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ऐसे करें अपनी सेंसिटिव आंखों का ख्याल

आंख जिस्म का सब से नाजुक और संवेदनशील अंग है. इस में मामूली चोट या संक्रमण गंभीर रूप धारण कर सकता है और आंखों की रोशनी भी जा सकती है. इसलिए आंखों के मामलों में सतर्क रहना बेहद जरूरी है.

टैलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल, लेजर किरणें आदि का लगातार लंबे समय तक उपयोग किया जाए तो इन का दुष्प्रभाव आंखों पर भी पड़ता है. इसी तरह तेज रोशनी वाले हाईलोजन, बल्ब, बारबार जलनेबु?ाने वाली रोशनियां भी आंखों पर बुरा असर डालती हैं. वैल्ंिडग से निकली नीली रोशनी आंख के परदे को बहुत नुकसान पहुंचाती है.

आंखें इंसान की सब से बड़ी जरूरत होती हैं. इन को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है कि आंखों में होने वाली बीमारियों के बारे में पूरी जानकारी हो. इस संबंध में पेश हैं नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. सौरभ चंद्रा से हुई बातचीत के अंश :

आंखों की बीमारियों में बदलते मौसम की भूमिका कितनी होती है?
आंखें हैं तो सबकुछ है. मौसम के साथ होने वाले बदलावों का आंखों पर गहरा असर पड़ता है. गरमी के मौसम में धूप और धूल से आंखों में संक्रमण हो जाता है. यह प्रदूषण और धूप से आंखों में आने वाले बैक्टीरिया के कारण होता है. बरसात में फंगल इन्फैक्शन ज्यादा होता है. इस में आंखें लाल हो जाती हैं, चिपकने लगती हैं. सर्दी का आंखों पर कम प्रभाव पड़ता है.

इन का इलाज क्या है?
गरमी में जब भी आप बाहर से वापस आएं तो अपनी आंखों को हलके गरम पानी से धो लें. इस से धूल और बैक्टीरिया को आंखों से दूर करने में मदद मिलती है. बरसात में अगर आंखें लाल हों तो इन की साफसफाई का ध्यान रखें.

क्या उम्र के हिसाब से भी आंखों में बीमारियां हो जाती हैं?
बच्चों में आंखों का भेंगापन, पानी बहना जैसी बीमारियां ज्यादा होती हैं. इस उम्र में आंखों में चोट भी बहुत लगती है. 20 से 30 साल की आयु के बीच काम का बो?ा ज्यादा होता है. इस से माइग्रेन होने की संभावना ज्यादा रहती है. 30 से 40 साल की उम्र में ब्लडप्रैशर, डायबिटीज जैसी बीमारियों का शरीर पर हमला होता है. ये भी आंखों की रोशनी को प्रभावित करती हैं. 50 से 60 साल की उम्र में आंखों में मोतियाबिंद और ग्लूकोमा हो सकता है.

इन परेशानियों से बचने के लिए क्या करें?
कभीकभी इलाज आंखों की ऐक्सरसाइज करने से हो जाता है. सही ढंग से काम करने और अपनी डाइट पर ध्यान देने से भी आंखों को सेहतमंद रखा जा सकता है.

आंखों पर पड़ने वाली तेज धूप या लेजर किरणें, एक्सरे व दूसरी तरह के विकिरण और प्रदूषण भी नुकसानदेय होते हैं. इन से भी आंखों की सुरक्षा करना जरूरी है. प्राकृतिक रूप से आंखों की रक्षा के लिए पलकें होती हैं तब भी हमें आंखों की उचित देखभाल की जरूरत होती है.

आंखों को सुरक्षित रखने के लिए कुछ सावधानियां अपेक्षित हैं :

आंखों की चोटें

आंखों को चोटों से बचाना बेहद जरूरी है. एक आंख में गंभीर चोट लगने पर दूसरी आंख भी प्रभावित हो जाती है. देश में लोगों के अंधे होने का एक बड़ा कारण असावधानियों या दुर्घटनावश आंखों में चोट लगना भी है. चोटें कई बार कार्य करते वक्त, खेलने के दौरान, पटाखे चलाने में व अन्य दुर्घटनाओं में लग जाती हैं.

चोटों का आंखों पर दुष्प्रभाव :

नेत्रश्लेष्मा की साधारण चोटों में आंख लाल हो जाती है. यदि आंख में दर्द नहीं है और दृष्टि में कोई फर्क नहीं है तो फिर चिंता करने की जरूरत नहीं होती. आंख में कचरा, जहरीला कीट या तिनका चले जाने पर यदि उसे जोर से मला जाए तो कौर्निया में खरोंच आ सकती है और घाव भी हो सकता है.

कुछ चोटों से नेत्र ज्योति भी जा सकती है. नुकीली या पैनी वस्तु आंख में घुस कर स्वच्छ पटल यानी कौर्निया को फाड़ कर अंदर लैंस को भी अपने स्थान से हटा सकती है. लैंस और अंदर का जैल बाहर निकल सकता है. ऐसे में यदि आंख का इलाज न किया जाए तो दूसरी स्वस्थ आंख में सूजन आ जाती है और वह भी खराब हो सकती है.

जब आंखों में चोट लग जाए

– तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ या जो भी अच्छा चिकित्सक उपलब्ध हो, उसे दिखलाएं.
– आंख पर न दबाव दें न उसे मलें. पट्टी कस कर न बांधें.
– यदि आंख में रसायन या अम्ल पड़ गया हो तो आंख को पानी से तुरंत धोएं.
– आंख में पड़ा कचरा, कूड़ा या तिनका यदि पानी से आंख धोने पर भी न निकले तो तुरंत नेत्ररोग विशेषज्ञ को दिखलाएं.

आंखों की साफसफाई

– आंखों को गंदे हाथों से न छुएं.
– दिन में 2-3 बार ठंडे पानी से आंखों को धोएं या हलके छींटे मारें फिर उन्हें साफ कपड़े से पोंछें.
– आंखों को तेज धूप, धुएं व वैल्ंिडग की किरणों से बचाएं. इस के लिए गहरे रंग के चश्मे का प्रयोग किया जा सकता है.
– लगातार टैलीविजन देखना या कंप्यूटर पर कार्य करना नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए बीचबीच में आंखों को आराम दें. लेजर बीम वाले उपकरणों के प्रयोग में सावधानी रखें.
– पूरी नींद लें. इस से आंखें स्वस्थ रहेंगी.
– संतुलित भोजन लें अर्थात उस में आवश्यक मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, खनिज और विटामिंस भी हों. विशेषकर विटामिन ‘ए’ आंखों के लिए जरूरी है जोकि घी, मक्खन और दूध के साथसाथ गाजर व दूसरी हरी सब्जियों व फलों में होता है.
– मोतियाबिंद का शीघ्र इलाज करवाएं.
– उच्च रक्तचाप और मधुमेह रोगी आंखों में तकलीफ होने पर तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से जांच करवाएं. प्रत्येक वर्ष अपनी आंखों की पूरी जांच करवाएं.

पुनर्विवाह में झिझक सही नहीं

हर व्यक्ति को उम्र के हर पड़ाव में साथी की जरूरत जरूर पड़ती है चाहे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए या शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए. इंसान सामाजिक प्राणी है तो समाज से अलग कट कर नहीं रह सकता. जीवनसाथी की जरूरत भी सामाजिक जरूरत के दायरे से अलग नहीं है. 28 वर्षीय श्रेया के पति की मौत कोरोना वायरस से हो गई. उस के 2 छोटेछोटे बच्चे हैं. इतनी कम उम्र में पति की मौत के कारण उस के ऊपर दुखों का पहाड़ आ गिरा है. उस के घर में कोई कमाने वाला भी नहीं है. वह अपने पति की मौत के बाद बिलकुल ही अकेली हो गई है. पति के मौत के बाद उस के मायके वाले उसे पुनर्विवाह के लिए राजी करना चाह रहे थे. सब चाहते थे कि श्रेया का पुनर्विवाह हो जाए. लेकिन श्रेया ने सिरे से नकार दिया. वह अपने पति की यादों को भुलाना नहीं चाहती.

भावनाओं में बह कर अकेला जीवन गुजारने का प्रण कर चुकी है. परंतु जीवन भावनाओं से नहीं चलता है. कुछ दिनों बाद ही वह बिलकुल सचाई के धरातल पर आ गई थी. पति की मौत के समय जो नातेरिश्तेदार संवेदना प्रकट करने आए थे, वे एकएक कर के चले गए थे. उस के अपने जो मदद करने का आश्वासन दे रहे थे, अपनेअपने कामों में व्यस्त हो चुके थे. कुछ दिनों बाद ही अपने लोगों से मिलने वाली सहानुभूति बंद हो गई थी. कोई पलट कर भी हालचाल नहीं ले रहा था. दरअसल, किसी के पास आज की भागदौड़ की जिंदगी में इतना समय नहीं है. सिर्फ उस के मातापिता द्वारा हालचाल लिया जाता था. अब उस पर दोनों बच्चों के पालनपोषण की जिम्मेदारी आ पड़ी है. पति द्वारा छोड़े गए पैसे और संपत्ति बच्चे के पालनपोषण में मददगार तो साबित हो रहे हैं परंतु जीवन नितांत अकेला हो गया है. उसे लग रहा है कि वह दोनों बच्चों के लिए आया बन कर रह गई है. रहरह कर उस का अपना अकेलापन खाए जा रहा है. पत्नी की मौत के बाद पुरुष तो दोबारा शादी कर लेता है. लेकिन आज भी औरतों के पुनर्विवाह में कहीं न कहीं धार्मिक सीखें रुकावट पैदा करती हैं. औरतों को धर्म यह सिखाता है कि पति की मृत्यु के बाद विधवा के रूप में जीवन व्यतीत करना चाहिए.

सफेद साड़ी पहननी है. सिंगार नहीं करना है. रूखासूखा भोजन करना है. और यही बातें औरतों को पुनर्विवाह करने से रोकती हैं. यही श्रेया के साथ भी हुआ है. इसलिए वह खुद को विधवा के रूप में ढालने की कोशिश कर रही थी. ओम प्रकाश की उम्र मात्र 35 साल थी जब उन की पत्नी का देहांत हुआ था. उस समय उन की पत्नी तीसरे बच्चे को जन्म देने वाली थी. लेकिन डाक्टर उन की पत्नी और नवजात शिशु को बचा नहीं सके थे. पत्नी की मौत के बाद उन्होंने निर्णय लिया था कि वे पुनर्विवाह नहीं करेंगे. उन का मानना था कि एक औरत से जब सुख नहीं मिला तो क्या गारंटी है कि दूसरी औरत से सुख मिलेगा ही? हालांकि उन दिनों पुनर्विवाह के लिए रिश्ते आ रहे थे.

