Download App
Home » पृष्ठ 3508

कुछ तो बोलो

मेरे भीतर उतरती है

तेरे प्यार की रोशनी

कुछ इस तरह

यों चली आए

धूप

अंधेरी गुफाओं की

जमीन तक

सदियों से बंद हैं

कुछ बीती कहानियां

कुछ तड़पते एहसास

कुछ

सपने अपने

चलो

आज फिर से इन्हें

मुक्त करें…

फिर नई कहानी

की तलाश में

मन आकाश से

युक्त करें…

सुनो, चलोगे मेरे साथ

किसी और गहराई में

बंद गुफा से निकल कर

आकाश की ऊंचाई में…

अपना मन तो टटोलो

बोलो,

कुछ तो बोलो.

       – डा. प्रिया सूफी

ऐसे पाएं होम लोन में टैक्स पर छूट

होम लोन एक बोझ जैसा महसूस हो सकता है, क्योंकि इस पर लगने वाला ब्याज का बोझ कर्ज लेने वाले की खासी कमाई खा जाता है.  टैक्स का बोझ कम करने के लिए सरकार समयसमय पर टैक्स में छूट के जरिए राहत देती रहती है. टैक्स में छूट पाने के लिए घर खरीद कर न सिर्फ आप एक मकान मालिक बन सकते हैं, बल्कि टैक्स में छूट भी पा सकते हैं. सरकार द्वारा होम लोन लेने वालों को टैक्स पर छूट देने का मूल उद्देश्य लोगों को अपनी संपत्ति खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना है. 

टैक्स बचाने और लंबे समय तक इस में राहत पाने का सब से अच्छा तरीका है होम लोन. इनकम टैक्स ऐक्ट 1961 कहता है कि लोन को टैक्स बचाने के इंस्ट्रूमैंट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. कोई प्रौपर्टी खरीदने के लिए होम लोन लेने के बाद व्यक्ति अपने टैक्स में छूट के लिए आवेदन कर सकता है. यह छूट न सिर्फ मूल राशि पर, बल्कि होम लोन पर लगने वाले ब्याज पर भी लागू होती है.

होम लोन पर इनकम टैक्स में छूट इनकम टैक्स ऐक्ट के सैक्शन 24, 80 सी और 80 ईई के तहत मिलती है. यह लाभ सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष और एचयूएफ यानी हिंदू अनडिवाइडैड फैमिलीज को मिल सकती है. टैक्स में यह छूट सिर्फ होम लोन पर ही मिलती है, अन्य तरह के लोन जैसे कि लोन अगेंस्ट प्रौपर्टी यानी एलएपी आदि पर नहीं.

टैक्स में मिलने वाली छूट

टैक्स पर छूट होम लोन के 2 हिस्सों पर उपलब्ध है–मूल राशि और ब्याज पर. मूल राशि पर लाभ जहां सैक्शन 80 सी के तहत पाया जा सकता है वहीं इसी लाभ के लिए सैक्शन 24 के तहत भी आवेदन किया जा सकता है. केंद्र सरकार ने सैक्शन 80 ईई को 2013-14 के बजट में पेश किया था, जिस के तहत ब्याज के भुगतान पर कुछ शर्तों के साथ टैक्स में छूट मिलती है. जिन लोगों ने वित्त वर्ष 2013-14 में पहली बार होम लोन लिया था वे ब्याज की अदायगी पर सैक्शन 24 के तहत 1 लाख रुपए की अतिरिक्त छूट पाने के हकदार हो गए. अनयूटिलाइज्ड ब्याज के लिए वर्ष 2014-15 के लिए भी छूट उपलबध है. टैक्स पर अतिरिक्त छूट मिलने का मतलब यह है कि आप थोड़ा ज्यादा पैसा बचा सकते हैं. लेकिन सरकार ने इस छूट को आगे के वर्षों के लिए नहीं बढ़ाया क्योंकि इस के बारे में सैक्शन 80 ईई में वर्णित नहीं किया गया है. वित्त वर्ष 2015-16 के लिए यह लाभ सिर्फ सैक्शन 80 सी और सैक्शन 24 के तहत ही उपलब्ध है.

मूल राशि की अदायगी पर छूट : होम लोन लेने वाला व्यक्ति मूल राशि का जो हिस्सा हर महीने अदा कर सकता है उस के आधार पर इनकम टैक्स में छूट वह इनकम टैक्स ऐक्ट के सैक्शन 80 सी के तहत ले सकता है. इस सैक्शन के तहत कोई भी व्यक्ति अधिकतम डेढ़ लाख रुपए तक की राशि पर टैक्स में छूट पा सकता है. डेढ़ लाख रुपए की छूट की यह सीमा आप के पीपीएफ, टैक्स सेविंग एफडी, इक्विटी ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड, नैशनल सेविंग सर्टिफिकेट और अन्य सभी को मिला कर मिलने वाली छूट होती है.

इस सैक्शन के तहत छूट तब तक लागू नहीं होती है जब तक प्रौपर्टी निर्माणाधीन हो. यह लाभ प्रौपर्टी का कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही मिलता है. सब से महत्त्वपूर्ण बात यह जानना है कि एक टैक्सपेयर उन सालों के दौरान की गई ब्याज अदायगी का संयोजन कर के 5 बराबर किस्तों में छूट की मांग कर सकता है और इस की शुरुआत निर्माण कार्य पूरा होने वाले वर्ष से की जा सकती है. लेकिन अगर प्रौपर्टी का मालिक पजेशन लेने के 5 साल के भीतर प्रौपर्टी बेच देता है तो छूट नहीं मिलती. अगर प्रौपर्टी का मालिक इस पीरियड में टैक्स पर छूट लेता है तो इस छूट को आमदनी का हिस्सा माना जाएगा और टैक्स देना होगा. यह छूट पेमैंट के आधार पर भी उपलब्ध होती है, न कि उन सालों पर जब यह भुगतान किया गया.

संयुक्त रूप से छूट : सैक्शन 80 सी प्रौपर्टी की खरीदारी के समय लगी स्टैंप ड्यूटी और रजिस्टे्रशन चार्ज पर भी टैक्स में छूट देता है. सैक्शन 80 सी के तहत कोई भी व्यक्ति अधिकतम डेढ़ लाख रुपए तक की छूट पा सकता है जोकि पीपीएफ, टैक्स सेविंग एफडी, इक्विटी ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड, नैशनल सेविंग सर्टिफि केट व अन्य सभी को मिला कर संयुक्त रूप से मिलती है. यह छूट उस साल के दौरान ली जा सकती है जिस में इस की अदायगी की गई हो.

ब्याज की अदायगी पर छूट : प्रौपर्टी खरीदने पर यह लाभ सिर्फ उसी स्थिति में लिया जा सकता है जब प्रौपर्टी का निर्माण पूरा हो चुका हो और इस का पजेशन सर्टिफिकेट मिल चुका हो. प्रौपर्टी की खरीद के अलावा, टैक्स पर छूट रिहायशी प्रौपर्टी के निर्माण, मरम्मत, नवीनीकरण और पुनर्निर्माण आदि के वास्ते लिए गए लोन पर मिल सकती है. हाउस प्रौपर्टी से होने वाली आमदनी को होम लोन पर लगने वाले ब्याज के साथ ऐडजस्ट किया जा सकता है.

अपने कब्जे वाली प्रौपर्टी पर छूट पाने की अधिकतम राशि 2 लाख रुपए होती है. इस के अलावा, अगर प्रौपर्टी लोन मंजूर होने की तारीख से ले कर 3 वर्षों के भीतर कंप्लीट नहीं होता है तो ब्याज पर मिलने वाली छूट की सीमा 2 लाख रुपए से घट कर 30 हजार रुपए हो जाती है. अगर संपत्ति पर अपना कब्जा नहीं है तो टैक्स में छूट की कोई सीमा नहीं होती है, ब्याज की कुल राशि पर टैक्स में छूट के लिए आवेदन किया जा सकता है. इस का एक अन्य पहलू भी है- अगर प्रौपर्टी का मालिक अपने घर में न रह कर नौकरी या व्यापार अथवा अन्य किसी जिम्मेदारी की वजह से किसी अन्य जगह पर रहता है तो वह 2 लाख रुपए तक की छूट हासिल कर सकता है. सैक्शन 80 सी के तहत पेमैंट की अदायगी के आधार पर मिलने वाली छूट के विपरीत इस सैक्शन के तहत मिलने वाली छूट संग्रहण आधारित होती है. ऐसे में छूट वार्षिक आधार पर ली जा सकती है. ऐसा उस स्थिति में भी लागू होता है जब उस वर्ष के दौरान कोई अदायगी न की गई हो.       

होम लोन : कायदा और फायदा

होम लोन रिटेल बैंकिंग का सब से ज्यादा बिकने वाला उत्पाद है.

जौइंट होम लोन लेने से लोन राशि बढ़ती है, वहीं दूसरी तरफ टैक्स बचत में भी फायदा मिलता है.

सिंगल होम लोन में केवल होम लोन लेने वाले को ही टैक्स का फायदा मिलता है.

इंट होम लोन में लोन में भागीदारी करने वाले का भी टैक्स बचता है.

बैंक लोन देते वक्त दोनों आवेदकों की इनकम को ध्यान में रख कर लोन देता है.

इनकम टैक्स ऐक्ट 24 (बी) के तहत होम लोन के ब्याज पर 2 लाख रुपए तक की छूट का क्लेम कर सकते हैं.

इनकम टैक्स ऐक्ट 80 सी के तहत प्रिंसिपल अमाउंट पर 1.5 लाख रुपए तक का क्लेम किया जा सकता है.

किसी संस्था या संगठन के नाम होम लोन नहीं दिया जाता है.

परिजन की मृत्यु के बाद कैसे सुलझाएं मनीमैटर्स

अकसर कई लोग पैसों या प्रौपर्टी आदि के कानूनी वारिस के बारे में जीतेजी न तो कागजात तैयार करते हैं और न ही इस बाबत कोई निर्णय ले पाते हैं. नतीजतन ऐसे किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उस के नाम की संपत्ति के स्वामित्व को ले कर घरपरिवार में तमाम विवाद खड़े हो जाते हैं. कई बार तो मृतक के नाम किसी भी प्रकार की देय राशि का भुगतान तक रुक जाता है. इन में बैंक में जमा राशियों से ले कर बीमा दावे भी शामिल हैं. मुंबई के ठाणे उपनगर के निवासी 48 वर्षीय विलास की मृत्यु उस वक्त हो गई जब वे ड्राइंगरूम में टैलीविजन देख रहे थे. डाक्टर ने बताया कि हृदयाघात की वजह से उन की मौत हुई. आघात इतना जबरदस्त था कि विलास को अस्पताल ले जाने का भी वक्त नहीं मिला. न ही वे जातेजाते किसी से कुछ बात कर सके. शायद अचानक सीने में दर्द उठा हो और इस से पहले कि किसी को बुला पाते, वे चल बसे. हां, वे उस वक्त ड्राइंगरूम में अकेले थे. बेटे ने जब पानी का गिलास व दवाएं ला कर पिता को देनी चाहीं तभी उसे इस हादसे के बारे में पता चला.

