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पूंजी बाजार

दरों में कटौती से नई ऊंचाई पर बाजार

रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने करीब पौने  2 साल बाद 15 जनवरी को ब्याज दरों में कटौती कर के अर्थव्यवस्था में सुधार की दौड़ के बीच कर्जदारों को जो राहत दी उस ने बाजार का माहौल एक झटके में बदल दिया. बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई का सूचकांक एक दिन में 729 अंक बढ़ गया. 5 साल में सूचकांक की 1 दिन की यह सब से ऊंची छलांग रही. गवर्नर ने रेपो दर यानी रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों को दिए जाने वाले कर्ज की दर 0.25 अंक घटा कर 7.75 प्रतिशत कर दी है. इस से पहले ब्याज दरें मई-2013 में घटाई गई थीं. ब्याज दरों में कटौती से निवेश के और बढ़ने की उम्मीद की जा रही है. राजन ने कहा है कि वित्तीय हालात यदि इसी तरह सकारात्मक रहते हैं तो साल के अंत तक ब्याज दर 7 प्रतिशत तक की जा सकती है. इसी बीच, विश्व मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने कहा कि 2016 में चीन को पछाड़ कर भारत दुनिया की सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बन कर उभरेगा. इस से भी बाजार का उत्साह बढ़ा और सूचकांक नए रिकौर्ड तक पहुंच गया.

बाजार के जानकार मानते हैं कि ब्याज दरों में अगली कटौती आम बजट के पेश किए जाने के बाद ही की जा सकेगी. ताजा कटौती से शेयर बाजार में जो उछाल आया है उस के कारण बाजार 2 माह के दौरान 16 जनवरी को सर्वाधिक साप्ताहिक ऊंचाई पर रहा. इस से 3 दिन पहले सूचकांक लगातार 3 दिन तक तेजी पर बंद हुआ. ब्याज दरों में कटौती का बैंकों ने भी जोरदार स्वागत किया और सरकारी क्षेत्र के यूनाइटेड बैंक औफ इंडिया तथा यूनियन बैंक ने तत्काल ब्याज दरों में कटौती कर दी. माना जा रहा है कि ब्याज दरों में कटौती से कर्ज की मांग बढ़ेगी और इस का सीधा फायदा आटो तथा रियल एस्टेट क्षेत्र को होगा. रुपया अच्छी स्थिति में नहीं है जबकि महंगाई की दर लगातार कम हो रही है. तेल की कीमत विश्व बाजार में 6 साल के निचले स्तर पर है. सरकार इन स्थितियों का फायदा उठा कर वित्तीय लक्ष्य को हासिल करना चाहती है और इस अनुकूल माहौल से शेयर बाजार को लाभ होगा. नतीजतन, बाजार में निवेश का प्रवाह बढ़ेगा.

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बैंकों को अधिक स्वायत्तता देने का फैसला

सरकार ने सुधारों को तेजी से लागू करने और अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए बैंकों को और अधिक स्वायत्तता देने का फैसला किया है. इस नीति के तहत वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बैंकों को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि वे निडर हो कर तथा किसी का पक्ष लिए बिना वित्तीय फैसले लें. उन्होंने आश्वासन दिया कि मानव संसाधन संबंधी वित्तीय स्वायत्तता के फैसलों में सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी. बैंकों से कहा गया है कि सभी निर्णय तथ्यों पर आधारित हों, साथ ही, उन्हें हिदायत दी गई है कि यदि किसी का बेजा पक्ष लिया जाता है या लापरवाही बरती जाती है तो दोषी के विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जाएगी. आर्थिक क्षेत्र के जानकार इसे अच्छा प्रयास मानते हैं. इस से बैंकों के काम में तेजी भी आएगी और उन्हें प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकेगा.

इस से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि बैंक नियमों का पालन करते हुए आर्थिक विकास को बढ़ाने के निर्णय लेते रहें. उन्होंने विश्वास दिलाया कि उन के निर्णय यदि उचित, संतुलित और अच्छे होंगे तो उन के काम में कोई बाधक नहीं बनेगा और अनुचित काम के लिए किसी तरह का दबाव उन्हें नहीं झेलना पड़ेगा. प्रधानमंत्री ने आश्वस्त किया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई फोन उन के द्वारा लिए गए निर्णयों के संबंध में नहीं आएगा. बैंकों की स्वायत्तता का यह अच्छा फैसला है लेकिन उन्हें निजी क्षेत्र के बैंकों की तरह ग्राहकों को धोखे में रखने की छूट नहीं मिलनी चाहिए. निजी बैंक हिडन चार्जेज यानी बिना बताए ग्राहकों का पैसा विभिन्न मदों के लिए काटते हैं. ऋण देते समय लुभावनी योजनाएं बता कर आकर्षित करते हैं और फिर ग्राहक को फंसा कर मनमाफिक उसे लूटते हैं.

आम आदमी का विश्वास है कि सरकारी बैंक ऐसा नहीं करते हैं. वहां हिडन चार्जेज नहीं हैं. सरकारी बैंकों पर जनता का यह विश्वास बना रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब तक प्रतिस्पर्धा के बहाने उन्हें ऐसा करने के लिए विवश नहीं किया जाता है. सामान्य आदमी निजी बैंकों में खाता खोलने से डरता है. उस का एक रुपया भी ज्यादा कटता है तो चिंतित हो जाता है. वह अपनी मेहनत की कमाई का एक पैसा बरबाद होते देख बेहद तकलीफ महसूस करता है. सरकारी बैंक भले ही उस का अतिरिक्त पैसा काट दें लेकिन उसे पूरा भरोसा है कि उस के साथ अन्याय नहीं हुआ होगा. यह भरोसा कायम रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब बैंक कारोबार बढ़ाने की दौड़ में अपने ग्राहक के हित के लिए अत्यधिक सजग रहें.

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खाद्य उत्पादों का विपणन बढ़ाने का छलावा

सरकार आर्थिक प्रगति को चहुंमुखी बनाने की दिशा में काम करते हुए कृषि उत्पादों के विपणन को बढ़ावा देने को विशेष प्राथमिकता दे रही है. वह गांव के उत्पाद को अच्छा बाजार प्रदान कर के कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने की कोशिश कर रही है. राष्ट्रीय ग्रामीण और कृषि विकास बैंक को मजबूत आधार प्रदान किया जा रहा है. कृषि उत्पादों को बाजार में लाने के लिए मजबूत आपूर्ति व्यवस्था लागू की जा रही है और राज्य सरकारों को इस के लिए प्रोत्साहित करने की योजना बनाई जा रही है.

यह सच है कि सभी राजनीतिक दल किसान के हित की बात करते हैं और सत्ता में आते ही अपनी योजनाओं का खाका भी तैयार करते हैं लेकिन जमीन पर कुछ बदलता नहीं है. कृषि उत्पाद का लाभ हर बार बिचौलिए खा जाते हैं. किसान को उस की फसल की कीमत तक नहीं मिल पाती है. किसान की हालत लगातार खराब हो रही है लेकिन सरकारी दावे और उस के आंकड़े निरंतर मजबूत हो रहे हैं. समस्याओं का मारा किसान आएदिन आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है. वह अपने खेत में जो भी फसल उगा रहा है उस की मामूली कीमत ही उसे मिल रही है. वह ज्यादा पैदावार करता है तो फसल खेतों में ही सड़ जाती है. मजबूर हो कर किसान औनेपौने दाम पर बिचौलियों को उत्पाद बेचता है. बिचौलिए बिना मेहनत किए मालामाल हो रहे हैं और खूनपसीना एक कर के पैदावार बढ़ाने वाला किसान खून के आंसू रो रहा है. सरकारी नीति के शब्दों के आडंबर और योजनाओं को आकर्षक खाके में फंसाने के बजाय किसान को उसी की शैली में मदद पहुंचाने की जरूरत है. वह चाहता है कि खेत पर जो फसल तैयार हो उस की न्यूनतम लागत उसे मिलती रहे. इस स्तर पर वह सुनिश्चित होना चाहता है लेकिन उसे इस स्तर पर भी पक्का भरोसा नहीं मिल रहा है. किसान दलालों की तरह बिना मेहनत किए मोटी रकम हासिल नहीं करना चाहता, वह मात्र आश्वस्त होना चाहता है कि उस के खेत पर जो फसल उगे वह बरबाद न हो और उसे उस की मेहनत के बराबर कीमत मिलती रहे.

सेंट में उलझे नेताजी

एक नेताजी बस में यात्रा कर रहे थे. थोड़ा अजीब लगता है लेकिन उस दिन शायद उन की कारें पत्नी के रिश्तेदारों की सेवा में लगी होंगी. यही एक ऐसी जगह होती है जहां किसी मर्द की कोई अपील काम नहीं करती. सो, उस दिन वे बस में यात्रा करने को मजबूर थे. लेकिन उन के पड़ोस वाली सीट पर एक सुंदर स्त्री आ कर बैठी जिस ने निहायत उम्दा सेंट लगा रखा था. वह यों महक रही थी कि नेताजी का ईमान डोलने लगा. वे धीरेधीरे उस के पास सरकने लगे. धीरेधीरे पास सरकने की या अवसर से न चूकने की कला सभी नेताओं को मानो घुट्टी में ही पिलाई जाती है.