उन्होंने अपने दोनों बच्चों की अच्छे से परवरिश की. उन के बच्चों ने अच्छी तालीम हासिल कर ली थी. सब से पहले उन्होंने अपनी बड़ी बेटी का विवाह किया था. उन की बेटी अपने घर चली गई थी. कुछ वर्षों बाद उन्होंने अपने बेटे का भी विवाह कर दिया. बेटा पढ़लिख कर अच्छी जौब करने लगा था और अपनी पत्नी सहित दूसरे शहर में रहने लगा था. सालों बाद उन्हें अपने लिए खुद ही खाना बनाना पड़ रहा है. तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ. उन का कहना है, ‘‘काश, मैं ने पुनर्विवाह कर लिया होता तो आज जिंदगी के आखिरी पड़ाव में मु झे अपने हाथों से भोजन नहीं पकाना पड़ता, इतने बड़े घर में अकेला नहीं रहना पड़ता. इस उम्र में खुद के लिए भोजन पकाना मेरे वश की बात नहीं है. ऐसे में अब अफसोस हो रहा है कि मैं ने जो भावना में बह कर निर्णय लिया था वह गलत था.’’ उन का आगे कहना था, ‘‘मैं ने अपने बेटेबेटी के सुख के लिए अपने सुख का त्याग कर दिया. लेकिन मेरे बच्चों ने अपने सुख के लिए अपने पापा को अपने हाल पर छोड़ दिया. हालांकि उन दोनों की अपनी मजबूरी भी है.

आज मैं बिलकुल अकेला हो गया हूं. यह अकेलापन बहुत परेशान कर रहा है. कभीकभार बेटाबेटी मिलने आ जाते हैं वरना फोन से हालचाल लेते रहते हैं. लेकिन जीवनसाथी के बिना जिंदगी अधूरी ही लग रही है. मन में रिक्तता का अनुभव हो रहा है. ‘‘जब इंसान शारीरिक रूप से सक्षम होता है तो कई प्रकार के कामों में व्यस्त रहता है. उसे समय काटने में ज्यादा दिक्कत नहीं आती है. अपने काम के दबाव के कारण समय बीत जाता है. परंतु बुढ़ापे में काम करने की शक्ति क्षीण हो जाती है. दिनभर खाली बैठे रहना पड़ता है. आदमी कहीं जा भी नहीं सकता है. ऐसे में वह अपनी भावनाओं को किस के पास अभिव्यक्त करे. इंसान जब अकेला होता है तो उसे ऐसा महसूस होता है कि कोई उस की बातों पर भी गौर करे, उस की बातें सुने. लेकिन आज की नई पीढ़ी के पास दूसरों के पास बैठने के लिए भी समय कहां है. आज के युवा अपने बीवीबच्चों में व्यस्त हो जाते हैं. वे दूसरों पर कहां ध्यान दे पाते हैं.’’ जीवनसाथी की मौत के बाद पुनर्विवाह से इनकार करना खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. यह भी सत्य है कि पति या पत्नी के बिछुड़ जाने के बाद शारीरिक जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भूखे पेट तो कुछ दिन तक रहा जा सकता है लेकिन शारीरिक जरूरतों की उपेक्षा करना हर इंसान के बस की बात नहीं होती.

कुछ दिनों तक तो इस की उपेक्षा की जा सकती है लेकिन लंबे समय तक इस की उपेक्षा कर पाना हर इंसान के लिए असंभव सा प्रतीत होता है. वहीं अकेली औरतों को कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. समाज भी उन्हें अच्छी नजरों से नहीं देखता है. चाहे घर हो या औफिस, हर जगह औरतों को पराए पुरुषों से सामना करना पड़ता है. अकेली औरतों को मर्दों द्वारा आसानी से पाने का जरिया सम झा जाता है. इस प्रकार के पुरुषों से औरतों को घरबाहर कहीं न कहीं सामना करना ही पड़ता है. प्रत्येक इंसान को किसी न किसी उम्र के पड़ाव में साथी की जरूरत पड़ती है चाहे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए या शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए. इंसान सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज में ही रहना चाहता है. जीवनसाथी की जरूरत भी सामाजिक जरूरत के दायरे से अलग नहीं है. चाहे पति हो या पत्नी. एक उम्र के बाद शरीर थकने लगता है.

ऐसा लगता है कि उस की जरूरतों का ध्यान कोई तो रखे. और यह सिर्फ पति का पत्नी और पत्नी का पति ही रख सकता है. बेटाबेटी की अपनी निजी जिंदगी होती है. वे शादी के बाद अपने सुनहरे भविष्य के सपनों में खो जाते हैं. एक उम्र के पड़ाव के बाद मातापिता के लिए वह स्थान बेटेबहुओं की नजर में नहीं रह पाता है. उन का अपना जीवनसाथी होने से दूसरों पर वे बो झ नहीं बनते. यह देखा गया है कि वृद्ध पतिपत्नी ही एकदूसरे का बो झ उठाते में सक्षम होते हैं. एकदूसरे की जरूरतों को पूरा करते हैं, देखरेख करते हैं, खयाल रखते हैं, सेवा करते हैं, एकदूसरे की तारीफ करते हैं, एकदूसरे से प्यार करते हैं,

एकदूसरे की भावनाओं का आदर करते हैं, सम्मान करते हैं, आपस में लड़ते झगड़ते हैं. और यही तो जीवन है. सो, पति या पत्नी की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह कर लेना चाहिए. पुनर्विवाह करने से इनकार करना उचित नहीं है. आप जिन बेटेबेटियों के लिए अपना सुख त्याग करते हैं. वह त्याग आप के बच्चों के बड़े हो जाने पर छूमंतर हो जाता है. इसलिए आप उन के लिए सिर्फ जरूरत का हिस्सा न बनें, बल्कि अपनी जिंदगी के बारे में भी सोचें. अपनी जिंदगी की खुशियों का खयाल रखना भी जरूरी है

खुशहाल जीवन के लिए जरूरी जौब सैटिस्फैक्शन

एक मार्केटिंग फर्म के मार्केटिंग डिपार्टमैंट में काम कर रही महिमा शुरू में अपने काम को ले कर बहुत उत्साही थी, लेकिन साल पूरा होतेहोते उसे अपने काम से ऊब और थकान सी होने लगी. पैसे उसे जरूर अच्छे मिल रहे थे लेकिन टूरिंग जौब और ज्यादा देर तक काम करने से उस की सेहत पर भी खराब असर पड़ रहा था. साथ ही, अपने आसपास का माहौल और वहां काम करने वाले लोग भी उसे सूट नहीं कर रहे थे.

लेकिन घर की माली हालत ठीक न होने के कारण वह नौकरी छोड़ कर दूसरे विकल्प तलाश करने का जोखिम भी नहीं उठा सकती थी. पता नहीं दूसरी नौकरी मिले न मिले, मिले भी तो वहां का काम भी उस के मनमाफिक हो या नहीं. लिहाजा,  मन मार कर वह अपनी नौकरी करती रही और धीरेधीरे डिप्रैशन में आ गई.

दूसरी तरफ कृतिका एक मल्टीनैशनल कंपनी में कंप्यूटर औपरेटर थी. कुछ समय बाद उसे वह काम बोरिंग लगने लगा, फिर उस ने इनफौरमेशन टैक्नोलौजी में अपना कैरियर बनाना चाहा.

जब मन में ठान लिया तो पहले उस ने अपने बचे समय में एक अच्छे संस्थान से संबंधित पढ़ाई की. इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी में पूरी जानकारी हासिल की और सालभर बाद ही उसे उस क्षेत्र में कामयाबी भी मिल गई. आईटी में जौब मिलने के बाद ही उस ने अपनी पहली नौकरी छोड़ दी. अब वह अपने मनमुताबिक कैरियर से बहुत संतुष्ट है.

मशहूर विद्वान विंस्टन चर्चिल ने कहा था, “हर संस्थान अथवा व्यक्ति को समय के साथ बदलते रहना चाहिए. अगर ऐसा नहीं है तो धीरेधीरे विकास रुक जाएगा. वास्तव में परिवर्तन प्रकृति का नियम है और परिवर्तन से ही विकास संभव है. जो समय और परिस्थिति के अनुसार अपनेआप को बदलते रहते हैं, वही सफल होते हैं.

हद से ज्यादा जौब सैटिस्फैक्शन के नुकसान 

हम अकसर कहतेसुनते हैं कि किसी भी नौकरी में ‘जौब सैटिस्फैक्शन’ होना बेहद जरूरी है. इसी से जौब व कैरियर में हमारी तरक्की तय होती है. अगर यह न हो, इस का बुरा असर हमारे प्रदर्शन पर पड़ता है. लेकिन हद से ज्यादा ‘जौब सैटिस्फैक्शन’ के कुछेक नुकसान भी होते हैं, जिन से हमें बच कर रहना चाहिए. आइए जानते हैं इन नुकसानों में बारे में…

कंफर्ट जोन से कभी बाहर नहीं निकलना : ‘जौब सैटिस्फैक्शन’ होने पर आप की प्रोफैशनल लाइफ तो अच्छी रहती है लेकिन इस का एक बुरा असर यह पड़ता है कि आप अपने कंफर्ट जोन से कभी बाहर नहीं निकलना चाहते. आप को उस में रहने की आदत पड़ जाती है. आप वही टास्क करना चाहते हैं जो कि आप को कंपनी जौइन करते वक्त दिया गया था. कोई भी नई चीज करने या सुझाने से आप कतराते हैं.

खुद को चैलेंज करने से हमेशा बचना : अत्यधिक ‘जौब सैटिस्फैक्शन’ होने पर आप किसी भी चुनौतीपूर्ण कार्य के आने की स्थिति में उसे स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं. आप में पूरी टीम के बीच किसी नए कार्य को आगे बढ़ कर स्वेच्छा से करने की हिम्मत कम हो जाती है. ऐसे में ध्यान रखें कि जौब के प्रति संतुष्टि होना कहीं आप के कैरियर में रोड़ा न बन जाए.

चली जाती है कैरियर में रिस्क लेने की उम्र : अपने लक्ष्य को पाने के लिए कैरियर में प्लानिंग की जरूरत होती है. कैरियर के किसी पड़ाव पर की गई एक गलती आगे जा कर अपने भयावह परिणाम छोड़ती है. इसलिए सही वक्त पर सही कदम उठाना बेहद जरूरी होता है. कैरियर में बड़े रिस्क लेने की भी एक उम्र होती है. जितने लेट होते हैं, रिस्क लेने की क्षमता भी उतनी कम होती जाती है. जरूरत से ज्यादा ‘जौब सैटिस्फैक्शन’ होने पर हम रिस्क लेने से हमेशा डरते हैं. आप को यह सवाल हमेशा असमंजस में रखता है कि नई कंपनी में आप को ऐसा माहौल, काम और सहूलियतें मिलेंगी या नहीं.

क्यों जरूरी हैं जौब सैटिस्फैक्शन?

जौब सैटिस्फैक्शन हमारे जीवन का बहुत जरूरी हिस्सा है. यह हमें सफलता के एक कदम और नजदीक ले कर जाता है. साथ ही, हमें इस से पता चलता है कि हम अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हैं और आर्थिक रूप से मजबूत हैं. लेकिन सब से बढ़ कर अपने काम के प्रति संतुष्टि हमारे मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकती है. जब आप प्रोफैशनली अपने जौब से संतुष्‍ट होते हैं, तो यह आप की मैंटल हैल्थ को प्रभावित करता है.

हम पहले से ही एक बहुत ही प्रतियोगी दुनिया में रह रहे हैं. हालांकि, दूसरा कदम और भी जरूरी है. वह यह कि अपनी नौकरी को अपनी मैंटल हैल्थ को प्रभावित करने देने के बजाय वर्तमान में जो आप कर रहे हैं उस में शांति पाने और संतुष्ट रहने की कोशिश करें. ऐसे में आप कुछ चीजों को करने की कोशिश कर सकते हैं.