विलास 20 दिन पहले ही अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर आए थे. सीने में दर्द की शिकायत पर वे कुल 12 दिन भरती थे. अस्पताल के खर्च को मिला कर करीब 1 लाख 60 हजार रुपए का मैडिक्लेम दावा बीमा कंपनी के पास जमा कर दिया गया था. वह भी, अस्पताल से छुट्टी मिलने के एक सप्ताह के भीतर. उन की पत्नी शारदा ने बीमा कंपनी को लिखित रूप से इस मृत्यु के बारे में सूचित किया तथा उन से अनुरोध किया कि मैडिक्लेम दावे का चैक विलास कोजरेकर की जगह शारदा कोजरेकर के नाम जारी करें. बीमा कंपनी ने अनुरोध को ठुकराया तो नहीं पर उस के बीमा अधिकारी ने कहा कि भुगतान की प्रक्रिया टीपीए यानी थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर द्वारा पूरी की जाती है. पर उन्होंने आश्वस्त किया कि टीपीए को इस संबंध में बता दिया जाएगा. शारदा ने एफिडेविट भी जमा कर दिया. लेकिन टीपीए की ओर से उन्हें चैक विलास कोजरेकर के नाम ही मिला. शारदा चाहतीं तो इस चैक को बैंक में जमा कर भुगतान ले सकती थीं लेकिन यह कानूनन जुर्म था. इसलिए उन्होंने यह चैक टीपीए को इस अनुरोध के साथ वापस किया कि यह चैक उन के नाम से जारी किया जाए. उन्होंने आवश्यकतानुसार जरूरी कागजात भी जमा किए. मसलन, मृत्यु प्रमाणपत्र, सक्सैशन सर्टिफिकेट (उत्तराधिकार प्रमाणपत्र) आदि. अब शारदा को इंतजार है कि उन के नाम जारी दावे का चैक उन्हें मिल जाएगा.

विशेषज्ञ की लें मदद

बीमाधारक की मृत्यु की दशा में बीमा दावे के भुगतान प्रकरण में अधिक परेशानियां नहीं आतीं क्योंकि जमा किए जाने वाले कागजात की संख्या अधिक नहीं होती. लेकिन फिर भी, चूंकि भुगतान के लिए जमा किया जाने वाला हर कागजात विधिसम्मत होना चाहिए, इसलिए न तो इन्हें जुटाने या तैयार करने में देरी करनी चाहिए, न ही इन्हें तैयार करते वक्त किसी नौसिखिए की सलाह लेनी चाहिए. इस काम के लिए वकील, चार्टर्ड अकाउंटैंट या वित्तीय योजनाकारों की राय लेनी चाहिए. इन्हें अदा किया जाने वाला पेशेवर शुल्क भले आप को तत्काल भारी महसूस हो पर इस की वजह से आप तमाम परेशानियों में फंसने से बच जाएंगे.

जीवन बीमा, व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा या मैडिक्लेम दावे की रकम लाखों में हो सकती है. गलत तरीके से दावा प्रस्तुत करने की दशा में इन का भुगतान रुक जाता है या देरी होती है. जाहिर है कि बड़ी रकम पर ब्याज भी अधिक होगा. इस के अलावा, कई जरूरी कार्य भी रकम फंस जाने की वजह से अटक जाते हैं. दरअसल, परिजन की मृत्यु के बाद सिर्फ उन के बीमा दावे ही नहीं होते बल्कि इस सूची में कई प्रकार के अन्य भुगतान भी शामिल होते हैं, जैसे बैंक, पीपीएफ, फिक्स्ड डिपौजिट, डीमैट खाता, बौंड, डिबैंचर, प्रौपर्टी पर अधिकार आदि. इस के साथ ही, कै्रडिट कार्ड लंबित भुगतान, किसी भी प्रकार का बकाया कर्ज, बकाया मैडिकल बिल आदि के बारे में भी जानकारी होनी महत्त्वपूर्ण है. याद रखें, मृतक के नाम कोई भी कर्ज बकाया होने की दशा में उन के नाम जारी होने वाले अन्यत्र किसी भी प्रकार के भुगतान में देरी हो सकती है. ऐसा क्रैडिट कार्ड के भुगतान को ले कर अकसर देखा जाता है.

कुछ परिजन अपने मृत रिश्तेदार के क्रैडिट कार्ड पेमैंट को यह समझ कर छोड़ देते हैं कि कार्ड जिस के नाम से था, वह तो चला गया. मैं क्यों भुगतान करूं. लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कै्रडिट कार्ड जारी करने वाले बैंक के पास कार्डधारक का पूरा ब्योरा होता है. भुगतान 3 माह से अधिक लंबित होने पर वह इस की जानकारी सिविल संस्था (व्यक्ति की क्रय क्षमता निर्धारित आने वाली सरकारी नियामक एजेंसी) को देता है. वहां से यह सूचना सभी संबंधित वित्तीय संस्थाओं, मृतक के नियोक्ता कार्यालय आदि को जारी कर दी जाती है सो, किसी भी स्तर पर फरेब महंगा पड़ सकता है. यदि व्यक्ति पैंशनधारी है तो मृत्यु के बारे में संबंधित बैंक को भी तत्काल सूचित करें. मृत्यु होने के बाद वाले माह से पैंशन राशि की पैंशन के बैंक खाते से किसी भी प्रकार की निकासी कानूनन अपराध है. यह सही है कि जिंदगी में की गई वसीयत व्यक्ति के मरने के बाद हर प्रकार की कानूनी उलझन से छुटकारे का अचूक दस्तावेज होता है लेकिन इस के न होने की दशा में उपयुक्त तरीके से दावा किया जाना भुगतान प्रकिया को सरल बनाता है.

बैंक खाता और डीमैट खाता

आजकल बैंक खातों में नामित व्यक्ति का होना अनिवार्य है लेकिन कई पुराने खातों में अभी भी नामित किए जाने की प्रक्रिया शेष है. ऐसी स्थिति में या तो मृतक की वसीयत मान्य होती है या फिर दावा करने वाले व्यक्ति की ओर से जमा किया जाने वाला उत्तराधिकार प्रमाणपत्र. वसीयत में खाते के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी होनी जरूरी है. उचित यही है कि यदि आप का कोई भी खाता बगैर नौमिनी के जारी है तो अविलंब किसी को नौमिनी बना दें. डीमैट खाताधारक के लिए भी एक व्यक्ति को नामित करना आवश्यक होता है. क्योंकि इस प्रकार डीमैट खाते का हस्तांतरण आसान हो जाता है. नामिती की स्थिति में डिपौजिटरी के स्तर पर संबंधित कागजी कार्यवाही पूरी करने से शेयरों का हस्तांतरण नामित व्यक्ति के नाम हो जाता है. अगर दिवंगत व्यक्ति का डीमैट खाता किसी अन्य परिजन के साथ संयुक्त रूप से खुला हुआ हो तो डीमैट खाता बंद हो जाता है, भले ही दूसरा व्यक्ति जीवित हो, ऐसे मामले में संयुक्त खाताधारक को अपने नाम एक अलग डीमैट खाता खुलवाना चाहिए. इस के बाद संयुक्त डीमैट खाते से शेयरों का हस्तांतरण इस सिंगल डीमैट खाते में करवाना चाहिए.

म्युचुअल फंड के हस्तांतरण में कंपनियां नामित व्यक्ति या संयुक्त नाम से जारी फंड में से दूसरे नाम में यूनिट को सहजता से जारी कर देती हैं लेकिन इस कार्यवाही के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र की प्रति के साथ अपने केवाईसी (नो योर कस्टमर) प्रोफौर्मा और बैंक खाते के विवरण की प्रति म्युचुअल फंड कंपनी के पास जमा करनी पड़ती है. यूनिट के मूल्यांकन के आधार पर नामित व्यक्ति या संयुक्त यूनिटधारक को एक मुआवजा बौंड भी सौंपना पड़ता है.

मृतक की संपत्ति से भुगतान

व्यक्ति की मौत होने की दशा में उस की आय की समीक्षा उस की मौत की अवधि तक ही की जाएगी. यानी उस वर्ष के लिए आयकर का भुगतान व्यक्ति के कानूनी वारिस के जरिए होगा. रिटर्न भी उसी के हस्ताक्षर से फाइल होगा. यह रिटर्न आयकर अधिनियम की धारा 159 के तहत भरा जाता है. हां, यह जानना जरूरी है कि कानूनी वारिस पर मृत व्यक्ति के कर की अदायगी अपने पैसे से करने की जिम्मेदारी नहीं होती. मृत व्यक्ति मृत्यु के वक्त जितने कर का देनदार होता है, उस की वसूली मृतक की संपत्ति से की जाती है. देश के विभिन्न बैंकों में लगभग 56 लाख ऐसे खाते हैं जो खाताधारक की मृत्यु होने अथवा नामिती के अभाव में निष्क्रिय पड़े हैं. अकसर व्यक्ति की मृत्यु होने की महीनों बाद तक उस के दावों संबंधी प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो पातीं. बरसों भी लग जाते हैं. इसलिए यह जरूरी है कि हम जीवित रहते ही मरणोपरांत उत्पन्न होने वाली कानूनी प्रक्रियाओं से निबटने के लिए खाका तैयार कर लें.                        

वादविवाद और वसीयत

  1. वसीयत पर हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान करा लेने मात्र से वसीयत मान्य नहीं होती.
  2. भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत उत्तराधिकार प्रमाणपत्र ऐसा दस्तावेज होता है जिस के माध्यम से धारक को मृतक की तरफ से (उस के नाम पर देय हों) कर्ज की रकम या प्रतिभूतियां पाने का अधिकार होता है.
  3. आमतौर पर अदालत में अलग सेल होती है जो उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करती है.
  4. ज्यादातर मामलों में विवाद तब होता है जब एक ही संपत्ति के एक से ज्यादा दावेदार होते हैं और अलगअलग इलाकों में रह रहे होते हैं.
  5. कुछ समय पहले बौंबे हाईकोर्ट ने भी कहा था कि यदि कोई व्यक्ति आमतौर पर जिस भाषा का इस्तेमाल नहीं करता, अपनी वसीयत पर उसी भाषा में हस्ताक्षर कर दे तो वह झूठी नहीं हो जाती. गौरतलब है कि अदालत में जमीन से जुड़े विवाद के क मामले में यह फैसला देते हुए उसे वैध करार दिया जब जन्म से सिंधी मेलवानी ने अपनी मातृभाषा गुरुमुखी में हस्ताक्षर किया था. इसी तथ्य को ले कर वसीयत की वैधता पर सवाल उठा था.