सो, नेता सरकसरक कर महिला से एकदम सट गए. बिलकुल दबोच दिया उन्होंने उस बेचारी को. महिला बड़े संकट में फंसी थी. वह उन के अंदर के पुरुष का सम्मान भले न करती हो पर शुद्ध खद्दर और गांधी टोपी का लिहाज उसे था. कहे तो क्या कहे. जब बिलकुल ही सट गए, महिला को सांस लेना दूभर होने लगा तो फिर नेताजी ने ही कहा, ‘क्षमा करें, आप ने यह कौन सा सेंट लगा रखा है? मैं अपनी पत्नी के लिए खरीदना चाहता हूं.’ बोलतेबोलते नेताजी ने उस का हाथ अपने हाथ में लिया.

उस महिला ने मीठे स्वर में कहा, ‘जो गलती मैं ने की है उसे आप भी दोहराएंगे?’ नेताजी कुछ समझे नहीं. उन्होंने कहा, ‘मैं कुछ समझा नहीं.’ महिला ने उन के हाथ पर से हाथ फेरते हुए कहा, ‘क्या आप पसंद करेंगे कि अन्य लोग आप की पत्नी के इतने करीब आएं, उन के शरीर से बिलकुल सट कर पूछें कि आप ने कौन सा सेंट इस्तेमाल किया है, मैं भी अपनी पत्नी के लिए खरीदना चाहता हूं?’

जोक हिट तो स्टार हिट

हंसनेहंसाने के लिए मजाक किए जाते हैं, जोक्स बनाए जाते हैं, चुटकुले सुनाए जाते हैं. आज इंटरनैट के दौर में किसी ने कुछ गलत कहा नहीं कि उस पर मजेदार रिऐक्शंस सामने आ जाते हैं. इस से बौलीवुड की सैलिब्रिटीज भी बच नहीं पातीं. उन की कही बातों पर खूब मजे लिए जाते हैं. इस का थोड़ा मजा आप भी लीजिए :

आलिया भट्ट और वरुण धवन दोनों वाक कर रहे थे. तभी उन्हें 1 हजार रुपए का नोट पड़ा मिला.
आलिया : हम क्या करें?
वरुण : चल, 50-50 कर लेते हैं.
आलिया : यार, तो बाकी बचे 900 रुपयों का क्या होगा?

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आलिया भट्ट ने हैल्प डैस्क को कंप्यूटर की प्रौब्लम बताने के लिए फोन किया. 
आलिया : जब भी मैं अपना पासवर्ड डालती हूं तो स्टार, स्टार बन जाते हैं. इस में क्या खराबी है?
हैल्प डैस्क : डियर लेडी, स्टार आप की सेफ्टी के लिए दिखते हैं ताकि आप के पीछे खड़ा व्यक्ति आप का पासवर्ड न देख ले.
आलिया : हां, पर जब भी मैं टाइप करती हूं तब मेरे पीछे तो कोई खड़ा नहीं होता है.

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आलिया : सफोला औयल तो दे दिया भैया, इस के साथ का फ्री गिफ्ट नहीं दिया.
दुकानदार : मैम, इस के साथ कोई गिफ्ट नहीं है.
आलिया : उल्लू मत बनाओ, इस में तो लिखा है ‘कोलैस्ट्रौल-फ्री’.

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वरुण : तुम खाली पेट कितने सेब खा सकती हो?
आलिया : मैं 6 सेब खा सकती हूं.
वरुण : नहीं, तुम सिर्फ 1 सेब ही खा सकती हो क्योंकि दूसरा सेब खाने के बाद तुम्हारा पेट खाली थोड़ी न रहेगा.
आलिया : वाउ, क्या मस्त जोक था यह. मैं अपनी सहेली को बताती हूं.
आलिया अब श्रद्धा से : तू खाली पेट में कितने सेब खा सकती है?
श्रद्धा : मैं 10 सेब खा सकती हूं.
आलिया : पागल, 6 बोलती तो मैं तुझे मस्त जोक सुनाती.

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बिल गेट्स : आप का फेवरेट एमएस प्रोडक्ट कौन सा है? मेरा तो पावरपौइंट है.
आलिया : मेरा फेवरेट एमएस धौनी है.

ये कुछ जोक्स हैं जो बीते कुछ दिनों से हम सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर पढ़ कर खूब हंसते हैं और आलिया के लो आईक्यू लेवल का मजाक बनाते हैं. आखिर, आलिया भट्ट इन चुटकुलों की क्यों शिकार हो रही हैं, आइए जानते हैं :

‘राधा तेरी चुनरी’ गाने पर सैक्सी डांस करने वाली युवा अभिनेत्री आलिया भट्ट भले ही इस समय युवाओं की नं. 1 पसंद हों लेकिन वे बी टाउन में अपनी लो आईक्यू को ले कर सब से ज्यादा चर्चाओं में रहती हैं. आलिया के खुद के फैंस भी उन का सब से ज्यादा मजाक बनाते हैं लेकिन इस से उन की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ता. बीते कुछ समय से बी टाउन के सैलिब्रिटीज का सोशल मीडिया में जम कर मजाक उड़ाया गया है लेकिन बेवकूफी कहें या कम जानकारी, जिस के चलते सिर्फ आलिया भट्ट ही चर्चित रहीं. इस की शुरुआत डायरैक्टर करण जौहर के टीवी शो ‘कौफी विद करन’ शो से हुई, जहां आलिया कुछ सवालों के जवाब न दे सकीं और जिन के दिए तो काफी फनी दिए. इस के बाद से ही फेसबुक और ट्विटर पर उन के लो आईक्यू का जम कर मजाक बनाया गया. हालांकि, आलिया ने इस का बुरा नहीं माना और खुद पर बने चुटकुलों का भी मजा लिया. आखिर, आलिया इन जोक्स से खुश क्यों न हों, क्योंकि इस से वे फिल्मों के औफ सीजन के बावजूद पूरे साल चर्चा में जो बनी रहीं. अब पब्लिसिटी के लिए इतना तो सहना ही पड़ता है.

जरूरी नहीं लगती पढ़ाई

यह तो जगजाहिर है कि बौलीवुड इंडस्ट्री में स्टार किड्स को हाथोंहाथ लिया जाता है. एक पीढ़ी के सक्सैसफुल हो जाने पर उन के बच्चों के लिए दरवाजे खुल जाते हैं. अब इन में भी 2 कैटेगरी हैं. एक तो वे जो पकीपकाई खिचड़ी खाना चाहते हैं. दूसरे, थोड़ा हाईफाई व मौडर्न जमाने की दौड़ में शामिल कुछ युवा थोड़ीबहुत ऐक्ंटग सीख या बाथरूम सिंगिंग कर इस दौड़ में शामिल होते हैं. फिल्मों में जल्दी आने की होड़ में स्टार किड्स अपनी पढ़ाई तक पूरी नहीं करते और इंडस्ट्री का रुख कर लेते हैं. इस बात का एक उदाहरण देखिए :

स्कूल ड्रौपआउट आलिया भट्ट ने कुछ समय पहले प्रैसिडैंट का नाम पृथ्वीराज चौहान बता डाला. यही कारण है कि पढ़ाई पूरी न करने और कम जानकारी के चलते ही आलिया ने यह जवाब बड़े ही कौन्फिडैंट हो कर दिया. इस दौड़ में सिर्फ आलिया भट्ट ही नहीं, बल्कि कई युवा स्टार शामिल हैं. स्टार किड्स बी टाउन का रुख तो कर लेते हैं पर इस के लिए जरूरी बातों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझते.

कई स्टार किड्स तो पढ़ाई तो छोडि़ए, बी टाउन की जरूरी तैयारी भी नहीं करते. फिजिक, डांस, ऐक्शन और ऐक्ंटग यही बेसिक चीजें हैं जो किसी ऐक्टर या ऐक्टै्रस में सब से पहले देखी जाती हैं. इस दौड़ में शामिल अभिषेक बच्चन, तुषार कपूर, प्रतीक बब्बर, आर्य बब्बर, अरमान कोहली, फरदीन खान, सोहेब खान, तनीशा मुखर्जी, उदय चोपड़ा, बौबी देओल, जायद खान, इमरान खान, ऐशा देओल आदि शामिल हैं. ऐसे ही कुछ स्टार किड्स की एजुकेशन का हाल देखिए :

करिश्मा कपूर ने छठी क्लास पास की तो सलमान खान ने 10वीं पास कर कालेज ड्रौपआउट कर दिया तो वहीं मिस्टर परफैक्शनिस्ट आमिर खान ने भी 12वीं के बाद की पढ़ाई करनी जरूरी नहीं समझी.