दोस्त जरूरी

आप जहां भी काम करते हैं, वहां अपने कुछ दोस्त बनाइए. आप का दिन कैसा रहा, इस सब को शेयर करने के लिए एक दोस्त का सपोर्ट होना आप के लिए बहुत जरूरी है. ऐसा करना आप के लिए बहुत फायदेमंद होता है. इस तरह एक नया संबंध बनाना भी आप के कार्यस्थल की खुशी को बढ़ाता है.

इस के लिए कुछ ऐसे लोगों को ढूंढें जिन के काम करने का लक्ष्य आप के जैसा ही हो. यह आप के काम के दौरान अधिक सकारात्मक वातावरण बनाएगा. साथ ही, ऐसा करने से आप को आप की नौकरी से अधिक संतुष्टि भी महसूस होगी.

एक नया शौक 

आप को यह समझने की जरूरत है कि आप वह नहीं है जो आप का काम है. अपनी नौकरी से कुछ अलग करने से नौकरी से संतुष्टि का स्तर बढ़ सकता है. एक नया शौक आप को आप के सभी उद्देश्य के लिए अधिक लाभ और आनंद प्राप्त करने में मदद कर सकता है.अगर आप अपनी नौकरी में खुश नहीं रह पा रहे हैं तो उस गतिविधि को करने की कोशिश करें जिसे आप हमेशा से आगे बढ़ाना चाहते हैं. यह आप के समग्र जीवन और स्वास्थ्य की गुणवत्ता में सुधार लाने में मदद करेगा.इस के अलावा आप यह भी कोशिश कर सकते हैं कि आप की नौकरी का कौन सा पहलू आप को सब से ज्यादा पसंद है. इस तरह प्रोडक्टिविटी से कोई समझौता न करते हुए खुद को खुश रखने पर ध्यान दें.

टालमटोली की आदत बुरी

टालमटोल करना एक स्पायरल की तरह है जिस के गिरने का कोई अंत नहीं है. जब आप ऐसा करते हैं तो आप के काम करने की क्षमता और प्रेरणा में कमी आती है. ऐसा करने से आप की कार्यसंतुष्टि पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं. टालमटोली की आदत आप का बर्डन बढ़ा देती है.

तय करें हर दिन के छोटे लक्ष्य

हर दिन छोटे लक्ष्य निर्धारित करें और उन्हें अपने दैनिक आधार पर पूरा करने की कोशिश करें. यह आप को अगले दिन अपनी नौकरी के लिए तत्पर रहने के एहसास और उद्देश्य को बढ़ाएगा. साथ ही, इस से आत्मसम्मान भी बढ़ेगा.

हम जानते हैं कि स्थिति अभी आप के लिए ठीक नहीं है. लेकिन जब तक नौकरी का बाजार आप की महत्त्वाकांक्षाओं के अनुकूल नहीं हो जाता है तब तक आप जो कर रहें, उसी में संतुष्टि महसूस करने की कोशिश करें.

जोसफ की मारिया : गोपाल ने उससे माफी क्यों मांगी ?

सोमेश सर अपने एक दोस्त को विदा कर स्टेशन से तेज कदमों से लौट रहे थे। अभी 9 बजे हैं। 1 घंटा हाथ में है। जल्दीजल्दी तैयार हो कर स्कूल पहुंचना है। देर होना उन्हें पसंद नहीं। वे इस से बचना चाहते हैं। देर से पहुंचने वाले शिक्षकों को स्कूल के प्रिंसिपल जिस अंदाज में देखते हैं, वे नहीं चाहते कभी उसी अंदाज में उन्हें भी देखा जा।

रेलवे कालोनी अभी दूर थी। और 10 मिनट का वक्त लगेगा क्वार्टर पहुंचने में। वे चाहते तो स्टेशन तक आने के लिए अपनी बाइक का इस्तेमाल कर सकते थे। लेकिन कोई फायदा नहीं। क्वार्टर से निकल कर लगभग 100 मीटर का फासला तय करने के बाद बाइक को स्टैंड में खड़ा कर देना पड़ता है। बाइक चला कर स्टेशन तक नहीं पहुंचा जा सकता। एक लंबा ओवरब्रिज पार करने के बाद स्टेशन पहुंचा जाता है। उन्होंने ओवरब्रिज पार करते ही कदमों की रफ्तार बढ़ा ली।

“नमस्कार सोमेश सर…”

उन्होंने चलतेचलते मुड़ कर देखा, अपनी कालोनी के गोपालजी उन के पीछेपीछे चले आ रहे हैं।

“क्या बात है गोपाल बाबू, कहीं बाहर गए थे?”

“नहीं, अखबार लेने गए थे,” उन्होंने अखबार दिखाते हुए कहा।

“अब मुझे भी आपलोगों की तरह सुबहसवेरे अखबार बांचने की आदत लग गई है।”

“अच्छी आदत है…लेकिन हौकर गणेशी रोजाना दे जाता है न?”

“हां, इधर 2-4 रोज से नहीं आ रहा है। इसलिए स्टेशन जा कर चौबेजी के स्टौल से ले आते हैं।”

“आज हैडलाइन में क्या है?” कदम बढ़ाते हुए सोमेश सर ने यों ही पूछ डाला।

“अभी तो पूरा पढ़ा नहीं है लेकिन देख रहे हैं बड़ेबड़े अक्षरों में 2-3 तस्कर के पकङाने की खबर छपी है।”

“तस्कर…”

“अरे वही सर, गाय वाले तस्कर… बहुत मन बढ़ गया है इन ससुरों का. जगहजगह पिटने पर भी नहीं चेताते हैं। हम जिस को पूजते हैं उसी को हत्या कर के…कैसा घोर पाप करते हैं। आप ही कहिए कि यह सब बरदाश्त करने लायक है सर। सही करते हैं गौभक्त लोग, निकाल दें कचूमर इन का… तुम अगर कानून नहीं मानोगे तो भगत लोग कानून हाथ में लेंगे ही…जैसे को तैसा वाला मामला यहां लागू होना चाहिए… गोपाल बाबू अपने रौ में बोलते रहे। इधर सोमेश सर चुप्पी साध कर आगे बढ़ते रहे। बोलतेबोलते जब उन्हें यह एहसास हुआ कि सोमेश सर उन की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं तो चुप हो गए। कुछ पल तक खामोशी भी उन के साथ चलती रही। बाद में सोमेश सर ने ही विषय बदलते हुए चुप्पी तोड़ी,“कौन सी ड्यूटी चल रही है?”

“डे शिफ्ट। अभी तैयार हो कर जाना है।

गोपाल बाबू रेलवे के डीजल इंजन शेड में फ्यूल क्लर्क हैं। अपने नाम के अनुरूप गोपालक भी हैं। अपने क्वार्टर के पीछे खाली पड़े हिस्से को लोहे के एंगलों और चदरों से घेर कर एक ग्वालघर बना रखा है। जाहिर है, लोहे की ये सामग्रियां जर्जर अवस्था में पड़े लोकोशेड की हैं। ढहतेगिरते लोकोशेड की लौह संपत्ति के इस छोटे से हिस्से का अनाधिकृत उपयोग पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई। चूंकि गऊ माता का घर बनाने का मामला था, गोपाल बाबू दिनदहाड़े लौह सामग्रियों को खुद ढो कर ले आए थे। 3 गाएं पाल रखी हैं। तीनों गायों को वे देश की तथाकथित पवित्र नदियों के नाम से संबोधित करते हैं- गंगा, जमुना और सरस्वती।

ड्यूटी से बचे हुए समय का उपयोग तीनों गायों की सेवा में लगाते हैं। गाय के प्रति उन का अतिरिक्त प्रेम, भक्ति और आस्था से पूरी कालोनी परिचित है। कहीं भी गौकशी कोई मामला सामने आता है तो वे फूट पड़ते हैं। खुल कर अपना विरोध जताते हैं। पूरी कालोनी उन्हें सच्चे गौभक्त के रूप में देखती है। गायों की सानीपानी, नहानधोआन, ग्वालघर की सफाई आदि कामों के लिए उन्होंने कभी किसी सहायक की आवश्यकता नहीं समझी। ये सारे कार्य बड़े प्रेम और मनोयोग से करते हैं।

गायों के चारे के लिए पुआल से कुट्टी (पुआल के छोटेछोटे टुकड़े ) बनाने वाली बिजली से संचालित मशीन भी उन्होंने ग्वालघर के एक कोने में लगा रखी है। स्वीचऔन किया, मशीन चालू। 10 मिनट में ही चारा तैयार। क्वार्टर के आसपास के लोगों के कानों में सुबहशाम जब गोपाल बाबू का लयबद्ध स्वर पड़ता है तो समझ जाते हैं कि वे दूध दुहने के काम में लग गए हैं।

वे अकसर कहा करते हैं कि दूध दुहना बड़ा पुण्य काम है। धूपबत्ती जला कर सब से पहले तीनों गायों को प्रणाम करते हैं। गायों के दूध देने के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। दुहने के दौरान कुमार विशु की ‘गऊ महिमा…’ वाला गीत का मुखड़ा उसी सुर में गुनगुनाना नहीं भूलते,”गौमाता के श्रीचरण बसते जिस घरग्राम, बारह ज्योतिर्लिंग वहीं चारों धाम। घरघर जब भी पालते गौमाता को लोग, सुख वैभव भरपूर हो, निकट न आवे रोग…”

तीनों गायों से मिलने वाला भरपूर दूध का थोड़ा सा हिस्सा घर में उपयोग के लिए रख कर शेष हिस्सा बेच डालते हैं। कुछ होटल वाले, आसपास के क्वार्टर वाले स्वयं आ कर दूध ले जाते हैं।

सोमेश सर का क्वार्टर गोपाल बाबू के क्वार्टर से 5 ब्लौक की दूरी पर है। गोपाल बाबू अपने क्वार्टर वाले ब्लौक के करीब आते ही एक क्वार्टर की ओर अंगुली उठा कर फुसफुसाए,“देख रहे हैं सर…”

“क्या?”

“यहां भी गाय पाली जा रही है.”

