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अनुप्रिया पटेल: विरासत की राजनीति में न पार्टी बची न परिवार

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भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन की तरफ से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर लोकसभा सीट से अनुप्रिया पटेल चुनाव लड़ रही हैं. वह अपना दल सोनेलाल गुट की अध्यक्ष है. 2012 के विधानसभा चुनाव में वह विधायक चुनी गई थीं. इस के बाद वह 2014 के लोकसभा चुनाव जीत कर सांसद और मोदी मंत्रिमंडल में केन्द्रीय मंत्री बनीं. अनुप्रिया पटेल डाक्टर सोने लाल पटेल की बेटी हैं.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में डाक्टर सोने लाल पटेल को कमजोर वर्ग का प्रभावी नेता माना जाता है. उन का राजनीतिक कैरियर बहुजन समाज पार्टी से शुरू हुआ. वह कांशीराम के बेहद करीबी और बसपा के संस्थापक सदस्यों में से थे. डाक्टर सोनेलाल पटेल ने हमेशा जातिवाद का डट कर विरोध किया और सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ी. शुरूआती दौर में वह भाजपा और उस के मनुवाद के प्रबल विरोधी थे. सोने लाल पटेल का जन्म कन्नौज जिले के बगुलिहाई गांव में एक कुर्मी हिंदू परिवार में हुआ था.

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दलित पिछड़ों और कमजोरों के नेता थे सोनेलाल

पंडित पृथ्वी नाथ कालेज कानपुर से एमएससी की उपाधि प्राप्त की और कानपुर विश्वविद्यालय से भौतिकी में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. कम उम्र से ही वह समाज में फैले जातिवाद और सामाजिक असमानता के मुखर आलोचक थे. उन्होंने हमेशा सामाजिक न्याय और समानता की वकालत की. सोने लाल पटेल ने चौधरी चरण सिंह के साथ मिल कर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की. सामाजिक असमानता और जातिगत शोषण के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों और रैलियों में सक्रिय रूप से भाग लिया. विरोध प्रदर्शन के दौरान कई बार उन्हें पुलिस की बर्बरता भी सहनी पड़ी.

इस बीच सोने लाल पटेल की मुलाकात कांशीराम हुई. कांशीराम दलित पिछड़ों और मुसलमानों की लडाई लड़ रहे थे. वह उत्तर भारत में सामाजिक न्याय आंदोलन खड़ा करने का प्रयास कर रहे थे. जाति-आधारित भेदभाव और सामाजिक अन्याय के संबंध में उन के दृष्टिकोण काफी हद तक एक जैसे थे. कांशीराम के कहने पर पटेल ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन को बसपा के संस्थापकों में से एक माना जाता है.

 

कांशीराम ने जब बसपा के पुराने नेताओं को नजरअंदाज करते हुए मायावती को आगे बढ़ाना शुरू किया तो सोने पटेल का उन से मोह भंग हुआ. संकल्प और उद्देश्यों से असन्तुष्ट होने के कारण वे पार्टी से अलग हो गए. 4 नवंबर,1995 को सोने लाल पटेल ने ‘अपना दल’ की स्थापना की. उन्होंने 2009 में फूलपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव भी लड़ा. इसी साल उन की सड़क दुर्घटना में मौत भी हो गई. अपने इस दौर में सोने लाल पटेल भाजपा के साथ आ चुके थे.

न पार्टी बची न परिवार

डाक्टर सोने लाल पटेल के बाद उन की पत्नी कृष्णा पटेल अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनी और बेटी अनुप्रिया पटेल 2012 में वाराणसी की रोहनियां सीट से पहली बार विधायक बनी. 2014 में मिर्जापुर लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं. 2016 में मोदी सरकार में वह केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री बनीं.

राजनीतिक वर्चस्व में अनुप्रिया पटेल का अपनी मां कृष्णा पटेल और बहन पल्लवी पटेल से झगड़ा हुआ. झगड़े की वजह यह थी कि अपना दल के कामकाज में अनुप्रिया के पति आशीष सिंह का दखल बढ़ गया था. वह राजनीति में अपनी जगह बनाना चाहते थे. दूसरी तरफ अनुप्रिया की मां कृष्णा पटेल और बहन पल्लवी पटेल अपना दल पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहती थी. ऐसे में बात आगे बढ़ी तो अपना दल दो हिस्सों में बंट गया. अनुप्रिया पटेल ने ‘अपना दल (सोनेलाल)’ का गठन किया औरा कृष्णा पटेल और बहन पल्लवी पटेल नाम अपना दल (कमेरावादी) का गठन किया.

अनुप्रिया पटेल ने 2019 का लोकसभा चुनाव जीता, मंत्री हैं. उन की बहन पल्लवी पटेल ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव सिराथू विधानसभा सीट पर लड़ा. चुनाव जीत कर वह विधायक बनीं. अनुप्रिया पटेल सांसद और बहन पल्लवी पटेल विधायक हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल खासकर वाराणसी, भदोही, मिर्जापुर, जौनपुर, इलाहाबाद और प्रतापगढ़ क्षेत्रों में अपना दल का प्रभाव कुर्मी बिरादरी में है.

सोनेलाल पटेल ने कुर्मी बिरादरी में अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी. अपना दल के दोनों गुट अलगअलग विचारधाराओं के साथ जुड़ कर राजनीति कर रहे हैं. कृष्णा पटेल और पल्लवी पटेल वाला अपना दल (कमेरावादी) कांग्रेस-सपा की अगुवाई वाले इंडिया ब्लौक के साथ है. अनुप्रिया पटेल की अगुवाई वाला अपना दल (सोनेलाल) भाजपा के एनडीए गठबंधन के साथ है.

अनुप्रिया ने कानपुर में ली स्कूली शिक्षा

अनुप्रिया पटेल ने कानपुर के बालिका विद्यालय से अपनी 12वीं तक पढ़ाई की. इस के बाद लेडी श्रीराम कालेज से स्नातक किया. छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय से और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में एमबीए किया. कुछ समय तक अनुप्रिया ने ऐमिटी यूनिवर्सिटी नोएडा में पढ़ाया भी है. 2012 में पहली बार विधायक बनीं. 2009 में अनुप्रिया की शादी आशीष कुमार सिंह से हुई. वह अभी उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं. वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हैं.

2012 में अनुप्रिया पहली बार विधायक बनी. 2014 में सांसद बनीं. 2016 में वह मोदी सरकार में मंत्री बनीं. 2019 में दूसरी बांर सांसद बनीं. 2024 में वह मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ रही हैं. अनुप्रिया की मां कृष्णा पटेल का कहना है कि आशीष कुमार सिंह के चलते ही उन के परिवार में बिखराव हुआ. अनुप्रिया पटेल की सिफारिश पर ही भाजपा ने उन को पहले विधान परिषद का सदस्य बनवाया. बाद में 2022 में योगी सरकार वह मंत्री भी बन गए.

परिवार के झगड़े ने बिगाड़ी छवि

सोने लाल पटेल भले ही खुद सांसद या विधायक का चुनाव न जीत पाए हों पर अपने परिवार और समाज को जोड़ कर चलने में सफल रहे थे. 2009 में अनुप्रिया पटेल की शादी 12 दिन के बाद ही सोनेलाल पटेल की सडक दुर्घटना में मृत्यू हो गई. उस समय अनुप्रिया पटेल ने इस की सीबीआई जांच की मांग भी की थी. जैसेजैसे राजनीति में अनुप्रिया का कद बढ़ने लगा परिवार में झगड़े शुरू हो गए. पहले अपना दल में बंटवारा हुआ. सोनेलाल पटेल की राजनीतिक विरासत दो दलों के रूप मे बंट गई.

2021 में सोनेलाल पटेल की छोटी बेटी अमन पटेल ने एक पत्र गृहमंत्री अमित शाह को लिखा है. जिस में कहा है कि माता कृष्णा पटेल और मुझे तुरंत सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए. अमन पटेल ने अपनी बहन पल्लवी पटेल से जान को खतरा बताया है. इस से पहले अमन पटेल ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को भी पत्र लिख कर सुरक्षा की मांग की थी और अपनी बड़ी बहन पल्लवी पटेल से मां और अपने खुद को जान का खतरा बताया था.

अमन पटेल ने अपनी बड़ी बहन पल्लवी पटेल पर आरोप लगाते हुए कहा कि सोनेलाल पटेल जो अपना दल के संस्थापक हैं उन की उत्तराधिकारी के रूप में सभी 4 बहने हैं और उन की वसीयत में भी सब का नाम होना चाहिए लेकिन इस को अनदेखा करते हुए बगैर किसी के जानकारी के पिताजी की पूरी संपत्ति अपने नाम करा ली है और जिस के कुछ कागजात बड़ी मुश्किल से प्राप्त किए गए हैं.

आरोप है कि पल्लवी पटेल ने 2017 में विवाह के बाद अपने पति पंकज निरंजन को बिना किसी जानकारी के पिता सोनेलाल पटेल के व्यवसायिक ट्रस्ट में किसी की जानकारी बिना सदस्य बना दिया. 2019 में लोकसभा चुनाव में माता कृष्णा पटेल फूलपुर सीट से लड़ना था लेकिन उन को जबरदस्ती गोंडा से चुनाव लड़ाया गया और वहीं 2019 में ही पल्लवी ने अपने पति पंकज निरंजन को फूलपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा दिया.

अमन पटेल अपनी बड़ी बहन अनुप्रिया के साथ है. अमन पटेल की शादी अनुप्रिया पटेल मौजूद दिखी और शादी कराने में भूमिका अदा की थी. जबकि दूसरी बहन पल्लवी पटेल और मां कृष्णा पटेल को बुलाया भी नहीं गया था. ऐसे में सोनेलाल का परिवार और संगठन दोनों ही आपस में बंट गए हैं.

अनुप्रिया पटेल अपने पिता सोनेलाल पटेल के समय से ही राजनीति में सक्रिय हो गई थीं. एक तरह से उन की राजनीतिक उत्तराधिकारी हो गई थी. पल्लवी पटेल अपने पिता का स्कूल और बिजनेस देखने का काम करती थीं. दोनों की शादी होने के बाद परिवार में उन के पतियों का दखल बढ़ा जिस के बाद अपना दल और सोनेलाल परिवार दोनों अलगअलग राह पर चले गए. जाति और समाज की एकजुटता की बात करतेकरते परिवार और दल दोनों बिखर गए.

क्या शादी से पहले की बातें पति को बतानी चाहिए?

