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यात्री सुरक्षा के लिए ओला की पहल

टैक्सी सेवा प्रदाता कंपनियां पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्रों में टैक्सी ड्राइवरों की आपराधिक वारदात के कारण चर्चा में रही हैं. दिल्ली के लोगों के लिए, खासकर महिला सुरक्षा के लिए टैक्सियों का सफर खतरनाक सेवा के रूप में सामने आया था. टैक्सियों में छेड़छाड़ की घटनाओं के बढ़ने से टैक्सी महिलाओं के लिए अत्यधिक असुरक्षित सेवा मानी जाने लगी थी लेकिन ओला जैसी कंपनियों ने अपनी सेवाओं में तरहतरह के तकनीकी सुधार कर के ग्राहकों का भरोसा जीतने का प्रयास किया था. इस क्रम में टैक्सी सेवा प्रदाता ओला ने 2 करोड़ डौलर खर्च कर टैक्सी सेवा में सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ाने का फैसला किया.

इस निधि का इस्तेमाल ओला टैक्सी द्वारा यात्रियों की सुरक्षा के उपाय पर खर्च किया जाएगा. यात्री सुरक्षा के लिए ओला टैक्सी के ड्राइवर के मोबाइल पर सब से पहले ऐसा मास्क लगाया जाएगा कि टैक्सी ड्राइवर ग्राहक से बात तो कर सकेगा लेकिन उसे ग्राहक का मोबाइल नंबर नहीं दिखाई देगा. उस से अपराधी अथवा शातिर ड्राइवर मोबाइल नंबर का इस्तेमाल आपराधिक वारदात के लिए नहीं कर सकेगा और न ही वह ऐसी प्रकृति के किसी अपराधी को ग्राहक का मोबाइल नंबर दे सकेगा. कंपनी का कहना है कि इस से ग्राहक की निजता की सुरक्षा के संरक्षण के साथ ही ड्राइवर पर बराबर नजर भी रखी जा सकेगी. ड्राइवर की बातचीत और उस के व्यवहार पर ओला प्रशासन की नजर होगी और साथ ही, ड्राइवर की मोबाइल कौल पर खर्च होने वाले पैसे को भी बचाया जा सकेगा. कंपनी का कहना है कि उसे अगले वर्ष मार्च तक टैक्सी सेवा में सुधार के लिए 2 करोड़ डौलर यानी करीब 135 करोड़ रुपए खर्च करने हैं.

 

लिव इन पार्टनर्स

अदालतें और सरकार लिव इन पार्टनरों को शादीशुदा सा स्तर देने में लगी हैं. अगर 2-4 साल साथ रह चुके जोडे़ में से औरत अदालत का दरवाजा खटखटाती है कि उसे गुजारा भत्ता दिया जाए तो अदालतें विवाह न होने पर भी औरत को गुजारे के लिए पैसे देने को पुरुष को मजबूर करने लगी हैं. यह दोतरफा हथियार है. अच्छा है कि औरत को कोई पुरुष कई साल तक इस्तेमाल करने के बाद धक्के दे कर घर से यों ही निकाल नहीं सकता. पुरुष को अपने काम के अंजाम के प्रति सतर्क रहना होगा. लिव इन पार्टनर के साथ रहने का खमियाजा भुगतने का डर उसे बहुत से समझौते करने को मजबूर करेगा. वहीं, यह औरतों के लिए भी घातक है. बहुत से सक्षम पुरुष औरतों को घर में पनाह दे देते हैं. उन्हें बिना विवाह की औपचारिकताओं और बंधनों के कोई सहयोगी मिल जाता है. लाखों अकेली रहती अविवाहिताओं, परित्यक्ताओं, तलाकशुदाओं और विधवाओं के लिए यह वरदान है कि कोई साथी उन्हें मिल रहा है जो लगभग बराबरी का सा दरजा दे रहा है. लेकिन पुरुष अब औरतों को पनाह देने में सावधानी बरतेंगे.

अकेलापन और आर्थिक तंगी कितना परेशान करती है, यह भुक्तभोगी महिलाएं ही जान सकती हैं. अकेली औरत को धन मिलना कठिन होता है और उन्हें राक्षसरूपी पुरुषों की लोलुप नजरों से बचना भी कठिन होता है. बच्चों वाली अकेली औरतें भी, बच्चों के बड़े हो जाने के बाद, अपने अकेलेपन से भयभीत हो जाती हैं. एक पुरुष जो कानूनन चाहे पति न हो, किसी पत्नी का पति हो, अगर साथ रहने लगे तो जीवन के ठूंठ में 2-4 हरे पत्ते झलकने लगते हैं. पर अगर अदालतों और सरकार ने उन पुरुषों पर जबरन कुछ जिम्मेदारियां लादीं तो यह प्यार का और सहज समझौते का संबंध एक बंधन बन जाएगा और शुरू के दिनों में ही छोटा सा विवाद भी अलग रहने को मजबूर कर सकता है. एक नया साथी ढूंढ़ना और उस का मनमाफिक होना आसान नहीं होता. अच्छा यही रहेगा कि लिव इन पार्टनर्स पर कोई जबरदस्ती न लादी जाए. ज्यादा से ज्यादा सरकार मैत्री करार के तरह का लिव इन पार्टनर को थर्ड पार्टी यानी बच्चों, मातापिता, भाईबहन, इंश्योरैंस कंपनी, पुलिस, अस्पताल आदि के मामलों में कुछ हक बनाने को दे दे, एक प्रगाढ़ मित्र की तरह के. वरना लिव इन पार्टनर्स को वैसा ही माना जाना चाहिए जैसा 2 रूममेटों को माना जाता है जो एकदूसरे के दुखसुख में साथ देते हैं पर अपना स्वतंत्र जीवन बिताने के हकदार होते हैं.

बच्चों के मुख से

मेरी बेटी तीसरी कक्षा में पढ़ती थी. हमारी कालोनी के कुछ बच्चे कौन्वैंट स्कूल में और कुछ डीएवी स्कूल में पढ़ते थे. मेरी बेटी डीएवी स्कूल में पढ़ती थी. शाम को सब बच्चे साथसाथ खेला करते थे. खेल के दौरान सब बच्चे अपनेअपने स्कूल की बातें शेयर किया करते थे. एक दिन मेरी बेटी रोतेरोते घर आई और कहने लगी, ‘‘ममा, आप को मालूम है आज ईशा मौसी का बर्थडे है और मौसी ने हमें नहीं बुलाया.’’ मैं ने उस से कहा, ‘‘नहीं बेटा, आज नहीं है ईशा मौसी का बर्थडे. तुम्हें किस ने बताया?’’ तो वह रोतेरोते बोली, ‘‘रीना ने बताया. उस के स्कूल के सब बच्चे आज बर्थडे में चर्च गए थे.’’ तब माजरा समझ आया क्योंकि उस दिन 25 दिसंबर था, ईसा मसीह का बर्थडे जिसे मेरी बेटी अपनी ईशा मौसी का बर्थडे, समझ बैठी थी. उस की मासूमियत पर मैं मन ही मन मुसकरा उठी.

उषा शर्मा, पौड़ी गढ़वाल (उ.खं.)

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मेरे ससुराल में शादी थी. मैं, अपनी बेटी व अपने देवर की बेटी को डांस के स्टैप्स समझा रही थी. मैं ने कृति (देवर की बेटी) को समझाया कि तुम गणेश बनी हो, तुम्हारे हाथों की मुद्रा इस तरह से रहेगी. कृति थोड़ी देर तक अभ्यास करती रही, फिर हाथों का पोज देख कर पूछने लगी, ‘‘ताईजी, मेरा ‘मुरदा’ तो ऐसे ही रहेगा न?’’ दरअसल वह मुद्रा बोलना चाहती थी पर मुरदा बोल गई. वहां उपस्थित सभी लोगों की हंसी छूट गई.

जया मालू, कोलकाता (प.बं.)

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21 मार्च को सूर्यग्रहण हुआ. उस को ले कर फ्रांस के एक स्कूल में पढ़ने वाला मेरा 4 वर्षीय पोता रुद्र बहुत रोमांचित था. एक दिन स्कूल से आ कर उस ने अपने पापा अर्थात मेरे बेटे से कहा, ‘‘धरती पर ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा धरती की रोशनी को रोक देता है.’’ मेरे बेटे सौरभ ने उस को समझाया, ‘‘बेटा रुद्र, धरती ग्रहण कुछ नहीं होता है, क्योंकि धरती का प्रकाश नहीं होता है. प्रकाश सिर्फ सूर्य का होता है.’’ इस पर रुद्र ने अपने पापा से कहा, ‘‘धरती की भी रोशनी होती है. स्ट्रीट लाइट अर्थात खंभों पर जलने वाली रोशनी.’’ अब मेरे बेटे की हालत देखने लायक थी.

आशा कौशिक, ईस्ट औफ कैलाश (न.दि.)

रिलीज से पहले मुनाफा

आजकल फिल्मों के बाजार में मुनाफा और व्यापार का गणित बेहद उलझा हुआ है. सिनेमाघर में कोई फिल्म नहीं चलती, फिर भी उसे हिट साबित करते हुए आंकड़े दिखा दिए जाते हैं और कोई फिल्म खूब पसंद की जाती है लेकिन उस का बजट और बाकी चीजें दिखा कर उसे नुकसान का सौदा बताते हुए असफल करार कर दिया जाता है. फिल्में रिलीज से पहले ही अपना मुनाफा कमा लेती हैं. अब सोनम कपूर की अगली फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ भी कुछ इसी तरह कमाई के नए आंकड़े रिलीज से पहले ही पेश कर रही है. खबर है कि इस फिल्म के म्यूजिक राइट 17 करोड़ रुपए में बेचे गए हैं. इस लिहाज से यह किसी भी फिल्म के लिए अब तक का सब से महंगा बेचा या खरीदा गया संगीत है. अगर फिल्म का संगीत नहीं चला तो संगीत कंपनी सिर पीट लेगी.

कामयाबी की राह से फिसलते राजपाल यादव

राजपाल यादव बतौर अभिनेता लंबे संघर्ष के बाद एक अदद पहचान बना पाए थे लेकिन गुणवत्तापरक दोचार फिल्में करने के बाद वे कौमेडी फिल्मों के ढर्रे में ऐसे फंसे कि न तो हास्य कलाकार ही रहे न संजीदा अभिनेता. हाल में फिल्म ‘वैलकम बैक’ में नजर आए राजपाल के बेहूदा किरदार से उन की घटती साख को समझा जा सकता है. हालांकि फिल्मों में अभिनय की डगमगाती पारी को संभालने के बजाय राजपाल यादव ने जल्दबाजी में फिल्म निर्देशन व निर्माण का जिम्मा उठा लिया. इस के लिए दिल्ली के एक व्यापारी से करोड़ों रुपए उधार भी ले लिए. लेकिन अपरिपक्वता का नुकसान उन्हें झेलना पड़ा. फिल्म असफल हुई सो अलग. कर्ज चुका न पाने के चलते धोखाधड़ी के इल्जाम लिए बेचारे महीनों जेल की हवा खा कर लौटे हैं. बहरहाल अब वे फिर से चालू फिल्मों में ऊटपटांग किरदार कर के शायद जमापूंजी जोड़ कर कर्ज चुकाने की कोशिश में हों लेकिन एक अभिनेता को इस तरह कामयाबी की राह पर फिसलता देखना अखरता है.

हालांकि इस के लिए राजपाल यादव खुद दोषी हैं. क्योंकि ये सारे फैसले उन्हीं के लिए हुए थे. वरना ‘मैं, मेरी पत्नी और वो’, ‘जंगल’, ‘मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं’ जैसी फिल्मों से चमके राजपाल यादव इस तरह गुमनामी में न खोते. खैर, अच्छी बात है कि बीते दिनों उन्होंने एक अच्छी अंगरेजी फिल्म में काम किया है. काम भले ही नोटिस न हुआ हो लेकिन कोशिश की तारीफ होनी चाहिए. गिरतेसंभलते कैरियर को ले कर उन से हुई बातचीत में इन्हीं तमाम सवालों के जवाब जानने की कोशिश की गई.

