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विद्या के कपड़ों की नीलामी

फिल्म निर्देशक राजकुमार गुप्ता की कौमेडी फिल्म ‘घनचक्कर’ में विद्या बालन ने पंजाबी पत्नी का किरदार निभाया है. फिल्म की निर्माता कंपनी ‘यूटीवी’ और विद्या ने निर्णय लिया है कि फिल्म ‘घनचक्कर’ के प्रदर्शन के बाद फिल्म में विद्या बालन द्वारा पहने गए कौस्ट्यूम व पोशाकों की नीलामी कर के जो रकम हासिल होगी वह दान कर दी जाएगी. बीते साल डर्टी पिक्चर, कहानी और अब इस साल के कान फिल्म समारोह में जूरी मैंबर की हैसियत से शामिल होने वाली विद्या का यह चैरिटी अंदाज भी काफी अनोखा है.

 

बिग बी का तोहफा

बौलीवुड में अमिताभ बच्चन बहुत कम लोगों को ही गुलदस्ता वगैरह भेजते हैं. पिछले दिनों फिल्म ‘इशकजादे’ के लिए अभिनेत्री परिणिति चोपड़ा को स्पैशल ज्यूरी का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, तो अमिताभ बच्चन ने अपने हाथ से लिखा हुआ बधाई संदेश और एक गुलदस्ता परिणिति को भिजवाया. इसे पा कर परिणिति की खुशी का ठिकाना न रहा.

 

हौलीवुड की खुमारी

प्रियंका चोपड़ा हौलीवुड की फिल्म से जुड़ गई हैं. हालांकि वे अभिनय बल्कि डिजनी निर्मित व क्ले हाल निर्देशित एनीमेशन फिल्म ‘प्लेन्स’ में इशनी के पात्र को अपनी आवाज दे रही हैं. यह फिल्म बहुत जल्द पूरे विश्व  में अंगरेजी के अलावा हिंदी सहित 5 भाषाओं में प्रदर्शित होगी.

फिल्म के निर्देशक क्ले हाल कहते हैं, ‘‘हम ने अपनी फिल्म को भारत में रिलीज करने का मन बनाया है. मुझे भारत की सभ्यता व संस्कृति से लगाव है. इस के अलावा मैं ने प्रियंका चोपड़ा की फिल्म ‘दोस्ताना’ देखी थी. मुझे प्रियंका का काम पसंद आया था.’’ चलिए, फिल्म दोस्ताना से किसी का तो भला हुआ.

 

लखन का ऐक्शन

वर्ष 2003 में प्रदर्शित फिल्म ‘कलकत्ता मेल’ में ऐक्शन प्रधान किरदार निभाने के बाद अपने लखन यानी अनिल कपूर रोमांटिक या दूसरे किस्म के ही किरदारों में नजर आते रहे हैं. मगर अब तकरीबन 10 साल बाद अनिल कपूर ने भी ऐक्शन में वापसी की है. वे संजय गुप्ता व एकता कपूर निर्मित और संजय गुप्ता निर्देशित फिल्म ‘शूटआउट ऐट वडाला’ में जौन अब्राहम के साथ ऐक्शन करते हुए नजर आएंगे.

 

श्री

यह फिल्म हर किसी की समझ में आने वाली नहीं है. इस फिल्म में टाइम मशीन की कल्पना की गई है और कहा गया है कि इंसान चाहे तो समय से 1 या 2 दिन आगे चल सकता है. इसे समझाने के लिए निर्देशक ने टाइम ट्रैवल रिसर्च की बात की है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है और खुद भी अपनी धुरी पर घूमती है, जिस से समय का पता चलता है. लेकिन जब कभी भूकंप आता है या सूनामी आती है तो समय का यह चक्र टूटता है. इस से समय के चक्र में कुछ सैकंड का अंतर आ जाता है. यही अंतर सालों बाद बढ़तेबढ़ते 12 घंटे तक का हो जाता है. यदि कोई व्यक्ति इस टाइम टूटने के दौरान पैदा हुआ हो तो वह टाइम ट्रैवल कर के 1 या 2 दिन आगे जा सकता है, उसे आगे होने वाली घटनाओं के बारे में पता चल जाता है.