रंगमंच की बिसात के वैश्विक खिलाड़ी थे सईद जाफरी

भारतीय फिल्मों को मुख्यतौर पर 2 धड़ों में बांटा जाता है. पहला व्यावसायिक सिनेमा जिसे चालू और मसाला फिल्मों का सिनेमा भी कहते हैं और दूसरा समानांतर सिनेमा, जो ज्यादातर सामाजिक सरोकार और मुख्यधारा से उपेक्षित विषयों, मसलों व समाज की आवाज को परदे पर उतारता था. जाहिर है इन्हीं 2 धाराओं में न सिर्फ सिनेमा बंटा था बल्कि अभिनेता भी बंटे थे. सुपरस्टार और हीरो की छवि में कैद कलाकार व्यावसायिक सिनेमा के पैरोकार थे तो वहीं गैर परंपरागत चेहरेमोहरे और थिएटर की पृष्ठभूमि से आए कलाकार पैरेलल यानी समानांतर सिनेमा के पैरोकार थे. एक तरफ मसाला सिनेमा जहां दिलीप कुमार, राज कपूर से ले कर खान, कपूर और कुमार सितारों तक सिमटा है तो वहीं समानांतर सिनेमा में नसीरुद्दीन शाह, फारुख शेख, अमोल पालेकर, ओम पुरी, कुलभूषण खरबंदा, नीना गुप्ता, सुरेखा सीकरी, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी जैसे अनूठे अभिनेता व अभिनेत्री थे. हालांकि यह विभाजन कई बार धुंधला भी होता है और एकदूसरे धड़े के कलाकार प्रयोगों से गुजरते हैं.

लेकिन सईद जाफरी जैसे कुछ कलाकार ऐसे भी होते हैं जो इन सीमाओं से परे वैश्विक रंगमंच में कलाकार की उस हैसियत को छू लेते हैं जो किसी खास मुल्क या बिरादरी की मुहताज नहीं होती. सईद जाफरी को बतौर कलाकार परिभाषित करना बेहद मुश्किल है. बौलीवुड के शौकीन उन्हें आमिर खान की ‘दिल’ और राज कपूर की फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के मामा कुंजबिहारी की भूमिका के लिए, हास्य रसिक उन्हें ‘चश्मेबद्दूर’ के पानवाला लल्लन मियां के लिए याद करते हैं. लेकिन सईद जाफरी होने का अर्थ सिर्फ हिंदी फिल्में ही नहीं है. अर्थपूर्ण फिल्मों के शौकीनों की नजर में वे महान फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के नवाब मिर्जा हैं जो शतरंज की बाजियों में इस कदर मसरूफ हैं कि उन्हें लखनऊ के बदलते सियासी हालात की फिक्र ही नहीं. इंटरनैशनल फिल्म बिरादरी में जो पहचान सईद जाफरी की है वह चंद भारतीय समझते हैं, जो लंदन थिएटर से वाकिफ और हौलीवुड की चालू मसाला फिल्मों से इतर भी अंगरेजी सिनेमा को कुछ समझते हैं. उन्हें वे ‘अ पैसेज टू इंडिया’, ‘द फार पवेलियंस’ और ‘माय ब्यूटीफुल लौंड्रेट’ सहित महान फिल्म ‘गांधी’ के सरदार पटेल की भूमिका के लिए जानते हैं. एक ही दौर में अभिनय के इतने आयामों और अलगअलग देशों में सक्रिय रहे सईद ने 80 और 90 के दशक में न जाने कितने यादगार काम किए हैं. सईद जाफरी की खासीयत यही थी कि वे कला फिल्मों में और बौलीवुड मसाला फिल्मों में उतनी ही शिद्दत से काम करते थे जितना अमेरिका के हौलीवुड और ब्रिटिश फिल्मों, बीबीसी की सीरीज और थिएटर में. चश्मेबद्दूर के शौकीन और दिलफेंक मिजाज पानवाला से ले कर ठसकदार नवाब की भूमिकाएं अदा करने वाले बहुमुखी अभिनेता सईद जाफरी का पिछले दिनों 86 वर्ष की अवस्था में लंदन स्थित आवास पर ब्रेन हैमरेज से निधन हो गया.

पंजाब के मालेरकोटा नामक गांव में 8 जनवरी, 1929 को जन्मे सईद जाफरी के मातापिता उन्हें सिविल सर्विस में लाना चाहते थे लेकिन बचपन से ही खानाबदोश स्वभाव के रहे सईद को तो अभिनय के मैदान में उतरना था, लिहाजा उन्होंने एक दिन पिता से दिल्ली घूमने की इजाजत मांगी और दिल्ली की उस रेलयात्रा में एक दिल्ली के दोस्त से हुई मुलाकात उन्हें औल इंडिया रेडियो तक ले आई और फिर वहां उन्होंने पब्लिसिटी व एडवरटाइजिंग डायरैक्टर के तौर पर काम किया. यहां से शुरू हुआ सफर कब जा कर नाटक की दहलीज पर पहुंच गया, उन्हें खुद ही पता नहीं चला. बाद में जब उन्होंने 1951 में न्यू यूनिटी अ मेच्योर थिएटर की स्थापना की तब वे पूरी तरह से रंगमंच के खिलाड़ी बन चुके थे. जमींदार खानदान के सईद में कला का गुण ननिहाल से आया. बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में सईद साहब ने स्वीकार किया था, ‘बस यों ही शायरी पढ़तेपढ़ते और मामा के खतों का जवाब देतेदेते मैं खुद शायर बनने लगा.’ शेर-ओ-शायरी का यही शौक उन्हें उर्दू, अंगरेजी और हिंदी भाषाओं तथा आगे चल कर अभिनय की दुनिया में खींच ले गया. उन के बारे में कहा जाता है कि वे भारतीय होने के बावजूद विदेशों में अपनी परफैक्ट औक्सफोर्ड स्टाइल की अंगरेजी बोलने के लिए जाने जाते थे. इसी रंगमंच की दुनिया में उन की कला से प्रभावित हो कर उन्हें लंदन में नाटक करने का बुलावा आया. और इस तरह सईद जाफरी एकसाथ हिंदी सिनेमा, रंगमंच और लंदन थिएटर में काम करने वाले शायद पहले भारतीय बन चुके थे. जाफरी ने ‘द ऐक्टर्स स्टूडियो’ में थोड़े समय के लिए जगत प्रसिद्ध अभिनेत्री मर्लिन मुनरो के साथ काम किया था. लेकिन सब से ज्यादा चर्चा मिली उन्हें 1962 में ब्रौडवे के प्रोडक्शन ‘अ पैसेज टू इंडिया’ में प्रोफैसर गोडबोले के किरदार से. इस प्रकार ब्रौडवे के साथ काम करने वाले वे पहले भारतीय बने. अपने कैरियर के दौरान उन्होंने हौलीवुड के कई दिग्गजों के साथ काम किया. वे ऐसे पहले भारतीय अभिनेता थे जो शेक्सपियर के नाटकों को ले कर पूरे अमेरिका में घूमे.

इस बीच, एक नाटक के दौरान उन की मुलाकात अभिनेत्री और ट्रेवलर मधुर बहादुर से हुई. कला की उर्वरक जमीन पर 2 कलाकारों के बीच रोमांस का रसायन कुछ यों बना कि दोनों ने एकसाथ जिंदगी गुजारने की ठान ली. लेकिन पता नहीं क्यों दुनियाभर के संजीदा कलाकार, शायर और वैज्ञानिक, लेखक, दुनियादारी के तमाम किरदारों को संपूर्णता से निभाते हुए घर में पति के किरदार में असफल हो जाते हैं. सईद के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ और दोनों अलग हो गए. शायद एक आदर्श विवाह की राह में आजादखयाली ही सब से बड़ा रोड़ा होती है जबकि उम्दा कलाकार होने के लिए सब से जरूरी भी यही आजादखयाली ही है. जाफरी की मधुर के साथ यूएसए में ज्यादा दिन निभ नहीं सकी. वर्ष 1965 में दोनों का तलाक हो गया. उन की तीनों बेटियां जिया, मीरा और सकीना मां के साथ रह गईं और सईद फिर से ब्रिटेन आ गए. कहते हैं कि ब्रिटेन में सईद को नए सिरे से संघर्ष करना पड़ा. छोटीमोटी भूमिकाओं के अलावा कई नौकरियां भी कीं ताकि रोजीरोटी का जुगाड़ हो सके. 1980 में उन्होंने जेनिफर से शादी की. लेकिन सईद साहब का आखिरी वक्त शराब की आगोश में ही गुजरा. यह भी एक अजीबोगरीब इत्तफाक है कि ज्यादातर गंभीर कलाकार परिवार में अकेले रह जाते हैं और आखिरी वक्त में उन का साथ शराब ही निभाती है. महान फिल्मकार गुरुदत्त से ले कर मीना कुमारी, सुपरस्टार राजेश खन्ना इसी शराबनोशी में दुनिया को अलविदा कह गए. सईद भी शराब को गले लगा चुके थे.

शराब को ले कर बेहद दिलचस्प किस्सा बयान करते हुए फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे कहते हैं कि सईद जब दावतों में शरीक होते तो हमेशा उन की कोट में चांदी का गिलास होता और शराब केवल उसी गिलास में पीते और पीतेपीते मजेदार किस्से सुनाते. हर दावत के आरंभ में वे मेजबान से कहते कि अगर वे पीतेपीते होश खो दें तो बराय मेहरबानी उन का चांदी का गिलास उन की जेब में रख कर ही उन्हें अपने कमरे में भिजवा दें. हालांकि वे चाहते तो और भी चांदी के गिलास ले सकते थे लेकिन कुछ बात थी, जिसे सिर्फ वे ही जानते थे. कई कलाकार ऐसे होते हैं जिन के योगदान का मूल्यांकन आने वाली पीढ़ी नहीं कर पाती. सईद जाफरी के जीवन के कई ऐसे पहलू आज भी हम नहीं जानते. कारण, उन्होंने भारत से ज्यादा काम विदेशों में किया और विदेशी काम को 80-90 के दशक में भारतीय मीडिया न तो हम तक सही से पहुंचा पाया और न ही सईद ने कभी अपने काम को ले कर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कोई ढिंढोरा पीटा. सिर्फ अपने काम में डूबे रहे सईद जाफरी ने जब आखिरी सांस लंदन में ली तो उन के चाहने वाले लोगों की आंखें नम जरूर हुई होंगी. सईद जैसे कलाकार शतरंज की हर बिसात और रंगमंच की हर विधा में माहिर खिलाड़ी होते हैं.

