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भाजपा की रामलीला

ऐन चुनाव से 2 माह पहले दिल्ली में भावी मुख्यमंत्री के सवाल को उठा कर भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा ने अपने अनुशासन की पोलपट्टी खोल दी है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल महीनों से अपनेआप को नरेंद्र मोदी की तर्ज पर मुख्यमंत्री घोषित कर रहे थे कि संघ की ओर से पूर्व अध्यक्ष डा. हर्षवर्धन  आ खड़े हुए और दोनों का घमासान कांगे्रसभाजपा जैसा हो गया.

अब नेता का नाम तय हो गया पर यह साफ हो गया है कि ‘साफसुथरी पार्टी’ कितनी साफ है. भाजपा को आमतौर पर मध्यवर्ग के वोट मिलते हैं और यही मध्यवर्ग आजकल सरकारी कामकाज से नाराज हो कर अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ का समर्थक बन रहा है और निश्चित है कि यह वर्ग कांग्रेस को कम, भाजपा को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा. ऐसे में चुनावों से कुछ ही सप्ताह पहले विजय गोयल के नेतृत्व पर सवाल उठा कर भाजपा के नेताओं ने अपने दिमागी दिवालिएपन की कलई खोल दी. यह सवाल असल में चुनावों के बाद उठाया जाना चाहिए था अगर पार्टी को पर्याप्त बहुमत मिलता.

दिल्ली का चुनाव बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है क्योंकि यहां से केवल 7 सांसद चुने जाते हैं लेकिन यदि नरेंद्र मोदी का प्रभाव दिल्ली की राज्य इकाई पर भी नहीं है तो साफ है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बावजूद भाजपा की प्रदेश इकाइयों में आपसी फूट और खींचतान जारी है.

वैसे, यह बात नई नहीं है. जैसे राम का नाम लेने वाली भारतीय जनता पार्टी के आराध्य राम को भी ऐन सिंहासन पर बैठने वाले दिन अयोध्या की महल की राजनीति के कारण राजपाट न मिल कर वनवास मिला, रामलीला को बारबार दोहराना तो भाजपा का धर्म वैसे ही है.

 

जनतंत्र और जनता

देश लोकतंत्र से अब जांचतंत्र बन गया है. राजनीतिबाजों और अफसरों ने इस तरह लूट मचा रखी है कि देश की अदालतें, केंद्रीय जांच ब्यूरो, सतर्कता आयोग, चुनाव आयोग, मीडिया आदि हर समय जांच करते नजर आ रहे हैं और मजेदार बात यह है कि हर जांच में कुछ न कुछ मिल जाता है. टाटा व अंबानी घरानों के लिए जनसंपर्क का काम कर रहीं नीरा राडिया के फोनों पर हुई बातचीतों के टेपों से सुप्रीम कोर्ट को अपराधों की बू आई है और उस के आधार पर टाटा, अंबानी, आदित्य बिड़ला, यूनीटैक की कंपनियों पर शक पैदा हो गया है.

उधर कोयला खानों में हेरफेर से एलौट का मामला ठंडा नहीं हुआ कि 17-18 नामी उद्योगपति जांच के लपेटे में आ गए हैं. इतना ही नहीं, जलते कोयले की गरमी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को झुलसाने लगी है.

केंद्र सरकार तो जांच के दायरे में है ही, राज्य सरकारें भी इसी तरह के कांडों में फंसी हैं. ऐसा महसूस होने लगा है कि सरकार का काम केवल बेईमानी करना रह गया है और जिस का जहां बस चलता है वह वहां हाथ मार रहा है. जितने पकड़े जाते हैं उन से हजारगुना बच निकलते हैं.

देश में इस आपाधापी का एक कारण यह है कि लोगों ने अपनेआप को आज भी राजाओं का सेवक सा समझ रखा है, लोकतंत्र को अपने सामूहिक कार्यों के लिए बनी संस्था न मान कर अपने पर राज करने की छूट देने वाला तरीका मान लिया है और वोट की मशीन से जिसे चुना उसे अपने पर अनाचार और अत्याचार करने का हक भी दे दिया.

देश अभी भी इस बात को समझने को तैयार नहीं है कि राजनीतिबाजों और नौकरशाहों के हाथों में ताकत जनता की कृपा से आती है और सामूहिक कार्यों के लिए धन जनता के योगदान से जमा किया जाता है. जनता अपनी बला सरकार पर छोड़ कर निश्ंिचत हो जाना चाहती है कि अब सब ठीक हो जाएगा. असल में हर बार चुनाव में लोग स्वयं को लूटने का हक पाने वालों को चुनते हैं जो 5 साल तक जम कर लूटते हैं.

यह भूल जाइए कि लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश चौटाला, जगन्नाथ मिश्र जैसे कुछ को जेल में बंद कर देने से जनप्रतिनिधियों की लूट वाली सोच बदल जाएगी. जो पैसा खर्च कर के चुना जाएगा वह पैसा बनाएगा और उस जनता से बनाएगा जो अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती और जिसे सही व गलत का कोई अंदाजा नहीं है. 2013 में होने वाले कुछ राज्यों के और 2014 के आम चुनावों में जो चेहरे उतरने वाले हैं, उन में हरेक के चेहरे पर कालिख लगी है और वे जानते हैं कि साफसुथरे लोग न हैं और न ही जनता उन्हें जानना या चुनना चाहती है.

 

आरएसएस के मोदी

नरेंद्र मोदी को चुनावी सभाओं में मिलने वाली भीड़ भगवाइयों की पहली भीड़ नहीं है. यह वही भीड़ है जो कुंभ के मेलों में होती है, रामलीलाओं में होती है, तीर्थस्थानों में होती है, चारधाम यात्रा के लिए उत्तराखंड में जमा होती है, तिरुपति के मंदिर में लंबी लाइनों में होती है. धर्म के नाम पर रंगे लोगों की गिनती इस देश में कम नहीं है. इस तरह की भीड़ तब भी होती है जब रितिक रोशन शूटिंग पर पहुंचता है, फार्मूला 1 रेस होती है या क्रिकेट मैच होता है.

जनूनियों की भीड़ जनता का मत स्पष्ट नहीं करती. हां, मौजूद लोगों का उत्साह जरूर दर्शाती है. नरेंद्र मोदी ने छिन्नभिन्न होती, दिशाहीन भारतीय जनता पार्टी में एक नई जान फूंकी है. सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और लालकृष्ण आडवाणी से ऊबे लोगों को नरेंद्र मोदी में एक नया उत्साही, वाक्पटु नेता मिला है जो उन की पार्टी को नई ऊर्जा दे रहा है और पार्टी के निराश समर्थक व कार्यकर्ता जोश में आ गए हैं.

पटना में बम विस्फोटों के बावजूद नरेंद्र मोदी की सभा में गांधी मैदान में उमड़ी भीड़ यह जताती है कि नरेंद्र मोदी पर विश्वास व अंधविश्वास करने वाले अपनी जान की परवा भी नहीं करते. नरेंद्र मोदी ने पूरे भाषण में देश और बिहार के विकास का कोई गुर नहीं समझाया. उन्होंने नीतीश कुमार को मित्र कहकह कर भरपूर गालियां दे कर उस कृष्ण की याद दिलाई है जो एक तरफ कौरवों को सेना देता है तो दूसरी तरफ अर्जुन का सारथी बन कर उसे युद्ध करने पर राजी करता है.

10-20 साल से नहीं, सैकड़ों सालों से कट्टर हिंदू एक ऐसे उद्धारक की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो उन्हें बचा दे. पौराणिक ग्रंथों में जैसे देवता दौड़ेदौड़े कभी ब्रह्मा, कभी विष्णु के पास जाते थे कि उन्हें बचाया जाए वैसे ही हिंदू सदियों से अपने को बचाने वालों की चिरौरी करते रहे हैं और नए आक्रमणकारी का साथ तक देते रहे हैं ताकि पिछले आक्रमणकारी से छुटकारा मिल सके.

नरेंद्र मोदी फैक्टर देश पर छा गया है, इस से इनकार नहीं किया जा सकता है और यह सूखे में बादलों की तरह है. नरेंद्र मोदी पर इतना वादविवाद हो रहा है कि अब ज्यादा कहनेसुनने की गुंजाइश नहीं है क्योंकि मुद्दा नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व नहीं है, उन की शासन सक्षमता नहीं है, उन की नेतृत्व कला नहीं है. मामला तो कट्टर हिंदूवाद की पुनर्स्थापना का है. नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर मुख्यालय के प्रवक्ता हैं और नागपुर देश पर कब्जा करने का एक सपना क्यों न देखें, खासतौर पर जब बढ़ते भ्रष्टाचार, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, महंगाई, शहरों- गांवों में बढ़ते अपराध, शासकों का निकम्मापन रोज सुर्खियां बनते हों. बाढ़ के पानी में डूबते लोग तो कांटों भरी टहनी को पकड़ कर भी बचने की कोशिश कर लेते हैं. नरेंद्र मोदी को फिर क्यों छोड़ें?