वह क्वार्टर जोसफ का है. वह भी डीजलशेड में फ्यूल क्लर्क है. कहें तो वह गोपाल बाबू का सहकर्मी है। कुछ दिन पहले वह भी पालने के लिए एक गाय खरीद कर ले आया। उस का परिवार बड़ा है। परिवार में 4 बच्चों के अलावा वृद्ध मांपापा भी हैं। क्लर्की की तनख्वाह से घर चलाना मुश्किल हो रहा था, सो उस ने दूध बेच कर अतिरिक्त आय की प्राप्ति के मकसद से गाय खरीद कर ले आया। अपने क्वार्टर के पिछवाड़े मिट्टी से बने एक छोटे से घर को ग्वालघर का रूप दे कर अपनी गाय को बड़े जतन से पोस रहा है। जितनी सेवा, देखभाल की जरूरत है, उस से कहीं ज्यादा वह करता है। गाय की सेहत, उस की तंदरुस्ती इस बात की पुष्टि करती है।
जोसफ और उस के परिवार वाले अपनी गाय को मारिया कह कर संबोधित करते हैं। गाय को घर ले आने के 10-15 दिनों तक परिवार वाले उसे मैया ही कह कर पुकारते थे।

एक दिन जोसफ की पत्नी मार्था ने सुझाव दिया,“ क्यों न हम इसे मारिया कह कर पुकारें,” पत्नी के मुख से मारिया का नाम उच्चारित होते ही उस के भीतर कुछ हरहराने लगा। एक हूक सी उठी थी उस के सीने में। अंतस भीगने लगा था। आंखें भी पनीली हो गईं थीं। मरिया उस की 10 वर्षीया बेटी का नाम था, जो अब नहीं है। उस दर्दनाक हादसे की याद ने उसे हिला कर रख दिया था। क्वार्टर से निकली थी मुख्य सड़क पर। एक बाइक वाले ने सामने आए कुत्ते को बचाने के कवायद में अपनी बाइक मारिया पर चढ़ा दी थी। अंगअंग चूर हो गया था। इलाज का मौका भी नहीं दिया उस ने…

जोसफ ने कोई आपत्ति नहीं जताई पत्नी के सुझाव पर। अब वह मारिया में अपनी दिवंगत बेटी की छवि देखने लगा है। मारिया उस के लिए एक गाय नहीं रही, वरन बेटी थी। जोसफ और मार्था के बेटी सदृश्य प्यारदुलार, स्नेह, ममत्व पा कर मारिया भी अभिभूत थी।

जिस दिन जोसफ मारिया को खरीद कर लाया, उसी दिन से ही गोपाल बाबू दबी जबान में पूरी कालोनी में उलटीसीधी बातें सुनाने लगे थे। कुछ इस अंदाज में कि जैसे गाय पालने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ एक ही समुदाय को है। गाय के प्रति भक्तिभावना किसी दूसरे समुदाय में नहीं देखी जा सकती…गौभक्षक के घर में गऊ मैया की दुर्गति होने जा रही है अदि।

जोसफ के प्रति गोपाल बाबू का कटाक्ष उन्हें समझने में देर नहीं लगी। कहने की भंगिमा ही ऐसी थी। सोमेश सर किंचित पल के लिए थोड़ी तिक्तता से भर उठे। वे चाहते तो करारा जवाब दे सकते थे। जोसफ दूसरे समुदाय का है, इसलिए उस का गाय पोसना उन्हें नागवार गुजर रहा है। तब तो मुसलिमम और यूरोपीय देशों में पाली जा रही गायों को ले कर उन्हें घोर आपत्ति होनी चाहिए। उन्होंने बात आगे नहीं बढ़ाई, बस इतना ही कहा, “इस में आप को कोई दिक्कत नहीं होनी चहिए गोपाल बाबू,” उन का स्वर अपनेआप अपेक्षाकृत शुष्क और तीखा हो गया था। शायद इसे गोपाल बाबू ने महसूस कर लिया था।

“अच्छा सर चलते हैं, ड्यूटी पर पहुंचना है।”

सोमेश सर ने घड़ी देखी,”ओह, 10 मिनट का रास्ता तय करने में 15 मिनट लग गए। अगर रास्ते में गोपाल बाबू न मिलते तो अब तक मैं अपने क्वार्टर पहुंच जाता,” लंबेलंबे डग भरते हुए वे क्वार्टर पहुंचे।

“ट्रेन लेट थी क्या?”

“नहीं, रस्ते में गोपाल बाबू मिल गए थे। उन की चाल में चाल मिलाते, बतियाते देर हो गई,” पत्नी को जवाब दे कर जल्दीजल्दी तैयार होने लगे।

रविवार का दिन था। घड़ी दिन का 10 बजा रही थी। सोमेश सर बाजार से कुछ सब्जियां लेने निकले थे। हाथ में झोला ले कर अपने क्वार्टर से कुछ कदम बढ़े ही थे कि दूर से मुख्य सड़क के किनारे वाली रेल की पटरियों के आसपास कालोनी के लोगों का अच्छाखासा हुजूम दिखा। ऐसी रेल कालोनी कम ही देखने को मिलती है जिस में दाखिल होने वाली मुख्य सड़क के 2-3 मीटर की दूरी से ही रेल की पटरियां शुरू हो जाती हैं। ये पटरियां सीधे लोकोशेड से जा मिलती हैं। लोकोशेड एक ऐसा कार्यस्थल, जहां स्टीम इंजन की मरम्मती, पैसेंजेर, गुड्स ट्रेनों से जुड़ कर उस की रवानगी से पहले जांचपड़ताल होती थी।

लोकोशेड का अपना वर्कशौप भी होता था, जिस में इंजनों के मुत्तालिक छोटेमोटे कलपुरजे भी बनाए जाते थे। लोको ड्राइवरों की ड्यूटी का रोस्टर भी यहीं मैंटेन होता था। अब तो लोकोशेड जर्जर अवस्था में है। स्टीम इंजन का जमाना लदे एक लंबा समय बीत गया। आहिस्ताआहिस्ता जमींदोज होते लोकोशेड के पीछे एक डीजलशेड बना दिया गया था, जहां फ्यूल के रूप में डीजल तेल की रिफिलिंग के लिए डीजल इंजन इन रेल की पटरियों से गुजरती हुई यहां पहुंचती हैं।

कालोनी का नाम है लोकोपाड़ा।ब्रिटिश हुकूमत के जमाने में लोकोशेड के सामने बनी इस कालोनी का नामकरण शायद इसी को ध्यान में रख कर कर दिया गया था। कालोनी की मुख्य सड़क के किनारेकिनारे लोहे की लंबीलंबी रैलिंग और उस के ढाई मीटर की दूरी से शुरू होती है पटरियां। उस के बाद लगभग 50 मीटर चौड़ी खाली जगह। यही खाली जगह अब मैदान का रूप ले चुका है।

सोमेश सर को पटरियों पर 3 डीजल इंजन एक के पीछे एक खड़ी दिखीं। माजरे को समझने के लिए उन्होंने अपने कदम तेज कर लिए। सामने से खटारा साइकिल पर सवार हौकर गणेशी को आता देखा तो उन्होंने अधीरतापूर्वक पूछा,“क्या हुआ है गणेशी?”

“रनओवर हो गया।”

“रनओवर… किस का?”

“गाय का।”

“किस की गाय?”

“पता नहीं सर।”

सोमेश सर जब भीड़ के करीब पहुंचे तो उन्होंने देखा कि रेलवे के सभी विभागीय प्रभारी लोको फोरमैन, कैरिज फोरमैन, आईओडब्ल्यू, पीडब्ल्यूआई, स्टेशन मैनेजर, रेलवे सुरक्षा बल के निरीक्षक पहुंचे हुए थे। साथ में कई जवान लुंगी बांधे, खुला बदन, सिर पर गमछा धरे बगल में शुक्लाजी खड़े थे। इत्मीनान से खैनी मल रहे थे। सोमेश सर ने उन्हें कुरेदा, “कैसे हुआ यह सब शुक्लाजी?”

“अरे, क्या बताएं सरजी, इधर मैदान में बच्चा सब क्रिकेट खेल रहे थे। 3 गाएं उधर से आ कर मैदान में घुस गई थीं। एक बच्चा एक गाय को पत्थर उठा कर इतना जोर से मारा कि वह बिलबिला कर लाइन की तरफ भागी। ऐन वक्त यही डीजल इंजन आई थी। मास्टर (चालक) कोशिश किया कि ब्रेक मार कर रोक दें, लेकिन तब तक धक्का खा कर गाय लाइन के बीच में आ गई और बस…”

“जल्दीजल्दी बोलो यह किस की गाय है?”

रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ ) के सब इंस्पैक्टर मुखर्जी सर भीड़ से मुखातिब थे। कुछ दिन पहले ही मुखर्जी सर बंगाल के किसी रेलवे स्टेशन से तबादला हो कर यहां ओहदानशीं थे।

“देखो, बाद में पता लग जाएगा कि किस की गाय है तो भारी केस बन जाएगा….रेललाइन में घर का जानवर का घूमनाफिरना रेल के नियमकानून का खिलाफ है।”

भीड़ में फुसफुसाहट थी,”देखिए, रेल का काम कितना हंपर हो रहा है। स्टेशन मैनेजेर ने बताया कि यह जो 2 डीजल इंजन खड़ा है उन को तेल भर कर मालगाड़ी और पैसेंजर ट्रेन ले जाना है। कितना डिटेन हो रहा है डीजल इंजन। इस के चलते दोनों ट्रेन भी डिटेन हुआ तो डीआरएम लेबल से पूछताछ शुरू हो जाएगी।”

इसी बीच मुखर्जी सर के बगल में खड़े सुरक्षा बल के एक जवान दबी जबान में कुछ फुसफुसाया,”गोपाल मिश्रा कौन हैं? वे इधर हैं क्या?”

“जी, हम हैं सर…” गोपाल बाबू नमूदार हुए. अतिरिक्त विनम्रता के साथ हाथ जोड़े सब इंस्पैक्टर के सामने खड़े हो गए।

“यह आप की गाय है?”

“कैसी बात करते हैं हुजूर। अगर मेरी गऊ मैया होती तो अब तक हम इस को ऐसे ही पड़े रहने देते? अपने हाथों से क्लीयर कर देते और विधिविधान के साथ क्रियाकर्म भी कर देते. रामराम…ब्रह्महत्या का इतना घोर पाप ले कर हम जीवित रह पाएंगे?सर, हम भी रेल के मुलाजिम हैं, हम भी समझते हैं कि कितना डिटेन हो रहा है रेल का परिचालन…”

“आप के पास कितनी गाएं हैं?”

“सर, 3 हैं- गंगा, जमुना, सरस्वती. तीनों ग्वालघर में हैं… अभी तो सानीपानी दे कर आ रहे हैं। विश्वास नहीं हो तो सर चल कर जांच कर लें।”

सब इंस्पैक्टर ने अपने 2 जवानों को इशारा किया। वे दोनों गोपाल बाबू के साथ हो लिए। वहां पहुंच कर उन दोनों ने देखा कि एक ही नाद में तीनों गाय भोजन कर रही हैं। गोपाल बाबू की तीनों गायों का सशरीर मौजूद होने का सुबूत पा कर सब इंस्पैक्टर ने लावारिस गाय का रनओवर केस दर्ज कर मैडिकल डिपार्टमैंट के सैनेटरी इंस्पैक्टर को लाइन क्लीयर करने की हिदायत दी और अपने जवानों के साथ औफिस के लिए रवाना हो गए।

जोसफ को गाय खरीदे कुछ ही दिन हुए थे, इसलिए इस की खबर कालोनी वालों को भी नहीं थी। सिर्फ पड़ोसी ही जानते थे पर किसी ने मुंह नहीं खोला।

भीड़ जब छंटने लगी तो सहसा सोमेश सर की नजर जोसफ पर पड़ी, जो रनओवर स्पौट पर रेलवे ट्रैक को क्लीयर करने वाले सफाईकर्मियों की मदद कर रहा था। बिजली की मानिंद उन के जेहन में एक शंका कौंधी। कहीं यह मृत गाय जोसफ की तो नहीं? वे लंबेलंबे डग भरते हुए जोसफ के पास पहुंचे और उस के कंधे पर हाथ रख कर धीरे से पूछा, “तुम्हारी गाय?”