किसकिस का बना मजाक

सोशल मीडिया पर आलिया भट्ट पर बने जोक्स की भरमार है तो वहीं कई और भी अभिनेता व अभिनेत्रियां हैं जिन पर भी सोशल मीडिया में जम कर मजाक बना है. आइए देखिए :

करिश्मा तन्ना : बिग बौस सीजन 8 में करिश्मा तन्ना की भी लो आईक्यू लेवल का खूब मजाक उड़ाया जा रहा है. जनरल नौलेज की कम जानकारी और मैथ्स की कैलकुलेशन गलत करने को ले कर करिश्मा सोशल मीडिया व खबरों में छाई हुई हैं. मिस तन्ना को इस वजह से खूब पब्लिसिटी मिल रही है और दर्शक भी उन्हें फाइनलिस्ट बनाने की दौड़ में शामिल करने के लिए धड़ाधड़ वोटों की बौछार कर रहे हैं. सीजन 8 में मेकअप करने वाली करिश्मा को अब उन की लो आईक्यू लेवल के लिए ज्यादा पहचाना जा रहा है, जिस का करिश्मा को फायदा ही मिल रहा है.

टाइगर श्रौफ : अपनी पहली फिल्म के पहले से ही चर्चित जैकी श्रौफ के बेटे युवा टाइगर श्रौफ के लुक्स और उन की फेयरनैस पर मजाक बनाया गया. हालांकि, टाइगर ने अपने पर बने जोक्स का खुल कर मजा लिया. अब टाइगर मजा लें भी क्यों न, आखिर उन की पहली फिल्म ‘हीरोपंती’ जो आने वाली थी. वैसे भी शर्मीले स्वभाव के टाइगर का कहना है कि अगर उन का काम अच्छा हुआ तो लोग उन्हें इस के लिए याद रखेंगे.

यामी गौतम : फेयर ऐंड लवली की ऐड फिल्म से चर्चित यामी गौतम का खूब मजाक बना. ‘गोरा निखार पाएं सिर्फ सात दिनों में’ को ले कर यामी सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. यामी ने अपने पर बने मजाकों पर कोई रिऐक्शन नहीं दिया. आखिर देना भी क्यों, यामी ने तो जैसे फेयर ऐंड लवली ऐड फिल्म का कौपीराइट ही ले लिया हो. अगर यामी बोलेंगी तो फसेंगी.

आलोक नाथ : आलोक नाथ का मजाक तो उन के लिए बड़ा ही अच्छा साबित हुआ. आखिर हो भी क्यों न, कोई उन्हें ‘बाबूजी’ कहता तो कोई संस्कारी पुरुष कह रहा था. कुछ लोग तो उन्हें यह भी कहते हैं कि बाबूजी तो बचपन से ही संस्कारी हैं. आलोक नाथ ने फिल्मों में जो काम किया था उन में उन का किरदार या तो संस्कारी होता या फिर वे एक गार्जियन की भूमिका में नजर आते. खैर, आलोक नाथ ने अपने पर बने इन चुटकुलों का खूब मजा लिया. अब भला आलोक को रिऐक्ट करने की कोई वजह मिली नहीं और फिर संस्कारी इमेज उन्हें अपने अनुरूप ही लगती भी है.

नील नितिन मुकेश : ये एकमात्र ऐसे ऐक्टर हैं जिन के नाम पर ही मजाक बना. हुआ यह कि लोगों ने इन के बर्थडे पर कह डाला कि क्या नील, 3 लोगों का बर्थडे मना रहे हो और क्या 3 लोग एकसाथ ही चलते हैं, अच्छा नील यहां हैं, तो बाकी लोग कहां हैं आदि. इन्हीं कमैंट्स से परेशान नील नितिन मुकेश ने रिऐक्ट करना शुरू कर दिया. उन्होंने अपने पर बनाए गए जोक्स को सीरियसली ले लिया. इस के बाद तो वे कई दिनों तक सोशल मीडिया में छाए रहे.

सोशल मीडिया से फायदा

आलोक नाथ स्पैशल मीडिया पर सब से पहले ट्रैंड बने यानी बाबूजी ने इंटरव्यू में माना है कि उन्हें इन मजाकों से काफी फायदा हुआ है. सोशल मीडिया पर ट्रैंड बनने के बाद आलोक नाथ कई कौमिक म्यूजिक वीडियो, न्यूज चैनल्स में भी दिखाई दिए और उन्हें कई टीवी सीरियल्स और कुछ फिल्में भी मिली हैं. ऐसे ही टाइगर श्रौफ अपनी फिल्म रिलीज के वक्त खूब चर्चा में बने रहे, भले ही मजाक की वजह से क्यों न हुआ हो. आलिया भट्ट चुटकुलों के चलते तब तक भले ही एक फिल्म की थी पर फिर भी वे अपनी दूसरी फिल्म के आने तक सोशल मीडिया पर छाई रहीं. खैर, कुल मिला कर इन चुटकुलों से अभी तक आलिया को फायदा ही मिला है.

हालांकि इन सब से पहले और सब से ज्यादा चुटकुले जिस स्टार पर बने, वे हैं रजनीकांत. रजनी के बारे में कहा जाता है कि वे मौर्निंग वाक पर निकलते हैं तो अमेरिका तक हो आते हैं या मोबाइल स्विच औफ होने पर सिर्फ रजनीकांत ही कौल कर सकते हैं. ऐसा रजनी के ऐक्शन और फिल्मों में चमत्कृत कर देने वाले कारनामों के चलते हुआ. इस सब से जाहिर है कि सैलिब्रिटीज इन दिनों गुड हों या बैड, हर तरह की पब्लिसिटी चाहते हैं और इस तरह सोशल मीडिया सभी की इनडायरैक्टली मदद ही कर रहा है. इस पर न तो पैसे खर्च होते हैं, न ही खबर में रहने के लिए न्यूज चैनलों का मुंह ताकना पड़ता है.

आलिया बनी होशियार

सोशल मीडिया पर आलिया के लो आईक्यू और चुटकुलों की लंबी फेहरिस्त से जहां उन्हें जम कर पब्लिसिटी मिली वहीं खुद पर बने जोक्स का आलिया ने भी खूब मजा लिया. इतना सब होने के कुछ दिनों बाद ही आलिया का एक कौमिक वीडियो रिलीज हुआ जिस में आलिया खुद पर बनी वीडियो पर हंस रही थीं और इस में उन्होंने खुद के होशियार होने वाली बातें भी कीं. इस वीडियो के रिलीज होते ही सब ने कहा, अब आलिया में भी दिमाग आ गया है और वे अब होशियार हो गई हैं.

महमूद की कौमिक टाइमिंग कमाल की थी : बोमन ईरानी

अभिनय जगत में 44 साल की उम्र में कदम रखने वाले हास्य अभिनेता बोमन ईरानी की जिंदगी की यात्रा काफी रोचक रही है. मुंबई में वेफर की दुकान पर नौकरी करने वाले बोमन फोटोग्राफर बने, फिर थिएटर से जुड़े और आज वे बौलीवुड के सफल चरित्र अभिनेता हैं. कुछ समय पहले प्रदर्शित फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में उन के अभिनय को काफी सराहा गया. पेश हैं उन से हुई बातचीत के खास अंश : 

आप एक बेहतरीन अभिनेता हैं. पर 44 साल की उम्र में अभिनय को कैरियर बनाने की बात दिमाग में कैसे आई?

इस का मेरे पास जवाब नहीं है. मुझे स्कूल दिनों से ही अभिनय से लगाव रहा था. फिल्मों से जुड़ने से पहले मैं फोटोग्राफी करने के साथसाथ थिएटर किया करता था. उस से पहले 32 साल की उम्र तक मैं ने एक वेफर की दुकान में नौकरी की. फिर फोटोग्राफी करनी शुरू की. बतौर फोटोग्राफर, मैं मोटरसाइकिल और मोटरसाइकिल रेस की फोटो खींचा करता था. फिर शामक डावर और अलिक पदमशी से मुलाकात हुई. अलिक पदमशी के साथ मैं ने पहला नाटक ‘रोशनी’ किया था. उस के बाद 10 साल तक थिएटर से जुड़ा रहा. एक दिन फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा ने मुझे फोन किया और पूछा कि क्या मैं फिल्म में अभिनय करना चाहूंगा. उस के बाद मैं फिल्मों से जुड़ गया.

आप ने फिल्मों में कौमेडी के साथसाथ कुछ गंभीर किस्म के किरदार भी निभाए हैं. मगर आप की पहचान एक कौमेडी कलाकार के रूप में बनी हुई है?

मैं ने खुद को किसी सीमा में बांधने का प्रयास कभी नहीं किया पर लोगों को जो परफौर्मेंस अच्छी लगती है, उसे वे याद रखते हैं. जब कौमेडी ऐक्टर के रूप में मेरी पहचान बन गई तो इसे तोड़ने के लिए मैं ने ‘खोसला का घोंसला’ जैसी फिल्म भी की.

पुरानी कौमेडी फिल्मों के मुकाबले अब लोग सैक्स कौमेडी बनाने लगे हैं?

