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जब मां बाप युवाओं की आवश्यकता न समझें 

“पापा  आप ने यह बहुत गलत किया. मेरे दोस्तों के आगे मेरी इंसल्ट की. वैरी बैड पापा. “
“ऐसा क्या गलत कर दिया मैं ने? तुझे इतना ही कहा न कि रात में पार्टी करने नहीं जाएगा. इस में गलत क्या है? रात के समय कितने क्राइम होते हैं. “
“यार पापा मैं क्या कोई दूध पीता बच्चा हूं जो रात में आ कर मां के हाथ से बोतल में दूध पियूंगा और फिर लोरी सुनते हुए सो जाऊंगा. समझने की कोशिश करो पापा. मेरा अपना सर्कल है. मैं अपने हिसाब से जीना चाहता हूँ. हर कदम पर मुझे गाइड मत किया करो. ‘
“हां हम तो अब तेरी नजर में मूर्ख हो गए न. सारी अक्लतेरे अंदर आ गई. तुझे पालने में अपना खूनपसीना एक कर दिया और जनाब अब हमें ही सीख देने लगे हैं. “
“पापा आप लोग तो मुझे समझते ही नहीं. आप से कुछ कहना ही बेकार है,” कह कर दिवेश ने जोर से अपने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया.
इस तरह की घटनाएं अक्सर हमें अपने आसपास देखने को मिल जाती हैं जब घर में छोटीछोटी बातों पर पेरैंट्स और युवाओं के बीच कहासुनी होने लगती है. दोनों को लगता है कि सामने वाला हमें समझ नहीं रहा.
देखा जाए तो पिछले कुछ समय में लोगों की सोच, रहनसहन और जीवनशैली में काफी बदलाव आए हैं. समय बड़े रफ्तार से आगे बढ़ रहा है. इसी के साथ युवाओं के जीने का तरीका बदला है. स्वछंद वातावरण के साथ ही हर तरफ कम्पटीशन बढ़ता जा रहा है. इस भौतिक युग में ऊंचे मुकाम को हासिल करने के लिए अक्सर महत्वपूर्ण रिश्तों को त्यागने से भी लोग गुरेज नहीं करते.
ऐसे में जब बात आती है मातापिता के साथ युवाओं के रिश्ते की तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऊपर से भले ही सब बदल रहा हो पर जो प्यार इस रिश्ते में होता है वह अब भी कायम है. एक सर्वे में पाया गया है कि 75 प्रतिशत युवा अपने पैरेंट्स के साथ ही रहना पसंद करते हैं परंतु अक्सर परिस्थितियां उन्हें अलग रहने को भी मजबूर करती हैं. कभी अच्छी पढ़ाई के लिए तो कभी शिक्षा के बाद कैरियर बनाने के लिए युवाओं को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है. अपने शहर से बड़े शहर और बड़े शहर से विदेश का सफर आज युवाओं के कैरियर ग्राफ़ को बढ़ाने की जरूरत बन चुका है. इस तरह मातापिता और युवाओं के बीच एक दूरी आती है जो युवाओं के सोचने की दिशा भी बदल देती है. जो युवा घर में पेरैंट्स के साथ हैं उन की भी सोच अपने दोस्तों और सोशल मीडिया से प्रभावित होती रहती है.
आज के समय में ज्यादातर युवा स्वतंत्र माहौल में रह कर दोस्तों के साथ मौजमस्ती करना, देर रात तक जागना, पार्टी करना जैसी मानसिकता के साथ जीवन बिताना पसंद करते हैं तो वहीँ पेरैंट्स इसे गलत मान कर युवाओं को सीख देने लगते हैं. सच तो यह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों की सोच और जीवन जीने के तरीके में बदलाव निश्चित है. इसे ही जेनरेशन गैप कहते हैं. आपसी तालमेल बिठाए रखने के लिए जरुरत है कुछ तुम बदलो और कुछ हम बदलें, वाले सिद्धांत को स्वीकार करना.
युवाओं को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जिंदगी के उतारचढ़ाव में, हर कठिन मोड़ पर मातापिता से बढ़ कर कोई शुभचिंतक नहीं होता. उन के न होने से जीवन में अधूरेपन का एहसास हमेशा होता है. आप के सुख, समृद्धि, खुशी और ऊँचाई हासिल करने पर देखने वाली सब से प्यारी आंखें मातापिता की होती हैं. इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि एक बच्चे को जितना उस के मातापिता समझते हैं उतना कोई नहीं समझ सकता. एक बच्चे के लिए क्या सही है और क्या गलत, इस बात का फैसला मांबाप से बेहतर शायद ही कोई कर सकता हो.
वहीं दूसरी ओर लगभग हर बच्चे के लिए उस के मम्मीपापा ही पहले रोल मॉडल होते हैं. पैरेंट्स की छोटी से छोटी आदतें भी बच्चों पर बहुत गहरा प्रभाव डालती हैं. साइकोलॉजी की इमिटेशन थ्योरी से ये साबित भी होता है कि बच्चे सामाजिक व्यवहार अपने मातापिता से ही सीखते हैं. ऐसे में जब पेरैंट्स आप की कुछ बातों या आदतों से सहमत न हों तो आप को बहुत धैर्य से इस समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए.
 *युवाओं की कुछ बातें जो पेरैंट्स नहीं समझते* 
1. कई बार पेरैंट्स अपने युवा बच्चों के लुक्स, पहनावे और करियर को ले कर उस की आलोचना करने लगते हैं. वे यह नहीं समझते कि उन का बच्चा आज के समय के अनुरूप खुद को ढालना चाहता है न कि पुरानी सोच के हिसाब से. युवाओं को कई बार पैरेंट्स के हिसाब से चलने पर दोस्तों के आगे शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. ऐसे में आगे चल कर उसे डिप्रेशन और चिड़चिड़ेपन की शिकायत हो सकती है. क्यों कि जो पेरैंट्स की नजर में अच्छा है जरुरी नहीं कि वह आज के फैशन के हिसाब से भी सही हो. बच्चों को इस मामले में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. हां यह बात अलग है कि उन का पहनावा और लुक्स मर्यादा की सीमारेखा के अंदर हो. यही बात करियर के मामले में भी लागू होती है. बच्चा वही फील्ड चुनना चाहता है जो उसे पसंद है पर पेरैंट्स उन के जरिये अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं जो उचित नहीं है.
2. आजकल के पेरैंट्स को अपने युवा बच्चों से यह शिकायत भी रहती है कि वे सारा समय गैजेट्स जैसे लैपटॉप, मोबाइल आदि में लगे रहते हैं. उन के पास बातें करने के लिए समय नहीं होता. यह सच है कि अक्सर युवा बच्चे अपने दोस्तों या गर्ल/बॉयफ्रेंड्स में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे पेरैंट्स को समय नहीं देते. इस के लिए पेरैंट्स को इस मामले में शुरू से ही स्ट्रिक्ट रहना चाहिए.
मगर बात यह भी सही है कि आज के समय में युवा बच्चों को बहुत सा समय गैजेट्स पर इसलिए भी बिताना पड़ता है क्योंकि गैजेट्स आजकल पढ़ाई और इनफार्मेशन का मुख्य जरिया बन चुका है. आज की गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में वे इन के सहारे ही आगे बढ़ सकते हैं. आज के बच्चे तकनीकी बातों में बहुत होशियार रहते हैं और यह आज के समय की मांग है. सिर्फ पढ़ाई ही नहीं ऑफिस का सारा काम भी आजकल गैजेट्स के सहारे ही होता है और यह बात पेरैंट्स  को समझनी होगी.
3. कई मांबाप की यह आदत होती है कि वे अपने बच्चों को लड़का या लड़की होने के अनुसार व्यवहार करने के लिए कहते हैं. जैसे अगर लड़की है तो उन्हें यह नसीहत दी जाती है कि वे स्पोर्ट्स में भाग न लें या लड़कों वाले कपड़े न पहनें आदि. लड़कों को अक्सर अपनी भावनाओं को छिपाने की सलाह दी जाती है. उन्हें कहा जाता है कि वे मजबूत हैं, उन्हें रोना नहीं है. कई बार ऐसे हालात युवाओं में डिप्रेशन पैदा करते हैं. ऐसा करने से बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
जरूरी है कि पेरैंट्स उन्हें समझें और उन की पसंद और स्वभाव के हिसाब से जीने दें. उन पर कोई खास किरदार निभाने का भार न डालें. हर इनसान दूसरे से अलग होता है. उस की परिस्थितियां भी अलग होती हैं. अपने बच्चों से यह अपेक्षा नहीं रखी जा सकती कि वे आप की सोच के हिसाब से चलेंगे. उन्हें उन की जिंदगी जीने देनी चाहिए.
4. अक्सर यह देखा जाता है कि युवा वर्ग की सोच शादी विवाह के मसले में अपने पेरैंट्स से काफी अलग होती है. पेरैंट्स जहाँ अपने बच्चों को कम उम्र में ही शादी कर सेटल हो जाने की सलाह देते हैं वहीँ युवा जल्दी शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहते. वे थोड़ा समय मौजमस्ती में बिताना चाहते हैं. अपने करियर के मामले में मुकाम हासिल कर लेने के बाद शादी की बात सोचना चाहते हैं. यही नहीं आज के युवा धर्म, जाति या कुल और हैसियत देख कर नहीं बल्कि कम्फर्ट लेवल देख कर जीवनसाथी चुनना चाहते हैं. कई बार वे पहले लिवइन में रहने की बात भी सोचते हैं. यह सब पेरैंट्स को रास नहीं आता और इस बात पर अक्सर पैरंट्स और युवाओं में ठन जाती है.
इस मामले में पेरैंट्स को थोड़ा लिबरल होना होगा. उन्हें समझना होगा कि जिंदगी उन के बच्चों को जीनी है. वे जिस के साथ जीना चाहते हैं उन के साथ जीने दें. क्योंकि इस मामले में जब तनाव बढ़ता है तो किसी का भला नहीं होता. कई बार घर बर्बाद हो जाते हैं. हॉनर किलिंग, आत्महत्या जैसे कदम उठा लिए जाते हैं पर युवा अपने प्यार को भूल नहीं पाते. इसलिए बेहतर है कि बच्चॉं की ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी ढूंढें और उन की भावनाओं को समझें.
5. अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से कभी नहीं करनी चाहिए. न ही दोस्तों के आगे अपने युवा बच्चों को डांटना चाहिए. ऐसा करने से आप के बच्चे के आत्मसम्मान को ठेस पहुंच सकती है. दोनों के बीच रिश्ता और खराब हो सकता है. किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए एकदूसरे को समझने और अपने प्यार का अहसास दिलाने की जरुरत होती है.
 *युवा क्या करें* 
अपने पेरैंट्स को प्यार से समझाएं. आप के उम्रदराज पैरंट्स की सोच अपने समय के हिसाब से सही है. आप उन की सोच को बिल्कुल से नकार नहीं सकते. आप उन्हें अपने दिल की बात समझा सकते हैं, अपनी जरूरतों और मजबूरियों से अवगत करा सकते हैं पर जबरदस्ती इस बात के लिए मजबूर नहीं कर सकते कि वे आप की बात समझें ही. इसलिए बेहतर है की सब से पहले प्यार से उन्हें अपनी बात समझाने का प्रयास करें. जरूरत पड़े तो फिर उदाहरण दे कर अपने कथन की सत्यता साबित करें. उन से निवेदन करें कि वे आप को अपने मन का करने दें. पर भूल कर भी उन पर चीखेचिल्लाएं नहीं. कभी भी दूसरों के आगे उन की बेइज्जती न करें. हो सके तो कभीकभी उन की बात भी मान लें ताकि उन्हें यह न लगे कि आप हमेशा उन की अवज्ञा ही करते हैं. याद रखें पेरैंट्स की बात आप को भले ही गलत लग रही हो मगर कहीं न कहीं वे आप का भला सोच कर ही कुछ भी कहते हैं. उन से ज्यादा आप का भला चाहने वाला और कोई नहीं होता. इसलिए अपने पेरैंट्स को अहमियत देना न भूलें.

