढोंगी बाबाओं की ओर से संचारित होना है. आधीअधूरी जानकारी पा कर लोग खुद चिकित्सक बन जाते हैं और घर पर ही इलाज कर बैठने की सोच लेते हैं सिर्फ यह मान कर कि हर्बल दवाएं हैं, कोई दुष्प्रभाव या साइडइफैक्ट तो होगा नहीं.

हर्बल दवाओं से नुकसान

कई बार हम जानेअनजाने किसी डाक्टर को अपनी समस्याएं बताए बगैर मैडिकल स्टोर से दवाएं खरीद लाते हैं और मुफ्त में समस्याएं भी घर ले आते हैं. हर्बल लैक्सेटिव्स (विरेचक औषधि) बाजार में ओवर द काउंटर यानी ओटीसी के रूप में कहीं भी मिल जाती हैं. हम में से ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें इन से जुड़े दुष्प्रभावों की जानकारी तक नहीं. ये विरेचक औषधियां न सिर्फ शरीर में इलैक्ट्रोलाइट संतुलन को बिगाड़ सकती हैं बल्कि कई तरह के विटामिंस और वसीय पदार्थों का विघटन भी कर देती हैं.

मूत्र संबंधित विकारों के भी दुष्प्रभावों की भी बात करनी जरूरी है जिन की वजह से विटामिन बी-1, बी-6, विटामिन सी, सीओक्यू 10 और शरीर के इलैक्ट्रोलाइट्स कम होने लगते हैं. शरीर में कैफीन की मात्रा ज्यादा होने से विटामिन ए, विटामिन बी कौंप्लैक्स, लौह तत्त्वों और पोटैशियम जैसे पोषण तत्त्वों में कमी आने लगती है.

अकसर हर्बल दवाओं को दुष्प्रभावहीन बताया जाता है और इसी कारण लोग बगैर सोचेसमझे इन दवाओं को अपना लेते हैं. वे इस बात को भूल जाते हैं कि इन की असंतुलित मात्रा या किसी प्रशिक्षित चिकित्सक की सलाह लिए बगैर इन का उपयोग गलत असर भी डाल सकता है.

वैज्ञानिक एल्विन लेविस के शोध के अनुसार, एलोवेरा के जैल की अधिक मात्रा, जिसे अकसर लोग बगैर जानकारी के तमाम रोगोपचार के लिए इस्तेमाल करते हैं, शरीर के लिए नुकसानदायक भी हो सकती है. इस के चलते पेटदर्द, पेचिस जैसी आम समस्याओं के अलावा हृदय से संबंधित कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. पेड़पौधों में जो रसायन पाए जाते हैं, उन का कई बार सीधा सेवन घातक साबित होता है.

फ्लेवेनौइड नामक रसायन की अधिकता होने से मानव शरीर में कई दुष्परिणाम देखे जा सकते हैं. अमेरिकन जर्नल औफ मैडिसिंस में वैज्ञानिक अर्नस्ट के रिव्यू लेख की मानी जाए तो फ्लेवेनौइड एनीमिया जैसी समस्याओं के अलावा आप की किडनी को भी क्षतिग्रस्त कर सकते हैं.

जरूरी है चिकित्सकीय सलाह

हर्बल दवाएं किसी प्रैस्क्रिप्शन के बिना आसानी से बाजार में मिल जाती हैं लेकिन मेरी समझ से आप को हर्बल दवाओं के सेवन के वक्त चिकित्सकीय सलाह (मैडिकल गाइडैंस) लेना जरूरी है, क्योंकि अकसर हर्बल दवाओं की उपयोगिता के बारे में सभी लोग बात करते हैं लेकिन किन्हीं दूसरी दवाओं के साथ होने वाले रिऐक्शन के बारे में ज्यादा लोगों को समझ नहीं है. यही बात उन डाइटीशियंस को भी समझनी चाहिए जो चिकित्सा विज्ञान की समझ के बगैर खानपान में खासे परिवर्तन जरूर करा देते हैं लेकिन किसी खास तत्त्व की अधिकता या कमी के दुष्परिणामों की फिक्र नहीं करते.

शरीर में किसी पोषक तत्त्व की कमी है तो पोषक तत्त्व की पूर्ति के लिए औषधियों की तरफ दौड़ लगाने के बजाय तत्वों की कमी होने के कारणों को खोजा जाए और इन कारणों का प्राकृतिक रूप से निवारण किया

जाए. यदि अनियंत्रित खाद्यशैली, भागदौड़ और तनावग्रस्त जीवन में हम अपने शरीर को ढाल लेते हैं तो शरीर बीमारियों की चपेट में आता है.

हर्बल ज्ञान को सब से बड़ा नुकसान पहुंचाया

है इस के अंधाधुंध बाजारीकरण और झोलाछाप जानकारियों ने. कई जानकार जड़ीबूटियों के बारे में इतनी सारी बातें बोल जाते हैं कि ऐसा लगने लगता है कि मानो कुछ जड़ीबूटियां अमृत तो हैं. तथाकथित जानकार इस तरह की वनस्पतियों को हिमालय से ले कर सुदूर पूर्वी राज्यों के पहाड़ी इलाकों से लाने और फिर दवा बनाने का दावा करते हैं. दरअसल, हर वनस्पति की एक खासीयत होती है. हरेक वनस्पति असरदार है. इस बात को सही जानकार भी अच्छी तरह जानते हैं.

