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सही समय पर बिजलीपानी

किसानों को अगर समय पर बिजलीपानी न मिल पाए, तो खेती को नुकसान होना तय है. किसानों की इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए  गीयर बाक्स ड्रिवेन ट्रैक्टर पंप बनाए जा रहे?हैं.

* गीयर बाक्स में गीयर रेशियो फिक्स होने से पंप को पसंदीदा आरपीएम मिलते हैं और पुली के एडजस्टमेंट की जरूरत नहीं होती है.

* बेल्टड्राइव होने से बेल्ट की पावर और स्पीड का नुकसान नहीं होता.

* यूनिवर्सल कपलिंग होने से एलाइनमेंट में थोड़ा फर्क हो तो भी पंप आसानी से चलता?है.

* गीयर बाक्स होने से पाजिटिव ड्राइव मिलती है, जिस से पंप एक स्पीड पर चलता है और एकजैसा हेड और डिस्चार्ज मिलता?है.

* यह फिटिंग में आसान है और ट्रैक्टर में जुड़े होने की वजह से आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता?है.

* आपातकालीन हालात में ट्रैक्टर में जुड़े पावर जनरेटिंग सेट से उजाला फैलाया जा सकता?है.

* ट्र्रैक्टर से जुड़े पावर जनरेटिंग सेट से किसान खेत में सबमर्सिबल पंप व बिजली से चलने वाले कई खेतयंत्रों को चला सकते हैं.

इसी तरह गीयर बाक्स ड्रिवेन एसी जनरेटर भी बन रहे?हैं.

* गीयर बाक्स में गीयर रेशियो तय होने से जनरेटर को पसंदीदा आरपीएम मिलते?हैं और पुली एडजस्टमेंट की जरूरत नहीं होती है.

* यह फिटिंग में आसान है और ट्रैक्टर में जुड़े होने से इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता?है.

* आपातकालीन हालात में ट्रैक्टर में जुड़े पावर जनरेटिंग सेट से उजाला भी किया जा सकता?है.

* ट्रैक्टर से जुड़े पावर जनरेटिंग सेट से किसान खेत में सबमर्सिबल पंप व बिजली से चलने वाली कई खेती मशीनों को चला सकते?हैं.

* लंबे समय तक चलने के लिए विश्वसनीय क्लास ‘एच’ इंस्युलेशन.

* कापेक्ट, हलका व मजबूत डायकास्ट एल्यूमिनियम स्टेटर फ्रेम.

* खास डिजाइन की कांपेक्ट स्लिपरिंग व ब्रश असेंबली.

* मोटर स्टार्ट करने की अच्छी कूवत, शार्ट सर्किट में रखरखाव की कूवत.

* लंबे समय तक बिना इस्तेमाल के रहने पर भी पौजिटिव वोल्टेज बनता है.

ये पंप राजकोट की कंपनी फिल्डमेन इंजीनियर्स प्रा. लि. के द्वारा भी बनाए जा रहे?हैं.

ज्यादा जानकारी के लिए किसान 91-0281-2387074, 2387075 नंबरों पर फोन कर  सकते?हैं.                             

नजर न आने वाले निमेटोडों की रोकथाम

नजर न आने वाले निमेटोड (सूत्रकृमि) ज्यादातर जलीय जीव हैं, मगर ये जमीन में भी पाए जाते हैं. कुछ फसल के बाहरी भागों पर और ज्यादातर जमीन में पाए जाते हैं. यहां इस महत्त्वपूर्ण पादप परजीवी निमेटोड की पहचान, जीवनचक्र व रोकथाम के बारे में जानकारी दी गई है. पादप सूत्रकृमि या निमेटोड बेहद छोटे सांप जैसे जीव होते हैं, जिन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता है. ये सूक्ष्मदर्शी यंत्र से ही दिखाई देते हैं. ये अधिकतर मिट्टी में रह कर पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. इन के मुंह में एक सुईनुमा अंग स्टाइलेट होता है. इस की सहायता से ये पौधों की जड़ों का रस चूसते हैं, जिस के कारण पौधे भूमि से खादपानी पूरी मात्रा में नहीं ले पाते और उन की बढ़वार रुक जाती है. ये हर प्रकार की फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं. दुनिया की 34 फीसदी फसलें रोगों, कीटों और खरपतवारों के कारण तबाह होती हैं. यहां नजर न आने वाले निमेटोड की खास प्रजातियों की भी जानकारी दी जा रही है :

बीज गाल (पिटिका) निमेटोड (एंगुनिया ट्रिटीसाई)

पहचान व जीवन चक्र : यह निमेटोड (सूत्रकृमि) विश्व में गेहूं उत्पादन क्षेत्रों में पाया जाता है. नर व मादा द्वारा प्रजनन करने के बाद मादा अंडे देना शुरू कर देती है. वह अगले 6 से 12 दिनों के अंदर 1000 अंडे नए गाल (पिटिका) के अंदर दे देती हैं. निमेटोड गाल (पिटिका) को फाड़ कर दूसरी अवस्था के लारवे कार्यशील हो जाते हैं और जमीन से 10 से 15 दिनों में बाहर आ जाते हैं. बीज के जमने के समय लारवे हमला कर देते हैं और बीज के जमने वाले भाग पर गाल बनाते हैं. ये तने और पत्ती की सतह पर पानी की पतली परत के सहारे ऊपर चढ़ जाते हैं. पत्ती के बढ़ने वाले भाग से पत्ती की चोटी पर चढ़ जाते हैं. ये पौधे की बढ़वार अवस्था में फूल व जननांग तंत्र पर हमला करते हैं और बाहरी परजीवी लारवे भीतरी परजीवी लारवों में बदल जाते हैं.

नुकसान के लक्षण

निमेटोड (सूत्रकृमि) से संक्रमित नवजात पौधे का आधारीय भाग हलका सा फूल जाता है व बीज के जमाव के 20-25 दिनों बाद तने पर निकली हुई पत्ती मुड़ जाती है. संक्रमित नवजात पौधे की बढ़वार रुक जाती है और अकसर पौधा मर जाता है. संक्रमित पौधा सामान्य दिखाई देता है. पौधे में बहुत फुटाव निकल आते हैं और बाली 30-40 दिनों पहले निकल आती है. बाली लंबे समय तक सामान्य बाली के मुकाबले हरी रहती है. बीजपत्र गाल (पिटिका) में बदल जाते हैं. इस रोग के कारण नवजात पौधे की पत्तियों पर हलका पीला सा पदार्थ जमा हो जाता है. संक्रमित पौधे की बाली में दाना नहीं बनता है. इस रोग के बीजाणु के कारण कभीकभी 80 फीसदी तक नुकसान होता है.