खास बातें जाफरी की

  1. जाफरी ने कैरियर की शुरुआत दिल्ली में थिएटर से की थी.
  2. 1951-56 तक औल इंडिया रेडियो में पब्लिसिटी, एडवरटाइजिंग डायरैक्टर के तौर पर रहे.
  3. जाफरी ने द ऐक्टर्स स्टूडियो में अभिनेत्री मर्लिन मुनरो के साथ काम किया था.
  4. सईद पहले भारतीय थे जिन्हें ‘और्डर औफ ब्रिटिश एंपायर’ अवार्ड मिला था.
  5. सईद जाफरी ने 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया.
  6. फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (1977) के लिए बेस्ट सपोर्टिंग ऐक्टर के फिल्मफेयर अवार्ड से नवाजा गया.
  7. 1985-87 के दौरान प्रसारित हिट सीरीज ‘तंदूरी नाइट्स’ में भी उन्होंने काम किया है.
  8. औस्कर विजेता फिल्म ‘गांधी’ में सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका निभाई थी.
  9. पियर्स ब्रोसनन, शान कोनरी और माइकल केन जैसे बड़े नाम उन के सह कलाकार रह चुके हैं.

सईद का फिल्मनामा

उन्होंने ‘द मैन हू वुड बी किंग’ (1975), ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (1977), ‘गांधी’ (1982), ‘अ पैसेज टू इंडिया’ (1964), बीबीसी संस्करण एवं 1984 फिल्म, ‘द फार पैवेलियंस’ (1984) और ‘माय ब्यूटीफुल लौंड्रेट’ (1985) सहित विभिन्न फिल्मों में अभिनय किया. उन्होंने 80 और 90 के दशक में विभिन्न बौलीवुड फिल्मों में भी काम किया. उन की अहम फिल्में रही हैं, ‘गांधी’, ‘मासूम’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘हिना’, ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘चश्मेबद्दूर’, ‘जुदाई’, ‘अजूबा’, ‘दिल’, ‘किशन कन्हैया’, ‘घर हो तो ऐसा’, ‘राजा की आएगी बरात’, ‘मोहब्बत’ और ‘आंटी नंबर वन’, वहीं ‘तंदूरी नाइट्स’ और ‘ज्वैल इन द क्राउन’ जैसे टीवी शो के लिए भी सईद जाने जाते रहे हैं.

बौलीवुड में भेदभाव से नाराज पान नलिन

इन दिनों कई निर्देशक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में अपनी फिल्मों का प्रदर्शन कर रुकी हुई फिल्मों को रिलीज करने का रास्ता खोज रहे हैं. मोटेतौर पर यह सिलसिला अनुराग कश्यप ने अपनी फिल्मों के साथ शुरू किया था. अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टिवल में अपनी फिल्में दिखाने का फायदा यह होता है कि कई बार वहां आए निर्माताओं की नजर उन रुके हुए फिल्मों पर पड़ जाती है जो रिलीज की राह देख रही होती हैं. जब ये निर्माता इन फिल्मों की औडियंस रिऐक्शन ठीकठाक देखते हैं तो साझेदारी में फिल्म को भारत में रिलीज करने की हामी भर देते हैं. कई अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित फिल्मों व डौक्यूमैंट्री से शोहरत हासिल कर चुके निर्देशक पान नलिन भी इसी श्रेणी के निर्देशक हैं. पान नलिन भी लीक से हट कर फिल्में बनाते हैं और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टिवल में लोगों को दिखा कर रिलीज की राह पक्की करते हैं. उन की हालिया फिल्म ‘एंग्री इंडियन गौडेसेज’ भी इसी तरह की फिल्म है.

‘समसारा’ और ‘वैली औफ फ्लावर्स’ जैसी सफलतम फिल्मों के निर्देशक पान नलिन को भारतीय फिल्मकार भले न माना जाता हो मगर उन की फिल्मों को यूरोप और पूरे विश्व में हमेशा न सिर्फ सराहा गया, बल्कि कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया. वे लेखक, विज्ञापन फिल्म निर्माता, निर्देशक, डौक्यूमैंट्री फिल्मकार भी हैं. वे अब तक ‘कुंभ मेला’, ‘द नागास’, ‘काल सहित तकरीबन 15 डौक्यूमैंट्री फिल्में बना चुके हैं. उन की पहली फिल्म ‘समसारा’ लद्दाखी भाषा में थी, जिस ने 130 करोड़ रुपए से अधिक कमाए थे.

फ्रांस में बसे पान नलिन गुजरात के एक गांव में नलिन कुमार पंड्या के नाम से जाने जाते थे. उन के पिता गुजरात में अमरेली रेलवे स्टेशन के पास टी स्टाल चलाते थे. नलिन कुमार पंड्या ने फिल्म निर्देशक बनने के लिए बड़ा संघर्ष किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली. बौलीवुड से उन्हें तिरस्कार के अलावा कुछ नहीं मिला. तब उन्होंने 1991 में 15 मिनट की ‘खजुराहो’ नामक एक लघु फिल्म का निर्माण किया. इस फिल्म ने उन्हें कान इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल पहुंचा दिया, जहां उन की कई यूरोपीय फिल्मकारों से मुलाकात हुई और फिर वे यूरोपीय फिल्मकारों के साथ मिल कर डौक्यूमैंट्री फिल्में बनाते हुए नलिन कुमार पंड्या से पान नलिन हो गए. आज की तारीख में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म जगत, खासकर यूरोप में पान नलिन बहुत बड़े फिल्मकार के रूप में पहचान रखते हैं. 4 दिसंबर, 2015 को उन की नई फिल्म ‘एंग्री इंडियन गौडेसेज’ भारत में रिलीज हुई. इस से पहले यह फिल्म भी अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में जबरदस्त शोहरत बटोर चुकी है. पान नलिन मुंबई में थे. उन से भारत छोड़ कर फ्रांस में बसने और अपनी फिल्मों की शूटिंग के लिए भारत आने से ले कर कई मुद्दों पर लंबी बातचीत हुई जिस में उन्होंने गुजरात और भारत छोड़ कर फ्रांस में बसने की वजह बताते हुए कहा, ‘‘मैं भारत में ही फिल्मकार बनना चाहता था लेकिन बौलीवुड और एनएफडीसी की कार्यशैली की वजह से मुझे बहुत तिरस्कार झेलना पड़ा, जबकि यूरोप ने मुझे अपना लिया. सच कह रहा हूं.

मैं गुजरात में ही जन्मा व पलाबढ़ा. मेरा परिवार अभी भी गुजरात में रहता है, जिन से मिलने के लिए मैं गुजरात आता रहता हूं. मेरी शिक्षा भी गुजरात में ही हुई. मैं ने बड़ौदा में फाइन आर्ट की पढ़ाई करते हुए फिल्म बनाना सीखा. मैं ने चोर बाजार से एक कैमरा खरीद कर 3-3 मिनट की फिल्में बनाईं. उस के बाद फिल्ममेकर बनने के मकसद से मुझे गुजरात से बाहर निकलना पड़ा. पहले मैं मुंबई आया. यहां मैं ने महसूस किया कि बौलीवुड में बहुत मुश्किल है. एक सचाई का पता चला कि बौलीवुड में टैलेंट की कद्र नहीं होती. यहां फिल्मी परिवार से रिश्ता अहमियत रखता है. गैर फिल्मी परिवार को बौलीवुड में उतनी अहमियत नहीं मिलती. मेरी लिखी हुई कहानियां तक सुनने को कोई तैयार नहीं था. जिंदगी जीने के लिए कुछ तो करना था. सो मैं ने कुछ विज्ञापन फिल्में व कौर्पोरेट फिल्में बनाईं. मैं ने ‘राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम’ यानी एनएफडीसी का भी दरवाजा खटखटाया. पर उस ने मुझे यह कह कर रिजैक्ट कर दिया कि आप ने पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट से पढ़ाई नहीं की है. एनएफडीसी के चेयरमैन ने मुझ से कहा कि विज्ञापन फिल्में बनाने से कोई फिल्मकार थोड़े ही बन जाता है. मेरे कहने का अर्थ यह है कि बौलीवुड में मुझे बहुत तिरस्कार झेलना पड़ा. परिणामस्वरूप, मैं तनाव का शिकार हुआ.

‘‘बौलीवुड में हर तरफ से तिरस्कार झेलते हुए मैं ने 15 मिनट की एक लघु फिल्म ‘द खजुराहो’ बनाई. यह 1991 की बात है. इस फिल्म को मैं ने इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में भेजा. कुछ अवार्ड मिल गए. कान फिल्म फैस्टिवल में जाने का अवसर मिला. वहां पर एक यूरोपियन निर्माता से बात हुई. फिर हम ने यूरोपियन टीम के साथ कुछ डौक्यूमैंट्री फिल्में बनाईं. जरमनी से एक निर्माता आए. मैं ने दिल्ली में ‘मानसून फिल्म्स’ नामक फिल्म प्रोडक्शन कंपनी का औफिस खोला. 2000 में जर्मनी की प्रोडक्शन कंपनी ‘पंडोरा फिल्म्स’ के साथ मिल कर मैं ने पहली फीचर फिल्म ‘समसारा’ का निर्माण व निर्देशन किया. हम ने इसे लद्दाखी भाषा में बनाया था, जिसे भारत में क्षेत्रीय फिल्म की संज्ञा दी गई. मगर इस फिल्म ने विश्व के कई देशों में प्रशंसा बटोरी.

