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जौली अमृता

लंबे अरसे से एक हिट फिल्म को तरस रही अभिनेत्री अमृता राव इन दिनों काफी खुश हैं. खुश हों भी क्यों न, उन की फिल्म ‘जौली एलएलबी’ का रिसपौंस काफी अच्छा रहा. इतना ही नहीं, 2002 से बौलीवुड में?डेब्यू करने वाली अमृता कई बड़ी फिल्मों में भी काम कर रही हैं. प्रकाश झा की फिल्म सत्याग्रह में जहां वे बिग बी, अजय देवगन व करीना के साथ नजर आएंगी वहीं अनिल शर्मा की फिल्म ‘सिंह साहब द ग्रेट’ में सनी देओल के साथ. यानी अब कह सकते हैं कि अमृता का कैरियर एक बार फिर से संवरने लगा है.

 

करण के लटकेझटके

माधुरी दीक्षित इन दिनों करण जौहर को डांस स्टैप्स सिखा रही हैं क्योंकि टीवी पर आने वाले अगले डांस रिऐलिटी शो में करण जौहर डांस करते हुए दिखाई देंगे. माधुरी कहती हैं कि अगर करण अपनी फिल्म के ‘राधा…’ गाने पर डांस कर सकते हैं तो इस पर क्यों नहीं. करण ‘क्यूबन बौलरूम’ डांस चा…चा…चा… करते हुए दिखेंगे.

इस के लिए करण काफी मेहनत कर रहे हैं और वे बौलीवुड के लटकेझटकों को खूब जानते हैं. इसलिए डांस करना उन्हें मुश्किल नहीं लग रहा है. खैर, शो में पता चलेगा कि वे डांस करने में कितना दमखम रखते हैं.

कल्कि की खुशी

कल्कि कोचलिन को बौलीवुड में आए काफी समय हो चुका है पर उन के ऊपर कोई?भी गीत फिल्माया नहीं गया. पहली बार ‘एक थी डायन’ में कल्कि के ऊपर एक गाना फिल्माया गया. गीत के दौरान वे इमरान हाशमी के सामने लिप सिंक भी करती नजर आएंगी. कल्कि की सोलो आइटम डांस की भी इच्छा है लेकिन यह डांस वे अपनी शर्त के अनुसार करना चाहती हैं.

कल्किजी, आप की शर्त क्या है यह तो पता नहीं पर ग्लैमर वर्ल्ड में ज्यादातर शर्तें निर्माता, निर्देशक की मानी जाती रही हैं. इस से कैसे पार पाएंगी आप?

 

आज तक पिता की शक्ल नहीं देखी- पूजा चोपड़ा

फिल्म ‘कमांडो’ के जरिए बौलीवुड में अपना डेब्यू करने वाली पूजा चोपड़ा उन अभिनेत्रियों में से हैं जिन्हें सबकुछ आसानी से नहीं मिला. लंबे संघर्ष और भयावह अतीत से गुजर कर इस मुकाम तक पहुंची पूजा चोपड़ा से  शांतिस्वरूप त्रिपाठी ने बातचीत की. प्रस्तुत हैं मुख्य अंश.

अपनी फिल्म ‘कमांडो’ को ले कर इन दिनों पूजा चोपड़ा चर्चा में हैं. उन की जिंदगी कई झंझावातों से गुजर चुकी है. आखिरकार हर तरह की मुसीबत से उबर कर आज वे अभिनय के मैदान में उतर चुकी हैं.

अपनी अब तक की यात्रा को किस तरह से देखती हैं?

मेरी जिंदगी में तमाम उतारचढ़ाव आए. आज मैं जिस मुकाम पर हूं उस में मेरी नानी, मेरी मां और मेरी बड़ी दीदी का बड़ा योगदान है. जब मेरी उम्र सिर्फ 20 दिन की थी तभी मेरी मां को पिता का कोलकाता का घर छोड़ कर पुणे में नानी के घर रहने आना पड़ा था. मेरी दीदी, जो मुझ से 7 साल बड़ी हैं, बताती हैं कि मेरे पिता को दूसरी संतान के रूप में बेटी नहीं चाहिए थी. इसलिए वे अस्पताल भी नहीं आए थे.

जब हम लोग घर पहुंचे तो मेरे पिता ने मेरे मुंह पर तकिया रख कर मुझे मारने का असफल प्रयास किया. तब मेरी मां, मुझे व मेरी दीदी को ले कर नानी के घर चली आई थीं. उस के बाद से मेरी मां ने पिता से कभी संपर्क नहीं किया. मैं ने आज तक अपने पिता की शक्ल नहीं देखी है. इस तरह मेरी परवरिश पुणे में हुई.