रोकथाम

बीज की सफाई : टुंडा रोग या बाल कोकल रोग रहित बीज प्राप्त करने के लिए बीजों को छन्नी से छान कर पानी में डाल कर तैरते हुए बीज अलग कर लेने चाहिए.

गरम पानी से उपचारित करना : बीजों को 4 से 6 घंटे तक ठंडे पानी में भिगोने के बाद 54 डिगरी सेंटीग्रेड गरम पानी में 10 मिनट तक उपचारित करना चाहिए.

फसल हेरफेर कर बोना : निमेटोड (सूत्रकृमि) खेत से बाहर करने के लिए पोषक फसल की 2 या 3 साल तक बोआई नहीं करनी चाहिए.

रोगरोधी किस्में : निमेटोड अवरोधी प्रजातियां खेत में बोनी चाहिए.

फालतू पौधे निकालना : निमेटोड संक्रमित पौधे पता लगा कर अगेती अवस्था में नष्ट कर देने चाहिए. सूप से फटकना या हवा में उड़ाना: यह विधि भी सहायक गाल को बाहर करने के लिए होती है. इस विधि से 100 फीसदी गाल (पिटिका) अलग नहीं होते हैं.

जड़गांठ (सूत्रकृमि) मेलोइडोगाइन प्रजातियां

पहचान व जीवन चक्र : जड़गांठ सूत्रकृमि की प्रजातियां बैगन, भिंडी, टमाटर, मिर्च, घिया, तुरई, करेला, खीरा, गाजर आदि फसलों में पाई जाती हैं. जड़गांठ सूत्रकृमि की 1 मादा लगभग 4 सौ अंडे देती है. यह अच्छे पोषक पौधे पर 2 हजार तक अंडे देती है. अंडों में पहली अवस्था के लारवे विकसित होते हैं व दूसरी अवस्था अंडे से बाहर निकल कर जमीन की ओर जाती है और पौधे की चोटी से घुसती है. निमेटोड की दूसरी अवस्था ही संक्रमित या परजीवी अवस्था है. जीवनचक्र गरमी व बरसात में 21 से 27 दिनों का, जबकि सर्दियों में 50 से 80 दिनों से ऊपर का होता है. यह वातावरण के तापमान पर निर्भर करता है. 1 साल में 7 से 8 पीढि़यां पाई जाती हैं.

नुकसान के लक्षण

जड़गांठ सूत्रकृमि की समस्या ज्यादातर रेतीली मिट्टियों में देखने को मिलती है. इस के नवजात का पौधे पर अधिक असर पड़ता है. समय से पहले फलों का शुरू हो जाना इस की वजह से होता है. जमीन में नीचे मूल में गाल निमेटोड से संक्रमित होने की पहचान है. पौधे की जड़ पर गांठ का आकार निमेटोड की संख्या और फसल की आयु पर निर्भर करता है. गांठ के कारण जड़ का वजन कम हो जाता है और जड़तंत्र छोटा होने के कारण पौधे खाना कम लेने के कारण कम बढ़ते हैं. इस निमेटोड से सब्जी वाली फसल अधिक प्रभावित होती है. कद्दूवर्गीय सब्जियों में भारी गांठ पाई जाती है. जड़गांठ निमेटोड द्वारा सब्जी फसल में 11 फीसदी और खेत में अधिकतम 25 से 50 फीसदी तक हानि होती है.

रोकथाम

कृषि क्रियाएं विधि : खेत की गरमी के दिनों यानी मईजून में 2-3 गहरी जुताई करें. फसलों को बदल कर व बोआई का समय बदल कर बोने से इस के संक्रमण को कम किया जा सकता है. फसलचक्र में अनाज वाली फसल बोनी चाहिए.

फसलों के अवशेषों को जला कर नष्ट करने से इन की संख्या को कम किया जा सकता है. अंत: फसल जैसे प्याज व लहसुन को पोषित फसल के बीच में बोने से इस के असर को कम किया जा सकता है.

अवरोधी प्रजातियां : जड़गांठ अवरोधी प्रजातियां बोने से आर्थिक हानि से बचा जा सकता है.

* टमाटर की पंजाब एनआर 07, हिसार ललित, बनारस जैंट आदि प्रजातियां मुफीद हैं.

* बैगन की माइजर हरा, विजय संकरण, ब्लैक ब्यूटी, पूसा परपिल लौंग प्रजातियां मुफीद हैं.

* भिंडी की लौंग ग्रीन स्मूथ, आईसी 9273, आईसी 18960 वगैरह प्रजातियां मुफीद हैं.

* मिर्च की पूसा ज्वाला, कैप 63, ज्वाला प्रजातियां मुफीद हैं.

रासायनिक विधि : पौध वाली फसलों की नर्सरी को उपचारित करना चाहिए. सीधे खेत में बोने वाली फसलों जैसे भिंडी, कद्दू व लोबिया के बीजों को कार्बोफ्युरान 2-3 ग्राम प्रति किलोग्राम से उपचारित करना चाहिए. बैगन व टमाटर की पौध की जड़ों को 0.1 फीसदी मोनोक्रोटोफास के घोल या 0.05 फीसदी ट्राइजोफोस के घोल में खेत में लगाने से 6 घंटे पहले भिगो लेना चाहिए.

खेत में लैविक करंज, महुआ और नीम की खली 2.5 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालना लाभदायक होता है.

जैविक रोकथाम : फंगस पेसीलोकमाइसस लिलासीनस और जीवाणु पस्टुरिया पनीटरंस जड़गांठ के मुख्य जैविक नियंत्रक हैं.

गांठसिस्ट निमेटोड (हेटरोडेरा प्रजातियां)

पहचान व जीवनचक्र : यह निमेटोड गेहूं, अरहर, मक्का, धान और जौ आदि फसलों को हानि पहुंचाता है. जौ का मोल्या रोग इसी की वजह से होता है. गांठ सिस्ट निमेटोड जड़ में एक ही स्थान पर रह कर खाने वाला कीट है. यह अंडे गांठ के अंदर देता है, जो कई सालों तक जीवित रहते हैं. ये गांठ से अलग हो कर जमीन में निकल आते हैं और अगले साल संक्रमण करते हैं.