सवाल

क्या शादी से पहले की बातें पति को बतानी चाहिए?

जवाब

मेरी जल्दी ही शादी होने वाली है. मेरा पहले बौयफ्रैंड था लेकिन अब कोई मतलब नहीं है उस से. दोतीन और भी बातें हैं घर वालों की. आप बताएं, क्या बताना ठीक रहेगा?

पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास पर टिका होता है. शादी से पहले कुछ बातें क्लीयर हो जाएं तो अच्छा रहता है. हां, पहली मुलाकात में बताएं, यह जरूरी नहीं. थोड़ा एकदूसरे को जानपहचान लें. उस की मानसिकता को समझ लें और आप को जब पक्का लगे कि वह आप से शादी करने के लिए मना नहीं करेगा तो उसे बौयफ्रैंड वाली बात बता दें.

जहां तक घरवालों की बातें हैं तो जरूरी नहीं कि आप शादी से पहले बताएं, यदि वे बातें आप के विवाहित जीवन से संबंधित नहीं हैं तो. शादी के बाद बताना चाहें तो बता दीजिए, वक्त और मौका देख कर. सब आप की समझदारी पर निर्भर करता है.

 

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चुनावी अफवाहें फैलाता सोशल मीडिया

महाभारत में एक कथा अश्वथामा से जुड़ी है. अश्वत्थामा का जन्म भारद्वाज ऋषि के पुत्र द्रोण के यहां हुआ था. उन की माता ऋषि शरद्वान की पुत्री कृपी थीं. द्रोणाचार्य का गोत्र अंगिरा था. तपस्यारत द्रोण ने पितरों की आज्ञा से संतान प्राप्ति हेतु कृपी से विवाह किया. कृपी भी बड़ी ही धर्मज्ञ, सुशील और तपस्विनी थीं. दोनों ही संपन्न परिवार से थे. जन्म लेते ही अश्वत्थामा ने अश्व के समान आवाज निकाली. यह चारों दिशाओं में गूंजने लगी. तब आकाशवाणी हुई कि इस बालक का नाम अश्वत्थामा होगा.
महाभारत युद्ध के दौरान जब भीष्म शरशय्या पर लेट गए तो 11वें दिन के युद्ध में कर्ण के कहने पर द्रोण सेनापति बनाए गए. दुर्योधन द्रोण से कहते हैं कि ‘वे युधिष्ठिर को बंदी बना लें तो युद्ध अपनेआप खत्म हो जाएगा’.

युद्ध में जब दिन खत्म हो रहा होता है तो द्रोण युधिष्ठिर को युद्ध में हरा कर उसे बंदी बनाने के लिए आगे बढ़ते ही हैं कि अर्जुन आ कर अपने बाणों की वर्षा से उन्हें रोक देता है. नकुल, युधिष्ठिर के साथ थे. अर्जुन भी वापस युधिष्ठिर के पास आ गए. इस प्रकार कौरव युधिष्ठिर को नहीं पकड़ सके.
द्रोण का मुकाबला करना पांडवों के लिए भारी पड़ रहा था. द्रोण के साथ उन का बाहुबलि बेटा अश्वत्थामा भी युद्ध कर रहा होता है. पितापुत्र ने मिल कर महाभारत युद्ध में पांडवों की हार सुनिश्चित कर दी थी. पांडवों की हार को देख कर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से छल का सहारा लेने को कहा.

इस योजना के तहत युद्ध में यह अफवाह फैला दी जाए कि ‘अश्वत्थामा मारा गया’, लेकिन युधिष्ठिर झूठ बोलने को तैयार नहीं थे. तब भीम द्वारा युद्ध कर रहे अश्वत्थामा नामक हाथी को मार दिया गया. इस के बाद युद्ध में यह बाद फैला दी गई कि ‘अश्वत्थामा मारा गया’. द्रोणाचार्य को इस बात पर भरोसा नहीं हो रहा था. द्रोण ने युधिष्ठिर से अश्वत्थामा की सत्यता जानना चाही तो उन्होंने जवाब दिया ‘अश्वत्थामा मारा गया, परंतु हाथी’. श्रीकृष्ण ने उसी समय शंखनाद किया जिस के शोर के चलते गुरु द्रोणाचार्य आखिरी शब्द ‘हाथी’ नहीं सुन पाए. उन्होंने समझा कि मेरा पुत्र मारा गया. यह सुन कर उन्होंने शस्त्र त्याग दिए और युद्ध भूमि में आंखें बंद कर शोक में डूब गए. यही मौका था जबकि द्रोणाचार्य को निहत्था जान कर द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से उन का सिर काट डाला.

एक अफवाह ने महाभारत युद्ध का पूरा परिणाम बदल दिया. दूसरी कहानी में भी अफवाह की भूमिका प्रमुख रही है. महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की. अर्जुन का बेटा अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस गया. चक्रव्यूह के सातवें चरण में उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि 7 महारथियों ने घेर कर मार दिया. अभिमन्यु की मृत्यु की सूचना पा कर अर्जुन क्रोध से पागल हो उठा. उस ने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले उस ने जयद्रथ का वध नहीं किया तो वह आत्मदाह कर लेगा.
अगले दिन युद्ध शुरू हुआ. अर्जुन की आंखें जयद्रथ को ढूंढ रही थीं. किंतु वह कहीं दिख नहीं रहा था. दिन बीतने लगा. धीरेधीरे अर्जुन की निराशा बढ़ती गई. यह देख श्रीकृष्ण बोले ‘पार्थ समय बीत रहा है और कौरव सेना ने जयद्रथ को रक्षा कवच में घेर रखा है. अतः तुम शीघ्रता से कौरव सेना का संहार करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो’. यह सुन कर अर्जुन का उत्साह बढ़ा और वह जोश से लड़ने लगे. जयद्रथ तक पहुंचना मुश्किल था. संध्या होने वाली थी. तब श्रीकृष्ण ने अपनी माया फैला दी. इस के फलस्वरूप सूर्य बादलों में छिप गया और संध्या का भ्रम उत्पन्न हो गया.

संध्या हो गई है और अब अर्जुन को प्रतिज्ञावश आत्मदाह करना होगा’ यह सोच कर जयद्रथ और दुर्योधन खुशी से उछल पड़े. अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए जयद्रथ कौरव सेना के आगे आ कर अट्टहास करने लगा. जयद्रथ को देख कर श्रीकृष्ण बोले ‘पार्थ तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने खड़ा है उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इस का. वह देखो अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है.’ यह कह कर उन्होंने अपनी माया समेट ली. देखते ही देखते सूर्य बादलों से निकल आया. यह देख जयद्रथ भागने को हुआ लेकिन तब तक अर्जुन ने अपना गांडीव उठा लिया था. उस का वध कर दिया.

तथ्यों को नहीं परखते

पौराणिक कथाओं से हम को अफवाह सुनने की आदत पड़ गई है. अफवाह सुन कर तथ्यों का जांचने का काम नहीं करते हैं. आजकल देश में लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं. सोशल मीडिया कौन नेता किस दल में जा रहा इस की अफवाह फैलाने का काम कर रहा है. किस नेता को नाम उम्मीदवारी से कट रहा है किस का जुड़ रहा है इस को ले कर कयास लगाता है. जिस को ले कर बात सच हो जाती है उस पर अपनी पीठ थपथपाते हैं हम ने पहले ही कह दिया था. ज्योतिष में भी यही होता है कि 10 बातें कहते हैं जो सही हो जाती है उन का ढोल पीटते हैं जो सच नहीं होती उन की चर्चा नहीं होती है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं अजय राय. वह वाराणसी लोकसभा से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव भी लड़ रहे हैं. वाराणसी के मजबूत नेता हैं. उन को ले कर सोशल मीडिया पर अफवाह उड़ा दी गई कि वह भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं. सोशल मीडिया कि इस अफवाह चैनलों ने भी खबर कि तरह प्रसारित कर दिया. इस को सुन कर अजय राय को अपना वीडियो जारी कर के खंडन करना पड़ा कि वह कांग्रेस में ही हैं. भाजपा में जाने की बात अफवाह है. उन्होंने अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ मुकदमा कायम करने की धमकी भी दी. अजय राय ने कहा कि भाजपा अपनी हार से डर कर अफवाहे फैला रही है.

इसी तरह की अफवाह मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेता कमलनाथ को ले कर उड़ाई गई. लगातार खबरें चलाई गईं कि कमलनाथ किस तरह से भाजपा में जा रहे हैं. उन के बेटे को भाजपा से टिकट मिलेगा. इस तरह की शर्तें बताई गईं जो शायद खुद कमलनाथ और भाजपा को भी नहीं पता थीं.
जब कमलनाथ भाजपा में नहीं गए तो कहा गया कि अमित शाह ने मना कर दिया. 2022 के विधानसभा चुनाव के पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पद से हटाया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अफसर एके शर्मा यूपी की कमान संभालेंगे. योगी न केवल 2022 का चुनाव जीत कर आए दूसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री भी बने.

अफवाहों की चर्चा अधिक होती है

तथ्यों का जांचने में मेहनत लगती है. यह कोई करना नहीं चाहता. राजनीतिक रिपोर्टिंग का बड़ा हिस्सा कयासों से आगे निकल कर अफवाहों तक पंहुच गई है. प्रिंट मीडिया में खबरों को जांचपरख कर छापा जाता था. अब सोशल मीडिया और खबरिया चैनलों में बिना तथ्यों की जांचपरख के खबरों का प्रकाशन हो जाता है. यह कयास कम अफवाहें फैलाने वाली अधिक होती हैं. ऐसे में खबरों पर जांचपरख कर समझबूझ कर यकीन करना चाहिए.

खबरिया चैनल तथ्यों के बिना खबरें चलाते हैं. पहले स्वर्ग में सीढ़ी, नागनागिन, नोट में चिप, देवी देवताओं को ले कर तथ्य विहीन खबरें दिखाते थे अब राजनीतिक खबरों में भी वही हाल हो गया है. ऐसे में जनता खुद को ठगा महसूस करती है. संविधान ने मीडिया को चौथे स्तंभ का दर्जा दिया वह चरमरा रहा है. अफवाह, कयास, पेड न्यूज और खबरों का दायरा खत्म हो गया है. इन में अंतर कर पाना कठिन हो गया है.

