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त्योहारों की उमंग जीवन में भरे रंग

भारतीय जनजीवन में त्योहारों और उत्सवों का आदिकाल से ही काफी महत्त्व रहा है. यहां मनाए जाने वाले सभी त्योहार मानवीय गुणों को स्थापित कर लोगों में प्रेम, एकता व सद्भावना को बढ़ाने का संदेश देते हैं. दरअसल, ये त्योहार ही हैं जो परिवारों और समाज को जोड़ते हैं. त्योहार हमारी संवेदनाओं और परंपराओं के ऐसे जीवंत रूप हैं जिन्हें मनाना या यों कहे कि बारबार मनाना हमें अच्छा लगता है क्योंकि अनोखे रंग समेटे त्योहार हमारे जीवन में उमंग और उत्साह की नई लहरों को जन्म देते हैं.

क्यों जरूरी हैं त्योहार

  1. त्योहार जीवन को खुशहाल व रिश्तों को मजबूत बनाने में एक अटूट कड़ी की भूमिका निभाते हैं.
  2. होली का त्योहार जहां मस्ती और मौज का संदेश देता है वहीं दीवाली अंधकार को दूर कर के जीवन में रोशनी भरने का.
  3. त्योहार अच्छा खाना, अच्छा पहनना, खुश रहने और जीवन को खुशनुमा बढ़ाने का श्रेष्ठ माध्यम होते हैं.
  4. ऐतिहासिक विरासत और जीवंत संस्कृति के सूचक ये त्योहार विदेशियों के समक्ष भी हमारे सरस और सजीले सांस्कृतिक वैभव का प्रदर्शन करते हैं और हमें गौरवान्वित होने का अवसर देते हैं.
  5. जीवन को नई ताजगी देते त्योहार जीवन में जीने का उत्साह और उल्लास का रंग भरते हैं जिस से जीने का हौसला दोगुना हो जाता है. रोजमर्रा की परेशानियों को भुला कर हमें सजनेसंवरने और नए स्वाद चखने का भी अवसर देते हैं ये त्योहार.

रोशनी का त्योहार

अमावस्या के अंधकार में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ यानी अंधेरे से रोशनी की तरफ जाने का संदेश देता दीवाली का त्योहार आकाश में पटाखों की रोशनी  और समृद्धि की अभिव्यक्ति है. आशाओं के उत्सव के रूप में मनाए जाने वाले इस त्योहार का महत्त्व जीवन के अनमोल पहलुओं से जुड़ा हुआ है. इस का उद्देश्य भाईचारे को बढ़ाते हुए एकदूसरे के दुखसुख का हमसफर बनना है.

नएपन का एहसास

बदलते समय के साथ बदल रहा है समाज और बदल रहा है त्योहारों को मनाने का अंदाज भी. ‘मैं तो लूंगा खीलखिलौने तुम भी लेना भाई’ की जगह अब औनलाइन गिफ्ंिटग, हाईटैक डिजिटल दीवाली और मौल संस्कृति का नया रूप देखने को मिल रहा है. आइए, नजदीक से देखें दीवाली के बदले रूप को.

औनलाइन गिफ्टिंग

उद्योग जगत के एक अनुमान के अनुसार, औनलाइन गिफ्ंिटग का बाजार 1,000 करोड़ रुपए से अधिक का है. औनलाइन गिफ्टिंग के जरिए दूर बैठे अपनों को उपहारों के जरिए दीवाली की खुशियां बांटने का यह माध्यम दिनोंदिन जोर पकड़ रहा है. गिफ्टिंग का यह बदला अंदाज दूरियों को नजदीकियों में बदलने का बेहतर माध्यम सिद्ध हो रहा है.

मिठाइयों, चौकलेट्स, कार्ड्स, फ्लावर बुके, ज्वैलरी, कौर्पोरेट गिफ्ट्स सभीकुछ औनलाइन शौपिंग साइट्स पर मौजूद हैं. इन साइट्स पर पीवीआर मूवी गिफ्ट कार्ड्स, कैफेकौफी डे गिफ्ट वाउचर्स, स्पा सैलून की अनेक स्कीम्स भी मौजूद हैं जिन्हें आप बस एक क्लिक पर अपनों को, वे चाहे कहीं भी हों उपहारस्वरूप दे कर उन की खुशियों में अपनी खुशियां ढूंढ़ सकते हैं.

बढ़ते उपयोगी उपहार

चौकलेट के विज्ञापनों ने भारतीय रिश्तों व परिवार के आपसी प्रेम को त्योहारों से जोड़ दिया है, फिर चाहे वह रोशनी का त्योहार दीवाली हो या भाईबहन के अटूट बंधन का रक्षाबंधन. विदेशी कंपनियां भारतीय त्योहारों को ध्यान में रख कर अपने प्रौडक्ट लौंच कर रही हैं. हाटबाजारों, मेलों की जगह मौल संस्कृति जन्म ले रही है. बाजारों में सस्ते और विभिन्न वैरायटी के इतने उपहार मौजूद हैं कि आप के लिए चुनना मुश्किल हो जाएगा. यह बदलाव व नयापन अच्छा तभी होगा जब वह समाज के हर वर्ग के हित में हो, विदेशी कंपनियों के कुचक्र में छोटे व्यापारियों के हितों की बलि न चढ़े और बाजारीकरण हावी न हो.

दीयों की रात वादों की सौगात

दीवाली की खुशियां आप की जिंदगी में ताउम्र बनी रहें, इस के लिए आप भी पूरे करें वे वादे जो आप को और आप के अपनों को सही माने में दीवाली की खुशियां दें.