नीबू के आकार की गांठ में मार्चअप्रैल और अक्तूबरनवंबर तक 400 अंडे रहते हैं. इस समय अंडों में दूसरी अवस्था वाले लारवे सोई अवस्था में रहते हैं. फसल की अगली बोआई के समय नवंबर से जनवरी के बीच संक्रमित लारवे दूसरी अवस्था वाली गांठ से निकलने शुरू हो जाते हैं. एक सीजन में 50 फीसदी अंडे फूट जाते हैं और बाकी अगले सीजन तक सुरक्षित रहते हैं. जड़ के सिकुड़ने पर सिस्ट के निकलने पर सामान्य प्रभाव पड़ता है और ज्यादातर लारवे निकलते हैं. दूसरी अवस्था के लारवे जड़ की चोटी से घुसते हैं. इन का जीवन चक्र 9 से 14 सप्ताह में पूरा हो जाता है. 1 साल में इस की 1 पीढ़ी पाई जाती है.

नुकसान के लक्षण

इस निमेटोड के लक्षण खेत में टुकड़ों में दिखाई देते हैं. शुरुआती लक्षण लगभग 3 से 4 सप्ताह बाद फसल के जमने के समय दिखने लगते हैं. इस के अलावा बढ़वार रुक जाती है और संक्रमित पौधे पीले और हरेपीले रंग के दिखाई देते हैं. पत्तियां रंगहीन हो जाती हैं और तना पतला व कमजोर हो जाता है, ऐसे पौधों में बहुत कम दाने बनते हैं. ज्यादा संक्रमण होने पर दाने बिलकुल नहीं बनते. संक्रमित पौधे के आधार पर मूसला जड़ बन जाती है. हलकी जमीन में इस का प्रकोप अधिक होता है. इस से 45 से 48 फीसदी हानि होती है.

रोकथाम

कृषि क्रियाएं विधि : यह निमेटोड सूखा न सहने वाला होता है. फसलचक्र व गरमी की जुताई से इस पर काबू पाया जा सकता?है. पोषक अवरोधी फसलें जैसे सरसों, चना, गाजर व फ्रैंचबीन लगाना ठीक रहता है.

अपोषक फसलें उगाने पर संक्रमित फसल में 60 फीसदी तक निमेटोड की संख्या कम की जा सकती है. मईजून के महीनों में 2-3 बार गरमी की जुताई करने पर निमेटोड की संख्या घटाई जा सकती है, क्योंकि गरमी में गांठ पोषक क हो जाते हैं. अगेती बोआई से गेहूं की फसल का नुकसान कम होता है. 1 से डेढ़ महीने की फसल निमेटोड के आक्रमण को सहन करने की कूवत रखती है.

अवरोधी प्रजातियां : भारत में गेहूं की निमेटोड अवरोधी प्रजातियां सीसीएनआरवी 1 व राज एमआर 1 उगाई जाती है.

जौ की अवरोधी प्रजातियां राज किरन, आरडी 2035, आरडी 2052 और सी 164 संक्रमित इलाके में उगाई जाती हैं. इन प्रजातियों में मादा के अंडे देने में असफल होने के कारण निमेटोड की संख्या कम हो जाती है.

रासायनिक विधि : जमीन को 3 ग्राम कार्बोफ्यूरान या फोरेट 10 ग्राम प्रति 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर डालने पर निमेटोड पर काबू पाया जा सकता है.

एकीकृत नियंत्रण : मईजून के महीने में गरमी की जुताई और अपोषक फसलों की बोआई जैसे सरसों, चना या अवरोधी प्रजाति बोने पर निमेटोड की संख्या कम की जा सकती है. 

खेतीजगत के जनवरी के जरूरी काम

जनवरी के जोश से भरे महीने का सभी को पूरी शिद्दत से इंतजार रहता है. खेतीकिसानी के सूरमाओं यानी किसानों के लिए भी जनवरी की कशिश किसी से कम नहीं होती. वे भी पिछले साल की गई अपनी तमाम कारस्तानियों का जश्न मनाने के लिए बेताबी से जनवरी की बाट जोहते हैं. साल के पहले महीने यानी जनवरी में जाड़ा भी अपने शबाब पर होता है, मगर इस जाड़े से किसानों में सुस्ती नहीं आती. यह सर्दी तो किसानों में चुस्तीफुर्ती का संचार करने वाली होती?है. वे कई गुना ज्यादा जोश से अपने खेतों में जुट जाते हैं. जनवरी में रबी की ज्यादातर फसलें पनप कर बढ़ चुकी होती हैं. मोटे तौर पर उन का आधा सफर निबट चुका होता है, लिहाजा उन की खास देखभाल जरूरी हो जाती है. रबी की कीमती फसलों के साथसाथ सर्दी के फलसब्जी वगैरह की देखभाल भी जनवरी में जरूरी होती है.

पेश है एक सरसरी ब्योरा जनवरी के दौरान किए जाने वाले खेती संबंधी जरूरी कामों का, जिन्हें करने में बिल्कुल लापरवाही नहीं की जानी चाहिए:

* ठंडे मौसम में गेहूं के खेतों पर सब से?ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. गेहूं की सिंचाई के मामले में सचेत रहना बहुत जरूरी है. मोटे तौर पर 20 दिनों के अंतराल पर खेतों की लगातार सिंचाई करते रहना चाहिए.

* गेहूं के खेतों की सिंचाई का खयाल रखने के साथसाथ खरपतवारों के प्रति भी चौकन्ना रहना जरूरी?है और उन्हें समयसमय पर निकालते रहना चाहिए. खरपतवारों के साथसाथ दूसरी फसलों के पौधों को भी गेहूं के खेतों से उखाड़ देना चाहिए. चौड़े पत्ते वाले खरपतवार अगर ज्यादा बढ़ जाएं, तो उन के सफाए के लिए 2-4 डी सोडियम साल्ट दवा का इस्तेमाल करें.

* इस मौसम में गेहूं की फसल को अनावृत कंडुआ बीमारी का खतरा होता है. इस बीमारी की गिरफ्त में आई बालियों वाले पौधों को जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर दें.

* इस दौरान गेहूं के खेत में काली गेरुई बीमारी का हमला भी हो सकता?है. ऐसा होने पर मैंकोजेब दवा की ढाई किलोग्राम मात्रा को 700 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से फसल पर छिड़कें.