 

सांस क्यों फूलती है ? जानें इसकी वजह

आए दिन सांस फूलने की शिकायतें सुनने को मिलती हैं. शादीब्याह या किसी छोटेमोटे प्रोग्राम में मौसी, बूआ, ताऊ, चाची या अन्य किसी चिरपरिचित को सांस फूलने की शिकायत करते सुना जाता है. क्या कभी आप ने सोचा कि सांस फूलने के असली कारण क्या हैं.

सांस फूलना

सांस फूलने की मुख्य वजह है शरीर को औक्सीजन ठीक से न मिल पाना जिस से फेफड़े पर अनावश्यक दबाव पड़ता है. ऐसे में फेफड़े औक्सीजन पाने के लिए श्वसन क्रिया की गति को बढ़ा देते हैं जिस को हम सरल भाषा में सांस फूलना कहते हैं. यदि समय रहते सांस फूलने पर ध्यान नहीं दिया गया तो इस के परिणाम जानलेवा हो सकते हैं.

सांस फूलने के रोकने के 2 उपाय हैं. एक, या तो शरीर की औक्सीजन की मांग पूरी करने के लिए बाहर से अतिरिक्त औक्सीजन दी जाए, दूसरे, शरीर की औक्सीजन की मांग को कम किया जाए.

महत्त्वपूर्ण कारण

सांस फूलने के खासकर अपने देश में 2 मुख्य कारण हैं. एक तो ज्यादा मोटापा व दूसरा शरीर में खून यानी लाल कणों की कमी. अगर औक्सीजन को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाले रक्तकणों यानी हीमोग्लोबिन की कमी है तो औक्सीजन की सप्लाई बाधित होगी.

अपने देश में अधिकांश महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं. काफी संख्या में महिलाएं बच्चेदानी की समस्या व उस से जुड़ी अनावश्यक व अधिक रक्तस्राव (ब्लीडिंग) की समस्या से पीडि़त हैं. देश में अधिकतर बच्चों के जन्म के बीच फासला काफी कम होना भी अनीमिया व सांस फूलने की शिकायत का एक बहुत बड़ा कारण है. सांस न फूले, इस के लिए कुपोषण समाप्त करना जरूरी है.

मोटापा एक अभिशाप

आजकल लोगों की आरामतलबी बढ़ रही है. नियमित सुबह की सैर व व्यायाम का अभाव, शराब व चरबीयुक्त खा- पदार्थों का भरपूर सेवन ये दोनों बातें शरीर के मोटापे को तेजी से बढ़ा रही हैं. अकसर मोटे लोगों को यह शिकायत करते सुना जाता है कि जरा सी सीढ़ी चढ़ने में सांस फूलती है. मोटापे में जरूरी नहीं कि दिल की बीमारी ही हो. समय रहते यदि कुपोषण खत्म कर दिया जाए व मोटापे को नियंत्रित किया जाए तो सांस फूलने की समस्या से छुटकारा मिल सकता है.

फेफड़े का रोग, बड़ा कारण

फेफड़े का इन्फैक्शन, जैसे निमोनिया व टीबी सांस फूलने का सब से बड़ा कारण हैं? श्वास नली व उस की शाखाओं में सूजन भी इस का एक कारण है जिसे मैडिकल भाषा में एस्थमैटिक ब्रांकाइटिस कहते हैं. कभीकभी श्वास नली पर किसी गिल्टी या छाती में ट्यूमर का दबाव भी सांस फूलने का कारण बन सकता है. अकसर दुर्घटना में छाती की चोट का सही इलाज न होने पर अंदर

खून या मवाद जमा हो जाता है और उस से फेफड़ों पर दबाव बनता है. इस से अकसर सांस फूलने के साथसाथ खांसी की भी शिकायत रहती है.

स्केलोडरमा नाम की बीमारी फेफड़े को आहत करती है और फेफड़े के अंदरूनी हिस्से में अस्वाभाविक बदलाव आता है. इस से फेफड़े की बाहरी औक्सीजन सोखने की क्षमता कम हो जाती है और जरा सा चलने पर सांस फूलने लगती है.

दिल के रोग

यदि आप का दिल कमजोर है यानी पिछले हार्टअटैक के दौरान दिल का कोई हिस्सा बहुत कमजोर या नष्ट हो गया है तो ऐसा कमजोर दिल खून व पानी का साधारण भार भी नहीं उठा पाता और सांस फूलने का कारण बन जाता है. ऊपर से अगर मोटापा भी है, तो स्थिति और भी कष्टकारी हो जाती है.

दायीं तरफ का दिल गंदे खून का स्टोरहाउस है जो धड़कन के साथ शरीर के अंगों से आए गंदे खून को फेफड़े की तरफ शुद्धीकरण के लिए भेजता है और फिर यह खून दिल के बाएं हिस्से में इकट्ठा होता है और धड़कन के साथ शरीर के अन्य अंगों में जाता है.

अगर किसी को पैदाइशी दिल की बीमारी है और दिल के अंदर शुद्ध व अशुद्ध खून का आपस में सम्मिश्रण होता रहता है, तो जिस्म में नीलापन दिखता है विशेषकर उंगलियां व होंठ प्रभावित होते हैं और साथ ही, सांस फूलने की भी शिकायत रहती है.

आवश्यक जांच

वैसे तो अनगिनत जांचें हैं पर कुछ बहुत जरूरी जांचें सांस फूलने के कारण को समझने व उस के इलाज के लिए आवश्यक हैं, जैसे छाती का ऐक्सरे, छाती का एचआर, सीटी, पीएफटी, दिल के लिए डीएसई (डोब्यूटामीन स्ट्रैस ईको), खून की जांच जैसे विटामिन ‘डी’ की मात्रा व ब्लड गैस एनालिसिस आदि.

सांस फूलने पर क्या करें

उस अस्पताल में जाएं जहां आवश्यक जांचों की सुविधा हो. संबंधित जांचों के बाद अगर लगे कि सांस फूलने का कारण फेफड़ा है तो किसी छाती रोग विशेषज्ञ व थोरेसिक सर्जन से सलाह लें. यदि फेफड़ा क्षतिग्रस्त है या दबाव में है तो तुरंत सर्जरी करवाएं, आप की जरा सी  लापरवाही दूसरी तरफ के नौर्मल फेफड़े को भी नुकसान पहुंचा सकती है. अगर सांस फूलना दिल की वजह से है तो किसी हृदयरोग विशेषज्ञ या कार्डियोथोरेसिक सर्जन से सलाह लें. किडनी विशेषज्ञ की राय भी लेनी पड़ती है अगर गुरदे के कारण सांस फूल रही है.

कुछ खास बातें

यदि आप 20 साल की उम्र से ही रोज 2 घंटे नियमित टहलते हैं और 2 घंटे धूप का सेवन करते हैं तथा धूलधक्कड़ से दूर रहते हैं तो यकीन मानिए आप सांस फूलने की समस्या से काफी हद तक बचे रहेंगे. मोटापा किसी भी हालत में न पनपने दें.

रोज तकरीबन 350 ग्राम सलाद व 350 ग्राम फलों का सेवन करें. प्रोटीन भरपूर मात्रा में लें. पत्तेदार सब्जियों का नियमित सेवन करें. किसी तरह के धूम्रपान व तंबाकू के सेवन से बचें. शराब न पीएं. अगर आप यह सलाह मानेंगे तो सांस फूलने की तकलीफ ले कर आप को अस्पताल के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे.                        –

(लेखक दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में वरिष्ठ थोरेसिक एवं कार्डियो वैस्कुलर सर्जन हैं.)

उलझनें: हर सास, बहू की दुश्मन नहीं होती

‘‘ममा, आप की चिट्ठी,’’ बेटे ने डाक देखते हुए कहा.

‘‘चिट्ठी? आजकल तो डाक के नाम पर बिजली, टैलीफोन का बिल या कोई औफिशियल लैटर ही होता है. मोबाइल और ईमेल के जमाने में चिट्ठी लिखने की फुरसत ही किसे है?’’

‘‘हां, देखिए तो, पता हिंदी में लिखा है…’’ मानो चिट्ठी के साथ ही हिंदी में लिखा पता भी एक अजूबा ही हो.

मैं ने चिट्ठी हाथ में ले कर पहले पते पर नजर डाली. मोती से पिरोए अक्षर कुछ जानेपहचाने से तो लगे पर स्मृति पर जोर डालने पर भी याद नहीं आया कि किस के लिखे हुए हो सकते हैं. ऊपर भेजने वाले का नाम नहीं था. चिट्ठी खोल कर पढ़ते ही चौंक उठी, ‘अरी गुड्डो.’ एक नातीपोते वाली अधेड़ स्त्री के लिए गुड्डो उद्बोधन अजीब ही लगेगा. मैं तो स्वयं भी भूल चुकी थी कि बचपन के कुछ वर्ष मुझे इसी नाम से पुकारा जाता था. पुरानी नौकरानी अवश्य मेरे काफी बड़े हो जाने के बाद भी मुझे ‘गुड्डो बाई’ कह कर पुकारती रही, पर अब तो उसे मरे भी जमाना बीत चुका था.

‘अरी गुड्डो, इतने साल बाद मेरी चिट्ठी पा कर तू हैरान हो रही होगी, है न? तेरी शादी के भी कई साल बाद तक हम दोनों एकदूसरे को चिट्ठी लिखती रही थीं. याद है न? पर जीजाजी के बारबार के तबादलों में यह सिलसिला कब खत्म हो गया, पता ही नहीं चला. खैर, मैं तो बराबर नागपुर में ही बनी रही और मेरा पता भी बराबर वही रहा. तू तो बीचबीच में अपनी खबर दे सकती थी. पर जाने दे, शिकायत नहीं कर रही, बुरा मत मानना. हम स्त्रियों की जिंदगी ही ब्याह के बाद कुछ ऐसी हो जाती है कि बचपन का सबकुछ पीछे छूट जाता है. ‘अब तो मैं तुझे निमंत्रण दे रही हूं. हमारी शादी की 50वीं सालगिरह है. यों हम ने पहले तो कभी शादी की सालगिरह नहीं मनाई पर इस बार तेरे भांजेभांजियां कुछ धूमधाम करने पर तुले हुए हैं, सो तुझे जीजाजी और बच्चों के साथ जरूर आना है. अब तो तू भोपाल में ही है, सो ज्यादा दूर भी नहीं है. देख, कोई बहाना नहीं चलेगा. जो तू न आई तो अब की मेरी पक्कीपक्की कुट्टी. जीजाजी को नमस्कार, बच्चों को प्यार, जरा जल्दी में हूं, बाकी मिलने पर.

तेरी अंगूरी.’