बड़ों को खुशियां देने का वादा : रोहित के बुजुर्ग पिता घुटनों में दर्द की शिकायत से परेशान रहते थे. प्राइवेट नौकरी की भागदौड़ में रोहित समझ नहीं पा रहा था कि कैसे वह अपने पिता की तकलीफ दूर करे. ऐसे में रोहित के एक दोस्त ने उसे सलाह दी कि वह अपने पिता को एक मसाजर गिफ्ट करे. रोहित ने दोस्त की सलाह मान कर अपने पिता को मसाजर गिफ्ट किया. मसाजर से रोहित के पिता की तकलीफ दूर हो गई और रोहित को यह खुशी हुई कि उस ने अपने पिता के लिए कुछ किया.

दरअसल, कई बार नौकरी व व्यवसाय की भागदौड़ में हम उन की परेशानियों और जरूरतों को समझ नहीं पाते. ऐसे में छोटीछोटी बातों से कुछ ऐसा करें जिन से वे खुश रहें, वे खुश रहेंगे तो आप भी खुश रहेंगे.

बच्चों को समय देने का वादा : बच्चे हमारे जीवन की सब से बड़ी पूंजी होते हैं. उन के विकास के लिए हम उन्हें अच्छी शिक्षा, सुखसुविधाओं के साथसाथ समयसमय पर उपहार दे कर उन्हें खुशियां देने का प्रयास करते हैं. लेकिन कई बार हम उन की सब से जरूरी जरूरत यानी उन्हें समय देना भूल जाते हैं, उन के साथ हंसीखुशी के पल बांटना भूल जाते हैं. पेरैंटिंग का सब से जरूरी नियम है बच्चों की भावनात्मक जरूरतों को समझना, उन के विचारों, मनोभावों को जानना. 

स्वस्थ रहने का वादा : इस दीवाली आप खुद से एक वादा कीजिए कि आप अपने साथसाथ पूरे परिवार को फिट व हैल्दी रखने की जिम्मेदारी उठाएंगे यानी हैल्थ पर विशेष ध्यान देंगे.

देर से सोने व जागने की आदत को करेंगे अलविदा.

घर से बिना ब्रैकफास्ट किए नहीं निकलेंगे.

अतिरिक्त वजन घटाएंगे.

जंकफूड की जगह हैल्दी फूड को खानपान का हिस्सा बनाएंगे.

साल में 1 बार स्वास्थ्य जांच अवश्य कराएंगे.

मौर्निंग वाक और ऐक्सरसाइज को दिनचर्या का हिस्सा बनाएंगे.

ईकोफ्रैंडली दीवाली : जीवन से अंधेरे को दूर कर के रोशनी फैलाने वाले इस त्योहार पर आप खुद से वादा करें कि आप ‘सेव नेचर सेव लाइफ’ पर आधारित ईकोफ्रैंडली दीवाली मनाएंगे और पर्यावरण को प्रदूषणमुक्त रखने में अपना योगदान देंगे.

  1. दीवाली सैलिबे्रशन का समय निर्धारित कर के मात्र 3-4 घंटे ही दीवाली मनाएंगे.
  2. ईकोफ्रैंडली पटाखों का इस्तेमाल करेंगे, कैमिकल बेस्ड पटाखों का इस्तेमाल नहीं करेेंगे. बिजली की झालरों की जगह परंपरागत मिट्टी के दीयों का इस्तेमाल करेंगे. इस से बिजली की बचत होगी.
  3. रंगोली में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करेंगे, जैसे सफेद रंग के लिए चावल पाउडर, लाल रंग के लिए कुमकुम, पीले के लिए हल्दी वगैरह.
  4. घर की सजावट ताजे गेंदे व रजनीगंधा के फूलों से करेंगे. आम के पत्तों व गेंदे के ताजे फूलों की बंदनवार से घर सजाएंगे.
  5. पटाखे अकेले अपने परिवार के साथ छोड़ने के बजाय दोस्तों, रिश्तेदारों के साथ मिल कर छोड़ेंगे.

बचत का वादा : दीवाली के नजदीक आते ही जहां एक ओर बाजार व शौपिंग मौल रंगबिरंगे उपहारों व सजावटी सामानों से भर जाते हैं वहीं कंपनियां इस समय विभिन्न औफर्स ला कर ग्राहकों को लुभाने का प्रयास करती हैं. नतीजतन, लोगों में ‘मौका भी है और दस्तूर भी’ की राह पर शौपिंग का क्रेज उमड़ने लगता है, जो बाद में जेब व बजट दोनों पर भारी पड़ता है. इसलिए इस दीवाली में खुद से वादा कीजिए कि व्यर्थ की फुजूलखर्ची करने के बजाय किफायत से काम लेंगे.

वैसे, ध्यान रखिए कि स्मार्ट होममेकर स्मार्ट चीजें ही खरीदते हैं. इस दीवाली फुजूलखर्ची न कर के आप ने जो बचत की है उसे विभिन्न निवेश प्लान में लगा कर घर और परिवार के भविष्य को सुरक्षित करेंगे और बचत में समझदारी के वादे को पूरा करेंगे.

दोस्तों से वादा : आज की व्यस्त जिंदगी में रिश्तों के साथ दोस्त भी कहीं पीछे छूट जाते हैं. तो इस दीवाली अपनेआप से वादा कीजिए कि दोस्तों के हमेशा टच में रहेंगे. अपने हर सुखदुख उन के साथ बांटेंगे. टच में रहने के लिए आप मैसेजेस, सोशल नैटवर्किंग साइट्स के साथसाथ महीने में 1 बार वीकेंड पर और त्योहारों पर गेटटुगेदर पार्टी का सहारा ले सकते हैं. पार्टी का आयोजन आप घर पर कर सकते हैं, इस से बचत तो होगी ही साथ ही, दोस्तों का एकदूसरे के परिवार से मेलजोल बढ़ेगा. ऐसी पार्टियों से पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं और माहौल खुशनुमा हो जाता है.