* अपने मसूर व मटर के खेतों का जायजा लें और उन की अच्छी तरह से निराईगुड़ाई करें. निराईगुड़ाई से तमाम खरपतवार तो निबटते ही?हैं, साथ ही पौधों को खुराक भी ठीक से मिलती?है. अगर खरपतवार ज्यादा तादाद में हों तो उन्हें खरपतवारनाशी दवा का इस्तेमाल कर के खत्म करें.

* चने व मटर के खेतों में फूल आने से पहले सिंचाई करें. ध्यान रखें कि इन फसलों में फूल बनने के दौरान सिंचाई करना मुनासिब नहीं होता. जब फूल पूरी तरह से आ चुके हों तब फिर से सिंचाई करें.

* चने व मटर के खेतों में जनवरी के आखिरी हफ्ते के दौरान अकसर रतुआ बीमारी का डर रहता?है. ऐसा होने पर रोकथाम के लिए ढाई किलोग्राम जिंक मैंगनीज कार्बामेट दवा को 700 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करें.

* जनवरी में अकसर चने की फसल में फलीछेदक कीट का कहर हो जाता?है. ऐसी हालत में फलियां बनना शुरू होते ही इंडोसल्फान 35 ईसी दवा की 2 लीटर मात्रा 1000 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में छिड़काव करें. समय से छिड़काव होने पर फलियां साबुत व अच्छी निकलेंगी.

* अपने जौ के खेतों का मुआयना करें. अगर बोआई को 1 महीना हो चुका हो तो बिना चूके खेतों की सिंचाई करें. सिंचाई के अलावा जौ के खेतों की निराईगुड़ाई करना भी जरूरी?है, ताकि तमाम खरपतवारों से नजात मिल जाए.

* सरसों व राई के खेतों की निराईगुड़ाई करें ताकि खरपतवार काबू में रहें. अगर पौधों में फूल व फलियां आ रही हों तो बिना चूके सिंचाई करना न भूलें.

* राई व सरसों की फसलों पर इस दौरान बालदार सूंड़ी का हमला हो सकता है. इस की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी दवा की 1.25 लीटर मात्रा को 700 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें.

* इस दौरान अगर सरसों में तनासड़न बीमारी हो जाए, तो रोकथाम के लिए बिनोमाइल की आधा किलोग्राम मात्रा या थाइरम की डेढ़ किलोग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करें.

* जनवरी में ज्यादातर तोरिया की फसल तैयार हो जाती हैं. जब इस की करीब 75 फीसदी फलियां सुनहरे रंग की लगने लगें तो फसल की कटाई का काम करें. कटाई के बाद फसल को अच्छी तरह सुखा कर उस की मड़ाई करें.

* नए साल के पहले महीने में गन्ने और नए गुड़ का आलम रहता है. गन्ने की पेड़ी फसल व शरदकालीन बोआई वाले गन्ने की कटाई का काम पूरा करें.

* गन्ने की कटाई के दौरान निकली पत्तियों को जलाएं नहीं. ऐसा करना गैरकानूनी तो है ही, साथ ही मुनासिब भी नहीं?है. इन पत्तियों को जमा कर के कंपोस्ट बनाने में इस्तेमाल करें. इन पत्तियों को पशुओं को बांधे जाने वाली जगह पर बिछाया जा सकता है.

* गन्ने की पत्तियों को आगामी पेड़ी फसल में पलवार के लिए भी इस्तेमाल कर सकते?हैं. ऐसा करने से खेत में काफी समय तक नमी कायम रहती?है. ऐसा करने से खेत में खरपतवार भी ज्यादा नहीं निकलते?हैं.

* प्याज की रोपाई के लिहाज से जनवरी का महीना सब से उम्दा होता?है, लिहाजा यह काम हर हालत में कर डालें. प्याज की रोपाई करने से पहले चुने गए खेत में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश डालना न भूलें. इन चीजों की मात्रा के लिए अपने इलाके के कृषि वैज्ञानिक की राय जरूर लें. प्याज की रोपाई के बाद हलकी सिंचाई जरूर करें.

* भले ही आलू को मोटापे की खास वजह माना जाता?है, मगर जनवरी में नए आलू का जलवा खूब रहता?है. आलू की अगेती फसल जनवरी में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है. खुदाई हाथों से करने की बजाय मशीन से करना बेहतर रहता?है. मशीन के जरीए आलू की खुदाई तेजी से होती?है और आलू बरबाद भी नहीं होते.

* आलू की पछेती व मध्यम फसलों पर भी गौर फरमाएं. इन में अगर झुलसा रोग का असर नजर आए तो रोकथाम के लिए मैंकोजेब दवा का तुरंत इस्तेमाल करें. दवा की मात्रा के बारे में कृषि वैज्ञानिक की राय लें. वैसे दवा बेचने वाला भी इस बारे में सही जानकारी देता है.

* जनवरी के दौरान पाला पड़ने का खतरा काफी बढ़ जाता है. पाले से बचाव के लिए छोटे फलों वाले पौधों व सब्जियों की नर्सरी को टाट वाली बोरियों या घासफूस के छप्परों से सही तरीके से?ढंक दें. पाला गिरने वाली रात को बाग व खेत की सिंचाई जरूर करें, इस से पाले से नुकसान का खतरा घट जाता?है.

* तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी, करेला व भिंडी वगैरह की बोआई के लिए कई बार जुताई कर के खेत तैयार करें. खेत की मिट्टी में गोबर की सउ़ी हुई खाद मिलाना न भूलें.

* संतरा, माल्टा, किन्नू, नीबू व आड़ू के पेड़ों की कटाईछंटाई करें. कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर इन पेड़ों में कैमिकल व गोबर की सड़ी खाद डालें.

* संतरा, माल्टा, किन्नू व नीबू वगैरह पेड़ों को इस बीच गमोसिस रोग का डर रहता है. रोग होने पर इस के असर वाले हिस्सों को पेड़ों से काट कर किसी गड्ढे में डाल कर जला दें. पेड़ों के काटे गए हिस्सों पर अलसी का तेल व रिडोमिल से बना पेस्ट लगाएं. इस पेस्ट को बनाने के लिए 1 लीटर अलसी के तेल में 20 ग्राम रिडोमिल दवा मिलाएं.

* इस महीने आंवले के पेड़ों में अकसर फलविगलन रोग लग जाता?है. ऐसी हालत में बचाव के लिए ब्लाइटाक्स 58 दवा का प्रयोग करें.