 

आपके पत्र

सरित प्रवाह, अक्तूबर (प्रथम) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी’ अति महत्त्वपूर्ण है. आप ने बिलकुल सत्य लिखा है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करवा कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वही किया है जो हिंदू राजाओं के साथ उन के ब्राह्मण सलाहकार किया करते थे.

इतिहास में दर्ज है कि ज्यादातर राजा ब्राह्मणों की सिफारिश पर बनाए जाते थे. कुछ ही युद्धों में जीत कर या जनता की इच्छा पर राजा बन पाते थे. नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की भी पसंद हैं, यह औपचारिकता तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नहीं निभाने दी.

नरेंद्र मोदी ने अब तक केंद्र में कभी काम नहीं किया. वे राज्य के मुख्यमंत्री चाहे हों पर वहां उन्होंने कोई क्रांतिकारी काम नहीं किया. उन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भरोसा है तो इसलिए कि उन्होंने वर्ष 2002 में दिखा दिया था कि वे हिंदुओं का नाजायज पक्ष कैसे ले सकते हैं और राजनीतिक व कानूनी वार झेल सकते हैं. प्रधानमंत्री का पद धर्मनिरपेक्ष ही होना देश के हित में है.

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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हिंदी का प्राध्यापक होने के कारण आप की पत्रिका मैं नियमित पढ़ता हूं. यह एक अत्यंत आदर्श साहित्यिक पत्रिका है जिस में पुरोगामी विचारों को स्थान मिलता है. लेकिन अक्तूबर (प्रथम) अंक में ‘प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी’ शीर्षक के तहत छपे आप के संपादकीय विचार पढ़ कर बड़ा दुख हुआ, जिस में आप ने भाजपा व नरेंद्र मोदी पर अत्यंत प्रतिगामी टिप्पणी कर अकारण ब्राह्मण व मराठों के इतिहास को जातीय रंग दिया है. संभाजी राजे और राजाराम के सत्तासंघर्ष के कारण व छत्रपति शिवाजी महाराज के मृत्योपरांत मराठों में 2 गुटों के संघर्ष के परिणामस्वरूप पेशवा का उदय हुआ.

वैसे भी, सत्ता की राजनीति में स्वार्थ के आगे जाति गौण होती है. इतिहास में सभी जातियों ने राजनीति कर सत्ता सुख प्राप्त किया है. आज भी भारतीय लोकतंत्र में विभिन्न जातियां सत्ता का सुख प्राप्त कर रही हैं और वर्तमान संदर्भ में किसी भी जाति पर टिप्पणी करना अशोभनीय है.

दूसरी बात, पेशवाओं ने अपने शौर्य के कारण उत्तर भारत में मराठों के राज्य का विस्तार किया. उन की हार के पीछे बहुत गहरा इतिहास है. आप ने आज के ब्राह्मणों को नवब्राह्मण कह कर अकारण कटुता को आमंत्रित किया है. आदर्श पत्रकारिता जाति पर नहीं, मात्र राष्ट्रहित पर आधारित होनी चाहिए.

डा. टी पी देशपांडे, नांदेड़ (महाराष्ट्र)

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संपादकीय टिप्पणियां ‘धर्म और दंगा’, ‘कानून और अदालत’ व ‘प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी’ समाज को यह संदेश देती हैं कि किस तरह हमारे देश के कर्णधार धर्म व जाति के नाम पर फूट डालते हैं और लोगों के दिलों में नफरत का जहर घोल कर दंगे करवाते हैं. क्या कभी किसी ने यह जाना या सुना है कि इन दंगों में किसी राजनीतिज्ञ की जान गई है या उस की हत्या की गई है.

इसी अंक में प्रकाशित लेख ‘आसाराम: संत के चोले में ऐयाशी’ लेख उन धर्मभीरू लोगों के लिए एक करारा थप्पड़ है जो आंखें मूंद कर समाज को कलंकित करने वाले तथाकथित ‘बाबाओं’ के पीछे चल रहे हैं. कितनी बड़ी विडंबना है कि आसाराम के भक्त यह मानने को तैयार नहीं हैं कि आसाराम ने कोई अपराध किया है. वे धर्म के नाम पर एक धब्बा हैं.

सुनंदा गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

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बाबाओं के फेर में

अक्तूबर (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी’ में आसाराम का कच्चा चिट्ठा खोला गया है. तस्करी, वेश्यावृत्ति व अपराध से बड़ा धर्म का कारोबार है. रात 11 बजे के बाद लाउडस्पीकर बजाना वर्जित है. फिर भी सभी धर्मस्थल शोर मचाते रहते हैं. धर्मस्थल कानून से ऊपर नहीं हैं.

रजत कुमार, बरेली (उ.प्र.)

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लेख ‘आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी’ पढ़ा. इस से यह निष्कर्ष निकला कि हमारे देश में राजनीतिक, सांस्कृतिक, नैतिक पतन के साथ धार्मिक विस्खलन भी तीव्र गति से हो रहा है. ऐसे ही कारणों की बदौलत हम हरेक क्षेत्र में पिछड़े हैं, अंदर से खोखले हो रहे हैं, केवल सरकारी आंकड़ों में आगे और स्वस्थ हैं.

धार्मिक प्रतिष्ठानों, पाखंडी खेलों में संलग्न पंडितों व मठाधीशों ने हमारे देश की धार्मिक प्रतिष्ठा को नष्ट करने में कुछ भी नहीं छोड़ा है. आसाराम की हैवानियत के चलते सच्चे धार्मिक गुरुओं की महिमा कम होने का डर है.

आश्चर्य की बात यह है कि आजकल टीवी चैनलों में धार्मिक प्रवचनों का प्रचारप्रसार ज्यादा होता है, लेकिन बलात्कार के घिनौने और अमानुषिक हादसे हमारे देश में लगातार बढ़ रहे हैं. महिलाओं पर बर्बर अत्याचार होता है जबकि दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियों की पूजाअर्चना यहीं ज्यादा होती है.

हैरानी यह भी होती है कि स्वयं घोषित देवों की संख्या भी बढ़ रही है और अंधविश्वासी, अशिक्षित, मानसिक कमजोर लोग उन के दरबार भी लगाए रहते हैं. अधिकतर देवस्थलों के संरक्षक राजनीतिक नेतागण होते हैं जिस के कारण संतों को सत्ता सहायता भी उपलब्ध होती है.

आसाराम के आश्रम में जिस तरीके से आसाराम और उन के शिष्यों ने किशोरी के साथ घंटों यौन उत्पीड़न का नंगा नाच किया, संपूर्ण विवरण पढ़ने के बाद लगा, ऐसे लोगों को मौत की सजा देनी चाहिए. पापपुण्य का हिसाब दिखा कर ज्यादातर लड़कियों और औरतों को गुमराह कर के ऐयाशी का शिकार बनाया जाता है. लड़की अगर नहीं बताती तो आसाराम लोगों की नजर में बदनाम नहीं होते, यथावत राम ही रहते.

सिलीगुड़ी में काली मंदिर के पीछे के कमरे में ब्लू फिल्म दिखाने की व्यवस्था करने वाले पुजारी जब पकड़े गए, लोगों के कान खुल गए. एक नवग्रह मंदिर के परिसर से रोज सुबह नकली दारू लोड कर के दार्जिलिंग ले जाने का धंधा चलता था. मंदिर के एकमात्र मालिक पंडित से शिकायत की गई तो वे मौन हो गए क्योंकि उन्हें शेयर मिलता था. श्वेत वस्त्रधारी, ललाट पर पीले चंदन का लेप लगाने वाला पंडित तब नाराज हो गया जब मंदिर परिसर से नकली दारू के लोड करने की व्यवस्था पर रोक लगाई गई.

सो, इस तरह के पंडितों की देखरेख में धार्मिक स्थलों का संचालन होता है और वहां भक्तजन भी जुट जाते हैं तो आसाराम जैसे रावणों का जन्म क्यों नहीं होगा?

बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जिलिंग (प.बं.)

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आसाराम के बारे में ‘आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी’ लेख पढ़ कर कुछ भी अप्रत्याशित नहीं लगा. जो हुआ वह तो होना ही था, बल्कि वर्षों से होता आया है, प्रकाश में अब आया है.

आश्चर्य यह है कि आस्थावान लोगों की आस्था टूटे नहीं टूट रही है. विश्वास और अंधविश्वास के बीच का फर्क कब समझ में आएगा लोगों को? नित्यानंद, निर्मल बाबा और आसाराम सरीखे कलियुगी भगवान से समाज को कब छुटकारा मिलेगा?

अफसोस यह है कि भगवान के खोल में छिपे इन राक्षसों के लिए जनता स्वयं ही उन का ग्रास बनने को तैयार है, विशेषकर महिलाएं, जो स्त्री हो कर भी एक स्त्री की पीड़ा नहीं समझतीं. अशिक्षित ही नहीं शिक्षित लोग भी अपनी अंधभक्ति के खिलाफ कोई तर्क सुनना पसंद नहीं करते. कई सैलिब्रिटी, जो जनता के आदर्श हैं, वे भी इन तथाकथित बाबाओं के चरणों में शीश नवाते हैं.