पति, बेटा और सहेली तीनों मुझसे नाराज हैं, इस स्थिति से कैसे निकलूं ? 

सवाल

मेरी सहेली की बेटी और मेरा बेटा एकदूसरे से शादी करना चाहते हैं. हुआ यों कि उन दोनों का कालेज एक था, जहां उन्हें एकदूसरे से प्यार हो गया. मुझे अपनी दोस्त की बेटी से कोई परेशानी नहीं है लेकिन पता नहीं क्यों इस शादी के लिए मेरा मन नहीं मान रहा. मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरी अपनी बहू को लेकर जो अपेक्षाएं हैं वे पूरी होंगी भी या नहीं. इस बारे में मैं ने अपनी सहेली से बात की तो वह मुझ पर भड़क उठी और अब उस ने रिश्ता ही तोड़ दिया है. बेटा भी मुझ से बात नहीं कर रहा, पति भी नहीं और सहेली भी नहीं. इस स्थिति से कैसे निकलूं?

जवाब

देखिए, आप ने हंसतेखेलते बच्चों के जीवन को उथलपुथल तो किया ही है, साथ ही, अपनी दोस्त को भी पीड़ा पहुंचाई है. आप का यह डर कि बहू के तौर पर दोस्त की बेटी अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाएगी, निरर्थक है, क्योंकि आजकल कब कौन क्या कर जाए, पहले से अंदाजा लगाना लगभग नामुमकिन है. इस स्थिति में हो यह सकता है कि आप अपनी दोस्त से माफी मांगें और उसे बताएं कि आप ने जो कुछ भी कहा एक मां होने के नाते कहा, बिलकुल वैसे ही जैसे उन्होंने आप की बात एक सहेली के नाते नहीं, मां होने के नाते सुनी थी. अब गलती की है तो उस का एहसास करें और रिश्ते को फिर से जोड़ें अपने बच्चों की खातिर इतना तो आप कर ही सकती हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

कहीं नकली मसालों को असली समझने की गलती आप तो नहीं कर रहे, तो हो जाएं सतर्क

बैन का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि दिल्ली में नकली मसाले बनाने वाले गिरोह को गिरफ्तार किया है जिनके पास से 15 टन नकली मसाला बरामद हुआ है जो देखने में बिलकुल असली मसाले लगते हैं. ऐसे में असली नकली मसालों की पहचान कैसे हों, खासकर महिलाओं के लिए यह जानना मुसीबत बना हुआ है.

सुगंध से जानें

मसालों की तेज खुशबू इनके असली होने की पहचान होती है मसाले की थोड़ी मात्रा अपने हाथ में लें और इसे अपनी उंगलियों के बीच मसलें, यदि आप ऐसा करते हैं तो मसाले की तेज खुशबू असली होने की पहचान है. खुले मिलने वाले मसाले तो मिलावटी हो ही सकते हैं, क्योंकि उनकी कहीं कोई जांच नहीं होती. इसलिए परखना जरूरी है.

पानी में डालें

काली मिर्च को एक गिलास पानी में डाले मसाला असली होगा तो गिलास के तले में बैठ जाएगा और नकली होगा तो वह तैरता रहेगा.

तवे पर सेकें

तवे को आंच पर रखें व थोड़ा सा मसाला उस पर रखें यदि मसाले समान रूप से जलेंगे और अपनी खुशबू छोड़ेंगे तो वह असली है अन्यथा नकली मसाला अत्यधिक धुआं, गंदी स्मेल छोड़ेंगे.

इन मसालों को ऐसे पहचानें-

मिर्च व हल्दी

लाल मिर्च, हल्दी पाउडर को यदि पानी मे मिलाने पर पूरी तरह घुल जाए तो वह असली है अन्यथा नकली.

धनिया पाउडर

धनिया पाउडर की महक इतनी तेज होती है कि इसकी खुशबू ही इसकी पहचान होती है यदि खुशबू आती है तो मसाला असली है अन्यथा वह मिलावटी है.

दाल चीनी

दालचीनी के कुछ टुकड़े लेकर अपने हाथ पर रगड़कर देखें. अगर दालचीनी से लाल या भूरा रंग निकलता है, तो समझ जाएं कि ये असली दालचीनी है.

जीरा

जीरे की पहचान के लिए जीरा दो उंगलियों की बीच में रगड़कर देखना है. यदि जीरा असली है तो आपकी उंगलियां काली नहीं होंगीऔर यदि नकली होगा तो उंगली काली हो जाएगी.

मेरी पत्नी बार-बार अपना घर बनवाने के लिए फोर्स कर रही है, बताइए मैं क्या करुं?

सवाल

मैं नौकरीपेशा व्यक्ति हूं. प्राइवेट नौकरी करता हूं और किराए के मकान में रहते हुए 15 साल हो चुके हैं. मेरे पास 150 गज का एक प्लौट है. पत्नी मेरे पीछे पड़ी है कि उस प्लौट पर अपना मकान बना लेना चाहिएकब तक किराए के मकान में रहते रहेंगे और किराया भरते रहेंगे. वही पैसा अपने मकान में क्यों न लगाया जाए. मुझे भी लगता है कि खुद का मकान बना लेना चाहिए. लोन भी बैंक से मिल रहा हैबससम झ नहीं आ रहा कि मकान बनाने के काम बिल्डर को सौंप दूंक्या फायदेमंद रहेगाक्योंकि खुद मकान बनवाना मेरे बस की तो बात नहीं और न ही मुझे कुछ इस काम की नौलेज है.

जवाब

घर बनवाने की आप को कोई नौलेज नहीं है तो मकान बनवाने का काम बिल्डर को देना ही फायदेमंद होगा. लेकिन इस से पहले आप को बिल्डर के बारे में पूरी जानकारी लेनी होगीतभी बिल्डर को काम देना फायदेमंद हो सकता है.

आप कुछ प्रश्न पूछ सकते हैंजैसे उस के पास निर्माणकार्य के लिए बीएसएसआई या अन्य प्रमाणपत्र हैं. आप को जानना चाहिए कि बिल्डर के पूर्व ग्राहक कौन थे और उन्होंने उस से किस प्रकार का निर्माणकार्य करवाया था. बिल्डर के पास वर्तमान में किसी निर्माणकार्य पर उपयुक्त अभियंता और श्रमिक हैं जो संगठित ढंग से कम कर रहे हैं?

आप बिल्डर से पूछें कि निर्माण के दौरान उस की जिम्मेदारी क्या होगी और कितने समय में काम पूरा होगाघर के निर्माण में कौन सी तकनीकें इस्तेमाल की जाएंगी और इन की विशेषताएं क्या होंगीनिर्माणकार्य के लिए किस प्रकार के सामान और मजदूरों की जरूरत होगीनिर्माणकार्य की लागत क्या होगी और यह कितने समय में पूरा होगानिर्माणकार्य के दौरान घर के रखरखाव का कौन सा विकल्प होगा?

निर्माणकार्य के दौरान अगर कोई समस्या आती है तो उसे कैसे हल करेंगेघर के निर्माण के लिए कौन से डौक्यूमैंट्स की आवश्यकता होगीनिर्माणकार्य के बाद घर की गारंटी क्या होगी और यह कितने समय तक होगीबिल्डर और आप के बीच लिखित अनुबंध में सम झौता होना चाहिए ताकि बिल्डर अपनी कही बातों से मुकर न जाए.

अंत में बिल्डर को काम देने से पहले आप को स्थानीय मार्केट में उपलब्ध अन्य बिल्डरों से भी मूल्य तुलना करनी चाहिए. आप को सब से उचित मूल्य पर बिल्डर का चयन करना चाहिए.

Summer Special: गरमी में सही शैम्पू का इस्तेमाल है जरूरी

गरमी में जितना असर स्किन पर पड़ता है उससे कईं ज्यादा असर बालों पर पड़ता है. गरमी में हम बौडी पर आने वाला पसीना तो साफ कर देते हैं लेकिन सिर में आने वाला पसीना हमारे बालों को नुकसान पहुंचा देता है. और अगर हम गलत शैम्पू चुनते हैं तो यह बालों की कईं प्रौब्लम्स का कारण बन जाते हैं. बालों की प्रौब्लम्स के चलते सही शैंपू चुनना जरूरी है. इसके लिए आज हम आपको कुछ खास टिप्स बताएंगे, जिससे आप समर में भी अपने बालों की केयर सही ढ़ंग से कर पाएंगे.

1. बालों के हिसाब से चुनें शैम्पू

अगर आप के हेयर ग्रीसी यानी चिपचिपे हैं तो मार्केट में कई प्रकार के ग्रीसी हेयर शैंपू मिलते हैं, जो ग्रीसी हेयर को ठीक कर सकते हैं. बार-बार आम शैंपू लगाने से बालों और स्कैल्प का औयल कम हो जाता है, जिससे बालों में डैंड्रफ हो जाता है और उन का झड़ना भी बढ़ जाता है. इस मौसम में बाहर जाने से पहले सीरम जरूर प्रयोग करें.

2. हेयर कलर या डैंड्रफ के लिए अलग शैम्पू का करें इस्तेमाल के लिए

शैंपू हेयर टैक्स्चर के आधार पर प्रयोग करें. कई बार पूरा परिवार एक ही शैंपू का प्रयोग करता है, जो ठीक नहीं. अगर आप ने हेयर कलर किए हैं तो उस शैंपू का प्रयोग करें, जो कलर न उतारे और यदि बालों में डैंड्रफ है, तो डैंड्रफ हटाने वाले शैंपू का प्रयोग करें. इसी तरह अगर बाल डैमेज हो रहे हों तो हेयर रिपेयर करने वाले शैंपू का प्रयोग करें.

3. बालों का टैक्स्चर जरूर जान लें

शैंपू खरीदने से पहले बालों का टैक्स्चर जरूर जान लें. कई बार महिलाएं कर्ली बालों को फ्रीजी बाल समझती हैं.

4. हेयर औयलिंग वाले शैम्पू भी कर सकते हैं इस्तेमाल

मौनसून में हेयर औयलिंग बहुत आवश्यक है. इस से बेजान बालों में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है. उन की ग्रोथ बढ़ती है, क्योंकि मसाज से औयल बालों की जड़ों तक पहुंचता है. महीने में 2 बार 2 घंटों तक बालों में औयल लगा कर रखना पर्याप्त होता है. आजकल बाजार में औयल के गुण वाले शैंपू भी उपलब्ध हैं.

5. 15 दिन के गैप में करें हेयर कलर

आजकल अधिकतर महिलाएं हेयर कलरिंग करती हैं. अत: बारिश के मौसम में कलर प्रोटैक्ट रेंज का प्रयोग ठीक रहता है. इसमें शैंपू, कंडीशनर इत्यादि शामिल हैं. एक बार कलर करने के बाद बालों को दोबारा 15 दिनों के बाद ही कलर करें. कलर के बाद शैंपू, कंडीशनर लगाने से बाल ठीक रहते हैं. अगर डैमेज हो रहे हों और पोरस भी हैं, तो रैस्टोर वाला शैंपू या फिर हेयर मास्क लगाना सही रहता है.

