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धनकुबेर हुनर के शहंशाह

तमाम देशी और विदेशी अरबपतियों की सूची में भारतीयों की मौजूदगी अब सुर्खियां नहीं बटोरती क्योंकि अब हर साल फोर्ब्स पत्रिका में जारी होने वाली अरबपतियों की सूची में तमाम भारतीयों की मौजूदगी आम बात हो गई है. कुछ ऐसे ही हुनरमंदों के बारे में बता रहे हैं लोकमित्र.

हर साल सितंबरअक्तूबर माह में जारी होने वाली ‘फोर्ब्स’ पत्रिका की अरबपतियों की सूची में भारतीयों की मौजूदगी आम बात है. लेकिन इन सूचियों में अब ऐसे प्रोफैशनल अरबपतियों के नाम सामने आने लगे हैं जो अभी भी, पारंपरिक तरीके से सोचें तो, रईसियत के पर्याय नहीं. मसलन, सामान्य अध्यापकों और बाबुओं से ले कर मिस्त्रियों तक के बेटे या बेटियां अब इस श्रेणी में आने लगे हैं. अभिनेता अमिताभ बच्चन के पिता शिक्षा विभाग में कार्यरत थे. क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर के पिता मराठी के लेक्चरर थे वहीं महेंद्र सिंह धौनी के पिता एक सार्वजनिक उपक्रम में तकनीकी कर्मचारी थे. अभिनेता शाहरुख खान की मां का मिट्टी के तेल का डिपो था. अगर सरसरी निगाह से सोचें तो यह जेहन में नहीं आता कि इतनी सामान्य पृष्ठभूमि से उठ कर भी कोई अरबपति हो सकता है. नए अरबपतियों की सूची में यही एक नई और ध्यान खींचने वाली बात है.

अमिताभ बच्चन ग्लैमर की दुनिया के भले दशकों तक शहंशाह रहे हों लेकिन जब उन की कंपनी एबीसीएल डूबी तो उन पर कई करोड़ रुपए का कर्जा था. सुनने में तो यहां तक आया है कि कुछ दिनों के लिए उन्हें अपना एक बंगला भी गिरवी रखना पड़ा था. हो सकता है यह बात सही नहीं हो लेकिन इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उन की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. शायद उस दौर में उन के बड़े से बड़े शुभचिंतक को भी यह उम्मीद नहीं रही होगी कि एक दिन बिग बी इन सब चीजों से उबर जाएंगे और अपनी अद्भुत प्रतिभा व प्रोफैशनल निष्ठा की बदौलत बदलते दौर में भी रोल मौडल बन जाएंगे.

पर ऐसा ही हुआ. जिन दिनों यानी पिछली सदी के आखिरी दशक के मध्यार्द्ध में जब टीवी चैनलों का जादू फीका पड़ने लगा था, वे ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसा सुपरडुपर हिट प्रोग्राम ले कर आए और देखते ही देखते फिर छा गए. इस प्रोग्राम की जबरदस्त सफलता से अमिताभ ने साबित कर दिया कि वे परदे की दुनिया के शहंशाह हैं, चाहे परदा छोटा हो या बड़ा.

आज भी विश्लेषणकर्ता, विशेषज्ञ यह साफसाफ कह पाने में असमर्थ हैं कि ‘कौन बनेगा करोड़पति’ ने जादू अपने कंटैंट की बदौलत बिखेरा या अमिताभ बच्चन की अद्भुत पेशेवराना प्रतिभा के चलते. जो लोग कहते हैं कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम अपने विषय के चलते ही सफलता का हकदार था उन की बात पूरी तरह से गलत नहीं है, लेकिन अमिताभ बच्चन जैसी सहज प्रस्तुति, अद्भुत चुंबकीय व्यक्तित्व, खनकता हुआ उन का बेहद शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता व शुद्धता में जादुई सी लगती उन की हिंदी. इन सब ने इस कार्यक्रम को सुपरडुपर हिट बनाने में अपना अद्भुत योगदान दिया था.

यही वजह है कि अमिताभ बच्चन ने कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम की असाधारण सफलता के चलते न सिर्फ अपनेआप को फिर से फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर लिया बल्कि आर्थिक संकट के तमाम दुश्चक्रों से बाहर निकल आए.

अपने कौशल, हुनर और विचार की बदौलत देश में जिन पेशेवरों ने बहुत ऊंचा स्थान हासिल किया है उन में अमिताभ के साथसाथ सचिन तेंदुलकर और शाहरुख खान भी मौजूद हैं.

सचिन तेंदुलकर से पहले शायद ही कभी किसी ने सोचा हो कि कोई खिलाड़ी 500 करोड़ रुपए का भी कौंट्रेक्ट साइन कर सकता है. भारत के खेल परिदृश्य में यह काल्पनिक रकम थी जिस पर सचिन तेंदुलकर ने कौंट्रेक्ट साइन किया. सचिन तेंदुलकर ने प्रतिभा की बदौलत खेल के मैदान में कमाई करने का वह रिकौर्ड बनाया है जिसे शायद ही आने वाले दिनों में कोई भारतीय तोड़ पाए. हालांकि आज भी सचिन तेंदुलकर को यूरोप और अमेरिका की टेनिस सर्किट के मुकाबले बहुत कम पैसा मिलता है लेकिन फिर भी वह इतना ज्यादा है जितना दुनिया के शायद ही किसी क्रिकेटर ने कभी कल्पना में भी हासिल किया हो.

महेंद्र सिंह धौनी भी उन्हीं की तरह आगे बढ़ रहे हैं. हालांकि अभी वे किसी सार्वजनिक की गई अरबपतियों की सूची का हिस्सा नहीं हैं लेकिन इन दिनों बाजार में उन की जो कीमत है, उतनी किसी और खिलाड़ी की नहीं है. कुछ मामलों में तो वे सचिन तेंदुलकर पर भी भारी पड़ते हैं.

बौलीवुड के बादशाह शाहरुख खान ने सफलता का शिखर छू कर न सिर्फ अमिताभ की कुरसी के लिए अपना मजबूत दावा कई साल पहले पेश किया था बल्कि अमिताभ की तरह ही उन की कमाई का ग्राफ भी लगातार ऊंचा रहा है.

वैसे पिछले कुछ सालों में सलमान खान और आमिर खान ने भी किसी भी तरह से शाहरुख से कम पैसा नहीं कमाया, लेकिन शाहरुख और इन दोनों खानों में एक खास फर्क है. शाहरुख ने विशुद्ध रूप से महज अपनी अभिनय प्रतिभा बेच कर यह मुकाम हासिल किया है जबकि बाकी दोनों खान पहले से ही आर्थिक रूप से बेहद संपन्न रहे हैं और दोनों की पृष्ठभूमि भी इन के पहले से ही फिल्मी रही है. शाहरुख खान कारवां में अकेले खान हैं जिन के आगेपीछे परिवार का कोई भी सदस्य इस इंडस्ट्री से जुड़ा नहीं रहा.

अरबपतियों की हुनरमंद पौध में शहनाज हुसैन, नैना लाल किदवई, किरण मजूमदार शा और इंदिरा नूई भी शामिल हैं. जहां किरण मजूमदार शा को विरासत में बायोएक्सपर्ट पिता और इसी क्षेत्र के विशेषज्ञ पति का साथ मिला, वहीं शहनाज हुसैन और नैना लाल किदवई ऐसी पृष्ठभूमि से ताल्लुक नहीं रखती हैं जो आज उन की शानदार सफलता का आधार है. इन्हीं में इंदिरा नूई भी शामिल हैं.

सच बात तो यह है कि इन भारतीय महिलाओं ने भारत के स्त्री समाजशास्त्र में चुपके से एक क्रांतिकारी अध्याय सृजित किया है, जिसे भविष्य में युगपरिवर्तक मोड़ के रूप में पढ़ा और समझा जाएगा. हर्बल क्वीन के नाम से मशहूर शहनाज हुसैन ने अपनी यात्रा एक छोटी सी पगडंडी से शुरू की थी. आज वे 4 अरब रुपए से ज्यादा के चौरस राजमार्ग की हर्बल क्वीन हैं. किरण मजूमदार शा देश की अकेली बायो क्षेत्र की सब से सफल शख्सीयत हैं, वहीं नैना लाल किदवई और इंदिरा नूई ने कौर्पोरेट बोर्डरूम में स्त्रियों के नेतृत्व को नई परिभाषा दी है.

कुल मिला कर आज की तारीख में भारत में 20 ऐसे अरबपति हैं जो पहली पीढ़ी के अरबपति हैं और ये सब के सब प्रोफैशनल हैं यानी इन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमताओं से यह मुकाम हासिल किया है. हां, यह बात जरूर है कि इन में से कइयों के पीछे विरासत में शानदार बौद्धिक आधार रहा है. लेकिन धनकुबेरों के लिए जो पारंपरिक परिभाषा रही है कि मुंह में चांदी का चम्मच ले कर पैदा होने वाले ही अपने हाथ सोने के बनाते हैं, वैसा आधार उन के साथ नहीं रहा.

सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में आज इस तरह के हुनरमंद धनकुबेरों का जलवा है. चाहे कंप्यूटर किंग बिल गेट्स हों या सोशल मीडिया को धनकुबेर में बदल देने वाले मार्क जुकरबर्ग. बिल गेट्स ने अपनी किताब ‘रोड अहेड’ में एक जगह कहा है, ‘विचार संपदा की कुंजी है.’ हालांकि इस बात को अकेले बिल गेट्स ने ही कहा हो, ऐसा नहीं है. यह विचार उन के कहे जाने के पहले से ही मौजूद है. लेकिन जब बिल गेट्स कहते हैं तो यह बात इसलिए भी ज्यादा विश्वसनीय हो जाती है क्योंकि बिल गेट्स ने सिर्फ कहा भर नहीं है, कर के दिखाया भी है.

नए धनकुबेरों की सफलता कथा पुराने धनकुबेरों से कहीं ज्यादा रोमांचक है मगर मिथकीय नहीं है, क्योंकि इन की सफलता कथा में चमत्कार जैसे शब्द की कोई भूमिका नहीं है. अपने एक साक्षात्कार में बिल गेट्स ने कहा है, ‘मैं जहां भी भाषण देने जाता हूं, लोग मुझ से एक सवाल जरूर पूछते हैं. आप इतने सफल कैसे बने? और मैं बारबार यह जवाब दे कर थक चुका हूं कि सचमुच इस में कोई रहस्य नहीं है. मैं तो सिर्फ अपने आइडिया की बदौलत जो कुछ हूं, आप के सामने हूं.’

महान दार्शनिक एमर्सन ने अपनी मशहूर कृति कंडक्ट औफ लाइफ वैल्थ’ में कहा है, ‘‘संपदा वास्तव में अपने दौर में प्रकृति को समझना है.’’ नए दौर के धनकुबेरों ने यही किया है. आधुनिक धनकुबेरों ने सफलता की मिथकीय गाथाओं में बिलकुल नए आयाम जोड़े हैं.

मसलन, सचिन तेंदुलकर को लें. सचिन तेंदुलकर ने अगर अपना नाम हिंदुस्तान के 20 सब से रईस लोगों में शुमार करवाया है तो इसलिए नहीं कि वे यह लक्ष्य ले कर चले थे. उन की यह सफलता उन का क्रिकेट के प्रति अद्भुत समर्पण और जिजीविषा का नतीजा है. सिर्फ अपने प्रोफैशनल समर्पण और खेल के प्रति कमिटमैंट के चलते सचिन ने यह मुकाम हासिल किया है.सिर्फ नई पीढ़ी के धनकुबेरों में ही अपने विचार और हुनर के प्रति निष्ठा रही हो, ऐसा नहीं है और यह भी पूरी तरह से सच नहीं होगा कि सिर्फ इसी पीढ़ी ने इस तरह की सफलता हासिल की. अजीम प्रेमजी नई पीढ़ी के उद्योगपतियों में नहीं शुमार किए जाते. वे इस नई पीढ़ी से पहले की पीढ़ी के उद्योगपति हैं और सिर्फ राष्ट्रीय धनकुबेरों की सूची में ही दर्ज हों, ऐसा नहीं है. वे फोर्ब्स की इंटरनैशनल अरबपतियों की लिस्ट का भी हिस्सा हैं. उन की सफलता में भी धन से धन कमाने की जगह विचार को धन में बदल देने का कारनामा शामिल रहा है.

अजीम प्रेमजी के बापदादा अनाज और खाने के तेल का कारोबार करते थे. उन का पोस्टमैन वनस्पति घी काफी मशहूर रहा है. लेकिन जब अजीम प्रेमजी इस कारोबार के मुखिया बने तो उन्होंने कुछ ही दिनों के भीतर पुराने कारोबार को टाटा बायबाय कह दिया. उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हाथ आजमाया. हालांकि उन दिनों उन का पारंपरिक कारोबार जमाजमाया था, लेकिन जमेजमाए कारोबार को छोड़ कर उन्होंने कंप्यूटर और बाद में सौफ्टवेयर के क्षेत्र में अपना हाथ आजमाया और आज वे आईटी सैक्टर के सब से सफल कारोबारियों की सूची में महत्त्वपूर्ण

स्थान रखते हैं. कुछ साल पहले तक 17,600 करोड़ रुपए की नैटवर्थ के साथ वे भारत के सब से अमीर व्यक्ति थे, लेकिन आज उन की जगह मुकेश अंबानी ने ले ली है. मुकेश अंबानी अपने हुनर की बदौलत आज बुलंदियों पर हैं.

अपने विचारों और तकनीक के प्रति समर्पण के चलते जिन 2 और व्यक्तियों ने सफलता की अद्भुत ऊंचाइयां हासिल की हैं उन में एचसीएल के शिवनाडार और इन्फोसिस टैक्नोलौजी के एन आर नारायणमूर्ति हैं. दोनों में अद्भुत प्रोफैशनल क्षमता रही है.

एन आर नारायणमूर्ति को कुछ साल पहले ‘ईस्टर्न आई’ अखबार ने भारत के चौथे सब से प्रोफैशनल अरबपतियों में शुमार किया  था. उन के पास उस समय 47 अरब रुपए की संपत्ति थी. नारायणमूर्ति भी 80 के दशक की शुरुआत में ऐसे ही प्रतिभाशाली उभरते हुए सितारे थे जिन के पास मजबूत विचार और विश्वास था, लेकिन पूंजी नहीं थी. तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें पारंपरिक पूंजी के मालिक घास नहीं डाल रहे थे. लेकिन आखिरकार उन की प्रतिभा को उन की पत्नी सुधामूर्ति ने पहचाना और खुद अपने कैरियर को दांव पर लगा कर नारायणमूर्ति के महत्त्वाकांक्षी विचारों को आधार मुहैया कराया रिटायरमैंट के बाद. आज फिर से वे इन्फोसिस कंपनी के चेयरमैन पद पर काबिज हैं और इन्फोसिस को बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए तत्पर हैं.

बहरहाल, आज विचार पूंजी बन चुका है बशर्ते आप को उस की मार्केटिंग करनी आती हो और उस का रिश्ता आम लोगों के साथ जोड़ना आता हो. इसीलिए आज के धनकुबेर पहले के धनकुबेरों से भिन्न हैं.

अर्थव्यवस्था की दुर्दशा करती सामाजिक व्यवस्था

देश की गिरती आर्थिक सेहत और रुपए की दुर्दशा पर आंसू बहाने वाली सरकार, जनता और उद्योग जगत को समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था को इस हालत तक पहुंचाने वाले वे खुद ही हैं. वास्तविकता तो यह है कि भारत की कमजोर आर्थिक व्यवस्था हमारी उस संस्कृति का नतीजा है जो सदियों से अकर्मण्यता व निकम्मेपन का संदेश देती रही है. धर्मप्रचारकों का अंधविश्वासी प्रचार, चमत्कार पर निर्भरता और सरकार व जनता का निठल्लापन किस तरह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ रहा है, बता रहे हैं जगदीश पंवार.

देश की गिरती अर्थव्यवस्था को ले कर सरकार चिंतित है. उद्योग जगत निराश है और आम जनता नाखुश है. डौलर के मुकाबले रुपए की रिकौर्ड गिरावट के चलते आयातनिर्यात पर बुरा असर पड़ा है. रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतों से जनता हैरानपरेशान है. प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह संसद में स्वीकार कर चुके हैं कि वास्तव में देश की आर्थिक सेहत ठीक नहीं है. वित्त मंत्री पी चिदंबरम आर्थिक बदहाली के लिए उन से पूर्व वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी के अदूरदर्शी फैसलों को जिम्मेदार बताते हैं. रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे सुब्बाराव जातेजाते कह गए कि सरकार की गलत राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते आर्थिक हालात खराब हुए हैं.

सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद रुपए में मामूली सुधार ही आ पाया पर महंगाई लगातार बढ़ रही है.  थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर अगस्त में लगातार तीसरे माह बढ़ कर 6.1 फीसदी पहुंच गई. खुदरा महंगाई की दर भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. आम आदमी सब से ज्यादा परेशान खानेपीने और पैट्रोलडीजल की बढ़ती कीमतों से है. पैट्रोल, डीजल की कीमतें पिछले 3 महीनों में छठी बार बढ़ीं. हालांकि पिछले दिनों पैट्रोल की कीमतें घटाई गईं पर प्याज, टमाटर व अन्य सब्जियां और तेल, दाल और आटा की कीमतें आसमान छू रही हैं. आने वाले दिनों में रसोई गैस व केरोसिन की कीमत में भी इजाफा होने की संभावना है.