भविष्य में झांकने की कल्पना करना सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन यह असंभव है. बौलीवुड में टाइम ट्रैवल पर कई फिल्में बन चुकी हैं. ‘श्री’ उन फिल्मों से बहुत पीछे है.

कहानी श्री (हुसैन कुवाजेरवाला) नाम के एक नौजवान की है जो एक टैलीकौम कंपनी में अकाउंटैंट है. एक दिन कंपनी का मालिक उसे एक औफर देता है जिस के बदले उसे 20 लाख रुपए देने तय होते हैं. बदले में उसे 12 घंटे देने हैं. वह तैयार हो जाता है. उसे कौफी में बेहोशी की दवा मिला कर पिलाई जाती है. जब उसे होश आता है तो देखता है कि उसे एक व्यक्ति ने कैद किया हुआ है. वह भाग निकलता है. तभी उसे पता चल जाता है कि कंपनी के मालिक ने उसे एक तकनीक के सहारे समय से 2 दिन आगे भेज दिया है. अब श्री के साथ समय की 2-2 घटनाएं, एक वर्तमान की और एक 2 दिन आगे की, चलने लगती हैं. उसे पता चल जाता है कि पुलिस कमिश्नर और वैज्ञानिक की हत्याएं होने वाली हैं. वह न सिर्फ आगे होने वाली घटनाओं को रोकता है बल्कि वापस वर्तमान में आ कर असली अपराधी को भी पकड़वाता है.

फिल्म की इस कहानी में काफी कन्फ्यूजन है. 2-2 कहानियां एकसाथ चलती हैं. एक श्री, जो वास्तव में है, दूसरा श्री जो 2 दिन आगे ट्रैवल कर रहा है. कौन असली है, कौन फ्यूचर वाला है, इसी में दर्शक उलझ जाते हैं. फिल्म भले ही तेज रफ्तार वाली है लेकिन फिल्म का नायक इस की सब से बड़ी कमजोरी है. फिल्म का निर्देशन साधारण है. मध्यांतर तक दर्शक इसी उलझन में रहते हैं कि आखिर श्री के साथ हुआ क्या है.

एक थी डायन

यह फिल्म एकता कपूर और विशाल भारद्वाज ने कोंकणा सेन शर्मा के पिता मुकुल शर्मा द्वारा 36 साल पहले लिखी एक लघु कहानी पर बनाई है. आज से 50 साल पहले डायन का मिथ गांवों में बहुत प्रचलित था. यदाकदा आज भी कुछ गांवों में डायन के नाम पर कुछ महिलाओं को मार डाला जाता है.

‘एक थी डायन’ में उस वक्त मुकुल शर्मा ने डायन के बारे में जो मिथ प्रचलित थे, अपनी कहानी में उन का जिक्र किया?था. मसलन, डायन के?घने काले बाल होते हैं, उस की लंबी चोटी होती है, उस चोटी में उस की जादुई शक्तियां समाई होती हैं, डायन के पैर उलटे होते हैं, वह बच्चों को खा जाती है. एकता कपूर और विशाल भारद्वाज दोनों ने मिल कर इन सुनीसुनाई बातों के आधार पर इस फिल्म को बना कर दर्शकों को अंधविश्वासों की खाई में ही धकेला है.

फिल्म की कहानी एकदम बकवास है. बोबो (इमरान हाशमी) एक जादूगर है. तमारा (हुमा कुरैशी) उस की प्रेमिका है. बचपन में डायना (कोंकणा सेन शर्मा) नाम की एक डायन ने उस के पिता और बहन को मार डाला था. उस वक्त बोबो ने उस डायन की चोटी काट डाली?थी, जिस से वह मर गई थी.

अब कई वर्ष बाद वह डायन बोबो की जिंदगी में फिर से आ जाती है. बोबो उस का फ्लैट खरीदने आई युवती लिजा दत्त (कल्कि कोचलिन) को डायन समझने लगता है जबकि डायन तो तमारा निकलती है जो बोबो को वापस अपनी दुनिया में ले जाने आई है, क्योंकि बोबो खुद एक पिशाच है. बोबो तमारा की भी चोटी काट कर उसे मार डालता है.