विधवा हुई कोई अपराध तो नहीं किया

रूबीना एक कसबे में महीनाभर पहले विधवा हुई. उस की उम्र 30-32 साल है. शादी के 10 साल हो गए थे. सास बहुत तेज है. बहू से अकसर तूतूमैंमैं करती रहती है. महल्लेवाले सासबहू को ले कर चटखारे लेते रहते हैं.

पति बस का ड्राइवर था, जिस की रोड ऐक्सिडैंट में मौत हो गई. फिर क्या था, अब तो सास को रूबीना और भी फूटी आंख न सुहाती. तरहतरह के विभूषणों से बहू नवाजी जाने लगी. ‘करमजली, डायन, पति को खा कर चैन पड़ गया सीने में ‘कुलक्षिणी’. अब जाने क्याक्या उस के कुलक्षण थे.

रूबीना बच्चों के एक क्रेच में आया है. हाथ में कुछ पैसे आते हैं तो घरखर्च चलाने के बाद अपनी मरजी खर्चती है, सास से बिना पूछे. सजनासंवरना, ठेले पर चाटपानीपुरी खाना या फिर शाम के शो में कभी पिक्चर ही चले जाना. और एक गलती उस की यह भी है कि उसे बच्चा नहीं था. चाहे पतिपत्नी दोनों में से किसी में कमी हो, बच्चा न हुआ, तो हो गई वह कुलक्षिणी.

अब पति का श्राद्ध निबटा कर फिर से वह अपनी दिनचर्या में आ गई, यानी क्रेच में काम पर जाना, दिनभर शाम तक घर का काम करना और फिर शाम को दुकानों में ठेलों पर घूमना,  खरीदना, खाना, ठहलना और साजश्रृंगार की चीजें खरीदनापहनना. मगर न घर में चैन था, न बाहर. टोकने वाले टोकते या उस की छीछी करते, तो वह बिफर पड़ती.

‘क्या किसी के खसम का खा रही हूं मैं? अपना कमाती हूं, दिनभर घरबाहर खटती हूं, बुढ़िया को बैठा कर खिलाती हूं फिर क्यों न पहनूं? पति था भी तो कौन सा सोहाग करता था मुझ से? चारछह महीने में घर आ कर 5 हजार रुपए कर जाता तो अगले तीनचार महीने फिर खबर ही नहीं. जाने कहांकहां मुंह मार चुका था. मैं ने तो कई बार खुद पकड़ा. तो, अब उस के लिए रोने बैठी रहूं.’

लोगों को उस की जबान पर बड़ा ताज्जुब होता. विधवा हो कर इतनी जबान चले. सभी उस की सास की आग में और घी डाल जाते. लेकिन हम उन लोगों से पूछते कि रूबीना गलत भी कहां है? पति साल में चारछह बार आ कर छहआठ हजार रुपए दे कर अपना काम खत्म समझे. जिस के रहने, न रहने से रूबीना को खास फर्क भी न पड़ा, उस के चले जाने से वह अपनी जिंदगी को मातम का काला साया बना कर खानापहननाघूमना सब छोड़ दे? क्या समाज इस के लिए उसे सर्टिफिकेट देगा? या उसे पद्मभूषण की उपाधि मिलेगी? या उस का मरा हुआ पति जीवित हो जाएगा?

अब आइए एक हाई क्लास मौर्डन फैमिली के 60 साल की बुजुर्ग महिला का हालेदिल लें. डाइनिंग का यह माहौल है. वह अपने बेटे, बहू और पोते के साथ कहीं किसी के घर गेस्ट हो कर आई हैं. खाने में वेज-नौनवेज सबकुछ है. बुजुर्ग विधवा महिला सर्विंग बाउल से अपनी प्लेट में कुछ टुकड़े नौनवेज के लेती है.

बहू और उस की हमउम्र होस्ट सहेली एकदूसरे को देखती हैं. दोनों के होंठों के बीच हलकी व्यंग्यभरी मुसकान ऐंठ कर दबी होती है. बुजुर्ग महिला का बेटा यह समझता है और सब को सुना कर अपनी मां से कहता है, ‘मां नौनवेज की दूसरी डिश ट्राई करो.’ फिर अपने दोस्त की पत्नी की तरफ देख कर कहता है, ‘दरअसल, डाक्टर ने मां को नौनवेज खाने की सलाह दे रखी है. पापा के जाने के बाद से उन की तबीयत बहुत खराब रहने लगी थी.’

बुजुर्ग महिला का नौनवेज फेवरिट था लेकिन इतनी कैफियतें सुन खाने से मन उठ गया. वह सोच रही थी कि नौनवेज खाना या न खाना खुद की चौइस क्यों नहीं हो सकती? क्यों सेहत या कमजोरी का बहाना बनाना पड़ा? अपने पति के प्रति प्रेम, लगाव क्या किसी के खाने से जुड़ा मसला होना चाहिए? गोया कि पति नहीं, तो क्या पसंद का खाना भी नहीं, क्योंकि पसंद का खाया, पहना तो अब पति के प्रति प्रेम को प्रमाणित नहीं किया जा सकता. दूसरे, नौनवेज खा लिया तो अब शरीर की भूख इतनी बढ़ जाएगी कि पुरुष देखते ही उस के साथ भाग जाने को मन करेगा. हद हो गई लकीर के फकीरों की. यह आज के समाज का चित्र है और कुछ नहीं.

भारतीय समाज में एक स्त्री शादी के बाद जैसे हमेशा ही प्रमाण देती रहती है कि वह अपने पति के प्रति समर्पित है. पति ही उस का सबकुछ है और, दरअसल, तभी समाज में उस का एक स्थान होता है. ठीक उसी तरह पति की मृत्यु के बाद भी एक विधवा स्त्री इस स्थिति में रहती है कि उसे हर वक्त यह प्रमाणित करते रहना पड़े कि पति के जाने के बाद भी वह पति को ही जपती रहेगी. उस के सिवा उस की जिंदगी का कोई महत्त्व नहीं है और वह यह बात स्वीकार करती है.

एक विधवा स्त्री अगर भावनात्मक रूप से इस कदर पति से जुड़ी है कि वह खुद ही सबकुछ त्याग कर जीना चाहे, इसी में उसे खुशी मिले तो बात जबरदस्ती की नहीं होती. लेकिन जिस स्त्री को विवाह में पति से दुख ही मिला हो या उसे पति के लिए विलाप ही करते रहने से अच्छा मूव औन कर जाना ज्यादा सही और व्यावहारिक लगता हो, तो उसे पति के नाम पर जिंदगीभर मातमपुरसी करते रहने की बाध्यता क्यों हो?

यहां पुरुषों से तुलना तो बनती है. आखिर हर बात में संविधान से ले कर समाज तक बराबरी का दंभ भरने वाला कानून किस कोने में जा कर छिप जाता है जब बात स्त्री के दैनिक जीवनधारण की आती है?

इतिहास के पन्नों में विधवा स्त्री

हम बात करें हिंदू समाज की विधवाओं की, क्योंकि इस धर्म में विधवाओं को ले कर ऐसे कड़े नियमकानून थे, अब भी मानसिकता वही है, कि लगता है जैसे विधवा हो जाने से स्त्री ने कोई जानबूझ कर अपराध किया है, जिस के लिए उसे सजा पाना है.

मध्यकाल से पहले तक यानी वैदिककाल में स्त्रियों की स्थिति बेहतर थी. यद्यपि तब विधवाओं के जीवनयापन में बेड़ियां थीं लेकिन जीवन आज से पूरी तरह अलग था और इस से उन के सम्मान की हानि नहीं थी.

बात तब बिगड़ी जब मनु ऋषि ने स्त्री को आजन्म पिता, पति और पुत्र के अधीन ही रहने का फरमान सुना दिया. इस के बाद तो भारत में साम्राज्य विस्तार हेतु सैकड़ों आक्रमण हुए और उस दौरान राजाओं और मुगल, अफगान, पठान शासकों और आक्रमणकारी दलों की शिकार स्त्रियां या फिर विधवा स्त्रियां ही बनती रहीं.

मजबूरन सामाजिक पंचायतों द्वारा स्त्री और परिवार की मानमर्यादा की सुरक्षा हेतु स्त्रियों, खासकर विधवा स्त्रियों, पर घोर पाबंदियां लगाई गईं और लगाई जाती रहीं. जबकि, स्त्रियों पर ढेरों नियम न थोप कर उन की सुरक्षा के नियम कड़े किए जाने उचित होता.

आगे चल कर मध्यकाल और उस के बाद ऊंची जातियों की विधवा स्त्रियों पर ऐसी बेड़ियां थोपी गईं और उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से यह बात मानने को बाध्य किया जाता रहा कि पति की मृत्यु स्त्री के घोर पाप और अपराध का फल है और इस पाप के बदले उस ने अपना सारा सुख, सारी सुविधा का त्याग नहीं किया तो ईश्वर, जो कहीं है भी कि नहीं, उसे कभी माफ नहीं करेगा और यदि उस ने चोरीछिपे कुछ अच्छा खापहन लिया तो उसे भयानक सजा ‘तथाकथित’ ईश्वर की ओर से मिलेगी.

इन बातों को घोल कर पिलाने के लिए उन्हें शिक्षा से दूर रखा जाने लगा और कम उम्र में कुलीन ब्राह्मण के नाम पर बूढ़े बीमार लोगों के विवाह में दे कर उन्हें जानबूझ कर वैधव्य की ओर धकेला जाता रहा.

स्थिति जघन्य हो चुकी थी और सारे भारत में सतीप्रथा को अत्यंत पूजनीय स्थान दे कर जलती चिता में मृत पति के साथ स्त्रियों को जिंदा जलाया जा रहा था. इस घोर अंधविश्वास और अन्याय के युग में ईश्वर चंद्र विद्यासागर युग प्रवर्तक के रूप में सामने आए. उन के अथक प्रयासों व लंबी लड़ाई के बाद वर्ष 1856 में विधवा पुनर्विवाह कानून लागू हुआ. ज्ञात हो, ईश्वरचंद विद्यासागर ने खुद अपने बेटे का ब्याह एक विधवा कन्या से करवाया था.

ये विधवा महारानियां

रानी लक्ष्मीबाई, गोरखपुर के निकट तुलसीपुर की रानी ईश्वर कुमारी, अनूप नगर के राजा प्रताप सिंह की पत्नी चौहान रानी, मध्य प्रदेश के रामगढ़ रियासत की रानी अवंतिका लोधी, नाना साहेब पेशवा की पुत्री मैना, सिकंदर बाग की वीरांगना उदा देवी… किसकिस का नाम लें, जिन्होंने पति की मृत्यु के बाद न केवल राजगद्दी और प्रजा को संभाला बल्कि राज्य के बाहरी आक्रमणकारियों और अंगरेजों की साजिशों व दबावों के विरुद्ध जम कर लड़ाइयां लड़ीं, शहीद हुईं और इतिहास से निकल कर लोगों के लिए प्रेरणा बन गईं. अगर वे विधवा होने के बाद सामाजिक दबावों के आगे सिर झुका लेतीं तो भारत की गौरवगाथा वे न होतीं जो आज इतिहास में दर्ज है.

कालांतर में विधवा स्त्रियों की दशा

विधवा पुनर्विवाह कानून के पारित होने से अब तक विधवा स्त्रियों की दशा में क्याकुछ सुधार हुए हैं, हम अपनी छिपी हुई मानसिकता को परख कर आज समझ सकते हैं.