‘‘मुझे पूरे विश्व में फिल्मकार के रूप में पहचान मिली. हौलीवुड की बहुत बड़ी कंपनी ‘मीर मैक्स’ ने हमारी यह फिल्म खरीद ली. 2006 तक इस फिल्म ने एक से दूसरे देश में रिलीज होते हुए 130 करोड़ से अधिक रुपए कमा लिए थे, जोकि अपनेआप में एक रिकौर्ड था. फिर मेरी दूसरी फिल्म ‘वैली औफ फ्लावर्स’ को यूरोपियन निर्माता ने फाइनैंस किया. यह एक प्रेमकहानी थी. यह हिंदी फिल्म थी जिस में मिलिंद सोमण व नसीरुद्दीन शाह के साथ फ्रैंच व जापानी अभिनेत्री मैलीन जम्पोनौय, जम्पा केलसंग तामंग व यूरोपियन तकनीशियन थे. दो सदियों तक चलने वाली कथा हिमालय से शुरू हो कर वर्तमान में जापान जा कर खत्म होती है. हालांकि मैं अपनी हर फिल्म की शूटिंग भारत में ही करता हूं पर मैं कभी भी भारत के किसी निर्माता को अपनी फिल्म के साथ जोड़ने में सफल नहीं हो पाया. यहां का निर्माता शर्त रखता था कि कहानी अच्छी है, आप अच्छे निर्देशक हैं, पर किसी स्टार को साइन कर के लाओ, जो मेरे वश में नहीं था. खैर, अब तो मेरी तीसरी फिल्म ‘एंग्री इंडियन गौडेसेज’ भी भारत में रिलीज हो चुकी है, जिसे मैं ने गोआ में फिल्माया.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘यह फिल्म यूनिवर्सल है. टोरंटो फिल्म फैस्टिवल में दर्शकों ने इसे वोट दे कर फस्ट रनरअप तक पहुंचाया. वहां हमें इस फिल्म के लिए वितरक मिल गए. फ्रांस, जरमनी, ब्राजील, जापान ने यह फिल्म खरीद ली. उस के बाद तो मेरे पास कई इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल से मांग आ गई. दरअसल, हर अच्छी कहानी को पसंद किया जाता है. फिल्म के पात्र यंग हैं जोकि यूनिवर्सल हैं. अमेरिकी व फ्रैंच लड़कियों ने बताया कि इस फिल्म के पात्र उन के दोस्त जैसे हैं. ब्राजील के वितरक ने कहा कि हम ने एक बेहतरीन ब्राजीलियन फिल्म बनाई है. जबकि मैं तो ब्राजील कभी गया नहीं. पर ब्राजील में भी पुर्तगाली भाषा बोली जाती है. समस्याएं भी ब्राजील से मिलतीजुलती हैं. सातों पात्र बहुत सशक्त हैं.’’

फिल्म ‘एंग्री इंडियन गौडेसेज’ के अंदर स्त्रीत्व व सैक्सुएलिटी के चित्रण को ले कर पान बताते हैं, ‘‘मैं निजी स्तर पर पुरुषत्व व नारीत्व जैसी बातों पर यकीन नहीं करता, इसलिए मैं ने नारीवाद जैसा कोई मुद्दा नहीं उठाया. पर किसी दर्शक को ऐसा लगा तो यह उस की अपनी सोच है. मैं ने मूवमैंट वाली फिल्म नहीं बनाई है. इस में प्रेमकहानी है. पुरुष पात्रों को हम ने बुरा नहीं दिखाया है. सोशल मीडिया पर पुरुष वर्ग हमारी फिल्म को ज्यादा पसंद कर रहा है.’’ ‘वूमन इंपावरमैंट’ के दृष्टिकोण से यह फिल्म कहां ठहरती है, इस सवाल पर पान यों जवाब देते हैं, ‘‘मैं इस तरह की बातों को मूवमैंट का हिस्सा नहीं बनाना चाहता. हम ने रिसर्च किया, तो पाया कि भारतीय मीडिया में औरतों को ले कर नकारात्मक बातों को बहुत ज्यादा प्रचारित किया जाता है जबकि वैसा नहीं है. हम ने रिसर्च में पाया कि हकीकत यह है कि भारत में औरतों का काफी सशक्तिकरण हो चुका है. ‘‘भारत पहला देश है, जहां पहली बार औरतों की कू्र वाली फ्लाइट चली. पायलट और को-पायलट भी महिला हैं. यह फ्लाइट थी – दिल्ली और कोलकाता के बीच. ऐसा यूरोप या अमेरिका में नहीं है. पूरे विश्व के मुकाबले सब से ज्यादा महिला सीईओ भारत में हैं. एनजीओ चलाने वाली औरतों की संख्या सब से ज्यादा भारत में है. सब से ज्यादा लेखक व किताबें बेचने वाली महिलाएं भारत में हैं. पूरे विश्व के मुकाबले सब से अधिक औरतें भारतीय पैरामिलिट्री फोर्स में हैं. पर हमारे देश के लोग, हमारे देश का मीडिया, हमारे देश के राजनेता इन शक्तिशाली महिलाओं की चर्चा करने के बजाय चंद हादसों या दुर्घटनाओं को इस तरह पेश करते हैं जैसे कि हमारे देश में सब से ज्यादा अबला नारी हो. जबकि हकीकत में हमारे देश की नारी सब से ज्यादा ताकतवर है. अमेरिका या फ्रांस में भी औरतों के खिलाफ अपराध होते हैं.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘गरीबी और अमीरी के बीच बढ़ती खाई की वजह से कुंठा भी बढ़ रही है. जब इंसान को रोजगार नहीं मिलता है, उस के पास पैसे नहीं होते हैं तो वह समाज के विरुद्ध सोचने लगता है. सैक्सुएलिटी को ले कर हम ने जो मोरल इश्यू बना रखा है उस की वजह से भी अपराध बढ़ रहे हैं. हम लोग सैक्स पर खुल कर बात नहीं करते हैं. स्कूल में सैक्स एजुकेशन दी जानी चाहिए, हमारी फिल्म में इस पर बात की गई है.’’ 1991 में बौलीवुड में रिश्तों को अहमियत दी जा रही थी. ऐसा आप का अनुभव था. अब 25 साल भी हालात बदले या नहीं, इस बाबत पान मानते हैं, ‘‘सिनेमा के निर्माण में बदलाव आया है. पहले सैल्यूलाइड पर 35 एमएम में फिल्में बनाते थे. अब डिजिटल में फिल्में बनने लगी हैं. अब फिल्म बनाना आसान हो गया है. पर टैलेंट चाहिए. अब एक अच्छा डिजिटल कैमरा और लैपटौप हो तो भी फीचर फिल्म बना सकते हैं. लेकिन बौलीवुड में आज भी टैलेंट की कद्र कम, रिश्ते की कद्र ज्यादा है. ‘‘आज भी बौलीवुड रिलेशनशिप पर आधारित इंडस्ट्री है. दूसरी बात अब फिल्म वितरण की स्थिति बहुत खराब हो गई है. अब फिल्म वितरण में 4-5 कंपनियों का वर्चस्व चल रहा है. इन लोगों ने खुद ही तय कर लिया है कि भारतीय दर्शक किस तरह की फिल्म देखेगा, जोकि गलत है. ‘एनएच-10’, ‘प्यार का पंचनामा’, ‘विक्की डोनर’, ‘कहानी’ जैसी फिल्में हिट हैं तो वहीं ‘शानदार’ जैसी फिल्में असफल हैं. यानी दर्शक हर तरह की फिल्म देखना चाहता है. पर फिल्म निर्माता और वितरकों के बीच दूरियां बढ़ी हैं.’’

इस तरह की समस्या के समाधान को ले कर पान कहते हैं, ‘‘सिनेमाघरों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी. चीन, कोरिया, जापान की फिल्म इंडस्ट्री बहुत बड़ी है. वहां के मौडल को अपनाना होगा. सरकार को भी इस इंडस्ट्री के विकास की तरफ ध्यान देना होगा. सरकार को फिल्म की लागत, फिल्म निर्माता की हैसियत पर गौर करते हुए टैक्स लगाना चाहिए. भारत में हम 10 करोड़ रुपए की लागत वाली फिल्म बनाएं या 200 करोड़ रुपए की लागत वाली, हमें सड़क पर शूटिंग के लिए शुल्क एकसमान ही देना पड़ता है. यह गलत है. ऐसा पूरे विश्व में कहीं नहीं है.’’ एनएफडीसी का सवाल कि फिल्म निर्देशक के लिए शिक्षा या डिगरी की आवश्यकता होनी चाहिए, पर पान असहमति जताते हुए कहते हैं, ‘‘वह गलत बात थी. तकनीशियन के लिए कुछ शिक्षा की जरूरत है पर फिल्म निर्देशक बनने के लिए डिगरी का होना जरूरी नहीं है. फिल्मों में सहायक और गुरुशिष्य परंपरा का ही चलन रहा है. फिल्म स्कूल से ट्रेनिंग ले कर ही फिल्म बना सकते हैं, यह जरूरी नहीं. मैं बीच में न्यूयार्क फिल्म स्कूल में कुछ भारतीयों से मिला, जो शिक्षा हासिल करने के लिए 1 करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं. इसे जायज नहीं कहा जा सकता. फिल्म स्कूल में आर्ट व क्राफ्ट के हिसाब से फिल्ममेकिंग सिखाई जाती है. पर यहां तो फिल्ममेकिंग पूरी तरह से दुकानदारी है. मेरी राय में ईमानदारी से फिल्म बनाना जितना जल्दी शुरू करें उतना ही ज्यादा अच्छा अनुभव व सीख मिलेगी. मैं ने तमाम फिल्मकार देखे हैं, जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा, पर गांव में जा कर फिल्म की शूटिंग करते हैं और फिर उन की फिल्म के साथ दर्शक जुड़ नहीं पाता. दूसरा, भारतीय फिल्मकारों में बहुत बड़ा घमंड है कि उन्हें सब पता है. कहानी के बजाय स्टार्स को वरीयता देना भी गलत है.’’

बहरहाल, पान जैसे निर्देशकों की फिल्मों की विडंबना यही है कि उन्हें समीक्षकों का भले ढेर सारा प्यार मिल जाए लेकिन दर्शकों का प्यार नहीं मिलता. चंद सिनेमाघरों में रिलीज हो कर ये फिल्में पुरस्कार समारोहों की रौनक बढ़ा सकती हैं लेकिन जनमानस का सिनेमा बनने का सफर पूरा करने के लिए पान को कलात्मक व व्यावसायिक सिनेमा के बीच संतुलन बनाना ही होगा वरना वे ऐसी ही फिल्मों तक सीमित रहेंगे.

प्रियंका के सीन लीक

प्रियंका चोपड़ा ने जब से विदेशी शो ‘क्वांटिको’ करना शुरू किया है, उन के काम की तारीफ कम, उन के बोल्ड सींस को ले कर ज्यादा बातें होती हैं. बीते दिनों कार में उन के बोल्ड सीन की क्लिप बड़े चटखारे ले कर सोशल मीडिया में परोसी गई और अब उस सीरियल से जुड़ा एक शौवर सीन लीक हो गया है और इस तरह प्रचारित किया जा रहा है मानो वे पहली अभिनेत्री हैं जिन्होंने इस तरह के बोल्ड और सैक्सी दृश्य किए हों. इस से पहले भी कई हिंदी फिल्मों में प्रियंका चोपड़ा ने बोल्ड सीन किए हैं. और प्रियंका ने ही नहीं लगभग सभी अभिनेत्रियां यह कर रही हैं. दरअसल, हम भारतीय इतने लंपट हैं कि अभिनय से ज्यादा देहसुख में आनंद लेते हैं. शायद इसीलिए, अभिनेत्रियों के अभिनय के बजाय उन के बदन पर सब की निगाहें टिकी रहती हैं.

