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धर्मयुद्ध के मुहाने पर दुनिया

दुनिया एक बार फिर विश्वयुद्ध के कगार पर है. विश्व के देशों में आईएस से निबटने की रणनीति तैयार की जा रही है. दूसरे विश्वयुद्ध की तर्ज पर विभिन्न देशों के  बीच गुटबंदी शुरू हो चुकी है. एकदूसरे पर जबान और हथियारों से हमले किए जा रहे हैं. सामरिक रणनीतियां परवान चढ़ाई जाने लगी हैं. कारण वही है चिरपरिचित, सदियों पुराने सड़ चुके धर्म और तमाम पराकाष्ठाओं को लांघती धर्मों की बर्बर संकीर्ण सोच, जिस के कारण सदियों से इस पृथ्वी पर बड़ीबड़ी लड़ाइयां होती रही हैं. 13 नवंबर को आईएस द्वारा फ्रांस में किया गया हमला एक तरह से दूसरे पर्ल हार्बर पर आक्रमण था. 13 नवंबर के हमले में पेरिस के कंसर्ट हौल में 130 लोगों को जान गंवानी पड़ी. इस हमले के बाद सीरियाई क्षेत्र में स्थित आईएस के ठिकानों पर फ्रांस सरकार के बमवर्षक विमानों की गड़गड़ाहट गूंजने लगी. फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने बदला लेने की बात कहते हुए वहां अपनी सैन्यशक्ति झोंक दी. बदले की इस कार्यवाही के बाद मुसलिम देशों में ही नहीं, अन्य राष्ट्रों में भी युद्ध की भयावहता पर चिंता व्याप्त हो गई. इस कार्यवाही में रूस, ब्रिटेन, अमेरिका भी शामिल हो गए हैं और आईएस पर हमला बोल दिया गया है. दुनियाभर के देशों में हलचल बढ़ गई है. फ्रांस पर हमले के बाद रूस के विमान को तुर्की द्वारा गिरा देने के बाद कुछ देशों के बीच आपसी तल्खी और बढ़ गई. आईएस से मुकाबले के लिए गैरइसलामी देशों के बीच एकता दिखाई देने लगी.
 
पश्चिमी देशों को आशंका सता रही है कि आईएस के पास जैविक हथियार न हों और अगर परमाणु हथियार उन के हाथ लग गए तो दुनिया को भारी विनाश से कोई नहीं रोक पाएगा.लिहाजा, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मामले को ले कर गंभीर गुफ्तगू चल रही है क्योंकि आईएस अपने मजहब बहुल वाले देशों में कत्लेआम तो मचाए हुए है ही, पश्चिम के लिए भी खतरा बना हुआ है. रूस ने सीरिया के अपने वायुसेना ठिकाने पर मिसाइल रक्षा प्रणाली तैनात करने का ऐलान कर दिया. उधर, भारत और रूस का साझा युद्धाभ्यास पोखरण क्षेत्र में शुरू हो गया. यूक्रेन ने सभी रूसी विमानों को अपनी हवाई सीमा में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया. उधर, रूस ने यूक्रेन के लिए गैस की खेप रोकने का ऐलान कर दिया था. यूक्रेन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बहुत हद तक रूस पर निर्भर है. जापान, जरमनी, आस्ट्रेलिया समेत दूसरे देश भी सतर्क हो गए हैं. इन देशों की सेनाओं ने अपनेअपने हथियार पोंछने, चमकाने शुरू कर दिए हैं. रोचक तथ्य है कि कभी नाटो के सदस्य रहे पाकिस्तान ने आईएस के खिलाफ युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया. पाकिस्तान का कहना है कि उस के 1 लाख 82 हजार सैनिक पहले से ही अफगानिस्तान की सीमा पर तैनात हैं.
 
इराक व सीरिया से भाग रहे और मारे जा रहे लोगों के हालात विश्वयुद्ध जैसे ही हैं. इन घटनाक्रमों को विश्वयुद्ध का आगाज माना जा रहा है. आमतौर पर जनमानस की धारणा है कि अमेरिका, फ्रांस जैसे देशों पर आतंकवादियों के हमले इसलाम के नाम पर कट्टरपंथियों का काफिरों यानी गैर मुसलमान देशों पर हमला है. इस संघर्ष में एक तरफ कट्टर इसलामी संगठन और भीतरी तौर पर उन की पैरोकार सरकारें तथा दूसरी ओर बाकी धर्मों के मानने वाले देश शामिल हैं. आतंकियों के निशाने पर प्रगतिशील, उदार विचारों वाले मुसलिम और उन के देश भी हैं. इराक, सीरिया, लेबनान, तुर्की, सऊदी अरब, सूडान, लीबिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत समेत कई देश आईएस के निशाने पर हैं. आईएस इन देशों को इसलामिक राज्य घोषित करना चाहता है और फिर यहां इसलामिक शरीया कानून थोपने की सोच रहा है. यह बात आईएस कई बार जाहिर कर चुका है. यह कट्टरपंथी संगठन मध्यपूर्व की प्राचीन धरोहर को नष्ट करने में लगा है. वह दूसरे धर्मों के स्थलों को नेस्तनाबूद कर रहा है. सैकड़ों लड़कियोें को अपहृत कर वह उन के साथ बलात्कार, जबरन शादी करता है उन का और धर्म परिवर्तन करा रहा है. वह सीरिया केकुछ हिस्से पर कब्जा कर चुका है जहां उसी की हुकूमत चलती है. अब वह लीबिया में घुस रहा है. पश्चिम एशिया में मजहब बड़ी समस्या है. राज्य की पहचान स्थापित करने मुसलमानों और उस की ताकत दिखाने में वहाबी मुसलमानों और शिया मुसलमानों द्वारा इसलाम के इस्तेमाल किए जाने का वहां इतिहास रहा है. क्षेत्र में संस्कृति बहुल के लिए कोई विशेष जगह नहीं रही है कि शिया, सुन्नी, यजिदी, कुर्द, तुर्क, ईसाइयों के विभिन्न पंथ हाशमी, बेडूइन और यहूदी शांतिपूर्ण रहे हों. फ्रांस और ब्रिटेन सहित यूरोप द्वारा उपनिवेश बनाने तथा अमेरिका के हाल के हमले का यहां इतिहास रहा है.
 
एशिया एकमात्र महाद्वीप है जो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान में हुए परमाणु हमले का घाव झेल चुका है. चिंता इस बात की है कि एशिया में कईर् देशों के पास परमाणु हथियार हैं. रूस, भारत, चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों से लैस हैं. मौजूदा समय में एशिया में शक्ति संतुलन के लिए कई देशों में होड़ लगी है. शीतयुद्ध की महाशक्ति रूस सहित चीन और भारत भी महाशक्ति के तौर पर अपना दावा पुख्ता करने में लगे हैं. 2013 में उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण करने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा उस पर प्रतिबंध लगा दिए गए थे. उस के बाद अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने सालाना संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया जिस के बाद उत्तर कोरिया ने आरोप लगाया था कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी शक्ति स्थापित करने के लिए उसे जंग की ओर ढकेलना चाहता है. इस क्षेत्र में धर्म की कट्टरता और खूनी नफरत का फैलाव जारी है. इन सब के बीच भारत भी इसलामी आतंकवाद के भय से गैरइसलामी देशों के साथ दोस्ताना ताल्लुकात बढ़ा रहा है. महाभारत युद्ध की तर्ज पर विश्वभर के राजाओं के साथ मिल कर युद्ध में जीत की जमीन तैयार की जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले डेढ़ साल में आधी दुनिया को नाप चुके हैं. वे इसलामी आतंकवाद के खिलाफ विश्व के देशों को एकजुट करने की कवायद में जुटे हैं. इस के साथ वे विश्व में रह रहे प्रभावशाली अमीर हिंदू भारतीयों के जरिए कई देशों की सरकारों को वश में करने के प्रयास में हैं.
 
यह असल में धर्मयुद्ध है. इस पृथ्वी पर धर्मयुद्धों का बहुत पुराना इतिहास रहा है. यूरोप में शताब्दियों पहले दशकों तक चले क्रुसेड्स में करोड़ों लोग धर्म की बलि चढ़ गए थे. प्रथम विश्वयुद्ध की बात करें तो कहने को यह औद्योगिक कारणों से लड़ा गया लेकिन इस के पीछे गुलाम बनाने वाली धार्मिक श्रेष्ठ मानसिकता निहित थी. 1914 से 1918 में लड़े गए इस महायुद्ध में बड़े देश ऐसे उपनिवेश चाहते थे जहां वे कच्चा माल पा सकें और मशीनों से बनाई गई चीजें बेच सकें. इस काम के लिए सैनिक संधियां की गईं. इस से देशों में आपसी अविश्वास और वैमनस्य उत्पन्न हुआ. बहाना बना आस्ट्रिया की गद्दी के उत्तराधिकारी आर्क ड्यूक फर्डिनैंड और उन की पत्नी की हत्या का.
इस वारदात के एक महीने बाद आस्ट्रिया ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया. फ्रांस, रूस और ब्रिटेन ने सर्बिया की मदद की और जरमनी, आस्ट्रिया की तरफ हो गया. कुछ समय बाद ब्रिटेन, जापान की ओर से व तुर्की, जरमनी की ओर से युद्ध में शामिल हो गया. युद्ध यूरोप, एशिया और अफ्रीका-3 महाद्वीपों में लड़ा गया. शुरू में जरमनी की जीत हुई. जरमनी ने कई व्यापारी जहाजों को डुबो दिया. इस से अमेरिका, ब्रिटेन की तरफ से युद्ध में कूद पड़ा पर रूसी क्रांति के बाद रूस अलग हट गया. 1918 में ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका ने जरमनी व दूसरे देशों को हरा दिया. इस महायुद्ध में करीब 1.6 करोड़ लोगों को जान गंवानी पड़ी थी. प्रथम विश्वयुद्ध का आधार 13वीं शताब्दी में ही तैयार हो गया था. तब ओटोमन साम्राज्य तमाम मुसलिम राष्ट्रों से बड़ा था. वहां ज्यादातर लोग मुसलमान थे या परिवर्तित थे. 13वीं सदी से ही उन में पड़ोसी ईसाइयों से वैरविद्वेष था. इन मुसलिम देशों की सेनाएं यूरोप केखिलाफ सैनिक मार्च निकालती थीं. सेना में उलेमा, धर्मगुरु भी होते थे. 1481 के बाद तुर्क शासन ग्रीक और बाल्कन समेत एशिया में स्थापित हो गया. तुर्क इसलामिक शासन स्थापित करना चाहते थे. उन के शासन में यहूदी दूसरे दरजे में आते थे पर वे इसलाम धर्म अपनाकर शासक वर्ग में शामिल हो सकते थे.

 
पहले विश्वयुद्ध के समय भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था. भारत के सैनिक भी युद्ध में शामिल हुए थे. युद्ध शुरू होने से पहले जरमनी ने कोशिश की थी कि भारत में ब्रिटेन के खिलाफ आंदोलन शुरू किया जा सके लेकिन रियासतों और कांग्रेस ने इस युद्ध में ब्रिटेन की आर्थिक और सैनिक सहायता की थी. 1933 में जरमनी  का शासक एडोल्फ हिटलर बना और उस ने एक शक्तिशाली सैन्य ताकत के रूप में प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. यहूदियों से नफरत दूसरे विश्वयुद्ध का सब से बड़ा कारण था. इस बात से फ्रांस और इंगलैंड चिंतित हो गए जो पिछली लड़ाई में काफी नुकसान उठा चुके थे. उधर, इटली भी इस बात से परेशान था कि जरमनी उस के काम में दखल देगा क्योंकि इटली भी शक्तिशाली बनना चाहता था. इन तमाम बातों के चलते खुद को बचाने के लिए फ्रांस ने इटली के साथ हाथ मिलाया और उस ने अफ्रीका में इथियोपिया को इटली को देने का फैसला कर लिया. यह देश उस के कब्जे में था. हिटलर ने संधि तोड़ी, घोषणापत्रों को दरकिनार किया. इटली ने इथियोपिया पर हमला कर दिया. केवल जरमनी ने इस हमले को सही ठहराया. इस कारण इटली ने जरमनी को आस्ट्रिया पर कब्जा करने की मंशा को हरी झंडी दे दी.
 
वक्त बीतता गया, देशों के बीच तनाव बढ़ता गया और एकदूसरे से ताकतवर बनने की कोशिशें होती रहीं. यूरोप में जरमनी और इटली ज्यादा शक्तिशाली होते जा रहे थे. जरमनी ने 1938 में आस्ट्रिया पर हमला बोल दिया. लेकिन दूसरे यूरोपीय देशों ने इस का विरोध नहीं किया. इस बात से हिटलर उत्साहित होता गया. दूसरे विश्वयुद्ध के समय भी भारत पर अंगरेजों का कब्जा था, इसलिए भारत ने नाजी जरमनी के खिलाफ युद्ध में भाग लिया. गुलाम भारत की ओर से 20 लाख से ज्यादा सैनिक युद्ध के लिए लड़े. इस के अलावा सभी देसी रियासतों ने युद्ध के लिए बड़ी मात्रा में अंगरेजों को धनराशि दी थी. 1939 से 1945 तक चले दूसरे विश्वस्तरीय युद्ध में 70 देशों की सेनाएं शामिल थीं. इन में धर्म ओतप्रोत था. युद्ध में विश्व 2 हिस्सों में बंट गया था. इस में 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया. यह मानव इतिहास का सब से ज्यादा घातक युद्ध साबित हुआ. इस में 5 से 7 करोड़ लोगों की जानें गईं. इस की शुरुआत नाजी जरमनी द्वारा की गई. यह धार्मिक वैमनस्य की उपज थी. नाजी यहूदियों को खत्म कर देना चाहते थे. जरमनी ने पहले पोलैंड पर हमला बोला. उस के बाद फ्रांस ने जरमनी पर युद्ध की घोषणा कर दी तथा इंगलैंड व दूसरे राष्ट्रमंडल देशों ने भी इस की स्वीकृति दे दी. जरमनी ने 1939 में यूरोप में एक बड़ा साम्राज्य बनाने के उद्देश्य से पोलैंड पर हमला किया था. अंत तक जरमनी ने यूरोप का एक बड़ा भाग अपने अधीन कर लिया था. 1944 और 1945 के दौरान अमेरिका ने कईर् जगहों पर जापानी नौसेना को शिकस्त दी तथा पश्चिमी प्रशांत के कई द्वीपों पर अपना कब्जा जमा लिया. जब जापानी द्वीप समूह पर आक्रमण करने का समय आया तो अमेरिका ने जापान में 2 परमाणु बम गिरा दिए. मध्य युग में 11 से 13वीं सदी के बीच 200 सालों तक यूरोप में धर्मयुद्ध चला. 10वीं सदी के आखिरी वर्षों में इसराईल पर कब्जे के लिए खूनी युद्ध शुरू हो गया था. भारत में 1947 के भारतपाक विभाजन का संघर्ष और जम्मूकश्मीर में दशकों से धर्मयुद्ध चल रहा है. भारतपाकिस्तान के बीच 6 दशक से ज्यादा समय से लड़ाई चल रही है. यह धर्मों की नफरत का ही नतीजा है. 
 
धर्मग्रंथों में जिहाद
 
असल में इन देशों में धर्म पर आधारित कानून बने हुए हैं जो दूसरे धर्म के साथ भेदभाव करने वाले होते हैं. ज्यादातर अरब देशों में मजहबी किताबों में लिखी गई बातों को ही कानून बना दिया गया है. इन किताबों में जिहाद की शिक्षा दी गई है. बताया गया है कि  काफिरों को खत्म कर देना चाहिए. ऐसा करना ऊपर वाले का हुक्म है. लिहाजा मुसलिम देशों में बच्चों के खून में जिहाद बहने लगता है. धर्र्म के लिए वे कुछ भी करगुजरने को तैयार रहते हैं. लोकतंत्र को धर्म पनपने नहीं देता. धर्म व्यक्ति पर तानाशाही थोपता है. लोकतंत्र दरअसल लोगों की स्वतंत्रता की पैरवी करता है, इसलिए मजहबी देशों में मानव अधिकारों का हनन अधिक होता है. धर्मग्रंथों में जिहाद का जिक्र है. 11वीं सदी के आरंभ में क्रुसेडरों ने जब यरुशलम के लिए मोरचाबंदी की तो पहली बार मुसलमानों को जिहाद के लिए इकट्ठा किया गया. सीरिया को एकजुट कर मुसलमानों ने ईसाइयों को खदेड़ कर इसलामिक गणराज्य बनाया. इस के बाद से जिहाद और बड़े पैमाने पर दुनिया में फैलने लगा. ईसाइयों ने अपनी पवित्र भूमि फिलिस्तीन और उस की राजधानी यरुशलम स्थित ईसा की मजार पर कब्जा करने के लिए 1095 और 1291 के बीच धर्मयुद्ध किए. उस वक्त उस जमीन पर इसलाम की सेना ने कब्जा जमा रखा था. लेकिन कहा जाता है कि इस भूमि पर मूसा ने अपने राज्य की स्थापना की थी. इस भूमि पर यहूदी भी अपना अधिकार चाहते थे. यह युद्ध धर्मों का युद्ध था. ईसाई, मुसलमान और यहूदी आज भी यहां युद्ध जारी रखे हुए हैं.
धर्म की इस सोच के कारण ही आईएस, तालिबान, जैश-ए-मोहम्मद जैसे खूंखार आतंकवादी संगठन कामयाब होते रहे हैं. विश्व में बड़ी संख्या में युवा इन संगठनों में भरती होने को लालायित दिखाई देते हैं. इन में अनपढ़ ही नहीं, पढे़लिखे लोगों की तादाद भी ज्यादा है. ये लड़ाके यूरोप, अमेरिका जैसे समृद्ध देशों में जा कर उन पर हमला कर के धर्म का मकसद पूरा करने में जुटे हैं. एक धर्म को दूसरा धर्म फूटी आंखों नहीं सुहाता. इसलिए मुसलिम देशों के ये आतंकी कभी अमेरिका, कभी ब्रिटेन, कभी फ्रांस तो कभी अन्य धर्म वाले देशों में खूनखराबा करते हैं. ये संगठन भावी विश्वयुद्ध का कारण बनेंगे. युद्ध हमेशा बरबादी ले कर आता है. पहले से ही गरीब, पिछड़े, भुखमरी के शिकार देशों की हालत और खराब होगी. सीरिया, इराक से भाग कर यूरोप, अमेरिका, जरमनी जैसे देशों में शरण लेने के लिए समुद्र में डूबते, भूख, बीमारी से मरते लोगों को देख कर धर्मयुद्धों के दृश्य ताजा हो रहे है. आईएस के हमलों में हजारों लोग मारे जा चुके हैं, लाखों बेघर हो चुके हैं.
 
इसलामिक स्टेट का हो खात्मा
 
विश्वयुद्ध के लिए विश्वभर में जनमत तैयार होने लगा है. यूरोप के अधिकांश देशों में मुसलमानों को शक की निगाहों से देखा जाने लगा है और उन से भेदभाव बढ़ने लगा है. इसलामिक स्टेट की बर्बरता का जवाब यूरोप या अमेरिका में रह रहे आम मुसलमानों के प्रति अपमानजनक व्यवहार किया जाना नहीं है पर कट्टरपंथी चाहते हैं कि ऐसा हो ताकि दुनिया इसलामी और गैरइसलामी खेमों में बंट जाए ताकि हथियारों में कमजोर मुसलिम आत्मदाह को हथियार बना कर पश्चिमी देशों में भयंकर भय का वातावरण बना सकें. अब के युद्ध में और पिछले युद्धों में फर्क यह है कि अब यूरोप और अमेरिका अपने नागरिकों की जान की बहुत परवा कर रहे हैं. पिछले युद्धों में सरकारों ने सैनिकों की जानों की कोई चिंता न की थी. दूसरी तरफ मुसलिम देशों में जिहाद का प्रचार खूब हो रहा है और धर्म के नाम पर मुसलमान मरने को तैयार हैं. क्या यूरोप, अमेरिका अपनी तकनीक के सहारे इसलामिक स्टेट को समाप्त कर पाएंगे? यह न भूलें कि बहुत सी तकनीकें तो पहले से ही इसलामिक स्टेट के हाथों में हैं.

 
भारत की स्थिति इस युद्ध में अजीब है. यहां के मुसलिम फिलहाल इसलामिक स्टेट में रुचि नहीं दिखा रहे क्योंकि वे जानते हैं कि यह इसलामिक स्टेट अरबियों का है और भारतीय मूल के मुसलमान एक धर्म के होने के बावजूद उन्हें यानी अरबियों को पसंद नहीं हैं. भारत सरकार को आतंकवाद से निबटने के लिए अमेरिका, यूरोप के साथ जाना होगा पर किस हद तक और कब, यह अभी अस्पष्ट है. अमेरिकी जनता को इसलामविरोधी युद्ध की डोज रोज रिपब्लिकन पार्टी के संभावित उम्मीदवार डौनल्ड ट्रम्प से मिल रही है जिसे कट्टरपंथी ईसाई कहा जा सकता है. अमेरिका में अब आर्थिक समस्याओं से उपजे भेदभाव की जगह धार्मिक आतंक से उपजी समस्याओं ने ले ली है और बराक ओबामा को पश्चिम एशिया में सक्रिय होने पर सोचना पड़ रहा है. वरना 2016 में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनावों में उन की डैमोके्रटिक पार्टी के उम्मीदवार की हार पक्की है. डौनल्ड ट्रंप कतई इस युद्ध में सभी तरह के हथियार अपनाने से न हिचकिचाएगा, ऐसा उस की सिरफिरी बातों से लगता है. धर्र्म और आतंकवाद अलग नहीं हो सकते. धर्म का नफरत, बैर, अशांति, कलह, हिंसा और युद्ध से हमेशा से नाता रहा है. यही धर्म की फितरत है. धर्म शांति का वाहक कभी रहा ही नहीं है. न कभी हो सकता है. धर्म कहां सहिष्णुता की सीख देता है. धर्म की उपस्थिति जहां भी रहेगी, वहां लड़ाई की पक्की गारंटी है. दुनिया में शांति, प्रेम, भाईचारा धर्मों के खात्मे से ही स्थापित हो पाएगा, यह पक्का है. अगर इस धरती पर धर्म मौजूद रहा तो धरती का खात्मा तय है. मानवता के बचाव के लिए धर्मों का त्याग करना ही रास्ता है.
 

कट्टरता की जड़ें

इसलामिक स्टेट का पेरिस में कहर ढाना एक तरह से डिप्लोमैसी यानी कूटनीति के लिए अच्छा रहा. अमेरिका, रूस, सऊदी अरब, फ्रांस, ईरान सब उस दुष्ट इसलामिक स्टेट यानी आईएस को निबटाने में अपने हितों को ज्यादा देख रहे थे. दोनों तरफ के लोगों ने जो पैसा एकदूसरे के खिलाफ दिया था उस से ट्रेंड लड़ाकू अब अपने आकाओं की नहीं, इसलामी सोच की सुन रहे हैं. बदलती स्थिति में अब इन खूंखारों को खत्म करने में किस का कैसा नुकसान होगा, यह सब को भूलना होगा. पश्चिमी एशिया की शांति के लिए यूरोप, चीन, अमेरिका, जापान, भारत आदि को भी सोचना होगा. यह समस्या हम से दूर है, यह न सोचें. इसलाम के नाम पर इस समस्या को कहीं भी निर्यात किया जा सकता है. द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू तो यूरोप में हुआ पर उस ने एशिया, अफ्रीका और अमेरिका को भी लपेटे में ले लिया था. वह समाप्त हुआ तब जब जरमनी, जापान और इटली पूरी तरह नष्ट हो गए. और तब यहूदियों को एक देश दिलाया गया जिसे वे अपना कह सकें.

नई कूटनीति के तहत अब केवल सुरक्षा के इंतजाम काफी नहीं हैं, इसलाम को पटरी पर लाना जरूरी है. इस के लिए सऊदी अरब और ईरान, जो सुन्नी और शिया मुसलमानों की शक्ति के केंद्र हैं, लपेटे में लाए जाएं. इन के साथ ही पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नाइजीरिया, सोमालिया, टर्की भी मरम्मत मांगेंगे. कुल मिला कर जहां कट्टर इसलामी हैं, जिन्हें इसलामिस्ट कहना ज्यादा सही रहेगा नाजियों की तरह, को एक कोने में न धकेला जाए. विश्व की ताकतों को हर देश से इसलामिस्टों को निकाल बाहर करना होगा या उन के पर कतरने होंगे. उन की आय के स्रोत बंद करने होंगे. उन्हें पनाह देने वाले केंद्र नष्ट करने होंगे. इसलाम के प्रचार के नाम पर बने कू्ररता और जंगलीपन का पाठ पढ़ाने वालों को नष्ट करना होगा. इस के साथ ही, इन की प्रतिछाया वाले ईसाई, हिंदू व बौद्ध अतिवादियों को भी नियंत्रित करना जरूरी है. अत्याचार व अनाचार का वायरस ऐसा है जो किसी भी धर्म में घुस कर एकजैसा काम कर के लगता है. सभी धर्मों के कट्टर एक तरह से सोचते हैं. वे खुद को ईश्वर का ऐसा दूत मानने लगते हैं जिन के पास हर विरोधी का गला काट देने का लाइसैंस हो, धर्म चाहे कोई भी हो.

विश्व की ताकतों को मुहिम शुरू करने से पहले अपने में झांकना होगा कि इसलामिक स्टेट वाले विषाणु उन के यहां भी तो नहीं पल रहे हैं. वे मौजूद हैं, यह जानना कठिन नहीं है.

शराब पर पाबंदी

नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने राज्य में शराब की बिक्री पर पाबंदी लगा दी है. इस से सरकार को चाहे 4 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो पर जनता को जो लाभ होगा वह इस नुकसान से कहीं अधिक होगा. शराब कोई खाना नहीं है कि उस के बिना कोई जी नहीं सकता. शराब पीना प्राकृतिक नहीं है, इसे पीना सिखाया जाता है और उस सिखाने के पीछे शराब कंपनियां और देशी शराब भट्ठों के मालिक दोनों खूब पैसा खर्च करते हैं. शराब का नुकसान गलीगली, घरघर में देखा जा सकता है. जिसे एक बार शराब की लत पड़ जाए वह किसी भी सूरत में उसे नहीं छोड़ता, घरबार चाहे बिक जाए, सोशल ड्रिंकिंग से शुरू हो कर शराब कब लत बन जाए, यह कहा नहीं जा सकता. जो सोशल ड्रिंकिंग यह सोच कर करते हैं कि एकदो पैग से क्या होगा, वे तनाव में कितनी ही बार बोतलों पर बोतलें चढ़ा जाते हैं.

घर के सदस्य के शराब पीने का खमियाजा औरतों और बच्चों दोनों को भुगतना पड़ता है. उन्हें न केवल धुत्त शराबी की देखभाल करनी होती है, उसे संभालना होता है, बल्कि उस की गालियां भी सुननी पड़ती हैं, उस ने जिन से झगड़ा किया उन से माफी भी मांगनी पड़ती है. शराब पी कर गाड़ी, ट्रक, बस चलाने वाले खुद को तो मारते ही हैं, दूसरों को भी मार डालते हैं. शराब का एक भी ऐसा गुण नहीं है कि सरकार या समाज इसे किसी तरह की मान्यता दे. अफसोस यह है कि सदियों से शराब सरकारी खजाने को भरने का काम कर रही है इसलिए इस को हर तरह से बढ़ावा दिया जा रहा है. शराब से नेताओं और अफसरों की जेबें भरती हैं और वे नीतीश को अपनी जेब पर डाका डालने देंगे, यह असंभव है. अंगरेजी के अखबार जल्दी ही रोना शुरू कर देंगे कि बिहार में शराबबंदी से क्या नुकसान हुए. शराब समर्थक टैलीविजन स्क्रीनों पर उतर आएंगे कि कौन क्या पिएगा, इस का फैसला उसी को करने दें.

शराब कंपनियां और अफसर मिल कर जल्दी ही कानून व्यवस्था का मसला खड़ा कर देंगे. जहरीली शराब मुफ्त पिलानी शुरू कर दी जाएगी ताकि 100-200 लोग मर जाएं और मांग हो जाए कि अच्छी शराब की बिक्री चालू कर दी जाए. सरकार के हाथों में पैसे की कमी का रोना और ज्यादा रोया जाएगा, लोग पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश, नेपाल आदि से शराब ला रहे हैं आदि के समाचार सुर्खियां पकड़ लेंगे. ये सब हरियाणा में हो चुका है जहां मुख्यमंत्री बंसीलाल ने एक बार औरतों की मांग पर शराबबंदी लागू की थी. नीतीश कुमार इस शराब आंधी को कैसे काबू करते हैं, देखने की बात है. यह लगता नहीं कि उन की ताकत शराब कंपनियों, ठेकेदारों, अफसरों व नेताओं से ज्यादा है.

देश की सोच

मनोरंजन की दुनिया की शख्सीयत आमिर खान ने खुली सभा में स्वीकार कर के कि वे बढ़ते कट्टरवाद और उस के परिणाम असहिष्णुता से चिंतित हैं और उन की पत्नी देश छोड़ने तक की बात कर रही है, देश के कट्टर अंधविश्वासी, छाती पीटने वाले व भगवा लाठी फटकारने वालों को चुनौती सी दी है. लोकसभा चुनावों में भारी जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के छुटभैये समझ रहे थे कि 1971 के कांगे्रसी समाजवाद की तरह 2014 में हिंदू पोंगाशाही का युग 500-700 साल बाद आखिर लौट ही आया है.

आमिर खान जानापहचाना चेहरा है. उन के 4 शब्दों से जो तूफान मचा है वह दूसरों के 4000 शब्दों से भी नहीं मचता. वे सच कह रहे हैं, यह तो बाद के तूफान से साफ है कि यहां के पोंगापंथी सच सुनना ही नहीं चाहते. यह कोई नई बात नहीं है. यहां राम नाम या राधेकृष्ण इतना जोरशोर से बोला जाता है कि राम और कृष्ण के बारे में रामायण, महाभारत या भागवत पुराण से उद्धृत सच भी कह दो तो वैसा ही तूफान खड़ा हो जाता है और झूठ को इस कदर तरहतरह के शब्दों में लपेट कर फेंका जाता है कि सच गोबर के ढेर में दब कर, सिसक कर मर जाता है.

आमिर खान ने जो कहा वह देशभर में महसूस किया जा रहा है. मुसलिम ही नहीं, दलित, पिछड़े, आरक्षित सरकारी कर्मचारी, लेखक, कलाकार, विचारक, इतिहासकार देख रहे हैं कि देश की संस्थाओं पर पोंगापंथी का रंग पोता जा रहा है. देश की सोच पर अंकुश लगाया जा रहा है. लोकतंत्र की जान ‘विचारों की अभिव्यक्ति’ को कुचला जा रहा है. यह एक रात में होने वाला काम नहीं है और आम जनता को यह महसूस भी नहीं होता. पोंगापंथी पाखंडों से भ्रमित मध्यवर्ग अनजाने अपने पैरों पर जंजीरें बांध रहा है और भगवाई पाखंड की पाकिस्तान बनने की खीझ और आरक्षण को लागू करने की कुंठा के कारण आमिर खान के वक्तव्य, लालू की जीत, साहित्यकारों की सम्मानवापसी को आश्चर्य से देख रहा है. इस वर्ग को भ्रम है कि उस की प्रगति का राज घंटेघडि़यालों और उन के स्वामियों के हाथों में है. इस वर्ग ने अब तक जो भी पाया है, अपनी मेहनत से पाया है पर हैरानी की बात है कि वह इस का श्रेय  उस पूजापाठ को देता है जिस का धंधा चमकाने के लिए देश को बांटा जा रहा है या पाखंडविरोधियों का मुंह बंद किया जा रहा है.

कल तक आमिर खान इसी वर्ग का आदर्श था. अब जब आमिर ने अपने मन में व्याप्त भय व्यक्त कर दिया है तो उस वर्ग के लिए वे देशद्रोही हो गए, त्याज्य हो गए, शंबूक जैसे अछूत हो गए हैं जिस ने वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया वह एकलव्य बन गया जो धनुर्धारी हो गया. आमिर खान के साथ जो हो रहा है वह हमारे लोगों के साथ सदियों से होता रहा है. यही हमारी गुलामी और गरीबी का कारण रहा है. जब तक ऐसा माहौल रहेगा, न मेक इन इंडिया होगा, न स्वच्छ भारत बनेगा, न अच्छे दिन आएंगे, न सुशासन मिलेगा. ये सब एकदूसरे से जुड़े हैं.

करों पर कर का बढ़ता बोझ

चुनावी गणित ने नरेंद्र मोदी को समझौतावादी रुख अपनाने को मजबूर कर दिया है. उन्होंने कांगे्रस को बुला कर संसद में मिल कर महत्त्वपूर्ण कानून बनवाने में सहायता मांगी है. बिहार चुनावों के परिणामों से पहले भारतीय जनता पार्टी को विश्वास था राम और कृष्ण की कृपा की वजह से वे अपना युद्ध कुछ दिन बाद जीत ही लेंगे पर लगातार बढ़ती कट्टरता के खिलाफ बोलों और चुनावी हारों ने स्पष्ट कर दिया है कि लोकसभा में बहुमत मात्र सरकार की मनमानी के लिए काफी नहीं है. सरकार मुख्यतया गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स यानी जीएसटी कानून पास करवाना चाहती है, जिस से आशा है कि उत्पादकों व व्यापारियों को बेहद फायदा होगा और खरबों की पूंजी व मेहनत का लाभ आम जनता को मिलेगा. करों का बोझ जनता पर है,  यह तो साफ है पर गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स यानी जीएसटी कोई रामबाण नहीं. यह द्रौपदी का चीरहरण भी साबित हो सकता है या एकलव्य का अंगूठा काट भी हो सकता है.

आजकल बहुत से करों का हिसाब करना पड़ता है, पर इतने कर हैं ही क्यों? ये कर नौकरशाही की देन हैं जिस ने समयसमय पर नेताओं को बेवकूफ बना कर लागू करवाया. क्या उस समय के नेता समझ नहीं पा रहे थे कि करों का बढ़ता बोझ किस तरह न केवल जनता की जेब पर डाका है, कर वसूलने में डाकुओं की तरह, जनता की कनपटी पर बंदूक रखनी पड़ती है सो अलग. यह बंदूक अकसर चल ही जाती है. हर साल देशभर में हजारों व्यापार इन टैक्सों के कारण बेमौत मर जाते हैं और उन व्यापार स्वामियों की संपत्ति वर्षों तक बेकार पड़ती रहती है. एक गुड्स और सेवा कर क्या इस समस्या को सुलझाएगा – शायद नहीं. एक अफसर के पास अब इतने अधिक अधिकार हो जाएंगे कि वह हर मक्खी को भी मोटी रिश्वत देने को मजबूर कर देगा. इस में कर की दर सब से बड़ी बात है और ऐसा लगता नहीं कि यह कर कम होगा. अगर कर पर कर न हो और कुल कर बराबर हों तो भी कर चोरी तो होगी ही. अफसरों को बहाना मिल जाएगा कि कर चोरों से निबटने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं जिस का मतलब असल में उन के द्वारा मोटी रिश्वत वसूलना होगा.

कांगे्रस इस लूट के खिलाफ है, ऐसा नहीं. कांगे्रस अब मोदी सरकार से सहयोग कर रही है क्योंकि उसे लग रहा है कि शासन की डोर उस से हमेशा के लिए हाथ से नहीं गई है. बिहार में वह सत्ता की भागीदार है. मध्य प्रदेश में उस की स्थिति सुधर रही है और अगले चुनावों में वह जीत भी सकती है. वह कर जमा करने और उस के फ्रिंज बेनेफिट ‘रिश्वत’ के मौके क्यों खोएगी? यह कानून सिर्फ मोदी सरकार बनवाए या दोनों भाजपा व कांगे्रस समझौता कर के बनवाएं, यह तो जनता के खिलाफ ही होगा.

फिल्म की आड़ में प्रचार : गुलाटी बनेंगे होस्ट

दीवाली के दौरान रिलीज होने वाली फिल्मों को ले कर दर्शकों में जोरदार के्रेज होता है. उस पर अगर फिल्म में सलमान खान हो तो यह क्रेज और भी ज्यादा हो जाता है. शायद इसी बात को भांपते हुए भाजपा सरकार ने फिल्म की आड़ में अपना प्रचार करने का मौका हाथ से नहीं जाने दिया. खबर है कि कई सिनेमाघरों में फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ के शो शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए सैंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी द्वारा तैयार किया गया वीडियो दिखाया गया. जाहिर है इस वीडियो में सरकार की उपलब्धियों का बखान किया गया है. बिहार चुनावों में मिली करारी हार के बाद पार्टी की इस तरह की प्रचारबाजी समझ से परे है. अच्छा होता अगर पार्टी हार के कारणों पर मंथन करती.

पानी से परेशान

निर्देशक शेखर कपूर ने भले ही कई फिल्में बना ली हों लेकिन उन की एक फिल्म को सालों से कोई निर्माता नहीं मिल रहा है. इस फिल्म का नाम है पानी. करीब 10-15 साल पहले इस फिल्म को शेखर कपूर ने आमिर खान समेत कई कलाकारों के साथ बनाने की योजना बनाई मगर बारबार विफल रहे. यशराज बैनर ने न सिर्फ इस फिल्म को पूरा करने का जिम्मा उठाया बल्कि इस के लिए अभिनेता सुशांत राजपूत को साइन भी कर लिया. ऐसे में सब को यही उम्मीद थी कि अब यह फिल्म पूरी होगी लेकिन खबर है कि जल संकट और भविष्य की त्रासदी जैसे विषय पर आधारित यह फिल्म एक बार फिर अटक गई है.

परदे पर राहुल

सुधीर मिश्रा अलग तरह की फिल्मों के लिए जाने जाते हैं. इन दिनों वे दासदेव फिल्म बना रहे हैं. यह फिल्म देवदास पर अलग तरीके से चोट करती है. गौरतलब है अभिनेता राहुल भट्ट इस के लिए फिल्म अगली के बाद वापसी करने जा रहे हैं. वैसे दासदेव का पहले देवदास नाम रखा गया था. बाद में इसे बदल कर दासदेव कर दिया गया है. देवदास की मौडर्न एप्रोच में राजनीति का जोरदार तड़का लगाया गया है और जो किरदार राहुल भट्ट निभा रहे हैं वह कथित तौर पर राहुल गांधी से प्रभावित है. हो सकता है यह पब्लिसिटी स्टंट हो. बहरहाल, फिल्म में पारो के रूप में रिचा चड्ढा और चंद्रमुखी के रूप में अदिति राव हैदरी दिखेंगी.  देवदास पर बनी फिल्म देव डी ने भी दर्शकों को चौंकाया था. अब दासदेव से भी यही आशा है.

दीपिका की चिंता

बौलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने शाहरुख खान के साथ ओम शांति ओम, चेन्नई ऐक्सप्रैस और हैप्पी न्यू ईयर जैसी सफल फिल्मों में काम किया है. मैडम दीपिका अब चाहती हैं कि शाहरुख की हर फिल्म में उन्हें ही लिया जाए. यह हम नहीं बल्कि खुद दीपिका का कहना है. हाल में फिल्म बाजीराव मस्तानी से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान दीपिका का कहना था कि उन की फिल्मों के सैट पर मुझे खुद का न होना अखरता है. वे कहती हैं कि शाहरुख के साथ की गई फिल्मों की बदौलत उन्हें व्यावसायिक सफलता मिली है जबकि फाइंडिंग फैनी और रामलीला ने उन के अंदर की अभिनेत्री को निखारा है. बाजीराव मस्तानी भी इसी तरह की फिल्म है. साफ जाहिर है कि अभिनय प्रधान फिल्मों के बजाय कमर्शियल फिल्मों की सफलता ज्यादा लुभाती है.

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