दूसरी ओर आर्थिक प्रगति के लिए जरूरी नए उद्योगों व व्यापारों के लिए निवेशक हाथ पीछे खींच रहे हैं. निवेशकों की नजर में भारत में बेलगाम भ्रष्टाचार है. लालफीताशाही हावी है और बुनियादी ढांचे में ठहराव के साथ वित्तीय दबाव है. आयातनिर्यात पर भी असर पड़ रहा है. चालू खाते का घाटा 1991 के पहले के स्तर पर पहुंच गया है और राजकोषीय घाटे में सुधार के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं. यानी आर्थिक सुधार जहां से शुरू हुए थे, यह सरकार वापस वहीं चली गई है. गौरतलब है कि 1992 में मनमोहन सिंह जब नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री थे तब आर्थिक नीतियों की शुरुआत की गई थी. कहा गया है कि भारत के पास अब केवल 7 माह का विदेशी मुद्रा भंडार बचा है और इस के बाद अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेने की नौबत आ सकती है.

वर्ष 1991 में आर्थिक संकट इतना गहरा था कि पी वी नरसिम्हा राव सरकार को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भारत का 67 टन सोना गिरवी रख कर 2.2 बिलियन डौलर का आपात कर्ज लेने के लिए बाध्य होना पड़ा था. आर्थिक हालात के बदतर होने के लिए सरकार की नीतियों को दोषी ठहराया जा रहा है लेकिन क्या वास्तव में हमारे देश के खराब आर्थिक हालात के कारण सिर्फ सरकारों की नीतियां ही हैं? क्या इस देश का हर नागरिक, हर संस्था देश के आर्थिक उत्पादन में मदद कर रहे हैं? क्या हर नागरिक अपना कर्तव्य निभा रहा है? किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में कमोबेश हरेक नागरिक का योगदान होता है लेकिन क्या यहां जनता अर्थोपार्जन कर अपने घर, परिवार, समाज और देश के विकास में सहायता कर रही है? क्या यहां का हरेक व्यक्ति आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर है? क्या नागरिक उत्पादकता में वे अपनी भागीदारी दे रहे हैं?

असल में देश की 1 अरब 30 करोड़ की आबादी में से केवल 10 प्रतिशत लोग ही कमाने वाले हैं. बाकी किसी न किसी के कंधे पर लटके हुए हैं. यानी दूसरों पर निर्भर हैं. उद्यमशीलता अवरुद्ध है. यहां मांग कर खाना या मुफ्त का खाना शर्म की बात नहीं, धर्म माना गया है. दरअसल, भारत की अर्थव्यवस्था की दिक्कतें अर्थशास्त्र से नहीं, सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं.

हमारी जो संस्कृति है वह अकर्मण्यता, निकम्मापन का संदेश देने वाली है. हमारे यहां पर किसी व्यक्ति को परिश्रम का पाठ पढ़ाया ही नहीं जाता. यहां निकम्मेपन का गुणगान किया गया है. निकम्मों का मानसम्मान किया गया है. काम करने का जिम्मा संपूर्ण समाज को नहीं, एक वर्ग को दिया गया. बाकी को उस पर निर्भर छोड़ दिया गया.

धर्म ने समाज को वर्णव्यवस्था के नाम पर बांट दिया. जिस में ब्राह्मण, क्षत्रिय को अर्थोपार्जन का काम नहीं दिया गया. ब्राह्मण सिर्फ पढ़नेपढ़ाने, पूजापाठ करनेकराने का काम करेगा, क्षत्रिय की जिम्मेदारी सिर्फ  रक्षा करने की होगी. अर्थाेपार्जन का काम केवल वैश्य का होगा. यानी व्यापार, वाणिज्य वैश्य करेगा. शूद्र को इन तीनों वर्णों की सेवा का जिम्मा दिया गया. दलित तो अछूत थे, समाज के अंग ही नहीं थे.

काम के बंटवारे की सदियों पुरानी इस सामाजिक व्यवस्था का असर अभी तक देखा जा सकता है. इस व्यवस्था की वजह से ही हमारे देश में लाखों पंडेपुजारी, साधुसंत, गुरु, महंत, प्रवचक, शंकराचार्य, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, ज्योतिषी, तांत्रिक, ओझा, मुल्ला, मौलवी, पादरी, गं्रथी किसी तरह की उत्पादता से दूर, निठल्ले बैठ कर मेहनतकश लोगों की कमाई पर ऐश कर रहे हैं.

इस देश में छोटेबड़े तकरीबन 5 करोड़ धर्मस्थल हैं. इन धर्मस्थलों के बाहर बगैर काम कर के खाने वाले कोई लाखों भिखारी बैठे हैं. जो इन धर्मस्थलों की महिमा गाते हैं और मुफ्त में खाने के हक को भगवान का दिया हक बताते फिरते हैं.

हमारे धर्मों और संस्कृतियों ने मेहनत के बजाय भिक्षावृत्ति का खूब गुणगान किया है. भीख मांगने वाले को आदर, सम्मान दिया गया. निकम्मों को ऊंचा ओहदा मिला. शूद्र अगर मेहनत कर शिल्प का काम करता है तो भी उसे सम्मान के काबिल नहीं माना गया. यानी हम मेहनतकश नहीं, बेकार लोगों की जमात पैदा कर रहे हैं जो इस देश, समाज और व्यक्ति पर बोझ बनी हुई है.

ब्राह्मण, पुरोहितों, पंडों के जवाब में दूसरे वर्ण ने भी अपनेअपने मंदिर, मठ, आश्रम स्थापित कर लिए और अपने पुरोहित बना लिए. यानी जो काम इन वर्गों के लिए धर्म ने निषिद्ध किया था, उन में से कुछ ने उसे अपना लिया. इस का मतलब है परिश्रम करने वाले लोगों की संख्या और सीमित हो गई. बिना काम किए लूटने वाला नया वर्ग पैदा हो गया. नई आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद पिछले करीब 2 दशक से काम न करने वालों का एक नया वर्ग पैदा हो गया.

देश के धर्मस्थल हमारे कारखानों, फैक्टरियों, कंपनियों से ज्यादा धन पैदा कर रहे हैं. यहां जिस ने भगवा पहन लिया, देखते ही देखते वह करोड़ोंअरबों में खेलने लगता है. मजे की बात है कि बिना कुछ किएधरे हमारे यहां धर्म का साम्राज्य राज्य से भी ज्यादा समृद्ध और ताकतवर है. यानी आडंबर और पाखंड का कारोबार दिन दूना चमक रहा है. धर्म की अर्थव्यवस्था में मंदी की कभी कोई गुंजाइश नहीं रही.

हमारे देश में धर्म का सालाना कारोबार 50 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का होने का अनुमान है. यह दुनिया के कई छोटे देशों के वार्षिक बजट को मिला कर भी अधिक बैठता है. यह धन मेहनतकश लोगों का है जो धर्म व ईश्वर के नाम पर की जा रही बेईमानी, चालबाजी पर  बड़ी श्रद्धा के साथ चढ़ाया जा रहा है.

महाराष्ट्र के गणपति उत्सव की बात करें तो वहां पूजा के नाम पर केवल 10 दिन में 500 से 700 करोड़ रुपए बिना टैक्स दिए पंडों द्वारा वसूल कर लिए जाते हैं. यह धन देश के किसी एक छोटे राज्य के बजट के बराबर है. यहां हजारों की संख्या में पंजीकृत गणपति मंडल हैं और करीब इतने ही गैर पंजीकृत हैं. 10 लाख से अधिक घरों में गणपति की विधिविधान से पूजा कराने पंडे ही आते हैं. यह संख्या अलग है.

इसी तरह पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा उद्योग 40 हजार करोड़ रुपए सालाना का बताया जाता है. इस में एक हिस्सा स्वार्र्थी लोगों के पास जाता है जिस का कोई टैक्स भुगतान नहीं किया जाता.  इसी तरह बिना हींग, फिटकरी के देशभर में रामलीला उद्योग खूब पनप रहा है. इन धर्मस्थलों के पास लाखों एकड़ उपजाऊ भूमि नाजायज तरीके से हड़पी हुई है. हाल में बलात्कार के आरोप में जेल में बंद आसाराम के कब्जे में देशभर में हजारों एकड़ जमीन है. जिस जमीन पर अन्न उत्पादन या कलकारखाने लगने चाहिए, वहां पाखंड का धंधा चलाया जा रहा है.