सऊदी अरब हुक्मरानों की बदलती सोच

सऊदी महिलाओं के लिए साल 2015 बहुत ही अहम रहा. इस साल पहली बार सऊदी सरकार ने देश की महिलाओं को वोट देने और चुनाव में खड़े होने का अधिकार दिया है. अब यह आशा की जा रही है कि सऊदी समाज में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और राजनीति में भी वे सक्रिय भूमिका निभा सकेंगी. लेकिन वहीं, कुछ कट्टरपंथी सोच रखने वालों ने इस के खिलाफ माहौल बनाना शुरू कर दिया है ताकि महिलाओं को उन अधिकारों से वंचित रखा जा सके. औनलाइन मुहिम द्वारा महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है और कटाक्ष कर उन्हें चुनाव में हिस्सा लेने से रोकने की मांग की जा रही है. यह मुहिम कितनी कामयाब होगी, इस बहस से हट कर इस बात को निरस्त नहीं किया जा सकता कि महिला अधिकारों का समर्थन करने वालों की संख्या अधिक और प्रबल है जिस से प्रभावित हो कर ही सऊदी सरकार ने यह फैसला किया है. ज्ञात रहे, सऊदी सरकार की संसद, जिसे शूरा कहते हैं, में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2011 से है लेकिन इस के बावजूद, उन्हें वोट देने अथवा चुनाव में खड़े होने की इजाजत नहीं थी. 2011 में सऊदी सुल्तान अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज अलसऊद ने संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए 20 फीसदी सीटें आरक्षित करने की घोषणा की थी. इस के बाद 150 सीटों वाली संसद में 30 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो गईं.

इस पहल से खाड़ी देशों में सऊदी अरब अकेला ऐसा देश है जहां किसी भी देश की संसद में महिला प्रतिनिधि के मुकाबले अधिक प्रतिनिधि हैं. संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई की 40 सदस्यों वाली संसद में महिलाओं की संख्या 7 है, बहरीन में 40 में 4, कुवैत में 50 में 3, ओमान में 84 में 1 महिला सदस्य है. सब से खराब सूरतेहाल यमन की है जहां 301 सदस्यों वाली संसद में केवल 1 महिला सदस्य है. इस से यह साफ होता है कि सऊदी समाज, जिस में महिलाओं को उन के जायज अधिकार भी हासिल नहीं थे, की सोच में तबदीली आ रही है. सऊदी सरकार द्वारा महिलाओं पर बहुत सी पाबंदियों को खत्म किए जाने के बावजूद उन्हें अभी भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इन में निकाह, नौकरी और पासपोर्ट के लिए घर के मुखिया से इजाजत लेना अनिवार्य होना भी शामिल है.

बदलाव की बयार

सऊदी महिलाओं ने खेलों में भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया है. पहले तो इस की इजाजत नहीं थी फिर जब इजाजत मिली तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेलों के लिए यह शर्त है कि टूर्नामैंट में हिस्सा लेने के लिए घर के किसी आदमी को खेल के मैदान तक जाना पड़ेगा. इतना ही नहीं, इसलामी शिक्षा एवं दिशानिर्देश के अनुसार अपने बदन को छिपाने वाले कपड़े पहनने होंगे. इस के तहत, 2012 में लंदन के ओलिंपिक खेलों में किसी सऊदी महिला ने पहली बार हिस्सा लिया. इस से भी बड़ा बदलाव उस समय आया जब एक सऊदी महिला ने वकालत करने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया. इस के पूर्व किसी महिला ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह वकालत करेगी. इस महिला के साहस ने अन्य महिलाओं को इस दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है. वैसे यह अलग बात है कि इस महिला के लिए वकालत शुरू करने के लिए किसी वकील के अधीन रह कर प्रशिक्षण प्राप्त करना अनिवार्य किया गया था.

सऊदी अरब में अभी भी महिलाओं के कार चलाने पर प्रतिबंध है. बीते दिनों कुछ महिलाओं ने कार चलाने की अनुमति हासिल करने के लिए सऊदी अरब की सड़कों पर गाडि़यां चलाई थीं लेकिन सरकार ने गाडि़यां चला रही महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया था. महिलाओं को कार चलाने की अनुमति कब मिलेगी, यह समय ही बताएगा. 2013 में सऊदी सरकार ने कुछ शर्तों के साथ महिलाओं को स्कूटर चलाने की इजाजत दी है. इस के तहत सऊदी महिला के स्कूटर चलाते समय साथ में घर का कोई आदमी रहेगा जो दुर्घटना होने की स्थिति में जख्मी महिला को परदे का लिहाज रखते हुए अस्पताल तक पहुंचाने में मदद कर सके. महिलाओं को मतदान करने और निकाय चुनाव में खड़े होने के खिलाफ कट्टरपंथियों के ए समूह ने देश के मुफ्ती आजम से मुलाकात कर इस बात पर जोर दिया है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और महिलाओं को चुनाव में भाग लेने से रोकें. मुफ्ती आजम ने उन की मांग को निरस्त कर दिया है, जिस के बाद इस समूह ने सोशल मीडिया पर मुहिम छेड़ दी है लेकिन इस मुहिम का नतीजा विपरीत निकला और महिला हितों के लिए काम करने वाले और भी ज्यादा सक्रिय हो गए हैं. ऐसे में आशा की जा रही है कि विरोधी समूह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकेगा.

बहरहाल, सऊदी अरब के इस फैसले का भारत और पाकिस्तान के मुसलमानों पर गहरा असर पड़ेगा. इन दोनों देशों में औरतों के पास चाहे बराबर के हक हों मगर हकीकत यह भी है कि मुसलिम समाज अरब देशों की नकल करने की कोशिश करता है. वहां के बदलाव की हवा यहां पर नए पत्तों को उगने का मौका देगी.

बच्चों को बिगाड़ते हिंसक वीडियो गेम्स

मातापिता को पछतावा है कि उन के बच्चे ने अपने सहपाठी की खेलखेल और मामूली बात में हत्या कर दी. एक और बच्चे ने सही राय देने वाले दूसरे बच्चे का सिर फोड़ दिया. क्लास का यह छोटा बच्चा अकसर पुलिस का रोल करता था और बच्चों की खूब धुनाई करता था, उन की चीजें खा जाता था. किसी के पास अच्छी चीज देखता तो उसे चुरा लेता या तोड़फोड़ देता. इस तरह की अनेक घटनाएं हमारे आसपास रोज ही घटती दिखाई देती हैं लेकिन बच्चे ऐसी हरकत क्यों करते हैं, यह विचारणीय है. बत्रा अस्पताल, दिल्ली की बाल मनोवैज्ञानिक डा. दीपाली का कहना है कि आजकल बच्चे टीवी, वीडियो गेम और कंप्यूटर के संपर्क में बहुत ज्यादा हैं. वे जो कुछ इन गैजेट्स में देखते हैं, उसे अपने जीवन में कौपी करने की कोशिश करते हैं. उन का जीवन घर और स्कूल तक सीमित होता है. दोनों जगह उन्हें मनमानी करने का मौका मिल जाता है. यह मनमानी उन्हें निरंकुश और हिंसक बनाती है. दरअसल, बच्चे वीडियो गेम और कार्टून कैरेक्टर की जगह अपने को अनुभव करते हैं. एक कल्पनात्मक जीवन उन पर हावी होता जाता है. हमें जो व्यवहार हिंसक लगता है वह उन का सामान्य व्यवहार है. वे सबकुछ बहुत सहज रीति से कर रहे होते हैं. उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता. इसीलिए मातापिता को जब तक उन के हिंसात्मक व्यवहार का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. काफी समय तक उन का व्यवहार मांबाप ढकतेछिपाते रहते हैं.

मेरी पड़ोसिन की 4 साल की बेटी सारे दिन वीडियो गेम खेलती और टीवी देखती रहती है. घर में मजाल है कि कोई अपनी पसंद का धारावाहिक देख ले या समाचार अथवा कोई अन्य चैनल लगा ले. अगर कोई ऐसा करने का प्रयास करता हो तो उसे वह थप्पड़, लात मारने लगती है. एक दिन मैं पड़ोसिन के घर अपना मनपसंद कार्यक्रम देखने गई क्योंकि मेरा टीवी खराब पड़ा था. उस ने रोरो कर हंगामा खड़ा कर दिया कि आंटी को यानी मुझे भगाओ. अकसर ऐसे बच्चे मातापिता को होशियार लगते हैं. उन का ध्यान आधुनिक खेल व तकनीक में देख कर मातापिता को लगता है वे होशियार तथा तेज हो रहे हैं. जबकि यही चीज उन के सिर पर हावी हो जाती है. विमहैन्स के क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डा. जौन विक्टर कहते हैं, ‘‘ऐसे बच्चे इन हिंसक खेलों के दुष्प्रभावों से अपनी संवेदनशीलता खोने लगते हैं. उन्हें दूसरों को पीडि़त व परेशान करने में मजा आता है. वे केवल अपने बारे में सोचते हैं. उन्हें सिर्फ अपने आनंद व अपनी तकलीफ से मतलब होता है. ऐसे में उन का अपनेआप से नियंत्रण हटने लगता है. वे हिंसक स्वभाव के हो जाते हैं.’’ ऐसा नहीं है कि हिंसक होते हुए बच्चे पहचाने न जा सकें. आवश्यकता है उन पर निगाह रखने की.

‘आजकल बच्चे ऐसे ही हैं. ये नए युग के बच्चे हैं. हमारी पुरानी पीढ़ी की तरह घोंचू नहीं हैं. 21वीं सदी के बच्चे भी ऐसे नहीं होंगे तो कौन होंगे.’ अकसर मातापिता ये सफाई देते हैं. इस तरह बच्चों को काबू करने का जो योग्य समय होता है वह निकल जाता है. जब हिंसा उन की रगों, दिलोदिमाग में आ कर छा जाती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. हिंसा उन के ब्रेन और नर्वस सिस्टम का हिस्सा बन जाती है. वीडियो गेम, टीवी या कंप्यूटर जैसी तमाम चीजें अपनी दृश्यात्मकता के कारण बच्चों को बहुत यथार्थ लगती हैं. जब वे वीडियो गेम खेलते हैं तो वे केवल दर्शक नहीं रहते. वे स्वयं उस का हिस्सा हो जाते हैं. उन की मासूम दुनिया में ये खेल नकारात्मक हिंसा और प्रतिस्पर्द्धा का तानाबाना बुनते हैं. बच्चों को ये गेम्स पहले धीरे और फिर बहुत तेजी से अपने रंग में रंगते हैं. अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों ने टीवी शो का बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया. अध्ययन में पाया गया कि देखने को सच समझने और ऐक्शनप्रधानता के कारण बच्चों का दिमाग हिंसा की ओर ऐसे सहज रूप से प्रवृत्त होता है जैसे वह उन के स्वभाव का हिस्सा हों. बच्चों को खेलने के गुड्डेगुडि़या दिए गए. 6-7 वर्ष के बच्चों ने उन के साथ बहुत प्यारभरा व्यवहार किया, जैसे वे उन के प्यारे दोस्त हों. अगले दिन, उन्हें एक फुटेज दिखाई गई जिस में एक बच्चा बहुत बेरहमी से उस गुड्डे को मार रहा था. ये बच्चे भी अपने गुड्डेगुडि़या को मारने में लग गए. लातघूंसे, उठापटक आदि तमाम तरीकों का उन्होंने इस्तेमाल किया.