पत्र पढ़ कर मैं यादों में खो गई. मेरे बचपन की सहेली अंगूरी. गोरीचिट्टी, गुलगोथनी सी, बातबात पर हंसने वाली, जिस के लिए दिन में कई बार अपनी दादी की डांट खाती, ‘छोरियों का इत्ता हंसना अच्छा नहीं न होवे…’ पर अंगूरी की हंसी तो निर्झर बहते झरने सी झरती रहती. मध्य प्रदेश का छोटा सा गांव जहां विभाजन से पहले ही आ कर बसे 6-7 पंजाबी और 12-13 मारवाड़ी परिवार बाकी लोकल रहवासी. आपस में काफी भाईचारा. अंगूरी का परिवार हमारा पड़ोसी होने के कारण, हम दोनों हमउम्र सखियों का अधिकांश समय साथ ही बीतता. उस में व्यवधान तब आया जब गांव के प्राइमरी स्कूल से पास होने पर मैं आगे पढ़ने के लिए जबलपुर चली गई. उस समय गांव के मारवाड़ी समाज में लड़कियों को होस्टल भेजने के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता था. छुट्टियों में घर आने पर पुराना सिलसिला जारी रहता. मैं उसे अपने स्कूल और होस्टल की बातें बताती और वह मेरे पीछे गांव में घटी हर घटना से मुझे अवगत कराती. चिट्ठियों का सिलसिला भी बदस्तूर जारी रहता. पढ़ने का शौक होने के कारण अपने पिता को पटा कर उस ने किसी तरह प्राइवेट मिडिल पास कर लिया. फिर उस की शादी हो गई. छुट्टियां न होने के कारण मैं उस की शादी में नहीं आ पाई थी.

छुट्टियों में घर आने पर मैं सब से पहले उस से ही मिलने गई. पर अंगूरी को देख कर मुझे धक्का सा लगा. इन चंद महीनों में ही वह बिलकुल बदल गई थी. उस का गोरा गुलाबी रंग पीला पड़ गया था. उस की निर्झर सी हंसी भी गायब हो गई थी.

‘अंगूरी, तू बीमार है क्या? तू ने चिट्ठी में तो कुछ लिखा ही नहीं? क्या हो गया तुझे…?’

चिंतित काकी ने बताया, ‘पता नहीं बेटी, इसे क्या हो गया है. न पहले की तरह हंसतीबोलती है न ठीक से खातीपीती है. पिछले महीने गौने का मुहूर्त निकला, सब तैयारी हो गई पर यह बीमार पड़ गई. अंगूरी को पहले तो कभी बीमार पड़ते नहीं देखा. तेज बुखार और उल्टी. जबरदस्ती खिलाओ तो उसी समय सब निकल जाता है. इटारसी ले जा कर डाक्टर से इलाज कराया पर कोई फायदा नहीं हुआ. लोग कहते हैं कि किसी ने कुछ कर दिया है. सो, झाड़फूंक भी बहुत करवाया. पर यह वैसी की वैसी है. अब इस की ससुराल वाले फिर से मुहूर्त निकलवाने को कह रहे हैं. आखिर ब्याही छोरी को कब तक घर में रखेंगे. लोग पचास तरह की बातें करते हैं. यह बस चुप, घुन्नी सी बैठी रहती है. कुछ बताती भी तो नहीं. तू पूछ न, गुड्डो, तेरी सहेली है, बहन जैसी. शायद तुझे कुछ बताए.’ और काकी आंसू पोंछती वहां से उठ गईं.

मैं ने खोदखोद कर उस की ससुराल के बारे में पूछने की बहुत कोशिश की पर उस ने यही कहा कि वहां सब लोग बहुत अच्छे हैं.

‘पर कोई बात तो होगी. पहले तो तू ऐसी न थी. क्या जीजाजी…’

‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है,’ उस ने जल्दी से मेरी बात काट दी.

‘फिर क्या है?’

‘क्या बताऊं, गुड्डो, तू नहीं समझेगी.’

मैं ने इसी साल मैट्रिक कर के कालेज में दाखिला लिया था, चिढ़ कर बोली, ‘हां, मैं भला कैसे समझूंगी, तू तो शादी के बाद पुरखिन हो गई. दुनियाभर की समझ तो तुझ में ही पैदा हो गई है न?’ मैं खीझ कर उठ गई. मेरे वापस होस्टल जाने से 2 दिन पहले पता लगा कि अंगूरी की सास आई हैं. उन दिनों उन की बिरादरी में महिलाएं बहुओं के मायके नहीं जाती थीं. इसलिए सब को आश्चर्य हुआ. वे अंगूरी के साथसाथ उस की छोटी बहनों और सहेलियों के लिए भी ढेरों उपहार लाई थीं. अंगूरी के लिए उन की आंखों में छलकते प्यार में कोई बनावट नहीं थी. उन्होंने अंगूरी से क्या बातें कीं, यह तो पता नहीं चला पर अगली बार गौने का मुहूर्त निकलने पर अंगूरी बीमार नहीं पड़ी. बाद में उस के साथ मुलाकात होने या उस के पत्रों से भी उस के व्यवहार में कोई अस्वाभाविकता नजर न आने के कारण मैं ने भी फिर कभी उस से कुछ नहीं पूछा. इसी बीच, बेटे ने आवाज लगाई तो मैं वर्तमान में लौट आई.

उस के निमंत्रण पर हम ने उस की शादी की वर्षगांठ में जाने का निश्चय कर लिया. नागपुर स्टेशन पर अंगूरी और उस के पति हम लोगों को रिसीव करने आए. अंगूरी के बालों में भी मेरी तरह उजले तार चमक रहे थे और उस के पति कुछकुछ गंजे हो चले थे. पर दोनों के ही चेहरों पर खुशी और संतोष साफ झलक रहा था. दूसरी रात पार्टी समाप्त होने के बाद हम दोनों सहेलियां जब कमरे में लेटीं तो उस ने अपने जीवन की पुरानी कहानी से परदा उठाया. उस ने लजाते हुए बताया कि शादी के समय उसे सैक्स के विषय में कोई जानकारी नहीं थी. गांव की हमउम्र लड़कियों में उसी की शादी सब से पहले हुई थी. घर में भी कोई बड़ी बहन या भाभी के अभाव में उसे कौन कुछ बताता. पहली रात पति के प्रस्ताव पर वह एकदम भौचक रह गई थी. जब पति ने उसे समझाने का यत्न किया कि यह तो शादी का ही एक हिस्सा है तो वह घबरा कर पलंग से उठ कर खड़ी हो गई. जब पति ने उसे हाथ पकड़ कर बैठाने की कोशिश की तो वह चीख मार कर बेहोश हो गई. चीख सुन कर घरभर इकट्ठा हो गया. मेहमान स्त्रियां दबे स्वरों में टिप्पणियां कर रही थीं पर सास ने सब को समझा कर वहां से हटा दिया कि बहू को किसी कीड़े ने काट लिया है. पति को बुला कर भनभनाते बेटे को अपने साथ ले जाने को कह कर उसे पुचकारते हुए अपने साथ लिटा लिया. वह रोती हुई बारबार कहे जा रही थी कि मुझे यहां नहीं रहना. उस के बाद 3-4 दिन वह ससुराल में रही, सास अपने ही साथ सुलाती रही. पति अत्यंत क्रोध में थे. बहुत समझाने पर ही उन्होंने उस के साथ सब नेगवेग पूरे किए.

गौने की बात चलने पर उस की बीमारी का पता चला तो सासूमां बिरादरी में चलने वाली कानाफूसियों की परवा न करते हुए स्वयं ही उस के मायके आ पहुंचीं. उन की अनुभवी नजरों ने देख लिया कि अंगूरी की अपनी और चचेरी बहनें बहुत छोटी हैं और उस की सभी सहेलियां भी अभी अविवाहित हैं, सो वे अंगूरी की परेशानी समझ गईं. कुछकुछ अंदाजा तो उन्हें बेटे की शिकायत से ही हो गया था. उन्होंने उसे कोई उपदेश नहीं दिया, सिर्फ इतना कहा कि अब जब तुम्हारी शादी हो चुकी है तो यदि तुम ससुराल नहीं गईं तो तुम्हारे मातापिता की बदनामी होगी. छोटे भाईबहनों, खासकर बहनों की शादी में भी मुश्किलें आएंगी. तुम अपने मातापिता के दुख का कारण तो नहीं बनना चाहोगी न, जिन्होंने तुम्हें इतने लाड़प्यार से पाला है. हां, तुम्हें मेरे बेटे से संबंध रखने की जरूरत नहीं, तुम मेरे ही साथ रहोगी और अपनी छोटी ननद के साथ सोओगी. यहां वे हमेशा सब से उस की तारीफ करतीं और हर बात में उस का परामर्श लेने व आगे रखने की कोशिश करतीं. फिर पता नहीं कैसे एक ही घर में रहते, कब उस के पति का क्रोध और स्वयं उस का उन के प्रति डर गायब हो गया. अब तो दुनिया देख ही रही है. उसे किसी से किसी बात की शिकायत नहीं है. कभीकभी सोचती है कि उस की सास के स्थान पर कोई और सास होती तो क्या हुआ होता. हठात, उस की नजरें माला चढ़ी सास की तसवीर की ओर उठ गईं. उस की नजरों में अथाह श्रद्धा थी. मेरी नजर भी उधर ही उठ गई. उस नारी को मैं ने जीवन में बस एक बार ही देखा था. उस साधारण गृहस्थ निरक्षर नारी ने मनोविज्ञान और मैरिज काउंसलिंग जैसे शब्द कभी सुने भी न होंगे. पर नारी मन की उन छोटीमोटी उलझनों को खूब समझती थी जिन के चलते कई जीवन बरबाद हो जाते हैं.

भारतीय छात्रों के लिए सुरक्षित नहीं रहा अमेरिका

दुनिया की सुपर पावर कहलाने वाला और सब से सुरक्षित देश माना जाने वाला अमेरिका भारतीय छात्रों के लिए बहुत ही असुरक्षित देश बन गया है. पिछले कई महीनों में अमेरिका के अलगअलग क्षेत्रों में छात्रों पर हमले की घटनाएं बढ़ गई हैं. एक के बाद एक भारतीय छात्रों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौतें हो रही हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका में एक महीने पहले लापता हुआ 25 वर्षीय भारतीय छात्र मोहम्मद अब्दुल अरफात 9 अप्रैल को अमेरिकी शहर ओहियो में मृत पाया गया है.