“नहीं…वह तो गोपाल बाबू के ग्वालघर में है।”

“क्या?” सोमेश सर जैसे आसमान से गिरे। जिस व्यक्ति को जोसफ का गाय पालना नागवार गुजर रहा है, उस के घर में जोसफ की गाय… उन के मन में एक और शंका उभरी कि कहीं जोसफ ने मारिया को बेच तो नहीं दिया। जोसफ के मुंह से ही शंका का निवारण चाह रहे थे, “लेकिन तुम्हारी गाय वहां क्यों?”

“उन की तीनों गायों के जिंदा होने के सुबूत के लिए।”

“मतलब…मैं समझा नहीं जोसफ… साफसाफ कहो न…”

“गंगा, जमुना और सरस्वती ये तीनों गायों को जीवित दिखाने के लिए वे मेरी मारिया को ले गए।”

“उन की 3 गाएं और तुम्हारी 1 कुल 4 हुए न?” जोसफ की बातें उन्हें पहेली जैसी लग रही थीं। गुस्सा भी आ रहा था उन्हें। सीधी सी बात को पेचीदा बना कर क्यों उलझा रहा है।
जोसफ तफसील से बताने लगा कि घंटाभर पहले गोपाल बाबू उस के पास दौड़तेहांफते आए और हाथपैर जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे,”कुछ घंटे के लिए मारिया को मुझे दे दो जोसफ भाई।”

“लेकिन क्यों?” जोसफ ने हैरानी से पूछा।

“देख भाई, मेरी गाय गंगा रेलवे ट्रैक पर रनओवर हो गई है। अब कानूनी काररवाई शुरू हो जाएगी और हम बुरी तरह फंस जाएंगे।”

“तो मारिया को ले कर क्या करेंगे?”

“मारिया को गंगा बना कर दिखा देंगे कि हमारी तीनों गाय जिंदा हैं।”

“लेकिन…” जोसफ की दुविधा वाली स्थिति को भांपते हुए गोपाल बाबू उस के पैर पर गिर पड़े, “देख भाई, न मत कहो…इस मुसीबत से तुम ही मुझे उबार सकते हो…जीवनभर नहीं भूलेंगे तुम्हारा यह उपकार।”

जोसफ इनकार नहीं कर सका। गोपाल बाबू ने मारिया को घर ले जा कर झटपट जमुना और सरस्वती के साथ बांध दिया। गोपाल बाबू की प्यारी गंगा जा चुकी थी। अब उस की भूमिका में मारिया थी, मुसीबत के फंदे से उन्हें बचाने वाली मारिया।

मामले की असलीयत से वाकिफ होते ही सोमेश सर का मुंह अचरज से खुला का खुला रह गया। उन्हें गौभक्त गोपाल बाबू के चेहरे पर किसी कसाई का चेहरा चस्पां नजर आने लगा।

लेखिका-मार्टिन जौन

जब मां बाप युवाओं की आवश्यकता न समझें 

“पापा  आप ने यह बहुत गलत किया. मेरे दोस्तों के आगे मेरी इंसल्ट की. वैरी बैड पापा. “
“ऐसा क्या गलत कर दिया मैं ने? तुझे इतना ही कहा न कि रात में पार्टी करने नहीं जाएगा. इस में गलत क्या है? रात के समय कितने क्राइम होते हैं. “
“यार पापा मैं क्या कोई दूध पीता बच्चा हूं जो रात में आ कर मां के हाथ से बोतल में दूध पियूंगा और फिर लोरी सुनते हुए सो जाऊंगा. समझने की कोशिश करो पापा. मेरा अपना सर्कल है. मैं अपने हिसाब से जीना चाहता हूँ. हर कदम पर मुझे गाइड मत किया करो. ‘
“हां हम तो अब तेरी नजर में मूर्ख हो गए न. सारी अक्लतेरे अंदर आ गई. तुझे पालने में अपना खूनपसीना एक कर दिया और जनाब अब हमें ही सीख देने लगे हैं. “
“पापा आप लोग तो मुझे समझते ही नहीं. आप से कुछ कहना ही बेकार है,” कह कर दिवेश ने जोर से अपने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया.
इस तरह की घटनाएं अक्सर हमें अपने आसपास देखने को मिल जाती हैं जब घर में छोटीछोटी बातों पर पेरैंट्स और युवाओं के बीच कहासुनी होने लगती है. दोनों को लगता है कि सामने वाला हमें समझ नहीं रहा.
देखा जाए तो पिछले कुछ समय में लोगों की सोच, रहनसहन और जीवनशैली में काफी बदलाव आए हैं. समय बड़े रफ्तार से आगे बढ़ रहा है. इसी के साथ युवाओं के जीने का तरीका बदला है. स्वछंद वातावरण के साथ ही हर तरफ कम्पटीशन बढ़ता जा रहा है. इस भौतिक युग में ऊंचे मुकाम को हासिल करने के लिए अक्सर महत्वपूर्ण रिश्तों को त्यागने से भी लोग गुरेज नहीं करते.
ऐसे में जब बात आती है मातापिता के साथ युवाओं के रिश्ते की तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऊपर से भले ही सब बदल रहा हो पर जो प्यार इस रिश्ते में होता है वह अब भी कायम है. एक सर्वे में पाया गया है कि 75 प्रतिशत युवा अपने पैरेंट्स के साथ ही रहना पसंद करते हैं परंतु अक्सर परिस्थितियां उन्हें अलग रहने को भी मजबूर करती हैं. कभी अच्छी पढ़ाई के लिए तो कभी शिक्षा के बाद कैरियर बनाने के लिए युवाओं को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है. अपने शहर से बड़े शहर और बड़े शहर से विदेश का सफर आज युवाओं के कैरियर ग्राफ़ को बढ़ाने की जरूरत बन चुका है. इस तरह मातापिता और युवाओं के बीच एक दूरी आती है जो युवाओं के सोचने की दिशा भी बदल देती है. जो युवा घर में पेरैंट्स के साथ हैं उन की भी सोच अपने दोस्तों और सोशल मीडिया से प्रभावित होती रहती है.
आज के समय में ज्यादातर युवा स्वतंत्र माहौल में रह कर दोस्तों के साथ मौजमस्ती करना, देर रात तक जागना, पार्टी करना जैसी मानसिकता के साथ जीवन बिताना पसंद करते हैं तो वहीँ पेरैंट्स इसे गलत मान कर युवाओं को सीख देने लगते हैं. सच तो यह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों की सोच और जीवन जीने के तरीके में बदलाव निश्चित है. इसे ही जेनरेशन गैप कहते हैं. आपसी तालमेल बिठाए रखने के लिए जरुरत है कुछ तुम बदलो और कुछ हम बदलें, वाले सिद्धांत को स्वीकार करना.
युवाओं को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जिंदगी के उतारचढ़ाव में, हर कठिन मोड़ पर मातापिता से बढ़ कर कोई शुभचिंतक नहीं होता. उन के न होने से जीवन में अधूरेपन का एहसास हमेशा होता है. आप के सुख, समृद्धि, खुशी और ऊँचाई हासिल करने पर देखने वाली सब से प्यारी आंखें मातापिता की होती हैं. इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि एक बच्चे को जितना उस के मातापिता समझते हैं उतना कोई नहीं समझ सकता. एक बच्चे के लिए क्या सही है और क्या गलत, इस बात का फैसला मांबाप से बेहतर शायद ही कोई कर सकता हो.
वहीं दूसरी ओर लगभग हर बच्चे के लिए उस के मम्मीपापा ही पहले रोल मॉडल होते हैं. पैरेंट्स की छोटी से छोटी आदतें भी बच्चों पर बहुत गहरा प्रभाव डालती हैं. साइकोलॉजी की इमिटेशन थ्योरी से ये साबित भी होता है कि बच्चे सामाजिक व्यवहार अपने मातापिता से ही सीखते हैं. ऐसे में जब पेरैंट्स आप की कुछ बातों या आदतों से सहमत न हों तो आप को बहुत धैर्य से इस समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए.
 *युवाओं की कुछ बातें जो पेरैंट्स नहीं समझते* 
1. कई बार पेरैंट्स अपने युवा बच्चों के लुक्स, पहनावे और करियर को ले कर उस की आलोचना करने लगते हैं. वे यह नहीं समझते कि उन का बच्चा आज के समय के अनुरूप खुद को ढालना चाहता है न कि पुरानी सोच के हिसाब से. युवाओं को कई बार पैरेंट्स के हिसाब से चलने पर दोस्तों के आगे शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. ऐसे में आगे चल कर उसे डिप्रेशन और चिड़चिड़ेपन की शिकायत हो सकती है. क्यों कि जो पेरैंट्स की नजर में अच्छा है जरुरी नहीं कि वह आज के फैशन के हिसाब से भी सही हो. बच्चों को इस मामले में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. हां यह बात अलग है कि उन का पहनावा और लुक्स मर्यादा की सीमारेखा के अंदर हो. यही बात करियर के मामले में भी लागू होती है. बच्चा वही फील्ड चुनना चाहता है जो उसे पसंद है पर पेरैंट्स उन के जरिये अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं जो उचित नहीं है.
2. आजकल के पेरैंट्स को अपने युवा बच्चों से यह शिकायत भी रहती है कि वे सारा समय गैजेट्स जैसे लैपटॉप, मोबाइल आदि में लगे रहते हैं. उन के पास बातें करने के लिए समय नहीं होता. यह सच है कि अक्सर युवा बच्चे अपने दोस्तों या गर्ल/बॉयफ्रेंड्स में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे पेरैंट्स को समय नहीं देते. इस के लिए पेरैंट्स को इस मामले में शुरू से ही स्ट्रिक्ट रहना चाहिए.
मगर बात यह भी सही है कि आज के समय में युवा बच्चों को बहुत सा समय गैजेट्स पर इसलिए भी बिताना पड़ता है क्योंकि गैजेट्स आजकल पढ़ाई और इनफार्मेशन का मुख्य जरिया बन चुका है. आज की गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में वे इन के सहारे ही आगे बढ़ सकते हैं. आज के बच्चे तकनीकी बातों में बहुत होशियार रहते हैं और यह आज के समय की मांग है. सिर्फ पढ़ाई ही नहीं ऑफिस का सारा काम भी आजकल गैजेट्स के सहारे ही होता है और यह बात पेरैंट्स  को समझनी होगी.
3. कई मांबाप की यह आदत होती है कि वे अपने बच्चों को लड़का या लड़की होने के अनुसार व्यवहार करने के लिए कहते हैं. जैसे अगर लड़की है तो उन्हें यह नसीहत दी जाती है कि वे स्पोर्ट्स में भाग न लें या लड़कों वाले कपड़े न पहनें आदि. लड़कों को अक्सर अपनी भावनाओं को छिपाने की सलाह दी जाती है. उन्हें कहा जाता है कि वे मजबूत हैं, उन्हें रोना नहीं है. कई बार ऐसे हालात युवाओं में डिप्रेशन पैदा करते हैं. ऐसा करने से बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
जरूरी है कि पेरैंट्स उन्हें समझें और उन की पसंद और स्वभाव के हिसाब से जीने दें. उन पर कोई खास किरदार निभाने का भार न डालें. हर इनसान दूसरे से अलग होता है. उस की परिस्थितियां भी अलग होती हैं. अपने बच्चों से यह अपेक्षा नहीं रखी जा सकती कि वे आप की सोच के हिसाब से चलेंगे. उन्हें उन की जिंदगी जीने देनी चाहिए.
4. अक्सर यह देखा जाता है कि युवा वर्ग की सोच शादी विवाह के मसले में अपने पेरैंट्स से काफी अलग होती है. पेरैंट्स जहाँ अपने बच्चों को कम उम्र में ही शादी कर सेटल हो जाने की सलाह देते हैं वहीँ युवा जल्दी शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहते. वे थोड़ा समय मौजमस्ती में बिताना चाहते हैं. अपने करियर के मामले में मुकाम हासिल कर लेने के बाद शादी की बात सोचना चाहते हैं. यही नहीं आज के युवा धर्म, जाति या कुल और हैसियत देख कर नहीं बल्कि कम्फर्ट लेवल देख कर जीवनसाथी चुनना चाहते हैं. कई बार वे पहले लिवइन में रहने की बात भी सोचते हैं. यह सब पेरैंट्स को रास नहीं आता और इस बात पर अक्सर पैरंट्स और युवाओं में ठन जाती है.
इस मामले में पेरैंट्स को थोड़ा लिबरल होना होगा. उन्हें समझना होगा कि जिंदगी उन के बच्चों को जीनी है. वे जिस के साथ जीना चाहते हैं उन के साथ जीने दें. क्योंकि इस मामले में जब तनाव बढ़ता है तो किसी का भला नहीं होता. कई बार घर बर्बाद हो जाते हैं. हॉनर किलिंग, आत्महत्या जैसे कदम उठा लिए जाते हैं पर युवा अपने प्यार को भूल नहीं पाते. इसलिए बेहतर है कि बच्चॉं की ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी ढूंढें और उन की भावनाओं को समझें.
5. अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से कभी नहीं करनी चाहिए. न ही दोस्तों के आगे अपने युवा बच्चों को डांटना चाहिए. ऐसा करने से आप के बच्चे के आत्मसम्मान को ठेस पहुंच सकती है. दोनों के बीच रिश्ता और खराब हो सकता है. किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए एकदूसरे को समझने और अपने प्यार का अहसास दिलाने की जरुरत होती है.
 *युवा क्या करें* 
अपने पेरैंट्स को प्यार से समझाएं. आप के उम्रदराज पैरंट्स की सोच अपने समय के हिसाब से सही है. आप उन की सोच को बिल्कुल से नकार नहीं सकते. आप उन्हें अपने दिल की बात समझा सकते हैं, अपनी जरूरतों और मजबूरियों से अवगत करा सकते हैं पर जबरदस्ती इस बात के लिए मजबूर नहीं कर सकते कि वे आप की बात समझें ही. इसलिए बेहतर है की सब से पहले प्यार से उन्हें अपनी बात समझाने का प्रयास करें. जरूरत पड़े तो फिर उदाहरण दे कर अपने कथन की सत्यता साबित करें. उन से निवेदन करें कि वे आप को अपने मन का करने दें. पर भूल कर भी उन पर चीखेचिल्लाएं नहीं. कभी भी दूसरों के आगे उन की बेइज्जती न करें. हो सके तो कभीकभी उन की बात भी मान लें ताकि उन्हें यह न लगे कि आप हमेशा उन की अवज्ञा ही करते हैं. याद रखें पेरैंट्स की बात आप को भले ही गलत लग रही हो मगर कहीं न कहीं वे आप का भला सोच कर ही कुछ भी कहते हैं. उन से ज्यादा आप का भला चाहने वाला और कोई नहीं होता. इसलिए अपने पेरैंट्स को अहमियत देना न भूलें.