* अपने आम के बाग का बारीकी से मुआयना करें, क्योंकि मौसम आने पर उन में कोई कमी नहीं आनी चाहिए. पिछले महीने आम के पेड़ों के तनों पर लगाई गई अल्काथीन शीट की ठीक से सफाई करें.

 * आम के बाग में मिज व भुनगा कीटों की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास 50 ईसी दवा की डेढ़ मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में मिला कर पेड़ों में बौर आने के तुरंत बाद छिड़कें. जरूरी लगे तो 15-20 दिनों बाद दवा का दोबारा छिड़काव करें.

* अंगूर की बेलों की काटछांट का काम इस महीने के आखिर तक हर हालत में निबटा लें. जगह हो तो अंगूर की नई बेलें भी लगाएं.

 नई बेल लगाने के बाद सिंचाई करना जरूरी होता है.

* नए साल के पहले महीने में अंडों की खपत में काफी इजाफा हो जाता?है, मगर मुरगियों पर ठंड का खौफ भी बढ़ जाता है. ऐसे में मुरगियों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करें ताकि वे ठंड व बीमारी से मरने न पाएं.

* गायभैंसें डीलडौल में भले ही भारीभरकम होती हैं, लेकिन कड़ाके की सर्दी के आगे वे भी बेबस हो जाती हैं. उन्हें ठंड से बचाने का मुकम्मल बंदोबस्त करें. बुखार व दस्त जैसी दिक्कतों की दवाएं हर वक्त पास में मौजूद होनी चाहिए.

* अपने इलाके के 2-3 पशुओं के डाक्टरों के फोन नंबर संभाल कर यानी कापी में लिख कर रखें ताकि आड़े वक्त में उन्हें बुलाया जा सके. फोन में फीड नंबरों के भरोसे न रहें, क्योंकि अकसर वे डीलीट हो जाते हैं.

* धुंध यानी कोहरे के इस मौसम में अपनी पशुशाला व मुरगी के दड़बों की हिफाजत चौकस कर दें, क्योंकि फौग की सफेद चादर में चोरों की पौबारह रहती है.

खेत का कचरा है खेत का सोना

हमारे देश में सदियों से किसान फसलों के बचे भागों यानी अवशेषों को कचरा समझ कर या तो खेत में ही जला देते हैं या फिर उन्हें पशुओं को खिलाने के काम में लेते हैं. ज्यादातर देखने में आता है कि खासतौर पर पुआल वगैरह तो खेत में ही जला दिया जाता है, जिस से खेत को काफी नुकसान होता है. ऐसा करने से खेत के लाभदायी सूक्ष्मजीव मर जाते हैं और खेत की मिट्टी इन बचे भागों में पाए जाने वाले महत्त्वपूर्ण पोषकतत्त्वों के बगैर रह जाती है. ऐसे में जरूरत है कचरा समझे जाने वाले फसल के बचे भागों को खेत में सोना समझ कर मिला देने की. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने लगाई अवशेषों को जलाने पर पाबंदी : फसल अवशेषों को जलाने पर न केवल वायु प्रदूषण से पर्यावरण का प्रदूषण बढ़ रहा है, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग भी बढ़ रही है. हाल ही में 4 नवंबर, 2015 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तर भारत के राज्यों दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान के खेतों में फसल अवशेषों को जलाने पर सख्त फैसला लेते हुए किसानों पर 15 हजार रुपए तक जुर्माना लगाने का फैसला किया है.

क्या है एनजीटी का आदेश : 4 नवंबर, 2015 को एनजीटी ने कहा कि जिन राज्यों में पुआल जलाए जाने संबंधी रोक की सूचना जारी नहीं की गई है, वहां उसे फौरन जारी किया जाए. एनजीटी ने पर्यावरण शुल्क के तौर पर सभी प्रकार के छोटे, मंझोले और बड़े किसानों से 15 हजार रुपए तक जुर्माना वसूल करने का फरमान सभी राज्यों को दिया है. इस के साथ ही एनजीटी ने सभी राज्यों को फसल अवशेषों के निस्तारण (डिसपोजल) के लिए किसानों को मशीनें मुहैया कराने का आदेश भी दिया है.

कैसे हो रहा है दुरुपयोग : खासतौर से गेहूंगन्ने की हरी पत्तियां और सागसब्जियों के हरे पत्ते व डंठल पशुओं को खिलाए जाते हैं, जबकि धान के पुआल, गन्ने की सूखी पत्तियों व सनई आदि को खेत में ही जला दिया जाता है. यह समस्या उन खेतों में अधिक होती है, जहां गेहूं की कटाई हारवेस्टर द्वारा की जाती है, हारवेस्टर से कटाई के बाद फसल के अवशेष खड़े रह जाते हैं, जिसे लोग जलाना ज्यादा ठीक समझते हैं. यदि फसलों के अवशेषों को जला कर नष्ट न कर के खेत में ही जुताई के समय मिला दिया जाए, तो ये जीवांश खाद में बदल जाएंगे.

कैसे होगा सही इस्तेमाल : वर्तमान में हमारे देश में इस काम को बेहतर तरीके से करने के लिए रोटावेटर जैसी मशीनें आसानी से इस्तेमाल में लाई जा सकती हैं. यह मशीन पहली बार में ही जुताई के साथ फसल अवशेशों को कतर कर मिट्टी में मिला देती है. जिन इलाकों में नमी की कमी हो, वहां पर फसल अवशेषों का सही इस्तेमाल करने के लिए जरूरी है कि उन से कंपोस्ट तैयार कर के खेत में इस्तेमाल की जाए. उन इलाकों में जहां चारे की कमी नहीं होती, वहां मक्के की करबी व धान के पुआल को खेत में ढेर बना कर खुला छोड़ने के बजाय गड्ढों में कंपोस्ट बना कर इस्तेमाल करना मुनासिब रहता है. आलू व मूंगफली जैसी फसलों की खुदाई के बाद बचे अवशेषों को खेत में जुताई के साथ मिला देना चाहिए. मूंग व उड़द की फसलों से फलियां तोड़ कर बचे भाग खेत में मिला देने चाहिए. इसी प्रकार से केले की फसल के बचे अवशेषों से भी कंपोस्ट तैयार कर लेनी चाहिए.