मध्यांतर से पहले फिल्म की यह कहानी कुछ रफ्तार लिए है लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म मटियामेट हो जाती है. न तो फिल्म कोई हौरर का प्रभाव छोड़ पाती है, न ही कहानी में कोई रहस्य रह पाता है. बचते हैं तो सिर्फ घिसेपिटे फार्मूले. सिर्फ कोंकणा का काम अच्छा है.

निर्देशक ने दर्शकों को ‘हैल’ यानी नरक की सैर करा दी है. क्लाइमैक्स में उस ने  एक लिफ्ट द्वारा डायन और उस के बहुत से प्रेत साथियों को एक गटरनुमा जगह पर इकट्ठा किया है जिसे नरक बताया गया है. यहीं बोबो डायन को मारता है.

फिल्म का निर्देशन साधारण है, गीतसंगीत में भी दम नहीं है. छायांकन कुछ ठीक है. आज के जमाने में भूतपिशाचों की बातें करना डायन के फिर से लौट आने की कल्पना करना एकदम बेमानी है. इसलिए ऐसी डायन से तौबा भली.

 

नौटंकी साला

आप ने रामलीला तो अवश्य देखी होगी, अब रावणलीला भी देख लें. यह रावणलीला रोहन सिप्पी ले कर आए हैं अपनी फिल्म ‘नौटंकी साला’ में. इस रावणलीला में रोहन सिप्पी ने राम के किरदार को खूब शराब पीने का मौका दिया है. उस किरदार ने और रावण के किरदार ने मिल कर ऐसी नौटंकी की है कि वह दर्शकों के सिर के ऊपर से निकल जाती है. यह नौटंकी पूरी फिल्म में चलती रहती है. फिल्म के शुरू में तो लगता है कि राम का किरदार ही नौटंकी कर रहा है लेकिन अंत में पता चलता है कि रावण का किरदार उस से बड़ा नौटंकीबाज है.

‘नौटंकी साला’ एक फ्रैंच फिल्म ‘एप्रेस वो अस’ पर आधारित है जिसे इंडियन कौमेडी में बनाया गया है. परदे पर यह फिल्म देखते वक्त ऐसा लगता है जैसे किसी गांव में?स्टेज पर हो रही नौटंकी देख रहे हों.

फिल्म की कहानी आर पी यानी राम परमार द्वारा एक दुखी आदमी मंदार (कुनाल राय कपूर) को आत्महत्या करने से बचाने से शुरू होती है, जो अपनी प्रेमिका नंदिनी (पूजा साल्वी) के वियोग में दुखी है. आर पी मंदार को थिएटर कंपनी में काम दिलाता है. उसे राम की भूमिका दी जाती है. राम परमार खुद रावण की भूमिका करता है. राम की भूमिका करते वक्त मंदार कई हास्यास्पद स्थितियां पैदा करता है. राम परमार मंदार और उस की प्रेमिका नंदिनी को मिलाना चाहता है. लेकिन वह खुद नंदिनी से प्यार कर बैठता है. मंदार को जब यह पता चलता है तो वह आर पी का साथ छोड़ कर चला जाता है.

फिल्म की इस कहानी में राम परमार यानी रावण का किरदार कर रहे व्यक्ति द्वारा राम का किरदार कर रहे व्यक्ति की प्रेमिका से इश्क करना हास्य की स्थिति पैदा करता है. मध्यांतर से पहले का भाग धीमा और उबाऊ है. स्टेज पर दोनों पात्रों द्वारा अभिनय करते वक्त ऊलजलूल संवाद बोलना दर्शकों को हंसाता है. रोहन सिप्पी इस बेसिरपैर की कहानी पर फिल्म बना कर दर्शकों को क्या बताना चाहते हैं, यह तो वही जानें लेकिन उन के द्वारा क्रिएट किया गया यह ह्यूमर दर्शकों को हजम नहीं हो पाया.

‘विक्की डोनर’ के बाद आयुष्मान खुराना की यह दूसरी फिल्म है. इस फिल्म में वह नाटकीय ही लगा है. रावणलीला के मंचन में वह रावण की?भूमिका में बिलकुल भी नहीं जमा. राम की भूमिका कर रहे कुनाल ने तो रामायण वाले राम की खिल्ली ही उड़ाई है. निर्देशक ने उस किरदार को शराब के नशे में टल्ली दिखाया है.