पुणे पहुंचने के बाद मेरी मां ने होटल इंडस्ट्री में काम करना शुरू किया. वे आज भी काम करती हैं. मैं ने आम लड़कियों की तरह पढ़ाई की. कालेज में पढ़ते समय मेरे साथ तनुश्री दत्ता भी थी. मैं ने और तनुश्री ने पुणे के कई फैशन शो में हिस्सा लिया. मैं कई बार विजेता भी बनी. एक दिन ‘मिस इंडिया’ बन गई, तो मुझे लगा कि यदि तनुश्री ‘मिस इंडिया’ बन सकती है तो मैं भी कुछ बन सकती हूं. मैं ने ‘मिस इंडिया’ के लिए फार्म भर दिया. मैं ने काफी मेहनत की. जितनी तैयारी कर सकती थी, उतनी की. फिर एक दिन ‘मिस इंडिया’ का खिताब जीतने का मेरा सपना पूरा हो गया.

अगला पड़ाव ‘मिस वर्ल्ड’ का था. मैं ने पूरी कोशिश की. ‘मिस वर्ल्ड’ प्रतियोगिता के दौरान एक दिन स्टेज पर पहुंचना था, पर दूसरी प्रतियोगिता की वजह से हम लेट हो गए. उसी दौरान एक दुर्घटना घट गई. मैं भागते हुए सीढि़यों से उतर रही थी, पैर फिसला और फै्रक्चर हो गया. मुझे अस्पताल पहुंचा दिया गया. तब तक मैं 120 में से टौप 16 में पहुंच चुकी थी. इस तरह से मैं मिस वर्ल्ड बनने से वंचित रह गई थी. बाद में मुझे खासतौर पर ‘मिस इंडिया वर्ल्ड’ का खिताब दिया गया. मुझे पूरी जिंदगी इस बात का अफसोस रहेगा कि मैं अपने देश के लिए ‘मिस वर्ल्ड’ का खिताब नहीं ला पाई.

आप को कब एहसास हुआ कि आप अभिनेत्री बन सकती हैं?

मेरी मां ही मेरी प्रेरणास्रोत हैं. उन्होंने जूही चावला की मां मोना चावला के साथ ‘ताज ब्लू डायमंड’ होटल में काम किया है. जूही चावला पहले ‘मिस इंडिया’ बनीं और फिर अभिनेत्री बनीं. तो एक बार मेरी मां के मुंह से यह बात निकली थी कि शायद मैं भी इसी तरह से आगे निकल जाऊं. 

पर आप ने ऐक्शनप्रधान फिल्म ‘कमांडो’ से कैरियर की शुरुआत की, जोकि एक पुरुष प्रधान फिल्म लगती है?

पहली बात तो स्पष्ट कर दूं कि जब मैं ने इस फिल्म को साइन किया था उस वक्त इस फिल्म का नाम तय नहीं हुआ था. स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद मुझे समझ में आया कि यह फिल्म तो मेरे ही पात्र की कहानी है. इसलिए न कहने का सवाल ही नहीं था.

फिल्म ‘कमांडो’ की शूटिंग के अनुभव कैसे रहे?

फिल्म की शूटिंग के दौरान बहुत तकलीफें झेलीं. मैं ने पहले ही बताया कि मेरा एक पैर टूट चुका है और इस में अभी भी पूरी तरह से मजबूती नहीं आई है. मुझे अभी भी पैर में पट्टी बांध कर और छड़ी ले कर चलना पड़ता है. इस वजह से ‘कमांडो’ की शूटिंग करना मेरे लिए सब से बड़ी चुनौती रही.

क्या अभिनेत्री बनने के लिए कोई खास तैयारी की?

यों तो मैं ने अभिनय कैरियर की शुरुआत करने से पहले अनुपम खेर के ऐक्ंिटग स्कूल ‘ऐक्टर्स प्रिपेयर्स’ से अभिनय की ट्रेनिंग हासिल की. शामक डावर, बोस्को सीजर और गणेश हेगड़े से डांस की ट्रेनिंग ली पर अब मुझे लगता है कि मेरे अभिनय की सही ट्रेनिंग तो फिल्म ‘कमांडो’ की शूटिंग के दौरान हुई. फिल्म के निर्माता विपुल शाह ने एक अभिनेत्री के तौर पर मुझे प्रशिक्षण दिया.

हिंदी फिल्मों में हीरोइनों के हिस्से में 2-3 गाने या 1-2 सीन के अलावा कुछ नहीं आता?

आप ने बिलकुल सही फरमाया. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हीरोइनों की यही स्थिति है. फिल्मों में ज्यादातर हीरोइनें सिर्फ ‘शो’ पीस की तरह नजर आती हैं. मगर मैं  खुद को खुशनसीब समझती हूं कि मेरी फिल्म देख कर कोई ऐसा नहीं कहेगा. इस फिल्म के जरिए मुझे एक कलाकार के रूप में अपनी प्रतिभा को निखारने का पूरा मौका मिला है.

फिल्म में आप ने ऐक्सपोजर नहीं दिया?