गौर कीजिए कुछ पौइंट्स पर जब हम कुपमंडूक बन जाते हैं.

* जब खुद के घर में नौकरी या व्यवसाय करने वाले पुत्र की किसी विधवा स्त्री से ब्याह की बात आती है तो आज भी लोग तुरंत पीछे हट जाते हैं, नाकभौं सिकोड़ते हैं.

*  अपने घर में अगर जवान बेटे की मौत हो जाए, उस की विधवा पत्नी को बेटे की जागीर देने में भी आनाकानी होने लगती है. बहुत बार उसे किसी तरह टरकाने की कोशिश की जाती है.

*  जब घर में बेटे की मौत हो जाए और उस के बच्चे भी हों, बहुत कम ही परिवार ऐसे होते हैं जो अपने घर या रिश्तेदार के किसी बेटे से बहू के ब्याह को राजी हों. ज्यादातर सब की सोच यही होती है कि अब उस की अलग क्या जिंदगी होगी. बच्चे ही पाल लेगी और क्या.

* अगर कोई संयुक्त परिवार का बेटा खत्म हो जाए जहां वह संयुक्त व्यवसाय का हिस्सा रहा हो, उस की पत्नी व्यवसाय में उस का स्थान लेना चाहे तो घर के दूसरे पुरुष सदस्य उसे यह हक लेने दें, यह आज भी भारतीय परिवारों में इतना आसान नहीं है.

* विधवा स्त्री की परिवार के अन्य विवाहित सधवा स्त्रियों के मुकाबले अकसर पूछपरख और भागीदारी कम होती है. किसी शगुन वाले अनुष्ठान में वह दूरदूर से सेवा और कामकाज करे, इतना ही उस के हिस्से में है. सभा या अनुष्ठान में उस की जम कर खुशी से भागीदारी समाज और रिश्ते में आज भी आंखों की किरकिरी है.

* एक तो हिंदू विवाह में कन्यादान की रीति कन्या को वस्तु समान बनाती है जिसे दान किया जा सके, तिस पर वह भी विधवा स्त्री को हक नहीं कि वह पिता के अभाव में अपनी बेटी के ब्याह के वक्त धार्मिक रीति निभा सके. यह कितनी अपमानजनक स्थिति है जिसे मानने की बाध्यता ने अपनाना आसान कर दिया है. समाज तो है ही, विधवा स्त्री भी खुद को तुच्छ समझ कर हर अधिकार से खुद को निकाल ले जाती है.

* इन सब के उलट आज की मौर्डन विधवा स्त्री स्वतंत्रता से जीने और अपने सामान्य प्राकृतिक, सामाजिक अधिकारों के लिए विरोधी तेवर मुखर करती है तो वह अलगथलग कर दी जाती है. उस के लिए पीठपीछे कुछ उपाधियां निर्धारित कर दी जाती हैं, जैसे ‘इस के लक्षण ठीक नहीं हैं’, ‘बहुत चालू औरत है,’ ‘पति की मौत से इस के पर निकल आए’ आदि.

और अब भी अगर यह दावा किया जाए कि अब जमाना बदल गया है, विधवाएं अब बेखौफ, बेलौस जिंदगी जीती हैं तो रुख करें भारत के धर्मस्थानों और तीर्थस्थलों का. वृंदावन तो अब ‘विधवाओं का शहर’ ही कहलाने लगा है.

आज भी बंगाल, असम, ओडिशा से हजारों की संख्या में विधवाएं अपने घर और समाज से लांछित व परित्यक्त हो कर वृंदावन पहुंचती हैं और मजबूरन भगवान के नाम पर भीख मांग कर रोतेधोते गुजारा करती हैं. उन की ऐसी बदतर हालत पर सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के बाल और महिला विकास मंत्रालय को फटकार लगा चुका है कि विधवा स्त्रियों के सम्मान की क्या कहें, दो रोटी और एक सादे कपड़े भर के गुजारे के लिए उन्हें दूसरों के आगे हाथ फैलाने पड़ते हैं, विधवाओं को इस से नजात दिला कर एक सम्मान की जिंदगी देने की पहल क्यों नहीं की जाती.

विधवा स्त्रियों के हालात में सुधार हेतु कुछ जरूरी उपाय

  1. आज भी हमारे समाज में विधवा नाम से एक मैंटल ब्लौकेज बना हुआ है. पत्नी की मृत्यु के बाद पति को व्यक्तिगत जीवन में भले ही दिक्कतें हों लेकिन वह अछूत तो नहीं हो जाता. लेकिन यह क्या कि पति की मृत्यु से पत्नी समाज के अंधविश्वासों के कारण मानसिक यातना की शिकार हो जाए. शुभकार्यों में उस की उपस्थिति अनुचित मानी जाए. वह कन्यादान के काबिल न रहे. किसी शादी और शुभ अनुष्ठानों में वह अकसर सेवा तो दे लेकिन विवाहित स्त्रियों से अलगथलग पड़ जाए.
  2. हिंदू धर्म में जब तक विवाहित स्त्रियों के लिए प्रतीकचिन्ह, जैसे सिंदूर, चूड़ी, बिछिया, पायल, अल्ता जरूरी रहेंगे तब तक विधवा स्त्रियों के खानपान, रहनसहन, पहनावा पर समाज की भेदभावभरी कुदृष्टि बनी रहेगी.यदि विवाहित स्त्रियों के पहचान के लिए प्रतीकचिन्हों की बाध्यता खत्म हो तो विधवा स्त्रियों की पहचान के लिए थोपे गए तुगलकी कानून भी कमजोर हों. निसंदेह इस के लिए विवाहित स्त्रियों को ही आगे आना होगा.
  1. विधवा स्त्रियों के लिए आर्थिक जानकारी निहायत जरूरी है और इस के लिए सबकुछ भविष्य पर छोड़ना ठीक नहीं. विवाहित रहते हुए ही एक स्त्री को या तो अपने पति के निवेश के बारे में जानकारी हो जानी चाहिए या फिर पति अगर जानकारी न देता हो तो आर्थिक नियमों की जानकारी उसे किसी बाहरी स्रोत से प्राप्त कर के रखनी चाहिए. मनी मैनेजमैंमेंट, बैंकिंग, सेविंग्स, इन्वैस्टमैंट आदि की जानकारी के लिए स्त्री को शुरू से ही सतर्क रहना चाहिए. इस से किसी अनहोनी पर वह आसानी से आर्थिक मोरचा संभाल पाएगी.
  2. आर्थिक आजादी सम्मान से जीने का मुख्य आधार है और एक स्त्री को आज के जमाने में किसी भी तरह आत्मनिर्भर होना चाहिए. अगर विवाहित रहते हुए पैसे कमाने की गुंजाइश न रहे तो आज के जमाने के हिसाब से वह इतना स्मार्ट वर्क जरूर कर ले कि जब भी जरूरत पड़े, अपने मनपसंद क्षेत्र में काम ढूंढ सके.
  3. एक स्त्री को अपने कानूनी अधिकार और कानूनी बंदिशों के बारे में मालूमात होनी चाहिए. ताकि विधवा हो जाने की स्थिति में पति और ससुराल की संपत्ति में उस का या उस के बच्चों का जो भी हक है उसे मिल सके. जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाहकार की मदद से वह अपना हक सुनिश्चित कर सके.

एक तार्किक, बौद्धिक नजरिया जीवन के दुखद पहलुओं को कुछ हद तक मनोनुकूल कर सकता है. लेकिन पहल सब से पहले एक स्त्री को ही करनी होगी. यह न देखें कि जो विधवा है वह जाने, मुझे क्या? जिंदगी कब किस की किस करवट बैठे, कोई नहीं जानता. इसलिए आज के समाज में हर उस परंपरा व नजरिए का विरोध होना चाहिए जो मनुष्य होने के सामान्य अधिकार और सम्मान की रक्षा न करे.

मोटी मन को भा गई: मामाजी ने क्या इशारा किया?

लड़की को देख कर आते ही हम ने मामाजी के कानों में डाल दिया, ‘‘मामाजी, हमें लड़की जंची नहीं. लड़की बहुत मोटी है. वह ढोल तो हम तीले. कहां तो आज लोग स्लिमट्रिम लड़की पसंद करते हैं और कहां आप हमारे पल्ले इस मोटी को बांध रहे हैं.’’ मामाजी के जरीए हमारी बात मम्मीपापा तक पहुंची तो उन्होंने कह दिया, ‘‘यह तो हर लड़की में मीनमेख निकालता है. थोड़ी मोटी है तो क्या हुआ?’’

सुन कर हम ने तो माथा ही पीट लिया. कहां तो हम ऐश्वर्या जैसी स्लिमट्रिम सुंदरी के सपने मन में संजोए थे और कहां यह टुनटुन गले पड़ रही थी.

तभी हमारा लंगोटिया यार रमेश आ धमका. उसे पता था कि आज हम लड़की देखने जाने वाले थे. अत: आते ही मामाजी से पूछने लगा, ‘‘देख आए लड़की हमारे दोस्त के लिए? कैसी हैं हमारी होने वाली भाभी?’’

‘अरे भई खुशी मनाओ, क्योंकि तुम्हारे दोस्त को बीएमडब्ल्यू मिलने वाली है,’’ कह मामाजी ने चुपके से आंख दबा दी.

हम कान लगाए सब सुन रहे थे. मामाजी द्वारा आंख दबाने से अनभिज्ञ हम मन ही मन गुदगुदाए कि अच्छा, हमें बीएमडब्ल्यू मिलने वाली है. अभी तक हम लड़की के मोटी होने के कारण नाकभौं सिकोड़ रहे थे, लेकिन फिर यह सोच कर कि अभी तक मारुति पर चलने वाले हम अब बीएमडब्ल्यू वाले हो जाएंगे, थोड़ा गर्वान्वित हुए और फिर हम ने दिखावे की नानुकर के बाद हां कह दी. वैसे भी यहां हमारी सुनने वाला कौन था?

जनाब, शहनाई बजी, डोली घर आ गई. लेकिन जब बीएमडब्ल्यू के बिना डोली आई तो असमंजस में पड़ हम ने अपने दोस्त रमेश से अपनी परेशानी जाहिर की. रमेश हंसा, फिर मामाजी से नजरें मिला हमारी श्रीमतीजी की ओर इशारा कर बोला, ‘‘यही तो हैं तुम्हारी बीएमडब्ल्यू. नहीं समझे क्या? अरे पगले बीएमडब्ल्यू का मतलब बहुत मोटी वाइफ. अब समझे क्या?’’

अब्रीविऐशन कितना कन्फ्यूज करती है, हमें अब समझ आया. मजाक का पात्र बने सो अलग. हम इस मुगालते में थे कि बीएमडब्ल्यू कार मिलेगी. खैर हम ने बीएमडब्ल्यू, ओह सौरी, श्रीमतीजी के साथ गृहप्रवेश किया.

हमें फोटो खिंचवाने का शौक था और फोटोजेनिक फेस भी था, मगर शादी में हमारे सारे फोटो दबे रहे. बस, दिखतीं तो सिर्फ हमारी श्रीमतीजी. गु्रप का कोई फोटो उठा कर देख लें, आसपास खड़े सूकड़ों के बीच घूंघट में लिपटी हमारी मोटी श्रीमतीजी अलग ही दिखतीं. उस पर वीडियो वाले ने भी कमाल दिखाया. उस ने डोली में हमारे पल्लू से बंधी पीछे चलती श्रीमतीजी के सीन के वक्त फिल्म ‘सौ दिन सास के’ का गाना, ‘दिल की दिल में रह गई क्याक्या जवानी सह गई… देखो मेरा हाल यारो मोटी पल्ले पै गई…’ चला दिया.