हिंदी भाषा की 150 फिल्मों के अलावा मराठी, पंजाबी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ भाषा की फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुके राजपाल यादव अब तक के अपने कैरियर को ले कर बताते हैं, ‘‘वास्तविकता में मेरे अभिनय कैरियर को 27 साल पूरे हो गए हैं. मैं ने नुक्कड़ नाटकों से शुरुआत की थी. कचहरी में खड़े हो कर हम दोचार लड़के डुगडुगी बजाते थे. 100-200 लोग इकट्ठा हो जाते, तो नाटक दिखा देते थे. उस वक्त हम पानी, बिजली या अंधेरे के खिलाफ यह नाटक किया करते थे. फिर कुछ थिएटर के अंदर नाटक किए. उस के बाद मैं अभिनय की ट्रेनिंग लेने पहुंच गया. फिर ‘मुंगेरी के भाई नौरंगी लाल’ से टीवी पर काम करना शुरू किया. उस के बाद फिल्में करने लगा. मुझे अभिनय के हर कोने से गुजरने का मौका मिला है. इसी सोच के तहत 100 फिल्में करने के बाद मैं ने हौलीवुड की फिल्म की. अब क्षेत्रीय भाषा की फिल्म भी कर रहा हूं. शुरू से ही मेरा मकसद रहा है कि मुझे अलगअलग तरह के किरदारों में अलगअलग रूप में लोग देखें व पसंद करें. मैं तो आज भी अपनेआप को विद्यार्थी मानता हूं.’’

अपने कैरियर के टर्निंग पौइंट वाली फिल्मों के बारे में उन का कहना है, ‘‘फिल्म ‘जंगल’ की रिलीज के बाद 1 साल तक मुझे काम नहीं मिला था क्योंकि ‘जंगल’ में मैं ने बड़ी दाढ़ी वाला जंगली सा नैगेटिव किरदार निभाया था. ऐसे किरदार बौलीवुड में होते नहीं हैं. साल भर बाद मुझे सलमान खान के साथ फिल्म ‘मैं ने प्यार क्यों किया’ मिली. इस फिल्म के रिलीज के महज साल भर के अंदर मुझे 16 फिल्में मिलीं. राम गोपाल वर्मा के बाद सलमान खान व सोहेल खान ने मेरी प्रतिभा को पहचाना. उस के बाद सभी ने मुझे सराहा.’’ डांवांडोल होते कैरियर व गलत फिल्मों के चयन पर राजपाल कहते हैं, ‘‘मैं ने अपनी अभिनय क्षमता को साबित करने, कैरियर को संवारने के लिए, घर का चूल्हा जलाने के लिए काफी काम कर लिया पर अब सिर्फ सुकून के लिए फिल्में करना चाहता हूं. अब मैं अपने कैरियर में उन फिल्मों को जोड़ना चाहता हूं जिन्हें करने से मुझे सुकून मिले. जब मुझे सुकून मिलेगा तो मेरी फिल्म देखने वाले दर्शक को भी सौ प्रतिशत सुकून मिलेगा.’’

हास्य किरदारों में बंधने की बात पर उन का मानना है, ‘‘पिछले 15 साल से मेरी कोशिश रही है कि लोग मुझे सिर्फ कौमेडियन न समझें. मैं कौमेडी के अलगअलग आयामों को जीना चाहता हूं. कौमेडियन नहीं बनना चाहता. मुझे कौमेडी करना बहुत अच्छा लगता है. जहां 40 फिल्मों में मैं ने कौमेडी की वहीं हौलीवुड की ‘भोपाल प्रेयर फौर रेन’ जैसी फिल्में भी की हैं. इस में मैं ने जो किरदार निभाया उसे निभाना आसान नहीं था. ‘‘यह एक गंभीर किस्म की मनोरंजक फिल्म है. 1984 में घटी घटना के किरदारों को जीना और इस तरह से जीना कि लोगों को उस पर यकीन हो सके, आसान तो नहीं था. 1984 की घटना के वक्त मैं भोपाल में नहीं था. लेकिन घटना के 30 साल बाद यदि मैं उस त्रासदी को, उस वक्त के इंसान की व्यथा को अपने किरदार के माध्यम से सही रूप में चित्रित कर पाया, तो यह मेरी अभिनय प्रतिभा के चलते संभव हो पाया. मैं अपने पूरे जीवन में अभिनय करना चाहता हूं. मुझे तो मनोरंजन की सेवा करनी है. मेरी लड़ाई उसी को ले कर है.’’

हौलीवुड फिल्म ‘भोपाल प्रेयर फौर रेन’ में अभिनय करने की बात को ले कर चुप्पी के पीछे वे कहते हैं, ‘‘मैं चाहता था कि जब यह फिल्म भारत में रिलीज हो तो मैं इस की चर्चा करूं. हर कलाकार की तमन्ना अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों में काम कर के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम कमाने की होती है. इसलिए मैं ने भी अथक प्रयासों से एक हौलीवुड फिल्म ‘भोपाल प्रेयर फौर रेन’ में अभिनय किया. ‘‘हौलीवुड में महात्मा गांधी पर बनी फिल्म के बाद यह दूसरी गंभीर फिल्म है, जिसे भारतीय पृष्ठभूमि में बनाया गया. अब फिल्म देख चुके लोगों को पता चल चुका है कि इस में मेरे साथ मौर्टिन सीन, मिश्चा बार्टन, कल पेन जैसे हौलीवुड अभिनेताओं ने भी अभिनय किया है. इस में मैं ने शीर्ष भूमिका निभाई है. किसी हौलीवुड फिल्म में शीर्ष भूमिका निभाना मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है.’’

‘मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं’ या ‘मैं, मेरी पत्नी और वो’ जैसी आप की फिल्में समय से पहले रिलीज हो गईं? इस सवाल पर वे कहते हैं, ‘‘मैं ऐसा नहीं मानता. उन फिल्मों की ही वजह से मैं आज 2015 में वह सिनेमा कर पा रहा हूं जो करना चाहता हूं. 2000 में जब मैं फिल्मों में आया, उस वक्त पूरी तरह से ‘कमर्शियल शो मैन शिप’ वाली या पूरी तरह से श्याम बेनेगल या गोविंद निहलानी जैसे फिल्मकारों की कलात्मक फिल्में बना करती थीं. इन दोनों के बीच का कोई सिनेमा नहीं था. पर राम गोपाल वर्मा का मैं धन्यवाद अदा करता हूं कि उन्होंने उस दौर में ‘मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं’ जैसी फिल्म बना कर सिनेमा को नई दिशा दी. उस के बाद ही ‘मैं, मेरी पत्नी और वो’ बनी. फिर ‘खोसला का घोसला’, ‘वैलकम टू सज्जनपुर’, ‘भेजा फ्राय’, ‘तेरे बिन लादेन’ जैसी फिल्में बनीं, जिन्होंने सिनेमा में एक नया जौनर पैदा किया. सिनेमा को एक नई दिशा दी. कुछ नया करने की जद्दोजेहद में लगे कलाकार को अलग ढंग का काम करने का अवसर मिला. इन फिल्मों को दर्शकों ने भी पसंद किया.

‘‘देखिए, ‘दम लगा कर हइशा’ जैसी फिल्म भी हिट है. तो मैं इस बात को ले कर खुश हूं कि 2001 में जिस तीसरी धारा के सिनेमा यानी कि सेमी कमर्शियल फिल्म को ले कर प्रयोग किया था, वह आज सशक्त सिनेमा बन चुका है. ऐसे सिनेमा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होने का मुझे सुअवसर मिला. इसी वजह से अब हम सभी यह कहने लगे हैं कि फिल्में छोटी या बड़ी नहीं होती हैं, फिल्में अच्छी या बुरी होती हैं.’’ हिंदी के अलावा क्षेत्रीय फिल्मों में झुकाव को ले कर राजपाल सफाई देते हुए कहते हैं, ‘‘हिंदी फिल्मों ने मुझे जिंदगी दी तो उसे कैसे नजरअंदाज कर सकता हूं. माना कि अब मैं ने क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में करना शुरू किया है पर मैं ने हिंदी फिल्में करना बंद नहीं किया है. मैं ने सोचा है कि हिंदी फिल्मों के अलावा हर साल क्षेत्रीय भाषाओं की 1-2 फिल्में करता रहूंगा. पर मैं हमेशा उन्हीं फिल्मों में नजर आऊंगा जिन्हें देख कर आप व मेरे फैन खुद कहेंगे कि यह किरदार तो राजपाल यादव को ही करना चाहिए था. ‘‘हिंदी सिनेमा में मुझे देखते हुए 80 प्रतिशत लोग जान चुके हैं. बाकी 20 प्रतिशत लोगों के लिए मैं मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलुगू, कन्नड़ भाषा की फिल्में कर रहा हूं. मेरी कोशिश यह है कि मैं हर उस घर के किचन में भी जाऊं जहां के लोग सिर्फ अपनी मातृभाषा ही जानते व समझते हैं. एक कलाकार के तौर पर मेरा सपना पूरे विश्व के हर किचन में पहुंचना है. इस के लिए मैं प्रयासरत हूं. कितनी सफलता मिलेगी, कह नहीं सकता.’’

सलमान खान सहित कई मराठी कलाकार मराठी भाषा की फिल्मों से जुड़ रहे हैं. इसी वजह से आप भी मराठी भाषा की फिल्म कर रहे हैं? इस बात पर वे इंकार करते हैं, ‘‘बिलकुल गलत. मैं एक कलाकार हूं. कलाकार के तौर पर जब हिंदी में मेरी 100 फिल्में पूरी हो गईं तब मैं ने सोचा कि अब अपने कलाकार मन को विस्तार देना चाहिए. इसलिए मैं ने कई भाषाओं की फिल्मों में अभिनय करना शुरू किया. मराठी भाषा की ‘चश्मेबद्दूर’, ‘राडा रोक्स’ और ‘दगड़ाबाईची चाल’ सहित 3 फिल्में की हैं. आगे भी काम करूंगा.’’ क्षेत्रीय सिनेमा, अंगरेजी व हिंदी में फर्क को ले कर राजपाल यादव कहते हैं, ‘‘बहुत बड़ा अंतर है. क्षेत्रीय सिनेमा में हमें कलाकार के तौर पर बहुत कुछ सीखने को मिलता है. मैं दक्षिण भारतीय सिनेमा की बहुत इज्जत करता हूं. दक्षिण भारत के लोग पूरे पैशन के साथ सिनेमा करते हैं. यही वजह है कि वहां का सिनेमा इतना अच्छा और मजबूत होता है कि बौलीवुड के लोग उस का रीमेक करते हैं. इसी तरह बंगला सिनेमा का भी अपना अलग अस्तित्व है. ‘‘मेरी पहली प्राथमिकता हिंदी फिल्में हैं. पर मैं अपने अंदर के कलाकार को खोजने के लिए बंगला, मराठी, तमिल, कन्नड़ व तेलुगू फिल्में करता रहता हूं. क्षेत्रीय सिनेमा को जीने का जो अवसर मिलता है, उसे मैं खोजना नहीं चाहता. जबकि हौलीवुड के लोगों में एनर्जी बहुत कंट्रोल में होती है, पर उन का सिस्टम बहुत मजबूत होता है. वे प्रोफैशनल तरीके से काम करते हैं.’’