‘कमांडो’ एक पारिवारिक फिल्म है. इस फिल्म में प्रेम कहानी है. हीरो हीरोइन के गले भी लगता है. दोनों हाथ भी पकड़ते हैं मगर फिल्म में कहीं ऐक्सपोजर नहीं है. इस फिल्म में एक भी किसिंग सीन नहीं है. मैं ने छोटे कपड़े नहीं पहने हैं. इस की  वजह यह है कि विपुल शाह का मानना है कि फिल्म हमेशा पारिवारिक होनी चाहिए. लेकिन इस के यह माने नहीं हैं कि मुझे इस तरह के सीन करने से परहेज है. यदि फिल्म की स्क्रिप्ट और किरदार की मांग हो तो मैं इंटीमेट सीन कर सकती हूं, किसिंग सीन कर सकती हूं.

बौलीवुड में स्टार बेटियों के बीच खुद को कहां पाती हैं?

बौलीवुड में तो स्टार कलाकारों के व उन के रिश्तेदारों के बेटेबेटियां ही हावी हैं. इन लोगों के लिए बौलीवुड में काम पाना आसान है. जबकि हम जैसे मध्यवर्गीय और गैर फिल्मी परिवार से आने वाले कलाकारों के लिए बौलीवुड में ब्रेक पाना कहीं मुश्किल है. यहां मंजिल पाना आसान नहीं है, हम कोशिश कर रहे हैं.

आत्मा

निर्देशक सुपर्ण वर्मा ने अपनी इस फिल्म के टाइटल में लिखा है : ‘आत्मा : फील इट अराउंड यू’. इन तथाकथित आत्माओं पर पहले भी बहुत सी फिल्में बन चुकी हैं. विक्रम भट्ट ने इस तरह की कुछ पारलौकिक सब्जैक्ट पर फिल्में बनाई हैं लेकिन इस ‘आत्मा’ का ट्रीटमैंट कुछ अलग सा है. यह बाकायदा एक कहानी है और निर्देशक का उस कहानी पर नियंत्रण बना रहता है.

फिल्म की कहानी अभय नाम की एक ऐसी आत्मा (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) की है, जो अपनी बेटी निया (डोयेल धवन) से बेहद प्रेम करती है पर उसे अपनी पत्नी माया (बिपाशा बसु) से नफरत है. उस आत्मा ने माया की जिंदगी को तबाह कर रखा है. निया के संपर्क में आने वाले कई लोगों को यह आत्मा मार चुकी है. यह आत्मा माया को खुली चुनौती देती है कि वह अपनी बेटी को ले जाएगी. उस आत्मा से अपनी बेटी को बचाने के लिए माया को खुद को मार कर आत्माओं की दुनिया में प्रवेश करना पड़ता है जहां वह अभय की आत्मा से मुकाबला कर उसे भस्म कर डालती है. वाह, क्या बेसिरपैर वाली कहानी है.

फिल्म का अभिनय पक्ष और स्पैशल इफैक्ट्स ठीक हैं. बिपाशा बसु का काम जरूर शानदार है. पार्श्व संगीत अच्छा है. छायांकन भी अच्छा है. 

रंगरेज

प्रियदर्शन दक्षिण भारत के जानेमाने तजरबेकार निर्देशक हैं लेकिन जब वे ‘रंगरेज’ जैसी बचकानी फिल्म बनाते हैं तो हैरानी होती है. तमिल फिल्म ‘नादोदिगल’ के रीमेक में निर्देशक ने दोस्ती की मिसाल पेश करने की कोशिश की है. फिल्म के निर्माता हैं वासु भागनानी जिन्होंने अपने बेटे जैकी को फिल्मों में ब्रेक देने के लिए कई फिल्में बनाईं. हर बार वह फ्लौप रहा. ‘रंगरेज’ में भी वह बौड़म साबित हुआ है.

कहानी मुंबई में रहने वाले ऋषि (जैकी भागनानी) की है, जिसे पुलिस की नौकरी में जाना है लेकिन वह दोस्तीयारी के चक्कर में हर वक्त मारामारी करता रहता है. उस का एक दोस्त जौय (राघव चानना) अपनी प्रेमिका को पाने के लिए ऋषि से मदद मांगता है. ऋषि अपने कुछ दोस्तों को ले जा कर जौय की प्रेमिका जैस्मीन का पहले अपहरण करता है फिर जौय के साथ उस की शादी करा देता है. एक दिन ऋषि व उस के दोस्तों को पता चलता है कि अब जौय और जैस्मीन साथ नहीं रहना चाहते तो वे उन दोनों का अपहरण कर लेते हैं और उन्हें सबक सिखाते हैं. अंत में ऋषि पुलिस अफसर बन जाता है. इस कहानी में ऋषि और मेघा (प्रिया आनंद) की प्रेम कहानी साथसाथ चलती है.

दक्षिण भारत में यह फिल्म हिट थी लेकिन हिंदी में रीमेक बनाते वक्त प्रियदर्शन ने कई ऐसे मसाले डाले हैं जिन के चलते यह बेस्वाद हो गई है. फिल्म में जैकी भागनानी और उस के 3 दोस्तों ने दोस्ती के नाम पर न सिर्फ मारपीट की है बल्कि जोश में होश भी खो दिया है.

फिल्म का निर्देशन साधारण है. सभी मुख्य कलाकारों ने निराश किया है.