नौटंकी के अलावा फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जिस का जिक्र किया जा सके. संगीत में भी दम नहीं है

आशिकी-2

वर्ष 1990 में महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आशिकी’ रिलीज हुई थी. उस फिल्म के गाने बहुत चर्चित हुए थे. यह फिल्म उस की सीक्वल नहीं है. आशिकी उस फिल्म में भी थी, इस में भी है. मगर इस फिल्म की आशिकी बेहद कमजोर है, आशिक हर वक्त शराब की बोतलें गटकता रहता है. कहने को तो वह नामी गायक है लेकिन अब उस की प्रतिभा का ग्राफ ढलान पर है. वह छोटेछोटे प्रोग्रामों में परफौर्म करता है.

कहानी राहुल जयकर (आदित्य राय कपूर) नाम के एक गायक की है. वह रौकस्टार है. एक दिन एक बार में गाना गा रही युवती आरोही (श्रद्धा कपूर) पर उस की नजर पड़ती है जो उसी का गाना गा रही होती है. राहुल को आरोही का गाना पसंद आता है. वह उसे एक बड़ी सिंगर बनाने का फैसला करता है. मुंबई आ कर वह आरोही को एक म्यूजिक कंपनी के मालिक (महेश ठाकुर) से मिलवाता है. देखते ही देखते आरोही एक बैस्ट सिंगर बन जाती है. उसे बैस्ट अवार्ड्स भी मिलने लग जाते हैं. आरोही और राहुल के बारे में लोग तरहतरह की बातें करते हैं. राहुल को लगने लगता है कि वह आरोही की तरक्की में बाधा बन रहा है. वह उस से दूर चला जाता है.

आरोही से यह सब देखा नहीं जाता. वह अपना संगीत कैरियर छोड़ कर राहुल की देखभाल करने लगती है. लेकिन राहुल अपनी जान दे देता है ताकि आरोही की तरक्की में कोई बाधा न पहुंचे.

मोहित सूरी ने अपनी इस फिल्म में महेश भट्ट वाली ‘आशिकी’ की नकल करने की कोशिश की है, मगर कमजोर कहानी होने की वजह से फिल्म मार खा गई है. निर्देशक ने फिल्म के नायक को एकदम देवदास सरीखा दिखाया है जो हर वक्त शराब के नशे में धुत रहता है. वैसे तो उसे बैस्ट रौकस्टार कहा गया है लेकिन है वह बैस्ट शराबी. फिल्म का निर्देशन साधारण है. निर्देशक नायक को एक प्रेमी के रूप में स्थापित करने में असफल रहा है. श्रद्धा कपूर स्वीट लगी है.

पिछली फिल्म ‘आशिकी’ का गीतसंगीत काफी पौपुलर हुआ था, इस फिल्म में सिर्फ एक गीत-‘तुम ही हो…’ कई बार बजता है. यही एक गीत है जो कुछ ठीकठाक है, बाकी गीत कमजोर हैं. छायांकन अच्छा है.

 

हुस्न की मलिका डौली पार्टन

बिंदास, बेबाक और ग्लैमरस जीवनशैली में रमी डौली पार्टन आज ग्रैमी अवार्ड विनर गायिका हैं. लेकिन उन के इस मुकाम तक पहुंचने की दास्तां बेहद अजीबोगरीब और रोचक किस्सों से भरी पड़ी है. मेकअप स्टाइल, टैटू और विग ने उन्हें कैसे मशहूर कर दिया, बता रही हैं रजनी माथुर.

वह शाम बहुत खुशनुमा थी. मशहूर कौमेडियन जैनिफर सौन्डर्स और फनी कलाकार रोजेनी बार अमेरिका के एक रेस्तरां में बैठी थीं. तभी वहां एक बेहद आकर्षक महिला ने प्रवेश किया. अब तीनों दोस्तों के बीच चर्चा का विषय था शरीर पर टैटू बनवाना. सब से बाद में आने वाली सुप्रसिद्ध गायिका व अभिनेत्री डौली पार्टन ने अपनी ड्रैस के टौप की जिप खोली और वक्षस्थल पर बने टैटू दिखाए जो खूबसूरत तितलियों के थे. उन सुंदर टैटू को देख कर सौन्डर्स व रोजेनी न सिर्फ चौंकी बल्कि प्रभावित भी हुईं.