घर में काम करने वाली नौकरानी तनखा बढ़ाने को कहे तो उसे निकम्मा कह कर निकाल दिया जाता है, जरूरतमंद दोस्त या रिश्तेदार कुछ रुपए मांगे तो आप बहाने खोजते हैं, सब्जी वाले से 5-10 रुपयों के लिए बहस कर लेते हैं मगर इन बाबाओं के लिए लाखोंलाख रुपया दान करने में गर्व महसूस करते हैं.

हम यह क्यों नहीं समझते कि हमारे ही बीच में पैदा होने वाला मनुष्य, जो दैत्यों का सा आचरण करता है, वह भला भगवान कैसे हो सकता है. अगर सही अर्थों में ये महात्मा हैं तो हमारे बीच क्यों रह रहे हैं? राजसी ठाटबाट और ऐशोआराम त्याग कर हिमालय की कंदराओं में या सतपुड़ा के जंगलों में जा कर तपस्या क्यों नहीं करते?

पूजना ही है तो उन किसानों को पूजो जिन के परिश्रम के कारण ही हमारे घरों में अनाज आता है. सीमा पर मरमिटने वाले जवान पूजनीय हैं जिन के कारण हम अपने घरों में चैन की नींद सोते हैं. माला जपो, उन देशभक्तों के नाम की, जिन की दी हुई आजाद आबोहवा में हम सांस ले रहे हैं. धन्यवाद करो मातापिता का जिन्होंने हमें यह दुनिया दिखलाई. दान करो प्रकृति को जो हर पल हमें जिंदगी दे रही है.

दरअसल, हमारी जागरूकता ही इन बाबाओं का सिंहासन हिला सकती है और हमारी धर्मनिरपेक्षता ही इन की जड़ें उखाड़ सकती है.

आरती प्रियदर्शिनी, गोरखपुर (उ.प्र.)

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प्रधानमंत्री की योग्यता

अक्तूबर (प्रथम) अंक का अग्रलेख ‘नरेंद्र मोदी ?: विवादों के घेरे में भाजपा के प्रधानमंत्री’ पढ़ा. लेखक ने कई सवाल भी उठाए, जैसे मोदी विपक्ष से ही नहीं, अपनों से भी घिरे हैं, मोदी कौन सा चमत्कार दिखाएंगे, उत्तराखंड की पहाडि़यों में वे हैलिकौप्टर से क्यों गए थे, वे अपना कद राष्ट्रीय नेतृत्व या पीएम योग्य किस आधार पर मान रहे हैं, उन्हें न तो अंगरेजी ही आती है और न ही सब को साथ ले कर चलने की योग्यता ही उन में है, आदि.

आज तक हमारे देश में बने प्रधानमंत्रियों में से कितने ‘अभिमन्यु’ थे, जो मां के पेट से ही सभी कुछ सीख कर आए थे? क्या ‘आसमान’ से अवतरित हुए ‘युवा’ प्रधानमंत्री ने चमत्कार कर दिखाया था या फिर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी देवेगौड़ा, जिन्हें देश की राज्यभाषा हिंदी तक नहीं आती थी और जिन्हें राज्य से एकदम केंद्र में ले जा कर पीएम की कुरसी पर बैठा दिया गया था, ने क्या कोई चमत्कार कर दिखाया था?

देश में आज 10-12 महत्त्वाकांक्षी राजनेता ऐसे ही हैं. जो तीसरेचौथे मोरचे के नाम पर पीएम बन जाने का सपना संजोए बैठे या प्रयत्नशील हैं. मगर, इन में से किसी एक के भी बारे में क्या कोई भी बता सकता है कि वह सर्वमान्य, चमत्कारिक या फिर देश चलाने की सारी योग्यताएं अपने में समेटे हुए हैं.

रही बात सब को साथ ले कर चलने की, तो सुनिए, ये कहावतें हमारे देश में यों ही प्रचलित नहीं हैं कि ‘राजनीति में कोई किसी का न ही स्थायी दोस्त है न ही दुश्मन और न ही कोई अछूत.’ और ये सभी तथाकथित जननायक जब राजनीति ‘स्वहित’ की ही करते हों तो फिर वे दूर रहेंगे भी कब तक. पहाड़ों पर पैदल जाने की बात कर लेखक ने अपनी बौद्धिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगवाया है, क्योंकि उन्होंने यह नहीं बताया कि वहां पैदल गया ही कौन था, जो मोदी भी जाते.

टीसीडी गाडेगावलिया, करोल बाग (न.दि.)

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भेड़ की खाल में भेडि़या

आसाराम की हैवानियत की पड़ताल करती रिपोर्ट ‘आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी’ पढ़ी. आसाराम जो कुछ भी धर्म के नाम पर कर रहे थे, आज दुनिया के सामने है. इन को क्या सजा होगी, कब होगी, होगी भी कि नहीं या इन के हर महकमे में बैठे इन के अंधविश्वासी भक्त इन को बचा ले जाएंगे, वक्त ही बताएगा. जब से इन को पकड़ा गया है, इन के भक्तों की पूरी कोशिश है कि उन्हें किसी भी तरीके से बचा लेना चाहिए. हैरानी की बात तो तब लगती है जब राम जेठमलानी जैसे विख्यात लोग भी उन्हें जमानत दिलवाने में लगे हैं.

पीडि़ता लड़की और उस के मांबाप जिन्होंने इतना सब सह कर भी जिंदादिली से काम लिया है, बधाई के पात्र हैं. अपने भीतर छिपी पीड़ा को एक दुखी बाप के लिए दुनिया के सामने लाना आसान बात नहीं है. यह तो देशवासियों के लिए ‘आई ओपनर’ है.

मैं समझता हूं कि इस से लोग, खासतौर पर महिलाएं, सबक लेंगी. कसम खाएंगी कि वे कभी भी ऐसे गुरुओं के चक्कर में नहीं पड़ेंगी.

ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुजरात)

अकर्मण्य देश के मुंगेरी सपने

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का डौंडियाखेड़ा गांव देश के नक्शे में कहां है, कल तक कोई वाकिफ नहीं था. लेकिन पिछले दिनों एक साधु के सोने के खजाने से जुड़े तथाकथित स्वप्न ने इस गांव को रातोंरात मीडिया, नेता और नौकरशाहों के साथसाथ आम लोगों के पर्यटन स्थल में तबदील कर दिया है. शोभन सरकार के सपने के सोने पर हो रही सियासत, नौकरशाही की सक्रियता व खबरिया चैनलों का बेवकूफाना तमाशा क्या रंग लाएगा और क्या है खजाने का पूरा सच, पढि़ए शैलेंद्र सिंह की रिपोर्ट में.

खजाने की खोज की अफवाहें पूरी दुनिया में उड़ती रहती हैं. कई बार पुरातत्त्व विभाग भी ऐसे झांसे में आ जाता है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के डौंडियाखेड़ा गांव में ऐसे ही एक खजाने की खोज शुरू हुई. इसे खबरिया चैनलों ने जिस तरह से सनसनी बना कर पेश किया उस से उन की पत्रकारिता पर सवाल खडे़ हो गए हैं. जैसेजैसे खुदाई बढ़ती गई परत दर परत राजनीति की ईंटें भी उखड़ने लगीं. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में होड़ लग गई कि अफवाह का सब से बड़ा पैरोकार कौन है?

पूरे मामले में जनता के बीच फैला अंधविश्वास भी खुल कर सामने आ गया. 1 हजार टन सोना मिलने की आहट से ही लोग अपना कामधाम छोड़ कर उधर दौड़ पडे़. इस से डौंडियाखेड़ा में रहने वाले उन लोगों का कुछ लाभ जरूर हो गया जो खानेपीने की दुकानें चलाते थे. 20 रुपए बिकने वाले दूध की कीमत 45 रुपए और चाय की कीमत 8 रुपए हो गई. 7 फुट गहरी खुदाई तक पुरानी लखौरी ईंटों की दीवार मिलने से पुरातत्त्व विभाग खुश है. उस का कहना है कि पुरानी धरोहर किसी खजाने से कम नहीं होती है.

खजाने की इस कहानी को सिलसिलेवार पढ़ने से सचाई की झलक मिलने लगती है. राजधानी लखनऊ से 70 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के डौंडियाखेड़ा गांव में राजा राव रामबक्श सिंह का एक किला है. इस गांव को अब संग्रामपुर के नाम से जाना जाता है. अब यह किला एक टीले के रूप में दिखता है. यहां एक पुराना शिवमंदिर है. इस को देख कर ही अंदाजा लगता है कि यह काफी पुरानी जगह है. यह जगह पुरातत्त्व विभाग के अधीन है. जंगलनुमा इस जगह पर कोई आताजाता नहीं था. डौंडियाखेड़ा के इस किले में खजाना है, यह अफवाह काफी लंबे समय से इस क्षेत्र के लोगों से सुनी जा रही थी. यहीं पास में शोभन सरकार का आश्रम है. इस इलाके में रहने वाले लोग शोभन सरकार को भगवान की तरह मानते हैं.