कचरे में ही भरा है सोना : किसान आमतौर पर फसल के अवशेषों को कचरा समझ कर जला देते हैं, मगर वही कचरा यदि खेतों में मिला दिया जाए तो वह सोने से कम नहीं होता है. इस से खेतों को कई पोषक तत्त्व तो मिलते ही हैं, साथ ही मिट्टी के जीवांश कार्बन की मात्रा में भी इजाफा हो जाता है. इन अवशेषों से मिट्टी की जलधारण की कूवत बढ़ जाती है और सूक्ष्म जीवों की मात्रा में भी इजाफा हो जाता है. इन सब के अलावा मिट्टी में कई भौतिक, जैविक व रासायनिक सुधार होते हैं. कुछ और ध्यान देने वाली बातें : फसल की कटाई के बाद खेत में बचे अवशेषों यानी घासफूस, पत्तियों व ठूंठ आदि को सड़ाने के लिए किसानों को 20-25 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर के रोटावेटर या कल्टीवेटर से जुताई कर के मिट्टी में मिला देनी चाहिए. इस से पड़े हुए अवशेष खेत में विघटित होने लगेंगे और करीब 1 महीने में पूरी तरह विघटित हो कर आगामी बोई जाने वाली फसल को पोषक तत्त्व प्रदान करेंगे. कटाई के बाद डाली गई नाइट्रोजन अवशेषों के सड़ने की गति को तेज कर देती है.

यदि फसल अवशेष खेत में ही पड़े रहे तो फसल बोने पर जब नई फसल के पौधे छोटे रहते हैं, तो वे पीले पड़ जाते हैं, क्योंकि उस समय अवशेषों को सड़ाने में जीवाणु जमीन की नाइट्रोजन का इस्तेमाल कर लेते हैं. नतीजतन शुरुआत में फसल पीली पड़ जाती है. लिहाजा फसल अवशेषों को नाइट्रोजन छिड़क कर मिट्टी में मिलाने में चूक नहीं होनी चाहिए. ऐसा कर के हम अपनी जमीन में जीवांश पदार्थ की मात्रा में तेजी से इजाफा कर के जमीन को खेती लायक बरकरार रख सकते हैं.

कैसे परखें दुधारू पशुओं को

अकसर ही पशुपालक या किसान पशु खरीदने के मामले में ठगी और धोखाधड़ी के शिकार हो जाते हैं. बिचौलियों के चक्कर में फंस कर किसान महंगी कीमत पर दुधारू पशु तो खरीद लेते हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि पशु से उतने दूध का उत्पादन नहीं हो रहा है, जितना बिचौलिए या व्यापारी ने बताया था. तब किसान ठगा महसूस करता?है और आमदनी बढ़ाने के मकसद से खरीदा गया दुधारू पशु उस के लिए सिरदर्द और खर्चीला साबित होता है. इस तरह से दुधारू पशु के जरीए आमदनी बढ़ाने का सपना टूट जाता है. उस समय पशुपालक के पास हाथ मलने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता है. इस से बचने के लिए जरूरी है कि किसान किसी दूसरे पर भरोसा करने के बजाय खुद दुधारू पशुओं को परखने की जानकारी हासिल कर लें.

दुधारू पशु को खरीदते समय किनकिन बातों को देखने, जानने और समझने की जरूरत होती है अगर किसानों को यह सब पता हो, तो वे किसी के झांसे में नहीं फंसेंगे और तब पशु उन के लिए आमदनी बढ़ाने का जरीया साबित होंगे. दुधारू पशुओं को खरीदते समय उस के दूध उत्पादन की कूवत के साथसाथ शारीरिक बनावट, स्तन प्रणाली, उम्र, सेहत, प्रजनन कूवत और वंशावली के बारे में पता करना जरूरी?है. 

शारीरिक बनावट : वेटनरी डाक्टर सुरेंद्र नाथ बताते हैं कि अच्छे दुधारू पशु का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा होता है. उस के नथुने खुले हुए और जबड़े मजबूत होते हैं. उस की आंखें उभरी हुई, पूंछ लंबी और त्वचा चिकनी व पतली होती है. छाती का हिस्सा विकसित और पीठ चौड़ी होती है. दुधारू पशु की जांघ पतली और चौरस होती है और गर्दन पतली होती है. उस के चारों थन एकसमान लंबे, मोटे और बराबर दूरी पर होते हैं.

दूध उत्पादन कूवत : बाजार में दुधारू पशु की कीमत उस के दूध देने की कूवत के हिसाब से ही तय होती है, इसलिए उसे खरीदने से पहले 2-3 दिनों तक उसे खुद दुह कर देख लेना चाहिए. दुहते समय दूध की धार सीधी गिरनी चाहिए और दुहने के बाद थनों को सिकुड़ जाना चाहिए.

आयु : आमतौर पर पशुओं की बच्चा पैदा करने की कूवत 10-12 साल की आयु के बाद खत्म हो जाती है. तीसराचौथा बच्चा होने तक पशुओं के दूध देने की कूवत चरम पर होती है, जो धीरेधीरे घटती जाती है. दूध का कारोबार करने के लिए 2-3 दांत वाले कम आयु के पशु खरीदना काफी फायदेमंद होता है. पशुओं की उम्र का पता उन के दांतों की बनावट और संख्या को देख कर चल जाता है. 2 साल की उम्र के पशु में ऊपरनीचे मिला कर सामने के 8 स्थायी और 8 अस्थायी दांत होते हैं. 5 साल की उम्र में ऊपर और नीचे मिला कर 16 स्थायी और 16 अस्थायी दांत होते हैं. 6 साल से ऊपर की आयु वाले पशु में 32 स्थायी और 20 अस्थायी दांत होते हैं.

वंशावली : पशुओं की वंशावली का पता लगने से उन की नस्ल और दूध उत्पादन कूवत की सही परख हो सकती है. हमारे देश में पशुओं की वंशावली का रिकार्ड रखने का चलन नहीं?है, पर बढि़या डेरी फार्म से पशु खरीदने पर उस की वंशावली का पता चल सकता है.

प्रजनन कूवत : सही दुधारू गाय या भैंस वही होती?है, जो हर साल 1 बच्चा देती?है. इसलिए पशु खरीदते समय उस का प्रजनन रिकार्ड जान लेना जरूरी है. प्रजनन रिकार्ड ठीक नहीं होने, बीमार और कमजोर होने से पाल नहीं खाने, गर्भपात होने, स्वस्थ बच्चा नहीं जनने, प्रसव में दिक्कतें होने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं.