हनीमून पर मनाली पहुंचे तो होटल के स्वागतकर्ता ने हमारी खिल्ली उड़ाते हुए कहा, ‘‘आप चिंता न करें हमारे डबलबैड वाले रूम में व्यवस्था है कि एक सिंगल बैड अलग से जोड़ा जा सके.’’ हम तो खिसिया कर रह गए, लेकिन श्रीमतीजी ने रौद्र रूप दिखा दिया, बोलीं, ‘‘मजाक करते हो? खातेपीते घर की हूं…फिर डबलबैड पर इतनी जगह तो बच ही जाएगी कि बगल में ये सो सकें. इन्हें जगह ही कितनी चाहिए?’’

पता नहीं श्रीमतीजी ने हमारे पतलेपन का मजाक उड़ाया था या फिर अपनी इज्जत बढ़ाई थी, पर इस पर भी हम शरमा कर ही रह गए.हमारी हनीमून से वापसी का दोस्तों को पता चला तो पहुंच गए हाल पूछने. न…न..हाल पूछने नहीं बल्कि छेड़ने और फिर छेड़ते हुए बोले, ‘‘भई, कैसी है तुम्हारी बीएमडब्ल्यू?’’ अब्रीविऐशन के धोखे और लालच में लिए गए फैसले ने हमें एक बार फिर कोसा. हम अपनी बेचारगी जताते खीजते हुए बोले, ‘‘दोस्तों, हनीमून पर घूमनेफिरने, किराएभाड़े से ज्यादा तो श्रीमतीजी के खाने का बिल है. अब तुम्हीं बताओ…’’ कहते हुए जेहन में फिर वही गाना गूंज उठा कि मोटी पल्ले पै गई…

अभी हमारी बात पूरी भी न हुई थी कि हमारे दोस्त रमेश ने हमें धैर्य बंधाते हुए कहा, ‘‘बी पौजिटिव यार. क्यों आफत समझते हो? वह सुना नहीं अभिताभ का गाना, ‘जिस की बीवी मोटी उस का भी बड़ा नाम है बिस्तर पर लिटा दो गद्दे का क्या काम है…’ और फिर मोटे होने के भी अपने फायदे हैं.’’

हम इस गद्दे के आनंद का एहसास हनीमून पर कर चुके थे. सो पौजिटिव सोच बनी. पर तुरंत रमेश से पूछ बैठे, ‘‘क्या फायदे हैं मोटी बीवी होने के जरा बताना? हम तो अभी तक यही समझ पाए हैं कि मोटी बीवी होने पर खाने का खर्च बढ़ जाता है, कपड़े बनवाने के लिए 5-6 मीटर की जगह पूरा थान खरीदना पड़ता है.’’

उस दिन हम टीवी देख रहे थे कि तभी घंटी बजी. हम ने दरवाजा खोला, सामने रमेश खड़ा था, अपनी  शादी का कार्ड थामे, अंदर घुसते ही हैरानी से पूछने लगा, ‘‘क्या हुआ भई छत पर तंबू क्यों लगा रखा है? खैरियत तो है न?’’ हम यह देखने बाहर जाते, उस से पहले ही श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘अरे, वह तो मैं अभीअभी अपना पेटीकोट सूखने डाल कर आई हूं.’’

सुनते ही रमेश की हंसी छूट गई. फिर हंसते हुए बोला, ‘‘हां भई, हम तो भूल ही गए थे कि अब तुम बीएमडब्ल्यू वाले हो गए हो…उस का कवर भी तो धोनासुखाना पड़ेगा, न?’’ बीएमडब्ल्यू के लालच में पड़ना हमें फिर सालने लगा. हमारी त्योरियां चढ़ गईं कि एक तो इतना बड़ा पेटीकोट, उस पर उसे तारों पर फैलाया भी ऐसे था कि सचमुच तंबू लग रहा था. फिर वही गाना मन में गूंज उठा, ‘मोटी पल्ले पै गई…’

खैर, रमेश शादी का न्योता देते हुए बोला, ‘‘समय पर पहुंच जाना दोनों शादी में.’’ जनाब, हम अपनी बीएमडब्ल्यू को मारुति में लादे पार्टी में पहुंच गए और एक ओर बैठ गए. तभी फोटोग्राफर कपल्स के फोटो लेते हुए वहां पहुंचा और हमें भी पोज देने को कहा.

आगेपीछे देख कोई पोज पसंद न आने पर वह बोला, ‘‘भाई साहब, आप भाभीजी के साथ सोफे पर दिखते नहीं…भाभीजी के वजन से सोफा दबता है और आप पीछे छिप जाते हैं. ऐसा करो आप सोफे के बाजू पर बैठ जाएं.’’

हम ने वैसा ही किया. पोज ओके हो गया, लेकिन तब तक पास पहुंच चुके दोस्त हंसते हुए बोले, ‘‘क्या यार सोफे के बाजू पर बैठे तुम ऐसे लग रहे थे जैसे भाभीजी की गोद में बैठे हो.’’

मोटे होने का एक और फायदा मिल गया था. इतने स्नैक्स निगलने के बाद भी हमारी श्रीमतीजी ने डट कर खाना खाया. सचमुच 500 के शगुन का 1000 तो वसूल ही लिया था. साथ ही एक और बात देखी. जहां अमूमन पत्नियां प्लेट भर लेती हैं और थोड़ाबहुत खा कर पति के हवाले कर देती हैं, फिनिश करने को, वहीं यहां उलटा था. श्रीमतीजी के कारण हम ने हर व्यंजन चखा. उस दिन हम ससुराल से लौटे तो अपनी गाड़ी की जगह किसी और की गाड़ी खड़ी देख झल्लाए. तभी श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘अरे, यह तो विभा की गाड़ी है,’’ और फिर तुरंत अपने मोबाइल से विभा का नंबर मिला दिया.

पड़ोस में तीसरी मंजिल पर रहने वाली विभा महल्ले की दबंग औरत थी. सभी उस से डरते थे. विभा तीसरी मंजिल से तमतमाती नीचे आई और दबंग अंदाज में बोली, ‘‘ऐ मोटी, इतनी रात को क्यों तंग किया? कहीं और लगा लेती अपनी गाड़ी? मैं नहीं हटाने वाली अपनी गाड़ी. कौन तीसरे माले पर जाए और चाबी ले कर आए?’’

‘‘क्या कहा, मोटी…’’ कहते हुए हमारी श्रीमतीजी ने विभा को हलका सा धक्का दिया तो वह 5 कदम पीछे जा गिरी.

विभा की सारी दबंगई धरी की धरी रह गई. आज तक जहां महल्ले वाले उस से नजरें भी न मिला पाते थे वहीं हमारी श्रीमतीजी ने उसे रात में सूर्य दिखा दिया था.

‘‘अच्छा लाती हूं चाबी,’’ कहती हुई वह फौरन गई और चाबी ला कर अपनी गाड़ी हटा कर हमारी गाड़ी के लिए जगह खाली कर दी.

इसी के साथ ही हमें श्रीमतीजी के मोटे होने का एक और फायदा दिख गया था. हम भी कितने मूर्ख थे कि अब तक यह भी न समझ पाए कि अगर श्रीमतीजी का वजन ज्यादा है तो इन की बात का वजन भी तो ज्यादा होगा अब महल्ले में हमारी श्रीमतीजी की दबंगई के चर्चे होने लगे. साथ ही हम भी मशहूर हो गए. हमारे मन में श्रीमतीजी के मोटापे को ले कर जो नफरत थी अब धीरेधीरे प्यार में बदलने लगी थी.

अब कोई मिलता और हमारी श्रीमतीजी के लिए मोटी संबोधन का प्रयोग करता तो हम भी उसे मोटापे के फायदे गिनाने से नहीं चूकते. उस दिन हमारी  कुलीग ज्योति किसी काम से हमारे घर आई तो हम ने श्रीमतीजी से मिलवाया, ‘‘ये हमारी श्रीमतीजी…’’

अभी इंट्रोडक्शन पूरा भी न हुआ था कि ज्योति बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘बहुत मोटी वाइफ हैं आप की,’’ और हंस दी.

हमें लगा यह भी हमें बीएमडब्ल्यू के मुगालते वाला ताना मार रही है सो थोड़ा किलसे लेकिन श्रीमतीजी ने बड़े धांसू तरीके से ज्योति की हंसी पर लगाम कसी, ‘‘मेरे मोटापे को छोड़ अपनी काया की चिंता कर. मैं तो खातेपीते घर की हूं. तुझे देख तो लगता है घर में सूखा पड़ा है. कुछ खायापीया कर वरना ज्योति कभी भी बुझ जाएगी.’’ लीजिए, हमें मोटे होने का एक और फायदा मिल गया. अब कोई हमें यह ताना भी नहीं मार सकता था कि हम अपनी श्रीमतीजी को खिलातेपिलाते नहीं, बल्कि इन का मोटा होना ससुराल को खातापीता घर घोषित करता था.

आज लड़कियां स्लिमट्रिम रहने के लिए कितना खर्च करती हैं. हमारा वह खर्च भी बचता था. साथ ही उन के खातेपीते रहने से हमारी सेहत में भी सुधार होने लगा था. उस दिन टीवी देखते हुए एक चैनल पर हमारी नजर टिक गई जहां विदेश में हो रही सौंदर्य प्रतियोगिता दिखाई जा रही थी. खास बात यह थी कि यह सौंदर्य प्रतियोगिता मोटी औरतों की थी.

कितनी सुंदर दिख रही थीं वे मांसल शरीर के बावजूद. हमारी श्रीमतीजी देखते ही इतराते हुए बोलीं, ‘‘देखो, बड़े ताने कसते हैं तुम्हारे यारदोस्त मुझ पर, मेरे मोटापे को ले कर छींटाकशी करते हैं, बताओ उन्हें कि मोटे भी किसी से कम नहीं.’’ हमें श्रीमतीजी की बात में फिर वजन दिखा. साथ ही उन के मोटापे में सौंदर्य भी. अब हमें मोटी श्रीमतीजी भाने लगी थीं, बीएमडब्ल्यू हमारी मारुति में समाने लगी थी.

अब हमारे विचारों में परिवर्तन हुआ. श्रीमतीजी पर प्यार आने लगा. हमारे मन में बसी ऐश्वर्या की जगह मोटी सुंदरी लेने लगी. ‘ऐश अगर सुंदरता के कारण फेमस है, तो हमारी श्रीमतीजी मोटापे के कारण. ऐश सब को लटकेझटके दिखा दीवाना बनाती है तो हमारी श्रीमतीजी अपनी दबंगई से सब को उंगलियों पर नचाती हैं. ऐश गुलाब का फूल हैं तो हमारी श्रीमतीजी गोभी का. फिर फूल तो फूल है. गुलाब का हो या फिर गोभी का. अब जेहन का गीत, ‘मोटी पल्ले पै गई…’ से बदल कर ‘मोटी मन को भा गई…’ बनने लगा. इसी सोच के चलते उस दिन भागमभाग वाली दिनचर्या से निबट आराम से पलंग पर लेटे ही थे कि कब आंख लग गई, पता ही न चला. फिर आंख तब अचानक खुली जब श्रीमतीजी ने बत्ती बुझाने के बाद औंधे लेटते हुए अपनी टांग हमारी पतली टांगों पर रख दी.