मोहम्मद अब्दुल अरफात की मौत अमेरिका में भारतीय या भारतीय मूल के छात्रों से जुड़ी घटनाओं की श्रृंखला में नवीनतम है. वह 2024 में अमेरिका में मरने वाले 11वें भारतीय छात्र हैं. इस से पहले 5 अप्रैल को भारतीय वाणिज्य दूतावास ने ओहियो के क्लीवलैंड में उमा सत्य साई गद्दे की मृत्यु की सूचना दी थी. 18 मार्च को बोस्टन में एक भारतीय छात्र अभिजीत पारुचुरू की भी संदिग्ध परिस्थितियों में निधन की सूचना आई थी.

अब 9 अप्रैल को मोहम्मद अब्दुल अरफात का शव मिलने से उन परिवारों में दहशत और चिंता का माहौल है जिन के बच्चे उच्च शिक्षा के लिए विदेशी विश्वविद्यालओं में पढ़ रहे हैं. मोहम्मद अब्दुल अरफात हैदराबाद का रहने वाला था और 2023 में उस ने उच्च शिक्षा के लिए क्लीवलैंड यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया था. मोहम्मद अब्दुल अरफात पिछले महीने अचानक लापता हो गया था. उस के पिता मोहम्मद सलीम कहते हैं कि उन की अरफात से आखिरी बार 7 मार्च को बात हुई थी और उस के बाद उन का सेलफोन बंद हो गया था. उन्होंने उस से कांटेक्ट करने की काफी कोशिश की मगर कामयाब नहीं हुए. अधिकारियों से भी मिले और दूतावास से भी सहायता मांगी, मगर अरफात की कोई खबर उन्हें नहीं मिली.

अचानक 19 मार्च को, सलीम को एक अज्ञात व्यक्ति का फोन आया, जिस ने कहा कि अमेरिका में ड्रग्स बेचने वाले एक गिरोह ने अरफात का अपहरण कर लिया है और फिर उस ने 1,200 अमेरिकी डौलर की मांग की. कौल करने वाले ने भुगतान के तरीके का उल्लेख नहीं किया. सलीम कहते हैं कि जब उन्होंने फोन करने वाले से कहा कि उन को बेटे से बात करने दो, तो उस ने इनकार कर दिया. 21 मार्च को भारत के महावाणिज्य दूतावास ने कहा कि वह अरफात को जल्द से जल्द ढूंढने के लिए अमेरिकी अधिकारियों के संपर्क में है. मगर 9 अप्रैल को मोहम्मद अब्दुल अरफात को ओहियो के क्लीवलैंड में मृत पाया गया.

अरफात की मौत की पुष्टि न्यूयौर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास ने कर दी है. न्यूयौर्क स्थित महावाणिज्य दूतावास ने ट्वीट किया है, “यह जानकर दुख हुआ कि मोहम्मद अब्दुल अरफात, जिन के लिए एक खोज अभियान चल रहा था, क्लीवलैंड, ओहियो में मृत पाए गए.”

वाणिज्य दूतावास ने कहा है कि वह क्लीवलैंड विश्वविद्यालय के छात्र की मौत की गहन जांच सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका में स्थानीय एजेंसियों के संपर्क में हैं. इस के साथ ही उन्होंने अरफात के पार्थिव शरीर को भारत लाने और शोक संतप्त परिवार को हर संभव सहायता देने की बात कही है.

एक के बाद एक हो रही मौतों ने अमेरिका में भारतीय छात्रों और भारत में उन के परिवारों को चिंतित कर दिया है. अरफात से पहले 25 वर्षीय एक छात्र विवेक सैनी की एक बेघर नशेड़ी ने पीटपीट कर हत्या कर दी थी और 27 वर्षीय वेंकटरमण पित्तला की जलयान दुर्घटना में मौत हो गई थी. कई अन्य छात्रों की मौत के कारणों की अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है. 2024 में अब तक 6 भारतीय छात्रों पर घातक हमले हो चुके हैं. इन 6 भारतीय छात्रों में से 5 छात्रों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है.

तो ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि अमेरिका जैसा देश भारतीय छात्रों के लिए अब सुरक्षित नहीं है. गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से भारत पर यह आरोप लग रहा है कि यहां के वांछित अपराधी जो अन्य देशों में छुपे बैठे हैं या वहां की नागरिकता ले कर आराम से रह रहे हैं और भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं, उन को रौ के अधिकारियों द्वारा दूसरे देशों में जा कर खत्म किया जा रहा है. कहीं भारतीय छात्रों की मौतों की कड़ी इस से तो नहीं जुड़ी है?

अमेरिका में नस्लवादी सोच, रंगभेद जैसी बुराइयां भी चरम पर हैं. गोरों और कालों के बीच आएदिन शूटआउट, स्टूडैंट्स द्वारा क्लासरूम में घुस कर दनादन गोलियां चला देने की घटनाएं वहां आम हैं. ऐसे गुंडा तत्वों के लिए भारतीय छात्र बहुत कोमल शिकार हैं. काले अमरीकियों के झुंड वहां अकसर लूटपाट और मारपीट पर उतारू रहते हैं. इन पर पुलिस का कोई कंट्रोल नहीं है.

4 फरवरी को शिकागो में एक भारतीय छात्र पर 3 काले हमलावरों ने रात में उस वक्त हमला किया जब वह खाना ले कर अपने घर जा रहे थे. इस हमले का एक सीसीटीवी फुटेज सामने आया है. इस में छात्र सैयद मजाहिर अली खाने का पैकेट ले कर पैदल ही घर की तरफ जाते दिख रहे हैं. रात का एक बजे का वक्त है. अचानक उन के पीछे 3 युवक उभरते हैं. ये तीनों पहले से ही एक कार के पीछे छिप कर अपने शिकार की तलाश में थे. इन तीनों ने मुंह पर रुमाल बांध रखे थे और हुड वाली जैकेट पहन रखी थी. जैसे ही ये तीनों मजाहिर की तरफ बढ़े मजाहिर खतरा भांप पर घर की ओर दौड़े. मगर कुछ ही क्षण में वे बदमाशों की गिरफ्त में आ गए. इन बदमाशों ने मजाहिर के साथ जम कर मारपीट की. उन के सर पर घातक वार किए. मजाहिर बुरी तरह घायल हो गए और जमीन पर गिर कर छटपटाने लगे. हमलावर उन की चीजें छीन कर निकल भागे.

अमरीकी पुलिस के मुताबिक यह लूटपाट के मकसद से किया गया हमला था. मजाहिर से उन का मोबाइल फोन भी छीन लिया गया. मजाहिर को घायल कर के और लूट कर तीनों उस काले रंग की सेडान कार से भागे जिसे उन्होंने पहले से स्टार्ट करके रखा था.

सैयद मजाहिर अली हैदराबाद के रहने वाले हैं. वो शिकागो की इंडियाना वेस्ट लाइन यूनिवर्सिटी से इनफार्मेशन एंड टैक्नोलौजी में मास्टर्स कर रहे हैं. इस हमले के बाद मजाहिर के परिवार वाले काफी परेशान हैं. उन की पत्नी रुकिया फातिमा ने भारतीय विदेश मंत्रालय से मजाहिर तक मैडिकल हेल्प पहुंचाने की अपील की है. इस हमले में मजाहिर का काफी खून बह गया था. उन के सिर, घुटने और पसलियों में गहरी चोटें आयई हैं. उन की पत्नी रुकिया फातिमा ने विदेश मंत्रालय से शिकागो जाने के लिए स्पेशल वीजा लगाने की मांग की है क्योंकि मजाहिर की देखभाल करने वाला वहां कोई भी नहीं है. सैयद मजाहिर अली किस्मत वाले थे कि इस हमले में उन की जान बच गई.

1 फरवरी को अमेरिका के ओहायो में भारतीय छात्र श्रेयश रेड्डी का शव मिला था. पुलिस की जांच अभी भी जारी है. रेड्डी की मौत हत्या है या कुछ और इस को ले कर अभी तक अमेरिकी पुलिस ने कोई जानकारी नहीं दी है. श्रेयश रेड्डी बेनिगेरी लिंडनर स्कूल औफ बिजनेस, सिनसिनाटी के छात्र थे. इस से कुछ दिन पहले भारतीय छात्र नील आचार्य की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की खबर आई थी. इस मामले में भी पुलिस कुछ खास नहीं बता पाई.

नील आचार्य PURDUE UNIVERSITY में पढ़ते थे. 28 जनवरी को वे अचानक लापता हो गए. लेकिन कुछ दिन बाद पुलिस को उन का शव बरामद हुआ. इसी तरह से एमबीए छात्र विवेक सैनी की जौर्जिया में हत्या हुई. उन पर नशे में धुत्त एक व्यक्ति ने हथोड़े से हमला किया था. हालांकि इस हमलावर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था.

अकुल बी. धवन UNIVERSITY OF ILLINOIS में पढ़ रहे थे. अकुल 20 जनवरी को लापता हो गए और इस के 10 घंटे बाद उन का शव उन के कैम्पस से कुछ ही दूरी पर मिला. इन सभी छात्रों की मौतों को ले कर पुलिस कुछ नहीं कर पा रही है. अमेरिका जैसे देश की पुलिस से यह उम्मीद नहीं है कि वह भारतीय छात्रों की संदिग्ध हालात में हुई मौतों पर चुप्पी साध ले या जांच पूरी न कर पाए. क्या अमेरिका अपने किसी नागरिक की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतों पर शांत बैठता है?

उल्लेखनीय है कि हालफिलहाल में भारत के 15 लाख छात्र दुनिया के अलगअलग देशों में पढ़ाई करने के लिए गए हैं. विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा लोकसभा में दिए गए एक जवाब में बताया गया कि वर्ष 2018 से 2 फरवरी 2024 तक 403 भारतीय छात्रों की अलगअलग देशों में संदिग्ध मौतें हुई हैं.

भारतीय छात्रों की मौतों के कई कारण भी उन्होंने बताए. जिस में प्राकृतिक कारण, बीमारियां और हमले शामिल हैं. विदेशों में मारे गए 403 भारतीय छात्रों में से सब से ज्यादा करीब 91 की मौत कनाडा में हुई है. बीते 6 सालों में 48 छात्रों की मौत ब्रिटेन में और 36 छात्रों की मौत अमेरिका में हुई है. अमेरिका में यह संख्या लगातार बढ़ रही है.