आडंबरों को न ढोने का वादा : दीवाली के दिन हर घर में जलने वाले दीये की रोशनी का उद्देश्य मन में छिपे व्यर्थ के अंधविश्वासों व आडंबरों को दूर करना है लेकिन व्यर्थ की पूजापाठ व पंडेपुजारियों के चक्कर में पड़ कर लोग मेहनत व ईमानदारी के बजाय ऐसे काम करते हैं जिन से वे अकर्मण्यता की ओर अग्रसर होते हैं. इस दीवाली आप वादा कीजिए कि आप अंधविश्वासों व आडंबरों के बजाय समाज की प्रगति में निवेश करेंगे. उदास चेहरों पर खुशियां ला कर दीवाली की जगमगाहट को और फैलाएंगे न कि व्यर्थ की परंपराओं को ढो कर खुशियों के त्योहार को बोझ बनाएंगे.

ये सारे वादे आप को न सिर्फ करने हैं बल्कि निभाने भी हैं. इन्हीं वादों के बीच एक वादा यह भी कि आप न सिर्फ दीवाली के दिन बल्कि हर दिन अपनेआप को प्रैजैंटेबल बनाए रखेंगे. खुद को खूबसूरत दिखने का कोई मौका न छोड़ेंगे. तो, इस तरह खुद से किए गए आप के ये वादे आप को सब की नजरों में प्रशंसा का पात्र बना देंगे और फिर आप को हर दिन हर पल खास नजर आएगा.      

हर साल नई आशा नई चुनौती : हर बार की तरह दीवाली एक बार फिर आ गई है. घर सज गए हैं, बाजारों में रौनक हैं, सभी जम कर खरीदारी कर रहे हैं, नए कपड़े, घर की साजसजावट, उपहारों का आदानप्रदान हो रहा है लेकिन इन सभी के बीच हर साल कुछ चुनौतियां और कुछ नई आशाएं होती हैं कि यह दीवाली पिछली दीवाली से और अच्छी हो, सब के चेहरों पर खुशियों की रोशनी जगमगाए लेकिन यह तभी होगा जब हम कुछ खास बातों का ध्यान रखें :

सेहत का न निकालें दिवाला : हर साल दीवाली पर मिठाइयों में मिलावट के अनेक मामले सामने आते हैं. खोये में मैदा, सिंथेटिक दूध, डिटर्जेंट पाउडर, यूरिया, चांदी के वर्क की जगह एल्यूमिनियम फौयल, नकली रंग का कैमिकल, सस्ती सैक्रीन जो एक प्रकार का कैमिकल होती है, का प्रयोग किया जाता है. जिस में लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ होता है और खुशियों का त्योहार दुख के मातम में बदल जाता है. त्योहारों के अवसर पर ऐसे अपराध समाज के लिए चुनौती हैं और उम्मीद करते हैं कि ऐसे अपराध करने वाले लोग दूसरों की जिंदगियों से नहीं खेलेंगे.

पर्यावरण के लिए चुनौती : दीवाली के अवसर पर पटाखों का शोर और उन से निकलने वाले हानिकारक धुएं से न सिर्फ पर्यावरण संबंधी समस्याएं जन्म लेती हैं स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ती हैं. डाक्टरों के अनुसार, 90 डैसीबल से अधिक तेज आवाज वाले पटाखे सुनने की शक्ति के लिए हानिकारक होते हैं जबकि दीवाली पर बिकने वाले अधिकांश पटाखे 120 डैसीबल से अधिक आवाज वाले होते हैं.

त्योहारों का रिश्ता सारे समाज से है उन्हें केवल निजी खुशियों तक सीमित न रख कर पूरे समाज के सुखदुख की दृष्टि से देखना ही लोगों के जीवन से अंधकार को दूर करेगा और जीवन में रंगों की रंगोली व खुशियों का प्रकाश फैलाएगा. 

निशाने पर बैटरी रिकशा

दिल्ली में आजकल बैटरी रिकशा तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं और बहुत सी जगह उन्होंने साइकिल रिकशों की जगह ले ली है. 4 सवारियों को बैठाने और प्रदूषण न फैलाने वाले ये रिकशा आटो रिकशा के मुकाबले ये बेहद सस्ते हैं. सब से बड़ी बात यह है कि ये रिकशा पैडल रिकशा के मुकाबले ज्यादा सभ्य हैं क्योंकि इन में गरमी में पसीने से तर, पतलादुबला रिकशे वाला मोटीमोटी सवारियों को खींचता नजर नहीं आता. लोग इन्हें पसंद कर रहे हैं क्योंकि इन पर चढ़ कर अमानवीय अपराधबोध नहीं होता.

लेकिन पुलिस और अफसरों को इन से बहुत शिकायत है. वे मोटर व्हीकल ऐक्ट का हवाला दे कर करों, लाइसैंसों से मुक्त इन रिकशाओं को कानूनों के दायरे में लाने की कोशिश कर रहे हैं. दिल्ली पुलिस ने बहुत से समाचारपत्रों को मोहरा बनाया है जो निरंतर इन के अवैध होने का रोना रो रहे हैं. बेहद हलके और धीमी गति से चलने वाले बैटरी रिकशा चाहे किसी को मार न सकें पर इन्हें परमिट, लाइसैंस, रोड टैक्स, ड्राइविंग लाइसैंस की चपेट में लाने की मांग की जा रही है.

यह मांग नितांत नाजायज है और केवल रिश्वत वसूली के लिए की जा रही है. देश में ऐसा कौन सा लाइसैंसशुदा काम है जो ढंग से चल रहा है. यहां चाहे फूड व ड्रग लाइसैंस हो, फैक्टरी लाइसैंस या मोटर व्हीकल लाइसैंस हो, इन का मकसद जिम्मेदारी समझाना नहीं, वसूली करना है.