बड़ा सुकून मिला. आज के समय में कहां श्रीमतीजी थकेहारे पति के पांव दबाती हैं, लेकिन हमारी श्रीमतीजी ने अपनी टांग हमारी टांगों पर रखते ही यह काम भी कर दिया था. तभी हम ने सोचा कि आखिर यह भी तो एक फायदा ही है श्रीमतीजी के मोटे होने का बशर्ते पत्नी गद्दे की जगह रजाई न बने वरना तो कचूमर ही निकलेगा.

दुर्घटना का कारण बनती हैं पुरुषों के दिखावे में काम आने वाली महंगी कारें

महाराष्ट्र में पुणे के कल्याणी नगर में एक रईसजादे वेदांत अग्रवाल ने रात के करीब 2.30 बजे अपनी महंगी पोर्शे कार से बाइक सवार अनीस अवधिया और अश्विनी कोष्टा को टक्कर मार दी. इस घटना में दोनों की मौत हो गई है. इस घटना के बाद वहां लोगों ने रईसजादे की जम कर पिटाई की. वेदांत के पिता विशाल अग्रवाल मशहूर ब्रह्मा रियलिटी कंपनी के मालिक हैं जो बिल्डिंग बनाने का काम करती है.

पुलिस ने वेदांत अग्रवाल के खिलाफ यरवड़ा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कर ली. इस घटना के बाद मृतकों के दोस्त एकिब रमजान मुल्ला ने पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई. अश्विनी और अनीस दोस्तों के साथ अपनी मोटरसाइकिल पर कल्याणीनगर से यरवड़ा की ओर यात्रा कर रहे थे. वेदांत अपनी पोर्शे कार को तेज गति से चला रहा था. इस बीच वह कार से नियंत्रण खो बैठा. इस के बाद कार एक बाइक और अन्य वाहनों से टकरा गई.

रईसजादे का शिकार बने 2 इंजीनियर

पुणे पोर्श कार हादसे का आरोपी वेदांत अग्रवाल के बालिग और नाबालिग होने पर सवाल उठ रहे हैं. वेदांत ने अपनी कार से जिन बाइक सवार को रौंद दिया वेह दोनों इंजीनियर थे. पुलिस ने वेदांत के पिता विशाल अग्रवाल को गिरफ्तार कर लिया. विशाल के पिता सुरेंद्र कुमार अग्रवाल ने अपने भाई से संपत्ति विवाद में अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन की मदद ली थी. राजन के गुर्गे ने गोलीबारी भी की थी. पहले पुलिस ने जांच की. बाद में सीबीआई को मामला सौंपा गया. यह केस कोर्ट में विचाराधीन है. इस से यह साफ जाहिर होता है कि आरोपी वेंदात का परिवार दबंग किस्म का था. उस के लिए इस तरह के हादसे कोई बड़ी बात नहीं.

हमारी अदालतों में मुकदमे सालोंसाल चलते हैं. जिस वजह से सही समय पर न्याय नहीं मिल पाते. 5 करोड़ से अधिक के मामले आदलतों में लंबित हैं. अमीर आदमी के मामलों में विवेचना से ले कर जिरह तक में इतना घालमेल हो जाता है कि आरोपी बरी हो जाता है. पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता. उन परिवारों के बारे में कोई नहीं सोच रहा जिन के बाइक सवार 2 बच्चे दुर्घटना का शिकार हुए हैं.

17 साल के लड़के ने पहले शराब के नशे में अपनी पोर्शे कार से बाइक सवार 2 इंजीनियरों को रौंद दिया. हादसे में दोनों लड़कालड़की की मौत हो गई. मरने वालों की पहचान 24 साल के अनीश अवधिया और 24 साल की अश्विनी कोष्टा के रूप में हुई है. दोनों मध्य प्रदेश के रहने वाले थे. पुणे में काम करते थे.

इस मामले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने कुछ शर्तों के साथ आरोपी नाबालिग को रिहा कर दिया. बाद में पुलिस ने आरोपी नाबालिग के पिता विशाल अग्रवाल को छत्रपति संभाजीनगर से गिरफ्तार किया. विशाल अग्रवाल की कार बिना रजिस्ट्रेशन सड़कों पर दौड़ रही थी. इस से साफ पता चलता है कि विशाल अग्रवाल कितना पहुंच वाला आदमी है.

पोर्शे कार की कीमत

भारत में इस समय पोर्शे कार के 8 मौडल्स बिक्री के लिए उपलब्ध है. इन में 3 एसयूवी, 4 कूपे और 1 वैगन शामिल हैं. पोर्शे ने पोर्शे टायकन भी 2024 लौंच की है. इंडिया में पोर्शे कारों की कीमत 88.06 लाख से शुरू होती है. भारत में पोर्शे की सब से महंगी कार 911 है जो 4.26 करोड़ रुपए में उपलब्ध है. पोर्शे के लाइनअप में सब से लेटेस्ट मौडल क्यान है जिस की कीमत 1.36 से 2 करोड़ रुपए है. पोर्शे की मौजूदा कारों में मैकन, क्यान, केएन कूप, 718, टायकन, मैकन ईवी, पैनामेरा और 911 जैसी कारें शामिल हैं.

पोर्शे जरमनी की औटोमोबाइल कंपनी है जो हाई परफौर्मेंस स्पोर्ट्स कार, एसयूवी और सेडान बनाने के लिए मशहूर है. इस कंपनी का स्वामित्व आस्ट्रियन पोर्श और पाइक फैमिली (आस्ट्रियन बिजनैस फैमिली पोर्श) के पास है. मई 2006 के एक सर्वे में पोर्श को लग्जरी इंस्टिट्यूट, न्यूयौर्क द्वारा सब से प्रतिष्ठित औटोमोबाइल ब्रैंड का खिताब दिया गया. इस सर्वे में 7,20,000 अमेरिकी डौलर की कुल संपत्ति वाले 500 से अधिक परिवारों ने हिस्सा लिया था जिन की वार्षिक आय न्यूनतम 200,000 अमेरिकी डौलर थी.

भारत में बढ़ रहा है महंगी कारों का शौक

सस्ती और टिकाऊ गाड़ियों के बजाय अब भारतीयों को महंगी गाड़ियां पंसद आ रही हैं. देश में लग्जरी कारों की बिक्री में 41 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. इन कारों में लुक और सेफ्टी फीचर्स के साथ ही साथ दिखावा भी होता है. साल 2022 में कुल गाड़ियों के मुकाबले 41 फीसदी गाड़ियां 10 लाख रुपए से अधिक कीमत की थीं.

क्रिकेट खिलाडी ऋषभ पंत के साथ कार का हादसा हुआ था. उस में उस को गंभीर चोटें आईं थीं. दिल्लीदेहरादून एक्सप्रेसवे पर हुए हादसे के समय में ऋषभ मर्सिडीज कार से सफर कर रहे थे. इस हादसे में ऋषभ की जान बच गई. जिस का श्रेय उन की महंगी गाड़ी को दे रहे हैं. अगर मर्सिडीज जैसी लग्जरी कार की जगह किसी साधारण कार में वे होते तो इतने भयानक हादसे में बच पाना मुश्किल था. महंगी कारों के सेफ्टी फीचर्स लोगों को लुभा रहे हैं.

पहले लोग सस्ती और टिकाऊ गाड़ियां पसंद करते थे. वहीं अब भारत में महंगी गाड़ियों का क्रेज बढ़ रहा है. टोयोटा, फोर्ड, इनोवा, सकोडा, सिकैड, औडी और मर्सिडीज जैसी गाड़ियों की डिमांड तेजी से बढ़ रही है. साल 2018 के मुकाबले साल 2022 में इन लग्जरी और महंगी गाड़ियों की डिमांड में 41 फीसदी की तेजी आई है. ग्रामीण इलाकों में भी स्कौर्पियो और फारच्युनर जैसी गाडियां लोगों की पंसद बनती रही हैं.

आंकड़ों को देखें तो 10 लाख रुपए से ऊपर के महंगी कारों को खरीदने वालों की संख्या बढ़ रही है. शौकीन लोग 25 लाख से 60 लाख रुपए तक की रेंज में गाडियां खरीद रहे हैं. इन में 3 श्रेणी के लोग हैं. पहले बिजनैसमैन हैं. दूसरे नेता और तीसरे अफसर हैं. इन की गाड़ियां इन के अपने नाम से कम होती हैं. माफिया टाइप लोगों के पास एक गाड़ी का मतलब नहीं होता, उन को अपने काफिले में एकजैसी 6-7 गाड़ियां चलने के लिए चाहिए. ये गाडियां बड़ी आसानी से बैंक लोन से मिल जाती हैं.

साल 2018 में 10 लाख से अधिक महंगी कारों की सेल 5.4 लाख थी तो वहीं साल 2022 में यह आंकड़ा 15.5 लाख के ऊपर पहुंच गया. अगर तुलना करें तो साल 2008 में करीब 34 लाख कारों की बिक्री हुई, जिन में से 16 फीसदी गाड़ियां ऐसी थीं जो 10 लाख रुपए से अधिक कीमत की थीं. वहीं साल 2022 में 38 लाख गाड़ियों की बिक्री हुई, लेकिन इस दौरान 10 लाख से महंगी कारों की संख्या 15 लाख रुपए को पार कर गई. यानी, महंगी कारें खरीदने वालों में 41 फीसदी का इजाफा हुआ.

शान और साख बढ़ाती हैं महंगी गाड़ियां

महंगी गाड़ियों की बढ़ती खरीदारी की 3 वजहें हैं. पहली, दिखावा यानी शान. जिस तरह से अमीर औरतों को अपने गहने और साड़ी दिखाने में खुशी होती है उसी तरह से पुरुष अपनी महंगी कार दिखा कर दूसरों पर रोब डालता है. जब वह अपनी महंगी कार से उतरता है तो मन में अलग किस्म की खुशी होती है. घर कितना भी अच्छा हो, उसे दिखाने के लिए लोगों को बुलाना पड़ता है. महंगी कार दिखाने के लिए किसी को बुलाना नहीं पड़ता.

महंगी गाड़ियों के फीचर्स लोगों को लुभा रहे हैं. सनरूफ, ड्राइविंग असिस्ट फीचर्स, 360 डिग्री कैमरा, इंफोर्मेशन स्क्रीन, 6 एयरबैग्स फीचर्स, महंगे साउंड फीचर्स भारतीयों को लुभा रहे हैं. इस के अलावा महंगी गाड़ियों के सेफ्टी फीचर्स लोगों को खूब लुभा रहे हैं. महंगी गाड़ियां समाज में साख को बढ़ाती हैं. लोग आप पर भरोसा करने लगते हैं. जिस बिजनैस में आप हैं उस में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी इस से संभव होती है.

अच्छी सड़कें होने से एक शहर से दूसरे शहर की दूरी कम हो गई है. अच्छी कारों से यह सफर कम समय में तय हो जाता है. यह बात और है कि महंगी कारें दुर्घटना का कारण बनती हैं. सुरक्षा कारणों से कार चलाने वाला भले ही बच जाएं पर सड़क पर चलने वाले इस की चपेट में आ ही जाता है. पुणे में 2 परिवार तबाह हो गए, जिन के बच्चे अपने परिवार की मदद के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद जौब कर रहे थे.

कानून और अदालतें गुनाहगार को दंड देने से अधिक उस के बचाने का काम करती है. वेदांत अग्रवाल को नाबालिग मान कर उसे छोड़ दिया है. उस के पिता को पुलिस ने पकड़ा है. पिता के खिलाफ केवल यह आरोप है कि उस ने नाबालिग बेटे को गाड़ी चलाने को दी और गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नहीं था. इस मामले में मामूली सजा के बाद आरोपी छूट जाएगा. जिन परिवार के बच्चे हादसे का शिकार हुए, 2-4 दिन रोपीट कर उन के परिवार वाले चुप हो जाएंगे.