अमेरिका एक ऐसा देश है जो उच्चस्तरीय शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालयों के लिए मशहूर है. उच्च शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों के लिए अमेरिका पहली पसंद है. बावजूद इस के अमेरिका में विदेशी छात्रों की सुरक्षा एक गंभीर चिंता का विषय होता जा रहा है, जिस पर बाइडेन सरकार का कोई ध्यान नहीं है. जहां तक अमेरिका जाने वाले विदेशी छात्रों की बात है तो वर्ष 2022 – 2023 में 10 लाख 57 हजार 188 विदेशी छात्रों ने उच्च शिक्षा के लिए अमेरिकी विश्वविद्यालयों को चुना.

इस में से 2 लाख 68 हज़ार 923 भारतीय छात्र हैं. अमेरिका में उच्च शिक्षा पाने के लिए चीन के बाद सब से ज्यादा संख्या भारतीय छात्रों की है. अधिकांश भारतीय छात्र इस उम्मीद से उच्च शिक्षा में वहां दाखिला लेते हैं कि उस के बाद उन्हें वहीं नौकरी मिल जाएगी और वे वहीं सेटल हो जाएंगे. अधिकतर भारतीय छात्र जो अमेरिका में पढ़ रहे हैं उन की इच्छा वापस भारत लौटने की नहीं होती है. इस के विपरीत चीनी छात्र अमेरिका में शिक्षा प्राप्त कर अपने देश वापस लौटते हैं और अपने ज्ञान से अपने देश को विकास की गति देते हैं.

ग्लोबल एजुकेशन कान्क्लेव के मुताबिक वर्ष 2022 में भारत से बाहर जा कर पढ़ाई करने वाले छात्रों ने लगभग 4 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जबकि 2025 तक यह खर्च 50 प्रतिशत तक बढ़ कर लगभग 6 लाख करोड़ रुपए तक हो जाएगा. यानी उच्च शिक्षा के मामले में विदेश जा कर पढ़ना भारतीय छात्रों को पसंद है. अब तो मध्यम वर्गीय परिवार भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजना चाहते हैं. लेकिन अमेरिका, कनाडा या यूके जैसे देशों से जब भारतीय छात्रों की हत्या या संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की खबरें आती हैं तो एक डर जरूर हावी हो जाता है, बावजूद इस के अमेरिका जाने का लोभ भारतीय छात्रों को खींचता है.

विदेश जा कर पढ़ाई करने के मामले में भारतीय छात्रों की पसंदीदा लिस्ट में अमेरिका, ब्रिटेन. कनाडा और आस्ट्रेलिया शामिल हैं. इन देशों की आधिकारिक भाषा अंगरेजी है. इसीलिए यह देश भारतीयों की पसंद हैं. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में जर्मनी, फ्रांस, रूस, यूक्रेन, सिंगापुर भी भारतीय छात्रों को भाया है. मगर रूस यूक्रेन युद्ध के बाद लगभग सभी भारतीय छात्र भारत वापस लौट चुके हैं.

चुनाव में जनता उदासीन, सरकारी निक्कमापन जिम्मेदार

2024 का लोकसभा चुनाव अप्रैल से ले कर जून माह तक चलेगा. इन चुनावों की घोषणा 16 मार्च को मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने की. इस समय उन के साथ दो नए आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सुखवीर सिंह संधु भी मौजूद थे. यह दोनों चुनाव आयुक्त अरूण गोयल के इस्तीफा देने और अनूप चन्द्र पांडेय के रिटायर होने के बाद नियुक्त किए गए थे. इस की अधिसूचना भी मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के हस्ताक्षर से जारी हुई. भारत निर्वाचन आयोग की अधिसूचना संख्या 464/आईएनएसटी/ईपीएस/2024 के तहत 16 मार्च से लगी अधिसूचना 4 जून को मतगणना के बाद खत्म होगी.

मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने बताया कि यह चुनाव 7 चरणों में होंगे. चुनाव की प्रक्रिया 81 दिन में पूरी होगी. पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल और अंतिम चरण का 1 जून को होगा. वर्ष 1951-52 के बाद यह सब से लंबे समय तक चलने वाला चुनावी कार्यक्रम है. उस समय पूरी चुनावी प्रक्रिया 4 महीने तक चली थी. 2019 का लोकसभा चुनाव 73 दिनों में सम्पन्न हुआ था.

वैसे पहले चुनाव से इस चुनाव की तुलना किसी भी तरह से जायज नहीं है. उस समय देश आजाद हुआ था. देश का हर ढांचा नया बन रहा था. चुनाव के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. आज देश हर तरह से सम्पन्न है. तमाम चुनाव हो चुके हैं. ऐसे में कुछ नया नहीं है. अच्छी सड़कें, आवागमन के अच्छे साधन, शासन प्रशासन का अनुभव है. ईवीएम के होने से सुविधाएं हैं. ऐसे में चुनाव के इतना लंबा होने का कोई मतलब नहीं है.

2019 के लोकसभा चुनाव में 67.4 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले थे. 2014 में 66.44 फीसदी मतदान हुआ था. 2009 में यह केवल 58.21 फीसदी ही था. पिछले 2 चुनाव में मतदान बढ़ा था. इस चुनाव में मतदाता उदासीन सा दिख रहा है. जिस से मतदान को बढ़ाना सरल काम नहीं होगा. इस बार 5 करोड़ मतदाता बढ़े हैं. इन की वजह से भले ही मतदान बढ़ जाए. इस बार महिला मतदाताओं की संख्या 47.1 करोड़ या 48.61 फीसदी है. इस बार मतदाताओं के लिए 10,48,202 पोलिंग बूथ बनाए जाएंगे. यह संख्या भी पिछले चुनाव के मुकाबले 1.19 फीसदी अधिक है. इस चुनाव में वोट डालने के लिए 50.5 लाख ईवीएम का इस्तेमाल किया जाएगा.

लंबे चुनावी कार्यक्रम से मिलेगा भाजपा को लाभ

चुनाव में पैसा और प्रबंधन सब से खास होता है. इस वजह से लंबे चुनावी कार्यक्रम से सत्ता पक्ष को लाभ होता है. विपक्ष जल्दी थक और बिखर जाता है. जिस का प्रचार पर असर पड़ता है. लंबे चुनाव कार्यक्रम से मौजूदा सरकार को सत्ता बरकरार रखने में फायदा होता है. नरेंद्र मोदी के आने के बाद चुनाव दर चुनाव यह कार्यक्रम लंबा होता गया है. लंबा चुनाव कार्यक्रम सत्ता बनाए रखने में मददगार होता है.

पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 और 21 फरवरी, 1952 के बीच 4 महीने तक चला. वह एक अपवाद था. 1957 में आम चुनाव 24 फरवरी से 9 जून के बीच हुए. 1962 का चुनाव में 19 से 25 फरवरी के बीच हुआ जो केवल 7 दिनों तक चला.

1967 में 17 से 21 फरवरी के बीच हुए चौथा आम चुनाव केवल 5 दिन में खत्म हो गया. 1971 में चुनाव 1 से 10 मार्च तक 10 दिन में हो गए. 1977 में 16 से 20 मार्च के बीच 5 दिनों तक चले. 1980 में 3 से 6 जनवरी के बीच 7वें आम चुनाव केवल 4 दिन तक चले. 1984 आठवां आम चुनाव 5 दिनों तक चले.

1989 में 22 से 26 नवंबर के बीच हुए आम चुनाव 15 दिन चले. 1991 में 20 मई से 15 जून के बीच हुए दसवें आम चुनाव 27 दिनों तक चले. 1996 में 27 अप्रैल से 7 मई के बीच हुए ग्यारहवें आम चुनाव 11 दिनों तक चले.

1998 में 16 से 28 फरवरी के बीच आयोजित बारहवें आम चुनाव 12 दिनों तक चले. 5 सितंबर से 3 अक्टूबर 1999 के बीच हुए तेरहवें आम चुनाव 29 दिनों तक चले. 2004 के चौदहवें आम चुनाव 21 दिन तक चले. 2009 के चुनाव 28 दिन तक चले. 2014 में आम चुनाव 36 दिन और 2019 के चुनाव 39 दिनों तक चले.

कब से शुरू हुई चुनाव आचार संहिता

आदर्श आचार संहिता की शुरुआत 1960 के केरल विधानसभा चुनाव से हुई. इस को राजनीतिक दलों से बातचीत और सहमति के बाद तैयार किया गया. इस में पार्टियों और उम्मीदवारों ने तय किया कि वो किनकिन नियमों का पालन करेंगे. 1962 के आम चुनाव के बाद 1967 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी आचार संहिता का पालन हुआ. बाद में उस में और नियम जुड़ते चले गए. चुनाव आयोग ने सितंबर 1979 में राजनीतिक दलों की बैठक बुला कर आचार संहिता में संशोधन किया. इसे अक्तूबर 1979 में हुए आम चुनाव में लागू किया गया.

साल 1991 का आम चुनाव आचार संहिता के विकास में सब से अहम था. इस में आचार संहिता का विस्तार किया गया. चुनाव आयोग भी इस के पालन के लिए सक्रिय हुआ. उसी साल यह विचार आया कि आचार संहिता उसी दिन से लागू हो जिस दिन तारीखों की घोषणा हो. लेकिन केंद्र सरकार इसे उस दिन से लागू करना चाहती थी जिस दिन अधिसूचना जारी हो. हाई कोर्ट ने मई 1997 में चुनाव की तारीखों की घोषणा से आचार संहिता लागू करने के चुनाव आयोग के कदम को सही ठहराया.

16 अप्रैल 2001 को हुई चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की बैठक में सहमति बनी कि आचार संहिता उसी दिन से लागू होगी जिस दिन चुनाव का कार्यक्रम जारी होगा. इस में यह शर्त भी जोड़ी गई कि चुनाव की तारीखों की घोषणा अधिसूचना जारी होने से 3 हफ्ते से ज्यादा पहले नहीं की जाएगी. नौवें चुनाव आयुक्त टीएन शेशन ने चुनाव आयोग की शक्तियों का एहसास दिलाया. उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग सरकार के अधीन काम करने वाला निकाय नहीं है. उन्होंने आयोग की स्वतंत्रता को सर्वोपरी रखा. इस के लिए वो प्रधानमंत्री के साथ भिड़ने से भी नहीं हिचकिचाए.