औषधियों का बाजार करोड़ों रुपयों का है किंतु प्राकृतिक रूप से शरीर स्वस्थ रखना लगभग मुफ्त है और इस मुफ्त इलाज के लिए किसी चिकित्सक की जरूरत भी नहीं, सिर्फ अपना जीवनयापन, खाद्यशैली, और रोजमर्रा की जिंदगी को सटीक कर लिया जाए तो शरीर खुद ही अपनी रक्षा कर सकता है. रोगों का उपचार बिलकुल संभव है, किंतु यह तभी होगा जब रोगों के कारणों को हम समझ पाएं और फिर कारणों के निवारणों पर अमल किया जाए.

पति का व्यवहार बहुत उदासीन हो चुका है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 36 वर्षीया महिला हूं, मेरे पति 41 वर्ष के हैं. हम दोनों की 14 साल पहले अरेंज्ड मैरिज हुई थी. मैं उन से आज भी उतना ही प्रेम करती हूं जितना शादी के बाद करती थी, वे भी मुझे बहुत खुश रखते थे. हम साथ में घूमने जाते, पिक्चर देखते और ढेरों बातें किया करते. पर अब उन का व्यवहार बहुत उदासीन हो चुका है. हमारे 2 बच्चे हैं, मैं उन की देखभाल में दिन काट लेती हूं परंतु रात में मेरी इच्छा होती है कि मैं उन से अपने मन का हाल कहूं पर वे किसी तरह की रुचि नहीं दिखाते. कभीकभी तो मन होता है कि उन्हें तलाक दे कर कहीं दूर चली जाऊं, परंतु ऐसा करने की हिम्मत ही नहीं होती. बताएं मैं इस दुविधा से कैसे निकलूं.

जवाब

आप के कहे अनुसार आप की दुविधा की जड़ आप के पति की उदासीनता है. वे आप से बात नहीं करते, आप को समय नहीं देते आदि बातें आप के मन को छलनी कर रही हैं. परंतु क्या आप ने यह जानने का प्रयास किया कि आप के हमेशा चहकने वाले पति जीवन के इस दौर में उदासीन क्यों रहने लगे हैं. उन के  2 बच्चे हैं जिन की परवरिश, आप की इच्छाएं और घर का पूरा खर्च उन के सिर है. वे भी खुद को अकेला महसूस करते होंगे. इस उलझन में आप का उन्हें तलाक देने के बारे में सोचना पूर्णरूप से गलत है. उन्हें भी उन के मन की बात कहने दीजिए, न बताएं तो जबरदस्ती पूछिए. उन्हें थोड़ा रिझाने की कोशिश करें. बच्चों की देखरेख के साथसाथ मनोरंजन के लिए बाहर आइए-जाइए, किताबें पढि़ए किट्टी पार्टी जौइन कीजिए और रात को जब पति वापस आएं तो उन की दिनचर्र्या पूछिए. कोशिश कीजिए कि छुट्टी के दिन पूरा परिवार कहीं घूम आए. समय के साथ आप को थोड़ा तो समझौता करना होगा.

 

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

 

राहत: श्यामा को क्यों चुभने लगी रूपा?

रूपा का पत्र पढ़ कर मन चिंतित हो उठा. वह आ रही है और अभी वेतन प्राप्त होने में 10 दिन शेष हैं. खाली पड़े नाश्ते के डब्बे मुझे मुंह चिढ़ा रहे थे. नाश्ते में मक्खन का प्रयोग कब का बंद हो चुका है. बड़ी तो सब समझती है. वह डबलरोटी पर चटनी, जैम कुछ भी लगा कर काम चला लेती है पर छोटी वसुधा तो गृहस्थी की विवशताओं से अनजान है. वह नित्यप्रति मक्खन के लिए शोर मचाती है. ऐसे में रूपा आ रही है पहली बार नन्हे बच्चे के साथ. पिछली बार आई थी तो 200 रुपए की साड़ी देते कैसी लज्जा ने आ घेरा था. फिर इस बार तो पति व बच्चे के साथ आ रही है. कितना भी कम करूं हजार रुपए तो खर्च हो ही जाएंगे. सामने रूपा का पत्र नहीं मानो अतीत का पन्ना फड़फड़ा रहा था. पिताजी ईमानदार, वेतनभोगी साधारण सरकारी कर्मचारी थे. जहां उन के सहयोगियों ने जोड़तोड़ लगा कर कार व कोठी खरीद ली वहीं वे अपनी साइकिल से ही संतुष्ट रहे. उन के कनिष्ठ जीहुजूरी व रिश्वत के बल पर पदोन्नति पाते गए जबकि वे हैडक्लर्क की कुरसी से ही जीवनभर चिपके रह गए.

मेरे जन्म के पश्चात जब 5 वर्ष तक घर में कोई और शिशु न जन्मा तो पुत्र लालसा में अंधी मां अंधविश्वासों में पड़ गईं, किंतु इस बार भी उन की गोद में कन्यारत्न ही आया. रूपा के जन्म पर मां किंचित खिन्न थीं. पिता के माथे पर भी चिंता की रेखाएं गहरी हो उठी थीं किंतु मेरी प्रसन्नता की सीमा न थी. मेरा श्यामवर्ण देख कर ही पिता ने मुझे श्यामा नाम दे रखा था. अपने ताम्रवर्णी मुख से कभीकभी मुझे स्वयं ही वितृष्णा हो उठती. मांपिताजी दोनों गोरे थे फिर प्रकृति ने मेरे साथ ही यह कृपणता क्यों की. किंतु रूपा शैशवावस्था से ही सौंदर्य का प्रतिरूप थी. विदेशी गुडि़या सी सुंदर बहन को पा कर मेरी आंखें जुड़ा गईं. उसे देख मेरा प्रकृति के प्रति क्रोध कुछ कम हो जाता, अपने कृष्णवर्ण का दुख मैं भूल जाती. मैं अपनी कक्षा में सदैव प्रथम आती थी. परंतु बीए के पश्चात मुझे अपनी पढ़ाई से विदा लेनी पड़ी. पिताजी की विवश आंखों ने मुझे प्रतिवाद भी न करने दिया. रूपा अब बड़ी कक्षा में आ रही थी और पिताजी दोनों की शिक्षा का भार उठा सकने में असमर्थ थे. हम जिस मध्यमवर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं वहां कन्या का एकमात्र भविष्य उस का विवाह ही है, इस में भी मेरा श्यामवर्ण आड़े आ रहा था. यहांवहां, भागदौड़ कर के आखिरकार पिताजी ने मेरे लिए एक वर जुटा लिया. प्रभात न केवल एक सरकारी अनुष्ठान में सुपरवाइजर थे वरन उन के पास अपना स्कूटर भी था. जिस का जीवन साइकिल के पहियों से ही घिसटता रहा हो उस के लिए स्कूटर वाला जामाता पा लेना वास्तव में बहुत बड़ी बात थी.

बिना दानदहेज के विवाह संपन्न हो गया. प्रभात सुलझे विचारों के थे. उन के साथ सामंजस्य मुझे कुछ कठिन न लगा. रूपा तो अपने स्कूटरधारी जीजा पर जीजान से कुरबान थी. कभी प्रभात उसे स्कूटर पर चाटपकौड़े खिला लाते तो वह हर्षातिरेक में उछल पड़ती. दिनभर उन्हीं का गुणगान करती. रूपा का आगमन मेरे हृदय में उल्लास का प्रकाश फैला देता. मेरी डेढ़दो सौ रुपए की साडि़यां ही उसे अमूल्य लगतीं. वह बारबार उन्हें छू कर पहनओढ़ कर भी तृप्त न हो पाती. कभी तीजत्योहार पर हम उसे रेशमी सूट सिलवा देते तो उस की निश्छल आंखों में कृतज्ञता के दीप जल उठते. पिता के घर में हम केवल सूती वस्त्र ही पहन पाते थे. पिताजी ने जीवनभर खादी ही पहनी थी. खादी उन का शौक नहीं, विवशता थी. गांधी जयंती पर खादी के वस्त्रों पर विशेष छूट मिलती, तभी पिताजी हमारे लिए सलवार, कुरतों के लिए छींट का कपड़ा लाते. उन्हीं दिनों वे सस्ती चादरें व परदे भी खरीद लिया करते थे. उन के अल्प वेतन में मां की साड़ी कभी न आ पाती. मामा अवश्य कभीकभी मां को बढि़या रेशमी साड़ी दिया करते थे. उन साडि़यों को मां सोने सा सहेज कर रखतीं और विशेष अवसरों पर ही पहनती थीं.

मेरे विवाह पर वर पक्ष ने खालिस सोने के झुमके और हार के साथ 11 साडि़यां दी थीं, जिन्हें देख कर सब प्रसन्न हो उठे. सब ने मां को बारबार बधाई दी और पिताजी से खुशी जाहिर की. मां तो बावरी सी हो उठी थीं. मुझे हृदय से लगा कर कहतीं, ‘कौन कहता है मेरी श्यामा काली है, वह तो हीरा है. तभी तो ऐसा घरवर मिला है,’ सभी मेरी खुशहाली की सराहना करते. प्रभात की निश्चित आय में मेरी गृहस्थी की गाड़ी सुचारु रूप से चल रही थी. मध्यवर्गीय कन्या के स्वप्न भी तो सीमित ही होते हैं. मैं ने कोठी, बंगला, गाड़ी के स्वप्न कहां देखे थे. आशा से अधिक सुख मेरी झोली में आ गिरा था. रूपा को प्रकृति ने सौंदर्य खुले हाथों से बांटा था पर बुद्धि देने में कृपणता दिखा गई. 2 प्रयासों में भी वह बीए न पास कर सकी तो पिताजी हताश हो गए और उस के विवाह के लिए चिंतित रहने लगे. प्रथम प्रयास में ही रूपा का विवाह एक समृद्ध परिवार में तय हो गया. वर पक्ष उस के सौंदर्य पर ऐसा मुग्ध हुआ कि झटपट हीरे जडि़त 2 वलय, रूपा के हाथों में पहना कर मानो उसे आरक्षित कर लिया. वर पक्ष की इस शीघ्रता पर हम दिल खोल कर हंसे भी थे. रूप की कनी कहीं हाथों से न निकल जाए, इसलिए उन्होंने विवाह तुरंत करना चाहा.

अभी तक मैं संपन्न न सही किंतु सुखी अवश्य थी. किराए का ही सही, हमारे पास छोटा सा आरामदेह घर था, प्यार करने वाला पति, अच्छे अंकों से पास होने वाली 2 अनुपम सुंदर बच्चियां. सुखी होने के लिए हमें और क्या चाहिए. परंतु रूपा का विवाह होते ही अचानक मैं बेचारी हो उठी. मां अकसर रूपा के ससुरकुल के वैभव का बखान करतीं, ‘रूपा के पति का पैट्रोल पंप है. ससुर की बसें चलती हैं. उस के 4 मकान हैं,’ आदिआदि. रूपा सुखी है, संपन्न है. इस से अधिक प्रसन्नता का विषय मेरे लिए और क्या हो सकता है. मैं भी अपने प्रतिवेशियों को रूपा के ससुरकुल की संपन्नता का विवरण दे कर प्रभावित करने का प्रयत्न करती. मौसी का घर कितना बड़ा है. उन के घर कितने नौकर हैं, कितनी गाडि़यां हैं, यह चर्चा अकसर मेरी बेटियां भी करती रहतीं.

पर अब सबकुछ बदलाबदला सा नजर आने लगा था. कल तक प्रभात का स्कूटर ही मेरे पितृकुल के लिए गर्व का विषय था. आज रूपा की विदेशी गाड़ी के समक्ष वह खटारा साबित हो गया. मेरे सोने के झुमके और हार रूपा के हीरेमाणिक जड़े आभूषणों के समक्ष हेय हो उठे. मेरी सिल्क की साडि़यां उस के आयातित वस्त्रों के सामने धूमिल पड़ गईं. कोई भी चमत्कार प्रभात की आय में ऐसी वृद्धि न कर सकता था जिस से हम संपन्नता की चादर खरीद पाते. न हमें कोई खजाना मिलने की आशा थी. बौनेपन का एहसास तभी से मेरे मन में काई की तरह जमने लगा. बेटियां जब अपने घर की तुलना मौसी के बाथरूम के साथ करतीं तो मेरा मन खिन्न हो उठता. मातापिता व इकलौती छोटी बहन का परित्याग भी तो संभव न था कल तक मां गर्वपूर्वक कहती थीं, ‘श्यामा के घर से 11 साडि़यां आई थीं,’ पर अब कहती हैं, ‘बेचारी श्यामा के घर से तो मात्र 11 साडि़यां आई थीं और वे भी एकदम साधारण. रूपा की ससुराल का घर भी बड़ा है और दिल भी. तभी 51 साड़ी चढ़ावे में लाए थे, कोई भी हजार रुपए से कम की न थी.’

 

पिताजी सब समझते थे पर कुछ न कहते. बस, एक गंभीर मौन उन के चेहरे पर पसरा रहता. ऊंट बहुत ऊंचा होता है पर जब वह पहाड़ के सामने आता है तब उसे अपनी लघुता का ज्ञान होता है. मैं सुखी थी, संतुष्ट थी किंतु रूपा के वैभव की चकाचौंध से मेरी गृहस्थी में शांति न रही. मैं दिनरात आय बढ़ाने के उपाय सोचती रहती. कभी स्वयं नौकरी करने का विचार करती. मैं चिड़चिड़ी होती जा रही थी. प्रभात नाराज और बेटियां सहमी रहने लगीं. अपनी पदावनति से मैं व्यथित थी. जिस घर में मेरा राजकुमारी की तरह स्वागत होता था, मेरे पहुंचते ही हर्ष और उल्लास के फूल खिल उठते थे, वहां अब मेरा अवांछित अतिथि की भांति ठंडा स्वागत होता. तीजत्योहार पर मां मुझे सूती साड़ी ही दे पाती थीं. मैं उसी में प्रसन्न रहती थी. परंतु अब देखती हूं, मां रूपा को कीमती से कीमती साड़ी देने का प्रयत्न करतीं. उस के घर मेवामिष्ठान भेजतीं. फिर मेरी ओर बड़ी निरीहता से निहार कर कहतीं, ‘तू तो समझदार है, फिर तेरे यहां देखने वाला भी कौन है? रूपा तो संयुक्त परिवार में है. उस के घर तो अच्छा भेजना ही पड़ता है,’ मानो वे अपनी सफाई दे रही हों.

प्रभात के आते ही जो मां पहले उन की पसंद का हलवा बनाने बैठ जाती थीं अब अकसर उन्हें केवल चाय का कप थमा देतीं. किंतु रूपा के आते ही घर में तूफान आ जाता. उस की मोटर की ध्वनि सुनते ही मां द्वार की ओर लपकतीं. तब उन का गठिया का दर्द भी भाग जाता. रूपा के पति के आते ही प्रभात का व्यक्तित्व फीका पड़ जाता. कभीकभी तो उन्हें अपनी आधी चाय छोड़ कर ही बाजार नाश्ता लेने जाना पड़ता. स्त्री सब कुछ सहन कर सकती है किंतु पति की अवमानना उसे स्वीकार नहीं होती. कल तक वे उस घर के ‘हीरो’ थे, आज चरित्र अभिनेता बन गए थे. प्रभात सरल हृदय के हैं. वे इन बातों पर तनिक भी ध्यान नहीं देते. रूपा के पति को छोटे भाई सा ही स्नेह देते हैं. उस के लिए कुछ करने में संतुष्टि पाते हैं किंतु मांपिताजी के बदले हुए व्यवहार से मुझे मर्मांतक पीड़ा होती. आज उसी रूपा का पत्र मेरे हाथ में है. वह आ रही है. उस की विदेशी गाड़ी मेरे जीर्णशीर्ण घर के समक्ष कैसी लगेगी? उस के बच्चे को कम से कम 2 सूट तो देने ही पड़ेंगे. पति पहली बार आ रहा है, उसे भी कपड़े देने पड़ेंगे. रूपा को तो वही साड़ी दे दूंगी जो प्रभात मेरे लिए शादी की सालगिरह पर लाए थे. प्रभात से छिपा कर पिछले दिनों मैं ने 2 ट्यूशन किए थे. उस के रुपए अब तक बचा कर रखे हैं. सोचा था, बच्चियों के पढ़ने के लिए मेजकुरसी खरीद लूंगी. परदे बदलने का भी विचार था पर अब सब स्थगित करना पड़ेगा. रूपा का स्वागतसत्कार भली प्रकार हो जाए, वह प्रसन्न मन से वापस चली जाए, यही एक चिंता थी.

संध्या को प्रभात के आने पर रूपा का पत्र दिखाया तो वे प्रसन्न हो उठे. जब मैं ने लेनदेन का प्रश्न उठाया तो बोले, ‘‘क्या छोटीछोटी बातों पर परेशान होती हो. हमारी गृहस्थी में जो है, प्रेम से खिलापिला देना. आज नहीं है तो नहीं देंगे, कल होगा तो अवश्य देंगे, क्या वह दोबारा नहीं आएगी?’’ प्रभात संबंधों की जटिलता नहीं समझते. छोटी बहन को खाली हाथ विदा करने से बड़ी विवशता मेरे लिए अन्य क्या हो सकती है. वे तो बात समाप्त कर के सो गए पर मुझे रातभर चिंता से नींद न आई. 3-4 दिन बीत गए. किसी गाड़ी की ध्वनि सुनाई देती तो हृदय की धड़कन बढ़ जाती. 5वें दिन रूपा का पत्र आया कि वह नहीं आ रही है और मैं ने राहत की सांस ली.

शादी से बाहर क्यों रोमांस खोजती हैं औरतें, ये हैं हैरान करने वाले वजह

दुनिया के दूसरे देशों के साथसाथ भारत में भी महिलाएं अपने यौनजीवन को ले कर चिंता में घिरी हुई हैं. ‘सैक्‍स’ शब्द का उच्चारण करना ही पारंपरिक समाजों में गलत माना जाता रहा है. भारतीय समाज में यौन संबंधों या यौन परेशानियों पर बातचीत पतिपत्नी के बीच ही नहीं होती है तो घर के अन्य सदस्यों से कैसे हो सकती है? आज के दौर में महिलाएं अपनी सैक्‍स इमेज, यौन उत्‍तेजना, चरम संतुष्टि, कामेच्छा और परेशानियों को ले कर समस्याग्रस्त रहने लगी हैं.

भारत जैसे परंपरागत देश में सैक्स या शारीरिक अंतरंगता संबंधी किसी भी विषय पर बातचीत करने की लगभग मनाही है. हमारा ऐसा समाज है जहां युवा यह सोचसोच कर बड़े होते हैं कि यौन अंतरंगता ऐसी गतिविधि है जो सिर्फ विवाहित जोड़ों की जिंदगी का हिस्सा होती है और विवाहेतर नजदीकियों को हमारे समाज में अच्‍छा नहीं समझा जाता.

भारत के प्राचीन धर्मग्रंथों और पुराणों आदि में सती सावित्री स्त्री को देवीतुल्य माना गया है जबकि अपने पति के अलावा किसी पराए पुरुष के साथ यौन संसर्ग करने वाली औरत को कुलटा कहा गया है. लेकिन आप को यह जानकर हैरानी होगी कि बेवफाई के मामले में विवाहित भारतीय महिलाएं देश में पुरुषों के मुकाबले आगे हैं.

ग्लीडेन सर्वे में खुलासा

यह खुलासा ग्लीडेन द्वारा हाल में कराए एक सर्वे से हुआ है. ग्लीडेन एक औनलाइन डेटिंग ऐप है और एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की तलाश करने वाले विवाहितों की संख्या इस ऐप पर बड़ी तेजी से बढ़ रही है, खासतौर से महिलाओं की. हाल ही में इस ने अपने आंकड़ों के आधार पर एक शोध किया है. इस शोध के मुताबिक, 53 फीसदी भारतीय पत्नियों ने अंतरंग विवाहेतर संबंधों में लिप्‍त होने की बात स्‍वीकार की है जबकि ऐसे पुरुषों का आंकड़ा 43 फीसदी पाया गया है.

ग्लीडेन डौट कौम को महिलाओं का एक ग्रुप चलाता है. यह ऐप महिला यूजर्स के लिए पूरी तरह निशुल्क है. इस प्लेटफौर्म पर आने वालों का आयुवर्ग 34 से 49 वर्ष तक का है. भारत में ज्यादातर वकील, डाक्टर्स और वरिष्ठ कार्यकारी जैसे कई पेशे के लोग इस प्लेटफौर्म से जुड़े हुए हैं.

ग्लीडेन का दावा है कि यह आप की पहचान छिपाने की पूरी गारंटी देता है. इस प्लेटफौर्म पर आने के लिए बच्चों की संख्या, वैवाहिक स्थिति, व्यवसाय, आय, अपना फिगर, बालों का रंग और लंबाई, आंखों का रंग व आदतें सहित कई अन्य निजी जानकारियां देनी पड़ती हैं.

ग्लीडेन के सर्वे से यह भी खुलासा हुआ कि विवाहेतर संबंधों को ले कर खासतौर से जब उस में रोमांस भी घुला हो तो बड़े शहरों की महिलाएं काफी खुली सोच रखती हैं. इस सर्वे में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता, पुणे और अहमदाबाद जैसे प्रमुख भारतीय शहरों की 25 से 50 वर्ष की उम्र की विवाहित महिलाओं को शामिल किया गया था.

सर्वे से यह भी पता चला है कि भारत में करीब 50 फीसदी शादीशुदा लोगों ने अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य के साथ अंतरंग संबंध होने की बात स्वीकार की है.

ऐसी महिलाएं, जो अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ नियमित रूप से यौन संबंध बना कर रखती हैं, उन पुरुषों से आगे हैं जो विवाहेतर यौनरिश्ते निभा रहे हैं. इस सर्वे से सब से हैरान करने वाली जो बात सामने आई है वह यह कि भारतीयों का मानना है कि कोई भी व्‍यक्ति एक वक्त में 2 अलगअलग लोगों के प्यार में पड़ सकता है.

सर्वे के मुताबिक, ऐसी शादीशुदा औरतों का प्रतिशत 40 प्रतिशत तक है जो किसी ऐसे पुरुष के साथ नियमित रूप से यौन संबंध रखती हैं जोकि उन का पति नहीं है जबकि केवल 26 प्रतिशत पुरुष ही किसी अन्य महिला के साथ शारीरिक स्तर पर नियमित संबंध रखते हैं.

रिश्तों के भीतर पनपते रिश्ते

भारत में करीब 50 प्रतिशत शादीशुदा पुरुषों ने यह स्वीकार किया है कि वे अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य के साथ भी अंतरंग संबंध रख चुके हैं, जबकि 10 में से 5 पुरुष कैजुअल सैक्‍स या वन-नाइट स्‍टैंड में लिप्त रहे हैं.

भारत में महिलाओं को रोजमर्रा की जिंदगी में काफी बेइज्जती और शर्मिंदगी उठानी पड़ती है, फिर वह चाहे सड़कों-चौराहों की बात हो या शयनकक्षों की निजता के स्‍तर पर. इसी के चलते वे अकसर अपनी यौनिकता (सैक्सुएलिटी) को ले कर खुलापन नहीं रख पातीं. भारतीय परिवारों में आज भी अधिकांश शादीशुदा महिलाओं के सामने सासससुर, ननददेवर के साथ रहने की मजबूरी है, लिहाजा पति के साथ वे ज्यादा खुल नहीं पाती हैं.

दोतीन बच्चे होने के बाद तो बच्चे भी उन के साथ बैडरूम शेयर करते हैं, जिस के चलते यौन आवश्यकताएं भी पूरी नहीं होतीं. यौनतृप्ति की चाह में जहां पुरुष घर से बाहर ठौर तलाशते हैं वहीं महिलाएं या तो घर-पड़ोस के अन्य युवाओं से देहसंबंध बना लेती हैं अथवा जिन के हाथ में स्मार्टफोन हैं वे डेटिंग ऐप, फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि पर दोस्त बना रही हैं और रोमांटिक बातों में ही यौनतृप्ति तलाश रही हैं. औनलाइन दुनिया में सक्रियता बढ़ने से वे खुद को अभिव्यक्त भी कर पा रही हैं.

खैर, ग्लीडेन जैसे विदेशी ऐप पर भारत के ग्रामीण परिवेश की महिलाएं नहीं जुड़ी हैं. अगर यह तबका जो भारत में सब से बड़ा तबका है, ग्लीडेन पर जुड़ा होता तो विवाहेतर संबंधों पर विस्फोटक जानकारी सामने आती क्योंकि भारतीय परिवारों में देवरभाभी संबंध, सालीजीजा संबंध इतने कौमन हैं कि इन पर किसी को आश्चर्य नहीं होता है.

रोज के अखबारों में 5 से 7 खबरें नाजायज यौनसंबंध और इन के चलते हत्या या हिंसा की छपती ही रहती हैं. नारायण दत्त तिवारी हों, मुलायमसिंह यादव हों या संजय सिंह जैसे कांग्रेसी नेता, विवाहेतर संबंधों से कौन अछूता रहा है? जिन के मामले खुल गए उन पर बातें होती हैं, जो नहीं खुले वो आराम से चल रहे हैं.

मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में आ कर काम करने वाले ग्रामीण परिवेश के लोग गांव में बीवीबच्चों के होते हुए यौन जरूरतों को पूरा करने के लिए शहरों में भी औरतों से संबंध बना लेते हैं. उधर, गांव में उन की पत्नियां भी घर के अन्य पुरुषों से या पड़ोसियों से संबंध बना कर भावनात्मक सुख व यौनतृप्ति पाती हैं.

परिवार के कितने काम के सोशल मीडिया पर शोक संदेश

बात कोविड के समय की है. सोशल मीडिया पर बहुत सारे शोक संदेश लोग दे रहे थे. मोहनलाल नामक एक व्यक्ति रेलवे से रिटायर हुए थे. उन के बेटे मदन ने अपनी फेसबुक पर उन की फोटो पोस्ट की जिस में उन के गले में फूलमाला पड़ी हुई थी. बेटे मदन ने लिखा पिताजी रिटायर हो गए. सफलतापूर्वक नौकरी की. उस के नीचे कमैंट में कई लोगों ने शोक संदेश लिख दिए. कुछ ने लाइक भी कर दिया.

शोक संदेश देने में जल्दी का कोई महत्त्व समझ नहीं आया. कई बार छोटेबड़े सभी के साथ ऐसा हो गया कि वह अस्पताल में भरती है. किसी ने उस के मरने की अफवाह उड़ा दी. ऐेसे में बिना सच का पता किए लोगों ने शोक संदेश देने शुरू कर दिए. बाद में पता लगा कि वह इंसान तो अभी जिंदा है. पहली बात बिना किसी सच को जाने ऐसे संदेश देना बहुत ही गलत बात होती है. इस से बचना चाहिए.

शोक संदेश में एक और चलन बहुत तेजी से बढ़ी है. महल्ले, अपार्टमैंट, सोसाइटी, घरपरिवार के ऐसे वाट्सऐप ग्रुप हो गए हैं जिन में लोग आपस में संदेश देते रहते हैं. इन में शोक संदेश भी दिए जाते हैं. इस ग्रुप में एक तो वह खुद नहीं होता जिस को शोक संदेश दिया गया है. आखिर वह संदेश किस काम का होता है ?

शोक संदेश में सब से प्रमुख बात यह होती है कि इसे भेजने की संख्या सैकड़ोंहजारों में होती है. जिस के घर शोक होता है उस के घर मिलने कितने लोग जाते हैं ? अंतिम संस्कार में कितने लोग हिस्सा लेते हैं? यह सख्या उंगली पर गिनने भर की होती है. आगरा की रहने वाली कविता सोशल मीडिया की इंफ्लुएंसर थी. 5 लाख उस के फौलोअर्स थे. एक दुर्घटना में उस की मौत हो गई. पोस्टमार्टम के बाद उस की बौडी के पास केवल उस के पिता और मां ही थे.

सोशल मीडिया से खत्म होती सामाजिकता

सोशल मीडिया ने सामाजिकता को खत्म कर दिया है. अब बात शोक संदेश की हो या बधाई संदेश की, सारे रिश्ते केवल सोशल मीडिया तक सीमित रह जा रहे हैं. पहले किसी के घर शोक संदेश होने पर लोग उस के घर जाते थे. अंतिम संस्कार में हिस्सा लेते थे. उस के घर वालों को हिम्मत बंधाते थे. उस के घर खानेपीने की व्यवस्था करते थे. दुख में हिस्सा लेते थे. अब सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली जाती है.

सोशल मीडिया पर विचारों की कमी है. यह भेड़चाल का हिस्सा है. शोक संदेश भी उस की तरह से हो गए हैं. यह दुनिया को दिखते हैं कि आप उस के शोक में शामिल हैं. असल में जिस के शोक में शामिल हैं उसे पता ही नहीं होता है. सोशल मीडिया पर ऐसे शोक संदेश  देने से अच्छा है कि उस के घर जाएं. घर वालों की मदद करें. जब व्यक्ति बीमार होता है तब उसे मदद करने वालों की जरूरत होती है.

अंतिम संस्कार में शामिल होने वालों से घरपरिवार को मदद मिलती है. पहले समाज और घरपरिवार खुद अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी लेता था. भले वे लोग बहुत अमीर न हों पर दिल वाले होते थे. आज लोगों के पास सबकुछ है पर उन की सामाजिकता और उन का मर्म केवल सोशल मीडिया की पोस्ट तक सीमित हो गया है.

राजनीति और व्यवसाय

देश के विकास और गुरु बनने के दावों के बीच एनडीए के एक पार्टनर तेलुगूदेशम पार्टी के सांसद का संसद में खुलेआम यह ऐलान कि वे अपना व्यवसाय और राजनीति दोनों एकसाथ नहीं चला सकते, हकीकत पेश करता है. सांसद ने शिकायत की है कि जिस तरह जांच एजेंसियों को ‘हथियार’ दिए गए हैं उसे राजनीतिक बदला लेना आज आसान हो गया है. सांसद महोदय को अपना पुश्तैनी व्यापार ज्यादा प्रिय है, इसलिए वे राजनीति का जोखिम नहीं लेना चाहते.

यह इसी व्यवसायी व राजनेता की मन की बात नहीं है, जनसेवाओं में लगे लगभग सभी लोगों की बात भी है. सरकार व्यवसायियों की बांह उन के राजनीतिक संबंधों के कारण कब मरोड़नी शुरू कर दे, यह पता नहीं. हमारे देश में हमेशा परंपरा रही है कि शक्तिशाली शासकों के आगे व्यापारी हमेशा मूंछें नीची कर के चलता है क्योंकि उसे मालूम है कि शासकों के हाथ बहुत लंबे होते हैं.

अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन पर अगर सभी बड़े घरानों के मालिक उपस्थित थे और अगर दूर बेरीकैडों के परे बैठने पर भी तालियां बजा रह थे तो इसलिए कि वे किसी भी तरह शासकों से बैर नहीं लेना चाहते. व्यापारियों ने हमेशा देशीविदेशी शासकों का साथ दिया है क्योंकि वे जानते हैं कि व्यापार चलाते हुए शासक के खिलाफ नहीं जा सकते.

व्यापार चलाने में जिस तरह की अनुमतियां आज सरकारी दफ्तरों से लेनी होती हैं वे, इस सांसद के अनुसार, जानलेवा सी हैं. 72 से भी ज्यादा अनुमतियों के बाद कोई काम शुरू किया जा सकता है और अगर व्यापारी विपक्षी दल का है तो उन अनुमतियों को कहीं भी अटकाया जा सकता है. जो आज सत्ता के साथ वाली पार्टी में है, कल विपक्ष में बैठने को मजबूर हो सकता है और उस के राजनीतिक कैरियर के साथसाथ उस का व्यावसायिक कैरियर भी दांव पर लग सकता है.

यह दुखद स्थिति है क्योंकि राजनीतिक दलों को जिंदा रखने और लोकतंत्र को बचाने में व्यवसायियों की मुख्य भूमिका होती है. वे ओपीनियन भी बनाते हैं और दलों को चुनावी लड़ाई में फंडरूपी सहयोग दे कर विपक्ष को जिंदा भी रखते हैं. विपक्ष के पास अगर धन देने वाले नहीं होंगे तो देश का लोकतंत्र एक संवैधानिक ढोल बन कर रह जाएगा. इलैक्टोरल बौंड्स का जो भी आंकड़ा सामने है उस से साफ है कि अभी भी सारा पैसा एक ही पार्टी को जा रहा है जिस के अवैतनिक वर्कर हर मंदिर और मंदिर से जुड़े व्यवसायों में भी लगे हैं जहां न ईडी, सीबीआई के हाथ पहुंचते हैं, न लोकल पुलिस के.

लोकतंत्र को असल में बचाना है तो व्यवसायियों को राजनीति में सुरक्षा मिलनी चाहिए, हालांकि, यह सिर्फ एक सपना सा ही है.

अमीरों के अमीर

दुनिया में अमीरी का हाल यह है कि आज विश्वभर के 5 सब से अमीरों के पास 869 बिलियन डौलर की संपत्ति है और हर रोज वे अगर 10 लाख डौलर भी खर्च कर डालें तो उन्हें 476 साल लगेंगे पूरा खजाना खाली करने में. ये 869 बिलियन डौलर होते कितने हैं, डौलरों में लिखें तो ये 869,000,000,000 होते हैं. रुपए में गिनना हो तो इस संख्या को 83 से गुणा कर दें.

ये अमीर क्यों हैं? इन्होंने पैसा लूटा नहीं है. इन्होंने सरकारों की तरह टैक्स भी नहीं लगाया जो बंदूक की नली के सहारे आम जनता से छीना जाता है. मोटेतौर पर देखा जाए तो इन्होंने वे प्रोडक्ट्स या सर्विसेज जनता को दीं जिन्हें जनता ने अपनी इच्छा से खरीदा और मुंहमांगे दाम दिए पर, कोई जबरदस्ती नहीं थी.

फिर इन अमीरों से जलन क्यों है? जलन इसलिए है कि यह ठीक है कि इन्होंने कुछ नई चीजें बनाईं, कुछ सेवाएं दीं, कुछ खोजें कीं पर क्या इन के बदले वे मनमाने दाम वसूलने का हक रखते हैं? उन्होंने असल में उस सामाजिक गठन का फायदा उठाया जो समाज ने अपने बचाव के लिए बनाया था, इन्होंने उन चीजों को बहका कर, बहला कर, फुसला कर बेचा और उन दामों पर बेचा, जिन पर बेचने का हक इन के पास नहीं था.

इन 5 में एलन मस्क और गौतम अडानी जैसे लोग शामिल हैं. एलन मस्क ने बहुत सी नई चीजें समाज को दीं पर गौतम अडानी ने केवल पैसा जमा करने के नए तरीके खोजे.

इन अमीरों ने बंदूक की नली का इस्तेमाल नहीं किया पर बंदूक की नली को पकड़ने वालों को इस्तेमाल किया. आज भारत में हर टैक्स औनलाइन हो गया है. एक तरह से यह सरल हो गया है पर क्या आप जानते हैं कि सरकार ने औनलाइन प्लेटफौर्मों को बनाने के लिए देश और दुनिया की कितनी इंटरनैट, सौफ्टवेयर और टैलीफोन कंपनियों को अरबोंखरबों दिए होंगे. आधार कार्ड के पीछे अरबों रुपए खर्च हुए और उन में से बहुत से रुपए 5 सब से अमीरों के हाथों में गए.

ये 5-10 अमीर आज सरकारों की नीतियों को ही नहीं, सरकारों को बदल सकते हैं. अमेरिका का फौक्स टीवी चैनल इन अमीरों के हाथ बिका है. डोनाल्ड ट्रंप इन का मोहरा हैं. भारत के सारे अमीर राम मंदिर के उद्घाटन में तो गए पर राम दरबार में नहीं. वे दरअसल राज दरबार में हाजिरी लगाने को गए. उन्होंने राम मंदिर बनवाया हो या नहीं पर उन्हें जरूर बनाया है जिन्होंने राम मंदिर बनवाया है.

यह हर देश में हुआ है. 5 अमीरों के साथ 500 और बेहद अमीर हैं जो दुनिया की आधी बचत पर बैठे हैं. वे ही सरकारों की नीतियां बनवाते हैं. वे ही लोगों को एक तरफ फालतू में खर्च करने को उकसाते हैं तो दूसरी ओर पास के या दूर के दुश्मन से लड़ने के लिए भड़काते हैं. क्यों? क्योंकि इसी से उन के पास पैसा बनता है. हर युद्ध इन अमीरों को और अमीर करता है जबकि लाखों को दानेदाने के लिए मुहताज करता है, विधवाएं बनाता है, अनाथ बनाता है.

दुनियाभर में अब संपत्ति पर टैक्स लगभग नहीं है पर ब्रैड पर हर जगह है. आम आयकर में भी अमीरों के लिए तरहतरह की छूटें हैं पर गरीबों को एक गज कपड़ा खरीदने पर भी टैक्स देना होता है. अमीरों का अरबों कर्ज माफ हो जाता है पर गरीबों का कर्ज तब तक माफ नहीं होता जब तक वे सड़क पर रहने न लगें.

पहले सिर्फ राजा अमीर होते थे. फिर धर्म के दुकानदार अमीर होने लगे. आज संपत्ति के रखवाले और टैक्नोलौजी के मालिक अमीर हो रहे हैं. धर्म और सरकार ने टैक्नोलौजी के साथ मिल कर 8 अरब गुलाम पैदा कर लिए हैं जिन के 5 सब से अमीर मालिकों के पास ये 876 बिलियन डौलर हैं.

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