बीजमसालों की उन्नत व रोगरोधी किस्में

भारत का दुनिया भर में मसाला उत्पादन व मसाला निर्यात में पहला स्थान है. इसलिए भारत को मसालों का घर भी कहा जाता है. इन मसालों में बीजमसालों का अनोखा स्थान है. हमारे देश में धनिया, जीरा, सौंफ, मेथी व अजवायन वगैरह बीजमसाले काफी मात्रा में उगाए जाते हैं. किसान भाई इन मसालों की अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत व रोगरोधी किस्मों की खेती कर के अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं. खास बीजमसालों की खास किस्मों के बारे में यहां बताया जा रहा है.

धनिया की उन्नत व रोगरोधी किस्में

आरसीआर 41 : यह किस्म सिंचित खेती के लिए राजस्थान के सभी इलाकों के लिए उपयोगी पाई गई है. यह किस्म राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय द्वारा साल 1988 में विकसित की गई थी. इस के दाने सुडौल, गोल व छोटे होते हैं. यह किस्म तनासूजन व उकटा रोगों के प्रति रोधी है. यह किस्म 130 से 140 दिनों में तैयार हो जाती है. इस की औसत उपज 9.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस के दानों में 0.25 फीसदी वाष्पशील तेल होता है.

आरसीआर 20 : यह किस्म सिंचित व असिंचित दोनों इलाकों के लिए मुफीद है. यह कम नमी वाली भारी मिट्टी वाले राजस्थान के दक्षिणी इलाके के साथसाथ टोंक, बूंदी, कोटा, बारां व झालावाड़ के लिए मुनासिब है. 110 से 125 दिनों में पकने वाली इस किस्म से असिंचित इलाकों में 4 से 7 क्विंटल और सिंचित इलाकों में 10 से 12 क्विंटल पैदावार प्रति हेक्टेयर होती है.

आरसीआर 435 : यह किस्म साल 1995 में विकसित की गई. इस के पौधे झाड़ीनुमा व जल्दी पकने वाले होते हैं. इस के बीज मध्यम आकार के होते हैं. इस के 1000 दानों का वजन 14 ग्राम होता है. 110 से 130 दिनों में पक कर तैयार होने वाली इस किस्म की औसत उपज 10.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. यह सूत्रकृमि व छाछिया की प्रतिरोधी है.

आरसीआर 436 : यह किस्म साल 1995 में कम नमी वाले इलाकों कोटा, बारां, झालावाड़ व बूंदी के लिए विकसित की गई थी. इस के पौधे 50 से 100 दिनों में पक जाते हैं. पौधे झाड़ीनुमा व दाने सुडौल होते हैं. इस की उपज 11.9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस के 1000 दानों का वजन 16 ग्राम होता है.

आरसीआर 446 : यह किस्म साल 1997 में जयपुर के सिंचित इलाकों के लिए विकसित की गई थी. इस के पौधे अधिक पत्तियों वाले और सीधे खड़े गुच्छों में घने मध्यम आकार के बीजों वाले होते हैं. यह किस्म 110 से 130 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की औसत उपज 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस के 1000 दानों का वजन 13.5 ग्राम होता है.

आरसीआर 480 : यह किस्म साल 2006 में विकसित की गई थी. यह 130 से 135 दिनों में पक कर 13.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. यह सिंचित इलाकों के लिए मुफीद होती है. इस के बीजों में 0.44 फीसदी तेल होता है.

आरसीआर 684 : इस का पौधा मध्यम ऊंचाई वाला होता है. मुख्य तना मजबूत व मोटा होता है. तने का रंग सफेद होता है और दाने मध्यम आकार के गोल होते हैं. यह तनासूजन के प्रति रोगरोधी है. यह किस्म 130 दिनों में पक कर 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है.

आरसीआर 728 : यह किस्म साल 2009 में विकसित की गई. इस के पौधे लंबे व घनी पत्तियों वाले होते हैं. यह किस्म 130 से 140 दिनों में पक कर 13.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. इस के बीजों में 0.34 फीसदी तेल होता है.

हिसार आनंद : यह बीज व पत्ते वाली किस्म अधिक उपज देने वाली भी होती है. यह हिसार इलाके के लिए मुफीद है.

स्वाथी (सीएस 6) : यह किस्म बारानी, पछेती बोआई और आंध्र प्रदेश के गुंटूर इलाके के लिए मुफीद है. इस में फलमक्खी के प्रतिरोधी गुण हैं. इस की उपज 855 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. यह 90 से 105 दिनों में पकती है. इस के दानों में 0.3 फीसदी वाष्पशील तेल होता है.

सिंधु (सीएस 2) : यह किस्म क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र लाम, गुंटूर से विकसित की गई है. यह किस्म अंतर सस्य और बारानी इलाकों के लिए मुफीद है. यह उकटा, छाछिया व तेले के लिए रोधी है. यह किस्म 10 क्टिंवल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. यह 102 दिनों में पकती है. इस के दानों में 0.4 फीसदी वाष्पशील तेल होता?है.

गुजरात धनिया 1 : यह किस्म गुजरात कृषि विश्वविद्यालय के मसाला अनुसंधान केंद्र जगुदान से विकसित की गई है. यह गुजरात राज्य के लिए मुफीद है. यह 112 दिनों में पकती है और इस की औसत उपज 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. यह किस्म उकटा व छाछिया रोग के प्रति काफी सहनशील है.

गुजरात धनिया 2 : यह किस्म भी जगुदान से विकसित की गई है, जो असिंचित इलाकों में शीघ्र बोआई के लिए सही है. यह किस्म 110 से 115 दिनों में पक कर तैयार होती है. इस की पैदावार 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. इस का दाना बड़ा होता है.

एसीआर 1 : यह किस्म राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र अजमेर द्वारा विकसित की गई थी. यह लंबे अरसे वाली किस्म है, जिसे बीज व पत्तियों दोनों के लिए सिंचित इलाकों में उगाया जाता है. इस के बीज गोलाकार होते हैं, जो निर्यात के लिए मुफीद होते हैं. इस की उपज 12 से 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. इस में वाष्पशील तेल 0.5 से 0.6 फीसदी तक होता है. यह तनासूजन व छाछिया रोग की प्रतिरोधी है.

को 1 : यह पत्तियों व बीजों दोनों के लिए मुनासिब किस्म है. यह साल 1987 में कयंबटूर कृषि विद्यालय से विकसित की गई थी. यह किस्म 110 दिनों में पक कर 5 से 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. यह किस्म ग्रीन मोल्ड बीमारी के प्रति प्रतिरोधी होती है.