खुदाई में सियासी पेंच

शोभन सरकार आश्रम में रहने वाले स्वामी भास्करानंद देव की तरफ से सितंबर में एक पत्र उन्नाव के डीएम, सांसद और प्रधानमंत्री को भेजा जाता है. पत्र में लिखा गया था कि ‘डौंडियाखेड़ा में राव रामबक्श के किले में 1 हजार टन सोने का खजाना दबा है. राजा राव रामबक्श की आत्मा ने शोभन सरकार से कहा है कि यह खजाना निकाल कर देश के खजाने में जमा करा दिया जाए, जिस से देश की खराब होती आर्थिक हालत में सुधार आ जाएगा.’ शुरुआत में पत्र को गंभीरता से नहीं लिया गया. इसी बीच, छत्तीसगढ़ से सांसद व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री चरणदास महंत शोभन सरकार आश्रम के संपर्क में आते हैं. खजाने की बात उन को पता चलती है. वे उन्नाव आ कर शोभन सरकार से मिलते हैं. इस के बाद खजाने की खुदाई में जो तेजी एएसआई दिखाती है वह देखते ही बनती है.

29 सितंबर को चरणदास महंत के निजी सचिव द्वारा भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण यानी जीएसआई उत्तरी क्षेत्र को ईमेल द्वारा पत्र भेजा जाता है. चरणदास महंत ने प्रधानमंत्री सहित दूसरे लोगों से मौखिक बात भी की. इस के बाद खजाने की खुदाई की प्रक्रिया में तेजी आनी शुरू हो गई. 3 और 4 अक्तूबर को जीएसआई की सर्वे टीम ने डौंडियाखेड़ा आ कर सर्वे का काम पूरा कर लिया. 10 अक्तूबर को भारतीय पुरातत्त्व विभाग यानी एएसआई ने सर्वे रिपोर्ट को गहराई से पढ़ कर खुदाई की तारीख तय कर दी. दरअसल, खुदाई की इसी तारीख ने राजनीति के पेंच को खोलना शुरू कर दिया था. एएसआई ने 18 अक्तूबर को डौंडियाखेड़ा में खजाने की खुदाई करने की तारीख तय की. डौंडियाखेड़ा से करीब 92 किलोमीटर की दूरी पर 19 अक्तूबर को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में अपनी पहली रैली कानपुर में करने वाले थे.

मीडिया का पीपली लाइव

एएसआई के कुछ लोग भी इस खजाने की खोज में दिखाई गई तेजी से हैरान थे. उस समय तक यह बात फाइलों में चल रही थी. अचानक 14 अक्तूबर से खबरिया चैनलों ने खजाने की खुदाई को तिलस्मी बना कर पेश करना शुरू कर दिया. खबरिया चैनलों के कार्यक्रमों में बाबा, सपना, किला, राजा और आत्मा को ले कर तमाम खबरें दिखाई जाने लगीं. इमेजिनेशन का खूब इस्तेमाल कर कार्यक्रमों को सनसनीखेज बनाया गया. स्टूडियो में बैठी ऐंकर सोने के पिंजडे़ जैसी लिफ्ट से जमीन के अंदर जा कर दिखाती थी कि खजाना कैसे दिखता है. हकीकत में खंडहर सा दिखने वाला राव रामबक्श सिंह का किला स्टूडियो में सोने सा चमक रहा था. घोडे़ पर चढ़ी राव रामबक्श सिंह की मूर्ति खरे सोने सी चमक रही थी. हर चैनल में इस बात की होड़ लग गई कि वह इस सनसनी को कैसे फैलाए?

खबरिया चैनलों ने ही यह अफवाह फैलाई कि बाबा के सपने में आ कर राजा ने खजाना निकालने की बात कही है. इस के बाद खबरिया चैनलों ने अपने कार्यक्रमों में बाबाओं, स्वप्न विशेषज्ञों को बैठा सपनों का महिमामंडन करना शुरू कर दिया. 2 दिन में ही खबरिया चैनलों में ऐसी होड़ मच गई कि हर तरफ सोने के खजाने का शोर मच गया. खजाना निकलने के बाद देश का कितना भला हो जाएगा? रिजर्व बैंक की हालत कितनी मजबूत हो जाएगी? रुपए का भाव कितना बढ़ जाएगा? देश में महंगाई खत्म हो जाएगी और विकास ही विकास नजर आएगा, ये सारा आकलन होने लगा. उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों में भी खजाने की कहानी का असर दिखने लगा. पूरे देश में खजाने के प्रति कुतूहल बढ़ता जा रहा था.

18 अक्तूबर को डौंडियाखेड़ा में जब खजाने की खुदाई का काम शुरू हुआ तो 30 खबरिया चैनलों की ओबी वैन उस जंगल में पहुंच चुकी थीं. कुछ चैनलों के पास तो वीडियो कैमरे कम पड़ गए तो कानपुर और लखनऊ से किराए पर कैमरे मंगवाए गए. 20 से 25 हजार रुपए के किराए पर कैमरे मिले. खबरिया चैनलों में लगी होड़ देखते ही बन रही थी. उन के संवाददाता जिसे भी देख रहे थे उसी के पीछे भाग रहे थे. शोभन सरकार और उन के लोगों की एकएक बाइट हासिल करने में ऐसी जद्दोजेहद मची थी जैसे ओलिंपिक का मैडल बंट रहा हो. शाम को शोभन सरकार ने अपने आश्रम में 35 पत्रकारों से इस शर्त पर बात की कि कोई उन का फोटो नहीं लेगा. पत्रकारों को गहन तलाशी के बाद उन तक पहुंचाया गया.

20 मिनट की बातचीत में शोभन सरकार ने खजाने का एक पुराना सा नक्शा दिखाया. बहुत ज्यादा बात नहीं की. इस के बाद पत्रकार बाहर निकले तो यह होड़ मच गई कि कौन अपने चैनल पर सब से पहले यह बता दे कि वह शोभन सरकार से मिल चुका है. हर चैनल पर पत्रकार चीखचीख कर कह रहा था कि शोभन बाबा ने खासतौर पर उस से ही बात की है. यहीं पर, शोभन सरकार की तरफ से ओम बाबा मीडिया से मिलने लगे. ओम बाबा ने एक नया दावा किया कि केवल डौंडियाखेड़ा ही नहीं, फतेहपुर के आदमपुर और कानपुर में भी सोने का खजाना है. वहां के डीएम को भी खुदाई का पत्र दिया गया है.

काम न आया पूजापाठ

18 अक्तूबर को डौंडियाखेड़ा में सुबह 11 बजे से खजाने की खुदाई का काम शुरू हुआ. इस के पहले सुबह 4 बजे मीडिया से बचते हुए शोभन सरकार ने खजाने की खुदाई वाली जगह पर पूजापाठ किया. खुदाई के लिए पहला फावड़ा मारने का काम वहां के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर, डीएम और उन्नाव के एसपी जैसे अधिकारियों ने किया. पुरातत्त्व विभाग की यह पहली खुदाई थी जिस के पहले इतना पूजापाठ किया गया था. पुरातत्त्व विभाग के लोगों ने मजदूरों के साथ मिल कर खुदाई शुरू की तो लोगों का उत्साह कम होने लगा. इस समय तक पुरातत्त्व विभाग के लोगों ने साफ कर दिया था कि 15 फुट की खुदाई में कम से कम 1 महीने का समय लगेगा. पुरातत्त्व विभाग ने यह भी कहना शुरू कर दिया था कि हम खजाने के लिए खुदाई नहीं कर रहे हैं.

29 अक्तूबर तक केवल 4.8 मीटर गड्ढे की खुदाई हुई थी. अब तक यह साफ हो गया कि 1 हजार टन सोना मिलने की बात कोरी अफवाह ही है. ऐसे में खबरिया चैनलों को अपना जमीर याद आने लगा. एक चैनल ने पूरे मामले में खबरिया चैनलों की भूमिका पर सवाल उठा कर अपना दामन पाकसाफ दिखाने की कोशिश शुरू कर दी. खबरिया चैनलों के साथ ही साथ धर्म और आडंबर का समर्थन करने वाले कुछ अखबारों ने भी खजाने की खोज के आधार पर सपने बुनने शुरू कर दिए थे. सवाल उठता है कि ऐसे सपने दिखा कर जनता को गुमराह करना कितना उचित है. लेखक और स्तंभकार हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं, ‘‘खबरिया चैनलों की विश्वसनीयता तो पहले से ही कम हो गई थी. अब समाचारपत्र भी उस होड़ में शामिल हो गए जो अच्छे लक्षण नहीं हैं.’’