चुनाव आचार संहिता से प्रभावित होता है जनजीवन

वैसे तो चुनाव आचार संहिता नेताओं के लिए होती है, लेकिन इस से आम जन जीवन प्रभावित होता है. उत्तर प्रदेश में 13 लाख 29 हजार 584 लाइसेंसधारी है. इस का मतलब यह है कि चुनाव के दौरान यह असलहे थाने में जमा करने पड़ते हैं. यह एक परेशानी भरा काम होता है. लंबे समय तक अपने हथियार थाने में जमा रखने से सुरक्षा का खतरा रहता है. इस के खिलाफ रविशंकर तिवारी और अन्य 4 लोगों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट संख्या (सी) संख्या 2844/2024 दायर की. इस में कोर्ट ने कहा कि सभी को अपने हथियार जमा करने की जरूरत नहीं है. जिन हथियार धारकों से चुनाव में शांति व्यवस्था को खतरा है उन के हथियार ही जमा कराए जाएं.

22 मार्च को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के आदेश के बाद पुलिस ने दागियों की सूची तैयार की है. इन को अपने असलहे 7 दिन के भीतर जमा करवाने होंगे. हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि प्रदेश में लाइसेंसी हथियार रखने वाले सभी लोगों को असलहे नहीं जमा करवाने होंगे.

कोर्ट ने कहा था कि जिस किसी से भी कानून व्यवस्था खराब होने का खतरा होगा उस के लिए स्क्रीनिंग कमेटी बना कर और संबंधित को कारण बता कर असलहा जमा कराने को कहा जा सकता है. अब पुलिस इस काम को कर रही है. जिस से जनता को परेशानी हो रही है.

चुनाव आचार संहिता के दौरान 50 हजार से अधिक का नकद पैसा ले कर चलना मुसीबत को मोल लेने वाला होता है. इस का पूरा हिसाब न दे पाने पर इस को जब्त किया जा सकता है. पुलिस को गाड़ी चेक करने का अधिकार मिल जाता है. इस दौरान पुलिस चुनाव आयोग के आदेश से काम कर सकती है. अगर कोई दोस्त या रिश्तेदार चुनाव लड़ रहा है तो उस के अपने निजी कार्यक्रम में बुलाने से पहले चुनाव आयोग की अनुमति लेनी पड़ती है. इस में यह घोषणा पत्र देना पड़ता है कि चुनाव से संबंधित कोई बात नहीं होगी.

सरकार का निक्कमापन

पहले चुनाव कम समय तक चलते थे तो दिक्कतें कम होती थीं. अब 16 मार्च से 4 जून तक 81 दिन यानि करीब करीब 3 माह का समय चुनाव आचार संहिता में बीतना है. ऐसे में जनता उदासीन हो रही है. जैसेजैसे विज्ञान और टैक्नलौजी का प्रयोग बढ़ रहा है वैसेवैसे चुनाव में समय कम लगना चाहिए. लेकिन भारत में इस का उल्टा हो रहा है. 2014 के बाद से हर चुनाव समय बढ़ता जा रहा है. सरकार का कहना है कि सुरक्षा कारणों से यह समय अधिक लग रहा है.

जनता के चुनाव में पुलिस का काम होना ही नहीं चाहिए. पुलिस एक बहाना है. लंबे चुनाव कार्यक्रम का एक बड़ा कारण यह है कि अब पार्टियों में असरदार नेता कम है. चुनाव प्रचार में उन की प्रमुख भूमिका होती है. नेताओं ने पार्टी तंत्र इसलिए विकसित कर लिया है कि उन का ही प्रभाव रहे दूसरे नेता की पूछ कम हो. लंबे चुनाव प्रचार में वह हर प्रदेश में जा पाएगा.

जो मतदान 1 जून को है उस की मतगणना भी 4 जून को होगी और 19 अप्रैल वाले चुनाव की मतगणना भी 4 जून को होगी. इस से यह साफ है कि चुनाव कम समय में कराए जा सकते हैं. सरकार अपने निक्कमेपन को छिपाने के लिए चुनाव कार्यक्रम को लंबे समय तक कराने के पक्ष में रहती है.
इस चुनाव में गर्मी भी उदासीनता का बड़ा कारण है. आम जनता को यह लग रहा है कि वह वोट किसी को दे सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. अभी चुनाव का पहला चरण भी दूर है चुनावी उदासीनता हावी है. चुनावी बातें केवल मीडिया और नेताओं तक सीमित रह जा रही हैं.

धरी रह गई रामदेव की बाबागीरी, पतंजलि के झूठे दावों वाले विज्ञापन की खुली पोल

पिछले 8 – 10 सालों में भगवान टाइप बनने वाले जो आदमी पैदा हुए हैं रामदेव उन में से एक हैं. योग और आयुर्वेद की आड़ में रामदेव ने देखते ही देखते अरबोंखरबों का साम्राज्य खड़ा कर लिया और साबित कर दिया कि इस देश के लोग घोषित तौर पर मूर्ख हैं जो चमत्कारों के नाम पर तबियत से पैसा लुटाते हैं. लेकिन किस्सा यहीं खत्म नहीं होता बल्कि शुरू होता है कि साल 2010 के बाद जब एकाएक ही हिंदुत्व की आंधी चली और 2014 में राजनीति, कौर्पोरेट और धर्म के घालमेल से एक ऐसे गिरोह का जन्म हुआ, जिस ने राष्ट्रवाद के नाम पर नाना प्रकार के पाखंडों को जम कर भुनाया. सिलसिला अभी भी चालू है सुप्रीम कोर्ट ने तो उस के एक हिस्से पर अपना सख्त रवैया भर दिखाया है जो बेहद जरुरी भी हो चला था.

 

बेहिचक कहा जा सकता है कि पापों का घड़ा भरने वाला मुहावरा यूं ही नहीं गढ़ दिया गया है. पतंजलि के अघोषित मालिक रामदेव अब घुटनों के बल आ गए हैं और जैसे भी हो इस लोकतांत्रिक झंझट से मुक्ति चाहते हैं. लेकिन यह कोई धार्मिक मोक्ष नहीं है जो गंगा में डुबकी लगाने या ब्राह्मण को दान देने से मिल जाएगा. यह एक ठग और अपराधी के प्रति देश की सब से बड़ी अदालत का कानूनी शिकंजा है जिस का मकसद करोड़ों लोगों को भ्रम और चमत्कारों के नाम पर की जा रही ठगी और चार सौ बीसी से बचाना है, नहीं तो केंद्र और भाजपा शासित राज्य सरकारें तो जितना मुमकिन हो सकता था उस से भी ज्यादा रामदेव को सर चढ़ा चुके हैं. जायजनाजायज सहूलियतें और बेशकीमती जमीनें उसे और पतंजलि को कौड़ियों के भाव दान कर चुकी हैं जिस के एवज में रामदेव उन के सनातनी एजेंडे का प्रचार किया करता है.

इस डील और ठगी का खुलासा करने में दिल्ली प्रैस पत्रिकाएं कभी चूकी नहीं हैं. जिन्होंने कभी पतंजलि के भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित नहीं किए. इस से रामदेव व्यथित भी रहा और दुखी भी और आक्रोशित भी कि देश में ऐसा भी कोई प्रकाशन संस्थान है जो पत्रकारिता और लेखन के प्रति इतना प्रतिबद्ध और समर्पित है कि अपने सिद्धांतों यानी पाठकों के हित से कोई समझौता न करते करोड़ों के इश्तिहार ठुकरा सकता है. और अगर वह ऐसा कर रहा है तो जाहिर है ठगी की पोल खोलता रहेगा. यह बात रामदेव और उस के समर्थकों को इतनी नागवार गुजरी थी कि अब से कोई 12 साल पहले उन्होंने कहा था कि तुम तो सरिता वाले हो हमारे खिलाफ छापोगे ही.

रामदेव के कुछ समर्थक सरिता के दफ्तर के बाहर ई – 3 झंडेवालान रानी झांसी मार्ग नई दिल्ली -55 के बाहर इकठ्ठे हो कर हायहाय के नारे लगाते भी नजर आए थे. तब बात आईगई हो गई थी लेकिन सरिता अपने मिशन पर काम करती रही और समयसमय पर योग और आयुर्वेद का भांडा फोड़ तर्कों और तथ्यों के आधार पर करती रही. लेकिन उस का कोई पूर्वाग्रह किसी बाबा विशेष के प्रति न तब था न आज है, जब रामदेव अपने गुरुर और भगवान हो जाने की खुशफहमी को कानून के सामने तारतार होते देखने मंजबूर हो चले हैं. वे माफी भी मांग रहे हैं तो एक ठसक और अकड़ के साथ, मानो ऐसा कर अदालत और देश पर कोई एहसान कर रहे हों.

चोरी भी और सीनाजोरी वाली बात जब सुप्रीम कोर्ट को अखरी तो सबकुछ लगभग शीशे की तरह सामने है हालांकि अभी भी बहुत कुछ भगवा परदे के पीछे छिपा भी है जिस के बारे में अंदाजा हर किसी को है. आइए देखते हैं कि आखिर माजरा है क्या.

विवाद है क्या

हालिया फसाद की स्क्रिप्ट जुलाई 2022 में लिखी गई थी जब पतंजलि ने अखबारों में एक इश्तिहार जारी किया था जिस का शीर्षक था – एलोपैथी द्वारा फैलाई गई गलतफहमियां. इस विज्ञापन में एलोपैथी को कई बीमारियों को ठीक करने में नाकाम बताया गया था. मसलन थाइराइड, अस्थमा, लीवर और आंख कान से जुड़ी बीमारियां. रामदेव ने तब यह दावा किया था कि इन बीमारियों को पतंजलि की दवाइयों और योग के जरिए पूरी तरह ठीक किया जा सकता है.

इस के पहले कोविड-19 के दौरान भी 14 जून 2020 को बाबा ने विज्ञापनों के जरिए यह प्रचार किया था कि कोरोना वायरस को उन की कंपनी पतंजलि द्वारा इजाद दवाइयों कोरोनिल और स्वसारी से ठीक और दूर किया जा सकता है. रामदेव ने एक भगवा झूठ तब यह भी बोला था कि उन की उक्त दवाइयों को विश्व स्वास्थ संगठन यानी डब्लूएचओ से मान्यता मिल चुकी है. जब इन दवाइयों को लौंच किया गया था तब मंच पर तत्कालीन स्वास्थ मंत्री डा. हर्षवर्धन सहित दूसरे दिग्गज मंत्री नितिन गडकरी भी मौजूद थे और तालियां पीट रहे थे

यह वह दौर था जब लोग कोरोना की दहशत में थे और जान बचाने के लिए कोई भी कीमत अदा करने तैयार थे. दुनियाभर के वैज्ञानिक और डाक्टर दिनरात एक कर रिसर्च कर रहे थे लेकिन रामदेव रातोंरात एक दुर्लभ खोज कर लाया. तब उस ने यह भी कहा था कि कोरोनिल कोरोना के रोगियों पर दुनिया भर में पहला सफल क्लिनिकल ट्रायल है. इस झुठैले ने तुरंत ही यह भी कहा था कि हमारे पूर्वज ऋषिमुनियों के ज्ञान से यह दवा बनाई गई है.