हमारे यहां हर लाइसैंस देने वाले विभाग पर दलालों का कब्जा है जो अधिकारियों के लिए रिश्वत वसूलने का काम भी करते हैं. रिश्वत मिली तो हर काम जायज वरना गलत. लाइसैंस का इस देश में केवल एक मतलब है : लाइसैंस पाने वाले ने रिश्वत का भुगतान कर दिया है और इसे काम करने दें.

लाइसैंस हमारे यहां हाथ में कलेवा या माथे पर तिलक, सिर पर स्कल टोपी या गले में क्रौस की तरह है कि भुगतान हो चुका है, अब जीने दो. 3 पहिए वाले आटो रिकशों, टैंपो आदि पर उन की कीमत के दोगुने की रिश्वत देनी पड़ती है और फिर हर बार हफ्ता देना होता है. तभी आटोरिकशा वाले ज्यादा अकड़ दिखाते हैं. बैटरी रिकशा चूंकि रिश्वतखोरी की चपेट से बचे हैं, इसलिए सस्ते हैं.

वे इज्जतदार काम की इजाजत दे रहे हैं और सब से बड़ी बात यह है कि आम नागरिक को राहत दे रहे हैं. इन्हें कानूनी दायरों से दूर रखना चाहिए पर यह, इस देश में तो संभव नहीं है क्योंकि पुलिस और परिवहन दलालों का तंत्र जनतंत्र पर कई गुना भारी है.

समाजसेवा का मोल नहीं

सुबह होती है, शाम होती है, जिंदगी यों ही बरबाद होती है. दुनिया के अधिकांश लोगों की जिंदगी यों ही दो वक्त के खाने, सिर पर छत का इंतजाम, बच्चों को पैदा व उन्हें बड़ा करने में बीत जाती है जबकि दुनिया में करोड़ों ऐसे हैं जिन्हें दूसरों से कुछ सहायता चाहिए ताकि वे अपने जीवन में वे खुशियां, चाहे थोड़ी सी ही, ला सकें जिन्हें आम सभ्य शिक्षित नागरिक प्रकृति की देन समझता है. हर वह जना जो हर सुबह यह सोचता है कि दिनभर सिवा अपने उबाऊ काम के क्या करे जो उसे जीवन का कुछ ध्येय दे सके, वह उन से सीखे जिन्होंने अपने साथ दूसरों के लिए कुछ किया.

समाजसेवा असल में खुद की सेवा है. आप अपने शरीर, अपनी बुद्धि, अपनी मेहनत, अपने पैसे से जब किसी का कोई अधूरा काम पूरा करते हैं तो खुद को बहुत कुछ सिखाते हैं. आप एक अंधे को रास्ता पार कराते हैं तो ही पता चलता है कि सड़क के ट्रैफिक से कैसे निबटा जाए. जब आप बीच रास्ते में खडे़ किसी और की गाड़ी का टायर बदलने में उस की सहायता करते हैं तो ही आप को पता चलता है कि टायर कैसे बदला जाता है, जब ट्रैफिक आजा रहा हो.

मानव ने प्रकृति पर जो विजय पाई है, वह उन लोगों के बलबूते पाई है जिन्होंने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जंगल से निकलने का रास्ता ढूंढ़ा, खुद निशान बन कर दूसरों को समझाने की कोशिश की, आग जलाने की विधि खोजी, बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं खोजीं आदि. यह काम खत्म नहीं हुआ है. तमाम खोजों, आर्थिक उन्नति के बावजूद कुछ लोग ऐसे रह गए हैं जो अपनी कमजोरी के कारण या किन्हीं दुर्घटनाओं के कारण पीछे ही हैं. उन्हें सहायता की जरूरत है.

सरकार ने 82 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून बनाया है. सवाल है कि इतने लोग भूखे रह क्यों गए? क्यों वे अपने लिए दो वक्त का खाना पैदा न कर सके? क्योंकि वे कुछ निकम्मे थे, कुछ का सबकुछ छीन लिया गया, कुछ शराबीनशेड़ी बन गए, कुछ बीमार हो गए. उन्हें आप की जरूरत है दलदल से निकलने के लिए. आप को उन की जरूरत है यह जानने के लिए कि दलदल से किसी को कैसे निकाला जाए और कैसे वहां न फंसा जाए.

दुनियाभर के सक्षम अमीर अब इस ओर ध्यान दे रहे हैं. मशहूर व्यवसायी बिल गेट्स और वारेन बफेट ने समाजवसेवी कार्यों में अपना पैसा लगाया है. भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्ंिलटन, भूतपूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर जनसेवा में समय लगा रहे हैं. अफसोस यह है कि हमारे नेता रिटायर हो कर जनसेवा नहीं करते, मरने तक वे अपने तन की सेवा में लगे रहते हैं.

खड़े होइए, कुछ करिए. घर के पास की सड़क साफ कर डालिए. नेकचंद की तरह नगर निगम के बाग में रौक गार्डन बना डालिए. पड़ोस के गांव में 2-4 घरों के बच्चों को पढ़ा डालिए. आसपास के किसी वृद्ध या आंटी की दवाएं लाने का जिम्मा उठा लीजिए. चिंता न करिए, यह घाटे का सौदा न रहेगा. इन कामों में जो तनमनधन लगाएंगे वे असीम शांति देंगे, आप का आत्मविश्वास बढ़ाएंगे. लोगों के तानों, तीखे शब्दबाणों को सहने की अच्छी आदत डालेंगे और आप के जीवन के खालीपन को भरेंगे.

 

सेना में भ्रष्टाचार

सैनिकों द्वारा शत्रु की सीमा में लूट तो हमेशा से की जाती रही है पर हाल में 2 मामले ऐसे आए हैं जिन में सेना के अफसर अपने देश में ही लूट मचा रहे हैं. यह पक्का है कि देश की सरकार और देश का कानून इन सैनिक अफसरों को अंतत: छोड़ ही देंगे और लूट जारी रहेगी.