 

हिम्मतवाला

1983 में आई जितेंद्र और श्रीदेवी की फिल्म ‘हिम्मतवाला’ को साजिद खान ने दोबारा बना कर कोई तीर नहीं मारा है. न तो उन की फिल्म की कहानी में नयापन है, न ही मेकिंग में कोई बदलाव है. फिल्म के नायकनायिका जितेंद्र और श्रीदेवी की नकल करते नजर आते हैं.

साजिद खान ने इस फिल्म की रिलीज से पहले यह दावा किया था कि उन्होंने मसालों से लबरेज फार्मूलों के आधार पर इस फिल्म को बनाया है. इस में कोई शक नहीं है कि फिल्म में मसालों की भरमार है लेकिन ये मसाले बदहजमी पैदा करने वाले हैं.

कहानी रामपुर नाम के एक काल्पनिक गांव की है. गांव में मुखिया शेरसिंह (महेश मांजरेकर) का आतंक है. उस ने गांव के पुजारी पर चोरी का इल्जाम लगा कर उसे मरने पर मजबूर कर दिया था और उस की बीवी सावित्री (जरीना वहाब) और उस की बेटी को गांव से निकाल दिया था. एक दिन गांव में एक नौजवान रवि (अजय देवगन) आता है. उस की मुलाकात शेरसिंह की नकचढ़ी बेटी रेखा (तमन्ना) से होती है. रवि उसे शेर से बचाता है तो वह उस से प्यार कर बैठती है.

शेरसिंह रवि की बहन पद्मा की शादी अपने साले नारायणदास (परेश रावल) के बेटे शक्ति (अध्ययन सुमन) से करा देता है और पद्मा को परेशान करता है. एक दिन शक्ति को पता चलता है कि रवि उस का भाई नहीं है. वह रवि की पोल खोलता है तो सचाई सामने आती है कि रवि शहर में एक ऐक्सिडैंट में मर चुका है. लेकिन सावित्री उसे ही अपना बेटा मानने लगती है. अब रवि शेरसिंह, नारायणदास, शक्ति और उन के गुंडों से उन के अत्याचारों का बदला लेता है और गांव वालों को उन के आतंक से मुक्त कराता है.

फिल्म का निर्देशन धीमा है. साजिद खान ने बाघ पर फिल्माए गए 5-7 मिनट के दृश्यों को रिपीट कर दिखाया है, जिस से कि दर्शकों में सनसनी पैदा हो सके. अजय देवगन ने ‘सिंघम’ सरीखी ऐक्टिंग की है. महेश मांजरेकर और परेश रावल ने जोकरों जैसी ऐक्टिंग कर दर्शकों को हंसाने की कोशिश की है.

 

चश्मे बद्दूर

‘चश्मे बद्दूर’ 1981 में आई सई परांजपे द्वारा निर्देशित फिल्म का रीमेक है. फिल्म युवाओं को ध्यान में रख कर बनाई गई है. चूंकि फिल्म डेविड धवन द्वारा निर्देशित है, इसलिए चालू मसाले, घटिया जोक्स, ‘साला’, ‘कमीना’, ‘उल्लू का पट्ठा’ जैसी गालियां न हों, ऐसा हो ही नहीं सकता. ओरिजनल फिल्म में फारुक शेख, राकेश बेदी, रवि वासवानी और दीप्ति नवल ने इतना बढि़या काम किया था कि दर्शक आज भी उसे भूले नहीं हैं.

नई ‘चश्मे बद्दूर’ सई परांजपे की फिल्म से एकदम अलग है. कौमेडी उस फिल्म में भी थी, इस में भी है मगर ब्रेनलैस है. फिल्म के गीतों में घटिया लफ्जों का इस्तेमाल किया गया है. ‘हर एक दोस्त कमीना होता है…’, ‘…इश्क महल्ला, यहां सबकुछ खुल्लमखुल्ला…’ कई संवाद भी इसी तरह के हैं. एक संवाद में तो लिलिट दुबे को ‘ढकी हुई मल्लिका शेरावत’ तक कह दिया गया है. ऋषि कपूर का इस्तेमाल सही ढंग से नहीं हो पाया है. ओरिजनल फिल्म में यही रोल लल्लन मियां यानी सईद जाफरी का था, जिसे आज भी याद किया जाता है.

डेविड धवन ने पुरानी कहानी को अपने अंदाज में फिट किया है. पिछली फिल्म की कहानी दिल्ली की थी, इस फिल्म की कहानी गोआ की है. सिद्धार्थ उर्फ सिड (अली जफर), जय (सिद्धार्थ) और ओमी (दिव्येंदु शर्मा) 3 दोस्त हैं और गोआ में जोसफीन (लिलिट दुबे) के किराएदार हैं. तीनों कड़के हैं, किराया देने तक का उन के पास पैसा नहीं है. एक दिन ओमी की नजर सीमा (तापसी पन्नू) पर पड़ती है. वह उसे पटाने की कोशिश करता है परंतु पिट जाता है. जय भी सीमा को पटाने की कोशिश करता है परंतु सफल नहीं हो पाता. दोनों सिड को सीमा और अपनेअपने चक्कर के बारे में बढ़ाचढ़ा कर बताते हैं. एक दिन अचानक सीमा की मुलाकात सिड से हो जाती है. दोनों में प्यार हो जाता है. ओमी और जय से यह देखा नहीं जाता. वे उन का ब्रेकअप करा देते हैं. लेकिन जब उन्हें अपनी गलती महसूस होती है तो वे दोनों को फिर से मिलवा देते हैं. इसी कहानी में जोसेफ (ऋषि कपूर) और जोसफीन के बीच प्रेमप्रसंग भी है.