खजाने के बंटवारे की होड़

खजाना मिला नहीं पर उस के बंटवारे की होड़ शुरू हो गई. शोभन सरकार की तरफ से केंद्र सरकार को कहा गया था कि खजाने का 20 फीसदी हिस्सा स्थानीय विकास पर खर्च हो. ऐसे में उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को कहां चैन आने वाला था. कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी और समाजवादी पार्टी के महासचिव नरेश अग्रवाल ने कहा कि खजाने पर पहला हक उत्तर प्रदेश का होगा. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 18 अक्तूबर को एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए कानुपर गए तो कहा कि हम चाहते हैं कि बाबा की बात सही निकले. प्रदेश के राज्यमंत्री का दरजा प्राप्त सुनील यादव ने शोभन सरकार से मुलाकात करने के बाद कहा कि संत का दावा अकाट्य है. खजाने से प्रदेश के विकास का खाका खींचा जाए. सुनील यादव ने भी खजाने पर उत्तर प्रदेश के दावे को मजबूती के साथ रखा.

सरकार ही नहीं, राजा राव रामबक्श और उन के सेनापति तक के करीबी होने का दावा करने वाले लोग भी जुट गए. वे सब भी खजाने में अपनी हिस्सेदारी मांगने लगे. वहीं, अखिल भारतीय क्षत्रिय समाज ने भी राजा के खजाने पर अपना दावा ठोंक दिया. राजा के इस किले में जहां कोई दिन में भी जाने का साहस नहीं करता था वहां मेला लग गया था. 200 पुलिस के जवान भीड़ को संभालने के लिए लगाए गए. प्रशासन ने खुदाई वाली जगह को चारों ओर बांस गाड़ कर घेर दिया. जैसेजैसे खजाने की खुदाई बढ़ रही थी, लोगों का सपना टूट रहा था.

6 फुट की खुदाई पर भूरे रंग की मिटट्ी मिलने के बाद शोभन सरकार के पैरोकार ओम बाबा ने नया दावा किया कि 15 फुट की खुदाई पर आश्चर्यजनक चीजें मिलेंगी.

नेताओं की तूतूमैंमैं

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 अक्तूबर को चेन्नई में कहा, ‘पूरी दुनिया हम पर हंस रही है. किसी ने खजाने का सपना देखा और सरकार ने खुदाई का काम शुरू कर दिया. अगर देश का काला धन वापस लाने का प्रयास होता तो खजाने की खुदाई की जरूरत नहीं पड़ती.’ हमेशा संत और बाबाओं का साथ देने वाली भाजपा शोभन सरकार के खिलाफ बोलने लगी. इस के पीछे की वजह केवल इतनी थी कि खजाने की खोज की चमक ने नरेंद्र मोदी की 19 अक्तूबर को होने वाली रैली को फीका कर दिया था.

चेन्नई में खजाने की खोज को जगहंसाई बताने वाले नरेंद्र मोदी ने कानपुर की अपनी रैली में इस विषय पर एक शब्द भी नहीं बोला. यही नहीं, जब वे कानपुर से वापस गुजरात गए तो शोभन सरकार का गुणगान किया. भाजपा ने कानपुर के एक नेता को दूत बना कर शोभन सरकार से मिलने के लिए भेजा.

18 अक्तूबर को ही शोभन सरकार की तरफ से एक पत्र नरेंद्र मोदी को लिखा गया था. पत्र में कई बातें लिखी गईं. इस के जवाब में भाजपा के प्रवक्ता रामेश्वर चौरसिया का बयान आया कि पत्र को देखने के बाद लगता है कि इस को कांग्रेस की तरफ से लिखा गया है. इसी बीच, मेरठ में कुछ लोगों ने शोभन सरकार के पैरोकार ओम बाबा को पहचान लिया. पूछने पर पता चला कि ओम बाबा का पहले नाम ओम अवस्थी था. वे कांग्रेस पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता थे. 15 साल पहले वे मेरठ से कानपुर चले आए. टीवी पर देख कर लोगों ने उन को पहचान लिया.

भाजपा नेता शोभन सरकार पर वार करने से बच रहे हैं पर ओम बाबा से वे खफा हैं. इन नेताओं का मानना है कि कांग्रेस के दबाव में ओम बाबा ने यह पूरा काम किया है. दूसरी पार्टियां भले ही इस मसले पर चुप हो गई हों पर जनता दल युनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस की आलोचना की. शरद यादव ने तो इस पूरे प्रकरण में अहम रोल निभाने वाले केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत और एएसआई के अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा कायम कराने की बात भी कही है.

अंधविश्वासियों का देश कहे जाने वाले भारत के नेता, नौकरशाह और प्रिंट व इलैक्ट्रौनिक मीडिया सभी का विश्वास सोने के खजाने पर डगमगा रहा है. कभी विश्वास तो कभी अविश्वास के फेर में पड़े इन ताजा अंधविश्वासियों के अंधविश्वास पर विश्वास को देख पुराने अंधविश्वासी, जिन में ज्यादातर महिलाएं हैं, मुसकराते मजे ले रहे हैं.

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फर्जी चमत्कारों पर जीता देश

ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों की इस पावन भारतभूमि पर सपनों में खोए लोगों का मजमा कब, कहां लग जाए, यह कोई हैरत की बात नहीं है. साधु शोभन सरकार ने अपना सपना केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री चरणदास महंत को सुनाया तो वह भला सपने को बकवास कैसे कह सकते थे. उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और केंद्र में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी को बताया. ऐसा खजाना हाथ लगने वाला हो तो किसी भी साधु की बात पर भरोसा किया जा सकता है. सपना साधु का था तो मिथ्या हो ही नहीं सकता. लिहाजा, भारतीय पुरातत्त्व विभाग यानी एएसआई और भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण यानी जीएसआई ने खोज कर बताया कि वास्तव में जमीन के नीचे कोई ‘धातु’ अवश्य है.

सरकार अपने महकमों की जांच से खुश हो गई. हो भी क्यों नहीं. आखिर हम उस भारतभूमि में रहते हैं जहां पहले भी राजा, महाराजा अपने साधुसंन्यासियों और राजपुरोहितों के सपनों के आधार पर ही राजकाज चलाया करते थे. यह देश बड़ेबड़े स्वप्नदृष्टा ऋषि, मुनियों, साधुसंतों, तपस्वियों की भूमि है जहां पहले भी इस तरह की महान विभूतियां अपने तप, अंतरदृष्टि के जरिए गड़े खजानों का अतापता बताती रही हैं.

देश हमेशा से भरोसा करता आया है कि साधु का सपना कभी झूठ नहीं होता. साधु की वाणी, वचन कभी खाली नहीं जाता. देश को साधुओं पर गहरी आस्था है. इस देश की पावन पवित्र भारतभूमि पर त्रिकालदर्शी ऋषि, मुनि, साधुसंत सदियों से वास करते आए हैं. शोभन सरकार के सपने में  शामिल सरकार खुश है कि हजार टन सोना आएगा तो देश की अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी. अर्थव्यवस्था सुधारने का जो काम सरकार स्वयं नहीं कर पाई, चलो शोभन सरकार का सपना ही पूरा कर देगा, इसलिए सरकार साधुओं, गुरुओं से दिशानिर्देश प्राप्त करने लगी है.

वहीं, कुछ लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही क्योंकि साधु ने सपने के सोने की मात्रा इतनी अधिक बताई है कि पूरे उत्तर प्रदेश के छोटेमोटे ईंट भट्ठों में ईंट का उत्पादन भी उतना नहीं होता होगा.

डौंडियाखेड़ा ही नहीं, पूरे उन्नाव जिले में लोगों का विश्वास है कि शोभन सरकार ने कहा है तो 1 हजार टन सोना निकलेगा ही. यह बात लोग छाती ठोंक कर कह रहे हैं. साधु के समर्थन में वे उन के तमाम चमत्कार गिनाते घूम रहे हैं, जिन में एक यह भी है कि एक बार शोभन सरकार ने अपने आश्रम में एक पेड़ को हिलाया तो इतने रुपए गिरे कि लोग गले तक ढक गए थे.

हमारी धर्र्म की किताबें भी तो गड़े खजाने के किस्से कहती हैं. हमारे यहां समुद्र मंथन से 14 बेशकीमती रत्न निकलने की कथा इस देश का बच्चाबच्चा जानता है. साधु, संत, गुरु, प्रवाचक यह कथा अपने लगभग हर प्रवचन में सुनाते भी हैं.

स्कंध पुराण के अनुसार, एक बार की बात है, शिवजी के दर्शनों के लिए दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कैलास जा रहे थे. मार्ग में उन्हें देवराज इंद्र मिले. इंद्र ने दुर्वासा ऋषि और उन के शिष्यों को प्रणाम किया. तब दुर्र्वासा ने इंद्र को आशीर्वाद दे कर विष्णु भगवान का पारिजात पुष्प प्रदान किया. इंद्रासन के गर्व में चूर इंद्र ने उस पुष्प को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया. उस पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत सहसा विष्णु भगवान के समान तेजस्वी हो गया. उस ने इंद्र का परित्याग कर दिया और उस दिव्य पुष्प को कुचलते हुए वन की ओर चला गया.