यह मानसिक प्रक्रिया कैसी होती है या बनती है, इस बारे में शिशु रोग विशेषज्ञ डा. देवेंद्र कुमार आमेरा कहते हैं, ‘‘जो कुछ हम देखते हैं वैसे ही ब्रेन में स्टिम्युलेशन होते हैं. ये बच्चे को अपनी गिरफ्त में लेते हैं. वीडियो गेम खेलते ही बच्चे हिंसक या प्रतिक्रियाशील नहीं होते. धीरेधीरे देख कर उन में जीतने का जनून हावी होता है. अगले चरण में यह जनून बरकरार रह कर दृढ़ होता जाता है. फिर जिद की हद तक पहुंच जाता है. ‘बाई हुक ऐंड कु्रक’ की स्थिति आ जाती है. तब यह खेल उन के जीवन के सहज हिस्से जैसे होते जाते हैं.’’ इस की गिरफ्त से बच्चे को बचाने के बारे में डा. आमेरा कहते हैं, ‘‘उन के साथ बहुत प्यार से पेश आया जाए. उन की हिंसक प्रवृत्ति को नजर में रख कर भी नजरअंदाज किया जाए यानी आप की निगाह या ध्यान उन पर है, इस का उन्हें पता न लगने दिया जाए वरना वे जागरूक हो जाएंगे. जरूरत यह है कि अपने व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद कुछ समय निकाल कर उन्हें बे्रन गेम के बजाय खेल के मैदान में उतारा जाए. वहां कृत्रिम हार मान कर उन्हें जिता कर प्रोत्साहित किया जाए. इस तरह वे अन्य बच्चों से समायोजन व तालमेल बिठाना सीख कर हार को जीत में और जीत को हार में बदलना या सहज रूप से स्वीकारना सीख लेंगे.’’

डा. दीपाली कहती हैं कि लड़कियों पर इस तरह के वीडियो गेम्स का प्रभाव उतना नहीं होता क्योंकि कहीं न कहीं हम उन्हें रचनात्मकता से जोड़े रखते हैं. यही बात हमें लड़कों पर भी लागू करनी होगी. उन की छोटीछोटी रचनात्मकता को उभारना और प्रोत्साहित करना होगा. प्रशंसा व प्यार में कमी नहीं रखनी होगी. लड़कों की संवेदनशीलता को भी गुण मानना चाहिए. समय रहते मनोवैज्ञानिक निदान से हिंसक बच्चे आसानी से राह पर लाए जा सकते हैं. जितनी देर से निदान होगा, सुधार में भी उतनी ही देरी होगी. लेखक डा. वीरेंद्र सक्सेना कहते हैं कि बच्चे हिंसक न हों, इस के लिए वीडियो गेम के साथसाथ शिक्षा व घरेलू माहौल भी सकारात्मक बनाए जाने की आवश्यकता है. ऐसा संभव नहीं कि बच्चा शांति भरे वीडियो गेम देखे और घर में चौबीस घंटे कलह, मारपीट देख कर उस से प्रभावित न हों. बच्चों को एकाग्र करने वाली चीजों और ऐक्टिविटी में लगा कर भी वीडियो गेम का गुलाम होने से बचाया जा सकता है. ये तो वे शौर्टकट हैं जो मातापिता ने अपनी प्राथमिकताओं के चलते बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उन्हें खुद थमाए हैं.

हर वीडियो गेम हिंसक नहीं होता, इसलिए उसे एकदम उस से दूर न किया जाए बल्कि धीरेधीरे समझाया जाए. पढ़ाई, पेंटिंग आदि में अगर उस की रुचि हो तो उसे इन ऐक्टिविटीज में व्यस्त रखा जाए. केवल एक साधन दे कर अन्य से हाथ खींच लेना ठीक नहीं. महंगी चीज खरीद कर मातापिता फिर जरा भी खर्चा करना पसंद नहीं करते. उन की इच्छा का सम्मान और तवज्जुह दोनों जरूरी हैं. कहते हैं हिटलर चित्रकार बनना चाहता था पर उस के पिता को उस की रचनात्मकता पसंद नहीं आई. उन्होंने जबरन उसे इस से दूर किया. यदि उस समय उसे रचनात्मक होने या बनने दिया जाता तो शायद वह कभी भी उतना हिंसक नहीं होता. बच्चे मासूम और फूल की तरह होते हैं. वे खिलना चाहते हैं, मुरझाना नहीं. हम लोग समय रहते उन के मन व संसार को मुरझाने से रोक सकते हैं. आज बच्चों पर नंबर लाने का जनून और हीरो बनने का शौक थोप दिया गया है. यह खुद उस के दिमाग की उपज नहीं है. यह बात हमें खुद समय रहते समझनी और माननी होगी. जीत के साथसाथ बच्चों को हार भी स्वीकारना सीखना होगा. वीडियो गेम का झुनझुना बच्चों को थमा कर हम समझ बैठे हैं कि वे अपने में मस्तमग्न हैं, हमें जरा भी डिस्टर्ब नहीं करते तो यह बात हम ने भले ही अच्छा संकेत मान ली हो पर यह सही नहीं है. द्य डा. जौन विक्टर का मानना है कि हिंसा व अक्खड़पन को लोग जैनेटिक मान कर मुक्ति पा लेना आसान समझते हैं जबकि ऐसा नहीं है. ज्यादातर हिंसा और नकारात्मक व्यवहार हम ने अपने परिवेश और प्रकृति से ग्रहण किए हुए होते हैं. आदत और स्थायी प्रकृति का हिस्सा बनने से पहले इन से मुक्ति पाना आसान रहता है.

७वां वेतनमान : सरकारी नौकरों की मौज

7वें वेतनमान के लागू होने के बाद सरकारी नौकरों को कम से कम 18 हजार रुपए प्रतिमाह और अधिक से अधिक 2 लाख 50 हजार रुपए प्रतिमाह का वेतन मिलेगा. इस वेतनमान के लागू होने से सरकारी नौकरों का वेतन 23.55 फीसदी बढ़ जाएगा. आर्थिक मुद्दों के जानकार संगठनों फिच और सिटी ग्रुप के अनुमान हैं कि 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी का 0.50 फीसदी तक बढ़ सकता है. सरकार के आय और व्यय के अंतर को राजकोषीय घाटा कहते हैं. इस वेतन वृद्धि के बाद चल रहे वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को 3.5 के भीतर रखना मुश्किल होगा. राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 3.9 है. इस को हासिल करना मुश्किल होगा. आर्थिक बोझ को दरकिनार कर अगर जनता पर पड़ने वाले बोझ को देखा जाए तो जबजब सरकारी कर्मचारियों का वेतनमान बढ़ा है महंगाई बढ़ी है. 7वें वेतनमान से 1.02 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ देश पर पड़ेगा. केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय का दावा है कि सरकार को पहले से अनुमान था कि 7वें वेतनमान के लागू होने का असर पडे़गा इसलिए वह पहले से ही सचेत था. सरकार के सामने आगे कोई जोखिम आने वाला नहीं है. इस के विपरीत रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था सार्वजनिक और निजी निवेश में गिरावट के दौर से गुजर रही है. इस से देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है. ऐसे में 7वें वेतनमान के रूप में अतिरिक्त बोझ देश के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है. देश के सामने जीडीपी ग्रोथ को बनाए रखना आसान नहीं होगा. देसी रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का मानना है कि 7वें वेतनमान के लागू होने के बाद उपभोक्ता मांग बढ़ेगी. उपभोक्ता मांग सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज हो सकती है पर बाकी जनता बढ़ती महंगाई के बोझ के नीचे दब जाएगी.

हैरानी यह है कि सरकारी नौकर वेतन में 23.55 फीसदी वृद्धि से भी खुश नहीं हैं. इंडियन पब्लिक सर्विस सर्विसेज इंप्लाइज फैडरेशन के अध्यक्ष वी पी मिश्र का कहना है कि वेतन आयोग ने फैडरेशन की केवल 2 मांगों–वन रैंक वन पैंशन और पे ग्रेड को खत्म करने को माना है. बाकी मांगों पर वेतन आयोग ने कोई विचार नहीं किया. इसलिए फैडरेशन इस वेतनमान से खुश नहीं है. फैडरेशन अपने मुद्दों को ले कर आंदोलन की तैयारी में है. दरअसल, सरकारी नौकरों की नाराजगी की बड़ी वजह यह है कि छोटे कर्मचारियों के वेतन में 2,670 रुपए की वृद्धि हुई है जबकि कैबिनेट सेक्रैटरी के वेतन में 1 लाख 60 हजार रुपए की. वेतन आयोग ने बडे़ और छोटे अफसरों के बीच जो भेदभाव रखा है उस से असंतोष बढ़ रहा है  

उत्तर प्रदेश सरकार में काम कर रहे राजस्व विभाग के एक अफसर कहते हैं, ‘‘केंद्र सरकार ने अपने नौकरों के लिए 7वां वेतनमान लागू कर दिया है. इस से अब राज्य सरकारों पर भी दबाव होगा कि वे भी अपने प्रदेशों में 7वां वेतनमान लागू करें. इस का एक राजनीतिक उद्देश्य भी है. उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार पर दबाव होगा कि वह इस बढे़ वेतनमान को लागू करे. अगर वर्तमान सरकार बढे़ वेतनमान को लागू न कर पाएगी तो सहज भाव उस के खिलाफ और 7वां वेतनमान लागू करने वाली केंद्र सरकार के पक्ष में होगा. इस का उसे चुनावी लाभ मिल सकेगा. 1990 के बाद सरकारी नौकरियों में दलित व पिछडे़ वर्ग के लोगों की संख्या सब से अधिक बढ़ी है. ऐसे में यह वोटबैंक उस के साथ हो सकता है. बिहार चुनाव की करारी हार के बाद केंद्र सरकार अपनी साख बचाने के लिए 7वें वेतनमान का सहारा ले रही है.’’