फिल्म का यह रीमेक काफी लाउड है. फिल्म के 2 पात्रों ओमी और जय जबतब द्विअर्थी संवाद बोलते रहते हैं. भले ही इन संवादों को सुन कर आज के युवाओं को हंसी आए लेकिन ये वाहियात हैं. डेविड धवन ने इस के अलावा कौमेडी क्रिएट करने के लिए अनुपम खेर का किरदार फिल्म में डाला है. यह किरदार जबतब अपनी मां के हाथों थप्पड़ ही खाता रहता है और इसे देख के दर्शकों को खूब हंसी आती है.

डेविड धवन ने अपने चिरपरिचित अंदाज में ही फिल्म को निर्देशित किया है. वैसे तो अली जफर फिल्म का केंद्रीय पात्र है लेकिन सिद्धार्थ और दिव्येंदु ने कुछ अच्छा काम कर लिया है. वैसे उन की ऐक्टिंग में बनावटीपन ?ालकता है. तापसी पन्नू की हिंदी की यह पहली फिल्म है. फिल्म में बारबार उस ने ‘दम है बौस…’ संवाद बोला है. लेकिन खुद उसी में दम नहीं है. ऋषि कपूर का गैटअप अच्छा लगता है. लिलिट दुबे का काम भी अच्छा है.

फिल्म का गीतसंगीत लाउड है. ‘हर एक दोस्त कमीना होता है…’ और ‘ढिच्कियाओं ढुमढुम…’ गीत सुनने में कुछ अच्छे लगते हैं. छायांकन अच्छा है.

केन्या की अनोखी दहेज प्रथा: ब्राइड प्राइज

केन्या में अपने 30 वर्षों के प्रवास के दौरान मैं ने वहां की अनेक सामाजिक कुरीतियों तथा रीतियों का गहन अध्ययन किया. वहां की दहेज प्रथा मुझे बहुत आश्चर्यजनक लगी.

भारत में लड़की वाले लड़के वालों को दहेज देते हैं हालांकि यह गैरकानूनी है. इस के विपरीत केन्या में लड़के वाले लड़की के मातापिता को भारी रकम देते हैं. दहेज देने के बाद ही विवाह कानूनी तौर पर स्वीकृत होता है. इस प्रथा को केन्या में ‘ब्राइड प्राइज’ के नाम से जाना जाता है.

अचंभे वाली बात यह लगी कि केन्या सरकार ने इस प्रथा को पूर्ण मान्यता दे रखी है. ऐसा केवल केन्या में ही नहीं बल्कि केन्या के समीप के देशों, तंजानिया तथा युगांडा में भी इस प्रकार की दहेज प्रथा का प्रचलन है.

विभिन्न अफ्रीकी व्यक्तियों से संपर्क करने पर पता चला कि वे इस प्रकार की दहेज प्रथा का शिकार हुए. मेरे साथ एक अध्यापिका मिस रोज कार्यरत थीं. उन का एक ही बेटा था. उस के जन्मदिवस पर मु?ो आमंत्रित किया गया. वहां उन्होंने अपने पतिदेव मिस्टर पीटर से मेरा परिचय करवाया. मैं ने पीटर से पूछा कि क्या कारण है तुम्हारी पत्नी अपने नाम के साथ मिस लिखती हैं? पीटर ने बताया कि जो ब्राइड प्राइज रोज के मातापिता के साथ तय हुई है जब वह चुक जाएगी तब हमारा विवाह चर्च में होगा.

ब्राइड प्राइज यहां के अलगअलग कबीलों में अलगअलग ढंग से अदा की जाती है. कई कबीले जैसे कि किकूयू, लुओ, कलेंजिन आर्थिक तौर पर संपन्न हैं उन्हें कोई दिक्कत नहीं आती. जो कबीले, जैसे कि मसाई, तुरकाना, मिजीकेंडा आर्थिक तौर पर संपन्न नहीं हैं, वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ‘ब्राइड प्राइज’ तय करते हैं.

मेरे एक अफ्रीकी मित्र मिस्टर साइमन, जोकि लगभग 55 वर्ष के थे, मु?ो एक निमंत्रण पत्र दे गए. पूछने पर बोले कि आप को मेरे विवाह समारोह में अवश्य आना है. साइमन के बच्चे विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे. ब्राइड प्राइज पूर्ण होने के बाद उन का चर्च में विधिवत विवाह हो रहा था.