पति, बेटा और सहेली तीनों मुझसे नाराज हैं, इस स्थिति से कैसे निकलूं ? 

सवाल

मेरी सहेली की बेटी और मेरा बेटा एकदूसरे से शादी करना चाहते हैं. हुआ यों कि उन दोनों का कालेज एक था, जहां उन्हें एकदूसरे से प्यार हो गया. मुझे अपनी दोस्त की बेटी से कोई परेशानी नहीं है लेकिन पता नहीं क्यों इस शादी के लिए मेरा मन नहीं मान रहा. मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरी अपनी बहू को लेकर जो अपेक्षाएं हैं वे पूरी होंगी भी या नहीं. इस बारे में मैं ने अपनी सहेली से बात की तो वह मुझ पर भड़क उठी और अब उस ने रिश्ता ही तोड़ दिया है. बेटा भी मुझ से बात नहीं कर रहा, पति भी नहीं और सहेली भी नहीं. इस स्थिति से कैसे निकलूं?

जवाब

देखिए, आप ने हंसतेखेलते बच्चों के जीवन को उथलपुथल तो किया ही है, साथ ही, अपनी दोस्त को भी पीड़ा पहुंचाई है. आप का यह डर कि बहू के तौर पर दोस्त की बेटी अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाएगी, निरर्थक है, क्योंकि आजकल कब कौन क्या कर जाए, पहले से अंदाजा लगाना लगभग नामुमकिन है. इस स्थिति में हो यह सकता है कि आप अपनी दोस्त से माफी मांगें और उसे बताएं कि आप ने जो कुछ भी कहा एक मां होने के नाते कहा, बिलकुल वैसे ही जैसे उन्होंने आप की बात एक सहेली के नाते नहीं, मां होने के नाते सुनी थी. अब गलती की है तो उस का एहसास करें और रिश्ते को फिर से जोड़ें अपने बच्चों की खातिर इतना तो आप कर ही सकती हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

कहीं नकली मसालों को असली समझने की गलती आप तो नहीं कर रहे, तो हो जाएं सतर्क

बैन का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि दिल्ली में नकली मसाले बनाने वाले गिरोह को गिरफ्तार किया है जिनके पास से 15 टन नकली मसाला बरामद हुआ है जो देखने में बिलकुल असली मसाले लगते हैं. ऐसे में असली नकली मसालों की पहचान कैसे हों, खासकर महिलाओं के लिए यह जानना मुसीबत बना हुआ है.

सुगंध से जानें

मसालों की तेज खुशबू इनके असली होने की पहचान होती है मसाले की थोड़ी मात्रा अपने हाथ में लें और इसे अपनी उंगलियों के बीच मसलें, यदि आप ऐसा करते हैं तो मसाले की तेज खुशबू असली होने की पहचान है. खुले मिलने वाले मसाले तो मिलावटी हो ही सकते हैं, क्योंकि उनकी कहीं कोई जांच नहीं होती. इसलिए परखना जरूरी है.

पानी में डालें

काली मिर्च को एक गिलास पानी में डाले मसाला असली होगा तो गिलास के तले में बैठ जाएगा और नकली होगा तो वह तैरता रहेगा.

तवे पर सेकें

तवे को आंच पर रखें व थोड़ा सा मसाला उस पर रखें यदि मसाले समान रूप से जलेंगे और अपनी खुशबू छोड़ेंगे तो वह असली है अन्यथा नकली मसाला अत्यधिक धुआं, गंदी स्मेल छोड़ेंगे.

इन मसालों को ऐसे पहचानें-

मिर्च व हल्दी

लाल मिर्च, हल्दी पाउडर को यदि पानी मे मिलाने पर पूरी तरह घुल जाए तो वह असली है अन्यथा नकली.

धनिया पाउडर

धनिया पाउडर की महक इतनी तेज होती है कि इसकी खुशबू ही इसकी पहचान होती है यदि खुशबू आती है तो मसाला असली है अन्यथा वह मिलावटी है.

दाल चीनी

दालचीनी के कुछ टुकड़े लेकर अपने हाथ पर रगड़कर देखें. अगर दालचीनी से लाल या भूरा रंग निकलता है, तो समझ जाएं कि ये असली दालचीनी है.

जीरा

जीरे की पहचान के लिए जीरा दो उंगलियों की बीच में रगड़कर देखना है. यदि जीरा असली है तो आपकी उंगलियां काली नहीं होंगीऔर यदि नकली होगा तो उंगली काली हो जाएगी.

मेरी पत्नी बार-बार अपना घर बनवाने के लिए फोर्स कर रही है, बताइए मैं क्या करुं?

सवाल

मैं नौकरीपेशा व्यक्ति हूं. प्राइवेट नौकरी करता हूं और किराए के मकान में रहते हुए 15 साल हो चुके हैं. मेरे पास 150 गज का एक प्लौट है. पत्नी मेरे पीछे पड़ी है कि उस प्लौट पर अपना मकान बना लेना चाहिएकब तक किराए के मकान में रहते रहेंगे और किराया भरते रहेंगे. वही पैसा अपने मकान में क्यों न लगाया जाए. मुझे भी लगता है कि खुद का मकान बना लेना चाहिए. लोन भी बैंक से मिल रहा हैबससम झ नहीं आ रहा कि मकान बनाने के काम बिल्डर को सौंप दूंक्या फायदेमंद रहेगाक्योंकि खुद मकान बनवाना मेरे बस की तो बात नहीं और न ही मुझे कुछ इस काम की नौलेज है.

जवाब

घर बनवाने की आप को कोई नौलेज नहीं है तो मकान बनवाने का काम बिल्डर को देना ही फायदेमंद होगा. लेकिन इस से पहले आप को बिल्डर के बारे में पूरी जानकारी लेनी होगीतभी बिल्डर को काम देना फायदेमंद हो सकता है.

आप कुछ प्रश्न पूछ सकते हैंजैसे उस के पास निर्माणकार्य के लिए बीएसएसआई या अन्य प्रमाणपत्र हैं. आप को जानना चाहिए कि बिल्डर के पूर्व ग्राहक कौन थे और उन्होंने उस से किस प्रकार का निर्माणकार्य करवाया था. बिल्डर के पास वर्तमान में किसी निर्माणकार्य पर उपयुक्त अभियंता और श्रमिक हैं जो संगठित ढंग से कम कर रहे हैं?

आप बिल्डर से पूछें कि निर्माण के दौरान उस की जिम्मेदारी क्या होगी और कितने समय में काम पूरा होगाघर के निर्माण में कौन सी तकनीकें इस्तेमाल की जाएंगी और इन की विशेषताएं क्या होंगीनिर्माणकार्य के लिए किस प्रकार के सामान और मजदूरों की जरूरत होगीनिर्माणकार्य की लागत क्या होगी और यह कितने समय में पूरा होगानिर्माणकार्य के दौरान घर के रखरखाव का कौन सा विकल्प होगा?

निर्माणकार्य के दौरान अगर कोई समस्या आती है तो उसे कैसे हल करेंगेघर के निर्माण के लिए कौन से डौक्यूमैंट्स की आवश्यकता होगीनिर्माणकार्य के बाद घर की गारंटी क्या होगी और यह कितने समय तक होगीबिल्डर और आप के बीच लिखित अनुबंध में सम झौता होना चाहिए ताकि बिल्डर अपनी कही बातों से मुकर न जाए.

अंत में बिल्डर को काम देने से पहले आप को स्थानीय मार्केट में उपलब्ध अन्य बिल्डरों से भी मूल्य तुलना करनी चाहिए. आप को सब से उचित मूल्य पर बिल्डर का चयन करना चाहिए.