देश के मंदिरों में सैकड़ों टन सोना दबाया जा रहा है. देवीदेवताओं के रथ, सिंहासन, घंटे, घडि़याल, छत्र, कंगूरे, दरवाजे, सीढि़यां, चौखटें सोने से सजाई जा रही हैं. गिरती अर्थव्यवस्था के चलते पिछले दिनों वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने जनता से सोने की खरीदारी न करने की अपील की थी लेकिन धर्मस्थलों में धड़ल्ले से पुण्य के बदले सोना चढ़ाया जा रहा है. आंध्र प्रदेश में तिरुपति मंदिर, महाराष्ट्र में शिरडी, मुंबई में सिद्धिविनायक, केरल में पद्मनाभस्वामी जैसे मंदिरों में अकूत सोना दबा है. कहा जाता है कि जितना सोना सरकार के पास नहीं है उस से कई गुना इन धर्मस्थलों में पड़ा है. यानी जो धन लिक्विडिटी में यानी चलन होना चाहिए, वह धर्मों की तिजोरियों में बंद है.

गांवों, कसबों और शहरों में लोग खाली बैठे गपें हांकते, ताश खेलते मिलते हैं. चौपाल में, पेड़ों के नीचे बैठे मिलेंगे, लड़ाईझगड़ा करते और झूठी चौधराहट करते मिलेंगे पर काम करते नहीं. घर में 10 सदस्य हैं तो कमाने वाला एक है. घर के सारे के सारे कमाने वाले नहीं. वे इसी एक की कमाई से ही संतुष्ट हैं. भले ही घर में अभाव हो. यह एक रिवाज, परंपरा सी बनी हुई है और इस पर लोगों को गर्व भी है. भूख, गरीबी में भी काम न करना, है न कमाल की बात.

मजे की बात है कि बहाने भी हजार हैं. घर में औरत अकेली है, अकेली औरत को छोड़ना ठीक नहीं, बच्चों को कौन देखे, घर में एक मर्द का रहना जरूरी है, पशुओं को संभाले कौन? यानी इस तरह के बहानों ने गरीबी, भुखमरी, बेकारी और अपराध को खूब बढ़ावा दिया.

कई तो धर्म के प्रचार में दिनरात एक कर रहे हैं. कोई जाति का नेता बना हुआ है, कोई  गोत्र का झंडा उठाए हुए है, कोई देवता का, कोई मजार का. कहीं भजनकीर्तन चल रहा है, कहीं गुरु का प्रवचन तो कहीं भागवत कथा चल रही है. कहीं साईं संध्या तो कहीं माता के जागरण या चौकी में जुटे हैं.

लोग घरों में पूजापाठ, हवनयज्ञ में लगे हुए हैं, तीर्थयात्रा पर हैं. ऐसे करोड़ों लोग हैं जिन्हें देख कर लगता है मानो ये इसी काम के लिए जन्मे हैं. और तो और, लोग इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ रहे हैं.

गजब का माहौल है. अरे भई, फिर इस देश में काम कौन कर रहा है? ऐसे में जनता क्यों हल्ला मचा रही है कि महंगाई है, भ्रष्टाचार है, सरकार कुछ नहीं कर रही है. आप से पूछा जाए, आप क्या कर रहे हैं? क्या सारे काम सरकार ही करेगी? नागरिकों का कोई दायित्व नहीं?

हमें परिश्रम को छोड़ कर चमत्कारों पर भरोसा करने की सीख दी गई. खाली बैठ कर रामनाम की माला जपने से ही सबकुछ हासिल हो जाने का आश्वासन दिया गया. केवल पूजापाठ, प्रार्थना, हवनयज्ञ और मात्र ईश्वर के दर्शनों से ही मनोकामना पूर्ण होने की गारंटी दी गई.

खाली बैठे लोग नशाखोरी को अनिवार्य मानते हैं. यहां हर कोई किसी न किसी नशे का सेवन करता है. देश में लाखों लोग जुआ, सट्टे की लत के शिकार हैं. जुआ, सट्टा बिना मेहनत किए बैठेबिठाए पैसा कमाने का जरिया हमारी महाभारतकालीन परंपरा का हिस्सा है.

सरकारें धर्मों के विकास पर अरबों रुपए खर्च कर रही हैं. अमरनाथ, हज, वैष्णोदेवी, केदारनाथ जैसी यात्राओं के नाम पर खजाना खुला ही रहता है. इस से लोगों को अकर्मण्यता की ओर धकेला जा रहा है. क्या यह पैसा लोगों को कर्म की ओर प्रेरित करने में नहीं लगाना चाहिए?  होना यह चाहिए कि जो काम नहीं करता उसे खाने का हक भी नहीं.

आज संप्रग सरकार को खाद्य सुरक्षा बिल, रोजगार गारंटी, शिक्षा की गारंटी, निशुल्क स्वास्थ्य जैसे कानून और अरबों की योजनाएं हमारी इसी सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था के कारण लानी पड़ रही हैं.

इस के विपरीत चीन, जापान, यूरोप के देश तरक्की करते जा रहे हैं. चीन, जापान में हर व्यक्ति को काम करने की प्रेरणा कानूनों और परंपराओं से मिली है. जापान में हर जन के हाथ काम में लगे हैं. उन का अपने देश की अर्थव्यवस्था में योगदान है. यूरोप पुनर्जागरण के बाद तेजी से तरक्की के रास्ते पर चल पड़ा. मार्टिन लूथर ने पोपशाही के खिलाफ बोलने का साहस किया और अमेरिका चर्च के झूठे पाखंडों से हट कर आर्थिक विकास की ओर मुड़ गया. फिर तो दुनिया का इतिहास बदल गया. जंगलों में रहने वाली गोरों की कौम ने दुनियाभर पर राज करना शुरू कर दिया.

क्या हमारे यहां ऐसा कोई शासक आया जिस ने गुरुडम के खिलाफ दो शब्द भी कहने की हिम्मत दिखाई? उलटे तमाम नेता, शासक गुरुओं के चरणों में नतमस्तक दिखाई पड़ते रहे. आंकड़े बताते हैं कि आज 1 चीनी नागरिक 1 भारतीय से तीनगुना ज्यादा अमीर है. 2012 में भारत की प्रति व्यक्ति आय घट कर चीन के मुकाबले सिर्फ

24 प्रतिशत रह गई. अकेला चीन भारत को 54 प्रतिशत माल का आयात कर रहा है. इस में बड़ी संख्या उपभोग की वस्तुओं की है. जबकि आयात किया जाने वाला माल आसानी से भारत में भी बनाया जा सकता है. हमारे यहां निर्यात की तुलना में आयात तेजी से बढ़ रहा है.

हम अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था की वजह से अपनी क्षमता से बहुत कम प्रदर्शन कर पाते हैं. निकम्मापन, आरामतलबी हमारी नसनस में समाई हुई है, इसलिए तरक्की की दौड़ में हम पिछड़ रहे हैं. हमारा धर्म देश में सटोरिए, जुआरी, नशेड़ी, सट्टेबाज, कबूतरबाज, भ्रष्टाचारी, बेईमान और बिना मेहनत किए रातोंरात अमीर बनने की ख्वाहिश रखने वाली पीढि़यां पैदा कर रहा है, उद्यमशील व्यक्ति नहीं. लोगों में निचला, पिछड़ा बनने की होड़ लगी है. समाज इस बात में उलझा है कि लड़की की शादी किस गोत्र में हो.

हमारी यह पुरानी व्यवस्था गरीबी, काम किए बिना धन पाने की मानसिकता पैदा करती है, सो, आर्थिक समानता के बजाय आर्थिक असमानता बढ़ती जाती है. विकास, तरक्की को हमारी जातियों, धर्मों, वर्गों में बंटे समाज ने अवरुद्ध कर रखा है. आएदिन के दंगों, तनावों ने अरबों की संपत्ति को नष्ट किया. रहासहा उत्पादन ठप किया. हम इसी सोच के चलते बारबार अतीत के गीत गाते हैं. लफ्फाजी ज्यादा और काम कम करते हैं. बिना मेहनत किए कथित भगवान से ‘छप्पर फाड़ कर’ पाने की बेकार की उम्मीदें पाले रखते हैं. गरीबी, भुखमरी, बेकारी को हम पूर्व जन्म के कर्मों का फल मान कर कामधाम नहीं करते.

योजना आयोग के एक अध्ययन के अनुसार, उदारीकरण के बाद 1 करोड़ 40 लाख लोग खेती से बेदखल हो गए और विनिर्माण क्षेत्र में 53 लाख लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है. यानी यह जमीन मेहनतकशों से छीन कर निकम्मों को दे दी गई.

सदियों से सरकारें सेना की ताकत बटोरने में ही लगी रहीं. राजामहाराजा हमेशा युद्धों में उलझे रहे. किसी अच्छे उद्देश्य के लिए नहीं, इसलिए ताकि दूसरे की धन, संपदा पर कब्जा किया जा सके.  हमारी सरकार नए पंडों की जमातें बन गईं जो काम नहीं करतीं, काम में रुकावट डालती हैं. पिछले ढाई हजार सालों में जो झंझावात चला वह देश, समाज, व्यक्ति के विकास के लिए नहीं, दूसरों पर वर्चस्व और लूटखसोट के लिए चला.