पर पिछले कुछ वर्षों से केन्या की युवा पीढ़ी में जागृति आई है. बहुत से युवकयुवतियां अब इकट्ठे रहने लगे हैं पतिपत्नी के तौर पर. जो युवतियां ये कदम उठाती हैं उन्हें संपत्ति से वंचित कर दिया जाता है तथा किसी भी प्रकार की सहायता उन को अपने मांबाप से नहीं मिलती.

ब्राइड प्राइज तय कैसे होती है यह भी बहुत रोचक है. ब्राइड प्राइज की रकम गायों की संख्या से तय की जाती है. गरीब लड़के अपनी वधू के लिए 10 से 50 गायों तक का सौदा कर सकते हैं पर मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग के लड़के वाले 200 से 400 गायों तक भी देना स्वीकार कर लेते हैं. यह मोलभाव सामूहिक और सांस्कृतिक गीतों और नृत्यों के साथसाथ तय होता है. इस के साथ बजने वाले वाद्ययंत्र चमड़े के ड्रम, मंजीरे और गायों के सींगों से बने वाद्य यंत्र होते हैं. नर्तक पारंपरिक वेषभूषाएं पहनते हैं जिन में पत्तों, चमड़ों की पोशाकें तथा कौडि़यों और हड्डियों के आभूषण होते हैं. सिर पर पंखों के मुकुट भी पहने जाते हैं और चेहरे पर सफेद और लाल मिट्टी घोल कर चित्रकारी की जाती है.

यह परंपरा बहुत सालों से चली आ रही है. पर आजकल गायों की संख्या के बराबर रकम ही दी जाती है. जो लोग सारी रकम नहीं दे सकते वे किस्तों में भी चुका सकते हैं. कुछ कबीलों में वर अपनी वधू के भाईबहनों की पढ़ाई का खर्चा उठा कर भी ब्राइड प्राइज की रकम पूरी कर सकता है.

जिस प्रकार भारत में विवाह के बाद अनेक लड़कियां दहेज की हिंसा का शिकार हो जाती हैं उसी प्रकार केन्या में जो लोग ब्राइड प्राइज की पूरी रकम चुका देते हैं उन में से कुछ अपनी पत्नियों के साथ खरीदे हुए गुलामों जैसा व्यवहार करते हैं.

दुख की बात तो यह है कि तलाक लेने की स्थिति में ब्राइड प्राइज लड़की वालों को लौटाना पड़ता है. यही कारण है कि बहुत से जोड़े बगैर विवाह के पतिपत्नी के तौर पर रहते हैं, संतान पैदा करते हैं और कोई भी मतभेद होने पर अलगअलग रहने लगते हैं. ऐसी औरतें ‘सिंगलमदर’ कहलाती हैं. स्कूलों के रजिस्टरों में ऐसे बच्चों के अभिभावकों की जगह मां का ही नाम लिखा जाता है. हालांकि ऐसी माताएं स्कूल फीस की मांग इन बच्चों के पिताओं से कर सकती हैं.

ऐसे बच्चे अवैध नहीं माने जाते पर कहीं न कहीं इन के मन का कोना सूना ही रहता है जो एक पिता ही दूर कर सकता है. दहेज की कुप्रथा के शिकार ये बच्चे भी हो सकते हैं पर मां की ओर का पूरा परिवार बच्चों को पूरा सहयोग देता है और आगे बढ़ने को प्रेरित करता है.

बहरहाल, केन्या में यह कुप्रथा न होती तो शायद हर बच्चा अपने मांबाप के साथ संतुलित जीवन निर्वाह कर सकता.

सरकार ओर विपक्ष के 4 साल दोनों नाकाम

मौजूदा सरकार और विपक्षी दल भ्रष्ट और नाकाम सियासी सिक्के के दो पहलू हैं. सरकार भ्रष्ट और घोटालेबाज है तो विपक्ष भ्रष्टाचार का मूक समर्थक. दोनों ही सत्ता की मलाई जीमने और अपनी कारगुजारियों का ढोल पीटने में जरा?भी शर्मिंदगी महसूस नहीं करते. चोरचोर मौसेरे भाई की तर्ज पर सरकार और विपक्ष की सियासी व जनविरोधी जुगलबंदी का विश्लेषण कर रहे हैं लोकमित्र.

सियासत को छोड़ दें तो शायद ही ऐसा कोई दूसरा क्षेत्र हो जहां अपने मुंह अपनी तारीफ करने का चलन हो. यहां तक कि उस मनोरंजन उद्योग क्षेत्र में भी नहीं है जहां का सारा खेल ही छवि का है. लेकिन सरकारें बड़ी बेशर्मी से सार्वजनिक पैसे से अपना गुणगान करती हैं. आजकल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग सरकार अपने 4 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में यही कर रही है.

कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस सरकार के पिछले 4 साल एक के बाद एक घोटाले सामने आने में और बारबार देश को राष्ट्रीय शर्म में डुबोने में गुजरे हों वह जश्न मना रही है. किस बात का जश्न? क्या इस बात के लिए कि बारबार घोटालों में पकड़े जाने के बाद भी सरकार बड़ी निर्लज्जता और अपनी जोड़तोड़ की बदौलत अभी तक बरकरार है? अगर महज अस्तित्व में बने रहने के लिए यह सरकार जश्न मना रही है तो यह उस की कोई उपलब्धि नहीं है बल्कि उसे अपने षड्यंत्र में मिली कामयाबी है और यह आम जनता पर सरकार का विद्रूप व्यंग्य है.

एक विद्रूप तमाशा जहां सत्तारूढ़ कांगे्रस पार्टी कर रही है वहीं प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा भी उसी तमाशे को दुहरा रही है. यह कितनी हास्यास्पद बात है कि जिस भाजपा ने बारबार मौका मिलने के बावजूद कांगे्रस को कभी संसद में घेर कर उसे तमाम घपलोंघोटालों के लिए देश के समक्ष शर्मसार होने के लिए मजबूर नहीं किया उलटे खुद ही ऐसी परिस्थितियां खड़ी कीं कि कांगे्रस तमाम नाजुक मौकों और मसलों में संसद का सामना करने से बच गई.

अंतर्कलह में उलझा रहा विपक्ष

भाजपा ने संसद को ज्यादातर मौकों में पिछले 4 सालों में ठप रखा. अब भाजपा कह रही है कि कांगे्रस को बेनकाब करने के लिए वह गांवगांव, शहरशहर जनजागरण अभियान चलाएगी. जब संसद में मौका था तब भाजपा के ज्यादातर नेता संसद में उपस्थित रहने के बजाय टीवी चैनलों का चक्कर लगाया करते थे.

बिहार में भाजपा और जनता दल (यूनाइटेड) की सरकार भले ही अभी तकनीकी रूप से चल रही हो लेकिन जहां तक वैचारिक और मजबूत दोस्ताना वाले गठबंधन की बात है तो यह भी अंदर ही अंदर टूटफूट चुका है.

नीतीश कुमार ने राजधानी दिल्ली में बिहार स्वाभिमान रैली की, उस में भाजपा को पूछा तक नहीं जबकि भाजपा रैली के लिए तैयारियां कर रही थी. यही नहीं, नीतीश ने रैली के मंच से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम की तारीफ भी की, साथ ही यह भी कहा कि चुनावों तक कुछ भी हो सकता है. राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता. भाजपा के जले पर नमक छिड़कते हुए नीतीश कुमार ने यह कह कर अपना भाषण खत्म किया कि जो बिहार को स्पैशल राज्य का दरजा देगा, हम उस के साथ हैं.

कहने का मतलब यह है कि भले ही  अभी नीतीश और भाजपा के बरतनभांडे अलग न हुए हों लेकिन वे देहरी तक आ गए हैं, कभी भी एक  झटके में वे बाहर आ सकते हैं और इस का सब से बड़ा कारण है नरेंद्र मोदी. दरअसल, नरेंद्र मोदी सोच के स्तर पर तानाशाह हैं. संयोग से उन्होंने गुजरात में जीत की हैट्रिक भी लगा ली है जिस वजह से उन की तानाशाही का पारा और भी ऊपर चढ़ गया है. वे अपनेआप को पार्टी से ऊपर और विशिष्ट सम झते हैं. यही कारण है कि गुजरात में वे नरेंद्र मोदी के चलते भाजपा का अस्तित्व सम झते हैं न कि भाजपा के चलते नरेंद्र मोदी का अस्तित्व. इस वजह से भाजपा में अंदर ही अंदर बिखराव और एकदूसरे की टांग खींचने का दौर जारी है. कर्नाटक की जबरदस्त पराजय के पीछे भी भाजपा की आंतरिक कलह है.

दरअसल, नीतीश कुमार जैसे मुसलिमों की राजनीति करने वाले ही नहीं बल्कि भाजपा में भी बड़े पैमाने पर ऐसे लोग मौजूद हैं जो सोचते हैं कि अगर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया तो भाजपा को नुकसान होगा क्योंकि इस से सैक्युलर हिंदू वोट भी नहीं मिलेंगे इसलिए भाजपा में अंदर ही अंदर नरेंद्र मोदी का तमाम धड़े विरोध कर रहे हैं, यहां तक कि अपने को हिंदुओं का मसीहा बताने वाली शिवसेना भी नहीं चाहती कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हों. इसीलिए शिवसेना ने सुषमा स्वराज का राग छेड़ा है.

इस का एक बड़ा कारण नरेंद्र मोदी की एमएनएस मुखिया राज ठाकरे से नजदीकी है. वास्तव में किसी भी तानाशाह की तरह नरेंद्र मोदी भी चापलूसी पसंद हैं. राज ठाकरे उन्हें हर तीसरे दिन हिंदू हृदय सम्राट घोषित करते रहते हैं, ऐसे में मोदी उन के लिए विशेष जगह तो रखेंगे ही. भाजपा और उस की अगुआई वाले गठबंधन में अंदर ही अंदर अगर अविश्वास की खिचड़ी पक रही है तो इस के पीछे एक कारण तीसरे मोरचे की खिचड़ी भी है.

इस साल अपने पुराने संगीसाथियों से होली खेलते हुए अचानक मुलायम सिंह यादव को इल्हाम हुआ कि देश में सब से ज्यादा ईमानदार राजनेता लालकृष्ण आडवाणी हैं. उन की जबान से ये शब्द निकलते ही हजारों कान खड़े हो गए. दरअसल, एनडीए में आंतरिक कलह को लोगों ने इन छिटपुट पटखनियों के रूप में भी देखा है. कांगे्रस पर भाजपा या उस के साथी दलों का अगर कोई खास असर नहीं पड़ा तो सब से बड़ी वजह यही है कि दोनों की राजनीति में कोई खास फर्क नहीं है. कांगे्रस के भ्रष्टाचार से दो हाथ आगे बढ़ कर नितिन गडकरी का भ्रष्टाचार उजागर हुआ है.  झुग्गियों में चलते कौर्पोरेट दफ्तर, घर के ड्राइवर से ले कर चौकीदार तक को गडकरी ने अपने भ्रष्टाचार का हिस्सा बना दिया तो ऐसे में भला एक चोर दूसरे चोर को चोर कहे तो लोग गंभीरता से क्यों लेंगे.

सरकार के खोखले दावे

अब बात करते हैं संप्रग सरकार की. संप्रग सरकार के मुखिया के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने और संरक्षक के रूप में सोनिया गांधी ने 22 मई को पिछले 9 सालों का बखान करने के लिए 33 पृष्ठों का जो खाका पेश किया, वह वास्तव में  झूठ का पुलिंदा है. अब सरकार के इस पहले दावे को ही लें कि सरकार 4 सालों से अबाध गति से चल रही है तो सच यह है कि सरकार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की राजनीतिक कमजोरियों और उन कमजोरियों की लगाम इस सरकार के हाथ में होने की वजह से चल रही है.

वर्ष 2009 में जब सरकार बनी थी तो सरकार बनाने वाले इस गठबंधन में 11 पार्टियां शामिल थीं. इस समय इस में केवल 9 हैं. इस में भी अजित सिंह का राष्ट्रीय लोकदल बाद में आया है. 2009 के बाद से विपक्ष को, सरकार विशेषकर कांगे्रस के नेताओं ने नकारात्मक राजनीति के लिए जम कर कोसा. स्वयं सोनिया गांधी ने अपने भाषण का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की तीखी आलोचना पर केंद्रित किया.

कांगे्रस अपनेआप में कितनी आत्ममुग्ध है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बड़ी बेशर्मी से अपने रिपोर्टकार्ड में खुद ही सरकार ने सभी क्षेत्रों के लिए खुद को डिस्टिंक्शन मार्क्स दे दिए हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से ले कर संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी तक ने 22 मई के अपने भाषण में आंतरिक सुरक्षा से ले कर विदेश, अर्थव्यवस्था जैसे सभी क्षेत्रों में कीर्तिमान बनाने की गाथा गाई. यही नहीं, जो कुछ नहीं हो सका, उस के लिए विपक्ष को दोषी ठहरा दिया.

आज सरकार जिन विधेयकों के नाम पर अपनी पीठ थपथपा रही है उन में से कइयों का तो अभी भविष्य ही तय नहीं है. सोनिया गांधी के ड्रीम प्रोजैक्ट खाद्य सुरक्षा विधेयक का भविष्य क्या होगा, कोई नहीं जानता. लेकिन उस की सहानुभूति लेने के लिए सरकार कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती. यही वजह है कि चौथी वर्षगांठ के मौके पर सब से ज्यादा सोनिया गांधी ने इसी का जिक्र किया. दरअसल, सरकार इस गफलत में है कि जैसे पिछली बार मनरेगा ने उस की नैया पार लगाई थी, वैसे ही इस बार खाद्य सुरक्षा बिल लगा देगा. मनरेगा को भी सरकार ने भारत का नक्शा बदलने वाला आइडिया बताया, तब इस प्रोजैक्ट की बजट राशि क्यों घटाई जा रही है? हकीकत यह है कि मनरेगा भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा जरिया बन चुका है.

वास्तव में चौथी वर्षगांठ से भी कई दिन पहले जो बड़ेबड़े सरकारी विज्ञापन हर जगह दिखने शुरू हो गए हैं, दरअसल, भारत निर्माण के नाम पर वे उसी ‘शाइनिंग इंडिया’ की याद दिला रहे हैं जो प्रमोद महाजन के नेतृत्व में वाजपेयी सरकार ने वर्ष 2008 में शुरू किया था, चुनावों के कुछ दिन पहले. लेकिन कांगे्रस को याद करना चाहिए कि  झूठमूठ की शेखी कितनी भारी पड़ती है. एनडीए तब से आज तक लौट कर सत्ता का स्वाद नहीं चख सका.

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