अमेरिकी रेस्तरां का यह दृश्य अलगअलग टौक शो में चर्चा का विषय बना रहा. अब इस घटना में हकीकत कितनी है, यह बात अलग है पर है मजेदार और दिलचस्प.

डौली पार्टन अमेरिका की मशहूर गायिका, अभिनेत्री और लेखिका हैं. अपनी बिंदास जीवनशैली के लिए मशहूर डौली आज भले ही 67 वसंत पार कर चुकी हैं लेकिन उन के मेकअप का स्टाइल, अनगिनत विग उन्हें जैसे जवानी की दहलीज पर ला कर खड़ा कर देते हैं, वे वाकई में बिंदास हैं.

बचपन के दिन : डौली पार्टन का बचपन बहुत ही गरीबी के दौर से गुजरा. उन का जन्म अमेरिका के छोटे शहर लोकस्ट रिज टैनेसी में हुआ था. 12 भाईबहनों के विशाल परिवार में छोटा सा घर था. घर में एक ही बैड था. छोटी सी जगह में सब मिलबांट कर सो लेते थे. दीवारों पर वालपेपर भी पुराने हो चले थे. जहां से फट गए थे वहां पुराने अखबार  चिपका दिए गए थे. घर में बेशक गरीबी का आलम था पर डौली पार्टन ने बहुत ऊंचे सपने देखे थे. सब भाईबहन घर में रह लेते थे पर पैसे की तंगी ने डौली को काफी तंग किया. उन्हें सजनेसंवरने का बहुत शौक था पर उसे पूरा कैसे करें, लिहाजा उन के दिमाग में गजब का आइडिया आया.

विचित्र मेकअप : आंखों के मेकअप के लिए उन्होंने बहुत सोचा और फिर ढेर सारी माचिस की तीलियां जमा कीं. उन्हें जला कर उन का काला रंग इकट्ठा किया. इस चक्कर में कई बार उन के हाथ भी जल गए. उस कालिख को जमा कर के उन्होंने आईशैडो व आईलाइनर की तरह इस्तेमाल किया. यह सिलसिला चलता रहा. चूंकि चेहरे के निशानों को छिपाने के लिए पाउडर के पैसे न थे, लिहाजा चुपचाप सूखा आटा भी कई बार मल लेती थीं. कभी वह चिपक गया तो मुंह धो डालती थीं.

लिपस्टिक के लिए लाल बैरीज का प्रयोग करती थीं. वैसे यह थोड़ी जहरीली होती है पर मुंह के अंदर तो कभी गई नहीं. डौली को लगता था कि होंठ ही तो सब से सैक्सी पार्ट होता है, तो क्यों न लाल ही रंगा जाए जो सब से प्रभावशाली होता है. जब वे होंठों पर इसे लगा कर बाहर निकलतीं तो उन के पापा पूछते थे कि कौन सी लिपस्टिक लगाई है? वे कह देती थीं, ‘‘पापा, मेरे होंठ नैचुरली ऐसे ही तो हैं.’’

डौली अपने गाल भी लाल करना चाहती थीं. तभी उन के मन में विचार आया कि क्यों न पोक बैरीज का जूस गालों और होंठों पर लगाया जाए. पर यह जब धब्बेदार हो जाता था तो डौली को बहुत ही जोकराना लगता था. मरक्यूरोक्रोम से भी कई बार होंठ रंगे. जब कभी पोक बैरीज का जूस नहीं मिल पाता तो वे गालों पर जोरदार चिकोटी काट लेतीं जिस से गाल लाल हो जाया करते थे. इस तरीके में बेशक दर्द होता था पर उन्हें तो मेकअप की परवा थी.

डौली पार्टन के नाना, चर्च में उपदेशक थे, जहां मेकअप मना होता था. जब भी वहां जाना होता तब उन्हें मुश्किल होती. उन की एक ही चाह रहती थी कि कैसे वे मेकअप कर के बहुत सुंदर लगें. वे किसी चीज का इंतजार नहीं करतीं, जो करना है तुरंत करो. डौली आज कहती हैं कि मेकअप के लिए मैं ने इतनी तकलीफें उठाईं पर किसी ने उन्हें कभी भी खूबसूरत बच्ची नहीं कहा.