व्यवस्था गरीबों और आम लोगों को ही नहीं, अमीरों को भी सब्सिडी की रेवडि़यां बांट रही है. खाद्य सुरक्षा  बिल के तहत सरकार 1.20 लाख करोड़ रुपए बांट रही है तो 32 लाख करोड़ रुपए कौर्पोरेट को सब्सिडी के नाम पर भेंट कर रही है. इस दान के बावजूद औद्योगिक उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है.

मौजूदा समय में सरकार ने उत्पादन के बजाय सर्विस उद्योग की ओर ध्यान केंद्रित किया पर इस से बिचौलिए, सटोरिए, दलाल पैदा हो गए. बेईमानी अधिक पनपी. लिहाजा, मनमोहन सिंह अब फिर सर्विस से ध्यान हटा कर उत्पादन की बात कहने लगे हैं.

पिछले साल कारोबार के बेहतर माहौल वाले देशों की सूची में भारत का स्थान 132 से फिसल कर 182वें पर आ गया. दिक्कत यह है कि सरकार भी धर्म की राह पर चल रही है. हम दूसरे देशों के बजाय आर्थिक उत्थान वाले कानून नहीं, निकम्मेपन को प्रश्रय देने वाले कानून ज्यादा बना रहे हैं. इन कानूनों में बिना मेहनत किए बैठेबिठाए लोगों को भोजन, मकान देने के पक्के इंतजाम हैं.

हमारे नेताओं का सारा ध्यान अयोध्या में राममंदिर बनाने में, केदारनाथ में पूजापाठ शुरू कराने में, लैपटौप बांटने, बेरोजगारों को भत्ता देने, नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने जैसी बातों में ज्यादा है. बजाय इस के कि इस देश में जो निठल्ली सोच है उस में बदलाव कैसे लाया जाए.

संसद का ज्यादातर समय फालतू की बहसों, मसलन, प्रधानमंत्री को चोर क्यों कहा? सत्ता पक्ष ने विपक्ष को बेईमान क्यों कहा? संसद, विधानसभाओं में प्रतिनिधि काम की ठोस बातें करने के बजाय नदारद रहते हैं या सोए देखे जा सकते हैं या फिर पौर्न वीडियो देखने में मशगूल रहते हैं.

धार्मिक नेताओं, संगठनों को चिंता इस बात की अधिक रहती है कि उन के धर्र्म के लोग दूसरे पाले में तो नहीं जा रहे हैं. दूसरे धर्म के लोग उन की निंदा तो नहीं कर रहे हैं. उन के तीर्थ, मंदिरों का विकास हो रहा है या नहीं. उन्हें चिंता इस बात की नहीं है कि उन के धर्म के लोगों की गरीबी कैसे दूर हो, उन को रोजगार कैसे मिले, वे मेहनत कर रहे हैं या नहीं.

मीडिया इस बात पर बहस करने में ज्यादा रुचि दिखा रहा है कि बलात्कारी आसाराम की जमानत होगी या नहीं, गैंग रेप केआरोपियों को सजा उम्रकैद होगी या मृत्युदंड? अमिताभ बच्चन की फिल्म चलेगी या नहीं? आज आप का दिन अच्छे शकुन से गुजरेगा या नहीं? यात्रा, नौकरी पर जा सकते हैं या नहीं? 300 से अधिक टैलीविजन चैनलों में से 1 में भी ऐसा कार्यक्रम नहीं देखने को मिल रहा जो लोगों को परिश्रम की प्रेरणा देता हो. इन पर नाच, गाने, धार्मिक पूजापाठ, कथाएं, खानेपिलाने और ढोंगी बाबाओं के खोखले प्रवचनों के प्रपंच दिनरात चलते रहते हैं.

ऐसे में इस देश की अर्थव्यवस्था की बेहतरी की बात कौन करेगा माली हालत कैसे सुधरेगी? इस देश में कितने लोग निकम्मे हैं, क्या उन्हें भोजन पाने का हक होना चाहिए? जिन का आर्थिक उत्पादन में कोई सहयोग न हो, उन से काम कैसे कराया जाए, क्या ऐसी किसी सोच पर अमल होगा?

अर्थशास्त्र में भूमि, श्रम, पूंजी और उद्यमिता उत्पादन के मूल साधन माने जाते हैं. क्या हमारी संस्कृति में, जनता और राज की सोच में ये सब चीजें शामिल हैं? किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती वहां के लोगों के परिश्रम, कर्मशीलता, काम के प्रति ईमानदार सोच, लगन पर निर्भर करती है. देश में विकास की चमक अगर फीकी दिखने लगती है तो इस का मतलब है विकास हवाई महल की तरह है जो हलके झोंके से ही भरभरा कर गिर सकता है. ठोस, मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए हर नागरिक के हाथ में काम होना जरूरी है.

सुरक्षा की महत्ता

भारत कुछ समय से कम से कम एशिया की बड़ी सैनिक शक्ति बनने की कोशिश कर रहा है. भारत का कोचीन में बना विक्रांत जब पानी में उतरा तो बहुत खुशी हुई कि भारत विशाल जहाज बना सकता है जिस पर हवाई जहाज उतर सकें पर उस उस के कुछ दिन बाद ही परमाणु ईंधन से चलने वाली पनडुब्बी सिंधुरक्षक में लगी आग ने भारतीय नौसेना को सकते में डाल दिया है. भारत के पास केवल 8 पुरानी पनडुब्बियां बची हैं और इस दुर्घटना के बाद उन की जांचपड़ताल कुछ ज्यादा ही होगी.

दूसरी ओर चीन के पास डीजल से चलने वाली 47 और परमाणु ईंधन से चलने वाली 8 पनडुब्बियां हैं. वह अपने बेड़े में लगातार विस्तार भी कर रहा है. हमारा प्रबल शत्रु पाकिस्तान भी बहुत पीछे नहीं जबकि उस का समुद्रतट उतना लंबा नहीं है जितना भारत का है. व्यापार की सुरक्षा के लिए नौसेना बहुत आवश्यक है क्योंकि किसी खटपट के चलते यदि शत्रु ने कभी जल रास्ते रोक दिए तो बहुत सी आवश्यक सामग्री, जिस में पैट्रोल सब से महत्त्वपूर्ण है, आना बंद हो सकता है.

हमारी सेना के उपकरणों में हादसे होते रहते हैं. जिस तरह हमारे टैंक, तोपें, मिग हवाई जहाज रखे जा रहे हैं, उस से लगता नहीं कि देश में किसी को रक्षा के महत्त्व का एहसास है. यहां सेना रिश्वत के मामलों में बंटवारे पर होती लड़ाई के समय चमकती दिखाई देती है.

हमारे नेता चुनाव रैलियों में या लालकिले पर चढ़ कर बड़ीबड़ी बातें करते हैं पर देश की सेना कितनी लुंजपुंज है, यह अब किसी से छिपा नहीं है. अरबों के खर्च के बावजूद सेना ऐसा भरोसा नहीं दिला पा रही कि वह रूस, चीन, इंगलैंड जैसे देशों से मुकाबला कर सकती है. हम आमतौर पर हथियारों के लिए उन्हीं रूस, अमेरिका, इटली, जरमनी, डेनमार्क आदि पर निर्भर रहते हैं जो पैसे तो मनमाने लेते हैं पर क्या देते हैं या जो देते हैं, क्या हम उन्हें चलाना भी जानते हैं, इस पर कोई बोलना नहीं चाहता.

अब भी समय है कि हम सेना को वैदिक ग्रंथों की तरह का दरजा दे कर आलोचना से ऊपर रखने की कोशिश न करें. देश में बुद्धिमानों व परिश्रम करने वालों की कमी नहीं पर वे राजनीति, कूटनीति व रिश्वतनीति नहीं जानते.

उन की आलोचना सुनने में कोई हर्ज नहीं है. अगर वे कह रहे हैं कि सेना में भ्रष्टाचार है, खरीदी में बेईमानी है, खरीदा गया सामान घटिया है, सैनिकों का मनोबल कमजोर है तो उसे सुना जाए. सेना पर पड़ा परदा हटाना चाहिए ताकि पनडुब्बी या मिग विमानों के गिरने के हादसों के कारण साफ हो सकें. यह बहस देशद्रोह नहीं होगी क्योंकि देश की सेना का असल हाल क्या है, विदेशियों को आमतौर पर मालूम रहता है.

सुरक्षा का एहसास तभी होगा जब हम अपने बारे में सच, पूरा सच जानेंगे. आधेअधूरे झूठ के सहारे सपने बुने जा सकते हैं, हकीकत का मुकाबला नहीं किया जा सकता.    

कश्मीर पर बयानबाजी

पूर्व सेना अध्यक्ष विजय कुमार सिंह  का सार्वजनिक रूप से यह मान लेना कि आजादी के बाद से ही सेना, जम्मूकश्मीर के मंत्रियों को शांति बनाए रखने के लिए पैसा देती रही है, एक गंभीर अपराध है. यह बात उन्होंने अपने बचाव में तब कही जब उन पर आरोप लगे कि वे पैसा दे कर जम्मूकश्मीर की सरकार को गिराना चाहते थे. अब वे यह नहीं कह रहे कि यह तथ्य गलत है बल्कि यह कि इस बात का खुलासा करने वाले को दंडित किया जाए.

जम्मूकश्मीर निसंदेह बहुत संवेदनशील राज्य है. मुसलिम बहुल इस राज्य पर सिख राज के जमाने से हिंदू शासकों ने कब्जा जमा लिया था और 1947 में राजा हरिसिंह नलवा ने काफी हिचक और नानुकुर करने के बाद ही भारत में उस के विलय की संधि पर हस्ताक्षर किए थे. उस देरी के कारण ही राजा का एकतिहाई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया था और आज तक भारत उसे छुड़ा नहीं पाया है.

यही नहीं, भारत खासा पैसा खर्च करने के बावजूद वहां की जनता को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर पाया कि उस का जीवन भारत में ज्यादा सुखी रहेगा. कश्मीर के कठमुल्ले कश्मीरियों को पाकिस्तान में विलय के लिए उकसाते रहते हैं. और पाकिस्तान अंगरेजों द्वारा नियुक्त रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट के सिद्धांत के अनुसार, कश्मीर पर अपना हक मानता है. ऐसे में सिर्फ बयानबाजी से मामले को उलझाना बेवकूफी है.

पूर्व सेना अध्यक्ष वी के सिंह वास्तव में विवाद खड़े करने में माहिर हैं. कभी वे सेना की खरीद पर विवादों में आते हैं, कभी अपनी उम्र पर तो कभी अपने निजी गुप्तचर संगठन पर.  क्या भारतीय जनता पार्टी को ऐसे ही विवादित लोग मिलते हैं जो निर्माण की जगह विध्वंस में विश्वास करते हैं? नरेंद्र मोदी ने 2002 में धर्म के नाम पर मुसलमानों की सुरक्षा के एहसास का विध्वंस किया, लालकृष्ण आडवाणी ने राममंदिर के लिए बाबरी मसजिद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राजग यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का.

राम मिलाए जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी. सो वी के सिंह सही जगह पहुंचे हैं.

अदालत और जनप्रतिनिधि

जिन चुने प्रतिनिधियों पर अपराध साबित हो गया हो वे विधानसभा या लोकसभा के सदस्य नहीं रह सकते, सुप्रीम कोर्ट की कानूनों की इस व्याख्या ने हड़कंप मचा दिया क्योंकि कितने ही विधायक व सांसद ऐसे हैं जिन्हें 1 अदालत ने अपराधी करार दिया पर अभी उन की अपीलों पर विचार होना बाकी है. वे बाहर हैं क्योंकि उन्हें जमानत मिली हुई है और इसी नाते वे अपनी सदस्यता बनाए रख पा रहे हैं. चूंकि इस के दायरे में लालू प्रसाद यादव जैसे कई नेता आ रहे हैं, इसलिए कांगे्रस ने अध्यादेश बनाया ताकि वे आधेअधूरे सदस्य बने रह सकें. 

पर इस अध्यादेश पर जो जनरोष पैदा हुआ और जिस तरह से राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आंख मूंद कर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया उस से कांग्रेस के तेवर ढीले पड़ गए. राहुल गांधी ने एक आम प्रैस सम्मेलन में अचानक पहुंच कर इस अध्यादेश को नौंनसैंस यानी बेहूदा और फाड़ कर फेंकने लायक घोषित कर दिया. उस से कांग्रेस ही नहीं, अध्यादेश का विरोध कर रहे दल भी सकते में आ गए.

अध्यादेश तो अब पानी में गया और नतीजे के तौर पर सोमवार, 30 सितंबर को रांची की एक विशेष अदालत के फैसले के अनुसार चारा घोटाले मामले में लालू प्रसाद यादव को मुजरिम करार दे दिया गया. यह घोटाला लालू प्रसाद यादव के तब के संयुक्त बिहार के मुख्यमंत्री रहते किया गया था. उन्हें सजा ही नहीं हुई, शायद वे वर्षों तक चुनाव भी न लड़ सकें. हां, अगर अपील में उन की जीत हो जाए तो बात दूसरी.

अपराध सिद्ध होने पर भारतीय कानून में अपील का अधिकार है. आमतौर पर गंभीर आपराधिक मामला न हो और केवल आर्थिक हो तो अपील के दौरान जमानत मिल जाती है. केवल जघन्य अपराधों में अदालतें अपील के दौरान अपराधी को जेल में रखती हैं. यह व्यवस्था ठीक है वरना अपील के अधिकार का मतलब ही नहीं रह जाएगा क्योंकि अगर अपील के दौरान अपराधी 10-12 वर्ष जेल में रहने के बाद निरपराध सिद्ध हो तो जेल में रहे दिन तो वापस नहीं मिलेंगे. अपील का अधिकार ही न हो तो सजा दी जा सकती है.

नेताओं का अपराधी होना गंभीर बात है पर इस का फैसला जनता के हाथ में है. जनता अगर अपराधियों को चुनती है तो उन्हें स्वीकारने के अलावा कोई चारा नहीं. कोई कानून नेताओं पर केवल इसलिए लागू हो कि राजनीति से अपराधी तत्त्व निकालने हैं, गलत होगा. कानून नेताओं पर उसी तरह लागू होना चाहिए जैसा आम आदमियों पर लागू होता है.

लगता यह है कि अदालतें राजनीति को साफ करने में जरूरत से ज्यादा उत्सुक हैं पर जनता को न्याय देने में बिलकुल नहीं. अगर अपराध हुआ तो पता चलने के 4-5 महीनों में सभी अदालतें फैसला क्यों नहीं दे सकतीं? यदि रेल दुर्घटना होती है तो बीमारों का इलाज क्या 5 साल बाद किया जाएगा? यदि बाढ़ आई है तो हफ्तों विचार तो नहीं किया जाएगा कि कैसे बाढ़ में फंसे लोगों को बचाया जाए? सो, अदालतों का काम न्याय करना है तो वे तुरंत करें.

अदालतों में देरी होने के कारण ही देश में आपाधापी है. किसी अफसर, सरकारी बाबू या नेता की अपराध करने की हिम्मत ही इसीलिए होती है क्योंकि वह जानता है कि पकड़ा गया तो अदालतें फैसला करने में 20 साल लगाएंगी. जब अदालतें अपने आप को नहीं सुधार सकतीं, तुरंत न्याय नहीं दे सकतीं तो वे नेताओं से कौन सी व कैसी नैतिकता की मांग कर सकती हैं?

आतंकवाद का आतंक

केन्या में 1 मौल पर और पाकिस्तान में 1 चर्च पर तालिबानियों व दूसरे मुसलिम आतंकवादियों के कू्रर हमलों पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. धर्म की रीत ही यह है कि अपने विरोधियों या अपने भगोड़ों को मार डालो, नष्ट कर डालो, जला डालो. धर्म टिका ही हिंसा पर है जो जबरन थोपी जाती है और जिस के बल पर लोगों के मन में धर्म के प्रति आस्था, डर, विश्वास स्थापित किए जाते हैं.

कू्रर से कू्रर अपराधी भी अपनी हिंसात्मक करतूत को जायज ठहराने के लिए कोई न कोई स्पष्टीकरण पैदा कर लेता है कि वह जो कर रहा है, सही है और उस हालत में वही एकमात्र उपाय है. फर्क यह है कि कू्रर अपराधी को समाज सजा देता है पर हिंसक धार्मिक प्रचारक की पूजा की जाती है, उसे बहादुर कहा जाता है और मरने पर शहीद कहा जाता है.

केन्या के नैरोबी में और पाकिस्तान के पेशावर के चर्च में मरने वालों ने इसलाम के खिलाफ न तो कुछ किया था, न कहा था. केन्या, पाकिस्तान, अमेरिका हो या भारत, धार्मिक आतंकवादी गुनाह और सजा के चक्कर में नहीं पड़ते. उन्हें तो मोहरे चाहिए जिन पर आक्रोश जता कर वे यह साबित कर सकें कि उन के हाथ कितने लंबे हैं और उन के हथियार कितने खतरनाक हैं.

एक तरह से वे विधर्मियों या विदेशियों को नहीं, अपने देश में, अपने समाज में संदेश देते हैं कि उन की अनसुनी न की जाए वरना वे अपनों के साथ भी वही कर सकते हैं जो निहत्थे, निर्दोषों के साथ करते हैं. दरअसल, यह धर्म के खोखलेपन को छिपाने की तरकीब है और मानना पड़ेगा कि यह बेहद सफल है.

इसलामी देशों में इसी आतंकवाद के कारण लोग सत्ता के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर रहे. अधिकांश मुसलिम कट्टर देश बेहद गरीब हैं. जहां तेल मिल गया वहां पैसा है. मुसलिम देशों में लोकतंत्र नहीं है. कट्टर मुसलिम देशों में तो औद्योगिक प्रगति भी न के बराबर है. दुनियाभर के गरीब मुसलिम तेल पैदा करने वाले देशों में गुलामी कर रहे हैं पर वे अपने शासकों और कट्टरपंथियों के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे.

मुसलिम देशों में समाज सुधार न के बराबर है. वहां औरतों को तो छोडि़ए, आदमियों को बराबर के अधिकार नहीं हैं. वहां की जेलें निर्दोषों से भरी हैं. केवल मुल्ला और तानाशाह मौज करते हैं. वे इंसानों को हिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं. सद्दाम हुसैन ने इराक में, कर्नल मुअम्मर गद्दाफी ने लीबिया में, राष्ट्रपति अल असद ने सीरिया में अपने ही लोगों पर गोलियां चलाईं, अपनों को मारा. हिंसा का पाठ पढ़नेपढ़ाने वाले मुसलिम आतंकवादी इतने तंगदिल और बदमिजाज हैं कि किसी पर भी बंदूक उठाने या बम फेंकने पर उन के दिल में दर्द नहीं होता. ऐसा हर धर्म के कट्टर लोग सदियों से करते रहे हैं, यहूदियों ने जीसस के साथ किया, शंकराचार्य ने बौद्धों के साथ किया, हिटलर ने यहूदियों के साथ भी ऐसा ही किया. इस बार की घटनाएं धर्मजनित हिंसा के इतिहास के पहाड़ में बारीक बालू के कणों की तरह हैं, इस से ज्यादा नहीं.

 

आपके पत्र

सरित प्रवाह, सितंबर (प्रथम) 2013

‘सीमा पर हमला’ के तहत आप के विचार पढ़े तो याद आया कि पाकिस्तान ने अपने संविधान में संशोधन कर अपने प्रधानमंत्री को सेना का ‘सुप्रीम कमांडर’ घोषित कर उन को ‘असीमित पावर’ दी थी लेकिन जिस तरह पाक सेना बारबार एलओसी पर भारतीय सैनिकों का खून बहा कर, अंतर्राष्ट्रीय कायदेकानूनों का उल्लंघन कर रही है और पाक पीएम मेमने की तरह मरी सी आवाज में शांति, भाईचारे व वार्त्ता का राग अलाप रहे हैं वह यह कड़वा सच ही उजागर करती है कि इस्लामाबाद की गद्दी पर चाहे कोई भी पीएम बन बैठे, राज वहां की सेना ही करेगी.

दुख है तो बस इस बात का कि हमारे प्रशासक आतंकवाद से ग्रस्त पड़ोसी की ही मानो हां में हां मिलाते हुए उस के जैसी राह पकड़ लेते हैं. यह हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व की अक्षमता, कायरता व कमजोरी को ही प्रमाणित करता है.

ताराचंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)

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‘सीमा पर हमला’ शीर्षक से प्रकाशित आप की संपादकीय टिप्पणी पढ़ी. अच्छी लगी. सीमा के प्रहरी को सलाम. भारतवर्ष के प्रहरियों की हौसलाअफजाई कर के आप ने सभी देशवासियों का उत्साहवर्धन किया है. पाकिस्तान के जवानों द्वारा हमारे प्रहरियों को धोखा दे कर मारना घोर निंदनीय है. हमारी वर्तमान सरकार की नीयत में खोट होने के चलते हमारी विदेश नीति धराशायी होती प्रतीत हो रही है.

डा. जसवंत सिंह, कटवारिया सराय (न.दि.)

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आप की टिप्पणी ‘सीमा पर हमला’ पढ़ी. आप ने सच कहा, जंग खुद एक मसला है, हल नहीं. पाकिस्तान 66 सालों से भारत के खिलाफ लगातार विषवमन कर रहा है. समझौता ऐक्सप्रैस चले, दोनों देशों के गायक, क्रिकेटर, फिल्मकार, साहित्यकार कितना ही संवाद क्यों न साधें, वहां के हुक्मरानों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन की कुरसी की सलामती के लिए कश्मीर मुद्दे को बनाए रखना एकमात्र शर्त है. उन का एक ही एजेंडा है आतंकियों को शह देना. पाक कभी न सुधरने वाली शै है.पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेशक जर्जर है, वह युद्ध झेल नहीं सकता पर भारत को उकसाने की कार्यवाही लगातार जारी रखे हुए है. दरअसल, अमेरिका, सार्क देशों पर निगाह रखने के लिए पाकिस्तान को अपना बेस कैंप बनाना चाहता है. अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने पांव की जूती समझता है. वह उस को उकसाना और सहलाना दोनों काम साथसाथ करता है.

आप ने सही कहा है कि कूटनीतिक स्तर पर ही कश्मीर मसले के समाधान की पहल होनी चाहिए.

इंदिरा किसलय, नागपुर (महा.)

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संपादकीय टिप्पणी ‘सीमा पर हमला’ में पाकिस्तानियों द्वारा की गई भारतीय जवानों की हत्या पर जो आक्रोश प्रकट किया है वह भारत की जनता का भी है. हमला चाहे सैनिकों द्वारा किया जाए या घुसपैठियों द्वारा, पाक सेना का हाथ अवश्य होता है. निश्चय ही दोनों देश युद्ध लड़ने की हालत में नहीं हैं. कितना अच्छा होता कि पाकिस्तान लोकतंत्र के साथ अपने देश को विकास के मार्ग पर ले जाता पर उस की मति मारी गई है. वह हमेशा भारत के साथ युद्ध छेड़ने की फिराक में रहता है. भारत से दुश्मनी बनाए रखने और अमेरिका से पैसे ऐंठने को वह बड़ी राजनीति समझता रहा है.

पाकिस्तान न तो खुद चैन से जीएगा और न ही पड़ोसियों को चैन से जीने देगा. इसलिए, अच्छा यही होगा कि भारत इन हमलों का प्रतिकार तो करे पर युद्ध में उलझने से बचे.

माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)    

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संपादकीय टिप्पणी ‘सीमा पर हमला’ में आप के विचार पढ़े. हर बड़ी घटना के बाद सरकार कहती है कि सीमाओं की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएंगे, हर जरूरी कदम उठाए जाएंगे और सेना सीमा की रक्षा करने में सक्षम है. वहीं सेना कहती है कि बस, सरकार के आदेश का इंतजार है. यही हमारी कमजोरी समझी जाने लगी है. ऐसी कमजोरी कि सीमा पर हमारे जवानों को मारा जा रहा है.समय की नजाकत को देखते हुए चीन व पाकिस्तान को उन्हीं की भाषा में जवाब देने और बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार सीमा पर चौकसी कड़ी करने का आदेश देने में सरकार को हिचक नहीं होनी चाहिए. जम्मू के पुंछ में अघोषित पाकिस्तानी हमले में शहीद 5 जवानों में से 1 बिहरा (बिहार) के विजय कुमार राय की पत्नी पुष्पा देवी द्वारा ‘मुआवजा नहीं जवाबी कार्यवाही चाहिए’ कहते हुए मुआवजा लौटा देना गौरतलब है. यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि 2014 तक अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों की वापसी के बाद हमारी चुनौतियां और बढ़ेंगी.

कृष्णकांत तिवारी, भोजपुर (बिहार)

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आप की टिप्पणी ‘किसानों की जमीन’ और ‘पिटाई समस्या का हल नहीं’ पढ़ीं. आप के विचार समाज के लोगों को जागरूक करने की दिशा में बेहद कारगर हैं. यह पीड़ाजनक बात है कि सरकारें कानून का खौफ खाए बिना किसानों की जमीनों की छीनाझपटी कर अरबों रुपयों का बंदरबांट कर रही हैं. बेचारे किसान ठगे जा रहे हैं. यह तो भला हो न्यायालयों का, ‘कानून को ठेंगा’ दिखाने वालों को वे यह बता रहे हैं कि कानून से बड़ा कोई नहीं है चाहे वह आम आदमी हो या राजनेता.

प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

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भूमि की बंदरबांट

सितंबर (प्रथम) अंक में प्रकाशित ‘भूमि अर्जन विधेयक 2011 : कानून के सहारे हक’ लेख में देश के आजाद होने से अब तक जिस प्रकार से देश के नेताओं, नौकरशाहों, भूमाफियाओं, उद्योगपतियों, धार्मिक संतों द्वारा भूमि पर कब्जा करने का उल्लेख किया गया है वह सराहनीय है. मैं भूमि अर्जन विधेयक 2011 के संबंध में देश की लोकप्रिय पत्रिका सरिता के माध्यम से भारत सरकार लोकसभा, राज्यसभा के सदस्यों से सुझावों के रूप में कहना चाहूंगा कि कहने को तो भारत कृषि प्रधान देश है और इस की आबादी 130 करोड़ है. देश की इस आबादी को अन्न, फल, सब्जी व खाद्य पदार्थ की जितनी जरूरत है उस के मुताबिक कृषि की उतनी उपजाऊ जमीन को सुरक्षित रखा जाए ताकि देश को जमीन के अभाव में अनाज व खाद्य पदार्थ विदेशों से आयात न करना पड़े.

देश के उद्योगपतियों, राजनेताओं व नौकरशाहों और तथाकथित संतों ने देश की कृषि भूमि पर फार्म हाउस व धार्मिक आश्रमों के नाम पर जितनी उपजाऊ जमीन पर कब्जा कर रखा है उसे वापस लेने का प्रस्ताव भी विधेयक में शामिल किया जाए.

देश के महानगरों, नगरों व कसबों में भूमाफियों ने गरीब काश्तकारों से कौड़ी के भाव में काफी कृषिभूमि ले कर कब्जा कर रखा है, वे बाद में आवास एवं व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बढ़े हुए दामों पर बेचेंगे. इस तरह की सभी जमीनें सरकार वापस लेने हेतु भूमि अर्जन विधेयक में प्रस्ताव रखे.

जगदीश प्रसाद पालड़ी, जयपुर (राज.)

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राजनीति का काला चेहरा

सितंबर (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘लोकतंत्र में लूटतंत्र की ताकत’ में काफी निर्भीकता से रेतमाफिया व सत्ता के गठबंधन का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत किया गया है. चुनावों में बेशुमार चंदा देने वालों के गैरकानूनी गोरखधंधों को प्रश्रय देना सियासत का चरित्र बन गया है. सियासतदानों के गैरकानूनी रास्ते में अडं़गा डालने वाले कर्मनिष्ठ व ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया जाता है.

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन व उन्हें क्लीन चिट देने वाले डीएम रविकांत सिंह के स्थानांतरण की कार्यवाही निर्लज्जता, स्वार्थपरता और तानाशाही की पराकाष्ठा है. राजस्थान में एसपी पंकज चौधरी, हरियाणा में आईएएस अशोक खेमका, गुजरात में आईपीएस अशोक भट्टर का भी कुछ ऐसा ही हश्र हुआ है. क्या इस प्रकार की कार्यवाहियों से साहसी व कर्तव्यपरायण अफसर कुंठित व हतोत्साहित नहीं होते हैं?

अर्चना विकास खंडेलवाल, जबलपुर (म.प्र.)

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सितंबर (प्रथम) अंक पढ़ा. ‘लैपटौप का लौलीपौप’ लेख में दर्शाया गया है कि यह सपा सरकार की एक लुभावनी चाल है, बिलकुल सही है. यह युवा वोटरों को लुभाने की तकनीक मात्र है. देखा जाए तो अभी हमारे देश की शैक्षणिक प्रणाली उतनी विकसित नहीं हुई है कि छात्रों को लैपटौप व टैबलेट पर आश्रित होना पड़े. मीडिया के बाद यदि कोई छात्र तकनीकी क्षेत्रों में अपना कैरियर बनाना भी चाहता है तो इस के लिए वह जिस संस्थान में नामांकन करवाता है वहां आवश्यकतानुसार लैपटौप या टैबलेट दिए जाते हैं, जिस की कीमत उन की फीस में ही संलग्न होती है.गौरतलब है कि विश्व में जनसंख्या जिस प्रकार बढ़ रही है, भविष्य में खाद्यान्न का संकट एक बहुत बड़ी समस्या बनने वाली है. ऐसे में लैपटौप बांट कर ग्रामीण युवकों का शहरीकरण करना क्या अनुचित नहीं है? क्या लैपटौप चलाने वाले युवकयुवती अच्छे कृषक बन पाएंगे? भविष्य की आवश्यकता को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह युवकों को कृषि क्षेत्र की ओर प्रोत्साहित करे. लैपटौप के बदले में कृषियंत्र या कृषि संबंधी जानकारी दे ताकि भविष्य में खाद्यान्न संकट की समस्या उत्पन्न न हो. सरकार को यह सोचना चाहिए कि डाक्टर या इंजीनियरों की संख्या दोचार कम भी हो, तो भी कोई बात नहीं परंतु किसानों की कमी मनुष्य ही नहीं बल्कि  जीवजंतुओं की भी मौत का कारण बनती है.

आरती प्रियदर्शिनी, गोरखपुर (उ.प्र.)

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खुदगर्जी से कायम नाजायज रिश्ते

सितंबर (प्रथम) ‘ब्लैकमेलिंग का फसाद यौन शोषण’ पढ़ कर लगा जैसे वर्तमान समय में सैक्स को महत्त्वाकांक्षा की सीढ़ी और इस के पूरा न होने पर ब्लैकमेलिंग का हथियार बना दिया गया है. राजनीतिज्ञों के साथ सैक्स स्कैंडल ज्यादा जुड़े रहे हैं. इस का अहम कारण है राजनीतिज्ञों की मानसिकता कि जब वे सत्ता पर काबिज होते हैं तो उन्हें याद ही नहीं रहता कि उन का ध्येय देशसेवा है.

राजकुमार का 3 वर्ष से यौन शोषण होता रहा, फिर भी वह चुप था. उस ने राघवजी को अपने लक्ष्यप्राप्ति का साधन बनाया. दंड का भागी तो यह लड़का भी है. बेहद दुखद स्थिति है कि हम ऐसे राजनेताओं को पाल रहे हैं जिन का चरित्र ही खराब है. नारायण दत्त तिवारी का चरित्र तो उस तसवीर के साथ जगजाहिर हो गया था जब राजभवन में वे 3 लड़कियों के साथ रंगरेलियां मना रहे थे. लेकिन उज्ज्वला शर्मा जैसी महिलाएं भी कम दोषी नहीं जो कभी तो अपनी उम्मीदों को परवान चढ़ाने के लिए प्रेयसी बनती हैं और कभी यौन शोषण का आरोप लगाती हैं. मधुमिता ने भी यही किया और जान गंवा बैठी. फिलहाल, गोआ में एक राजनेता कई लड़कियों के साथ मौजमस्ती करते हुए पकड़े गए. आखिर कैसे घिनौने प्रतिनिधियों को चुन रहे हैं हम.

सवाल उठता है उन का जो यौन शोषण का आरोप लगाते हैं. आखिर क्यों वे ऐसे आरोप मढ़ते हैं? अभी यौन शोषण और बलात्कार जैसे शब्द भ्रमित करते हैं. तस्लीमा नसरीन ने लेखक सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का आरोप लगाया क्योंकि उन की पुस्तक ‘द्विखंडिता’ पर रोक लगाई गई. लेखिका ने ट्वीट किया, ‘सुनील गंगोपाध्याय ने मेरी किताब पर रोक लगवाई. उन्होंने मेरा और दूसरी महिलाओं का यौन शोषण किया. वे साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं, यह शर्मनाक है.’

मतलब, यदि पुस्तक हिट होती तो सब जायज था. अभिनेत्री रंजीता ने स्वामी नित्यानंद पर आरोप लगाया कि उन्होंने 40 बार उस का रेप किया.

दरअसल, आज यौन शोषण शब्द तब उभरता है जब कोई महत्त्वाकांक्षा की सीढ़ी से लुढ़कता है. जब स्त्रीपुरुष आपसी सहमति से एकदूसरे से संबंध बनाते हैं तो फिर वहां शोषण जैसा सवाल ही कहां रह जाता है. सच तो यह भी है कि प्राकृतिक यौन तुष्टि केवल पुरुष ही नहीं स्त्री भी करती है और इस के लिए वह तत्पर भी रहती है. इसलिए यौन शोषण जैसा घटिया शब्द बोलना बंद हो. जितना दोष यौन शोषक का है उतना ही शोषित का भी. इसे मजाक न बनाएं.

शशिकला सिंह, सुपौल (बिहार)

मुग्धा की चाहत

फिल्म ‘फैशन’ से अपना कैरियर शुरू करने वाली मुग्धा इस साल तिग्मांशु धूलिया की ‘साहिब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न’ के अलावा प्रकाश झा की ‘सत्याग्रह’ में भी दिखीं, पर सिर्फ कैमियो रोल में. फिल्मों के उतारचढ़ाव के बारे में वे कहती हैं, ‘‘हर किसी की जिंदगी में उतारचढ़ाव आते हैं. मेरा काम कड़ी मेहनत करना है और मैं उसे दिल से कर रही हूं.’’

दरअसल, फिल्म इंडस्ट्री में यह माने नहीं रखता कि आप कितने बड़े या कितने छोटे स्टार हैं. आप का अभिनय कैसा है यह तब तय होता है, जब फिल्म रिलीज होती है.             

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