बतर निर्माता व निर्देशक फिल्म बनाना जीवन का गलत कदम रहा? इस पर उन का मानना है, ‘‘फिल्म न बनाता तो कई अनुभवों से वंचित रह जाता. बहुत कुछ सीखने से वंचित रह जाता. सिर्फ कलाकारी करता रह जाता, अदाकारी न कर पाता. अब जीवन भर अच्छी कलाकारी कर पाऊंगा, क्योंकि अदाकारी सीख ली है. तकनीक का ज्ञान हो चुका है.’’ कैरियर की शुरुआत टीवी से हुई थी, पर अब टीवी से दूरी क्यों बना ली है. इस पर वे कहते हैं, ‘‘टीवी अब ऐसा हो गया है, जहां हमें लगातार ज्यादा समय देना पड़ता है. इसलिए नहीं कर पा रहा हूं. जबकि फिल्मों की शूटिंग के लिए हमें एक से डेढ़ माह के लिए बाहर रहना पड़ता है. हाल ही में एक फिल्म की शूटिंग के लिए एक माह हिमाचल में रहा. इसलिए टीवी के लिए शूटिंग करना मुश्किल है. पर यदि टीवी में ऐसा काम करने का मौका मिला, जहां मुझे कम समय देना पड़ा, तो मैं दे सकता हूं. हां, मैं ने काफी रिसर्च कर के एक सीरियल की रूपरेखा बनाई है जिस का नाम है ‘रेडी सेट लाफ’. इस के अलावा 26-26 एपीसोड की सीरीज हैं- ‘शेखचिल्ली की कहानियां’. यह विषय तो मेरे दिल के काफी करीब है. सही मौके पर मैं इसे बना कर टीवी पर लाना चाहूंगा.’’

थिएटर में क्या कर रहे हैं, के जवाब में उन का कहना है, ‘‘फिलहाल परेश रावलजी की कंपनी के साथ एक नया नाटक करने जा रहा हूं. हेमल ठक्कर निर्देशक होंगे. जबकि फिल्म ‘मारे गए गुलफाम’ में गुलफाम बना हूं. ‘हनु मैन’ में हनुमान यादव बना हूं. इस के अलावा डेविड धवन, रोहित शेट्टी सहित बड़े निर्देशक व बड़े बैनरों की भी 6-7 फिल्में कर रहा हूं. हिंदी में मैं एक तरफ बड़े बैनरों में कौमेडी किरदार निभा रहा हूं तो दूसरी तरफ छोटे बजट की फिल्मों में शीर्ष भूमिका निभा रहा हूं. ‘‘हां, हम फिल्म का निर्माण व निर्देशन दोनों करना चाहेंगे. हमारा काम अभिनय करना है. पर हम फिल्म बनाते हुए अपनी फिल्म में दूसरे कलाकारों से काम करवाना चाहेंगे.’’ भले ही राजपाल यादव ने कुछ गलतियां कर कैरियर को औफ द ट्रैक कर दिया हो लेकिन एक अच्छा अभिनेता जब चाहे अपनी फौर्म में आ सकता है. उम्मीद है राजपाल यादव एक बार फिर से सार्थक भूमिकाओं में नजर आएंगे.

जवानी की दुनिया दीवानी

50वें वर्ष में चल रहे शाहरुख खान 15.4 फीसदी हिंदुस्तानियों के रोल मौडल हैं. उन्हें रोल मौडल मानने वालों में 90 फीसदी की उम्र 30 साल से कम है और इन में से 95 फीसदी से ज्यादा लोग उन के चुस्तदुरुस्तपन और इस उम्र में भी जवान दिखने के कायल हैं. इसी तरह 10.7 फीसदी लोग अमिताभ को अपना रोल मौडल मानते हैं. उन्हें पसंद करने वाले भी उन के 71 साल की उम्र में भी युवा दिखने पर ही मुग्ध हैं. चाहे नंदन नीलकेणी हों या टौप टेन में शामिल कोई भी दूसरा रोल मौडल, इन सब को लोग इसीलिए भी चाहते हैं कि ये तमाम लोग बढ़ती उम्र में भी चुस्तदुरुस्त और आकर्षक दिखते हैं.

एक ऐसे देश में जहां 54 फीसदी तक की आबादी युवा हो, अगर उस देश की जवानी सब से बड़ी यूएसपी हो तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है. दरअसल, पिछले कुछ दशकों के आर्थिक विकास ने हमें जो खुशहाली बख्शी है उस के नतीजे में एक जबरदस्त बेचैनी है, यह बेचैनी है प्रदर्शन की. चाहे क्षेत्र कोई भी हो, हर क्षेत्र में लोग अपनी उपलब्धियों को प्रदर्शित करना चाहते हैं. हिंदुस्तान में जिस भी तरफ आप नजर उठा कर देखिए, तीनचौथाई से ज्यादा लोग वरिष्ठ नागरिकों से कम की उम्र के मिलेंगे यानी ऐसे लोग जो कुछ भी करगुजरने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. यही कारण है कि इस बड़े देश में जवानी एक कौमन फैक्टर बन चुकी है. बौलीवुड को अपने देश में फैशन और शानोशौकत से जीने की कला का बैरोमीटर मानें तो देखा जा सकता है कि 80 के दशक के बाद से बौलीवुड में लगातार चुस्तदुरुस्त और युवा बने रहने को तरजीह दी जा रही है. 50 और 60 के दशक में बौलीवुड के पास एक से बढ़ कर एक खूबसूरत चेहरे थे. देवानंद, राजेंद्र कुमार, धर्मेंद्र, भारत भूषण, दिलीप कुमार, मनोज कुमार आदि.

ये सब बेहद चिकने चौकलेटी चेहरे थे. गौर से देखें तो एक धर्मेंद्र को छोड़ कर दूसरा कोई भी ऐसा नहीं था जिस के वजूद से जवानी का एहसास होता हो या लगता हो कि जैसे जवानी फूट कर निकल रही हो क्योंकि उस दौर में जवानी आकर्षण का केंद्र तो थी लेकिन जवानी चुंबकीय आकर्षण का केंद्र नहीं थी. शायद ही उस दौर में कोई ऐसा खूबसूरत हीरो रहा हो जिस के 6 पैक्स तो छोडि़ए, 2 या 4 कटाव भी रहे हों. सब की संकरीसंकरी छातियां थीं, सुंदर चेहरे थे और औसत कद. लेकिन 80 के दशक के बाद से यह ट्रैंड बदल गया क्योंकि तब एक एंग्री यंगमैन ने खुद भले अपनेआप को सुगठित शरीर के धनी शख्स के रूप में स्थापित न किया हो, लेकिन शरीर सौष्ठव को एक क्रेज, एक चाहत के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था. हिंदुस्तानी सिनेमा ने पहले व्यवस्थित बौडी बिल्डर हीरो के रूप में संजय दत्त को पाया और फिर सलमान खान ने तहलका मचाया. वास्तव में सलमान खान ही बौलीवुड के ऐसे पहले हीरो थे जिन्होंने बौडी बिल्ंिडग व फड़कती हुई जवानी को, हीरो की यूएसपी बना दिया और आगे चल कर यह चलन हीरो के लिए अनिवार्य हो गया.

90 के दशक में जब भारत ने अर्थव्यवस्था को उदारीकरण का जामा पहनाना शुरू किया और सुधारों के नाम पर भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजे दुनिया के लिए खोले जाने लगे तो सिर्फ खुले दरवाजों से अर्थव्यवस्था को लगने वाली हवा ही नहीं आई बल्कि इन दरवाजों से पश्चिमी जीवनशैली और आशाओंआकांक्षाओं के झोंके भी आए और तेजी से भारतीय जनमानस की चाहतें, विशेषकर युवाओं की, बदलने लगीं. यह खुले द्वार से आई मुक्त जीवनशैली का प्रभाव ही था कि देश भर में युवाओं में अपनी बौडी को ले कर एक जबरदस्त सजगता आई. यही कारण है कि 1996 से 2011 के बीच भारत के महानगरों में जिमों के खुलने की तादाद इस के पहले के मुकाबले 900 फीसदी तक बढ़ गई. जिम संस्कृति ने एक तरह से भारतीय युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया. आज की तारीख में बेंगलुरु हो या दिल्ली, चंडीगढ़ हो या मुंबई, पुणे हो या हैदराबाद, इन तमाम शहरों में जिम, ब्यूटीपार्लरों का मुकाबला कर रहे हैं. यह बात अलग है कि इसी दौरान पार्लरों की तादाद में जिमों से 300 फीसदी से ज्यादा का उछाल आया है.

यह सब जवानी के प्रति आकर्षण के चलते संभव हुआ है. यह जवानी का बढ़ता आकर्षण ही है कि पिछले एक दशक में सौंदर्य प्रसाधनों की बिक्री में 700 फीसदी का उछाल आया है, और जिस हिंदुस्तान में 90 के दशक में सौंदर्य प्रसाधनों का कारोबार 85 से 90 करोड़ रुपए सालाना का था, वह कारोबार अब सालाना 10 अरब रुपए की भी सीमा को पार कर चुका है. अगर इस के असंगठित और नकली बाजार को भी इस में अनुमान के आधार पर जोड़ दें तो यह सालाना 13 से 14 अरब रुपए तक पहुंच चुका है. दरअसल, 90 के दशक के उत्तरार्द्ध के बाद युवा बना रहना एक सामाजिक ललक बन कर उभरा है. कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां जवानी ललकभरी दीवानगी का जरिया न बन गई हो. यही वजह है कि जवानी हर जगह एक रोल मौडल बन कर उभरी है. अपने इर्दगिर्द नजर दौड़ाइए, हर तरफ आप को जवानी के प्रति सजगता मिलेगी. कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां आज युवाओं को तरजीह न दी जा रही हो. क्या कारोबार, क्या सेवा क्षेत्र, क्या सामाजिक क्षेत्र, हर जगह युवाओं के नाम पर अप्रत्यक्ष रूप से जवानी का ही डंका बज रहा है. बैंकों में वर्ष 2000 के बाद 30 से 40 फीसदी युवा स्टाफ को तरजीह दी जा रही है. 2000 से 2012 के बीच बैंकों ने अपने पुराने और उम्रदराज कर्मचारियों को स्वेच्छा से अवकाश ग्रहण करने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया, जिस के चलते बैंकों से 9-12 फीसदी तक स्टाफ समय से पहले रिटायरमैंट ले चुका है. उन की जगह बिलकुल फ्रैश, कम उम्र के युवा रखे गए हैं. 1995 से 2012 के बीच बैंकों के कारोबार में 600 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ोतरी का कारण युवा और हौसले से भरा स्टाफ है.

अर्थशास्त्र में कहा जाता है, ‘विकसित होते समाज की उम्र कम हो जाती है. वह युवा हो जाता है और युवाओं पर ही सब से ज्यादा भरोसा करता है.’ यह सिद्धांत पूरी तरह से हिंदुस्तान पर लागू होता दिख रहा है. कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां युवाओं को तरजीह न दी जा रही हो या युवाओं की वकालत न की जा रही हो. यहां तक कि बुजुर्गों का आरक्षित क्षेत्र माना जाने वाला राजनीतिक क्षेत्र भी अब युवाओं के हस्तक्षेप से रहित नहीं है. दरअसल, उदारवादी अर्थव्यवस्था के प्रभावशाली होने के साथ ही देश में एक आर्थिक खुशहाली और सामाजिक जोश का दौर आया है. भले अपेक्षा के मुताबिक भारत में आर्थिक खुशहाली ने अभी अपनी जड़ें न जमाई हों लेकिन यह कहना गलत होगा कि आर्थिक खुशहाली आई ही नहीं. आज भारत में 20 करोड़ से ज्यादा संपन्न उपभोक्ता हैं और इस में चमकदार पहलू यह है कि इन 20 करोड़ में से 18 करोड़ युवा हैं. इन 18 करोड़ में से 14 करोड़ उपभोक्ताओं का पैसा अपना कमाया हुआ है यानी उन की उपभोग हैसियत उन के खुद के श्रम व कौशल से पैदा हुई है. इसलिए आज भारतीय उपभोक्ता बाजार न सिर्फ बहुत तेजी से फलफूल रहा है बल्कि उपभोक्ता बाजार युवाओं को अपने सिरमाथे पर बैठा रहा है. बाजार में ज्यादातर चीजें युवाओं की इच्छा और अपेक्षाओं को ध्यान में रख कर उपलब्ध कराई जा रही हैं और उत्पादित की जा रही हैं. देश में 14 करोड़ से ज्यादा ताकतवर उपभोक्ता भरपूर कमा रहे हैं और खर्च करने का निर्णय भी वे खुद ही ले रहे हैं.

कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां हाल के कुछ दशकों में भविष्योन्मुखी माहौल न बना हो. ऐसे में जबकि हर जगह युवाओं का डंका बज रहा हो तो भला फिर जवानी का डंका क्यों न बजे. इसलिए बौलीवुड में हर कामयाब हीरो के लिए जवान बना रहना अपनी शर्त हो गई है. 49 के शाहरुख, 50 के सलमान और लगभग 49 के आमिर इसीलिए आज अपने अभिनय से ज्यादा हर दिन कमनीय होती अपनी जवानी से चौंकाते हैं और आकर्षित करते हैं. सिर्फ सिनेमा के ही क्षेत्र में ये उदाहरण या ऐसे दबाव नहीं हैं बल्कि कौर्पोरेट क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही है. 4 दशक पहले किसी उद्योगपति का चेहरा दिमाग में आते ही बेडौल सेठों का सा शरीर जेहन में कौंधता था. लेकिन आज चाहे अनिल अंबानी हों या सुनील भारती मित्तल, कुमार मंगलम बिड़ला हों या अजीम प्रेमजी, सब के सब अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और हैसियत जितना ही अपनी लुक और खासतौर पर अपनी जवानी के लिए सजग दिखते हैं. आज के युवा उद्योगपति ऐथलीट माफिक दिखते हैं क्योंकि उन्हें पता है, भारत का युवा समाज थुलथुल शरीर, मुरझाया चेहरा और पस्त हौसलों से घृणा करता है. युवा भारत पर भले दिखावटी होने का आरोप लगे लेकिन वह युवा होने और बने रहने की हर तरकीब अपनाता है. यह अकारण नहीं कि कम उम्र में नौकरी शुरू करने वाले आज के युवा 30 फीसदी तक अपनी कमाई, अपने को युवा बनाए रखने में खर्च करते हैं. उन्हें पता है जो फिट दिखता है वही हिट दिखता है, इसलिए हिंदुस्तान का व्यापक समाज जवानी के लिए दीवाना हो रहा है. जवानी या जवान बने रहना हमारी यूएसपी बन गई है. नतीजतन, जवानी रोल मौडल की कुरसी पर आसीन हो गई है.

जवानी जिंदाबाद

इस की सब से बड़ी वजह यह भी है कि पिछले 2 दशकों में ज्यादातर कामयाबियां जवानी के हिस्से में ही आई हैं. 1990 के पहले तक हिंदुस्तान में अपना घर, अपनी गाड़ी और स्थिर जीवन की उम्र 50 से 55 थी, आज यह 27 से 30 हो गई है. इसे यों समझिए, पहले तथाकथित कामयाबियां जिस में अपना घर, अपनी गाड़ी और व्यवस्थित  घरगृहस्थी शामिल थी, उसे हासिल करतेकरते या वहां तक पहुंचतेपहुंचते आमतौर पर जिंदगी के 50 साल से ज्यादा के सुनहरे दिन समाप्त हो जाते थे. जबकि आज ये तमाम चीजें 26 से 30 साल के बीच में 45 फीसदी से ज्यादा युवाओं को हासिल हो जाती हैं. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज के युवा पहले के मुकाबले कितने कामयाब हैं. पहले बैंक बैलेंस जीवन के उत्तरार्द्ध की उपलब्धि होती थी, आजकल 25 साल का युवक भी अपनी सेविंग को सालाना औसतन 30 से 35 हजार रुपए के बीच हासिल कर रहा है.

कामयाबी की उम्र वाकई कम हो गई है. आज महानगरों की सड़कों में 95 फीसदी मोटरसाइकिलों में युवा मिलेंगे, 55 फीसदी से ज्यादा चमचमाती नई कारों में युवा दिखेंगे और बिकने वाले हर 5 में से इन दिनों 3 फ्लैट युवा खरीद रहे हैं. इस में कोई शक नहीं कि आज 70 और 80 के दशक के मुकाबले महंगाई 6 से 7 गुना ज्यादा है. लेकिन एक सीमित वर्ग ही सही, 20 से 25 फीसदी युवा आज ऐसे हैं जिन की तनख्वाह 70 और 80 के दशकों के मुकाबले 20 से 25 गुना ज्यादा है. कई बूढ़ों को तो यकीन ही नहीं होता कि ऐसा है. मगर वास्तव में ऐसा है. आज हर नौकरी की शुरुआत करने वाले युवा की औसत सैलरी 80 के दशक की औसत सैलरी से महंगाई का अनुपात निकालने के बाद भी 3 से 4 गुना ज्यादा है.

आज हर क्षेत्र में कामयाबी की उम्र घट गई है. चाहे कार खरीदने के संबंध में बात की जा रही हो या फ्लैट खरीदने के, चाहे कौर्पोरेट सैक्टर में अपने आइडिया का डंका बजाने की बात की जा रही हो या फिर कारोबार के क्षेत्र में अपने कारोबार को कामयाबी के असीमित शिखर पर पहुंचाने की बात हो, कामयाबी की उम्र हर जगह छोटी हो गई है. दुनिया के करोड़पतियों की सूची में इतिहास में पहली बार 30 से 35 फीसदी युवा हैं और 5 से 7 फीसदी तो इतनी कम उम्र के हैं कि आप कौर्पोरेट जगत को देखते हुए कह सकते हैं अभी उन के दूध के दांत ही नहीं टूटे. चाहे मार्क जुकरबर्ग हों या रैनबैक्सी के सिंह बंधु, सब ने इतनी कम उम्र में अपने नाम के आगे अरबपति होने का टाइटल लिखवाया है कि कामयाबी को स्वाभाविक रूप से युवाओं की थाती समझा जाने लगा है. शायद इसलिए भी जवानी समाज के हर क्षेत्र की रोल मौडल बन गई है क्योंकि उस का दूसरा कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं बचा.

श्राद्ध दानदक्षिणा का कारोबार

एक तरफ हम चांद तक पहुंचने का दावा कर कभी मंगलयान तो कभी रौकेट, मिसाइल की बातें कर खुद को तकनीकी व विज्ञान के मोरचे पर समृद्ध होने का डंका पीटते हैं तो दूसरी ओर जब वाट्सऐप और सोशल मीडिया पर श्राद्ध से ठीक एक दिन पहले धर्म, पूजापाठ और श्राद्ध से जुड़े रीतिरिवाजों का बखान देखते हैं तो वापस उसी पिछड़े, पुरातनकाल में लौट जाते हैं. उस काल में हम असभ्यता व धार्मिक कुरीतियों के जाल में उलझे थे. आम युवाओं के हाथ में तकनीक इसलिए नहीं है कि वे पोंगापंथ व धार्मिक रिवाजों का ब्रह्मज्ञान सुनें और उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करें. तकनीक तो आगे बढ़ने का औजार है. कुछ लोग इस से अंधविश्वास फैला रहे हैं. तकनीक के सहारे वाट्सऐप या फेसबुक इस्तेमाल करने वाले धार्मिक कर्मकांडों से अछूते तबके को धार्मिक अंधता में धकेल रहे हैं और वे इतने सफल हैं कि प्रबुद्ध, सफल भी इसे फौरवर्ड कर डालते हैं और स्वयं को धन्य समझते हैं.

धार्मिक कैंपेन को वाट्सऐप पर इस तरह प्रसारित किया जाता है कि अगर इसे आगे 100 लोगों को फौरवर्ड नहीं किया गया तो अशुभ होगा. तकनीक का इस से ज्यादा दुरुपयोग भला और कैसे हो सकता है? श्राद्ध एक कर्मकांड है. दरअसल, पंडों ने सालभर में अपनी आय का जरिया तय करने के लिए ही तमाम तरह के कर्मकांडों का विधान किया है. पंडों ने हरेक कर्मकांड के पीछे इस बात पर अधिक जोर दिया है कि अगर यह या वह न किया गया तो किस तरह अनिष्ट होगा. इसी ‘अनिष्ट’ का भय दिखा कर सब को कर्मकांडी बना दिया गया है. इस के अलावा वृद्धि श्राद्ध का भी विधान चालू कर दिया है ब्राह्मणों ने. यह श्राद्ध विवाह या उपनयन के पहले पितरों के आशीर्वाद के नाम पर कराया जाता है. इस के बाद मृतक के नाम पर ब्राह्मणों ने सालाना श्राद्ध सपिंडीकरण श्राद्ध का कर्मकांड भी थोप दिया है. यह श्राद्ध विशेष तिथि में व्यक्ति की मृत्यु के लिए कराया जाता है. इस के अलावा पितृपक्ष में पिछली 3 पीढि़यों के पूर्वजों के श्राद्ध का भी विधान रखा गया है. यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि श्राद्ध का मुख्य अर्थ दानदक्षिणा है. यानी पूर्वजों को खुश रखने के नाम पर सालभर श्राद्ध कर के, कामधंधे को चौपट कर के अपने परिवार के लिए भले ही दुख का कारण बनते रहें, लेकिन पितरों के नाम पर ब्राह्मणों का घर जरूर भरते रहें.

भारतीय दर्शन में चार्वाक ऋषि का महत्त्व है. चार्वाक श्राद्ध के खिलाफ थे. पश्चिम बंगाल में कुसंस्कारों के खिलाफ लंबे समय से काम करने वाली भारतीय विज्ञान युक्तिवादी समिति के महासचिव विप्लव दास, चार्वाक का हवाला देते हुए कहते हैं कि सदियों पुराना चार्वाक दर्शन भी श्राद्ध के खिलाफ रहा है. आत्मा के अस्तित्व व आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध जैसे विषयों पर चार्वाक ने सवाल उठाया है. परलोक और पुनर्जन्म के आस्तिक दर्शन को भी नकारते हुए चार्वाक दर्शन कहता है कि –

यदि गच्छेत् परं लोकं
देहादेश विनिर्गत:.
कस्माद् भूयो न चायाति
बन्धु-स्नेह-समाकुल:..

यानी अगर आत्मा का वजूद है और पुनर्जन्म वाकई होता है तो मरने के बाद शरीर से निकल परलोक गई आत्मा अपने भाईबंधुओं को रोताबिलखता देख कर भी वापस क्यों नहीं लौट आती.

मृतानामपि जन्तूना
श्राद्धं चेतृप्तिकारणम्.
निर्वाणस्य प्रदीपस्य
स्नेह: संवर्धयेच्छिखाम्..

यानी अगर मरने वालों की तृप्ति श्राद्ध से वाकई होती है तो यह वैसी ही बात है जैसे बुझे दीपक में तेल डाल भर देने से बिना आग का स्पर्श पाए दिए की लौ फिर से जल उठेगी.