बचपन में डौली टौम बौय बन कर रहती थीं. उन्हें जब औरत बनने का एहसास हुआ तो लगता था हर चीज खुद में समेट लूं. उन की आंटी घर में आतीं तो उन का पर्स पाउडर, लिपस्टिक व आईलाइनर से भरा होता था. डौली उन को देख कर दंग रह जातीं और जब कभी उन्हें प्रयोग करने को मौका मिलता तो उन्हें लगता मानो खजाना ही मिल गया हो.

गरीबी के दिन यों ही बीतते गए. फिर हाईस्कूल पास करने के बाद वे संगीत की तरफ बढ़ने लगीं और नैशविले आ गईं. यहां संगीत से जुड़ गईं, बाद में तरक्की के द्वार खुलते गए और वे एक नामीगिरामी गायिका बन गईं. आलम यह था कि संगीत के क्षेत्र में उन्हें कई पुरस्कार जैसे कंट्री अवार्ड से नवाजा गया. और तो और, ‘ग्रैमी अवार्ड’ भी दिया गया.

विश्वव्यापी प्रसिद्धि अब उन के खाते में जमा हो गई. उन के चर्चे हर तरफ हुए. 1985 में उन्होंने ‘डौलीवुड थीम पार्क’ की स्थापना की और 2000 में ‘कंट्री म्यूजिक हौल औफ फेम’ में शामिल हो गईं. महज 12 साल की उम्र में वे स्थानीय रेडियो पर गाना गाने लगी थीं. स्नातक के बाद नैशविले में पोर्टर वैगनर के साथ टीवी शो में पार्टनर भी बनीं.

गायिका बनने के बाद उन के ढेर सारे अलबम निकले जिन में ‘डौली पैट्स ग्रेटैस्ट हिट्स’, ‘लिटिल स्पैरो मोर’, ‘बैकवुड्स बार्बी’ वगैरा खासे चर्चित हुए. उन्होंने एक संस्था भी खोली जिस में बच्चों के पैदा होने से बड़े होने तक शिक्षा प्रदान की जाती है. 

उन के गानों में खास हैं, ‘आई विल आल्वेज लव यू’ (1974), ‘आईलैंड इन दि स्ट्रीम’ (1982) और ‘हार्ड कैंडी क्रिसमस’ (1983).

विग और भारी मेकअप

डौली ने अब तक न जाने कितने विग लगाए हैं. भारी मेकअप के साथ विग उन पर बेहद दिलकश लगते हैं. विग के साथ एक बार मजेदार वाकेआ हुआ. डौली अपनी दोस्त के साथ जा रही थीं. वे साइकिल पर थीं. विग को ज्यादा टाइट नहीं किया था. यों ही मस्ती में जा रही थीं, तभी पेड़ की एक नीची टहनी से उन की विग टकराई और टहनी में ही अटक गई. वे काफी गंजी नजर आईं, फिर जल्दी से उसे उतारा और फिक्स किया.

डौली पार्टन हैवी मेकअप करती हैं और रात को भी मेकअप कर के सोती हैं. कहीं देर रात को जागीं तब भी मेकअप तो होना चाहिए. उन की कोई भी फोटो मेकअप के बिना नहीं मिल सकती. अपनी टूर बस में ट्रिप के दौरान भी वे मेकअप टिप देती रहती हैं. गहरे मेकअप की वे शौकीन हैं. वे आईलिड पर गोल्डन रंग का शैडो बहुत ही गहराई से लगाती हैं और नीचे, आधी आंख पर गोल्डन आईलाइनर लगाती हैं.

कहा जाता है कि वे मेकअप में सोती हैं, मेकअप में जागती हैं. बिना मेकअप के सिर्फ बाथटब में होती हैं. उम्र के इस पड़ाव पर भी वे कमसिन नजर आती हैं. यह सब कमाल उन के बेमिसाल हुस्न और अदाओं का है, आज भी वे सारे शरीर पर टैटू बनवाने का दमखम रखती हैं.

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