क्या कहता है कानून

लापरवाही और तेज गति से व्हीकल ड्राइविंग दूसरों के जीवन खतरे में डालने वालों को जेल जाना होगा. केंद्र सरकार के नए प्रस्ताव के मुताबिक जानलेवा दुर्घटना गैरजमानती अपराध होगा. ऐसे प्रकरणों में दोष सिद्ध होने पर अधिकतम 2 साल की सजा की जगह नए कानून में न्यूनतम 2 साल से ले कर अधिकतम 7 साल तक की सजा भुगतनी पड़ सकती है. सजा को सख्त बनाने के पीछे सड़क दुर्घटनाओं में कमी ला कर यात्रा को सुरक्षित बनाना है.

गृह मंत्रालय ने कहा की आईपीसी (भारतीय दंड संहिता 1860) की सड़क दुर्घटनाओं से संबंधित धाराओं में सुधार किया जा रहा है. आईपीसीसी की धारा 304 में दुर्घटना से मौत या असावधानी से किसी की मृत्यु होने पर अधिकतम 2 वर्ष तक की सजा का प्रावधान था, साथ ही पुलिस को थाने में जमानत पर छोड़ने का अधिकार था. अब आईपीसी की धारा 304 में उपधारा जोड़ कर इसे 304 ए किया किया जा रहा है. कानून तक मसले पहुंचते कम हैं, जो पहुंचते हैं उन को चक्कर लगाने पड़ते हैं. पीड़ित को न्याय नहीं मिलता.

शादी के बाद रिश्ते में आने न दें दूरी, अपनाएं ये तरीके

यूनीसेफ की एक रिसर्च में पाया गया कि अगर मातापिता बच्चे के लिए समय नहीं निकालते और उन की परेशानियों को सुनते नहीं तो ऐसे बच्चे अपने मातापिता या अन्य लोगों के साथ बदतमीजी करने लगते हैं और जिद्दी बन जाते हैं.

बढ़ते बच्चों के पेरैंट्स अकसर यह शिकायत करते हैं कि उन का बच्चा आजकल बदतमीजी करता है, बात नहीं मानता, जिद करता है या फिर बिलकुल उदासीन हो गया है. इस तरह की समस्याएं पेरैंट्स को परेशान करती हैं. बच्चों के जिद्दी और बदतमीज होने के पीछे का मुख्य कारण बच्चों में तनाव यानी स्ट्रैस होता है. जब बच्चों के आसपास तनावग्रस्त माहौल होता है या वे किसी से अपने मन की बात नहीं कह पाते या कोई बैठ कर समझाने वाला नहीं होता तो बच्चे जिद्दी और बदतमीज या मायूस हो सकते हैं.

ऐसे में जरूरी हो जाता है कि पेरैंट्स अपने व्यस्त शेड्यूल से समय निकालें और उन को गाइड करें. उन के साथ बातें करें और उन की समस्याओं पर डिस्कशन करें ताकि उन्हें इस बात का एहसास हो कि पेरैंट्स उन का कितना खयाल रखते हैं और कोई भी मुश्किल आ जाए तो पेरैंट्स उन्हें उस प्रौब्लम से बाहर निकाल लेंगे.

बच्चे आप का समय चाहते हैं और कुछ ऐसा ही आप के जीवनसाथी के साथ भी है. आप का जीवनसाथी भी आप से हर बात शेयर करना चाहता है, कुछ समस्या हो तो डिसकस करना चाहता है और साथ समय बिताना चाहता है. पर अकसर हमारे पास उन के लिए समय नहीं होता और इस का नतीजा अकसर रिश्ते में बढ़ती दूरी के रूप में सामने आता है.

शादी के बाद अकसर कम हो जाता है प्यार

वैसे तो कहा जाता है कि सच्चा प्यार कभी नहीं बदलता लेकिन अकसर देखा गया है कि शादी के बाद पतिपत्नी के बीच प्यार बढ़ने के बजाय कम होने लगता है. एकदूसरे पर जान छिड़कने वाले लोग किसी न किसी वजह से लड़ाई करने लगते हैं.

दरअसल, शादी के कुछ सालों बाद ही सब बदलने लगता है. जैसेजैसे दिन बीतते जाते हैं, पतिपत्नी दोनों को एकदूसरे से शिकायत होने लगती है. पत्नियों को यह लगता है कि पति पहले जैसे रोमांटिक नहीं रहे, प्यार नहीं जताते, साथ समय नहीं बिताते, सरप्राइज नहीं देते, बोरिंग हो गए हैं. वहीं पतियों को लगता है कि पत्नियां अब उन के लिए सजतीसंवरती नहीं हैं, बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताती हैं, घर के कामों में लगी रहती हैं, हमेशा थकान का बहाना करती हैं.

रूममेट सिंड्रोम का फंडा

कई दफा हालात ऐसे हो जाते हैं कि पतिपत्नी के रिश्ते में प्यार और भावनात्मक लगाव की कमी हो जाती है. उन के बीच करीबी रिश्ता बनना भी कम हो जाता है लेकिन परिवार या जमाने के दबाव के चलते वे अलग नहीं हो पाते. ऐसे में वे एक छत के नीचे रहते तो हैं, साथ में खातेपीते भी हैं, घर बाहर के काम, खर्च और घर की जिम्मेदारियां भी आधीआधी बांट लेते हैं पर दिल से दूरी बनी रहती है. बाहर से दिखने पर पार्टनर्स की तरह नजर आते हैं लेकिन उन के रिश्ते में प्यार नदारद होता है. दोनों रिश्ते को बोझ की तरह ढोने लगते हैं.

मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘रूममेट सिंड्रोम’ कहते हैं. यह विभिन्न कारणों से किसी भी रिश्ते में पनप सकता है. लेकिन अगर कपल्स के बीच यह सिंड्रोम पैदा हो जाए तो यह रिश्ते को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने लगता है.

कभी आप ने सोचा है कि पतिपत्नी के बीच दूरियां क्यों बढ़ जाती हैं? पतिपत्नी के बीच बातचीत करने के लिए कोई कौमन टौपिक क्यों नहीं रहता या फिर वे छोटीछोटी बात पर झगड़ क्यों पड़ते हैं?

बौद्धिक जुड़ाव का अभाव

पतिपत्नी के बीच अकसर बातचीत के लिए कोई बौद्धिक टौपिक नहीं रह जाता. वे घर, परिवार या बच्चों की समस्याएं तो डिस्कस करते हैं मगर देश, समाज या राजनीति में क्या हो रहा है, इस पर बात नहीं करते.

वे किताबें या पत्रिकाएं नहीं पढ़ते, इसलिए नई चीजों से अपडेट नहीं रहते. उन के पास किसी नौवेल, आर्टिकल या कहानी डिस्कस करने की सोच नहीं होती. यानी, वे कुछ रोचक बातें नहीं करते जैसा कि हम दोस्तों के बीच करते हैं. वे कुछ मजेदार गेम्स भी नहीं खेलते और कोई गंभीर या कौमेडी मूवी भी साथ नहीं देखते. कुल मिला कर पतिपत्नी दोस्त नहीं बन पाते, इसलिए रिश्ता बोरिंग होने लगता है. एकदूसरे के लिए चार्म खत्म हो जाता है.

सामाजिक प्रथाओं के हिसाब से चलने पर जोर

शादी 2 परिवारों का मिलन होता है जबकि दोनों परिवारों की प्रथाएं अलग होती हैं. 2 अलग घरों के लोग विवाह के बंधन में बंधते हैं और दोनों के घर का रहनसहन, खानेपीने और त्योहारों को मनाने का तरीका सबकुछ अलग होता है. ऐसे में पति अपने घर की प्रथाओं को अहमियत देता है जबकि पत्नी परिवार को अपने तरीके से चलाना चाहती हैं. यही वजह है कि दोनों के बीच नोंकझोंक शुरू हो जाती है और प्यार कम होता नजर आने लगता है.

जिम्मेदारियों का बढ़ना

शादी के पहले लड़के और लड़कियों की कोई खास पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं होती और वे अपनी दुनिया में खोए रहते हैं. लेकिन शादी के बाद रोजमर्रा की जिम्मेदारियां बढ़ने लगती हैं. जिम्मेदारियों का बोझ पतिपत्नी के बीच लड़ाई का बड़ा कारण बन जाता है. लड़के खुद को जिम्मेदार महसूस करने लगते हैं तो नौकरी को सीरियसली लेते हैं और लड़कियां परिवार के सदस्यों का दिल जीतने के लिए घर के कामों में लग जाती हैं. अगर नौकरी करती हैं तो जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. ऐसे में कपल को एकदूसरे के लिए वक्त नहीं मिल पाता.

परिवार का हस्तक्षेप

शादी के बाद अकसर कपल्स की जिंदगी में परिवार का ज्यादा इंटरफेरेंस पतिपत्नी के बीच दरार डाल देता है. ज्यादातर लड़कियां मोबाइल पर अपनी मां, भाभी या बहन को अपनी जिंदगी की हर घटना विस्तार से बताती हैं. हर घटना का प्रौपर पोस्टमार्टम होता है और ससुराल वालों की कमियां गिनाई जाती हैं. इधर लड़के की मां भी रिश्तेदारों के जरिए अपनी बहू की कमियों और दोषों का आकलन करती हैं. इस के बाद दोनों के ही घरवाले पतिपत्नी की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप करने लगते हैं. इस से घर में तनाव बढ़ता है और पतिपत्नी के रिश्ते में अनायास ही दूरी आने लगती है.

पार्टनर को समय न देना

शादी के बाद पतिपत्नी दोनों अपनी दिनचर्या में इतने उलझ जाते हैं कि उन के पास एकदूसरे के लिए समय ही नहीं होता है. समय की कमी भी एकदूसरे के बीच कम होते प्यार की वजह हो सकती है. पत्नी यदि जौब करने वाली होती है तो वैसे ही उस के पास समय नहीं बचता. वह घरेलू हो तो भी आज के समय में मोबाइल से ही छुट्टी नहीं मिलती. इधर यदि बच्चे हो जाते हैं तब तो वैसे ही पतिपत्नी उस में व्यस्त हो जाते हैं.

हक जमाना

शादी की शुरुआत में तो हर कपल के बीच सबकुछ ठीक देखने को मिलता है, लेकिन वक्त के साथ कई बार अगर वे एकदूसरे पर अधिकार जमाने लगते हैं या पार्टनर का अपमान करने को नौर्मल समझते हैं तो रिश्तों में दूरियां बढ़नी शुरू हो जाती हैं.

एक दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं

अपने जीवनसाथी के साथ कुछ खूबसूरत समय जरूर बिताएं. इस समय हर काम से छुट्टी लें और केवल एकदूसरे में खो जाएं. किसी पार्क में जाएं या लाइब्रेरी में रोचक किताबें मिल कर पढ़ें. साथ शौपिंग करें या मूवी देखने जाएं. कभीकभी एडवैंचर ट्रिप पर भी निकलें. मतलब जिंदगी के अनमोल लमहे साथ गुजारें.