इंद्र द्वारा भगवान विष्णु के पुष्प का तिरस्कार होते देख दुर्वासा के क्रोध की सीमा न रही. उन्होंने देवराज इंद्र को श्री(लक्ष्मी)हीन हो जाने का शाप दे दिया. दुर्वासा ऋषि के शाप के फलस्वरूप लक्ष्मी उसी क्षण स्वर्गलोक को छोड़ कर अदृश्य हो गई. लक्ष्मी के चले जाने से इंद्र आदि देवता निर्बल और श्रीहीन हो गए. उन का वैभव लुप्त हो गया. इंद्र को बलहीन जान कर दैत्यों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवगण को पराजित कर के स्वर्र्ग पर अपना परचम फहरा दिया. तब इंद्र देवगुरु बृहस्पति और अन्य देवताओं के साथ  ब्रह्माजी की सभा में उपस्थित हुए. तब ब्रह्माजी बोले, देवेंद्र, भगवान विष्णु के भोगरूपी पुष्प का अपमान करने के कारण रुष्ट हो कर भगवती लक्ष्मी तुम्हारे पास से चली गई हैं. उन्हें फिर से प्रसन्न करने के लिए तुम भगवान नारायण की कृपादृष्टि प्राप्त करो. उन के आशीर्वाद से तुम्हें खोया वैभव फिर से मिल जाएगा.

ब्रह्माजी ने इस प्रकार इंद्र को आश्वस्त किया और उन्हें ले कर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे. देवताओं ने आने का प्रयोजन बताया. भगवान विष्णु त्रिकालदर्शी हैं. वे पलभर में ही देवताओं के मन की बात जान गए. तब वे देवगण से बोले, देवगण, मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनें क्योंकि केवल यही तुम्हारे कल्याण का उपाय है. दैत्यों पर इस समय काल की विशेष कृपा है इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तब तक तुम उन से संधि कर लो. क्षीरसागर के गर्भ में अनेक दिव्य पदार्थों के साथसाथ अमृत भी छिपा है. उसे पीने वाले के सामने मृत्यु भी पराजित हो जाती है. इस के लिए तुम्हें समुद्रमंथन करना होगा. यह कार्य अत्यंत दुष्कर है. इस कार्य में दैत्यों की सहायता लो. कूटनीति भी यही कहती है.

भगवान विष्णु के बताए अनुसार, इंद्र आदि देवतागण दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव ले कर गए और उन्हें अमृत के बारे में बता कर समुद्रमंथन के लिए तैयार कर लिया. समुद्रमंथन के लिए समुद्र में मंदराचल को स्थापित कर वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया. उस के बाद दोनों पक्ष अमृत प्राप्ति के लिए समुद्रमंथन करने लगे. भगवान कच्छप के एक लाख योजन चौड़ी पीठ पर मंदराचल पर्वत घूमने लगा. समुद्रमंथन में सब से पहले जल का हलाहल विष निकला. फिर अमृतमयी कलाओं से परिपूर्ण चंद्रदेव प्रकट हुए. कामधेनु गाय निकली. फिर उच्चै:श्रवा अश्व निकला. यह समस्त अश्व जाति में एक अद्भुत रत्न था.

उस के बाद गज जाति में रत्नभूत ऐरावत हाथी प्रकट हुआ, अब की बार समुद्र से संपूर्ण भुवनों की एकमात्र अधीश्वरी दिव्यरूपा देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं. कौस्तुभमणि, कल्पद्रुम, रंभा नामक अप्सरा निकलीं. इस के बाद कन्या के रूप में वारुणि प्रकट हुई. फिर पारिजात वृक्ष व पांचजन्य शंख निकले और आखिर में धन्वंतरि वैद्य अमृत का घट ले कर प्रकट हुए.

तंत्रमंत्रों के सहारे गड़ा धन निकालने के दावे

‘कामाक्षा सिद्घि’ नामक पुस्तक में पृथ्वी में गड़ा धन दिखने के मंत्र बताए गए हैं. पुस्तक में एक जगह लिखा है,‘ॐ हृं क्लीं सर्वोषधी प्रणते नमो विच्चे स्वाहा.’

इस मंत्र की साधना के लिए विधि भी कही गई है,‘‘काले कौए की जीभ को काली गाय के दूध में औटा कर जमाने के बाद उस से घी निकाल कर, घी को उक्त मंत्र से 108 बार अभिमंत्रित कर के आंखों में आंजे तो गड़ा हुआ धन दिखाई देने लगता है अथवा उक्त घी को दीपक में जला कर काजल बनाएं. उस काजल को जो मनुष्य पांव की ओर से जन्मा (विष्णु पांव) हो, उस की आंखों में लगाए तो उसे पृथ्वी का गड़ा हुआ धन दिखाई देता है.’’

इसी पुस्तक में कुछ और विधि बताई गई हैं :

  1. काले रंग की इकरंगी मुरगी, जिस का मांस भी काला हो, उस की चरबी को अपनी आंखों में आंजने से पृथ्वी में गड़ा हुआ धन दिखाई देने लगता है.
  2. जिस स्थान पर कौए मैथुन करें और उसी स्थान पर सिंह आ कर बैठै, तो ऐसे स्थान में धन गड़ा हुआ है, ऐसा जान लेना चाहिए.

पृथ्वी में गड़ा धन जानने के और भी नियमानुसार तंत्र हैं.

  1. लाल पूंछ वाली वामनी को पकड़ कर  उस का रक्त निकाल लें. फिर उस में मैनसिल मिला कर पीसें, इस अंजन को आंखों में आंजने से पृथ्वी में गड़ा हुआ धन दिखाई देगा.
  2. शुभ तिथि, वार व नक्षत्र में काली गाय के दूध को जीभ पर रखें और उस के घी को दोनों आंखें में आंजें तो पृथ्वी में गड़ा हुआ धन दिखाई देगा.
  3. एक ऐसी काली मुरगी लें जिस का मांस भी काला हो, उस मुरगी के मांस को आंखों में आंजने से पृथ्वी में गड़ा धन दिखाई देगा.
  4. जिस जगह से कमल पुष्प जैसी गंध आती हो वहां धन गड़ा हुआ समझना चाहिए. जहां आसपास कोई जलाशय न हो, परंतु सूर्य की तेज धूप में भी जिस स्थान की मिट्टी नम रहती हो, वहां धन गड़ा हुआ समझना चाहिए.

इस पुस्तक में और भी साधन बताए गए हैं:

  1. दीपावली की रात में श्मशान में जा कर मनुष्य के कपाल में दीपक जला कर काजल पारें फिर उस काजल का आंख में अंजन करें तो पृथ्वी के भीतर गड़ी हुई वस्तुएं दिखाई देंगी.
  2. तुलसी, तुरंत मरे हुए मनुष्य के पेट का पानी, गोरोचन व शर्करा, इन सब को इकट्ठा कर 8 दिन तक धूप में रखें और 9वें दिन उन का अपनी आंखों में अंजन करें तो पृथ्वी में गड़ी हुई वस्तुएं दिखाई देंगी.
  3. कौए के रक्त में मैनसिल को भिगो कर छाया में सुखा लें. फिर उसे कूटपीस कर कपड़छन कर के आंखों में अंजन करें तो पृथ्वी में गड़ी हुई वस्तुएं दिखाई दे उठेंगी.
  4. काले कौए की जीभ तथा मांस को ले कर आक के सूत में लपेट कर बत्ती बनाएं और उसे बकरी के घी में भिगो कर रात के समय दीपक में जला कर काजल पारें. उस काजल को आंखों में लगाने से पृथ्वी के भीतर पड़ी हुई वस्तुएं दिखाई देंगी.

शोभन सरकार ने सपना कैसे देखा, यह रहस्य भी हमें मिल गया है. उन्होंने जरूर ‘कामाक्षी सिद्धि’ नामक पुस्तक पढ़ कर कड़ी मशक्कत की होगी तब जा कर स्वप्न में गड़ा सोना दिखाई पड़ा है. यह रहस्य क्या है, कैसे स्वप्न में गड़े धन का पता लगाया गया, आप भी जान लीजिए :

‘‘गुरुवार के दिन एक कौए को पकड़ कर पिंजरे में बंद कर दें. यदि धन गाड़ने वाला व्यक्ति पुरुष है तो नर कौए को और स्त्री हो तो मादा कौए को पकड़ना चाहिए. 3 दिन तक कौए को सामान्य दानापानी के अतिरिक्त दिन में एक बार किसी भी समय शुद्ध शहद के साथ गेहूं की रोटी भी अवश्य खिलानी चाहिए. चौथे दिन उस कौए को मार कर चोंच सहित उस के सिर को अलग कर लें व उस के शरीर के शेष भाग को पृथ्वी में गाड़ दें. फिर उस सिर को किसी लकड़ी की डब्बी में बंद कर के सुखाने के लिए किसी अंधेरी कोठरी में रख दें.