पहला मामला पूर्व सेना प्रमुख विजय कुमार सिंह का है जिन पर आरोप है कि उन्होंने सेना के पैसे का दुरुपयोग जम्मूकश्मीर की सरकार को गिराने में किया. उन्होंने अपना खुद का गुप्तचर संगठन बना लिया था. वे अपने पर लगे आरोपों को छिपाने के लिए भारतीय जनता पार्टी में जा मिले हैं ताकि जो भी मामला सामने आए उसे झेलने के लिए भाजपा के नेता साथ आ जाएं. कहना न होगा कि उन की इस लूट का मामला 2-4 दिनों में रफादफा हो गया.

दूसरा मामला राजस्थान के जैसलमेर में तैनात एक ब्रिगेडियर विजय मेहता का है जिन पर आरोप है कि उन्होंने इलाके के एक गांव में बनी पत्थर की 2 छतरियों को तुड़वा कर अपने गुड़गांव के फार्महाउस में भेज दिया और वहां उन का पुनर्निर्माण करा लिया. उन्हें तोड़े जाने से पहले वह इलाका सैनिक प्रशिक्षण का क्षेत्र घोषित हो गया था. वहां गांव वालों का आनाजाना बंद हो गया था. ब्रिगेडियर महाशय अब उन की जगह नई छतरियां बनवाने को तैयार बताए जाते हैं. पुरानी छतरियां लगभग 400 साल पुरानी हैं.

अंगरेज देश से बहुत सी दुर्लभ चीजें लड़ाइयों में जीत कर इंगलैंड ले गए थे और वे वहां के संग्रहालयों व कुछ निजी घरों की शोभा बढ़ा रही हैं पर अंगरेज सैनिक तो पराए थे, शत्रु थे. देश की संपत्ति की रक्षा के लिए तैनात सैनिक खुद ही लूटपाट करें तो ऐसी करतूत जनता में सैनिकों के प्रति मौजूद विश्वास को ठेस पहुंचाती है.

सैनिकों को अभी भी बहुत आदर से देखा जाता है और सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार की अनदेखी की जाती है. सेना को मनचाहा बजट मिलता है और बड़े अधिकारी जब अरबोंखरबों के सौदे करते हैं तो आमतौर पर आम लोग ही नहीं, नेता और अदालतें चुप रहती हैं. मीडिया आमतौर पर सैनिकों को बख्श देता है, चाहे उस के पास भ्रष्टाचार के पूरे सुबूत हों. सैनिक अफसरों के बेटे विदेशों में किस तरह मौज करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है पर उस पर भी कुछ बोला नहीं जाता.

सेना जब पैसे से खेलेगी तो कुछ सैन्य अधिकारियों का मन डोलेगा ही, खासतौर पर जब पता हो कि कोई हिसाबकिताब नहीं रखा जा रहा. सेना की जमीनें भी बिकेंगी, खरीदी में रिश्वतें भी ली जाएंगी पर इस का मतलब यह नहीं कि सेना में लूट मचे और जनता एहसानों तले दबी रहे. सेना को अगर तीखी खोजी नजर से बचना है तो उसे खुद का दामन साफ रखना होगा. सेना बेईमानी कर के जनता का प्यार नहीं पा सकती. आज देश को शत्रु की उतनी चिंता नहीं, जितनी करों के जरिए जमा किए गए पैसों की बरबादी की है.

 

प्रधानमंत्री पद का लालच

वर्ष 2014 के आम चुनाव रोचक होंगे. भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने में जिस तरह होहल्ला मचाया जा रहा है उस से तो लगता है कि भाजपा जीत चुकी और बात अब केवल राजतिलक की रह गई है. लोकसभा चुनाव मई, 2014 में होने हैं, उस से पहले दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने हैं पर इस समय चुनावी आंधी नरेंद्र मोदी को ले कर है.

इस का एक मतलब तो साफ है कि मतदान पहले से कहीं ज्यादा होगा. मोदी समर्थक ऊंची जातियों वाले, पैसे वाले अब कतारों में जरूर खड़े होंगे. कांगे्रस और दूसरी पार्टियों को नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने के लिए मतदान केंद्रों तक अपने से सहानुभूति रखने वालों को ठेलठाल कर लाना होगा.

लोकसभा चुनावों में ऐसी सरगर्मी पहले केवल 1977 में देखी गई थी जब जनता पार्टी थी, ताकि आपातकाल थोपने की सजा इंदिरा गांधी को दी जा सके. तब उत्साह ऊपर से नीचे तक था पर अब प्रचार केवल इंटरनैट, मोबाइल और अखबारों तक सीमित है. मुकाबला गंभीर है, यह मोदी के चुनाव में कूदने से स्पष्ट है.

अब तक जो लोग चुनावों के प्रति उदासीन रहते थे वे सक्रिय रहेंगे, यह अच्छी बात है. अगर सरकार निकम्मी है और रिश्वतखोरी चपरासी से मंत्री तक जारी है, कौर्पाेरेटों यानी कंपनियों के मालिकों की सत्ता के गलियारों में खूब चल रही है तो केवल इसलिए कि आम जनता राजनीति को बेकार का शिगूफा मानने लगी थी. मोदी के चलते शायद यह बदला है.