तारीफ करने से हिचकें नहीं

जब आप गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड की तरह रिलेशनशिप में होते हैं तो अकसर ही एकदूसरे की तारीफ करते हुए नजर आते हैं. लेकिन शादी के बाद कपल्स अकसर इन चीजों को कम करना शुरू कर देते हैं. जबकि किसी बात के लिए धन्यवाद कहना या तारीफ करना बेहद जरूरी होता है. इस से आप न सिर्फ अपने पार्टनर को अच्छा महसूस कराते हैं बल्कि उस के महत्त्व को भी बताते हैं. जब आप का पार्टनर आप के लिए कुछ खास करता है तो आप का उन्हें थैंक्यू करना भी बनता है. लेकिन अकसर लोग इन बातों को ही इग्नोर करते हैं और उन के रिश्ते में एहसास मरने लगते हैं.

ईगो छोड़ सौरी बोलना सीखें

रिश्ते में लोग अकसर जब अपना ईगो ले आते हैं तो पार्टनर के साथ उन का रिश्ता टूटने लगता है. अगर किसी बात पर आप की गलती है, तो आप को उन्हें सौरी बोलने में बिलकुल भी हिचकिचाहट महसूस नहीं करनी चाहिए. आप को यह समझना होगा कि लड़ाईझगड़े हर कपल के बीच होते हैं लेकिन अपने रिश्ते में प्यार को बनाए रखने के लिए बहस को जितनी जल्दी हो, खत्म कर लेना चाहिए. ऐसे में सौरी बोलना सीख लें.

एकदूसरे से प्रौब्लम शेयर करें और एडवाइस लें

पतिपत्नी का एकदूसरे से सलाह लेना बेहद जरूरी है. ऐसे में दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता भी मजबूत होता है. जिन कपल्स के बीच खुल कर बातचीत करने की आदत होती है वे सालों बाद भी अपने रिश्ते को खूबसूरती से निभा पाते हैं. याद रखें, आप का पार्टनर शादी के बाद आप की जिंदगी का हिस्सा होता है. ऐसे में आप को उस से कुछ भी कहने में हिचकिचाहट नहीं महसूस होनी चाहिए.

पार्टनर पर अपना हक जताना बंद करें

शादी के कुछ सालों बाद जब आप अपने पार्टनर के साथ बुरी तरह से बरताव करते हुए उन पर रोकटोक लगाने लगते हैं या अपनी बातों को मनवाने का प्रयास करते हैं तो रिश्ते की गाड़ी डगमगाने लगती है. अपने साथी की भावनाओं का सम्मान करें और उन के विचारों/सोच का सम्मान करें. जब आप अपने पार्टनर को इज्जत देंगे तो वे भी आप के विचारों की कद्र करेंगे.

उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करें

पतिपत्नी एकदूसरे से पूछें कि उन की आप से क्या अपेक्षाएं हैं, उन्हें क्या पसंद है और क्या नागवार गुजरता है. दोनों अपनीअपनी उम्मीदें, मजबूरियां, परेशानियां आदि सबकुछ खुल कर शेयर करें बिना झगड़ा, बहस, आवाज ऊंची किए, शांत मन से. इस के बाद बीच का रास्ता निकालें. पतियों को समझना होगा कि पत्नी अपना मायका छोड़ कर उस के लिए आई है. किसी भी मुद्दे को ले कर घरवालों की तरफ हो जाना और उसे अकेला छोड़ देना भी ठीक नहीं है. अगर पत्नी की गलती है तो भी उसे अलग से प्यार से समझाया जा सकता है.

पत्नी को समझना होगा कि वह पति की जिंदगी में अभीअभी आई है जबकि यह परिवार उस के साथ उस के जन्म से है. पति का दिल जीतना है तो परिवार के साथ एडजस्ट करने की कोशिश करनी चाहिए.

जिम्मेदारियां मिल कर निभाएं

शादी के बाद जिम्मेदारियां बढ़ती ही हैं. ऐसे में दोनों को एकदूसरे की जिम्मेदारी समझनी होगी. एकदूसरे के कामों में मदद करनी होगी. इस तरह काम जल्दी होंगे तो दोनों साथ समय गुजार सकेंगे, घूमफिर सकेंगे और बातें भी होंगी. शादी के बाद बोरिंग हो चुके रिश्ते में दोबारा रोमांच भरने के लिए वे सारे काम दोबारा करें जो शादी के पहले करते थे. घूमने जाएं, सरप्राइज गिफ्ट्स दें आदि.

गृहशोभा ‘इम्पावर मौम्स’ इवेंट

मदर्स डे के खास मौके पर महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाते हुए दिल्ली प्रैस गृहशोभा मैगजीन ने ‘इम्पावर मौम्स’  इवेंट का आयोजन किया. जिस के सह संचालक एपिस थे. एसोसिएट स्पौंसर जौनसंस एंड जौनसंस, स्किन केयर पार्टनर ग्रीनलीफ, ग्राफ्टिंग पार्टनर डेलब्रिट्रो, होम्योपैथिक पार्टनर एसबीएल और स्पैशल पार्टनर श्री एंड शाम थे. इस कार्यक्रम का पूरा फोकस विमन इम्पावर पर था. यह कार्यक्रम दिल्ली में 18 मई, 2024 को आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम में महिलाओं, जिन में अधिकतर मांएं थी, ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया.

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महिलाओं ने बढ़चढ़ कर लिया हिस्सा

पीडियाट्रिशियन सैशन

सब से पहले पीडियाट्रिशियन डाक्टर श्रेया दुबे ने शिशु देखभाल से संबंधित बातें वहां मौजूद मदर्स से साझा कीं. उन्होंने बताया कि जन्म के पहले 6 महीने तक शिशु को कोई सौलिड फूड नहीं देना चाहिए. अगर यह पहले 6 महीने में दिया जाता है तो बच्चे को इफैंक्शन होने का खतरा रहता है. 6 महीने के बाद बच्चे को मैश किए हुए फ्रूट्र्स जैसे पपीता औैर सेब दिया जा सकता है. इस के अलावा सब्जियों को उबाल कर मैश करके जैसे मैश कददू, चुकंदर, गाढ़ी दाल और दलिया दिया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस बात का खास ख्याल रखें कि 9 महीने तक नमक और 12 महीने तक शुगर या शहद बच्चे को न दिया जाए. उन्होंने आगे कहा कि बच्चे को जबरदस्ती खाना नहीं खिलाना चाहिए. बस उन की प्लेट में खाना परोस देना चाहिए, लगभग 20 मिनट के लिए और उन पर छोड़ दें कि वे कब खाते हैं.

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पीडियाट्रिशियन डाक्टर श्रेया दुबे

इस के अलावा उन्होंने कहा कि लोगों को दूसरे के बच्चों को लेकर कोई नेगेटिव कमेंट नहीं करना चाहिए. इस से बच्चे और उन के पैरेंट्स के मन में नेगेटिविटी आ जाती है. अंत में उन्होंने महिलाओं को मदर्स डे विश करते हुए कहा कि डियर मौम्स आप अमेङ्क्षजग हैं, आप औसम हैं. आप अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं और अपने बच्चों का अच्छी तरह ख्याल रख रही हैं.

ब्यूटी ऐक्सपर्ट सैशन

सैलिब्रिटी ब्यूटी ऐक्सपर्ट डाक्टर भारती तनेजा, जो राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं और माधुरी दीक्षित और सुस्मिता सेन जैसी अभिनेत्रियों का लुक डिजाइन कर चुकी हैं, के आते ही महिलाओं में एक अलग ही उत्साह देखा गया. ऐसा लग रहा था मानो वे उन के ब्यूटी टिप्स सुनने के लिए बेताब बैठी हैं. महिलाओं को और ज्यादा इंतजार न करवाते हुए उन्होंने उन्हें कई स्किन केयर टिप्स दिए. उन्होंने कहा कि खूबसूरती बाहरी और भीतरी दोनों ही होती है और आप में ये दोनों ही होनी चाहिए. उन्होंने कहा आप की पौजिटिव सोच आप को खूबसूरत बनाती है.

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सैलिब्रिटी ब्यूटी ऐक्सपर्ट डाक्टर भारती तनेजा

उन्होंने आगे कहा कि घर और मां की जिम्मेदारी निभातेनिभाते आप अपना ख्याल नहीं रख पाती हैं. लेकिन आप अपने रुटीन में से थोड़ा सा वक्त निकालकर अपना स्किन केयर कर सकती हैं. इस के बाद उन्होंने एक स्किन केयर रुटीन बताया. जिस में उन्होंने घर में मौजूद दाल और चावल को पीसकर उस का स्क्रब बनाना सिखाया. उन्होंने महिलाओं को कई नई ब्यूटी ट्रीटमैंट्स के बारे में भी बताया. उन के द्वारा बताए गए ब्यूटी टिप्स और जानकारी को सभी ने खूब पसंद किया.

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ब्यूटी ऐक्सपर्ट डाक्टर भारती तनेजा को गिफ्ट देते हुए दिल्ली प्रेस के डायरेक्टर मिस्टर अनंत नाथ

फाइनैंस ऐक्सपर्ट सैशन

कहते हैं एक मां सबसे बड़ी योद्धा होती है. वह चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकती. वह अपने बच्चे का ख्याल भी रख सकती है और एक अच्छी निवेशकर्ता भी साबित हो सकती है. इसी बात एहसास उन्हें फाइनैंस ऐक्सपर्ट श्रुति देवड़ा ने कराया. श्रुति देवड़ा मुंबई की रहने वाली एक चार्टड अकाउंटेंट है. जो अपने ऐक्सपर्ट औपिनियन के लिए देशविदेश में जानी जाती हैं.

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श्रुति देवड़ा, चार्टड अकाउंटेंट

उन्होंने इवेंट में मौजूद महिलाओं और मांओ को निवेश संबंधी जानकारी दी. उन्होंने बताया कि छोटेछोटे निवेश से शुरुआत करके आप एक बड़ी बचत कर सकती हैं और इस के जरिए अपने सपनों को पूरा कर सकती हैं. साथ ही उन्होंने बताया कि निवेश में कितने समय के लिए निवेश किया जा रहा है यह सब से ज्यादा महत्वपूर्ण है. जितने ज्यादा समय के लिए निवेश किया जाएगा उतना ज्यादा ब्याज मिलेगा. इसलिए निवेश लंबे समय के लिए करें. अंत में फाइनैंस ऐक्सपर्ट श्रुति ने महिलाओं के निवेश संबंधी प्रश्नों के उत्तर दिए. जिन्हें सुनकर महिलाएं बेहद संतुष्ट नजर आईं.

 

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होस्ट गेम से जुड़े सवाल पूछते हुए

गेमिंग सैशन

ऐक्सपर्ट सैशन के बाद होस्ट अंकिता ने कुछ मजेदार गेम्स खिलवाए. जिस में सब से लंबे ईयररिंग गेम, वह मां जिस का बच्चा सब से छोटा है, ऐसी मां जिस के पास बेबी प्रौड्क्ट मौजूद है जैसे मजेदार गेम शामिल थे. वहां मौजूद महिलाओं से यह भी पूछा गया कि उन्होंने अपनी मां से क्या सीखा, जिस में उन्होंने अपने अपने ऐक्सपीरियंस सभी से साझा किए. इन प्रतियोगिताओं में विजयी महिलाओं को वनलीफ ब्रिहांस की तरफ से गिफ्ट्स हैम्पर दिए गए.

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गेम में हिस्सा लेती हुई महिलाएं
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गेमिंग सैशन

कार्यक्रम के अंत में सभी को गुडी बैग्स दिए गए. मदर्स डे के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया यह कार्यक्रम महिलाओं के बीच खासा हिट रहा.

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प्रतिभागी को मिले गिफ्ट
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