कितनी सैक्स कौमेडी वाली फिल्में बनीं? एक ‘ग्रैंड मस्ती’ बनी. इसे दर्शकों ने पसंद किया. 100 करोड़ का बिजनैस किया. देखिए, फिल्में लंबे समय को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं. दर्शक अपनी पसंद की फिल्में देखने जाता है. इसलिए यह नहीं कहा जाना चाहिए कि अब यह दौर चल रहा है. ‘शोले’ सुपरहिट थी, पर उस के बाद दूसरी ‘शोले’ नहीं बनी. यह मूर्ख लोग सोचते हैं कि यह फिल्म हिट हुई तो मैं भी इसी तरह की फिल्म बनाऊंगा. ‘शोले’ के बाद हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘गोलमाल’ हिट हुई थी. ‘शान’ असफल नहीं थी, उस ने अच्छा बिजनैस किया था.

कौमेडी वाले किरदार में इमोशन कितना जरूरी?

इमोशन के बिना कौमेडी, हर चरित्र बेकार है. इमोशन भी दिल से निकलना चाहिए.

आप की कौमेडी को लोग बहुत पसंद करते हैं. आप किस तरह की कौमेडी के पैरोकार हैं?

मुझे हृषिकेश मुखर्जी निर्देशित फिल्मों की कौमेडी पसंद है. मैं एडल्ट या सैक्स कौमेडी नहीं कर सकता. पर मैं इन्हें बुरी फिल्म की श्रेणी में भी नहीं मानता. आखिर सैक्स कौमेडी वाली फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ ने सौ करोड़ का बिजनैस किया. इस का मतलब हुआ कि इस तरह की फिल्में दर्शक देखना चाहते हैं. लेकिन इस तरह की फिल्मों में मैं खुद को सहज नहीं पाता. मुझे ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ और ‘थ्री इडियट्स’ जैसी फिल्में करने में ज्यादा आनंद आया. मैं यह बताना चाहूंगा कि मैं ‘थ्री इडियट्स’ के वायरस के किरदार को फनी नहीं, बल्कि डार्क किरदार मानता हूं.

आप हृषिकेश मुखर्जी की कौमेडी पसंद करते हैं. मगर आप ने हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘शौकीन’ के रीमेक में काम करने से मना कर दिया?

आप ने एकदम दुरुस्त फरमाया. मैं हृषिकेश मुखर्जी जैसी कौमेडी फिल्मों को खूब पसंद करता हूं. इस के बावजूद यह महज इत्तफाक है कि मैं ने उन की ‘शौकीन’ के रीमेक फिल्मों को करने से मना कर दिया. इस की वजह यह नहीं थी कि वे सब कहानियां वल्गर थीं. मुझे स्क्रिप्ट पसंद नहीं आई. पुरानी ‘शौकीन’ इसलिए हिट हुई थी क्योंकि उस में कुछ चार्मिंग था. मैं ‘ग्रैंड मस्ती’ या ‘क्या कूल हैं हम’ के खिलाफ नहीं हूं.

आप किस हास्य कलाकार के प्रशंसक हैं?

मैं महमूदजी का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं. वे सही मानों में अदाकार थे. उन की कौमिक टाइमिंग कमाल की थी. मजेदार बात यह है कि कौमेडी के साथ ही उन्होंने सामाजिक संदेश देने वाली फिल्में भी कीं. मेरी राय में वे सिर्फ मेरे ही नहीं बल्कि तमाम कलाकारों के लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं. यदि मैं ने अपने कैरियर में महमूद के मुकाबले 20 प्रतिशत भी सफलता पा ली, तो यह मेरे लिए गर्व की बात होगी. उन के बाद मैं जौनी लीवर का प्रशंसक हूं. उन्हें प्रकृति ने अनुपम उपहार दिया है. वे आप के कमरे के अंदर आएंगे और कुछ ऐसा कहेंगे कि आप हंसतेहंसते लोटपोट हुए नहीं रह सकते.

हर कलाकार बड़ी फिल्मों का हिस्सा बनना चाहता है?

बड़ी फिल्मों का हिस्सा बनना अच्छी बात है मगर हर कलाकार को खुद के लिए भी खड़ा होना आना चाहिए. शाहरुख खान और आमिर खान जैसे कलाकारों के साथ काम करना सब से बड़ी चुनौती होती है. क्योंकि उस वक्त कलाकार के तौर पर अपनी पहचान को खोने न देने का मुद्दा हावी रहता है.

आप को कब हंसी आती है?

मुझे तो कई बार अति गंभीर बातों या हालात पर भी हंसी आ जाती है. तो कई बार हास्यप्रद घटनाएं भी हंसा नहीं पातीं. कई बार हास्यप्रद जोक्स सुनाने वाला इंसान भी फनी नहीं लगता.

आप की नजर में सब से दुखद बात?

जब आप जोक्स सुनाएं और किसी को भी हंसी न आए.

कलाकार के तौर पर सैट पर आप किस तरह से काम करते हैं?

मेरी कोशिश होती है कि मैं सिर्फ चरित्र को न निभाऊं, मैं चरित्र निभाने के साथसाथ कहानी को भी ले कर चलता हूं. दूसरी बात, मैं हर चरित्र को ले कर तैयारी करता हूं. सैट पर हर सीन के फिल्मांकन से पहले मैं अपनी तरफ से निर्देशक को 4-5 तरीके से उस सीन को कर के दिखाता हूं और उसे चुनने का मौका देता हूं कि उसे क्या चाहिए. कलाकार के तौर पर निर्देशक के सामने चौइस रखना हमारा काम है. मेरी राय में कलाकार को संकोची और बेशर्म दोनों होना चाहिए.

किसी चरित्र को निभाने में लुक की कितनी अहमियत होती है?

लुक बहुत बाद में आता है. पहले तो स्क्रिप्ट पढ़ कर स्क्रिप्ट के मूड को पकड़ना जरूरी होता है. फिल्म की थीम को समझ कर वहां से चरित्र को निकालो. पर लुक महत्त्व रखता है. जींस पहनने पर टोन अलग होता है. पजामा पहनने पर टोन अलग होता है. लुक से आप का बिहेवियर परिभाषित होता है.

आप का अपना स्वभाव?

मैं स्पष्टवक्ता हूं. इमोशनल इंसान हूं. बिना किसी से प्रतिस्पर्धा किए अपने सपनों को पूरा करना चाहता हूं.

आप की सफलता का राज?

मैं अपने हर चरित्र को ले कर सैकड़ों सवाल किया करता हूं-कब, क्यों, कैसे, कहां. मसलन, फिल्म ‘बींग सायरस’ में मैं खुद आश्चर्यचकित था कि मेरा पात्र प्रेम इस कदर गुस्सैल कैसे हो सकता है?

आप की सब से बड़ी ताकत?

मेरी पत्नी. वे एक अच्छी पार्टनर हैं. मैं एक इंसान के तौर पर उन्हें बहुत इज्जत देता हूं. जब भी मैं कहीं गलत होता हूं तो वे मुझे बताती हैं कि मुझे क्या करना चाहिए. वे कहती हैं कि इसे मेरी राय नहीं बल्कि केयर मान कर चलें.

आप अपने बेटे के साथ भी एक फिल्म कर रहे हैं?

जी हां, मनीष झा एक कामैडी फिल्म ‘द लीजेंड औफ माइकल मिश्रा’ निर्देशित कर रहे हैं, जिस में मैं अपने बेटे कायोजी ईरानी के साथ नजर आऊंगा. इस में अरशद वारसी और अदिति राव हैदरी भी हैं. इस में हम दोनों पितापुत्र की भूमिका में नहीं हैं. हम दोनों के किरदार अलगअलग हैं. मेरे किरदार का नाम ‘फुल पैंट’ और मेरे बेटे कियाजो के किरदार का नाम ‘हाफ पैंट’ है. हम दोनों बिहारी बने हुए हैं.

क्या यह माना जाए कि आप के लिए एक निर्देशक शिक्षक की तरह होता है?

बिलकुल नहीं, एक अच्छे कलाकार के लिए निर्देशक कभी भी शिक्षक नहीं होता. निर्देशक एक गाइड की तरह कलाकार को चरित्र निभाने में साथ देता है. कई बार ऐसा होता है कि हमें उन किरदारों के लिए प्रशंसा मिलती है जिन के लिए हमें ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती, तो वहीं जिन के लिए हम सब से ज्यादा मेहनत करते हैं, उस पात्र के लिए हमें एक शब्द भी सुनने को नहीं मिलता.

आप के पसंदीदा निर्देशक?

फरहा खान और राज कुमार हिरानी बेहतरीन निर्देशक हैं. मैं तो फरहा खान को आज का मनमोहन देसाई मानता हूं. मैडनेस, स्पिरिट सब कुछ बेहतरीन. मुझे उन पर गर्व है. उन के साथ हीरो बन कर आया, रोमांटिक फिल्म की और एंजौय किया.

आप को अपनी कौन सी फिल्म सब से ज्यादा पसंद है?

मैं सब से बड़ा आलोचक हूं. इसलिए मैं अपनी फिल्में कभी नहीं देखता.

इन दिनों फिल्म प्रमोशन पर बहुत जोर दिया जाता है. इस पर आप की क्या राय है?

फिल्म का प्रमोशन न करने का अर्थ यह होता है कि हमें घमंड आ गया है. मैं चरित्र अभिनेता हूं फिर भी मैं ने फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के लिए 140 दिन शूटिंग की थी. इतनी मेहनत करने के बाद यदि हम फिल्म को प्रमोट नहीं करते हैं तो इस से हमारे अंदर का ईगो ही सामने आता है. फिल्म को प्रमोट करने से दर्शकों के बीच अवेयरनैस पैदा होती है. शाहरुख खान की फिल्म है तो सफल होना तय है. इस वजह से हमें ऐसा काम नहीं करना चाहिए जो हमें घमंडी साबित करे. हम प्रमोट करते हुए बताते हैं कि हमारी फिल्म में क्या है. यदि हमारी फिल्म के कंटेंट को दर्शक नहीं देखना चाहता, तो वह थिएटर के अंदर नहीं आएगा. महंगा टिकट खरीद कर उसे अफसोस तो नहीं होगा.

फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के प्रमोशन के लिए तो आप विदेशों में स्लैम टूर करने गए थे?

‘हैप्पी न्यू ईयर’ का सीक्वल बनना है. इसीलिए स्लैम टूर किया गया. 135 लोगों का पूरा ग्रुप गया था. यह हंसीमजाक नहीं है. सिर्फ फिल्म के प्रमोशन के लिए यह टूर नहीं था. हम अमेरिका के गूगल मुख्यालय भी गए. इस स्लैम टूर के दौरान मैं ने डांस किया, कौमेडी की.

अब आप थिएटर को ‘मिस’ करते हैं या नहीं?

बहुत ज्यादा मिस करता हूं.

पाठकों की समस्याएं

मेरी मां की उम्र 70 वर्ष है. पिता के गुजर जाने के बाद उन्हें अकेलापन महसूस होता है. वे किसी सोशल नैटवर्किंग से जुड़ना चाहती हैं जहां वे अपना खाली समय बिता सकें और जरूरतमंदों की सहायता भी कर सकें. कृपया मार्गदर्शन करें. 

अगर आप की मां शिक्षित हैं तो उन से कहिए कि वे छोटे बच्चों को पढ़ाने का कार्य करें. इस से उन का समय तो व्यतीत होगा ही, बच्चों को शिक्षित करने में खुशी भी मिलेगी. आमदनी होगी सो अलग. इस से उन का अन्य लोगों से मेलजोल भी बढ़ेगा. अगर वे खाना पकाने में दक्ष हैं तो कुकरी क्लासेज या कैटरिंग का काम भी घर बैठे कर सकती हैं. मदद के लिए सहायक रख लें. ऐसा करने से आर्थिक मदद तो होगी ही, साथ ही समय का सदुपयोग भी होगा. इस आयु के हर जने को उम्र के इस पड़ाव की समस्याओं के प्रति एहसास भी होना चाहिए क्योंकि ज्यादा काम या तनाव नुकसानदायक भी हो सकता है.

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मैं विवाहित पुरुष हूं. विवाह को 7 साल हो गए हैं. विवाह के बाद बहुत देर से मेरे बच्चा हुआ है. मैं अपनी बीवी और बच्चे को बहुत प्यार करता हूं. समस्या यह है कि दूर के रिश्ते में मेरी एक भाभी हैं. उन के विवाह को 10 वर्ष हो गए हैं. उन के अभी तक कोई संतान नहीं है. डाक्टरों का कहना है कि पति की शारीरिक कमी के कारण वे मां नहीं बन पाएंगी. भाभी चाहती हैं कि संतान उत्पत्ति में मैं उन का साथ दूं ताकि वे मां बनने का सुख प्राप्त कर सकें. मैं क्या करूं, उचित सलाह दीजिए.

आज के वैज्ञानिक युग में नित नए आविष्कार हो रहे हैं. निसंतानों के लिए संतानप्राप्ति के लिए आईवीएफ जैसी तकनीक उपलब्ध है जिस के सहारे कोई भी दंपती संतानप्राप्ति का सुख पा सकता है. इस के लिए आप किसी आईवीएफ स्पैशलिस्ट से संपर्क करने को कहें. भाभी की मदद का खयाल मन से निकाल दें. यह बेवकूफीभरा कदम होगा जो न केवल आप के व आप की पत्नी के बीच के रिश्ते को उलझाएगा बल्कि आप के भाभी के साथ के रिश्ते को भी कठिन बना देगा व समाज भी इसे गलत निगाह से देखेगा.

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मैं 20 वर्षीय अविवाहित हूं. मैं जहां नौकरी करता हूं वहां मेरे साथ एक अन्य लड़की भी कार्य करती है. मैं उस से प्यार करने लगा हूं. समस्या यह है कि मैं हिंदू धर्म का हूं और वह लड़की मुसलिम धर्म की है. वह मेरे धर्म के बारे में कुछ नहीं जानती. मैं जब भी उस की ओर देखता हूं वह भी मुड़मुड़ कर मेरी तरफ देखती है. मैं उस से अपने प्यार का इजहार करने से डरता हूं. मुझे लगता है कि कहीं वह सब के सामने मना न कर दे या उसे बुरा लगे और वह मेरे साथ कोई गलत व्यवहार कर दे. मैं क्या करूं, राय दीजिए.

प्यार के बीच धर्म कहां से आ गया. अगर आप उसे पसंद करते हैं, चाहते हैं तो उस से अपने प्यार का इजहार कीजिए. उस की भावनाओं को जानिए कि क्या वह भी आप से प्यार करती है या सिर्फ दोस्ती चाहती है. अगर उस की तरफ से जवाब हां में मिलता है तो बात को आगे बढ़ाइए. अपने परिवार वालों से इस बारे में बात कीजिए. बिना लड़की की फीलिंग्स जाने खयाली पुलाव मत पकाइए.

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मैं विवाहिता हूं. विवाह को 6 वर्ष हो चुके हैं. विवाह के बाद कुछ दिनों तक तो सब ठीक रहा लेकिन बाद में पता चला कि वे विवाह से पूर्व शराब बहुत पीते थे. उन्होंने अब फिर से शराब पीनी शुरू कर दी है. मैं मना करती हूं, समझाती हूं तो मानते नहीं और मुझ पर शक अलग करते हैं, मारपीट करते हैं. मैं और वे आंगनवाड़ी में कार्य करते हैं. वे अपनी आय का कोई हिसाब नहीं देते. मैं एक अनाथ हूं. दुनिया में मेरा कोई और नहीं है. मैं अलग रहने के लिए कहती हूं, तो अलग रहने नहीं देते. बहुत परेशान हूं. क्या करूं, राय दीजिए.

आप के केस में अच्छी बात है कि आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं. नशा किसी भी खुशहाल परिवार को बरबाद करने का कारण बनता है. यही आप के साथ भी हो रहा है. आप अपने पति की नशे की लत को छुड़ाने के लिए किसी नशामुक्ति केंद्र से संपर्क करें. उन से खुल कर सीधेसीधे बात करें. अगर मानते हैं तो ठीक है वरना कानूनी कदम उठाने की धमकी दीजिए. ऐसा करने से वे अवश्य राह पर आ जाएंगे.

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मैं 22 वर्षीय विवाहिता हूं. विवाह को 2 वर्ष होने वाले हैं. समस्या यह है कि मैं एक संयुक्त परिवार में रहती हूं जिस में रहने के नाम पर केवल 2 कमरे हैं और सदस्य काफी अधिक हैं. एक कमरे में मेरे जेठ, जेठानी और उन का बच्चा सोता है जबकि दूसरे कमरे में मैं, मेरे पति, सास, ससुर व ननद सोती है जिस की वजह से हमारे बीच पतिपत्नी का रिश्ता भी नहीं बन पाया है. मैं पति से कई बार अलग कमरे के लिए कह चुकी हूं पर वे मेरी बात को टाल देते हैं. मैं ने इस बारे में सास से भी बात की है. वे भी मेरी बात को टाल देती हैं. इसी वजह से हम परिवार बढ़ाने के बारे में भी नहीं सोच पा रहे हैं. क्या करूं, समझ नहीं आता. सलाह दीजिए.

यह सरासर आप के साथ ज्यादती है. आप इस बारे में खुल कर सख्त शब्दों में घर वालों से बात कीजिए. सास आप की बात को इसलिए अनदेखा कर रही हैं क्योंकि वे इस से प्रभावित नहीं हैं. जिंदगी आप की प्रभावित हो रही है, इस के लिए आप को ही कदम उठाना होगा. आप पति से साफसाफ कहिए कि वे अलग कमरे का इंतजाम करें वरना मैं मायके चली जाऊंगी. वे इसे बहुत दिनों तक बरदाश्त नहीं कर पाएंगे, साथ ही घर वाले भी समाज के सामने यह बात जाहिर नहीं होने देना चाहेंगे. इसलिए वे जरूर आप की बात सुनेंगे और हल निकालेंगे.  

फिर अलापा गया हिंदू राष्ट्र का राग

आज तक भारत एक राष्ट्र नहीं बन सका और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के प्रमुख हैं कि वे भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का राग अलापे जा रहे हैं. जब भी भारत में केंद्र या किसी राज्य में भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा की सरकार बनती है तो आरएसएस इसी तरह की मांग करना शुरू कर देता है.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का हिंदू राष्ट्र का राग इसलिए बेतुका है क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, और उस का संविधान धर्मनिरपेक्षवादी है. उस में कहा गया है कि कोई भी धर्म राज्य का धर्म नहीं बनेगा. नेपाल कुछ साल पहले तक हिंदू देश था, जिस पर आरएसएस को बहुत गर्व था, पर अब वह लोकतांत्रिक राष्ट्र बन गया है. ऐसे में आरएसएस लोकतांत्रिक भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का दिवास्वप्न क्यों देख रहा है? वह अच्छी तरह जानता है कि भारत में वर्णवाद से पीडि़त जातियों में अस्मिता और स्वतंत्रता की चेतना लगातार एक बड़ी सामाजिक क्रांति की चेतना बनती जा रही है, जो भारत को कभी हिंदू राष्ट्र नहीं बनने देगी.

बेतुका है राग

हिंदू राष्ट्र का राग इसलिए भी बेतुका है क्योंकि हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज में ही एक राष्ट्र की भावना नहीं है. इसे थोड़ा समझ लिया जाए. राष्ट्र का अर्थ है कौम. यह अंगरेजी के ‘नेशन’ शब्द का अनुवाद है, ‘कंट्री’ शब्द का नहीं. उर्दू में ‘नेशन’ के लिए ‘कौम’ शब्द का इस्तेमाल होता है. हिंदी में ‘राष्ट्र’ शब्द से ‘देश’ का भ्रम होता है, जबकि यह गलत है. इस का सही अर्थ ‘कौम’ है. अगर हम हिंदी में राष्ट्र का दूसरा शब्द तलाशेंगे तो वह ‘नस्ल’ ही हो सकता है. वैसे भी राष्ट्रवाद और नस्लवाद में कोई खास अंतर नहीं है. हिंदू राष्ट्र, हिंदू कौम या हिंदू नस्ल कुछ भी कह लीजिए, मतलब एक ही है.

गौरतलब सवाल ये हैं कि क्या हिंदू धर्म एक कौम या नस्ल का धर्म है? क्या हिंदू संस्कृति एक ही कौम या नस्ल की समान संस्कृति है? क्या हिंदू समाज एक ही कौम या नस्ल का समतावादी समाज है? कोई भी सामान्य हिंदू इन तीनों सवालों का जवाब हां में नहीं दे सकता. हिंदू धर्म में ब्राह्मण श्रेष्ठता का राग है, हिंदू संस्कृति में ब्राह्मण श्रेष्ठता का दंभ है और हिंदू समाज में हजारों जातियों का असमान विभाजन है. ऐसे में इस पागलपन का क्या इलाज है कि भारत हिंदू राष्ट्र बन जाएगा? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र बनाया जाएगा, ब्राह्मण श्रेष्ठता का, ब्राह्मण वर्चस्व का या ब्राह्मण शासन का?

सनातन धर्म के उत्थान का समय आ गया है, क्या मतलब है? क्या आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज सब बेकार के सुधार थे? हैरत की बात है कि अब आर्य समाजी इस का प्रतिरोध नहीं कर रहे जबकि सनातन धर्म का उत्थान पौराणिक धर्म का ही उत्थान है. सनातन धर्म का मतलब वैदिक या उपनिषेदिक धर्म का उत्थान नहीं है. वह रामायण व महाभारत के मिथकीय इतिहास को ही भारत का असली इतिहास मानता है और पौराणिक धर्म को ही सनातन धर्म मानता है. आर्य समाज पौराणिक धर्म का खंडन करता है, फिर वह संघ के सनातन धर्म का विरोध क्यों नहीं कर रहा, आखिर क्यों?

भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का काम केवल आज हो सकता है, फिर कभी नहीं. इस का क्या यह मतलब नहीं है कि आज देश में संघ की सरकार है, वे निर्भय हो कर हिंदू राष्ट्रवाद के संविधानविरोधी मिशन को आगे बढ़ा सकते हैं? पर, यह काम आसान नहीं है. इस के लिए भारत के संविधान को बदलना होगा, जो संघ के वश की बात नहीं है. लेकिन हां, संघ अपने इस मिशन से हिंदू राष्ट्रवाद का धर्मोन्माद जरूर बनाए रख सकता है पर वह आगे चल कर उस की राजनीति इकाई भाजपा के लिए यह आत्मघाती साबित होगा. दूसरे धर्म वालों के प्रति नस्लवादी नफरत फैला कर हिंदू राष्ट्रवाद को कायम करना देश को नष्ट करेगा.

नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा

नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा की साझेदारी वैसी ही लग रही है जैसी जवाहरलाल नेहरू और निकिता ख्रुश्चेव की एक जमाने में थी. जिस तरह से जवाहरलाल नेहरू रूसियों के आगेपीछे बिछे फिरते रहे थे, आज नरेंद्र मोदी अमेरिकियों को गले लगा रहे हैं. 1950 के दशक में देश के कम्युनिस्टों ने भारत को रूसी खेमे में धकेला था और 2010 के दशक से उद्योगपति व अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के अमीर भारत को अमेरिकी खेमे में खींच रहे हैं.

रूसी हनीमून ने भारत का बहुत नुकसान किया. अंगरेजी शासन के तुरंत बाद भारत की आर्थिक नीतियों ने पलटा खाया और भारतीय उद्योगपति सरकारी अफसरों व नेताओं के गुलाम हो गए. कोटा लाइसैंस यानी परमिटराज में कुछ ने तो पैसा बनाया पर ज्यादातर जनता का पैसा निखट्टू, निकम्मे भ्रष्ट सरकारी अफसरों व सरकारी उद्योगों को नष्ट करने के लिए सौंप दिया गया. 1947 का ठीकठाक देश 1970 तक कंगाल हो गया. 2010 के दशक का देश कोई महान काम कर रहा हो, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता पर फिर भी सरकारी शिकंजों की ढील के बाद हमारी सस्ती और अर्धकुशल लेबर फोर्स के कारण देश खासी प्रगति कर रहा है. अब, क्या हम पूरी तरह अमेरिकी कंपनियों और अमेरिकी बैंकरों के गुलाम हो जाएंगे?

बराक ओबामा अकेले भारत नहीं आए, कई जहाज भर कर अमेरिकी उद्योगपति भी आए और भारतीय उद्योगपति ओबामा की आड़ में उन से मिलने के लिए घंटों कतार में लगे रहे. वे बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स की तरह देश से किसी बीमारी या गरीबी को दूर करने के लिए अमेरिका से नहीं आए, वे अपनी कंपनियों की बैलेंस शीटों को मोटा करने के लिए आए. उन्हें भारत की गंदगी, गरीबी या गिरीपिटी हालत से कोई हमदर्दी नहीं है. बराक ओबामा से दोस्ती का अर्थ अगर भारत की जनता में स्वतंत्रताओं, परिश्रम, नई तकनीक को अपनाना, अनुशासन, स्वच्छ वातावरण, साफगोई होता तो बात दूसरी होती पर कोई राष्ट्रपति ये चीजें उपहार में दूसरे देश में नहीं देता. इन्हें तो उस देश की जनता ही देती है. बराकनरेंद्र दोस्ती में इस के आदानप्रदान के लक्षण कहीं नहीं दिख रहे. नमस्ते कहना देश को अपनाना नहीं है, देश को फुसलाना है ठीक वैसे ही जैसे रूस ने राजकपूर की फिल्मों को अपनाकर फुसलाया था.

अमेरिका आज खुद सामाजिक संकटों में घिरा है. वहां अमीर-गरीब के बीच की खाई बहुत चौड़ी हो गई है. अश्वेत राष्ट्रपति के होने के बावजूद वहां अश्वेतों में भय है. रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक गर्भपात व सेम सैक्स विवाहों का विरोध कर धर्म थोप रहे हैं. स्कूलों में जबरन बाइबिल पढ़ाई जा रही है कि दुनिया 7 दिनों में बनी. वह अमेरिका आज हमारे किस काम का जो अपना घर ठीक न कर पा रहा हो. वह बराक ओबामा हमारे किस काम का जिस की पार्टी हाल में संसद के दोनों सदनों में बहुमत खो चुकी हो. हम इस तमाशे को किस बात का भाव दे रहे हैं.

 

ओबामा की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत की यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हिंदू कट्टरता में विश्वास करने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार को पूरा समर्थन व सहयोग देने का, बराबरी का, आर्थिक समझौतों का भरोसा तो दिलाया पर साथ ही जातेजाते यह भी कह गए कि भारत देश का संविधान धर्म की स्वतंत्रता देता है और धर्म के नाम पर अनुच्छेद 25 के अनुसार किसी से भेदभाव नहीं किया जा सकता.

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साफ जता दिया कि वे नई सरकार के धार्मिक कट्टरता फैलाने वाले गुपचुप प्रोग्राम से अनभिज्ञ नहीं हैं और उन्हें विकास व गुड गवर्नेंस के पीछे धार्मिक व्यापार को फैलाने की चेष्टा की जानकारी है. पर वे खुल कर यह नहीं कह पाए कि यह अनुच्छेद 25 असल में महिलाओं और परिवारों पर एक भारी दबाव डालने वाला भी सिद्ध हो रहा है. भारतीय संविधान का धार्मिक स्वतंत्रता जैसा सिद्धांत दुनिया के बहुत देशों में है पर हर देश में धर्म के व्यापारियों के हाथ में यह आम लोगों को बरगलाने वाला महाशास्त्र सा बना हुआ  है जिस का विरोध करना या जिस की पोल खोलने का हक दूसरे धर्म वालों, सरकारों, अदालतों को तो छोडि़ए, उसी धर्म के विचारकों व सुधारकों को भी नहीं.

बराक ओबामा ने मोदी सरकार को चेतावनी दी है तो वहीं उन्होंने हिंदू व मुसलिम कट्टरपंथियों को यह एहसास कराया है कि वे सदियों पुराने धार्मिक रीतिरिवाजों को बिना संकोच, बिना किसी नियंत्रण के अपने भक्तों पर थोपते रहे और अपनी पोल खोलने वालों के मुंह पर ताले जड़ते रहे हैं. धर्म का अधिकार जो भारतीय संविधान देता है, किस काम का, किस के लिए और कौन इस का फायदा उठाता है? तिलक लगाना, टोपी पहनना, पूजापाठ करना, दान देना किस भक्त को कौन सा लाभ देते हैं कि सरकार व संविधान इन को थोपने वालों को संरक्षण दे और लोकतंत्र के महारक्षक अमेरिका के राष्ट्रपति इस का समर्थन करें?

इस देश में औरतों पर अत्याचार, उन के बलात्कार, बलात्कार के बाद उन्हें दोषी मानना, विवाह पर दहेज का बोझ, लड़की वालों का बारबार सिर झुकाना, औरतों को पूजास्थलों में धकेलना, विधवाओं को वृंदावन जैसी जगह छोड़ना, उन्हें सफेद कपड़ों में रहने देना, तलाक होने पर उन्हें ही दोषी करार देना सब धर्म की ही तो देन हैं. धर्म ने देश को ही नहीं, सारी दुनिया को खेमों में बांट दिया है. आज एक बार फिर नए साम्राज्य रुपएपैसे और शक्ति के लिए नहीं, धर्म के महत्त्व के नाम पर बन रहे हैं. पोप रोमन कैथोलिक साम्राज्य बनाने में लगे हैं; रूस के पुतिन और्थोडौक्स रूसी चर्च को दंभ दे रहे हैं; बोको हरम, इसलामिक स्टेट और तालिबानी कट्टर इसलाम को; तो भारत में हिंदुत्व का डंका बज रहा है. ये सब हर घर को धर्म का गुलाम बनाने में लगे हैं. धर्म की तरफदारी बराक ओबामा आखिर क्यों कर गए?

भारत अमेरिकी रिश्तों को क्या मिलेगी नई दिशा?

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के तीन दिवसीय दौरे ने भारतअमेरिकी रिश्तों को नई ताजगी दी है. इस दौरे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीना और भी चौड़ा हो गया है क्योंकि उन का रुतबा और कूटनीतिक प्रभाव भी बढ़ा है, देश को राजनीतिक फायदा भी होगा. दोनों देशों के बीच हुए आपसी करारों से होने वाले नफानुकसान को ले कर बहस चल पड़ी है. विरोधियों, खासतौर से वामपंथी परमाणु, व्यापार, जलवायु परिवर्तन जैसे समझौतों को ले कर मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि ये गरीबों पर भारी पड़ेंगे पर भाजपा और कौर्पोरेट जगत में खुशी की लहर है. अमेरिकाभारत की बढ़ती नजदीकी पड़ोसी पाकिस्तान और चीन को रास नहीं आ रही है.

25 जनवरी को व्यापारियों, अधिकारियों के बड़े लावलश्कर के साथ दिल्ली पहुंचे बराक ओबामा का राष्ट्रपति बनने के बाद दूसरा भारत दौरा था. इंडिया गेट पर हुई गणतंत्र दिवस परेड को देखने के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा का मकसद रक्षा, पर्यावरण, कारोबार जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देना रहा. भारत ने अमेरिकी उद्योग जगत के लिए लाल कालीन बिछाने में कोईर् कसर नहीं छोड़ी. मोदीओबामा में रक्षा, व्यापार, वाणिज्य तथा जलवायु परिवर्तन जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति हुई है. परमाणु जवाबदेही कानून में देश के भीतर परमाणु दुर्घटना होने पर कौन उत्तरदायी होगा, मुद्दे के चलते दोनों देशों के बीच जौर्ज बुश और मनमोहन सिंह के असैन्य परमाणु करार के रास्ते में ठहराव आ गया था.

अब इस यात्रा से टूटी कड़ी फिर जुड़ी है जो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्ंिलटन के कार्यकाल में शुरू हुई थी और जिस का चरम 2008 में परमाणु समझौता था. असल में भारतीय उत्तरदायित्व कानून परमाणु दुर्घटना के मामले में सीधे तौर पर आपूर्तिकर्ता यानी अमेरिकी कंपनियों को जवाबदेह ठहराता जबकि फ्रांस और अमेरिका ने भारत से कहा कि वह वैश्विक नियमों का पालन करे. अब मोदीओबामा में अंतिम सहमति यह जवाबदेही खत्म करने पर हो गई तथा निगरानी व्यवस्था को भी ओबामा ने अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए पीछे खींच लिया. अब कनाडा की तरह अमेरिका भी अंतर्राष्ट्रीय निगरानी एजेंसी आईएईए की जांच भर से खुद को संतुष्ट कर लेगा. इस सहमति पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हो रही है.

गुजरात और आंध्रप्रदेश  में रिएक्टर लगाने को तैयार बैठी अमेरिकी कंपनियां वेस्ंिटगहाउस और जीई हितैची अब निश्ंिचत हो कर अपना काम शुरू कर पाएंगी. अमेरिकी परमाणु उद्योग के अमेरिका में संयंत्र लगाने में अड़चनें आ रही थीं. अब वह भारत में अपना बोझ डाल सकेगा. परमाणु ऊर्जा के अलावा रक्षा क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच समझौते हुए हैं. कई उपकरणों का उत्पादन भारत में शुरू करने की योजना भी बनी है. अमेरिका दुनिया के बड़े विध्वंसक हथियार बनाने वालों में से है और वह उन की खपत के लिए ग्राहक ढूंढ़ रहा है. अमेरिकी कंपनी जीई हितैची और तोशीबा वेस्ंिटगहाउस के परमाणु रिएक्टरों की लागत 25 से 30 करोड़ के बीच की है जबकि घरेलू तकनीक से बने रिएक्टरों पर प्रति मेगावाट करीब 7 करोड़ रुपए खर्र्च आता है.

विश्व के तमाम ज्वलंत मुद्दों पर भी दोनों देशों के बीच सहमति दिखी. अफगानिस्तान, आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन तथा सुरक्षा परिषद के मुद्दों पर दोनों देशों ने एक जैसे विचार रखे हैं. ओबामा के साथ आए उद्यमियों का बड़ा काफिला भारत के साथ आर्थिक सहयोग में अमेरिकी दिलचस्पी को जाहिर करता है. यह स्वाभाविक है क्योंकि अमेरिका पिछले सालों से आर्थिक मंदी की मार से अछूता नहीं रहा. अब भी वह पूरी तरह उबर नहीं पाया है. वहां बेरोजगारी अब भी संकट बनी हुई है. ऐसे में अमेरिकी कारोबारी अपने उत्पाद के लिए नए बाजार की तलाश में हैं. अमेरिकी उद्यमियों द्वारा भारत में निवेश की संभावना कम ही थी क्योंकि यहां के कानून जटिल हैं. हालांकि मोदी सरकार ने बीमा, बैंक, प्रतिरक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में विदेशी निवेश के लिए दरवाजे और ज्यादा खोलने के साथ ही विदेशी पूंजी का रास्ता साफ करने के लिए कई कदम उठाए हैं. ‘मेक इन इंडिया’ के अपने नारे के जरिए विदेशी व्यापारियों को लुभाने की कोशिश की है. अब मेड इन इंडिया के साथ मेड बाई अमेरिका बन जाएगा.

उम्मीदें और आशंका

ओबामा की भारत यात्रा से उम्मीदों के अलावा कुछ आशंकाएं भी हैं. हथियारों की खरीद और साझा विकास के लिए अमेरिका किस हद तक भारत को तकनीक और विशेषज्ञता देगा, इस मामले में रूस भारत का भरोसेमंद सप्लायर रहा है. हालांकि रूस ने सदा महंगा व खराब सामान दिया है. भारत को दोनों देशों के बीच संतुलन कायम रखना होगा. जलवायु परिवर्तन पर चीन और अमेरिका ने जैसा समझौता किया है वैसा ही करने पर दबाव भारत पर पड़ रहा है. पर भारत आर्थिक विकास की जरूरतों की अनदेखी नहीं करना चाहता. बौद्धिक संपदा अधिकारों पर भारत कितनी नरमी दिखा पाएगा, यह देखना होगा. भारत दवाओं और अन्य मूलभूत जरूरतों को नजरअंदाज नहीं कर सकता.

अमेरिका ने भारत के नियामक और कर व्यवस्था में लगातार सरलता की बात उठाई है. प्रधानमंत्री को जीएसटी, प्रत्यक्ष कर संहिता जैसे मसलों पर राज्यों को साथ लाना होगा. पड़ोसी देश पाकिस्तान आतंक फैलाने की योजना बना कर कई ऐसे प्रयास कर रहा था कि ओबामा का दौरा रद्द हो जाए लेकिन भारत दौरे से पहले बराक ओबामा ने पाकिस्तान को यह साफ संकेत कर दिया था कि वह भारत में आतंक फैलाना बंद करे या फिर अंजाम भुगतने को तैयार रहे. अमेरिका और भारत मिल कर क्या कर सकते हैं, यह अस्पष्ट है पर अमेरिका आर्थिक सहायता पाकिस्तान को न दे तो वहां के अमीरों की हालत पतली हो जाएगी.

ओबामा की भारत यात्रा पर पड़ोसी देशों में अपेक्षित प्रतिक्रियाएं हुईं. पाकिस्तान ने अपने सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ को चीन के दौरे पर भेजा. चीन सरकार यह सोचती है कि अमेरिका और भारत मिल कर उसे घेरने की रणनीति बना रहे हैं, इसलिए चीन ने औपचारिक रूप से इस यात्रा में परमाणु सहयोग को ले कर आलोचना की है. चीन के सरकारी मीडिया द्वारा अमेरिकाभारत के नए रिश्तों को चीन के उभार को रोकने की रणनीति करार दिया गया. चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने कहा है कि पश्चिम ने एक निश्चित तरीके का चिंतन पैदा किया है और इसे बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जा रहा है. वह निहित स्वार्थ से चीनी ड्रैगन और भारतीय हाथी को स्वाभाविक विरोधी मानता है.

अखबार में भारत को आगाह करते हुए कहा गया है कि पश्चिम भारत को अपने पड़ोसी देशों की तरफ से पेश खतरों के लिए पूरी तरह तैयार होने के लिए उकसा रहा है और जाल बिछाने की कोशिश की जा रही है. हालांकि भारत नहीं चाहता पर पश्चिमी प्रभाव से वह उधर फिसल रहा है. दक्षिण और पूर्वी चीन सागर को ले कर भारतअमेरिका के साझे बयान से भी चीन की त्योरियां चढ़ गईं. वह चीन सागर को अपनी ऐतिहासिक बपौती मानता है जबकि भारतअमेरिका वहां अंतर्राष्ट्रीय कानूनों वाली व्यवस्था के हिमायती हैं. नरेंद्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तब उन की विदेश नीति को ले कर कई प्रकार की आशंकाएं थीं पर बहुत कम समय में ही मोदी ने अमेरिका, चीन, जापान, रूस,  नेपाल, भूटान और आस्ट्रेलिया जैसे देशों से भारत के संबंधों पर टेप लगवा लिया है.

एक वक्त वह था जब गुजरात दंगों के बाद अमेरिका ने मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया था. इन दंगों को ले कर उन के बारे में कई तरह के संशय थे. लेकिन धीरेधीरे चुनावी जीत और बतौर प्रधानमंत्री उन की विदेश नीतियों के चलते मोदी की छवि सकारात्मक रुख लेने लगी. कुछ मामलों के चलते नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों को ले कर आशंकाएं थीं पर पिछले दिनों मोदी की अमेरिकी यात्रा और अब ओबामा के दौरे से जिस तरह का माहौल बना है उस से उन तमाम आशंकाओं का समाधान हो गया है. अब वही अमेरिका मोदी की तारीफ करते नहीं थक रहा है.

मोदी ने जिस तरह से ओबामा के सामने भारत को पेश किया है उस से विश्वास और उम्मीदों का  माहौल बना है. आज विकसित देशों में केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था तरक्की कर रही है. भारत की अर्थव्यवस्था के भी तेजी से विकसित हो रहे देशों में अव्वल रहने की उम्मीदें जताई जा रही हैं. दक्षिण एशिया ही नहीं, एशिया, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में दोनों देशों के सहयोग का रणनीतिक व सामरिक दृष्टि से महत्त्व जगजाहिर है. आशा की जा सकती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के इस दौरे के दौरान हुए परस्पर समझौते और वादे सकारात्मक व दूरगामी नतीजे देंगे.

बिंब प्रतिबिंब

ऐश की खुशी का राज

यह फैसला जरा देरी से आया वरना ऐश्वर्या राय बच्चन आज से ज्यादा खुश होतीं. दरअसल, मिस वर्ल्ड सौंदर्य प्रतियोगिता की अध्यक्ष जूलिया मार्ले ने अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से बिकिनी राउंड हटाने का निर्णय किया है. उन के मुताबिक, इस राउंड से न तो महिलाओं और न ही हम में से किसी का फायदा होता है, ऐसे में इस को हटाया जाना ही उचित था. जूलिया के इस फैसले का स्वागत करते हुए ऐश्वर्या कहती हैं कि यह बिलकुल ठीक फैसला लिया गया है. जब 1994 में वे इस प्रतियोगिता में बतौर प्रतियोगी भाग ले रही थीं तो बिकिनी के लिहाज से उन की बौडी सर्वश्रेष्ठ नहीं थी, ऐसा मानती हैं खुद ऐश्वर्या, बावजूद इस के उस साल मिस वर्ल्ड का खिताब उन्होंने ही जीता. ऐसे में वे बिकिनी राउंड को निर्णायक भी नहीं मानतीं.

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लव जिहाद और करीना

विश्व हिंदू परिषद की महिला शाखा दुर्गा वाहिनी ने लव जिहाद के मुद्दे को फिर से हवा दी है. इस बार इस संगठन ने निशाना बनाया है बौलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर को. संगठन ने एक कैंपेन के तहत लव जिहाद के खिलाफ आवाज उठाते हुए एक पत्रिका जारी की है. यहां तक तो ठीक था लेकिन कवर पर करीना कपूर की विवादास्पद तसवीर लगा कर संगठन सस्ती लोकप्रियता बटोरने पर आमादा दिखता है. तभी तो पत्रिका के कवर पर करीना कपूर की तसवीर में आधा चेहरा हिंदू महिला का, जिस में उन के माथे पर सिंदूर है जबकि आधे चेहरे पर बुरकानुमा नकाब है. वीएचपी नेता कोर्टकचहरी का विकल्प होने की बात भले ही करते हों लेकिन बिना इजाजत, करीना की तसवीर का इस्तेमाल करना जायज नहीं ठहराया जा सकता.

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परदे पर बाल ठाकरे

इन दिनों चाहे सियासी हस्ती हो या धार्मिक गुरु, सब को फिल्मी परदे पर दिखने का शौक चढ़ा है. डेरा सच्चा सौदा के विवादास्पद प्रमुख बाबा रामरहीम खुद के पैसे और अभिनय से सजी फिल्म ‘मैसेंजर औफ गौड’ ले कर आए हैं वहीं, शिवसेना प्रमुख रहे बाल ठाकरे पर एक मराठी फिल्म बन चुकी है. ‘बालकडू’ नाम की इस फिल्म का पिछले दिनों म्यूजिक रिलीज इवैंट हुआ. इस दौरान बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे व शिवसेना सांसद संजय राउत भी मौजूद थे. फिल्म में बाल ठाकरे की पुरानी राजनीतिक रैलियों से असल आवाज उठा कर वौयसओवर के तौर पर डाली गई है जो फिल्म में समयसमय पर सुनाई देती है.

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बाफ्टा में लंच बौक्स

इरफान खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी व निमरत कौर अभिनीत फिल्म ‘द लंच बौक्स’  ने एक और उपलब्धि हासिल करते हुए ब्रिटेन के औस्कर कहे जाने वाले अवार्ड समारोह बाफ्टा (ब्रिटिश एकेडमी फिल्म ऐंड टैलीविजन आर्ट्स) 2015 में नामांकन हासिल कर लिया है. बाफ्टा में ‘द लंच बौक्स’ को ‘बैस्ट फौरेन लैंग्वेज’ श्रेणी में नौमिनेट किया गया है. निर्देशक रितेश इसे अपनी सब से बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहते हैं कि दुनिया की बेहतरीन फिल्मों के बीच मेरी फिल्म को नौमिनेशन मिलना मेरे व टीम के लिए गर्व की बात है. विदित हो कि इस कैटेगिरी में ‘द लंच बौक्स’ के साथ पोलैंड-डेनमार्क, रशिया, ब्राजील व बेल्जियम की फिल्में टक्कर में हैं.

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