Summer Special: गरमी में सही शैम्पू का इस्तेमाल है जरूरी

गरमी में जितना असर स्किन पर पड़ता है उससे कईं ज्यादा असर बालों पर पड़ता है. गरमी में हम बौडी पर आने वाला पसीना तो साफ कर देते हैं लेकिन सिर में आने वाला पसीना हमारे बालों को नुकसान पहुंचा देता है. और अगर हम गलत शैम्पू चुनते हैं तो यह बालों की कईं प्रौब्लम्स का कारण बन जाते हैं. बालों की प्रौब्लम्स के चलते सही शैंपू चुनना जरूरी है. इसके लिए आज हम आपको कुछ खास टिप्स बताएंगे, जिससे आप समर में भी अपने बालों की केयर सही ढ़ंग से कर पाएंगे.

1. बालों के हिसाब से चुनें शैम्पू

अगर आप के हेयर ग्रीसी यानी चिपचिपे हैं तो मार्केट में कई प्रकार के ग्रीसी हेयर शैंपू मिलते हैं, जो ग्रीसी हेयर को ठीक कर सकते हैं. बार-बार आम शैंपू लगाने से बालों और स्कैल्प का औयल कम हो जाता है, जिससे बालों में डैंड्रफ हो जाता है और उन का झड़ना भी बढ़ जाता है. इस मौसम में बाहर जाने से पहले सीरम जरूर प्रयोग करें.

2. हेयर कलर या डैंड्रफ के लिए अलग शैम्पू का करें इस्तेमाल के लिए

शैंपू हेयर टैक्स्चर के आधार पर प्रयोग करें. कई बार पूरा परिवार एक ही शैंपू का प्रयोग करता है, जो ठीक नहीं. अगर आप ने हेयर कलर किए हैं तो उस शैंपू का प्रयोग करें, जो कलर न उतारे और यदि बालों में डैंड्रफ है, तो डैंड्रफ हटाने वाले शैंपू का प्रयोग करें. इसी तरह अगर बाल डैमेज हो रहे हों तो हेयर रिपेयर करने वाले शैंपू का प्रयोग करें.

3. बालों का टैक्स्चर जरूर जान लें

शैंपू खरीदने से पहले बालों का टैक्स्चर जरूर जान लें. कई बार महिलाएं कर्ली बालों को फ्रीजी बाल समझती हैं.

4. हेयर औयलिंग वाले शैम्पू भी कर सकते हैं इस्तेमाल

मौनसून में हेयर औयलिंग बहुत आवश्यक है. इस से बेजान बालों में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है. उन की ग्रोथ बढ़ती है, क्योंकि मसाज से औयल बालों की जड़ों तक पहुंचता है. महीने में 2 बार 2 घंटों तक बालों में औयल लगा कर रखना पर्याप्त होता है. आजकल बाजार में औयल के गुण वाले शैंपू भी उपलब्ध हैं.

5. 15 दिन के गैप में करें हेयर कलर

आजकल अधिकतर महिलाएं हेयर कलरिंग करती हैं. अत: बारिश के मौसम में कलर प्रोटैक्ट रेंज का प्रयोग ठीक रहता है. इसमें शैंपू, कंडीशनर इत्यादि शामिल हैं. एक बार कलर करने के बाद बालों को दोबारा 15 दिनों के बाद ही कलर करें. कलर के बाद शैंपू, कंडीशनर लगाने से बाल ठीक रहते हैं. अगर डैमेज हो रहे हों और पोरस भी हैं, तो रैस्टोर वाला शैंपू या फिर हेयर मास्क लगाना सही रहता है.

विधवा हुई कोई अपराध तो नहीं किया

रूबीना एक कसबे में महीनाभर पहले विधवा हुई. उस की उम्र 30-32 साल है. शादी के 10 साल हो गए थे. सास बहुत तेज है. बहू से अकसर तूतूमैंमैं करती रहती है. महल्लेवाले सासबहू को ले कर चटखारे लेते रहते हैं.

पति बस का ड्राइवर था, जिस की रोड ऐक्सिडैंट में मौत हो गई. फिर क्या था, अब तो सास को रूबीना और भी फूटी आंख न सुहाती. तरहतरह के विभूषणों से बहू नवाजी जाने लगी. ‘करमजली, डायन, पति को खा कर चैन पड़ गया सीने में ‘कुलक्षिणी’. अब जाने क्याक्या उस के कुलक्षण थे.

रूबीना बच्चों के एक क्रेच में आया है. हाथ में कुछ पैसे आते हैं तो घरखर्च चलाने के बाद अपनी मरजी खर्चती है, सास से बिना पूछे. सजनासंवरना, ठेले पर चाटपानीपुरी खाना या फिर शाम के शो में कभी पिक्चर ही चले जाना. और एक गलती उस की यह भी है कि उसे बच्चा नहीं था. चाहे पतिपत्नी दोनों में से किसी में कमी हो, बच्चा न हुआ, तो हो गई वह कुलक्षिणी.

अब पति का श्राद्ध निबटा कर फिर से वह अपनी दिनचर्या में आ गई, यानी क्रेच में काम पर जाना, दिनभर शाम तक घर का काम करना और फिर शाम को दुकानों में ठेलों पर घूमना,  खरीदना, खाना, ठहलना और साजश्रृंगार की चीजें खरीदनापहनना. मगर न घर में चैन था, न बाहर. टोकने वाले टोकते या उस की छीछी करते, तो वह बिफर पड़ती.

‘क्या किसी के खसम का खा रही हूं मैं? अपना कमाती हूं, दिनभर घरबाहर खटती हूं, बुढ़िया को बैठा कर खिलाती हूं फिर क्यों न पहनूं? पति था भी तो कौन सा सोहाग करता था मुझ से? चारछह महीने में घर आ कर 5 हजार रुपए कर जाता तो अगले तीनचार महीने फिर खबर ही नहीं. जाने कहांकहां मुंह मार चुका था. मैं ने तो कई बार खुद पकड़ा. तो, अब उस के लिए रोने बैठी रहूं.’

लोगों को उस की जबान पर बड़ा ताज्जुब होता. विधवा हो कर इतनी जबान चले. सभी उस की सास की आग में और घी डाल जाते. लेकिन हम उन लोगों से पूछते कि रूबीना गलत भी कहां है? पति साल में चारछह बार आ कर छहआठ हजार रुपए दे कर अपना काम खत्म समझे. जिस के रहने, न रहने से रूबीना को खास फर्क भी न पड़ा, उस के चले जाने से वह अपनी जिंदगी को मातम का काला साया बना कर खानापहननाघूमना सब छोड़ दे? क्या समाज इस के लिए उसे सर्टिफिकेट देगा? या उसे पद्मभूषण की उपाधि मिलेगी? या उस का मरा हुआ पति जीवित हो जाएगा?

अब आइए एक हाई क्लास मौर्डन फैमिली के 60 साल की बुजुर्ग महिला का हालेदिल लें. डाइनिंग का यह माहौल है. वह अपने बेटे, बहू और पोते के साथ कहीं किसी के घर गेस्ट हो कर आई हैं. खाने में वेज-नौनवेज सबकुछ है. बुजुर्ग विधवा महिला सर्विंग बाउल से अपनी प्लेट में कुछ टुकड़े नौनवेज के लेती है.

बहू और उस की हमउम्र होस्ट सहेली एकदूसरे को देखती हैं. दोनों के होंठों के बीच हलकी व्यंग्यभरी मुसकान ऐंठ कर दबी होती है. बुजुर्ग महिला का बेटा यह समझता है और सब को सुना कर अपनी मां से कहता है, ‘मां नौनवेज की दूसरी डिश ट्राई करो.’ फिर अपने दोस्त की पत्नी की तरफ देख कर कहता है, ‘दरअसल, डाक्टर ने मां को नौनवेज खाने की सलाह दे रखी है. पापा के जाने के बाद से उन की तबीयत बहुत खराब रहने लगी थी.’

बुजुर्ग महिला का नौनवेज फेवरिट था लेकिन इतनी कैफियतें सुन खाने से मन उठ गया. वह सोच रही थी कि नौनवेज खाना या न खाना खुद की चौइस क्यों नहीं हो सकती? क्यों सेहत या कमजोरी का बहाना बनाना पड़ा? अपने पति के प्रति प्रेम, लगाव क्या किसी के खाने से जुड़ा मसला होना चाहिए? गोया कि पति नहीं, तो क्या पसंद का खाना भी नहीं, क्योंकि पसंद का खाया, पहना तो अब पति के प्रति प्रेम को प्रमाणित नहीं किया जा सकता. दूसरे, नौनवेज खा लिया तो अब शरीर की भूख इतनी बढ़ जाएगी कि पुरुष देखते ही उस के साथ भाग जाने को मन करेगा. हद हो गई लकीर के फकीरों की. यह आज के समाज का चित्र है और कुछ नहीं.

भारतीय समाज में एक स्त्री शादी के बाद जैसे हमेशा ही प्रमाण देती रहती है कि वह अपने पति के प्रति समर्पित है. पति ही उस का सबकुछ है और, दरअसल, तभी समाज में उस का एक स्थान होता है. ठीक उसी तरह पति की मृत्यु के बाद भी एक विधवा स्त्री इस स्थिति में रहती है कि उसे हर वक्त यह प्रमाणित करते रहना पड़े कि पति के जाने के बाद भी वह पति को ही जपती रहेगी. उस के सिवा उस की जिंदगी का कोई महत्त्व नहीं है और वह यह बात स्वीकार करती है.

एक विधवा स्त्री अगर भावनात्मक रूप से इस कदर पति से जुड़ी है कि वह खुद ही सबकुछ त्याग कर जीना चाहे, इसी में उसे खुशी मिले तो बात जबरदस्ती की नहीं होती. लेकिन जिस स्त्री को विवाह में पति से दुख ही मिला हो या उसे पति के लिए विलाप ही करते रहने से अच्छा मूव औन कर जाना ज्यादा सही और व्यावहारिक लगता हो, तो उसे पति के नाम पर जिंदगीभर मातमपुरसी करते रहने की बाध्यता क्यों हो?

यहां पुरुषों से तुलना तो बनती है. आखिर हर बात में संविधान से ले कर समाज तक बराबरी का दंभ भरने वाला कानून किस कोने में जा कर छिप जाता है जब बात स्त्री के दैनिक जीवनधारण की आती है?

इतिहास के पन्नों में विधवा स्त्री

हम बात करें हिंदू समाज की विधवाओं की, क्योंकि इस धर्म में विधवाओं को ले कर ऐसे कड़े नियमकानून थे, अब भी मानसिकता वही है, कि लगता है जैसे विधवा हो जाने से स्त्री ने कोई जानबूझ कर अपराध किया है, जिस के लिए उसे सजा पाना है.

मध्यकाल से पहले तक यानी वैदिककाल में स्त्रियों की स्थिति बेहतर थी. यद्यपि तब विधवाओं के जीवनयापन में बेड़ियां थीं लेकिन जीवन आज से पूरी तरह अलग था और इस से उन के सम्मान की हानि नहीं थी.

बात तब बिगड़ी जब मनु ऋषि ने स्त्री को आजन्म पिता, पति और पुत्र के अधीन ही रहने का फरमान सुना दिया. इस के बाद तो भारत में साम्राज्य विस्तार हेतु सैकड़ों आक्रमण हुए और उस दौरान राजाओं और मुगल, अफगान, पठान शासकों और आक्रमणकारी दलों की शिकार स्त्रियां या फिर विधवा स्त्रियां ही बनती रहीं.

मजबूरन सामाजिक पंचायतों द्वारा स्त्री और परिवार की मानमर्यादा की सुरक्षा हेतु स्त्रियों, खासकर विधवा स्त्रियों, पर घोर पाबंदियां लगाई गईं और लगाई जाती रहीं. जबकि, स्त्रियों पर ढेरों नियम न थोप कर उन की सुरक्षा के नियम कड़े किए जाने उचित होता.

आगे चल कर मध्यकाल और उस के बाद ऊंची जातियों की विधवा स्त्रियों पर ऐसी बेड़ियां थोपी गईं और उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से यह बात मानने को बाध्य किया जाता रहा कि पति की मृत्यु स्त्री के घोर पाप और अपराध का फल है और इस पाप के बदले उस ने अपना सारा सुख, सारी सुविधा का त्याग नहीं किया तो ईश्वर, जो कहीं है भी कि नहीं, उसे कभी माफ नहीं करेगा और यदि उस ने चोरीछिपे कुछ अच्छा खापहन लिया तो उसे भयानक सजा ‘तथाकथित’ ईश्वर की ओर से मिलेगी.

इन बातों को घोल कर पिलाने के लिए उन्हें शिक्षा से दूर रखा जाने लगा और कम उम्र में कुलीन ब्राह्मण के नाम पर बूढ़े बीमार लोगों के विवाह में दे कर उन्हें जानबूझ कर वैधव्य की ओर धकेला जाता रहा.

स्थिति जघन्य हो चुकी थी और सारे भारत में सतीप्रथा को अत्यंत पूजनीय स्थान दे कर जलती चिता में मृत पति के साथ स्त्रियों को जिंदा जलाया जा रहा था. इस घोर अंधविश्वास और अन्याय के युग में ईश्वर चंद्र विद्यासागर युग प्रवर्तक के रूप में सामने आए. उन के अथक प्रयासों व लंबी लड़ाई के बाद वर्ष 1856 में विधवा पुनर्विवाह कानून लागू हुआ. ज्ञात हो, ईश्वरचंद विद्यासागर ने खुद अपने बेटे का ब्याह एक विधवा कन्या से करवाया था.

ये विधवा महारानियां

रानी लक्ष्मीबाई, गोरखपुर के निकट तुलसीपुर की रानी ईश्वर कुमारी, अनूप नगर के राजा प्रताप सिंह की पत्नी चौहान रानी, मध्य प्रदेश के रामगढ़ रियासत की रानी अवंतिका लोधी, नाना साहेब पेशवा की पुत्री मैना, सिकंदर बाग की वीरांगना उदा देवी… किसकिस का नाम लें, जिन्होंने पति की मृत्यु के बाद न केवल राजगद्दी और प्रजा को संभाला बल्कि राज्य के बाहरी आक्रमणकारियों और अंगरेजों की साजिशों व दबावों के विरुद्ध जम कर लड़ाइयां लड़ीं, शहीद हुईं और इतिहास से निकल कर लोगों के लिए प्रेरणा बन गईं. अगर वे विधवा होने के बाद सामाजिक दबावों के आगे सिर झुका लेतीं तो भारत की गौरवगाथा वे न होतीं जो आज इतिहास में दर्ज है.

कालांतर में विधवा स्त्रियों की दशा

विधवा पुनर्विवाह कानून के पारित होने से अब तक विधवा स्त्रियों की दशा में क्याकुछ सुधार हुए हैं, हम अपनी छिपी हुई मानसिकता को परख कर आज समझ सकते हैं.

गौर कीजिए कुछ पौइंट्स पर जब हम कुपमंडूक बन जाते हैं.

* जब खुद के घर में नौकरी या व्यवसाय करने वाले पुत्र की किसी विधवा स्त्री से ब्याह की बात आती है तो आज भी लोग तुरंत पीछे हट जाते हैं, नाकभौं सिकोड़ते हैं.

*  अपने घर में अगर जवान बेटे की मौत हो जाए, उस की विधवा पत्नी को बेटे की जागीर देने में भी आनाकानी होने लगती है. बहुत बार उसे किसी तरह टरकाने की कोशिश की जाती है.

*  जब घर में बेटे की मौत हो जाए और उस के बच्चे भी हों, बहुत कम ही परिवार ऐसे होते हैं जो अपने घर या रिश्तेदार के किसी बेटे से बहू के ब्याह को राजी हों. ज्यादातर सब की सोच यही होती है कि अब उस की अलग क्या जिंदगी होगी. बच्चे ही पाल लेगी और क्या.

* अगर कोई संयुक्त परिवार का बेटा खत्म हो जाए जहां वह संयुक्त व्यवसाय का हिस्सा रहा हो, उस की पत्नी व्यवसाय में उस का स्थान लेना चाहे तो घर के दूसरे पुरुष सदस्य उसे यह हक लेने दें, यह आज भी भारतीय परिवारों में इतना आसान नहीं है.

* विधवा स्त्री की परिवार के अन्य विवाहित सधवा स्त्रियों के मुकाबले अकसर पूछपरख और भागीदारी कम होती है. किसी शगुन वाले अनुष्ठान में वह दूरदूर से सेवा और कामकाज करे, इतना ही उस के हिस्से में है. सभा या अनुष्ठान में उस की जम कर खुशी से भागीदारी समाज और रिश्ते में आज भी आंखों की किरकिरी है.

* एक तो हिंदू विवाह में कन्यादान की रीति कन्या को वस्तु समान बनाती है जिसे दान किया जा सके, तिस पर वह भी विधवा स्त्री को हक नहीं कि वह पिता के अभाव में अपनी बेटी के ब्याह के वक्त धार्मिक रीति निभा सके. यह कितनी अपमानजनक स्थिति है जिसे मानने की बाध्यता ने अपनाना आसान कर दिया है. समाज तो है ही, विधवा स्त्री भी खुद को तुच्छ समझ कर हर अधिकार से खुद को निकाल ले जाती है.

* इन सब के उलट आज की मौर्डन विधवा स्त्री स्वतंत्रता से जीने और अपने सामान्य प्राकृतिक, सामाजिक अधिकारों के लिए विरोधी तेवर मुखर करती है तो वह अलगथलग कर दी जाती है. उस के लिए पीठपीछे कुछ उपाधियां निर्धारित कर दी जाती हैं, जैसे ‘इस के लक्षण ठीक नहीं हैं’, ‘बहुत चालू औरत है,’ ‘पति की मौत से इस के पर निकल आए’ आदि.

और अब भी अगर यह दावा किया जाए कि अब जमाना बदल गया है, विधवाएं अब बेखौफ, बेलौस जिंदगी जीती हैं तो रुख करें भारत के धर्मस्थानों और तीर्थस्थलों का. वृंदावन तो अब ‘विधवाओं का शहर’ ही कहलाने लगा है.

आज भी बंगाल, असम, ओडिशा से हजारों की संख्या में विधवाएं अपने घर और समाज से लांछित व परित्यक्त हो कर वृंदावन पहुंचती हैं और मजबूरन भगवान के नाम पर भीख मांग कर रोतेधोते गुजारा करती हैं. उन की ऐसी बदतर हालत पर सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के बाल और महिला विकास मंत्रालय को फटकार लगा चुका है कि विधवा स्त्रियों के सम्मान की क्या कहें, दो रोटी और एक सादे कपड़े भर के गुजारे के लिए उन्हें दूसरों के आगे हाथ फैलाने पड़ते हैं, विधवाओं को इस से नजात दिला कर एक सम्मान की जिंदगी देने की पहल क्यों नहीं की जाती.

विधवा स्त्रियों के हालात में सुधार हेतु कुछ जरूरी उपाय

  1. आज भी हमारे समाज में विधवा नाम से एक मैंटल ब्लौकेज बना हुआ है. पत्नी की मृत्यु के बाद पति को व्यक्तिगत जीवन में भले ही दिक्कतें हों लेकिन वह अछूत तो नहीं हो जाता. लेकिन यह क्या कि पति की मृत्यु से पत्नी समाज के अंधविश्वासों के कारण मानसिक यातना की शिकार हो जाए. शुभकार्यों में उस की उपस्थिति अनुचित मानी जाए. वह कन्यादान के काबिल न रहे. किसी शादी और शुभ अनुष्ठानों में वह अकसर सेवा तो दे लेकिन विवाहित स्त्रियों से अलगथलग पड़ जाए.
  2. हिंदू धर्म में जब तक विवाहित स्त्रियों के लिए प्रतीकचिन्ह, जैसे सिंदूर, चूड़ी, बिछिया, पायल, अल्ता जरूरी रहेंगे तब तक विधवा स्त्रियों के खानपान, रहनसहन, पहनावा पर समाज की भेदभावभरी कुदृष्टि बनी रहेगी.यदि विवाहित स्त्रियों के पहचान के लिए प्रतीकचिन्हों की बाध्यता खत्म हो तो विधवा स्त्रियों की पहचान के लिए थोपे गए तुगलकी कानून भी कमजोर हों. निसंदेह इस के लिए विवाहित स्त्रियों को ही आगे आना होगा.
  1. विधवा स्त्रियों के लिए आर्थिक जानकारी निहायत जरूरी है और इस के लिए सबकुछ भविष्य पर छोड़ना ठीक नहीं. विवाहित रहते हुए ही एक स्त्री को या तो अपने पति के निवेश के बारे में जानकारी हो जानी चाहिए या फिर पति अगर जानकारी न देता हो तो आर्थिक नियमों की जानकारी उसे किसी बाहरी स्रोत से प्राप्त कर के रखनी चाहिए. मनी मैनेजमैंमेंट, बैंकिंग, सेविंग्स, इन्वैस्टमैंट आदि की जानकारी के लिए स्त्री को शुरू से ही सतर्क रहना चाहिए. इस से किसी अनहोनी पर वह आसानी से आर्थिक मोरचा संभाल पाएगी.
  2. आर्थिक आजादी सम्मान से जीने का मुख्य आधार है और एक स्त्री को आज के जमाने में किसी भी तरह आत्मनिर्भर होना चाहिए. अगर विवाहित रहते हुए पैसे कमाने की गुंजाइश न रहे तो आज के जमाने के हिसाब से वह इतना स्मार्ट वर्क जरूर कर ले कि जब भी जरूरत पड़े, अपने मनपसंद क्षेत्र में काम ढूंढ सके.
  3. एक स्त्री को अपने कानूनी अधिकार और कानूनी बंदिशों के बारे में मालूमात होनी चाहिए. ताकि विधवा हो जाने की स्थिति में पति और ससुराल की संपत्ति में उस का या उस के बच्चों का जो भी हक है उसे मिल सके. जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाहकार की मदद से वह अपना हक सुनिश्चित कर सके.

एक तार्किक, बौद्धिक नजरिया जीवन के दुखद पहलुओं को कुछ हद तक मनोनुकूल कर सकता है. लेकिन पहल सब से पहले एक स्त्री को ही करनी होगी. यह न देखें कि जो विधवा है वह जाने, मुझे क्या? जिंदगी कब किस की किस करवट बैठे, कोई नहीं जानता. इसलिए आज के समाज में हर उस परंपरा व नजरिए का विरोध होना चाहिए जो मनुष्य होने के सामान्य अधिकार और सम्मान की रक्षा न करे.

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