लोकतंत्र की पहचान केवल चुनावों और मतदान से है. अगर अपनेआप चल कर आने वालों की गिनती ज्यादा होती है तो सरकार ही नहीं, अदालतें और कंपनियां भी जनरोष की चिंता करती हैं. मतदान केंद्र एक तरह से वह दुकान है जहां से विशिष्ट कंपनी का उत्पाद खरीदा जाता है और वही कंपनी सफल होती है जो बिकने में 1 नंबर की हो. कांगेस और भाजपा ही नहीं, दूसरे दल भी इस बार जीजान लगाएंगे क्योंकि बहुतों को प्रधानमंत्री पद की कुरसी दिख रही है. मोदी ने यह जरूर कह दिया है कि वे प्रधानमंत्री पद का सपना नहीं देख रहे लेकिन उन्हें त्यागी, जनसेवक समझने वाले यह जरूर देख सकते हैं कि वे इस पद के लिए कितना ललचा रहे हैं.

 

आप के पत्र

सरित प्रवाह, सितंबर (द्वितीय) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘जागरूक बने जनता’ पढ़ी. यह आंख व कान खोलने वाली सटीक टिप्पणी है कि देश की समस्याएं हर रोज ज्यादा उलझती प्रतीत हो रही हैं. ऐसा लगता नहीं कि देश की व्यवस्था जिन राजनीतिबाजों और नौकरशाहों के हाथों में है वे उन्हें सुलझाना चाहते हैं.

देश अगर सोचे कि सर्वोच्च न्यायालय, महालेखा परीक्षक, चुनाव आयुक्त, स्वतंत्र प्रैस जैसी संस्थाएं कुछ कर सकती हैं तो यह गलत है. ये संस्थाएं सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए हैं, समस्याओं को हल करने में सरकार को सहयोग देने के लिए नहीं.

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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आप की टिप्पणियां ‘खाद्य सुरक्षा’, ‘जागरूक बने जनता’ और ‘भारत में विदेशी पूंजी’ पढ़ने के बाद लगा, हमारे वीर सपूतों ने देश को अंगरेजों के चंगुल से आजादी तो दिलाई लेकिन जनता को आजादी का सही इस्तेमाल करना नहीं सिखाया गया. ऐसे लोगों को चुन कर सत्ता सौंपी जाती है जो भ्रष्टाचार करना और कराना अपना हक समझते हैं. लोकसभा चुनाव का समय करीब आ गया तो सत्ताधारियों को भूख और कुपोषण से पीडि़त जनता की याद आई. मजे की बात यह है कि देश के 82 करोड़ भूखे लोगों के प्रति पनपी सहानुभूति के पीछे सत्ता पाने की उन की सख्त भूख है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून बना कर कांगे्रस पार्टी यह सपना देख रही है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में गरीब और भूखी जनता भरपेट खाद्य खा कर उस को मतदान करेगी. सोनिया गांधी ने घोषणा की कि यह कानून भूख और कुपोषण को दूर करने की पार्टी की प्रतिज्ञा पूरी करेगा. सोनिया के पुत्र राहुल गांधी ने कानून को ऐतिहासिक विधेयक बता कर नया इतिहास रचने की रंगीन आशा पाल रखी है.

इतना तो विश्वास करना पड़ेगा कि अब भंडारों में अन्न सड़ने की नौबत शायद नहीं आएगी. अनाहार के कारण मौत के शिकार हुए लोगों के संबंधियों को खाद्य सुरक्षा के गीत गाती सरकार क्या मुआवजा देगी?

अब तो नेतागण फेसबुक पर स्पष्टीकरण दे कर फेसबुकरहित गरीब समाज का मजाक उड़ाते हैं. फेसबुकी अभिव्यक्ति से भूखे लोगों का कुछ भला नहीं हो सकता. जहां तक जनता के जागरूक बनने का मशविरा है, सराहनीय है. लेकिन राजनीति और नौकरशाही जनता को इस तरह नचाती है और सताती है कि जनता के होश उड़ जाते हैं, आतंक उन के घर और मन पर छाया रहता है, क्योंकि अपराधी लोग सांसद और विधायक बन जाते हैं और फिर वे नौकरशाही की मदद से तांडव मचाते हैं. जनता को जागरूक बनाने में मीडिया की भूमिका ही महत्त्वपूर्ण होती है.

‘भारत में विदेशी पूंजी’, लगता है सत्ताधारियों की दृष्टि में यह एकमात्र सहारा है. जब विदेशी सोच, आचार-व्यवहार, रंगढंग, तौरतरीके हमें भाने लगे हैं तो विदेशी पूंजी का स्वागत करने की स्थिति बाध्यता बन गई है.

कभी हम उन्हें सिखाते थे, आज वे कदमकदम पर हमें सिखाते हैं. हम क्या थे, अभी क्या हैं, इस की जानकारी भी हमें विदेशी आईने में होती है तो इस वैश्वीकरण के बाजारवादी युग में पूंजी की ललकार को स्वीकार करना हमारी कमजोरी बन गई है. आप ने बिलकुल सत्य लिखा है, ‘विदेशी पूंजी से देश तरक्की करेगा, यह भ्रम है.’ भ्रम से बाहर निकलने के रास्ते ढूंढ़ना जरूरी हो गया है.

बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जिलिंग (प.बं.)

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जागरूकता का अभाव

सितंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित अग्रलेख ‘मुसलिम वोट बैंक : गलतफहमी में न रहें सियासी दल’ में मुसलिम वोटरों को किस तरह बरगलाया जाता है, इस की वास्तविक स्थिति प्रस्तुत की गई है. मुसलिम वर्ग में जागरूकता आना एक अच्छा संकेत है. मुसलिम तबका अधिकांश गरीब व कम पढ़ालिखा है. यह देखने में आया है कि हमारे यहां गरीब वर्ग के लोग, चाहे वे किसी जाति या धर्म के हों, नासमझी व अशिक्षा के कारण परिवार में वृद्धि करते रहते हैं. फलस्वरूप न तो उन का शैक्षणिक विकास हो पाता है न आर्थिक.

इस के विपरीत आज अच्छे व संपन्न वर्ग के लोग 1 या 2 बच्चे तक ही अपना परिवार सीमित रखते हैं. इधर, कट्टरवादी लोगों को खुश करने के लिए सत्ताधारी लोगों ने उन के परिवार कल्याण के लिए, उन की तरक्की के लिए कोई योजना नहीं बनाई. राजनीतिक दल मुसलमानों से जज्बाती मुद्दे पर वोट तो मांगते हैं परंतु उन की दशा सुधारने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाते. झोपड़ी में रह कर अभाव की जिंदगी जीना उन की नियति बन गई है.

देश में जब भी दंगे होते हैं, पिछड़े व गरीब लोग ही ज्यादा प्रभावित होते हैं. अच्छा संकेत यह है कि इतने सालों बाद ये लोग अब कुछ सोचने को तैयार हो गए हैं. उन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि उन का अपना हितैषी कोई नहीं है.

अच्छी बात है कि देश का नागरिक, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो, सचेत होता जा रहा है. यह संदेश देश के कर्णधारों तक जाना भी जरूरी है. इस के लिए साहस की जरूरत है. वोट देते वक्त मतदाता को इस बात का एहसास होना चाहिए कि उस की भी कोई अहमियत है. वह एक लोकतंत्रीय व्यवस्था में जी रहा है. मतदान करने के पहले वह उस आदमी को परख ले जिसे वह वोट दे रहा है.

प्रकाश दर्पे, इंदौर (म.प्र.)

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सितंबर (द्वितीय) अंक पढ़ा. कई लेख अच्छे लगे. लेख ‘मुसलिम वोट बैंक : गलतफहमी में न रहें सियासी दल’ ने सही माने में यह दर्शाया कि देश के मात्र छठे हिस्से के इन वोटों की प्राप्ति के लिए राजनीतिक दल किस स्तर की मारामारी करते हैं. इस के लिए चाहे उन्हें अपनी अस्मिता तक भी क्यों न गिरवी रखनी पड़े. इन वोटों को पाने की गलतफहमी सभी दलों को है.

लेख ‘धमारा घाट रेल हादसा : पोंगापंथी में गंवा बैठे जान’ में धमारा घाट रेल हादसे के बारे में बेशक सविस्तार कारण व निवारण बताए गए हैं मगर देश के धर्मभीरु व धर्मांध लोगों की समझ में फिर भी नहीं आएगा क्योंकि धर्मोपदेश के कारण भक्तगण इतने अंधेबहरे हो जाते हैं कि उन्हें न तो दिखाई देता है और न ही सुनाई. ऐसे में अगर वे फिर ऐसी किसी दुर्घटना के शिकार हो जाएं तो आश्चर्य न होगा.

जहां तक सवाल देश में फैली ‘घूस की मार देश बीमार’ का है, तो हमें याद आता है कि हमारा देश जो कभी ‘सोने की चिडि़या’ के नाम से जाना जाता था, वह तो अब ‘रेत का ढेर’ भी नहीं रहा, मगर इस देश के भ्रष्टाचारी व उन के परिजन अवश्य ही ‘सोने’ के हो गए हैं. शायद यही कारण भी है कि आज जब भी किसी भी विभाग का भ्रष्ट कर्मचारी पकड़ा जाता है तो उस के घर से न केवल सोनेचांदी के जेवर ही निकलते हैं, बल्कि सोने की ईंटें तक बरामद की जाती हैं. कारण, आज इन भ्रष्ट तत्त्वों के पेट कुएं जो बन गए हैं. ये सब विषय समाज के प्रबुद्ध वर्ग, समाज सेवकों तथा चिंतकों द्वारा मंथन किए जाने को आमंत्रित करते हैं.

ताराचंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)

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पोंगापंथी और प्रशासन

सितंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘धमारा घाट रेल हादसा : पोंगापंथी में गंवा बैठे जान’ पढ़ कर यही लगा कि रेल व प्रशासन दोनों उपरोक्त घटना के लिए बराबर के दोषी हैं. हम पोंगापंथी हैं, इस के यह माने नहीं कि रेल व प्रशासन हमारी पोंगापंथी का लाभ उठा कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ ले. संविधान में प्रत्येक को अपने मतानुसार चलने का पूरा अधिकार है. लेकिन उस में यह कहीं नहीं लिखा कि इस अधिकार का प्रयोग करने वालों की सुरक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है.

यह बात अलग है कि हमें अपनी रूढि़वादिता को बदलना होगा और इस के साथ अपनी सुरक्षा करनी व सावधानी बरतनी होगी परंतु बिहार के धमारा घाट पर हुई दुर्घटना ने जनता, प्रशासन और रेलवे तीनों की कमियों को उजागर किया है.

कृष्णा मिश्रा, लखनऊ (उ.प्र.)

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बेईमानी का बोलबाला

सितंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘घूस की मार, देश बीमार’ पढ़ा. घूस व रिश्वतखोरी ने दीमक की तरह देश को खोखला कर दिया है. सरकारी अफसर तो मात्र मोहरे हैं, असली रिश्वतखोर तो हमारे राजनेता हैं जिन के पास अकूत संपत्ति है.

इसी अंक का अन्य लेख ‘कुरसी की लड़ाई, नेताओं की आपसी खिंचाई’ आज के संदर्भ में सटीक व तथ्यपरक लगा, कोई भी दल खुद को बेदाग नहीं साबित कर सकता. सभी दल भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं. सत्ता हथियाने के लिए वे हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं. इस अंक में छपी कहानियां ‘दुख में अटकना नहीं’ और ‘मुआवजा’ बेहद मर्मस्पर्शी लगीं.

श्याम चौरे, इंदौर (म.प्र.)

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अच्छे लोगों की कमी

सरिता अच्छी पत्रिका है लेकिन आजकल इसे पढ़ कर लगता है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी ने इस का बहुतकुछ बिगाड़ दिया है. क्या कांग्रेस दूध की धुली पार्टी है जिस ने एक ही रात में हजारों सिखों को मरवा दिया. मैं ने देखा है, कांग्रेस के राज में हिंदूमुसलिम दंगे किस तरह से होते थे और वह क्याक्या करवाती थी. मैं न राजनीतिज्ञ हूं न किसी पार्टी का. मैं तो चाहता हूं कि सभी हंसते रहें और खुशी से अपना जीवन बिताएं.

आप से उम्मीद करता हूं कि अच्छी सामग्री प्रकाशित करें, लोगों को भ्रष्ट राजनेताओं से सावधान करें. हमारा देश तो अच्छा है, धनी है, बस कमी है तो अच्छे लोगों की.

महिंदर बेसराज

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रिश्तों में अपनापन

सितंबर द्वितीय अंक में ‘पितापुत्र, रिश्तों में पनपती दोस्ती’ लेख पढ़ा. सुमन बाजपेयी ने अति सुंदर ढंग से पिता और पुत्र के रिश्ते को पूरी सचाई के साथ पाठकों के सामने पेश किया है. मैं स्वयं नानूदादू बन चुका, दो बेटियों और एक बेटे का पिता हूं. अपने अनुभव के अनुसार मैं इतना कहना चाहूंगा कि यदि मेरी मेरे बच्चों के साथ दोस्ती में कोई कमी रह भी गई हो, लेकिन मेरे बच्चों और उन के बच्चों के बीच तो दोस्ती का रिश्ता ही पाता हूं.

ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुजरात)

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स्वार्थ की राजनीति

लेख ‘मुसलिम वोट बैंक : गलतफहमी में न रहें सियासी दल’ पढ़ा. भारत के सियासी दल वोट के लिए जिस तरह से मुसलिम समुदाय को राजनीति के तराजू पर तौल रहे हैं उस से कभी इस समुदाय का और न ही इस देश का भला होने वाला है. हां, लोगों के बीच धर्म की खाई अवश्य चौड़ी होती जाएगी. ऐसी अवस्था में मुसलिम, खासकर पिछड़े व दलित मुसलिम वर्ग को खुद अपनी परिस्थिति का नए सिरे से आकलन करना होगा. उन्हें गहन चिंतन करना होगा कि मजहबी शिक्षा, अंधविश्वास और पिछलग्गूपन से उन की उन्नति कभी नहीं हो सकती.

अपनी बदहाली से मुक्ति के लिए उन्हें आधुनिक सोच कायम करनी होगी. मजहब और विकास में अंतर समझ कर अपनी जिंदगी व समाज को नया आयाम देना होगा. धर्म या मजहब निजी आस्था है, लेकिन जीवन के संपूर्ण विकास के लिए वैज्ञानिक सोच को समाहित करना आवश्यक है.

किसी के द्वारा दी गई बैसाखी का सहारा न बन कर अपना रास्ता खुद चुनने की कोशिश करें. ऐसा तभी संभव होगा जब वह अपनी मौजूदा घिसीपिटी व्यवस्था से ऊपर उठ कर आधुनिक शिक्षा और ज्ञान की ओर अग्रसर हो. साथ ही, मुसलिम समाज में उत्पन्न जातीय संकीर्णता के बारे में पढ़ कर दुख हुआ. इसलाम धर्म के अनुयायियों में भी जातिभेद का बीज पनपेगा, ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती. वास्तव में हिंदू धर्म में व्याप्त जाति व्यवस्था का कीड़ा (दीमक) जिस के भी घर में पैर पसारेगा, उस घर को खोखला ही करेगा.

सूर्य प्रकाश, वाराणसी (उ.प्र.)

तुम नहीं थे

दीप था बाती भी थी
सिर्फ तुम नहीं थे
रोशनी हो न सकी

वाणी थी शब्द भी थे
सिर्फ तुम नहीं थे
बात हो न सकी

बसंत था बहार भी थी
सिर्फ तुम नहीं थे
फूल खिल न सके

नदी थी नाव भी थी
सिर्फ तुम नहीं थे
पार हो न सके

जिस्म था सांसें भी थीं
सिर्फ तुम नहीं थे
जिंदगी जी न सके.

काली प्रसाद जयसवाल   

इन्हें भी आजमाइए

  1. पलंग का सिरहाना अगर पुराना हो कर खराब लगने लगा हो तो उस के लिए कपड़े का कवर सी कर उस पर चढ़ा दीजिए. उस में दोचार जेबें भी बनाइए जो किताब, बटुआ आदि रखने के काम आएंगी.
  2. आलू के उबले हुए पानी में यदि चांदी की चीजें डाल कर फिर उबालें तो खूब चमक आ जाती है, इस के अलावा खट्टे दही में भी कुछ घंटे चांदी के बरतन पड़े रहें तो बिलकुल नए हो जाते हैं.
  3. सब्जी का बरतन जल जाने पर थोड़ा प्याज एक गिलास पानी के साथ उस बरतन में चढ़ा दें. थोड़ी देर में बरतन साफ हो जाएगा.
  4. कपड़े के सफेद जूतों को और अधिक सफेद व चमकदार बनाने के लिए सफेद पौलिश में पानी के स्थान पर दूध का प्रयोग करें.
  5. नीबू के छिलकों को धूप में सुखा कर बारीक पीस लें और मंजन के रूप में प्रयोग करें. दांतों को साफ करने के साथसाथ यह सांस की दुर्गंध को भी समाप्त करेगा.
  6. सूती कपड़े पर से चाय के दाग दूर करने के लिए उबले चावल पीस कर उस पर मलें या गीले आटे से रगड़ कर धोएं.
  7. ठंड में यदि आप के होंठ फट जाएं तो उन पर शहद और सुहागा मिला कर लगाइए.
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