ऐसा इसलिए कहा था कि उन की दवाइयों पर मच रहा होहल्ला शांत हो, अंधविश्वास फैले और फलेफूले तभी तो लोग अपनी जेब ढीली करेंगे और इस की भरेंगे और यह दिव्य कोरोनिल नाम का जादू बिना किसी अड़ंगे के बिकता रहे जो कि बिका भी.

इस इकलौती दवा से पतंजलि ने कोई 900 करोड़ रुपए का कारोबार किया था. उस दौर में तो कोरोना भगाने वाले लौकेट भी 20-20 रुपए में बिक रहे थे और लोग उन्हें गले में लटकाए यूं घूम रहे थे जैसे रामसे ब्रदर्स की भुतहा फिल्मों में हीरोहीरोइन इसा मसीह वाला क्रास और शंकर का त्रिशूल पहन कर भूत प्रेत और आत्माओं से बचते दिखाई देते थे.

लेकिन यहां रामदेव की मंशा तगड़ा मुनाफा काटने की थी सो उस ने एलोपैथी की सरेआम बुराई और आलोचना शुरू कर दी. वह एलोपैथी डाक्टरों का, दवाइयों का, अस्पतालों और चिकित्सा पद्धति का सरेआम मजाक बनाता रहा और दक्षिणापंथी सरकार यह तमाशा देखते रहने की गलती के साथ उसे शह देने का गुनाह भी करती रही. बात सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का सरीखी थी भी.

लेकिन आईएमए यानी इंडियन मैडिकल एशोसियेशन नहीं डरा. उस ने अगस्त 2022 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और पतंजलि के खिलाफ एक याचका दायर कर दी. आईएमए ने अपनी याचिका में कहा कि पतंजलि के दावे औषधि एवं जादुई उपचार अधिनियम 1954 और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 का उल्लंघन करते हैं.

चोरी ऊपर से सीना जोरी

अदालत ने नवम्बर 2023 में पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों पर अस्थायी रोक लगाने का आदेश जारी किया जिस पर पतंजलि ने सहमति जताई थी लेकिन चंद दिनों बाद ही ये विज्ञापन फिर शुरू हो गए. कैसे रामदेव सरेआम अदालत के आदेशों की धज्जियां उड़ा रहा था यह बात तब भी साबित हुई थी जब उसे कोर्ट ने मीडिया में बयानबाजी करने से मना किया था लेकिन इस आदेश के दूसरे ही दिन प्रैस कांफ्रेसों के शौकीन रामदेव ने एक और प्रैस कांफ्रेंस कर डाली.

भ्रमित करने वाले और झूठे विज्ञापनों पर भी रामदेव के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 188, 269, और 504 के तहत मामला दर्ज हुआ था. बीमारियों के इलाज के लिए भ्रमित करने वाले विज्ञापनों को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि के मैनेजर को 27 फरवरी 2024 को अवमानना नोटिस भेजते जवाव मांगा था लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. फिर 21 नवम्बर की सुनवाई के दौरान पतंजलि आयुर्वेद के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त किया कि हम यानी उस के मुवक्किल भविष्य में ऐसा कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं करेंगे. यह आश्वासन भी वकील ने दिया था कि मीडिया में कोई बयान नहीं दिया जाएगा. अदालत ने यह आश्वासन अपने आदेश में दर्ज किए हैं.

बात यहीं खत्म नहीं हुई. 21 नवम्बर को ही जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने पतंजलि के एमडी आचार्य रामकृष्ण को नोटिस का जवाब न देने पर एतराज जताया. सख्त रवैया अपनाते पीठ ने वही किया जो इन अड़ियल लोगों के साथ किया जाना जरुरी हो गया था.

हलके में लेने की भूल

सुप्रीम कोर्ट ने रामदेव को भी नोटिस जारी कर अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की बात कही. इस पर देशभर के जागरूक वकील और कानून से जुड़े लोगों को यह समझ आ गया कि अब रामदेव वाकई में फसने वाले हैं, जो अब तक कोर्ट को बहुत हल्के में लेते उसे गांव में पीपल के पेड़ के नीचे लगने वली पंचायत के तौर पर देखने और समझने से ज्यादा अहमियत नहीं दे रहे थे.

जाहिर है दौलत और शोहरत के नशे में चूर रामदेव एंड ठग कम्पनी को लग यह रहा था कि कुछ नहीं होने जाने वाला. देश भर की अदालतों में ऐसे करोड़ों मुकदमे घिसट रहे हैं जो वादी प्रतिवादी के गैर हाजिर रहने पर क्लर्क की टेबल पर ही दम तोड़ देते हैं और हजार पांचसौ रुपए में तारीखें लगती रहती हैं पेशियां बढ़ती रहती हैं. ऐसे में खामोख्वाह स्ट्रैस लेने की कोई तुक नहीं इस से धंधा खराब होता है और ज्यादा कुछ होगा तो थोड़ामोड़ा जुरमाना लगेगा जो वकील के हाथों जमा करवा कर फिर एक प्रैस कांफ्रेंस कर लेंगे. खुदा न खास्ता अगर और भी ज्यादा कुछ हुआ जैसा कि वकील कह रहे हैं तो मुंह फाड़ कर माफी मांग लेंगे. उस में अपना क्या जाता है अपन तो व्यापारी हैं झुक कर काम निकाल लेंगे और खुद भी इस झंझट से निकल लेंगे.

बीती 2 अप्रैल की पेशी के दौरान रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के ये शेख चिल्ली टाइप मंसूबे धरे रह गए. इस दिन अदालत ने रामदेव का माफीनामा स्वीकार करने से साफ मना कर दिया. 10 अप्रैल की सुनवाई में जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि ‘इन लोगों ने तीनतीन बार हमारे आदेशों की अनदेखी की है. इन्हें अपनी इस गलती का नतीजा तो भुगतना ही पड़ेगा.’ उन्होंने साफतौर पर कहा कि ‘आप हलफनामे में धोखाधडी कर रहे हैं. इसे किस ने तैयार किया.’

जस्टिस हिमा कोहली ने भी फटकार लगाई कि आप को ऐसा हलफनामा नहीं देना चाहिए था. अब रामदेव के वकील मुकुल रोहतगी को काफी कुछ समझ आ गया था, सो वे बोले ‘हम से चूक हुई है.’ इस हलफनामे में बड़ी मासूमियत दिखाते कोर्ट के नवम्बर 2023 के आदेशों का शब्दशः पालन करने की बात कही गई थी. लेकिन अदालत इस बात पर भी खफा थी रामदेव ने 30 मार्च को विदेश यात्रा का झूठा बहाना पेश होने से बचने के लिए बनाया और इस बाबत झूठे टिकट नत्थी किए.

हास्यास्पद बात यह भी रही कि रामदेव ने अपना हलफनामा मीडिया में जारी कर दिया मानो फैसला उसे करना है कोर्ट को नहीं. इस हरकत पर भी उन्हें कोर्ट ने फटकार लगाई कि वे प्रचार में विश्वास रखते हैं.

गलती उत्तराखंड सरकार की भी

चूक बहुत छोटा शब्द है. अदालत ने कहा हम इस को जानबूझकर कोर्ट के आदेश की अवहेलना मान रहे हैं. वैसे भी हम इस पर फैसला करेंगे. हम इस पर उदार नहीं होना चाहते. ये केवल कागज का एक टुकड़ा है. हम अंधे नहीं हैं. हमें सब दिखता है. बचाव की आखिरी कोशिश करते हुए मुकुल रोहतगी ने कहा कि लोगों से गलतियां होती हैं. इस पर कोर्ट ने कहा, फिर गलतियां करने वालों को भुगतना भी पड़ता है. फिर उन्हें तकलीफ उठाना पड़ती है.

तो आयुर्वेदिक दवाओं के साथसाथ योग से भी लोगों के रोग और कठिनाइयों से मुक्ति दिलाने का दम भरने वाले रामदेव की कठिनाइयां शुरू हो गई हैं. 16 अप्रैल की सुनवाई में अदालत का रुख यही रहा तो रामदेव एंड कंपनी को भुगतने तैयार रहना चाहिए. काफी कुछ भुगतना तो उत्तराखंड सरकार के लाइसैंसिंग प्राधिकरण के मुलाजिमों को भी पड़ रहा है जिन्हें अदालत ने कड़ी फटकार लगाते हुए कहा, “उत्तराखंड सरकार बताए कि ड्रग इंस्पैक्टर और लाइसैंसिंग अफसर पर क्या कार्रवाई की गई. ऐसा 6 बार हुआ कि लाइसैंसिंग इंस्पैक्टर आंखे मुंदे बैठे रहे. उन्होंने दिव्य फार्मेसी पर न कार्रवाई की और न ही रिपोर्ट बनाई. तीनों अधिकारियों को निलम्बित किया जाए.”

इतना सुनते ही ये अधिकारी भरी अदालत में हाथ जोड़ कर माफी मांगते नजर आए लेकिन अदालत पसीजी नहीं बल्कि उस ने इन अफसरों की जानबूझ कर की गई लापरवाही और मिलीभगत पर भी जम कर फटकार लगाई और अगली तारीख पर सभी को पेश होने का हुक्म दिया. यानी यह इंटरवल है. पिक्चर अभी खत्म नहीं हुई है. यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा कि इस का दि एंड क्या और कैसा होगा.

कार्रवाई के दौरान अदालत ने उत्तराखंड सरकार पर सख्त होते एक दिलचस्प बात प्रसंगवश अंगरेजी में यह कही कि हम चीर देंगे. गौरतलब है कि 90 के दशक में यह नारा कट्टर हिंदूवादियों द्वारा खूब इस्तेमाल किया गया था कि दूध मांगोगे तो खीर देंगे कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे. चीरने का एक और प्रसंग महाभारत की लड़ाई में मिलता है जब भीम ने दो कौरवों दुर्योधन और दुशासन को बड़ी बेरहमी से चीर कर मार डाला था.

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