गच्छतामिह जंतुनाम
व्यर्थम् पाथेयकल्पनम्
गेहस्थकृतश्राद्धेण
पथि तृप्तितरवारिता…

यानी जो यह पृथ्वी छोड़ कर चला गया, उस के लिए पिंडदान करने का कोई अर्थ नहीं है. अगर कोई घर छोड़ कर चला गया तो उस के नाम पर पिंडदान करने से उस की भूख मिट जाएगी? बहरहाल, चार्वाक की भौतिकवादी तार्किक सोच का उन के समसामयिक ब्राह्मणों द्वारा विरोध भी होता रहा है. माना जाता है कि चार्वाक को पीटपीट कर मार डाला गया. कह सकते हैं कि चार्वाक का समय आज भी मौजूद है जब तर्क को छोड़ कर लोग वाट्सऐप, फेसबुक पर अपने अंधविश्वासों व मूर्खता का प्रदर्शन करने में उत्सुक रहते हैं.

कुत्तेकौए का मान

कुत्ता और कौए जैसे जीवों का हम सालभर तिरस्कार करते हैं, लेकिन पितृपक्ष के दौरान उन्हें बड़ा मान दिया जाता है. श्राद्ध पक्ष में कौओं की विशेष पूछ होती है. ऐसा क्यों? कोलकाता में काली मंदिर के एक पुजारी हलचलजी कहते हैं कि हमारे हिंदू धर्म में कौआ यम का प्रतीक माना जाता है, जो शुभअशुभ का संकेत बताता है. इसी तरह आइरिश लोग कौए को युद्ध और मृत्यु की देवी मानते हैं. बहरहाल, हिंदू मान्यता के अनुसार, इस संसार में 84 लाख योनियां होती हैं लेकिन माना जाता है कि मर कर व्यक्ति सब से पहले कौए के रूप में जन्म लेता है इसीलिए कौए को श्राद्ध का एक अंश दिया जाता है. ब्राह्मणों का विधान है कि पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने और किसी तरह के अनिष्ट से बचते हुए कल्याण की कामना के लिए श्राद्ध में कौए को खिलाना जरूरी है. उसी के पेट की जूठन पितरों को जाएगी.

हलचल शास्त्रों का हवाला देते हुए कहते हैं, ‘‘पितृपक्ष के दौरान स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं और पितर कौए के रूप में धरती पर आते हैं. कौआ अगर थोड़ा सा भी अन्न खा ले तो वह सीधे पितरों तक पहुंचता है. पितरों का तर्पण तब तक अधूरा है जब तक कि ‘कागभुशुंडी’ अन्न को मुंह न लगा ले. इसीलिए कौए को भोजन कराना शुभ माना जाता है.’’ हलचल आगे कहते हैं कि ज्योतिष में कुत्ते को केतु का प्रतीक माना गया है. कुत्ते की सेवा करने से केतु का अशुभ प्रभाव नष्ट होता है. वहीं, हिंदू पुराण में कुत्ते को यमराज का पशु और भैरव का सेवक माना गया है. इसीलिए मान्यता है कि कुत्ते को भोजन कराने से भैरव खुश होते हैं और तमाम आकस्मिक संकटों से वे भक्तों की रक्षा करते हैं. मान्यता यह भी है कि कुत्ता भविष्य में होने वाली घटनाओं व सूक्ष्म जगत की आत्माओं को देखने की क्षमता रखता है. कुत्ते को प्रसन्न रखने से वह यमदूत को पास फटकने नहीं देता है. इसीलिए श्राद्ध में कुत्तों को खिलाने की मान्यता है. हलचल यह भी कहते हैं कि ग्रंथों की एक मान्यता की कहें तो इसे अपवित्र माना गया है. इस के स्पर्श से भोजन अपवित्र हो जाता है. कहते तो यह भी हैं कि कुत्ते को देख आत्माएं दूर चली जाती हैं. ऐसे में श्राद्ध में कुत्तों को खिलाने पर सवाल उठ ही जाता है. हाल के कुछ सालों में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, कीटनाशक के छिड़काव के कारण कौओं की बेहद कमी हो गई है. श्राद्धपक्ष के दिन लोग थाली परोस कर सारा कामधंधा छोड़ कर घंटों बैठे कौओं का इंतजार करते हैं, लेकिन कौआ दिखाई नहीं देता. इसलिए इस का भी हल निकाला गया है. कोलकाता के श्यामबाजार में हर रविवार के दिन पेड़पौधों से ले कर चिडि़या, कबूतर, रंगबिरंगी मछलियों व खरगोश का हाट लगता है लेकिन 27 तारीख के दिन श्राद्धपक्ष के मद्देनजर इस हाट में कबूतर बेचने वाले कौए भी बेच रहे थे. देख कर हैरानी हुई कि कौए कब से पालतू हो गए? कबूतर बेचने वाले ने बताया कि श्राद्धपक्ष है न. आजकल कौए दिखते नहीं हैं न. यह सिर्फ इन 15 दिनों के लिए.

साफ है कि कौए की जितनी पूछ श्राद्धपक्ष में होती है उतनी साल में कभी नहीं. श्राद्ध के इन्हीं 15 दिन कौओं की आवभगत होती है. साल के बाकी दिन इन की आवाज सुनना किसी को गवारा नहीं. मुंडेर पर बैठे कौए का कांवकांव करना एक मिथक के तहत अशुभ माना जाता है. कहते हैं कि कौआ यम का दूत होता है. वह सारी जानकारियां यम को पहुंचाता है. प्रमाण के तौर पर शास्त्रों में यहां तक कह दिया गया है कि चूंकि दक्षिण दिशा यम की दिशा है और कौआ दक्षिण दिशा से आता है, इसीलिए कौए का घर के आसपास मंडराना काल या मृत्यु का संकेत माना जाता है. सवाल यह भी उठता है कि हमारे पितरों, जब कभी वे जीवित थे, को कौओं से कोई लगाव नहीं होता है, फिर मरने के बाद वे कौए का ही रूप ले कर धरती पर क्यों आते हैं? कोई और रूप भी तो ले सकते हैं? बहुत तलाशा इस सवाल का जवाब, पर मिल नहीं सका. सदियों से यह परंपरा चली आ रही है, सो सब निभा रहे हैं, आखिर पितरों का सवाल जो है. उन्हें नाराज करना किसी को गवारा नहीं.

युक्तिवादी समिति के विप्लव दास कहते हैं कि जब आत्मा का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो उसे खुश करने या उस के नाराज होने का सवाल ही भला कैसे उठता है. उस पर श्राद्ध अपनेआप में बड़ा अमानवीय कर्मकांड है. एक तरफ परिजन के जाने का परिवार इतना बड़ा आघात झेलता है, तो दूसरी ओर इस दौरान उस पूरे परिवार पर इतने सारे कर्मकांड थोप दिए जाते हैं. हमारे देश में गरीबी इतनी है कि साधारण से अंतिम संस्कार तक के लिए कर्ज लेना पड़ता है. उस परिवार पर मृत व्यक्ति के नाम पर आजीवन कर्मकांड का बोझ, यह अमानवीय नहीं तो क्या है? ऐसा भी देखा गया है कि कुछ लोग जीतेजी अपने मातापिता के जीवित रहते उन का अपमान करते रहते हैं, लेकिन उन के चले जाने के बाद बड़ी शिद्दत से सालभर में बताई गई तिथियों में बड़े तामझाम से श्राद्ध करते हैं.

ऐसे में क्या यह अच्छा नहीं होता कि श्रद्धा के नाम पर अपने पुरखों का श्राद्ध करने के बजाय सही माने में उन के आदर्शों को जीवन में उतार कर उन के प्रति श्रद्धा जताई जाती. साथ ही, मृत परिजन के अंतिम संस्कार के तौर पर उस के अंगों का दान कर किसी को जीवन दे कर भी उस के प्रति श्रद्धा जताई जा सकती है और मृत परिजन को दूसरे के शरीर में जीवित भी रखा जा सकता है. दुनियाभर में विभिन्न समुदायों के बीच अपनेअपने धर्म की श्रेष्ठता को ले कर हिंसा की मिसालें हैं. लेकिन सही माने में सर्वश्रेष्ठ धर्म नाम से कोई धर्म नहीं है. सभी धर्म बहुत बड़ा झूठ और बहुत बड़ी बेईमानी हैं. धर्म के तमाम कर्मकांड से बचना ही अच्छा है

१०वां विश्व हिंदी सम्मेलन व्यावसायिक हिंदी के नाम

देश के हृदय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के लाल परेड ग्राउंड पर 10 से 12 सितंबर तक आयोजित 10वां विश्व हिंदी सम्मेलन कई माने में सार्थक रहा. जिस का सार यह निकला कि हिंदी को कहीं से कोई खतरा नहीं है, जरूरत उसे कारोबारी शक्ल देने की है. अभी तक हुए 9 सम्मेलनों में बड़ी चिंता हिंदी के अस्तित्व को ले कर जताई जाती रही थी. वह इस सम्मेलन में नहीं दिखी तो वजह बड़ी अहम थी कि आयोजक विदेश मंत्रालय और मध्य प्रदेश सरकार ने साहित्यकारों की सीमारेखा खींच दी थी. साफसाफ कहा जाए तो हिंदी के स्वयंभू ठेकेदारों को मनमानी नहीं करने दी गई जिस से हिंदी का वास्तविक वैश्विक व व्यापारिक पहलू सामने आ पाया. यह बहुत जरूरी भी हो चला था कि हर दफा हिंदी को साहित्यकारों के नजरिए से ही देखने की गुलामी से छुटकारा पाया जाए. इसीलिए इस सम्मेलन का मुख्य विषय साहित्य के बजाय हिंदीभाषा विस्तार एवं संभावनाएं रखा गया था. समकालीन हिंदी साहित्यकारों के लिए हालांकि यह बात तकलीफदेह थी कि साहित्य की यानी उन की अनदेखी कर भाषा की बात ज्यादा की जा रही है. साहित्यकारों की इस पीड़ा से आम लोगों ने कोई वास्ता न रख उन की बातों व आलोचनाओं पर ज्यादा तवज्जुह नहीं दी.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सम्मेलन के मुख्य संरक्षक थे और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस की अध्यक्ष थीं. सम्मेलन में मुद्दे की बात थी हिंदी का आधुनिक और तकनीकी स्वरूप, उस का मोबाइल और कंप्यूटर में प्रयोग और इस से भी अहम था हिंदी के डिजिटल व रोजगारोन्मुखी होने पर चर्चा, जिस ने आयोजन को एक बेहतर मुकाम पर ला खड़ा कर दिया. 39 देशों से आए प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में भाग लिया. देशविदेश के तकरीबन 6 हजार प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में शिरकत की. उन्होंने अपनी बात कही, दूसरों की सुनी और 12 विभिन्न विषयों पर सत्रों की चर्चा के बाद निष्कर्ष भी दिए जिन से हिंदीप्रेमियों को सुखद एहसास यह हुआ कि हिंदी उत्तरोत्तर तरक्की कर रही है, कुछ विसंगतियां हैं लेकिन वे किसी किस्म का खतरा नहीं हैं क्योंकि उन्हें दूर किया जा सकता है. सम्मेलन में कुछ विवाद भी हुए जो आमतौर पर ऐसे आयोजनों में अकसर होते हैं.

मोदी के नाम रहा शो

सम्मेलन की एक महीने पहले से जिस तरह तैयारियां चल रही थीं उस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कुछ उल्लेखनीय नहीं था. सुषमा स्वराज और शिवराज सिंह चौहान ने इश्तहारों व बयानों के जरिए नरेंद्र मोदी को फोकस पर ला दिया था. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग सरकार के सवा साल के कार्यकाल में यह पहला भाषाई और बड़ा गैर राजनीतिक सम्मेलन था. लिहाजा, इन दोनों के लिए यह जरूरी हो गया था कि सम्मेलन सफल हो. सभी की उत्सुकता और जिज्ञासा नरेंद्र मोदी में सिमट कर रह गई थी. अपने भाषण में नरेंद्र मोदी ने यह साबित कर दिया कि हिंदी की संरचना से वे भले ही ज्यादा परिचित न हों पर वे उस की व्यावसायिक उपयोगिता व आर्थिक महत्त्व बखूबी समझते हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आने वाले दिनों में भाषा एक बड़ा मार्केट बनने वाली है. सदी के अंत तक 90 फीसदी भाषाएं खत्म हो जाएंगी. विशेषज्ञों का अनुमान है कि भविष्य में केवल 3 भाषाओं का ही दबदबा रहेगा-अंगरेजी और चाइनीज के साथ हिंदी उन में से एक होगी. इसलिए कोशिश यह होनी चाहिए कि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं को कैसे टैक्नोलौजी के लिए परिवर्तित करें. आने वाले वक्त में डिजिटल वर्ल्ड बड़ा रोल अदा करने वाला है. भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मंशा साफ कर दी कि हिंदी को टैक्नोलौजी और कारोबारी भाषा बनाने के लिए जरूरी है कि बेवजह के पूर्वाग्रह न थोपे जाएं. अपने भाषण में उन्होंने अंगरेजी के 50 शब्दों का ठीक वैसा ही प्रयोग किया जैसा कि आम भारतीय करते हैं. त्योहार को फैस्टिवल, हावभाव को एक्सप्रैशन, बाजार को मार्केट और तकनीक को टैक्निक कहते हुए उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अंगरेजी मिश्रित हिंदी यानी कुछ हद तक हिंगलिश से परहेज करने की नहीं बल्कि उसे अपनाने की जरूरत है.

यह भाषण खासतौर से हिंदी के ठेकेदारों के लिए अप्रत्याशित था जो उम्मीद कर रहे थे कि प्रधानमंत्री की हैसियत से नरेंद्र मोदी हिंदी की मर्यादा का ध्यान रखेंगे. इस मर्यादा का मतलब है भारीभरकम संस्कृत के कठिन शब्दों का इस्तेमाल करेंगे, अंगरेजी का विरोध करेंगे और हिंदी के गिरते स्तर पर चिंता जताएंगे. प्रधानमंत्री बनने से पहले ही नरेंद्र मोदी बगैर किसी लिहाज के कहते रहे हैं कि वे व्यापारी हैं और एक के दस बनाना जानते हैं. विश्व हिंदी सम्मेलन में उन की यह मंशा साफ दिखी कि बजाय हिंदी पर भारीभरकम विवाद और बहस करने के, उस के व्यावसायिक पहलू पर जोर देते हुए उसे भुनाना चाहिए. भारत एक बड़ा बाजार है, इसलिए भाषा के जरिए उसे भुनाना चाहिए, इस बात का असर आम लोगों पर पड़ा जो हिंदी और ऐसे सम्मेलनों को महज लेखकों व साहित्यकारों की भाषा समझते हैं.

एक तरह से वे हिंदीभाषियों को यह आश्वस्त करने में सफल रहे कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी सुरक्षित है. जरूरत और कोशिश इस बात की है कि इस से पैसा बनाया जाए क्योंकि औसत रूप से हिंदीभाषियों के मुहताज सभी संपन्न देश हैं. हिंदी को इस नजरिए से पहली बार दिखाने वाले नरेंद्र मोदी ने दोटूक कहा कि जब भाषा ही नहीं बचेगी तो साहित्य कहां रहेगा. यानी साहित्यकारों का वजूद भाषा से है और भाषा का अस्तित्व साहित्यकारों से है, यह गलतफहमी छोड़ना ही बेहतर होगा. साफ यह भी हुआ कि हिंदी अब धर्मगुरुओं, साहित्यकारों, प्रकाशकों और लेखकों की ही नहीं, बल्कि उस आम आदमी की मिल्कियत है जो बाजार का बड़ा और अहम हिस्सा हैं. इस सम्मेलन की एक ख्ूबी, जो किसी को नजर नहीं आई, वह यह थी कि हिंदीभाषियों को अब मुनासिब सामाजिक सम्मान मिलने लगा है, वरना अब से कोई 25 साल पहले हिंदी गंवारों व जाहिलों की भाषा कही व समझी जाती थी. तब हिंदी बोलने वालों को 2 वर्गों के लोग खासतौर से प्रताडि़त करते थे. पहला वर्ग 10 फीसदी अंगरेजी जानने वालों का था जिस की नजर में हिंदी भाषी पिछड़े व मुख्यधारा से कटे थे. यह अभिजात्य वर्ग अपने अंगरेजीदां होने का रोब झाड़ते हर तरफ दबदबा बनाए हुए था. दूसरे वर्ग में अच्छी हिंदी जानने वाले और लेखक व साहित्यकार थे जो यह मानते और सोचते थे कि हिंदी के असल जानकार वे ही हैं.

लेकिन फिर पहले अंगरेजी और बाद में कंप्यूटर ने एक सामाजिक क्रांति सी ला दी. धीरेधीरे टूटीफूटी ही सही, सभी अंगरेजी बोलने लगे और देखते ही देखते हर क्षेत्र में छा गए. दरअसल, इस वर्ग, जिस में पिछड़े और दलित ज्यादा तादाद में थे, में आत्मविश्वास और स्वाभिमान अंगरेजी ने भरा. अब न तो साहित्यकारों का दबदबा है न फर्राटे से अंगरेजी की जुगाली करने वालों का. सम्मेलन में इस बात को तूल देने की कोशिश की गई कि अंगरेजी नई पीढ़ी को बरबाद कर रही है जबकि हकीकत तो यह है कि अंगरेजी हिंदीभाषियों को इज्जतदार और मुनासिब जगह दिला रही है. इस की बेहतर मिसाल खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. क्या कोई प्रधानमंत्री की इस बाबत बड़े पैमाने पर आलोचना कर सकता है या उन्हें चुनौती दे सकता है कि उन्होंने क्यों नए जमाने की हिंदी बोली जिस में अंगरेजी शब्दों का उपयोग या मिश्रण अनिवार्य हो चला है.

उत्थान और पतन की दास्तां

तीनदिवसीय सम्मेलन के 12 सत्रों में आमंत्रित अतिथियों ने खुल कर विचार रखे और सुझाव दिए पर भाषामय हो गए. भोपाल में चर्चा इस बात की ज्यादा रही कि अंगरेजी इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह व्यापारिक भाषा भी है. 95 देश अंगरेजीभाषी हैं और तमाम अंतर्राष्ट्रीय कामकाज इसी भाषा में होते हैं. हिंदी उस की जगह तो नहीं ले सकती लेकिन इसे व्यापारिक और डिजिटल बनाया जाए तो रोजगार के दरवाजे जरूर खुलेंगे बशर्ते विदेशी कंपनियों को हिंदी में कामकाज करने के लिए बाध्य किया जाए. सम्मेलन की घोषणा के साथ ही यह बात स्पष्ट कर दी गई थी कि इस में न तो हिंदी की गौरवगाथा का गान किया जाएगा और न ही अंगरेजी से होने वाले नुकसानों पर जुगाली. इसीलिए माइक्रोसौफ्ट और गूगल जैसी नामी आईटी कंपनियों सहित एप्पल और सीडैक के अधिकारियों, प्रतिनिधियों ने हिंदी के लिए अपनी योजनाएं प्रदर्शनी और भाषणों के जरिए बताईं. मोबाइल और इंटरनैट पर कैसे हिंदी का प्रयोग किया जाए, यह भी इन कंपनियों से आए प्रतिनिधियों ने सिखाया.

सम्मेलन में छिटपुट चर्चा संस्कृत की भी हुई कि वह लुप्त हो गई है पर इस की वजहों पर किसी ने ध्यान खींचने की हिम्मत नहीं की. संस्कृत आम लोगों की नहीं बल्कि ब्राह्मणों की भाषा रही है. सीधेसीधे कहा जाए तो धार्मिक भाषा होने के चलते यह लुप्त सी हो गई और इस से किसी का नुकसान नहीं हुआ है. उलटे, फायदा ही हुआ है. जैसे आईटी कंपनियां अपना कारोबार बढ़ाने के लिए हिंदी अपना रही हैं वैसे ही पंडेपुजारी संस्कृत को अपने रोजगार की भाषा बना चुके हैं. फर्क इतना है कि आईटी कंपनियां पढ़ेलिखे युवाओं को नौकरियां दे रही हैं. उलट इस के, पंडेपुजारी संस्कृत के बलबूते पर धर्म की व्याख्या के नाम पर मलाई जीमते हैं और लोगों को गुमराह करते हैं.

जाहिर है किसी की भाषा का उत्थान और पतन 2 बातों पर निर्भर करता है, पहली, इसे बोलने वालों की संख्या और मंशा, दूसरी, इस का व्यावसायिक प्रयोग. इसलिए अब आईटी कंपनियां हिंदी को ही बचाने की बात करने लगी हैं और वे अपना कारोबार बढ़ा रही हैं. जमाना तकनीक का है, डिजिटल है. लिहाजा, हिंदी को भी बदलना पड़ेगा और हिंदीभाषियों को भी. इसे बदलने का सीधा मतलब है कि हिंदी की गरिमा के प्रति बेवजह की जिद छोड़ी जाए. इसे साहित्यकारों के चंगुल और प्रभाव से मुक्त किया जाए जिन से किसी को कुछ हासिल नहीं होता.

औनलाइन बनाम औफलाइन कारोबार

जो काम पहले मोलभाव करने हेतु शहरशहर और बाजारबाजार घूम कर किया जाता था वही काम अब मनमुताबिक घरबैठे तसल्लीबख्श तरीके से होने लगा है. यह सब उच्च तकनीक का कमाल है जिस ने जीवन को अत्यधिक सुगम व आसान बना दिया है. औनलाइन यानी ई कारोबार ने अब लगभग संपूर्ण देश में अपने पांव पसार लिए हैं जिस से अकूत मुनाफा कमाने वाले पुरातन सोचधारी खुदरा कारोबारी दिग्गज पस्त हैं. देश के अधिकांश राज्यों में किया जा रहा सुनियोजित विरोध इस बात का द्योतक है कि जैसेजैसे ई कौमर्स प्लेटफौर्म यानी औनलाइन कारोबार का प्रचलन बढ़ता जा रहा है वैसेवैसे मुनाफा कमा रहे बड़ेबड़े कारोबारी जमीन पर आते जा रहे हैं. यहां तक कि घाटे व बरबादी के लपेटे में आते जा रहे टाटा, भारती व रिलायंस सरीखे बड़ेबड़े थोक व खुदरा कारोबारी दिग्गज भी अपनी नीतियों में परिवर्तन करने को मजबूर हो रहे हैं.

औनलाइन कारोबार यह बताता है कि उद्योग जगत में अकूत मुनाफा है और हमारे कारोबारी दिग्गज किस कदर मुनाफा कूट रहे हैं. औनलाइन कारोबारी कंपनियों-फ्लिपकार्ट, अमेजौन व स्नैपडील ने पिछली दीवाली पर 90 फीसदी तक की जबरदस्त छूट दे कर समस्त खुदरा कारोबारी दिग्गजों का बंटाधार कर दिया. अपने देश में मुनाफाखोरी का आलम यह है कि फैक्टरी से निकल 10 रुपए की कीमत वाला उत्पाद जनता तक पहुंचतेपहुंचते 100 रुपए से भी ज्यादा की दर पर बिकता है. औनलाइन कारोबार के तहत इसीलिए जनता को बेहद कम कीमत पर उत्पाद उपलब्ध हो जाते हैं क्योंकि मार्जिन बेहद कम लिया जाता है. पर अति अल्प मार्जिन के बावजूद औनलाइन कारोबार करने वाली सभी कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं. देश में औनलाइन कारोबार में लगी कंपनियों की संख्या लगभग 300 है. इन में कई कंपनियां केवल चुनिंदा उत्पादों में ही डील करती हैं जैसे जबोंग फैशन व लाइफस्टाइल क्षेत्र में ही डील करती है और शूस्टोर केवल जूतों व उन से संबंधित उत्पाद जनता को उपलब्ध कराता है जबकि दूसरी और स्नैपडील की टोकरी में सभी तरह के उत्पाद हैं.

भारत में औनलाइन कारोबार करने वाली प्रमुख कंपनियों में फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, मिंत्रा, जबोंग, शिंपलाई, होमशौप-18, इन्फीबीम, शौपक्लूज, ईबे व अमेजौन इंडिया कारोबार व राजस्व के अलावा बेहतर सेवाएं प्रदान करने के लिहाज से शीर्ष पर हैं. देश में औनलाइन कारोबार का जनक व पितामह फ्लिपकार्ट को माना जाता है. वर्ष 2007 में स्थापित इस उपक्रम का सालाना राजस्व (वर्ष 2013-14) 179 करोड़ रुपए है. अमेजौन इंडिया और स्नैपडील 169 तथा 154 करोड़ रुपए के साथ क्रमश: दूसरे व तीसरे पायदान पर हैं. इन कंपनियों की आय का प्रमुख स्रोत विक्रेता से कमीशन, अपने पोर्टल पर उत्पाद सूचीबद्ध कराने की फीस के अलावा प्रति उत्पाद बिक्री मार्जिन और विज्ञापन शुल्क है. हकीकत में मोटा मुनाफा कमा रही ये कंपनियां कागजों पर तो भारीभरकम घाटा (वर्ष 2013-14 के दौरान क्रमश: 400, 321, 265 करोड़ रुपए) दिखाती चली आ रही हैं पर संपूर्ण उद्योग जगत व विश्लेषक इसे स्वीकार नहीं करते. सभी का एकसिरे से यह मानना है कि चूंकि यह कारोबार पूरी तरह दलाली या कमीशनखोरी पर आधारित है और इस में सेवा प्रदाता को माल खरीदना या स्टौक करना नहीं पड़ता (दूसरे शब्दों में, अपने पल्ले से कुछ भी निवेश नहीं करना पड़ता) इसलिए किसी भी किस्म के घाटे का सवाल ही पैदा नहीं होता.

पिछली दीवाली पर फ्लिपकार्ट, स्नैपडील व गूगल के विशेष त्योहारी मेलों व डिस्काउंट पर एलजी, सोनी, लेनेवो व सैमसंग के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुख्य वितरकों ने बताया कि कंपनियां इस तरह के अवसर बाबत कम लागत व अधिक मार्जिन वाले एक्सक्लूसिव उत्पाद बनाती हैं. ये उत्पाद बाजारों में नहीं उपलब्ध होते. इस के अलावा पुराने आउटडेटेड माल को भी अच्छेखासे मार्जिन पर बेच दिया जाता है. सोनी के एक वितरक के मुताबिक, उस मेले में कंपनी ने अपने बंद हो चुके एक पुराने आउटडेटेड एलईडी टैलीविजन को

80 हजार रुपए की एमआरपी दिखा कर 24 हजार रुपए में बेच कर प्रति सैट 1,700 रुपए कमा लिए. औफलाइन कारोबारियों की तर्ज पर अब तो ये औनलाइन कारोबारी कंपनियां चालू त्योहारी सीजन में बड़े पैमाने पर चीन का सस्ता सामान सीधे वहां के निर्माताओं को और्डर दे कर बुक करा रही हैं. वे निर्माता अपने भारतीय वितरकों अथवा वैंडरों के माध्यम से सीधे इन कंपनियों के उपभोक्ताओं तक डिलीवरी करेंगे. इस प्रकार बगैर किसी भंडारण की व्यवस्था और भारीभरकम निवेश के ये कंपनियां केवल कमीशन मात्र से मुनाफा अर्जित करेंगी. यानी खुदरा व लघु दुकानदारों की तरह इन कंपनियों ने भी चीन का हर तरह का बेहद सस्ता व तड़कभड़क वाला माल बेच कर मुनाफा कमाने का रास्ता अख्तियार कर लिया है. चीन का माल बेहद सस्ता तो होता है लेकिन उस की कोई गारंटी नहीं होती. इस प्रकार यह बिना जोखिम मुनाफे वाला रास्ता है.

आधुनिकता एवं इंटरनैट के इस युग में जहां वैश्विक स्तर पर, कारोबार को चलाने व अधिक से अधिक ग्राहक बटोरने बाबत नित नए हथकंडे व तरीके अपनाए जा रहे हैं वहीं अपने देश में अभी तक भी ज्यादातर कारोबार करने का वही पुराना घिसापिटा तरीका चला आ रहा है और यही कारण है कि कोई भी नया तरीका बड़ेबड़े खुदरा कारोबारी दिग्गजों को न केवल तकलीफ प्रदान करता है बल्कि उन के मुनाफे में सेंध भी लगाने लगता है. एकाधिकारपरस्त माहौल में पलेबढ़े प्रतिष्ठित सूरमा उद्यमी वैश्विक स्तर के इस तरह के खुले व प्रतिस्पर्धी माहौल के आदी नहीं हैं. इसीलिए जहां नई पीढ़ी इसे हाथोंहाथ ले रही है वहीं पुरातन सोच इस के विरोध पर उतारू है. इस से पहले भी यही वर्ग विदेशी खुदरा स्टोरों के विरोध में उतरा था.

इस के बावजूद सब या अधिकांश उत्पादों में तो नहीं, पर तमाम उत्पादों के बाबत औनलाइन कारोबार की लोकप्रियता व महत्त्व इतनी ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है कि भारत के वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा लिखी गई नई किताब बिक्री के लिए केवल औनलाइन ही उपलब्ध कराई गई और उपलब्धता के 2 दिनों के दरम्यान ही बैस्ट सेलर की सूची में दर्ज हो गई. जैसा कि किताब के प्रकाशक ने करार किया था. यह किताब केवल एक औनलाइन कारोबारी कंपनी द्वारा ई कौमर्स के प्लेटफौर्म पर ही बेची गई. इस से पहले भी अपने देश में बड़ीबड़ी हस्तियों द्वारा लिखी कई नई किताबें केवल औनलाइन बेची गईं और उन से अच्छा मुनाफा कमाया गया. हालत यह है कि एक तरफ तो बड़ेबड़े क्रौसवर्ड व स्टारमार्क सरीखे खुदरा पुस्तक विक्रेता व प्रकाशक ग्राहकों की बेरुखी यानी टोटा झेल रही हैं दूसरी ओर औनलाइन कारोबारी कम कीमत पर पुस्तकें बेचने में नित नए रिकौर्ड स्थापित कर रहे हैं. इस का मतलब कुछ चीजों में अब कारोबारी परिदृश्य व तरीका बिलकुल बदलता जा रहा है.

और जहां तक सस्तेमंदे का सवाल है, देश के प्रबुद्ध खुदरा कारोबारियों ने इस का तोड़ भी निकाल लिया है. इन औनलाइन स्टोरों पर अब केवल वही चीजें सस्ती मिलती हैं जिन पर स्वयं निर्माता कंपनी डिस्काउंट दे रही है या फिर उन का इंतजाम चीन से किया गया है या कोई नया विशेष ऐसा उत्पाद जो बाजार में उपलब्ध न हो जैसे कोई पुस्तक विशेष या मोबाइल, रेफ्रिजरेटर आदि का विशेष मौडल. थोक व खुदरा कारोबारी अब दिल्ली, मुंबई व अन्य महानगरों से बिना वैट आदि कर चुकाए चीन निर्मित सस्ता माल ला कर इन औनलाइन स्टोरों से भी कम कीमत पर बेच रहे हैं. गत माह इस प्रतिनिधि ने एचपी कंपनी के ‘1020 प्लस’ नामक मौडल के पिं्रटर की कीमत स्नैपडील, फ्लिपकार्ट व एचपी के स्वयं के औनलाइन स्टोर पर मालूम की. इन पर क्रमश: 8,100, 8,175 व 8,456 रुपए की कीमत पाई गई जबकि स्थानीय वितरक ने मात्र 7,300 रुपए में यह प्रिंटर दे दिया. किताबें, मोबाइल, कपड़े आदि कुछ चुनिंदा चीजें ही ऐसी हैं जो औनलाइन स्टोरों पर बाजार से थोड़ी कम कीमत पर अब भी मिल रही हैं.

देश की 90 फीसदी आबादी पुरातन सोच की है और आज भी छोटीबड़ी खरीदारी के लिए अपने आसपास या शहर के मुख्य बाजारों में स्थित अपनी खास जानपहचान वाली दुकानों पर ही जाना पसंद करती है. और शायद यही कारण है कि बैस्ट प्राइस व वीमार्ट जैसे बड़े खुदरा स्टोर व बड़ेबड़े शौपिंग मौल्स आए तो बड़े धूमधड़ाके से थे पर बंद चुपचाप रातोंरात हो गए. वास्तविकता यह है कि आज की तारीख में देशभर में मात्र एक फीसदी मौल्स ही कामयाबी का दरजा प्राप्त कर पाए हैं. भारत की जनता से खराब रिस्पौंस मिलने से नए मौल्स संबंधी तमाम परियोजनाएं शुरू होने से पहले ही समाप्त पर दी गईं और बिलकुल यही हाल व रिपोर्ट औनलाइन कारोबार की है.

समाज की 95 फीसदी से भी ज्यादा की आबादी अब भी अपनी रोजमर्रा की दूध, ब्रैड, कलम, कौपी, आटा, सीएफएल, सब्जी आदि प्रकार की जरूरतें आसपास के छोटे दुकानदारों व बाजारों से पूरी करती है. एक आम आदमी या उपभोक्ता कलम, सेब, ब्रैड आदि तुरंत नजदीकी दुकान अथवा घर के पास से आवाज देते निकल रहे ठेले वाले से ले लेता है. वह जरा भी प्रतीक्षा नहीं करता परंतु नए मोबाइल या कोई पुस्तक के लिए आज औनलाइन और्डर करना ज्यादा पसंद करता है. इस के लिए वह बड़े आराम से 4-5 दिन प्रतीक्षा कर लेता है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो औनलाइन व औफलाइन दोनों ही कारोबारों की प्रकृति में जमीनआसमान का अंतर है. घर में यदि अचानक मेहमान आ जाए तो आप तत्काल निकटतम दुकान से समोसा आदि मंगवा कर चाय या ठंडा बना लेंगे पर औनलाइन और्डर कर के प्रतीक्षा नहीं कर सकते. व्यावहारिक रूप से किसी भी दशा में यह संभव है ही नहीं और हो भी नहीं सकता. इंटरनैट, फोन व तमाम दुकानदारों तथा हर वर्ग के तमाम उपभोक्ताओं से बात कर के ये निष्कर्ष निकाले गए हैं. चौंकाने वाली बात यह भी है कि देश का 78 फीसदी तबका कारोबार की इस नई विधा से या तो अनभिज्ञ है या उसे इस का इस्तेमाल करना नहीं आता या वह इन चक्करों में नहीं पड़ना चाहता. अधिकांश युवा आज ब्रैंडेड जूते, चप्पल, चश्मा, मोबाइल, किताबें, वौलेट आदि लग्जरी वस्तुएं तो औनलाइन मंगवा रहे हैं पर तमाम बातचीत, सर्वे व निरीक्षण में पाया गया है कि वे भी अपनी रोजमर्रा की आम जरूरत का सामान स्वयं अपने क्षेत्र की नजदीकी दुकान से ही लाते हैं. और यह स्थिति गुड़गांव, बेंगलुरु व नोएडा जैसे इलाकों की भी है जहां बड़ी तादाद में छोटाबड़ा हर स्तर का कामकाजी तबका रहता है.

हकीकत तो यह है कि औनलाइन स्टोर लोकप्रिय भले ही हो रहे हों पर आम खुदरा व्यापारियों पर इस का असर बिलकुल भी नहीं पड़ा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बड़े महानगर मेरठ में एक वैरायटी स्टोर के मालिक वैभव का मानना है, ‘‘जमाना चाहे कितना भी क्यों न बदल जाए भारतीय समाज खरीदारी हमेशा दुकानों में जा कर ही करना पसंद करता है. ज्यादा वैरायटी, कीमतों में मोलभाव, उधार, सामान की वापसी व अदलाबदली आदि कई कारण इस के साथ जुड़े हुए हैं. हमारी बिक्री में जरा भी फर्क नहीं पड़ा.’’

इसी तरह अलका सूट एंपोरियम के मालिक सुधीर चावला भी इस से सहमत हैं. महिला ग्राहकों से खचाखच भरे अपने एंपोरियम में बमुश्किल समय निकाल कर चावला बताते हैं, ‘‘नईनई वैरायटी, कीमत में मोलभाव, उधार व मुफ्त की मनचाही फिटिंग के चलते आज भी ग्राहक स्थानीय दुकानों की ओर ही दौड़ता है.’’ एक मोबाइल शौप के मालिक चरनजीत मानते हैं, ‘‘मोबाइल की बिक्री में भारी गिरावट आई है.’’सहारनपुर स्थित एसजी आटोमेशन के मालिक विकास का मानना है, ‘‘पैन ड्राइव, माऊस, स्पीकर आदि छोटीमोटी चीजों का उठान तो कम अवश्य हुआ है पर कंप्यूटर, पिं्रटर आदि में कोई खास फर्क नहीं है.’’  पर मेरठ में विभिन्न इलैक्ट्रौनिक आइटमों के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बहुत बड़े वितरक आहूजा ऐंड संस के मालिक के मुताबिक, इन औनलाइन स्टोर्स से उन्हें काफी फायदा हुआ है और इस के लिए उन्होंने अपने यहां एक अलग प्रकोष्ठ स्थापित किया है. उन के मुताबिक, अधिकांश ई कंपनियों ने स्थानीय डिलीवरी के लिए स्थानीय कारोबारियों से अनुबंध कर रखा है और यदि उन के इलाके का या बिलकुल पड़ोस का ग्राहक भी औनलाइन कंपनियों से सामान मंगवाता है तो डिलीवरी वे ही देते हैं.

तहकीकात से एक बात और निकल कर आई कि तमाम ई कंपनियां हैंडबैग, कुशन, टेबलक्लौथ आदि बुटीक संबंधी अनगिनत फैंसी आइटम घरेलू कामकाजी महिलाओं से और्डरों के आधार पर बनवा कर सीधे अपने उपभोक्ताओं को आपूर्ति करती हैं. इसी प्रकार कीमतों की तुलना कर के तमाम बड़े खुदरा व गलीमहल्ले के लघु स्तरीय दुकानदार इन कंपनियों से भी भारी मात्रा में सामान मंगवाते हैं पर ऐसा चाइनीज आइटमों में ज्यादा होता है. यानी उपभोक्ता स्तर का मुद्दा छोड़ दें तो एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकल कर सामने आता है कि अधिकांश मामलों में ई कंपनियां और दुकानदार दोनों ही एकदूसरे का व्यावसायिक उपयोग करते हुए एकदूसरे से लाभान्वित हो रहे हैं.

आजकल इंटरनैट व मोबाइल फोन के माध्यम से कहीं से किसी से भी संपर्क किया जा सकता है. आगरा के सदर बाजार स्थित ताल गिफ्ट एंपोरियम के मालिक अरुण शर्मा ने बताया कि उन की बिक्री पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा है पर वे भी अकसर दुकान में बेचने के लिहाज से ब्रैंडेड चाइनीज आइटम औनलाइन कंपनियों से मंगवा लेते हैं. उन का कहना है कि कई बार तो ऐसे आइटमों से उन की बिक्री में इजाफा ही हुआ है. उदयपुर के मशहूर शौपिंग पौइंट हाथी पोल स्थित आर्ट गैलरी के मालिक राज कमल चौबे ने बताया, ‘‘हम तो कई औनलाइन कंपनियों को और्डर पर माल सप्लाई भी करते हैं.’’ पहले केवल फुटकर कारोबार कर रहे चौबे साहब अब थोक व्यापारी भी हो गए हैं. कुल मिला कर निष्कर्ष यह कि अभी औनलाइन कंपनियों को देश के घरघर में पैठ बनाने में कम से कम 10 साल लगेंगे क्योंकि अभी यह हर वर्ग व हर वस्तु तक नहीं पहुंच पाई हैं. फिलहाल इस की अधिकांश पैठ दिल्ली, पुणे व मुंबई जैसे महानगरों व युवा वर्ग तक सीमित है. भारत को कारोबार के इस नए फंडे को अपनाना होगा वरना जैसे हम अन्य तमाम क्षेत्रों में दुनिया से बहुत पीछे हैं वैसे ही इस में भी हो जाएंगे. क्योंकि अब हालत यह होती जा रही है कि अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने तमाम नए उत्पाद केवल औनलाइन प्लेटफौर्म पर ही उपलब्ध करा रही हैं और खुदरा बाजार में बैठे उन के बड़ेबड़े वितरकों के पास उन के उस उत्पाद की कोई जानकारी नहीं होती.

पिछली दीवाली पर कई टीवी निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ऐसा प्रयोग किया जोकि सफल रहा. कंपनियों ने तमाम नएपुराने मौडल नएनए सांचे में बेहद कम यानी त्योहारी कीमत पर औनलाइन प्लेटफौर्म के जरिए लौंच किए और भारी सफलता प्राप्त की. खुदरा बाजार में मौजूद त्योहारी छूट व गिफ्ट आदि योजनाओं के बावजूद औनलाइन प्लेटफौर्म पर नए उत्पादों की कीमत काफी कम थी. त्योहारों पर इस तरह के प्रयोगों की सफलता को देखते हुए अन्य कंपनियों ने भी यही रास्ता अख्तियार करना शुरू कर दिया है. अब अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने नए उत्पाद बेहद किफायती दरों पर केवल औनलाइन ही लौंच कर रही हैं और सफलता के नित नए रिकौर्ड बना रही हैं. इस खेल में भारतीय कंपनियों की उपस्थिति न के बराबर है

बदलनी होगी पुरानी सोच

यह विडंबना ही है कि भारतीय कंपनियां अब भी इसे हलके में ले रही हैं और वही रास्ता अपनाने पर तुली हुई हैं जो विदेशी खुदरा स्टोरों के बाबत अपनाया गया था. देशी कारोबारी युवा पीढ़ी के बदलते रुझान को पकड़ कर समय के साथ चलने से अब भी पीछे हट रहे हैं जो कि आखिरकार उन के लिए ही नुकसानदेह सिद्ध होगा. वैसे भी किसी भी कारोबारी मौडल का सफल या विफल होना जनता यानी उपभोक्ता पर निर्भर करता है, कारोबारियों की सोच पर नहीं. और शायद इसीलिए करोड़ों की लागत व निवेश से बने बड़ेबड़े मौल्स फेल हो गए पर उन्हीं के आसपास मौजूद छोटीछोटी दुकानें ठाठ से चल रही हैं. यह आश्चर्य ही है कि एक ओर जहां देश की नव युवा पीढ़ी इस बदलाव को तेजी से अपना रही है वहीं हमारा कारोबारी समुदाय अब भी अपनी पुरातन सोच पर ही अड़ा हुआ है. कुल मिला कर आम जनता व सभी प्रकार के उपभोक्ताओं को कारोबार की इस नई विधा से केवल इतना फायदा जरूर हुआ है कि उन्हें वाजिब कीमत पर घरबैठे हर तरह की चीज मयस्सर हो जाती है और वे ई कंपनियों के दाम विश्लेषित कर स्थानीय दुकानदारों से मोलभाव कर लेते हैं. दूसरी ओर कारोबार के लिहाज से ये दोनों ही विधाएं एकदूसरे के सहयोग से खूब फलफूल रही हैं

शाकाहार बनाम मांसाहार

मानव जन्मजात शाकाहारी नहीं है और उन कुछ जीवों में से है जो शाकाहारी और मांसाहारी दोनों हैं पर शाकाहारी होने को श्रेष्ठता और शुद्धता का प्रमाणपत्र मान कर गले में लटका कर चलना भी गलत होगा. हिंसा बुरी है पर यह बुराई दूसरे आदमियों के प्रति ज्यादा है, पशुपक्षियों के लिए नहीं जो केवल जिंदा रहने के लिए एकदूसरे को खाते रहते हैं. मानव के अलावा अन्य पशु या जीव केवल आनंद के लिए या अपना शक्ति क्षेत्र स्थापित करने के लिए हिंसा नहीं अपनाते. जिन लोगों ने धर्म के नाम पर हाल ही में शाकाहारी थोपने की कोशिश की, जिसे आखिरकार उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय ने रोक दिया, वे हिंसक नहीं हैं क्या, दावा कर सकते हैं? जैन धर्म में सैकड़ों राजा हुए हैं जिन्होंने सेनाएं खड़ी कीं, युद्ध किए और हिंसा की और तभी आप को जैन मंदिर व जैन मूर्तियां दिखती हैं. ये अपनेआप पैदा नहीं हुईं. ये राजा के सैनिकों, जिन के पास हथियार होते थे, जो शत्रु को नष्ट करते थे, द्वारा स्थापित राज में कर वसूल कर बनवाए गए थे. वे आज शाकाहारी मत दूसरों पर थोपें, यह गलत है. सरकार का जैनियों के प्रति मोह अनायास नहीं उमड़ा. यह सोचीसमझी साजिश है जो मांसाहारी मुसलमानों को परेशान करने मात्र के लिए अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है. इस से जिन व्यवसायियों का धंधा खराब होता है उन में हिंदू और मुसलिम दोनों हैं. हां, हिंदू आमतौर पर नीची जातियों के होते हैं जिन्हें सवर्ण अछूतों की श्रेणी में रखते हैं. उन का धंधा बंद कर के इस व्यापार में लगे सभी पर नियंत्रण लगेगा. गो वध को बंद कर भी यही किया जा रहा है. वातावरण पैदा किया जा रहा है कि मानो गो हत्या केवल मुसलिम करते हैं. मुसलिमों में गोभक्ति नहीं है क्योंकि उन्हें ब्राह्मणों को गोदान नहीं करना होता पर उस का व्यापार हिंदूमुसलिम दोनों ही करते हैं और ये व्यापारी गरीब बेचारे हैं.

मांसाहारी होना कोई अच्छा नहीं है पर युगों से मांस खा कर ही आदमी आज अरबों की तादाद में हैं. यह प्राकृतिक है. अब मांस पैदा करने के लिए अन्न उगाना पड़ रहा है क्योंकि जिन पशुओं को मार कर खाया जाता है वे सब शाकाहारी हैं. शाकाहार का प्रचलन दुनियाभर में बढ़ रहा है. सरकार, संघ और जैनी चाहें तो इस का आंदोलन खड़ा कर सकते हैं. पर जिन लोगों को नशीली दवाएं रोकने की चिंता नहीं, तंबाकू रोकने की चिंता नहीं, पैर फैलाती शराब को रोकने की चिंता नहीं, वे अचानक पशुप्रेमी हो गए कि दूसरे की थाली पर हमला करने लगे. यह आश्चर्य की बात है. यह धार्मिक संकीर्णता का प्रयोग है जो वैचारिक संकीर्णता की ओर ले जाएगा. यह टैस्ट करना है कि लोग भगवा सिद्धांतों को वोट से कितना जोड़ते हैं. अभी तक तो जनमानस ने अच्छे दिनों की चाहत में अपना खानपान बदलना स्वीकार नहीं किया है, सोच तो दूर की बात है.

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