‘‘40 दिन बाद उस डब्बी को देखें. तब तक वह सिर सूख चुका होगा. तत्पश्चात उस सूखे हुए सिर को शुक्रवार के दिन 1 घंटे के लिए तेज धूप में रख दें और उस में 10 बूंद शुद्घ गुलाबजल व 1 माशा बढि़या शराब डाल कर डब्बी को फिर बंद कर दें. फिर अमावस्या की आधी रात के समय उस डब्बी को अपने सोने की चारपाई के सिरहाने जमीन में 1 फुट गहरा गड्ढा खोद कर गाड़ दें तथा स्वयं उसी चारपाई के ऊपर प्रतिदिन सोया करें. सोते समय सिर पूर्व की ओर व पांव पश्चिम की ओर रखने चाहिए.

‘‘उक्त कौए के सिर को सूखने में जितने दिन लगे हों (लगभग 40-50 दिन), उतने दिनों तक इसी प्रकार सोते रहें. इसी अवधि में किसी रात को सोते समय स्वप्न में गड़े हुए धन की पूरीपूरी सूचना मिल जाएगी और जागने पर स्वप्न की पूरी याद भी बनी रहेगी. तब उस सूचना के अनुसार, निश्चित स्थान पर पहुंच कर वहां गड़े हुए धन को निकाल लेना चाहिए.’’

इस के बाद जब आप को धन दिख जाए तो उस धन  को खोदने का मंत्र भी सीख लीजिए: ‘‘ॐ नमो भगवति सुमेरू रूपायै महाक्रांतायै कै कालरूपायै फट् स्वाहा.’’ और विधि भी समझ लीजिए: ‘‘पहले बिनौले, मूंग और तिल को गोमूत्र में पीस कर अपने शरीर पर लगाएं. फिर जहां खोदना हो वहां चौका लगा कर, बलिदान दे कर उक्त मंत्र का पाठ करें. फिर इसी मंत्र से गेहूं और तिल का होम करें. इस प्रकार 7 दिन तक करने के बाद शुभ नक्षत्र देख कर उस स्थान को खोदें तो सर्प आदि का भय नहीं होगा.’’

‘इच्छापूरक सिद्घियां’  नामक पुस्तक में भी गड़े धन की प्राप्ति के यंत्र बताए गए हैं. यंत्र इस प्रकार हैं:

‘‘बेलपत्र के रस हरताल तथा मैनसिल के मिश्रण द्वारा बेल कीलकड़ी के कलम से किसी शुभ स्थान पर बैठ कर पृथ्वी पर 2 हजार बार लिखने से गड़े हुए धन की प्राप्ति होती है तथा मनोभिलाषाएं पूर्ण भी होती हैं.’’

लेकिन इन तमाम तरीकों से अब तक कहांकहां, कबकब, कितना गड़ा खजाना मिला, इस बात का जिक्र कहीं नहीं है.

सरकार ने बेमतलब ही जीएसआई, एएसआई जैसे महकमे बना रखे हैं. उसे सपने में गड़ा धन देखने वाले साधु, तंत्रमंत्र की सहायता से धन बताने वाले तांत्रिकों को भरती करना चाहिए ताकि वे सरकार को बताएं और फिर खुदाई हो. अर्थ संबंधी महकमा शोभन सरकार और उस जैसे सपना देखने वाले साधुओं को दे दिया जाए जो समयसमय पर पता कर के बताते रहें कि  किस जगह खजाना दबा पड़ा है.

इस देश में सदियों से साधु और शासक सपनों के सौदागर रहे हैं जिन्होंने न खुद परिश्रम कर के सोना उगाने की तरकीब की और न ही जनता को ऐसी कोई सीख दी. उन्होंने चमत्कारों पर भरोसा करना सिखाया. खोखले सपनों के सच होने की कहानियां सुनाईं इसीलिए जब खुली आंखों से ऐसे सपने देखे जाते हैं तो हाथ भी खाली ही रहते हैं. हैरत की बात है कि यह ठगविद्या आज तक जारी है.

सरकार के साथ साधु के समर्थक वाहवाही लूट रहे हैं लेकिन जब सपने की हकीकत खुलेगी तो न सरकार मुंह दिखाने लायक रहेगी, न समर्थक और न ही साधु. यह कोई नई बात नहीं है. इस अकर्मण्य देश में बैठेबिठाए गड़ा धन पाने के धार्मिक उपाय सदियों से चले आ रहे हैं. पृथ्वी में गड़ा धन आम आदमी को नहीं, इस पावन पवित्र धरती के त्रिकालदर्शी, अंतर्यामी साधुसंतों, तांत्रिकों को ही दिखाई पड़ता रहा है. ये लोग ही राजाओं, शासकों और आम लोगों को बताते रहे हैं.

यह देश सदियों से चले आ रहे थोथे सपनों को कब तक ढोता रहेगा, साधुओं की बातों पर चलता रहेगा? यह सपने, जागती आंखों के

नहीं, अफीमी उन्माद से भरी आंखों के सपने हैं. इन्हीं के कारण देश गुलाम बना रहा, पिटता रहा और पिछड़ा रहा. सदियां बीत गईं पर सपने वही हैं. आज विज्ञान के युग में भी वही सपने देखे जा रहे हैं. हैरानी तो यह है कि पंडेपुरोहितों, साधुओंबाबाओं के फैलाए अंधविश्वास पर शासनप्रशासन तनमनधन से विश्वास कर रहे हैं.

-जगदीश पंवार

 

आज के वैज्ञानिक युग में सिर्फ सपने के आधार पर खुदाई करवाना कहां तक उचित है?

इस विषय पर आप के विचार आमंत्रित हैं. पता है : सरिता, ई-3, झंडेवाला एस्टेट, रानी झांसी मार्ग, दिल्ली प्रैस, नई दिल्ली-110055. आप हमें 08527666772 नंबर पर एसएमएस भी कर सकते हैं.

बात ऐसे बनी

मेरी शादी के 1 साल बाद मेरी सास ने मुझ से कढ़ी बनाने को कहा. मैं ने कढ़ी बनाई लेकिन उस दिन गलती से मैं पकौडि़यों में नमक डालना भूल गई. बिना नमक की पकौडि़यां डालने से कढ़ी में स्वाद नहीं आएगा और उन्हें नमक के पानी में भिगो भी नहीं सकते, उन में पानी भर जाएगा. मैं यह सोच ही रही थी कि तभी मेरे पति वहां आ गए. मैं ने पति को यह बात बता दी. उन्होंने एक कटोरी में नमक का पानी बनाया और सिरिंज की मदद से पकौडि़यों में डाल दिया. इस तरह पकौडि़यों ने रस को सोख लिया और उन में नमक भी पहुंच गया. पति की सूझबूझ काम आई और मेहमानों ने कढ़ी की बहुत तारीफ की.

रश्मि श्रीवास्तव

 

बात 1960 की है. मेरा जालंधर के एक डाकखाने में अकाउंट था. मैं इसे बंद करवा कर अपने पैसे लेना चाहता था, क्योंकि मैं ब्रिटेन जा रहा था. जब मैं अपने पैसे लेने काउंटर पर पहुंचा तो खजांची ने मेरी पासबुक देखी और मुझ से कहा कि पैसे तभी मिल सकते हैं जब आप इस काम के लिए किसी गवाह को ले आएं.

मैं एक मित्र को ले आया पर खजांची ने पैसे देने से फिर भी इनकार कर दिया. उस ने कहा कि आप किसी ऐसे गवाह को लाएं जो हम दोनों को जानता हो. मैं ने उसी समय कहा, ‘आप किसी से मेरी शादी करवा दें, फिर आप उस को भी जानेंगे और मुझे भी.’ उस समय उस के मुंह का हाल देखने लायक था. चेहरे पर पसीना बहने लगा और मेरे पैसे मिल गए.

 जोगिंदर पाल सिंह मक्कड़, स्कौटलैंड (यू.के.)

 

बात उन दिनों की है जब हम नेपाल से उत्तर प्रदेश के चांदीनगर इलाके में शिफ्ट हुए थे. हमें आए कुछ दिन हुए थे कि एक रात मेरी बेटी के कान में दर्द शुरू हो गया. घर में मेरे अलावा और कोई नहीं था. मेरे पतिदेव गांव गए हुए थे. बेटी दर्द के मारे रो रही थी. बेटी की हालत देख कर मैं घबरा गई. मुझे मालूम था कि 1-2 बूंद सरसों का तेल कान में डाल देने से दर्द में थोड़ी राहत मिलती है. लेकिन घर में एक बूंद भी सरसों का तेल नहीं था. रात के 12 बज रहे थे. मैं ने खिड़की से बाहर झांका तो गली सुनसान थी. मैं साहस कर के बाहर निकली और पड़ोसी का दरवाजा खटखटाया पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला. मुझे निराश हो कर लौटना पड़ा. क्या करूं, मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था.

मैं ने 2 बूंद रिफाइंड औयल बेटी के कान में डाल दिया. मैं ने सोचा, कुछ तो असर करेगा. सचमुच, 1 मिनट के अंदर दर्द गायब हो गया और मेरी बेटी चैन से सो गई.