10 साल में नया वेतन आयोग

सरकारी नौकरों के लिए सरकार ने हर 10 साल में नए वेतनमान का गठन अब तक किया है. 1946 में श्रीनिवास वरदचारियार की अध्यक्षता में पहले वेतन आयोग का गठन किया गया. उस समय मूल वेतन 35 रुपए था. देश की आजादी के बाद इस वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुईं. इस के बाद 1957 में जगन्नाथ दास की अध्यक्षता में दूसरा वेतन आयोग आया. उस ने न्यूनतम वेतन 80 रुपए रखा. 1970 में तीसरा वेतनमान रघुवीर दयाल की अगुआई में बना, इस में मूल वेतन 135 रुपए रखा गया. 1983 में चौथा वेतन आयोग पी एन सिंघल की अध्यक्षता में बना, इस में न्यूनतम वेतन 750 रुपए रखा गया. इस के बाद 1994 में 5वां वेतन आयोग जस्टिस एस पांडियन की अध्यक्षता में बना. 5वें वेतन आयोग में मूल वेतन 2,550 रुपए रखा गया. 2006 के छठे वेतनमान में यह वृद्धि बढ़ कर 7 हजार रुपए हो गई. छठे वेतन आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बी एन कृष्णा थे.  जस्टिस ए के माथुर की अध्यक्षता में बने 2014 में 7वें वेतन आयोग में मूल वेतन बढ़ कर 18 हजार रुपए हो गया है.

वेतन वृद्धि और बढ़ती महंगाई के समीकरण को वेतन आयोग में होने वाली वृद्धि से देखा व समझा जा सकता है. महंगाई का असर 1980 के बाद बढ़ना शुरू हुआ जब न्यूनतम वेतन करीब 6 गुना बढ़ कर 750 रुपए हो गया. महंगाई में असल तेजी 1990 के बाद देखने को मिली जब न्यूनतम वेतन 4 गुना बढ़ कर 2,550 रुपए हो गया. छठे वेतनमान के बाद महंगाई आगे बढ़ी जब न्यूनतम वेतन बढ़ कर 7 हजार रुपए हो गया. वेतनमान के बढ़ने के चलते महंगाई बढ़ने की आशंका से लोग अनुभव कर रहे हैं कि 7वां वेतनमान लागू होने के बाद महंगाई और भी तेजी से बढ़ेगी. केंद्र सरकार में करीब 18 फीसदी नौकरों के पद खाली हैं. केंद्र सरकार में कुल 40 लाख 48 हजार 707 स्थायी पद हैं. इस समय 33 लाख 1 हजार 536 कर्मचारी ही कार्यरत हैं. 7 लाख 47 हजार 171 पद खाली हैं. केंद्र सरकार के वेतनमान लागू करने के बाद सभी प्रदेशों पर इस बात का दबाव होगा कि वे अपने यहां भी इस वेतनमान को लागू करें. 

सरकारी नौकरियों का आकर्षण

सरकारी नौकरियों के बढ़ते वेतनमान के चलते युवाओं में सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है. इस को देखते हुए सरकारों ने लगातार सरकारी नौकरियों में परीक्षा शुल्क को बढ़ा दिया है. सरकारी नौकरियों में बढ़ते परीक्षा शुल्क का मुख्य कारण सरकारी नौकरियों का बढ़ता आकर्षण होता है. इस को समझने के लिए उत्तर प्रदेश सचिवालय में चपरासी भरती के लिए आए आवेदनपत्रों को देखना चाहिए. 368 चपरासी के पदों की भर्ती के लिए 23 लाख लोगों ने आवेदन किया. चपरासी की भरती के लिए योग्यता 5वीं पास रखी गई. जिन लोगों ने आवेदन किया उन में से 2 लाख से ज्यादा ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट थे. 255 लोगों ने पीएचडी कर रखी थी. 20 लाख लोग कक्षा 12 पास थे. केवल 53 हजार लोेग ऐसे थे जो 5वीं कक्षा तक ही पढे़ थे. एक पद के लिए करीब 6 हजार 250 लोगोें ने आवेदन किया. चपरासी की नौकरी करने के लिए पहले कोई आवेदन नहीं करता था. अब चपरासी की नौकरी के लिए भी लोग तैयार हैं. सरकारी नौकरी में छोटे से छोटे पद के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार हैं. सरकारी नौकरी को पाने के लिए लोग केवल महंगी परीक्षा फीस ही देने को तैयार नहीं होते बल्कि वे रिश्वत भी देने को तैयार रहते हैं. सरकारी नौकरियों की भरती में होने वाली गड़बडि़यों की मुख्य वजह रिश्वत ही होती है. लेखपाल की नौकरी के लिए 6 से 9 लाख रुपए की रिश्वत लोग देने को तैयार थे. इसी तरह, दारोगा भरती में 10 से 15 लाख रुपए तक रिश्वत की मांग होे रही थी. रिश्वत के इस पैसे को जुटाने के लिए लोग घर की जमीन, खेत और गहने तक बेचने से पीछे नहीं हटते हैं. चपरासी और लेखपाल की भरती के बाद जितना वेतन सरकार से मिलता है उस के मुकाबले रिश्वत की रकम बहुत होती है. इस के बाद भी लोग तैयार रहते हैं. कितने लोग तो रिश्वत बिचौलियों को दे कर फंस जाते हैं. ऐसे बहुत से मामले प्रकाश में आते हैं जिन में लोग शिकायत दर्ज कराते हैं कि सरकारी नौकरी के लिए उन के साथ ठगी की गई.

नौकरी, रिश्वत और आरक्षण

सरकारी नौकरी के आकर्षण की मूल वजह ज्यादा वेतन और कम काम होता है. इस के अलावा रिश्वत पाने की संभावनाएं बहुत होती हैं. 15 साल पहले एक पतिपत्नी ने साथसाथ नौकरी शुरू की. पति प्राइवेट नौकरी में था. उस समय उस का वेतन 6 हजार रुपए था. पत्नी सरकारी नौकरी में थी. उसे 16 हजार रुपए मिलते थे. 15 साल बाद पति को 30 हजार रुपए का वेतन मिल रहा है जबकि उस की पत्नी का वेतन 1 लाख 20 हजार रुपए हो गया है. पत्नी को रहने के लिए सरकारी मकान अलग से मिला है. काम का समय तय है. औफिस में छुट्टी की कमी नहीं है. इस में सरकारी नौकरी जाने का खतरा नहीं होता. हर साल महंगाई भत्ता और दूसरी सुविधाएं अलग से मिलती हैं. सरकारी नौकरी का स्थायित्व अलग आत्मविश्वास देता है. हर तरह की सरकारी नौकरी में रिश्वत लेने की अपार संभावनाएं होती हैं. सरकारी नौकरों के पास काम कराने तमाम लोग जाते रहते हैं. सुबह से शाम तक लाइन लगी होती है. छोटे से छोटा सरकारी नौकर भी बड़े काम का होता है. वह काम कराने वाले साहब तक सीधी पहुंच रखता है. इस में साहब का ड्राइवर, रसोइया, चौकीदार और चपरासी तक शामिल होते हैं. सरकारी विभाग में हर काम करने के बदले रिश्वत की दरकार होती है. दलित और ओबीसी बनना सभी जातियां चाहती हैं ताकि उन को आरक्षण के लाभ के सहारे सरकारी नौकरी मिल जाए. उत्तर प्रदेश की 17 ओबीसी जातियों ने खुद को दलित जातियों में शामिल करने की गुहार लगा रखी है. वे यह कदम दलितप्रेम में नहीं उठा रहीं, वे चाहती हैं कि दलितों के कोटे का मिलने वाला आरक्षण उन को मिलने लगे, जिस से वे सरकारी नौकरी पा जाएं और फिर खूब रिश्वत वसूलें. 

रोजगार साधनों की कमी

सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा फीस लेने वाले तर्क देते हैं कि परीक्षाओं का आयोजन कराने में खर्च होता है, इस के लिए फीस ली जाती है. उन की इस बात में दम हो सकता है. जब खर्च से अधिक फीस ली जाए तो महंगी परीक्षा फीस पर सवाल उठने लगते हैं. जरूरत इस बात की है कि परीक्षा की ऐसी व्यवस्था हो जिस के आयोजन में कम से कम फीस ली जाए. कोशिश हो कि छात्र को अपने शहर में ही परीक्षा देने का मौका मिले. उसे दूसरे शहर न जाना पडे़. इस से सरकार और परीक्षा इंतजाम करने वाली संस्थाओं का मुनाफा खत्म हो सकता है. देश में बेरोजगारों की दिनोंदिन बढ़ती समस्या को देखते हुए ऐसे प्रबंध करने जरूरी हो गए हैं. परीक्षा में नया सिस्टम बनाना होगा जिस में गड़बड़ी की संभावनाएं कम हों. परीक्षा देने में सरलता हो. प्राइवेट क्षेत्र के रोजगार में लोगों को सुविधाएं नहीं मिलतीं. वहां भी वेतन और तरक्की को ले कर चाटुकारिता और जीहुजूरी चलने लगी है. ऐसे में लोग प्राइवेट जौब की जगह किसी भी तरह से सरकारी जौब पाने के लिए भागते रहते हैं. कुछ साल पहले तक जब देश में प्राइवेट सैक्टर में जौब थीं तो लोग सरकारी नौकरी की तरफ कम जाते थे. 6 से 7 सालों में आर्थिक मंदी के चलते प्राइवेट सैक्टर में नौकरियों में कमी आई है. वहां वेतन और सुविधाएं कम हुई हैं. देश में सब से अधिक रोजगार के साधन कृषि क्षेत्र में हैं. इस के बाद कंस्ट्रक्शन, कारोबार, मैन्युफैक्चरिंग और शिक्षा के क्षेत्र में हैं. खेती में हो रहे नुकसान ने कृषि क्षेत्र में रोजगार की संभावना क ो कम कर दिया है. दूसरे क्षेत्रों में भी नौकरियां कम हो गई हैं. ऐसे में देश को बेरोजगारी के बोझ से बचाना है तो प्राइवेट सैक्टर को मजबूत करना होगा ताकि वहां रोजगार बढ़ सके और सरकारी नौकरियों पर दबाव कम हो सके. रोजगार के अवसर बढ़ने से लोग आरक्षण जैसे मुददों को भी भूल सकेंगे. अगर लोगों को प्राइवेट सैक्टर में अच्छे रोजगार मिलेंगे तो वे सरकारी नौकरियों की तरफ भागेंगे नहीं, न ही रिश्वत दे कर सरकारी नौकरी पाने की फिराक में रहेंगे.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें