सवाल
मेरी ननद की शादी को अभी केवल 4 महीने हुए हैं. वर का चुनाव घर वालों ने स्वयं किया था अर्थात ननद की अरेंज्ड मैरिज है. बावजूद इस के मेरी सास बेटी की ससुराल के सदस्यों के बारे में मीनमेख निकालती रहती हैं, जबकि सभी लोग काफी शिष्ट और शालीन हैं. सास दिन में कई कई बार फोन कर के बेटी के घर की खोज खबर लेती रहती हैं. उसे अनापशनाप सलाह देती हैं. उन का व्यवहार कहां तक उचित है? चाह कर भी मैं उन्हें मना नहीं कर सकती. क्या करूं कि वे अनावश्यक दखलंदाजी बंद कर दें?
जवाब
आप बहू हैं इसलिए यदि सास को कोई सलाह देंगी तो उन्हें नागवार गुजरेगा. इसलिए आप पति से कहलवाएं. वे अपनी मां को समझाएं कि वे बेटी के परिवार में हस्तक्षेप न करें. बेटे को समझाना आप की सास को अखरेगा नहीं और आप की चिंता भी दूर हो जाएगी.
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श्रृंगार रस, संगीत रस, हास्य रस, वाद्य रस और सब से रोचक स्वाद रस का भंडार है बनारस. साड़ी व कालीन उद्योग बनारस की प्रतिष्ठा में आज भी योगदान दे रहे हैं. बनारस अपने खानपान के लिए भी खास पहचाना जाता है. यहां की मिठाइयों का स्वाद लाजवाब है.
पहले यहां जो मिठाइयां बनती थीं उन में लड्डू, पेड़ा, बरफी, गुलाबजामुन, मगदल, खजूर, इमरती, बालूशाही, तिरंगी बरफी, राधाप्रिय, गांधी गौरव शामिल थीं. इन में से 2-4 को छोड़ कर अब भी वे सब मिठाइयां बिकती हैं. धीरेधीरे छेना ने अपना साम्राज्य फैलाना शुरू किया.
छेने की मिठाइयों में खीरमोहन, खीरकदम, रसमलाई, मलाईचाप, मलाई कोफ्ता, मलाई सैंडविच, मलाई के लड्डू, मलाई गिलौरी, मलाई पूड़ी, रसमाधुरी, रसमंजरी, राजभोग, रसगुल्ला, राजबहार आदि हैं. बनारस में छेने की मिठाइयों का चलन 5 दशक पूर्व हुआ था. पहले दुकानों पर खोये की चंद्रकला, लाल पेड़ा, केसरिया बरफी, गुलाबजामुन, इमरती, टिकिया बनती थीं.
बनारस की मिठाइयों में यहां के जानेमाने कारीगर व इस व्यवसाय के पारंगत कलाकार मिठाइयों के रंगरूप, आकारप्रकार तथा स्वाद को बदलते रहे व नई मिठाइयों को ईजाद भी करते रहे.
बनारस की मिठाइयों में मगदल को मिठाइयों का राजा माना जाता है. यह केवल जाड़े में बिकता है. यह यहां की सब से प्रिय मिठाई है. बनारस में वैसे तो मिठाइयों की सैकड़ों दुकानें हैं, लेकिन इन में से कई काफी मशहूर हैं. विदेशी या देशी पर्यटक
जब बनारस आते हैं तो यहां की खास मिठाइयां ले कर ही लौटते हैं. काशी में जितने महल्ले हैं उतनी तरह की मिठाइयां आज भी बिकती हैं. आप को जान कर आश्चर्य होगा कि सुविख्यात सितारवादक पं. रविशंकर को काशी के एक मिष्ठान कारीगर ने मिठाइयों का सितार बना कर भेंट किया था.
सुबह का आगाज
बनारस की सुबह का आगाज कचौड़ी, जलेबी के नाश्ते से होता है. बनारस की गलियां, नुक्कड़, हर जगह सुबह कचौड़ी, जलेबी के ग्राहकों की भीड़ जुट जाती है. दोपहर के बाद गरमागरम समोसों की बिक्री शुरू हो जाती है. बनारस में इधर कई सालों से दक्षिण भारतीय व्यंजनों ने भी अपना रंग जमा लिया है. बनारस की चटपटी चाट भी स्वाद के चटखारे लेने वालों के बीच काफी मशहूर है.
मलइयो के दीवाने
सुबहसुबह बड़ीबड़ी कड़ाहियों में बिकने वाली मलइयो का लोग कुल्हड़ में स्वाद लेते हैं. इसे पूसमाघ की मिठाई कहा जाता है. यह बहुत ही स्वादिष्ठ होती है.
मलइयो तैयार करने के लिए पहले कच्चे दूध को पकाया जाता है. बाद में इसे बड़े थाल में रख कर खुले आसमान के नीचे छत पर रख दिया जाता है. उसी दूध को सुबह मथनी से फेंटा जाता है, जिस से और भी झाग पैदा हो जाता है, फिर इस में छोटी इलायची, केसर, चीनी मिला कर फिर फेंटा जाता है. सुबह इसी को कड़ाही में रख कर बेचते हैं.
खई के पान बनारस वाला
बनारस के पान भी बहुत मशहूर हैं. ‘खई के पान बनारस वाला…’ गीत बनारस पर एकदम सटीक है. बनारसी पान खाते ही लोग मचल उठते हैं. वैसे तो पान, कत्था, सुपाड़ी, चूना सबकुछ बाहर से ही आता है, लेकिन बनारस में आने के बाद वह बनारसी हो जाता है.
यहां 2 पानदरीबा हैं – नया पानदरीबा, पुराना पानदरीबा. बनारस में मघई, देशी, जगन्नाथी, चंद्रकला, गंजाम, केतकी, सांची पान की बिक्री ज्यादा होती है. बनारस में पान के हर दुकानदार की अपनी अलग शैली होती है. खास बात यह है कि दुकानदार जिस ढंग से पान का बीड़ा बना कर लोगों के समक्ष पेश करते हैं, उन की वह अदा हर सैलानी के दिल को भा जाती है.
बनारसी ठंडई छाए बारहमासी
बनारस के खानपान में ठंडई का जिक्र न हो तो कुछ अधूरा सा लगता है. काशी यानी बनारस में पूरे वर्ष ठंडई की बिक्री होती है. यहां ठंडई के शौकीन अपनी पसंदीदा ठंडई पी कर तृप्त हो जाते हैं. बनारस में होली के पर्व पर ठंडई की डिमांड कुछ ज्यादा ही होती है.
बाजार से लौटते ही सब्जी का थैला पटक कर सुधा बेटी प्रज्ञा के कमरे की ओर बढ़ गई थी. गुस्से से उस का रोमरोम सुलग रहा था. प्रज्ञा फोन पर अपनी किसी सहेली से बात कर रही थी. खुशी उस की आवाज से टपक रही थी. ‘‘मेरे विशेष योग्यता में 4 नंबर कम रह गए हैं, इस का मुझे अफसोस नहीं है. मुझे खुशी है राजश्री सभी विषयों में अच्छे अंकों से पास हो गई है. पता है, राजश्री के रिजल्ट की उस से ज्यादा बधाइयां तो मुझे मिल रही थीं…’’ मां को अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ा देख प्रज्ञा ने सकपका कर फोन बंद कर दिया था.
‘‘हां, तो इस में गलत क्या है ममा? देखिए न, इस प्रयोग से सारी लड़कियां अच्छे अंकों से पास हो गई हैं.’’
‘‘तेरा रिजल्ट तो गिर गया न?’’
‘‘4 नंबर कमज्यादा होना रिजल्ट उठना या गिरना नहीं होता ममा. और वैसे भी इस का राजश्री की मदद से कोई लेनादेना नहीं है.’’
‘‘तो मतलब मेरी देखरेख में कमी रह गई?’’
‘‘क्या ममा, आप बात को कहां से कहां ले जा रही हैं? आप जैसी केयरिंग मौम तो कोई हो ही नहीं सकती.’’
‘‘बसबस, रहने दे. एक तो मना करने के बावजूद तू अपनी दरियादिली दिखाने से बाज नहीं आती, दूसरे मुझ से बातें भी छिपाने लगी है,’’ हमेशा की तरह सुधा का गुस्सा पिघल कर बेबसी में तबदील होने लगा था और प्रज्ञा हमेशा की तरह अब भी संयम बनाए हुए थी.
उस ने सोचा, ‘जिस बात को बताने से सामने वाले को दुख हो रहा हो, उसे न बताना ही अच्छा है.’
सुधा के लिए बेटी की ऐसी हरकतें और बातें कोई अजूबा नहीं थीं. प्रज्ञा बचपन से ही ऐसी थी. कभी अपने लिए कुल्फी मांग कर, भूखी नजरों से ताकती भिखारिन को पकड़ा देती तो कभी अपना टिफिन किसी को खिला कर खुद भूखी घर लौट आती. सुधा समझ ही नहीं पाती थी कि इन सब के लिए उसे बेटी की पीठ थपथपानी चाहिए या उसे जमाने के अनुसार चलने की सीख देनी चाहिए. अकसर वह अकेले में पति के सामने अपना दुखड़ा ले कर बैठ जाती, ‘मुझे तो लगता है हमारे यहां कोई सतीसाध्वी अवतरित हुई है, जिसे अपने अलावा सारे जमाने की चिंता है.’
‘हर इंसान का सुख का अपना पैमाना होता है सुधा. दुनिया के सारे लोग पैसा या नाम कमा कर ही सुखी हों, यह जरूरी तो नहीं. हमारी बेटी दूसरों को सुखी देख कर सुखी होती है. आज के मतलबपरस्त समाज में यह अव्यावहारिक जरूर लगता है.’
‘मुझे उस की बहुत चिंता रहती है. उसे तो कोई भी आसानी से उल्लू बना कर अपना उल्लू सीधा कर सकता है.’
पति के असामयिक निधन के बाद तो सुधा बेटी को ले कर और भी फिक्रमंद हो गई थी. कालेज के अंतिम वर्ष में पहुंच चुकी प्रज्ञा की शादी की चिंता उसे बेचैन करने लगी थी. दूसरों पर सबकुछ लुटा देने वाली इस लड़की के लिए तो कोई दौलतमंद, अच्छे घर का लड़का ही ठीक रहेगा. ऐसे में बड़ी ननद प्रज्ञा के लिए एक अति संपन्न घराने का रिश्ता ले कर आई तो सुधा की मानो मन की मुराद पूरी हो गई.
‘‘अपनी प्रज्ञा के लिए दीया ले कर निकलोगी तो भी इस से अच्छा घरवर नहीं मिलेगा. खानदानी रईस हैं. लड़के के पिता तुम्हारे ननदोई को बहुत मानते हैं. यदि ये आगे बढ़ कर कहेंगे तो वे लोग कभी मना नहीं कर पाएंगे. वैसे हमारी प्रज्ञा सुंदर तो है ही और अब तो पढ़ाई भी पूरी हो गई है. भैया नहीं रहे तो क्या हुआ, प्रज्ञा हम सब की जिम्मेदारी है. तभी तो जानकारी मिलते ही मैं सब से पहले तुम्हें बताने चली आई.’’
सुधा ननद का उपकार मानते नहीं थक रही थी, ‘‘दीदी, मैं एक बार प्रज्ञा से बात कर आप को जल्द से जल्द सूचित करती हूं.’’
ननद को रवाना करने के बाद सुधा ने बेचैनी में बरामदे के बीसियों चक्कर लगा डाले थे पर प्रज्ञा का कहीं अतापता नहीं था. फोन भी नहीं लग रहा था. स्कूटी रुकने की आवाज आई तो सुधा की जान में जान आई.
‘‘कहां रह गईर् थी तू? घंटों से बाहर चहलकदमी कर रही हूं.’’
‘‘मैं ने आप को बताया तो था कालेज के बाद मेघना के साथ कुछ काम से जाऊंगी,’’ प्रज्ञा अंदर आ कर कपड़े बदलने लगी थी. लेकिन सुधा को चैन कहां था. वह पीछेपीछे आ पहुंची.
‘‘हां, पर इतनी देर लग जाएगी, यह कहां बताया था? खैर, वह सब छोड़. तेरी बूआ आई थीं तेरे लिए बहुत अच्छा रिश्ता ले कर.’’
प्रज्ञा के कपड़े बदलते हाथ थम से गए थे. सुधा खुशी से लड़के, परिवार और उस के बिजनैस के बारे में बताए जा रही थी.
‘‘ममा, खाना खाएं बहुत भूख लगी है,’’ प्रज्ञा ने टोका तो सुधा चुप हो गई. खाने के दौरान भी सुधा रिश्ते की ही बात करती रही. लेकिन प्रज्ञा ने कोई उत्साह नहीं दिखाया. खाना खा कर वह थकावट का बहाना बना कर जल्द ही सोने चली गई. सुधा हैरान उसे देखती रह गई थी. ‘यह लड़की है या मूर्ति? लड़कियां अपने रिश्ते की बात को ले कर कितनी उत्साहित हो जाती हैं. और इसे देखो, खुद के बारे में तो न सोचने की मानो इस ने कसम खा ली है.’’
सवेरे उठते ही सुधा की फिर वही रात वाली बातें शुरू हो गई थीं.
‘‘ममा, मैं अभी कुछ साल नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं. उस के बाद ही शादी के बारे में फैसला लूंगी,’’ प्रज्ञा ने अपनी बात रखते हुए इस एकतरफा बातचीत को विराम लगाना चाहा. पर कल से संयम बरत रही सुधा का धैर्य जवाब दे गया.
‘‘इतने अमीर परिवार की बहू बनने के बाद तुझे नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ी होने की जरूरत कहां रह जाएगी? यह तो हमारा समय है कि दीदी को तेरा खयाल आ गया…’’ सुधा को अपनी बात बीच में ही रोक देनी पड़ी क्योंकि प्रज्ञा के मोबाइल पर किसी का फोन आ गया था और वह किसी से बात करने में बिजी हो गईर् थी.
‘‘तू चिंता मत कर. क्लास के बाद मैं चलूंगी तेरे साथ रिपोर्ट्स लेने. जरूरत हुई तो दूसरे डाक्टर को दिखा देंगे. तब तक जो दवाएं चल रही हैं, आंटी को देती रहना. सब ठीक हो जाएगा.’’
मोबाइल पर बात को खत्म कर के प्रज्ञा ने सुधा से कहा, ‘‘ममा, मुझे जल्दी निकलना होगा, मेघना की मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है. कल उन की खांसी और कफ ज्यादा बढ़ गया. कफ में खून भी आने लगा तो कुछ टैस्ट करवाने पड़े. उस के पापा लंबे टूर पर बाहर हैं. वह बेचारी घबरा रही थी, तो मैं साथ हो ली. वहां भीड़ होेने के कारण ही कल टाइम ज्यादा लग गया था. अभी भी बेचारी फोन पर रो रही थी कि पूरी रात मां खांसती रहीं. मांबेटी दोनों ही पूरी रात जागती रही हैं.’’ तैयार होतेहोते प्रज्ञा ने अपनी बात पूरी की और मां को बोलने का मौका दिए बिना ही स्कूटी ले कर निकल गई.
बेटी के लिए फिक्रमंद सुधा पति की तसवीर के आगे जा कर खड़ी हो गई. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. चिंतित और दुखी होने पर अकसर सुधा ऐसा ही किया करती थी. इस से कुछ पलों के लिए ही सही, उसे यह संतोष मिल जाता था कि वह अकेली नहीं है. उस के सुखदुख में कोई और भी उस के साथ है. सुधा को लगा तसवीर न केवल उस के दर्द को समझ रही है बल्कि उसे दिलासा भी दे रही है, ‘अपनी बेटी को समझने का प्रयास करो सुधा. मैं ने बताया तो था कि सुख को मापने का उस का पैमाना अलग है.’
कुछकुछ सुकून पाती सुधा घर के कामों में लग गई. प्रज्ञा को उस दिन लौटने में फिर रात हो गई थी. अगला सूर्योदय सुधा की जिंदगी में नया सवेरा ले कर आता था. आश्चर्यजनक रूप से प्रज्ञा ने शादी के लिए सहमति दे दी थी. सुधा को जानने की जिज्ञासा तो थी पर ज्यादा टटोलने से कहीं बेटी का मन न पलट जाए, इस आशंका से उस ने कुछ न पूछना ही ठीक समझा.
ननद को फोन कर उस ने प्रज्ञा की सहमति की सूचना दे दी. फिर तो आननफानन सारी औपचारिकताएं पूरी की जाने लगीं. सगाई का दिन भी तय हो गया. मां का उल्लास देख प्रज्ञा ने खुशी के साथसाथ चिंता भी जाहिर की थी, ‘‘काम का इतना तनाव मत लो ममा, आप बीमार हो जाओगी. आप कहो तो मेरी शौपिंग का काम मैं मेघना के साथ जा कर निबटा लूं.’’
‘‘नेकी और पूछपूछ,’’ सुधा ने सहर्ष अनुमति दे दी थी. तय हुआ कि मेघना को घर बुला लिया जाएगा और सुधा के टैंट वाले के यहां से लौटते ही दोनों सहेलियां शौपिंग के लिए निकल जाएंगी. घर में ज्वैलरी आदि रखी होने के कारण सुधा इन दिनों घर सूना नहीं छोड़ना चाहती थी.
अगले दिन सुधा समय से घर लौट आई थी. चाबी डाल कर दरवाजा खोलते ही उसे एहसास हो गया था कि मेघना आ चुकी है. दोनों बातों में बिजी थीं. रसोई में चाय चढ़ाने जाते वह प्रज्ञा के कमरे के आगे से गुजरी तो अंदर धीमे आवाज में चल रही बातचीत ने उस के कान खड़े कर दिए.
‘‘प्रज्ञा, अन्यथा मत लेना. पर मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि तू पैसे के लालच में किसी और से शादी कर रही है? मैं तो समझती थी कि तू और प्रतीक…’’
सुधा को लगा उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी. वह कान लगा कर दरवाजे की ओट में खड़ी हो गई.
‘‘कल प्रतीक मिला था…’’ मेघना की आवाज फिर सुनाई दी.
‘‘अच्छा, कहां? क्या कर रहा था? सुना, उस की नौकरी लग गई?’’ प्रज्ञा के स्वर की तड़प ने सुधा के साथसाथ मेघना को भी चौंका दिया था.
‘‘उस के बारे में जानने की इतनी तड़प क्यों? अभी तो तू कह रही थी तुम दोनों के बीच ऐसा कुछ नहीं है. मुझ से सच मत छिपा प्रज्ञा. जो कुछ मैं तेरी आंखों में देख रही हूं, वही मुझे प्रतीक की आंखों में भी दिखा था. मैं ने उसे तेरी सगाई की बात बताई तो उसे यकीन नहीं हुआ. कहने लगा कि मैं मजाक कर रही हूं. फिर थोड़ी देर बाद मैं ने उसे ढूंढ़ा तो वह फंक्शन से जा चुका था. मेरा शक अब यकीन में बदलता जा रहा है. उस से
2 दिनों पहले तक तो तू बराबर मां के टैस्ट वगैरह करवाने में मेरे साथ थी. तूने कभी कोई जिक्र ही नहीं किया. या शायद मैं ही इतनी बौखलाई हुई थी कि तुम्हारी मन की स्थिति से अनजान बनी रही.’’
‘‘आंटी अब कैसी हैं?’’ इतनी देर बाद प्रज्ञा का स्वर सुनाई दिया था. सुधा को लगा वह शायद बात का रुख पलटने का प्रयास कर रही थी.
‘‘मां की तबीयत में काफी सुधार है. मुझे सुकून है कि मैं समय रहते उन का अच्छे से अच्छा इलाज करवा सकी. तुम्हारे साथ रहने से मुझे मानसिक संबल मिला. वरना उन की बिगड़ी हालत देख कर एकबारगी तो मैं उम्मीद ही छोड़ बैठी थी. उन दिनों मुझे न कपड़ों का होश था, न खाने का, न सोने का. बस, एक ही बात चौबीसों घंटे सिर पर सवार रहती थी, किसी तरह मां जी जाए,’’ भावुक मेघना का गला भर आया तो प्रज्ञा ने उस के हाथ थाम लिए थे.
‘‘तुम्हारी इसी मातृभक्ति ने तो मुझे इस सगाई के लिए प्रेरित किया है. तुम्हें मां के लिए रोते, कलपते, भागते, दौड़ते देख मुझे एहसास हुआ कि सहजसुलभ उपलब्ध वस्तु की हम अहमियत ही नहीं समझते. उसे खो देने का एहसास ही क्यों हमें उस की अहमियत का एहसास कराता है?
‘‘हम समय रहते उस की परवा क्यों नहीं करते? बस, मैं ने तय कर लिया कि मैं मां की खुशी के लिए सबकुछ करूंगी. हां मेघना, मैं यह शादी ममा की खुशी के लिए कर रही हूं. यह जानते हुए भी कि मैं समीर के साथ कभी खुश नहीं रह पाऊंगी. उस से 2 मुलाकातों में ही मुझे समझ आ गया है कि पैसे के पीछे भागने वाले इस इंसान की नजर में मैं जिंदगीभर एक उपभोग की वस्तु मात्र बन कर रह जाऊंगी. जबकि प्रतीक पर मुझे खुद से ज्यादा यकीन है. वह सैल्फमेड इंसान मेरी मजबूरी समझ कर मुझे माफ जरूर कर देगा.’’
‘‘मुझे अब जिंदगीभर यह संतोष रहेगा कि मैं मां की खुशी का सबब बनी. उस मां की जो आजतक मेरे ही लिए सोचती रहीं. और मैं कितनी नादान थी सारी दुनिया की परवा करती रही और अपनी परवा करने वाली की ओर लापरवाह बनी रही.’’
सुधा में इस से आगे सुनने का साहस नहीं रहा था. वह लड़खड़ाते कदमों से जा कर बिस्तर पर लेट गई.
‘‘अरे ममा, आप कब आईं, बताया ही नहीं?’’ प्रज्ञा ने मां को कमरे में लेटा देखा तो पूछा.
‘‘बस, अभी आई ही हूं. अब तुम लोग बाजार हो आओ,’’ सुधा ने किसी तरह खुद को संभालते हुए उठने का प्रयास किया.
‘‘क्या हुआ? आप की तबीयत ठीक नहीं लग रही है,’’ प्रज्ञा घबराई सी मां का माथा, नब्ज आदि टटोलने लगी, ‘‘मैं डाक्टर को बुलाती हूं.’’
‘‘अरे नहीं, जरा सी थकान है, अभी ठीक हो जाऊंगी, तुम लोग जाओ.’’
‘‘मैं इसीलिए आप से कहती थी काम का ज्यादा तनाव मत लो,’’ प्रज्ञा मां के पांव सहलाने लगी.
‘‘प्रज्ञा, तू अब जा, देख मेघना भी आ गई है.’’
‘‘कोई बात नहीं आंटी, मैं तो फिर आ जाऊंगी.’’ मेघना जाने लगी तो सुधा ने उसे छोड़ कर आने का इशारा किया. दोनों के निकल जाने के बाद सुधा गहरी सोच में डूब गई थी.
‘एक पल को भी इस से मेरा दर्द सहन नहीं हो रहा. और मैं इसे जिंदगीभर का दर्द देने वाली थी. प्रज्ञा को जानतेसमझते हुए भी मैं ने कैसे सोच लिया कि पैसा इस लड़की को खुश रख पाएगा? यदि प्रज्ञा समीर के साथ नाखुश रहेगी तो मैं कैसे खुश रह पाऊंगी? प्रज्ञा की शादी अब वहीं होगी जहां वह सुखी रहे.’ एक दृढ़ निश्चय के साथ उठ कर सुधा पति की तसवीर के सामने खड़ी हो गई. उसे लगा तसवीर अचानक मुसकराने लगी है, मानो, कह रही है, ‘आखिर बेटी ने तुम्हारे सुख का पैमाना बदल ही दिया.’
फिल्म ‘शोले’ के होली गीत, ‘‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं, गिलेशिकवे भूल के दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं…’’ के बजे बिना शायद ही कोई होली उत्सव पूरा होता है. होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि इस गीत की अवधारणा से ही होली का जलसा पूरा होता है. एक यही त्योहार है जब रिश्तेनातों और पासपड़ोस में पुराने गिलेशिकवे भूल कर हम एकदूसरे के रंग में रंग जाते हैं.
होली की मूल भावना नोकझोंक और चुहुलबाजी में होती है. जब देवर अपनी भाभी के साथ, पड़ोसी अपनी पड़ोसिन के साथ , जीजा अपनी साली के साथ और पे्रमी अपनी प्रेमिका के साथ दो कदम आगे बढ़ कर एकदूसरे को रंगों से सरोबार करते हैं तो बुरा नहीं मानना चाहिए.
1 रूठे यार को मनाना :
होस्टल के दिनों के मेरे एक मित्र से एक गलतफहमी के चलते बहस हो गई. वह कहे वह सही, मैं कहूं मैं सही. बात इतनी बढ़ गई कि हम दोनों ने एकदूसरे की शक्ल देखने से इनकार कर दिया. कई दिनों तक बातचीत बंद रही. एक ही क्लास में पढ़ने और एक ही रूम व कैंटीन में सोनेखाने के बावजूद हमारे ईगो ने हमें एकदूसरे से नाराज ही रखा.
तकरीबन 7-8 महीने तक एकदूसरे को अनदेखा करने का सिलसिला चलता रहा. फिर होली की छुट्टियों का माहौल बन गया. होस्टल के सारे मित्र घर जाने लगे. लेकिन जब आप का सब से अच्छा मित्र नाराज हो तो होली की सारी तैयारियां फीकीफीकी सी लगती हैं. हर होली की सुबह वही तो आया करता था रंग लगाने. इधर, इतने दिन गुजर गए, बात भी नहीं हुई. मुझे लगा कि मैं ही जा कर उसे मना लूं लेकिन अकड़ इतनी थी कि लगा, मैं पहल करूंगा तो छोटा हो जाऊंगा.
एक दिन मैं सो रहा था कि अचानक वह चुपके से आया और सुबहसुबह मेरे सोते रहने पर ही मेरा चेहरा गुलाल से भर दिया औैर गले लगा कर बोला, ‘‘हैप्पी होली अकड़ू.’’ हतप्रभ सा मैं उसे देख रहा था. अंदर से इतना खुश कि मानो कुछ खोया हुआ वापस मिल गया. मैं ने भी उसे गले लगा लिया. सारे गिलेशिकवे आंसुओं और रंगों की धार में बह गए. साथ ही, मेरी अकड़ और अहं भी. आज जब हमारी दोस्ती को 20 साल से भी ज्यादा हो गए हैं, सोचता हूं कि अगर उस होली के मौके पर उस ने पहल न की होती तो आज हमारा परिवार और बच्चे एकदूसरे के इतने करीब न होते. हर होली अब हम सपरिवार मनाते हैं. मुझे तो ऐसा दोस्त मिल गया जिस ने होली के दिन बिना संकोच के दोस्ती का हाथ दोबारा बढ़ा दिया. लेकिन सब के साथ ऐसा नहीं होता.
अकसर अहं और छोटीमोटी तकरार इतनी बड़ी हो जाती हैं कि रिश्तों की वे गांठें कभी नहीं जुड़ पातीं. अगर आप भी किसी ऐसी ही बात का बुरा मान कर किसी दोस्त या करीबी से नाराज हैं तो इस होली पर उसे मनाने की पहल कर देखिए, उत्सव का आनंद दोगुना हो जाएगा और पुराने साथी को वापस पाने की खुशी का तो कोई हिसाब ही नहीं है. और हां, कोई भी झगड़ा या गलतफहमी इतनी बड़ी नहीं होती कि उसे सुलझाया न जा सके. तो समझ लीजिए होली का यह त्योहार ऐसी ही किसी पुरानी गलतफहमी या कड़वाहट को मिठास में बदलने का मौका है जो दोस्ती की राह में रोड़ा बन कर खड़ी है.
2 परिवार के संग त्योहार :
जिस तरह एक रसोई में कई बरतनों की आपसी टकराहट को रोक पाना मुश्किल है वैसे ही घरपरिवार में अपनों का रूठना या मनमुटाव होना स्वाभाविक है. ऐसे में सूखते रिश्तों में रंगों की नमी भरें. रिश्तों में दरार डालते इन फासलों को भरने के लिए ही होली का मस्तीभरा त्योहार आता है. जहां जरा सी शरारत और ढेर सारे रंगों की फुहार गुस्से की कालिख को अपनत्व की रंगीनियत से भर देती है. इसलिए रंगों के इस त्योहार की शुरुआत आप अपने परिवार के लोगों व अपने दोस्तों पर रंगों की बरसात कर के करें. फिर देखें कैसे कोई आप से नाराज रहता है. घर में बड़ेबुजुर्ग को गुलाल का तिलक लगा कर होली का शुभारंभ करें. मातापिता से अनजाने में की बदजबानी की माफी मांग कर हलके से गुलाल से उन के चेहरे में खुशियों के रंग भर दें. उन की सारी नाराजगी पलभर में दूर हो जाएगी.
अगर करीबी रिश्तेदार दूर हैं और किसी बात पर खफा हैं तो होली की शुभकामनाओं के लिए उन्हें सब से पहले फोन करें और घर पर होली उत्सव के लिए आमंत्रित कर उन का दिल जीतें. होली के मौके पर पुरानी बातों को भूलने की गुजारिश करें. यकीनन उन की नाराजगी बहुत देर तक नहीं टिक पाएगी. अगर वे काफी दूर रहते हैं और आप के घर तक आने में असमर्थ हों तो होली के कुछ दिनों पहले ही उन्हें बिना बताए होली की मिलन के लिए कुछ अच्छा सा उपहार व मिठाइयां ले कर उन के घर पहुंच जाएं और उन को हैरान कर दें. इस सरप्राइज विजिट से उन की हर नाराजगी दूर होते देर नहीं लगेगी.
भाईबहन का रिश्ता तो इतना प्यारा होता है कि जरा सी चौकलेट, गिफ्ट या प्यार से चोटी खींचने भर से सारे गिलेशिकवे भुला देता है. भाईभाई भी उसी रिश्ते की नाजुक डोर से बंधे होते हैं जिस में भाईबहन बंधे होते हैं. उन्हें भी सुलझने में देर नहीं लगती.
3 सामाजिक सरोकार न भूलें :
त्योहारों को मनाने का असली मकसद समाज को जोड़ कर रखना होता है. सदियों पहले त्योहारों के जरिए लोग खुशी और उल्लास के साथ अपने कबीले, कुनबे या समाज के साथ एक मंच पर आते और नजदीकियां बढ़ाते थे. इस से आपसी सौहार्द की भावना पल्लवित होती थी और परस्पर सद्भाव भी बढ़ता था.
धीरेधीरे समाज बदला और इन उत्सवों के बीच होली ने अपने मस्तीभरे मिजाज, नोकझोंक और हुड़दंगी रिवाज के चलते दुनियाभर के समाजों को रंगों के त्योहार में मदमस्त कर दिया. इसलिए होली सिर्फ भारत में ही नहीं, दुनिया के लगभग हर मुल्क में मनाई जाती है. फर्क बस इतना है कि कहीं रंगों का इस्तेमाल होता है तो कहीं फूलों, कीचड़ या टमाटर के साथ होली खेली जाती है.
बदलते समाज के साथ हमारे बीच स्वार्थ और संकुचित भावना भी न जाने कहां से पनपने लगी. हाल यह हुआ कि एक ही समाज, महल्ले या सोसायटी में रहने वाले परस्पर प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या या दिखावे के चलते सामाजिक बंधनों से दूर हो कर अपने ही घरों में कैद रहते हैं. वे होली के दिन भी पासपड़ोस की कोई खबर नहीं रखते, घर की चारदीवारी में बड़े रूखे अंदाज में त्योहारों की खानापूर्ति कर लेते हैं.
जरा सोचिए अगर समाज ही नहीं रहेगा तो हमारा अस्तित्व कहां रहेगा, शानोशौकत देखने वाला कौन होगा. घर पर पकवान तो ढेर सारे बनेंगे लेकिन साथ में बैठ कर खाने वाले पड़ोसी कहां से आएंगे. आड़े समय में गलीमहल्ले के लोग जितना काम आते है, उतना तो दूर रहते सगेसंबंधी भी नहीं आते. अच्छा पड़ोसी, अच्छा दोस्त भी होता है, एकदूसरे के दुखसुख का साथी होता है. इसलिए, इस होली संकल्प लें कि समाज से कटने के बजाय रंगों का यह त्योहार सभी के बीच मनाएंगे.
4 मुहब्बत के रंग :
जिस से प्रेम करते हैं और अगर वह रूठा या रूठी है तो समझ लीजिए होली ही वह मौका है जब उन के मानने की संभाव्यता सब से ज्यादा होगी. होली पर आप छेड़खानी और चुहुलबाजी कर अपनी मासूम शरारतों से उन्हें हंसने और मानने पर मजबूर कर सकते हैं. सारी पिछली बातों पर डालें धूल और झगड़ेलफड़े सब जाएं भूल. एक फोन, एक एसएमएस, एक प्यारी सी टचिंग रिंगटोन, एक दिल को धड़काने वाला पिक्चर मैसेज या ग्रीटिंग और ढेर सारा गुलाल रूठे यार को मनाने के लिए काफी है.
करीब दो साल पहले मोदी सरकार द्वारा लाए गए 3 कृषि कानूनों को वापस लेने की हुंकार के साथ किसानों ने दिल्ली की घेराबंदी की थी. ‘दिल्ली चलो’ के नारे के साथ दिल्ली के बौर्डर पर किसानों ने डेरा डाला, क्योंकि दिल्ली के अंदर घुसने के सारे रास्तों पर पुलिस ने सीमेंट के अवरोधों पर कीलकांटे जड़ कर किसानों और केंद्र सत्ता के बीच मजबूत दीवार खड़ी कर दी थी. उस आंदोलन के दौरान करीब साल भर तक जाड़ा, गर्मी, बरसात झेलते हुए किसान खुले आकाश के नीचे सड़कों पर बैठे रहे थे.
उस दौरान करीब 700 किसानों की जानें भी गई थीं लेकिन किसानों ने तब मोदी सरकार को झुका ही लिया था और वह तीन काले कानून वापस करवा दिए थे जिन से किसानों को अपनी ही जमीन पर मजदूर बनाने के सारे प्रबंध मोदी सरकार ने कर दिए थे.
जिस के बाद मजबूरन मोदी सरकार को किसानों की मांगों के आगे झुकना पड़ा. लेकिन उस आंदोलन से कुछ और नए मुद्दे खड़े हुए जिन को ले कर किसान एक बार फिर दिल्ली घेरने निकल पड़े. 14 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में देश भर से 400 से ज़्यादा किसान संगठन के लोग महापंचायत के लिए पहुचें. इतनी बड़ी तादात में किसानों का रेला देख दिल्ली के कई क्षेत्रों में 144 लागू कर दी गई. हालांकि किसानों की तरफ से किसी तरह की अराजकता या अव्यवस्था उत्पन्न नहीं हुई और महापंचायत के बाद 3 बजे दोपहर में रैली समाप्त भी हो गई. मगर इस महापंचायत में किसानों ने सरकार को यह संदेश जरूर दे दिया कि सरकार के व्यवहार से वे न सिर्फ आहत हैं, बल्कि आगामी लोकसभा चुनाव में वह भारतीय जनता पार्टी को करारा सबक भी सिखाने के लिए कमर कस चुके हैं.
महापंचायत के दौरान अपनी भड़ास निकालते हुए एसकेएम के नेता डा. दर्शन पाल ने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में किसान बीजेपी नेताओं को गांवों में नहीं घुसने देंगे. वहीं भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के नेता राकेश टिकैत ने कहा, “इस महापंचायत से सरकार को संदेश मिल गया है कि किसान इकट्ठा हैं और भारत सरकार बातचीत से समाधान करे. यह आंदोलन खत्म नहीं होगा. जिस तरह उन्होंने बिहार को बर्बाद किया, वहां मंडियां खत्म कर दीं, पूरे देश को बर्बाद करना चाहते हैं.”
किसान नेताओं ने एमएसपी की गारंटी कानून लाने की मांग की और हरियाणा पंजाब के शंभू और खनोरी बौर्डर पर बैठे किसानों पर पुलिस की कार्रवाई की निंदा की.
दरअसल मोदी सरकार ने अपने करीबी उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए जिस तरह किसानों की उपेक्षा की और उन्हें साजिशन गुलाम बनाने की चेष्टा की उस से किसान बिफर गया है. उद्योगपतियों के अरबोंखरबों के कर्ज माफ करने वाली सरकार किसानों की छोटीछोटी मांगों को दरकिनार कर रही है.
केंद्र सरकार की ओर से लगातार लागू की जा रही मजदूर किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ संयुक्त किसान मोर्चा लगातार संघर्ष कर रहा है. अन्नदाता के मुद्दे वही पुराने हैं जिन पर मोदी सरकार ध्यान नहीं दे रही है –
1. एमएसपी गारंटी कानून आए.
2. स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू की जाए.
3. किसानों की कर्जमाफी हो.
4. पिछले किसान आंदोलन में दर्ज मामले वापस लिए जाएं.
5. पिछले किसान आंदोलन में मृत किसानों को मुआवजा दिया जाए.
6. लखीमपुर खीरी मामले में दोषियों को सजा मिले.
7. भूमि अधिग्रहण कानून के किसान विरोधी क्लौज पर पुनर्विचार किया जाए.
किसान चाहते हैं कि स्वामीनाथन आयोग के सिफारिश को सरकार लागू करे. स्वामीनाथन आयोग ने किसानों को उन की फसल की लागत का डेढ़ गुना कीमत देने की सिफारिश की थी. आयोग की रिपोर्ट को आए 18 साल गुजर गए, लेकिन एमएसपी पर सिफारिशों को अब तक लागू नहीं किया गया. बिजली कानून 2022 भी वापस करने का दबाव वे सरकार पर बनाए हुए हैं. इस के अलावा भूमि अधिग्रहण और आवारा पशुओं की प्रमुख समस्या देश के अंदर बनी हुई है, जिस से किसान त्रस्त हैं. आवारा पशु खड़ी फसल को बर्बाद कर देते हैं. इस का कोई समाधान सरकार के पास नहीं है. उलटे सरकार किसानों के हित में कार्य करने की बजाय किसानों की जमीनों को कौर्पोरेट के हाथों बेचना चाहती है और इसी नियत से सरकार मजदूर किसान विरोधी नीतियां लगातार लागू कर रही है.
देश का किसान अपनी सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी आश्वासन चाहता है और सभी किसानों के लिए ऋण की पूर्ण माफी की मांग कर रहा है. जब उद्योगपतियों के कर्ज माफ़ हो सकते हैं तो उस के मुकाबले किसानों की कर्ज राशि तो मामूली सी है.
मनरेगा के तहत किसानों को खेती के लिए प्रतिदिन 700 रुपए निश्चित मजदूरी और साल में 200 दिनों के रोजगार की गारंटी भी चाहिए, जो सरकार के लिए कोई मुश्किल बात नहीं है. मगर सरकार की नीयत गरीबी खत्म करना नहीं, बल्कि गरीब को खत्म करने की है.
इस वर्ष की शुरुआत से ही सभी फिल्में बौक्स औफिस पर मुंह के बल धराशाही हो रही थीं, लेकिन मार्च माह के दूसरे सप्ताह 8 मार्च को प्रदर्शित फिल्म “शैतान” ने निर्माताओं के चेहरे पर थोड़ी सी मुसकान लाने का काम किया है.
इस सप्ताह विकास बहल निर्देशित बड़े बजट की अजय देवगन और आर माधवन अभिनीत फिल्म “शैतान” के साथ दो अन्य फिल्में, एक निर्देशक शंकर श्रीकुमार की फिल्म “अल्फा बीटा गामा” और बलविंदर सिंह जुंजुआ निर्देशित तथा रणदीप हुडा, इलियाना डिक्रूज व करण कुंद्रा एवं “तेरा क्या होगा लवली” प्रदर्शित हुई. अफसोस “अल्फा बीटा गामा” और “तेरा क्या होगा लवली” ने घोर निराशा किया.
शंकर श्रीकुमार निर्देशित फिल्म “अल्फा बीटा गामा” के कलाकारों में निशान, अमित कुमार वशिष्ठ व मेनका शर्मा का समावेश है. यह पुरानी फिल्म है जिसे 24 नवंबर 2021 को भारत के इंटरनेशनल फिल्म फैस्टिवल अर्थात इफ्फी में पैनोरमा खंड के अंतर्गत प्रदर्शित किया गया था.
यह फिल्म तब से प्रदर्शन का इंतजार कर रही थी. यह फिल्म अब 8 मार्च को रिलीज हुई, पर अफसोस यह फिल्म कब सिनेमाघर पहुंची? कब उतर गई ? दर्शकों को पता ही नहीं चला. फिल्म कहानी कोविड के पृष्ठभूमि में तीन किरदारों की है, जिन्हें 14 दिन के लिए एक ही कमरे में क्वारंटाइन किया गया है.
इस में मिताली, उस का प्रेमी रवि और पूर्व पति चिरंजीवी हैं. इस फिल्म का कोई प्रचार नहीं किया गया. इतना ही नहीं इस के बौक्स औफिस के कलैक्शन को ले कर भी निर्माता ने चुप्पी साध रखी है.
इसी सप्ताह बलविंदर सिंह जंजुआ निर्देशित सामाजिक हास्य फिल्म “तेरा क्या होगा लवली” प्रदर्शित हुई. गोरी त्वचा के इर्दगिर्द घूमने वाली इस कहानी में रणदीप हुड्डा, इलियाना डिक्रूज, करण कुंद्रा, पवन मल्होत्रा, राजेंद्र गुप्ता जैसे कलाकारों ने अभिनय किया है. मजेदार बात यह है कि इस फिल्म का निर्माण सोनी पिक्चर्स ने किया है, मगर कहीं कोई प्रचार नहीं किया गया. फिल्म किस थिएटर में लगी यह भी पता नहीं चला. बौक्स औफिस कलैक्शन को ले कर भी निर्माता कुछ भी कहने को तैयार नहीं है.
8 मार्च को ही फिल्म “क्वीन” फेम निर्देशक विकास बहल निर्देशित सुपरनैचुरल हौरर फिल्म “शैतान” रिलीज हुई जो की सफलतम गुजराती फिल्म “वश” की हिंदी रीमेक है. जिस में अजय देवगन, आर माधवन और ज्योतिका की आम भूमिकाएं हैं. इस के निर्माण में अजय देवगन, जिओ स्टूडियो और पैनोरमा स्टूडियो जुड़ा हुआ है.
फिल्म की कहानी के केंद्र में चार्टर्ड अकाउंटेंट कबीर (अजय देवगन) है, जो अपनी पत्नी ज्योति (ज्योतिका), बेटी जान्हवी (जानकी बोदीवाला) और बेटा ध्रुव (अंगद राज) के साथ देहरादून के जंगली इलाके के फार्म हाउस में कुछ समय बिताने आते हैं. बीच रास्ते में उन की मुलाकात वनराज (आर माधवन) से होती है.
वनराज, कबीर की बेटी जान्हवी को लड्डू खाने के लिए देता है. लड्डू खाते ही जान्हवी, वनराज के इशारे पर नाचने लगती है. कबीर परिवार के साथ फार्म हाउस पहुंचते हैं, जहां वनराज भी पहुंच जाता है और अब वह कबीर की मर्जी से उन की बेटी जाह्नवी को अपने साथ ले जाना चाहता है.
कबीर, वनराज के चंगुल से अपनी बेटी जान्हवी को छुड़ाने का प्रयास करते हैं. इस फिल्म को बिकाउ फिल्म समीक्षकों के अलावा किसी भी समीक्षक ने दो स्तर से ज्यादा नहीं दिए थे. फिल्म में तमाम घटनाक्रमों का दोहराव है. अंधविश्वास भरा हुआ है. विकास बहल के निर्देशन के साथ ही अजय देवगन व आर माधवन का अभिनय स्तरहीन है. जान्हवी के किरदार में जानकी बोदीवाला का अभिनय शानदार है.
ज्यादातर समीक्षाकों की राय थी कि यह फिल्म फ्लौप होगी. जबकि अजय देवगन तथा उनके मैनेजर और पैनोरमा स्टूडियो के कर्ताधर्ता मंगत कुमार पाठक के लिए इस फिल्म का चलना बहुत जरूरी था क्योंकि पैनोरमा स्टूडियो अप्रैल माह में शेयर बाजार में उतरते हुए अपना पहला आईपीओ बाजार में ला कर आम जनता से धन उगाही करने की योजना पर काम कर रहा है.
बहरहाल अब फिल्म “शैतान” का पीआरओ भी गर्व से बता रहा है कि कम लागत में बनी फिल्म “शैतान” ने महज 7 दिन में भारत के बौक्स औफिस पर लगभग 80 करोड़ रुपए कमा लिए हैं. तो वहीं इस ने विश्व भर में 20 करोड़ रुपए अलग से कमाए हैं. इस तरह यह फिल्म अब तक 100 करोड़ कमा चुकी है.
कुछ लोगों की राय में अपने आने वाले आईपीओ को ध्यान में रख कर पैनोरमा स्टूडियो और अजय देवगन की तरफ से टिकटों की बल्क खरीदारी की गई है. जबकि सिनेमा घर मलिक “शैतान” के व्यापार से खुश हैं. उत्तर प्रदेश के सिंगल थिएटर मालिकों का दावा है कि “शैतान” से उन्होंने अच्छी कमाई की है.
फिल्में और फैशन दो क्रिएटिव विषय हैं, जो हमेशा साथसाथ चलते हैं, जिन में से हर एक दूसरे को अलगअलग तरीकों से प्रभावित करते हैं. यही वजह है कि फिल्मों या टीवी सीरियल पर दिखाए गए पोशाक को कुछ ही दिनों मे मार्केट मे दिखने लगते हैं और दुकानदार भी उस पोशाक को फिल्मों के नाम ले कर ग्राहक को बेचते हैं. हमारी युवा पीढ़ी भी उसे तुरंत खरीद लेती है, क्योंकि वे फैशन मे किसी से पीछे नहीं रहना चाहती.
समाज में अपनेआप को बनाए रखने के लिए जमाने के साथ चलने को वे अच्छा मानती है, क्योंकि उन्हें इस बात का भी डर रहता है कि वे जमाने से पिछड़ न जाएं. युवक हों या युवतियां बाइक, कार, कपड़ों के साथ मैचिंग के जूते, चप्पल, हेयर कट, पर्स, हेयर पिन, ज्वैलरी आदि बहुत सी चीजें हैं, जिसे ले कर युवाओं की दीवानगी देखने लायक होती हैं.
25 वर्षीय उमा कहती है, “मैँ फिल्मों और टीवी धारावाहिकों मे दिखाए गए पोशाक और गहनों की बहुत शौकीन हूं और वैसी चीजें मार्केट मे खोजती भी हूं. फिल्म रौकी और रानी की प्रेम कहानी में मैं ने अभिनेत्री आलिया भट्ट को कौर्पोरेट वर्ल्ड में काम करते हुए सहजता से साड़ी और स्लीक ब्लाउस पहने देखा है और वह मुझे बहुत पसंद आया है. मैं ने भी वैसी ब्लाउज सिलवाई है. इस के अलावा कैटरीना कैफ हमेशा ट्रेंडी ज्वैलरी पहनती हैं, जिसे मैं ने सोशल मीडिया लुक में देखा है और मैं ने वैसी ही ज्वेलरी खरीदी है, जो रियल डायमंड नहीं है.”
ये सही है कि फैशन को लोगों तक पहुंचाने का माध्यम बहुत हद तक फिल्में ही होती हैं और फिल्मों को शूट करने के लिए फैशन के सहारे की जरूरत होती है. फिल्मों, टीवी और फैशन उद्योग के बीच का यह रिश्ता बड़े पैमाने पर समाज पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है.
खासकर जब बात फैशन ट्रेंड, कल्चरल ट्रेंड और वैल्यू की आती है तो फिल्में और फैशन उन सांस्कृतिक ट्रेंड और मूल्यों के बारे में एक जैसे विचार रखते हैं, क्योंकि एकदूसरे के बिना वे अधूरे हैं. ये चीजें सालों से पोपुलर है, जहां अधिक से अधिक लोग फिल्म के पात्रों की शैली की कौपी करने की कोशिश करना चाहते हैं और फिल्मों में विलासितापूर्ण जीवन शैली का चित्रण करने वाले पात्रों की तरह बनने की चाहत रखने के लिए उन के जैसे कपड़े खरीदना चाहते हैं.
इस बारे में डिजाइनर गौरांग कहते हैं, “फिल्मों का फैशन इंडस्ट्री से काफी जुड़ाव सालों से रहा है. मैँ हमेशा फैशन शो में ब्राइडल कलैक्शन का प्रयोग करता हूं, जो मैं ने इस बार शो में होली के गुलाबी रंगों को कपड़ों मे शामिल किया है. मैँ अगर फिल्म की बात करूं तो मुझे निर्देशक निर्माता संजय लीला भंसाली की फिल्में याद आती हैं जो बहुत ही भव्य तरीके से बनाई जाती हैं जिस में हीरोइनें बड़ीबड़ी घागरा चोली और साड़ी में दिखती हैं, जो युवाओं को आकर्षित करती है. यही वजह है कि आजकल की लड़कियां अपनी शादी में उन्हीं भव्य पोशाक को पहनना पसंद करती हैं.”
फिल्में फैशन उद्योग में विविधता और प्रतिनिधित्व भी बढ़ा सकती हैं. उदाहरण के लिए, फिल्म, “क्रेजी रिच एशियन्स” ने एशियाई फैशन की सुंदरता को प्रदर्शित किया, जिस के परिणामस्वरूप ऐसे डिजाइनों की मांग पूरे विश्व में वृद्धि हुई.
डिजाइनर श्रुति संचेती कहती हैं, “इंडिया में ही नहीं, विश्व मे हर जगह दो चीजें सब से अधिक बिकती हैं. वह है फिल्मों में दिखाए जाने वाले फैशन, इस में पुरुष और महिला, दोनों में क्रेज बराबर मात्रा मे होता है. अगर मैँ पुरानी फिल्मों को देखूं, तो लड़कियों को हेयर कट में साधना कट के साथ छोटीछोटी कुर्तियां और चूड़ीदार पहनना सालों पहले पसंद था.
“असल में लोग अपने पसंदीदा कलाकार के पहनावे को कौपी करना पसंद करते हैं और वही उन की प्रेरणादायक मूल्य होते हैं. अब डिजिटल मीडिया का क्रेज यूथ में अधिक हो गया है, इस से उन्हें कोई भी सूचना आसानी से मिल जाती है, जिस से वे अपनी पसंदीदा बड़े स्टार्स के पहनावे को देख कर कौपी कर लेते हैं. अगर उन्हें स्वीटजरलैंड में श्री देवी, अनुष्का शर्मा या काजोल को साड़ी में देखा है, तो वे भी हनीमून में साड़ी पहनना पसंद करते हैं. भले ही वह प्रैक्टिकली पौसिबल न हों, लेकिन उन की इच्छा यही रहती है.”
श्रुति आगे कहती हैं, “फिल्मों और फैशन का संबंध सालों से साइड बाइ साइड रहा है. साथ ही फिल्मों के फैशन का गहरा प्रभाव आम जनता पर भी पड़ता है. आज अगर गोद भराई की रसम होती है, तो फिल्म ‘हम आपके हैं कौन’ में माधुरी दीक्षित ने जो ड्रैस पहनी थी, वह आजतक भी लड़कियां पहनना पसंद करती हैं. इसके बाद कितने भी रंग आए और गए, लेकिन वह बैंगनी रंग की साड़ी आज भी सब के दिमाग में है.
“कुछ हिस्टोरिकल फिल्में जैसे जोधा अकबर, पद्मावत आदि फिल्मों को उस युग के हिसाब से रिसर्च कर बनाया गया है. भले ही उस युग को किसी ने देखा नहीं, लेकिन उस की खूबसूरती को फिल्मों में देख कर दुल्हनें वैसी ही तैयार होना पसंद करती हैं. यही वजह है कि फिल्मस्टार भी किसी नई ड्रैस को एन्डार्स करना पसंद करते हैं, जिसे देख कर लोग उन पोशाकों को खरीद कर अपने वार्डरोप मे रखना पसंद करते हैं.
“साड़ी में स्टाइलिश लगने के लिए हर तरह के स्ट्रैपी, स्लीवलेस, बैकलेस आदि सब तरीके के ब्लाउज महिलाओं ने पहना है. अभी 13 इंच की ब्लाउज, फ्रन्ट बटन के साथ सब से क्लासी लुक देता है और ये आरामदायक भी होता है.”
इस प्रकार यह कहना सही होगा कि समय के साथ मीडिया और सोशल मीडिया की वजह से फिल्मों और फैशन के बीच का संबंध, आपस में गहरा जुड़ गया है. फैशन और फिल्में दोनों एक साथ मिल कर ही किसी पोशाक को दर्शकों तक पहुंचाते हैं जिस में दोनों को फायदा होता है.
Dolly Sohi Passed Away: 48 वर्षीया टीवी ऐक्ट्रैस डाली सोही उन कलाकारों में से थीं जो नाम से ज्यादा अपने चेहरे से जानीपहचानी जाती हैं. छोटे परदे के कलाकार आमतौर पर अपने फैंस के बीच सीरियल के फेमस किरदार से मशहूर हो जाते हैं. जैसे डाली हिटलर दीदी के नाम से घरघर पहचानी जाने लगी थीं. डाली का कम उम्र में सर्वाइकल कैंसर से निधन टीवी इंडस्ट्री के लिए दोहरा सदमा है क्योंकि मौत के 48 घंटे पहले ही उस की ऐक्ट्रैस बहन अमनदीप की मौत भी पीलिया से हुई थी. इस दुखद इत्तफाक के थोड़े ही पहले डाली ने सोशल मीडिया पर अपने प्रशंसकों से आग्रह किया था कि वे उस के लिए दुआएं करें.
लेकिन एक बार फिर साबित हो गया कि कैंसर के मरीजों पर न दुआओं का असर होता, न ही दवाओं का. हालांकि यह कहा जाता है कि अगर पहली स्टेज पर ही कैंसर की पहचान हो जाए तो इलाज मुमकिन है. लेकिन इस घातक जानलेवा बीमारी की खूबी और दहशत इसलिए ज्यादा है कि बहुत एडवांस स्टेज पर ही इस की पहचान हो पाती है. टीवी और फिल्म इंडस्ट्री में कैंसर से मौत कोई हैरत की बात नहीं रही है लेकिन सुखद बात यह है कि कैंसर से ठीक होने वाले कलाकारों की संख्या कम नहीं. जिन में अहम नाम ऐक्ट्रैस मनीषा कोइराला का है. लीजा रे और सोनाली बेंद्रे भी इसी कड़ी के अगले नाम हैं.
कैंसर से जंग जीतने वालों में एक बड़ा नाम अभिनेता संजय दत्त का भी है जिन्हें फेफड़ों का कैंसर 2020 में हुआ था. जिस की पहचान भी चौथी स्टेज पर हुई थी. संजय दत्त अब इलाज के बाद एकदम ठीक हो चुके हैं लेकिन उन की बीमारी गौरतलब इसलिए है कि अपने दौर की मशहूर अभिनेत्री ब्यूटी क्वीन के खिताब से नवाजी गई उन की मां नर्गिस दत्त की मौत भी कैंसर से हुई थी.
संजय की पहली पत्नी की मौत भी कैंसर से हुई थी. उन के पिता सुनील दत्त ने अपनी पत्नी की याद में 1982 में फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ बनाई थी. इस फिल्म से होने वाले प्रौफिट को उन्होंने कैंसर के इलाज के लिए दान भी कर दिया था. सुनील दत्त की एक मंशा लोगों को कैंसर के दर्द और उस से होने वाली मौत से रूबरू कराने की भी कामयाब कोशिश थी.
‘दर्द का रिश्ता’ में कैंसर पेशेंट का रोल खुशबू ने निभाया था जिसे 11 साल की उम्र में ल्यूकोमिया यानी ब्लड कैंसर हो जाता है जिसे बोन मेरो ट्रांसप्लांट से ठीक होते दिखाया भी गया है. फिल्म की कहानी जानबूझ कर कैंसर के इर्दगिर्द गढ़ी गई जिस से अपनी बात कहने या मैसेज देने में आसानी रहे. नायक और नायिका दोनों ही डाक्टर बताए गए.
फिल्म में मुंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल को भी प्रमुखता से दिखाया गया है. 80 के दशक में कैंसर तेजी से फैलती बीमारी थी जिस में मरीज के बचने की कोई उम्मीद नहीं होती थी. ‘दर्द का रिश्ता’ की खूबी यह भी थी कि इस की कहानी को परिवार और खून के रिश्तों को ध्यान में रखते लिखा गया था.
रीना राय और स्मिता पाटिल दोनों ने प्रभावी अभिनय किया था. लेकिन सुनील दत्त बेहद नैचुरल एक ऐसे पिता के रोल में लगे थे जिस के चेहरे पर बेटी की मौत का खौफ हरदम मंडराता रहता है. फिल्म दर्शकों ने सराही थी और उन्हें इस से कैंसर को समझने का भी मौका मिला था.
फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ की खूबी यह थी कि इस में, अमेरिका में ही सही, कैंसर के इलाज को मुमकिन बताया गया था जिस का इलाज अब भारत में भी होने लगा है लेकिन यह भी कड़वा सच है कि यह बहुत महंगा है. यह चिंता भारत के मद्देनजर फिल्म के आखिर में सुनील दत्त स्मिता पाटिल के सामने जताते भी हैं.
आज भी बौन मेरो ट्रांसप्लांट आम आदमी की बस की बात नहीं जिस पर 20-25 लाख रुपए का खर्च आता है. ‘दर्द का रिश्ता’ रिलीज होने के 4 साल पहले 1978 में आई थी ‘अखियों के झरोखे से’ जिस ने बौक्सऔफिस पर धूम मचा दी थी. यह मूलतया रोमांटिक फिल्म थी जिस की कामयाबी में गीतसंगीत का भी बड़ा हाथ था. सस्ती, स्वस्थ और मनोरंजक पारिवारिक फिल्में बनाने के लिए मशहूर राजश्री प्रोडक्शन की इस फिल्म में सचिन और रंजीता की जोड़ी थी.
नायक हिंदू है जिसे क्रिश्चियन युवती से प्यार हो जाता है. लेकिन दोनों के प्यार में पेरैंट्स या समाज आड़े आता नहीं दिखाया गया है. जब शादी की बात तय हो जाती है तो पता चलता है कि नायिका को ल्यूकेमिया है. नायिका चाहती है कि नायक उस से दूर हो जाए जो हिंदी फिल्मों का एक खास टोटका है लेकिन नायक नहीं मानता. आखिर में सभी कैंसर से हार जाते हैं और नायिका नायक की बांहों में दम तोड़ देती है.
‘दर्द का रिश्ता’ और कैंसर पर बनी दूसरी फिल्मों की तरह इस में भी कैंसर को ले कर कोई खास मैसेज नहीं है लेकिन इस के बाद भी ‘अखियों के झरोझे से’ हिट हुई थी तो इस की वजह कालेज के सीन्स, रोमांस और उस से भी ज्यादा अहम बात फिल्म का अंत दुखद होना था जो आमतौर पर उन दिनों हिंदी फिल्मों का रिवाज नहीं था. कैंसर के मरीज के आखिरी दिन कितने द्वन्दात्मक होते हैं, यह दिखाने में ताराचंद बड़जात्या सफल रहे थे और रंजीता को खासी तारीफ दर्शकों व समीक्षकों की मिली थी.
1971 में कैंसर पर प्रदर्शित पहली बड़ी फिल्म ‘आनंद’ ने ही, दरअसल, देशभर को कैंसर के खौफ से रूबरू कराया था. लेकिन कुछ इस अंदाज में कि दर्शक भले ही नम आंखें लिए सिनेमाहौल से बाहर निकले लेकिन उस के जेहन में राजेश खन्ना की ऐक्टिंग और होंठों पर उन के बोले जिंदादिल डायलौग थे कि ‘बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं.’ फिल्म फ़्लैशबैक में चलती है जिस में डाक्टर भास्कर बनर्जी बने अमिताभ बच्चन को अपने लिखे उपन्यास ‘आनंद’ के लिए पुरस्कार मिलता है.
निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी के सधे डायरैक्शन का कमाल ही इसे कहा जाएगा कि कई जगह अतिनाटकीयता होने के बाद भी फिल्म पर उन की पकड़ बनी रही. इस के एक साल पहले ही निर्देशक असित सेन 1970 में राजेश खन्ना ही अभिनीत फिल्म ‘सफर’ में भी कैंसर का दर्द दिखा चुके थे. ‘आनंद’ को देखने के बाद दर्शकों की जबान पर लिंफोस्कोर्मा औफ इंटेसटाइन यानी आंतों का कैंसर शब्द चढ़ गया था.
कैंसर का कोई इलाज न होने पर एक डाक्टर किस तरह खीझताझल्लाता है, इस बेबसी को अमिताभ बच्चन ने बखूबी जिया था. मौत जब तय हो चुकी हो तो किसी की भी प्रतिक्रिया निराशा और हताशा भरी ही हो सकती है, इस मिथक को झुठलाते हुए ‘आनंद’ का जिंदादिल किरदार दर्शकों को खूब भाया था.
‘आनंद’ में हालांकि सारे मसाले थे लेकिन कैंसर के प्रति गंभीरता भी कम नहीं थी. तब चूंकि कैंसर का कोई इलाज नहीं था, इसलिए निर्माता और निर्देशक के पास इस के अलावा कोई और थीम हो भी नहीं सकती थी कि कैंसर की गिरफ्त में आए मरीज कैसे बचीखुची जिंदगी हंसीखुशी जिएं. फिल्म के गाने आज भी शिद्दत से सुने और गुनगुनाए जाते हैं.
कैंसर पर जो कमजोर लेकिन चर्चित फिल्में बनीं उन में से एक साल 2003 में प्रदर्शित फिल्म ‘कल हो न हो’ भी है. इस फिल्म में शाहरुख खान, प्रीति जिंटा और सैफ अली खान जैसे नामी व महंगे कलाकार थे. लिहाजा, इस का चलना तो तय था.
निर्माता कारण जौहर ने इस की कहानी लिखी थी जिस में हिंदी फिल्मों को कामयाब बनाने वाले सारे टोटके आजमाए गए थे. निर्देशक निखिल आडवाणी मुद्दे की बात कम ही कर पाए लेकिन चूंकि कैंसर रोगी के रोल में शाहरुख खान थे इसलिए उन के द्वारा निभाए अमन के किरदार में थोड़ा दम तो आया था.
नायिका नैना हालात की मारी निराश युवती है जो अमन से मिलती है तो जिंदगी के माने समझती है. दोनों में प्यार हो जाता है लेकिन नायक कुछ ऐसे हालात पैदा करता है कि नायिका उस के दोस्त की तरफ झुके.
आखिर वह क्यों ऐसा चाहता है, यह राज खुलता है तो दर्शकों को पता चलता है कि उसे कैंसर है. यह थीम बहुत घिसीपिटी हो चली थी, इसलिए निखिल आडवाणी ने इस में वह सब ठूंस दिया जो दर्शक बीसियों बार देख चुके थे. अमन के किरदार पर भी ‘आनंद’ के राजेश खन्ना की छाप दिखाई पड़ती है. कैंसर पर बनी इस फिल्म में शोबाजी के चलते दर्शक नायक से उतने कनैक्ट नहीं हो पाए जितने कि दूसरी फिल्मों में हुए थे.
कैंसर पर एक नियमित अंतराल से फिल्में बनती रहीं लेकिन अधिकतर में इसे जबरदस्ती कहानी में ठूंसा गया था. जहां सहानुभूति और मौत की दरकार थी वहां निर्माताओं ने कैंसर को एक प्रोडक्ट की तरह भुनाने की कोशिश की जिसे दर्शकों से नकार दिया. लेकिन साल 2020 में ओटीटी पर प्रदर्शित ‘दिल बेचारा’ एक हद तक इस की अपवाद मानी जा सकती है. मुकेश छावड़ा द्वारा निर्देशित ‘दिल बेचारा’ में लीड रोल सुशांत सिंह राजपूत ने निभाया था जो उन की आखिरी फिल्म भी थी.
थायराइड कैंसर की मरीज के रूप में संजना सांघी ने अपनी प्रतिभा दिखाने की पूरी कोशिश की लेकिन वह ज्यादा चल नहीं पाई. इस के बाद वे किसी फिल्म में नजर नहीं आईं. उन की पहचान केडबरी, तनिष्क और डाबर के विज्ञापनों तक ही सिमटी रही. नायक को भी आस्टियो साकोर्मा से पीड़ित दिखाया गया है जिस में कैंसर हड्डियां बनाने वाली कोशिकाओं में शुरू होता है.
भारत में हर साल एक लाख से भी ज्यादा मामले आस्टियो साकोर्मा के सामने आते हैं. इस कैंसर से ताल्लुक रखती एक अहम बात यह है कि यह ज्यादातर टीनऐजर्स में होता है. असल में ‘दिल बेचारा’ लुकिंग फार अलास्का और पेपर टाउंस जैसे चर्चित उपन्यास लिखने वाले अमेरिकी उपन्यासकार जान ग्रीन के उपन्यास पर बनी हौलीवुड की फिल्म ‘द फौल्ट इन आवर स्टार्स’ की रीमेक थी जो कोविड के चलते देर से रिलीज हुई.
सुशांत की रहस्यमय मौत के बाद मचे बवंडर का ‘दिल बेचारा’ को भरपूर फायदा मिला था. युवा उन्हें देखने को टूट पड़े थे. इस फिल्म की थीम प्यार और मौत थी जो सुशांत की जिंदगी से मैच भी करती हुई थी. मैनी के किरदार में वे ठीकठाक लगे थे जो जीने के नएनए फंडे बताता रहता है लेकिन फिल्म में वास्तविकता तब ज्यादा नजर आती है जब हताशनिराश नायिका को औक्सीजन सिलैंडर साथ ले कर चलते दिखाया जाता है.
खुद नायक भी लाइलाज बीमारी से जूझ रहा है लेकिन वह नायिका के मुकाबले जिंदादिल है और नियति को स्वीकार चुका है. नाटकीय घटनाओं के बीच दोनों में प्यार हो जाता है लेकिन आखिर में नायक मर जाता है. फिल्म थायराइड कैंसर के प्रति आगाह करती है जो पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा होता है. हालफिलहाल यह माना जाता है कि यह बीमारी पैसे वाली महिलाओं में ज्यादा होती है. दूसरे कैंसरों की तरह इस की पहचान भी शुरुआत में हो जाए तो इस का भी इलाज संभव है.
मैनी का किरदार कुछकुछ ‘आनंद’ से मिलताजुलता दिखाने की कोशिश की गई है लेकिन मुकेश छावड़ा ‘आनंद’ जैसी कोई बात ‘दिल बेचारा’ में पैदा नहीं कर पाए.
कैंसर पर और भी जो फिल्में बनीं उन में 1972 में ही आई ‘अनुराग’ प्रमुख थी. 1976 में आई ‘मिली’ में भी कैंसर था और 1981 में रणधीर कपूर अभिनीत फिल्म ‘हरजाई’ में भी कैंसर पर फ़ोकस किया गया था. जब कुछ फिल्में चल निकलीं तो निर्माताओं ने इस गंभीर विषय पर जो बनाया उसे दर्शकों ने सिरे से खारिज कर दिया.
‘कलंक’, ‘कट्टी बट्टी’, ‘लुटेरा’ और ‘द स्काई इज पिंक’ वक्तवक्त पर कैंसर पर बनी फ्लौप फिल्में हैं. साल 2016 में करण जौहर की ही ‘ए दिल है मुश्किल’ ऐसी ही फिल्म थी जो रणवीर कपूर ऐश्वर्या राय और अनुष्का शर्मा के लीड रोल्स में होने से ठीकठाक कमाई कर ले गई थी, वरन तो कैंसर इस में कहनेभर को था, बाकी जितनी बकवास एक फिल्म में हो सकती है वह इस में थी. कहने का मतलब यह नहीं कि कैंसर पर बनी फिल्म कोई डाक्यूमैंट्री हो लेकिन उस से इतने बंबइया होने की भी उम्मीद नहीं की जाती कि वह अपनी और मुद्दे की बात ही न कह पाए.
इस के बाद भी कैंसर पर बनी सभी फिल्मों की यह खासीयत रही कि उन में टोनेटोटकों और तंत्रमंत्र या आयुर्वेद या किसी और चमत्कार से कैंसर ठीक होते नहीं दिखाया गया. नहीं तो हिंदी फिल्मों में तो गूंगा बोलने और लंगड़ा चलने लगता है. इस के बाद भी अफसोस की बात यह है कि कैंसर मरीज के परिजन झाड़फूंक वगैरह में ज्यादा लगे दिखते हैं जिस से कुछ दिनों के लिए झूठी उम्मीद तो मिलती है लेकिन जिंदगी नहीं, जो अब एलोपैथी के इलाज से मुमकिन होने लगी है.