जयंती रानी पात्रा, कृष्णा (आंध्र प्रदेश)

इन्हें भी आजमाइए

  1. टीनएजर्स की पार्टी में सभी को अलगअलग तरह की ज्वैलरी डिजाइन करने के लिए कहें. इस के लिए उन्हें स्ट्रा, फ्लावर्स, बीड्स व सीक्वैंस, स्वरोस्की, कलरफुल पेपर आदि सामान दें. इस से इयररिंग्स, नैकलेस, कंगन, ब्रेसलैट, टीका, करधनी, बैल्ट, अंगूठी आदि डिजाइन करने को कहें. जब वे डिजाइन बना चुकें तो बाद में उन्हें पहनने के लिए भी कहें.
  2. रैस्तरां में आप के किसी परिचित के मिल जाने पर उस से अभिवादन करें या औपचारिकता पूर्ति के लिए एकदो शब्द कहें. उस की मेज पर पहुंच जाना अनुचित है क्योंकि यह स्थिति उस व्यक्ति को बाध्य करेगी कि वह आप के लिए भी चायकौफी मंगाए.
  3. बच्चों की पार्टी में सिर्फ उन्हीं बच्चों को इनाम न दें जो पार्टी के दौरान खेलों में सफल रहे हैं बल्कि सभी मेहमान बच्चों को कोई न कोई उपहार अवश्य दें, जिस से वे खाली हाथ वापस न लौटें.
  4. कई बार देखने में आता है कि लोग जाते तो हैं अफसोस जाहिर करने परंतु संबंधित व्यक्ति के वहां से हटते ही इधरउधर की हांकने लगते हैं. यह बहुत ही अशिष्टतापूर्ण लगता है. भले ही आप वहां अधिक समय न रह कर थोड़ी देर ही रूकें, पर दूसरे प्रसंग न उठाएं.

चांद सा रोशन चेहरा

दीवाली पर सजनेसंवरने की उमंग आप में भी जगने लगती होगी. तो फिर देर किस बात की. दीवाली की जगमगाहट में आप के चेहरे का नूर कर देगा सब को हैरान. कैसे, बता रही हैं आभा यादव.

महिलाएं हमेशा से ही सजधज कर खूबसूरत दिखना चाहती हैं पर त्योहारों का मौसम आते ही उन में सजनेसंवरने की उमंगें ज्यादा ही उठने लगती हैं और जब दीवाली का त्योहार हो तो बात ही क्या, प्रकाशोत्सव उन्हें कुछ नया करने को प्रेरित करता है ताकि वे उस दिन लगें निखरीनिखरी और बहुत खूबसूरत.

ब्यूटी ट्रीटमैंट : रोशनी के त्योहार का रोशन चेहरे के साथ स्वागत करें. मेकअप ऐक्सपर्ट रेनू महेश्वरी का कहना है कि दीवाली पर खूबसूरत दिखने के लिए त्योहार से 1 महीना पहले ब्यूटी ट्रीटमैंट लेना चाहिए. फिर 15 दिन के बाद दोबारा ट्रीटमैंट लें. सब से पहले चेहरे की क्लीनिंग के लिए औक्सी फेसवाश का प्रयोग करें. यह फेसवाश चेहरे की सफाई के साथसाथ चेहरे पर नमी भी प्रदान करता है. इस मौसम में स्किन शुष्क होने लगती है. इसलिए मौश्चराइजिंग वाले प्रोडक्ट प्रयोग करने चाहिए. इस के अलावा अपनी त्वचा के स्वभाव को जानें कि वह किस प्रकार की है, उसी के अनुसार प्रोडक्ट का इस्तेमाल करें. त्वचा को पोषण देने के लिए फेशियल करवाएं.

फेशियल : कुछ फेशियल त्वचा की गहराई से सफाई करते हैं, चेहरे की धूलमिट्टी को आसानी से बाहर निकाल कर नए कोशों को विकसित करने में मदद करते हैं तो कुछ त्वचा पर उम्र के बढ़ते प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं. पर किसी भी फेशियल में स्ट्रोक्स बहुत महत्त्वपूर्ण है. अगर उचित तरीके से स्ट्रौक्स करना न आता हो तो ऐंटीक्लाकवाइज स्ट्रौक्स खुद कर सकते हैं. वैसे इसे एक ऐक्सपर्ट ही कर सकता है कि किस चेहरे की किनकिन जगहों पर प्रैशर पौइंट देने हैं. सही स्ट्रोक्स व प्रैशर पौइंट से रक्त संचार बढ़ने के साथसाथ थकान भी उतर जाती है, जिस से आप और भी ताजा महसूस करेंगी. फेशियल मसाज क्रीम बादाम व शहद वाली ही इस्तेमाल करें. ये त्वचा को अच्छा पोषण देती हैं.

डेविस ग्लो किट (इंस्टाग्लो) : मार्केट में फेशियल की तरहतरह की किट हैं पर डेविस ग्लो किट में चिनार की जड़ को डालते हैं जिस से त्वचा गोरी होती है. इस में नीबू, संतरे और गन्ने के रस का मिश्रण होता है. गन्ने का रस त्वचा को मौश्चराइज करता है. नतीजतन, त्वचा को अतिरिक्त विटामिन मिलता है और त्वचा शुष्क नहीं होती है. दीवाली के मौसम में एलोवीरा का प्रयोग भी करें. इस में रौयल जैली व शहद दोनों चीजें मिला कर त्वचा पर लगाएं. यह त्वचा में मिनरल की कमी को पूरा करता है, जींस और हार्मोंस को पुन: उत्पन्न करता है और वसा के स्तर को कम करता है.

घरेलू टिप्स : केला, पपीता, संतरा, खीरा व टमाटर में से किसी को भी कद्दूकस कर के उस में नीम व तुलसी के पत्तों को पीस कर साथ में शहद मिला लें. फिर अपने हाथपैर पर 10 मिनट लगा कर रखें. फिर गुलाबजल या सादे पानी से हलके हाथों से साफ कर लें. यह त्वचा के लिए ऐंटीसैप्टिक का काम करता है.

बौडी पौलिश्ंिग : जब त्वचा शुष्क होने लगे तो मसाज करें. त्वचा में नमी बनी रहेगी. कौन सी त्वचा पर कैसी मसाज करनी है, यह जानना जरूरी है. जिन की त्वचा औयली हो या दाने निकले हों उन्हें ‘जैल मसाज’ करनी चाहिए. त्वचा के सूखेपन से छुटकारा पाने के लिए क्रीम में हलदी मिला लें. ऐसा करने से त्वचा जल्दी ठीक होगी. हलदी का रस निकाल कर क्रीम में मिलाएं, फिर इस्तेमाल करें.

गोल्ड पौलिश्ंिग : आजकल केसर और गोल्ड डस्क मिली हुई पौलिश्ंिग किट बाजार में उपलब्ध है. इस में आयुर्वेदिक प्रोडक्ट होते हैं. इस की मसाज से बौडी में चमक आती है, साथ ही इस में विटामिन ‘ई’ और बादाम का तेल मिला हुआ होता है. इस की मसाज से मृत त्वचा बाहर निकल जाती है और बौडी में लंबे समय तक चमक बनी रहती है. यह मसाज 10 मिनट तक करें. तैलीय त्वचा के लिए चौकलेट जैल मसाज करें. जिन को बौडी में चमक नहीं चाहिए वे चौकलेट मसाज करवाएं.

यदि केले और क्रीम को लगा रही हैं तो लगाने के बाद बालों को कपड़े या फौइल पेपर में लपेट कर रखें. इस से परिणाम अच्छा आता है और बालों को अच्छी तरह से पोषण मिलता है. आप चाहें तो मेथीदाने को पीस कर दही में मिला कर बालों में लगा सकती हैं. इस से बाल काले व चमकदार दिखेंगे. बालों में विटामिन ‘ई’ की मालिश करें. तेल गुनगुना कर के हर 15 दिन में लगाएं. इस से बालों में नई जान आ जाएगी.

इस तरह इस बार दीवाली के अवसर पर दीए ही नहीं आप का चेहरा भी रोशन होगा. ऐसे में आप को दीवाली का भरपूर मजा उठाने में कुछ ज्यादा ही खुशी का एहसास होगा और दूसरे लोग आप से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे. 

हेमा की नसीहतें

बीते जमाने की ड्रीमगर्ल और अब भाजपा नेता हेमा मालिनी बीचबीच में कुछ बेतुके बयान दे कर इस प्रयास में लगी रहती हैं कि दर्शक  उन्हें कहीं भुला न दें.

पिछले दिनों मुंबई गैंग रेप कांड के बाद बलात्कारियों को दोष देने के बजाय उन्होंने महिलाओं को घर से बाहर कभी न निकलने की नसीहत दी. इसी तरह उन्होंने कहा था कि बड़ी ऐक्ट्रैस को आइटम नंबर की जरूरत नहीं है, इस के लिए हीरोइनें इंडस्ट्री में मौजूद हैं. हेमाजी, अपनी ये राजनीतिक नसीहतें आप को अपने पास ही रखनी चाहिए. आने वाले चुनाव में शायद आप को इन की जरूरत पड़ सकती है.

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