को 2 : यह किस्म 90 से 100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की औसत पैदावार 6 से 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह रबी व खरीफ दोनों मौसमों के लिए मुफीद है. यह सूखा प्रतिरोधी किस्म मानी जाती है. इस के दानों में 0.3 फीसदी वाष्पशील तेल की मात्रा होती है.

को 3 : यह धनिया की अगेती किस्म है, जो तमिलनाडु के लिए मुफीद है. यह दानों व पत्तियों दोनों के लिए उगाई जाती है. यह 78 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की उपज 6 से 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. इस के दानों में 0.4 फीसदी वाष्पशील तेल की मात्रा होती है. यह उकटा व ग्रेनमोल्ड के प्रति सहनशील होती है.

जीरे की उन्नत व रोगरोधी किस्में

आरजेड 19 : यह किस्म साल 1988 में विकसित की गई थी. इस के पौधे सीधे खड़े होते हैं. इस के फूल गुलाबी और बीज गहरे भूरे रंग के होते हैं. यह किस्म स्थानीय किस्म की तुलना में उकटा व झुलसा के प्रति रोगरोधक होती है. यह किस्म 120 से 125 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की औसत उपज 5 से 6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. यह पूरे राजस्थान के लिए मुफीद होती है.

आरजेड 209 : यह किस्म साल 1995 में राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई थी. इस के बीज सुडौल व गहरे भूरे रंग के होते हैं. यह उकटा व झुलसा रोगों की प्रतिरोधी होती है. इस में छाछिया रोग के प्रति प्रतिरोधकता आरजेड 19 से ज्यादा है. यह किस्म 120 से 135 दिनों में पक कर 6 से 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. यह राजस्थान के लिए मुफीद है.

आरजेड 223 : यह किस्म राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई थी. यह किस्म उकटा रोग प्रतिरोधी है. यह 120 से 130 दिनों में पकती है और लगभग 6 से 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. इस में वाष्पशील तेल की मात्रा 3.23 फीसदी तक होती है. यह किस्म राजस्थान के लिए मुफीद है.

आरजेड 341 : यह किस्म साल 2006 में एसकेआरएयू द्वारा विकसित की गई थी. इस के बीजों में वाष्पशील तेल की मात्रा 3.87 फीसदी होती है. इस की उपज 4 से 5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

आरजेड 345 : यह किस्म साल 2009 में एसकेआरएयू द्वारा विकसित की गई थी. यह उकटा, झुलसा व छाछिया रोगों के प्रति प्रतिरोधी है. यह 120 से 130 दिनों में पक कर 6 से 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है.

जीसी 1 : गुजरात के मसाला अनुसंधान केंद्र जगुदान से विकसित इस किस्म के पौधे सीधे होते हैं. इस में गुलाबी रंग के फूल व भूरे रंग के बीज होते हैं. यह किस्म बड़े बीज व अधिक उत्पादन देने वाली होती है. यह 105 से 110 दिनों में पक कर तैयार होती है. इस में उकटा रोग सहने की हलकी कूवत होती है. इस का उत्पादन 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है.

जीसी 2 : यह किस्म भी गुजरात के जगुदान से विकसित की गई है. यह 100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की औसत उपज 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. पौधे झाड़ीनुमा व ज्यादा शाखाओं वाले होते हैं.

जीसी 3 : यह किस्म भी गुजरात के जगुदान से विकसित की गई है. यह उकटा रोग प्रतिरोधी होती है. यह 100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस का उत्पादन 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस में आवश्यक तेल की मात्रा 3.5 फीसदी होती है.

जीसी 4 : यह किस्म भी गुजरात के जगुदान से विकसित की गई है. इस में उकटा रोग सहने की ज्यादा कूवत है. यह 130 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की उपज 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह राजस्थान व गुजरात में ज्यादा बोई जाती है.

सौंफ की उन्नत व रोगरोधी किस्में

आरएफ 101 : सौंफ की यह किस्म साल 1995 में राजस्थान के टोंक की स्थानीय सौंफ से चयन कर के विकसित की गई है. यह किस्म 150 से 160 दिनों में पक कर तैयार होती है और 15 से 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है.

आरएफ 125 : यह किस्म इटली के ईसी 243380 से चयन कर के राजस्थान से विकसित की गई है. यह साल 1997 में विकसित की गई थी. इस के पौधे बौने व जल्दी पकने वाले छोटे घने गुच्छों वाले होते हैं. इस में वोलेटाइल आयल 1.9 फीसदी तक होता है. यह किस्म 110 से 130 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है इस की औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. यह किस्म राजस्थान के लिए मुफीद है.

आरएफ 143 : यह किस्म साल 2004 में विकसित की गई थी. इस के पौधे लंबे व सीधे होते हैं. इस के बीज मध्यम आकार के होते हैं और पौधों की लंबाई 116 से 118 सेंटीमीटर होती है.  इस की औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह 140 से 150 दिनों में पकती है. इस में वोलेटाइल आयल 1.87 फीसदी होता है.

आरएफ 205 : यह किस्म राजस्थान में साल 2009 में विकसित की गई थी. यह किस्म 130 से 140 दिनों में पक कर 16 क्विंटल और उपज देती है. इस में वोलेटाइल आयल 2.48 फीसदी तक होता है. पौधे सीधे व मध्यम ऊंचाई के होते हैं और दाने सुडौल होते हैं.

गुजरात फेनल 1 : यह किस्म गुजरात के बीजापुर स्थानीय से चयन कर के साल 1985 में विकसित की गई थी. इस के पौधे लंबे व झाड़ीनुमा होते हैं इस के बीज हरे होते हैं. यह गूंदिया रोग व पत्ती धब्बा रोग से मध्यम रोधी है. यह 225 दिनों में पकती है. इस की औसत उपज 17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. यह अगेती बोआई के लिए मुनासिब है. यह सूखा सहने की कूवत रखती है.

जी एफ 11 : रबी की सिंचित खेती के लिए मुनासिब यह अच्छी उपज वाली किस्म मसाला अनुसंधान केंद्र जगुदान गुजरात से साल 2003 में विकसित की गई. इस में वाष्पशील तेल की मात्रा 1.8 फीसदी होती है. यह 150 से 160 दिनों में पक कर 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर औसत उपज देती है.

एएफ 1 : यह किस्म राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र अजमेर से साल 2005 में विकसित की गई. इस का पौधा बड़ा और शाखाओं वाला होता है. इस में बड़े आकार के पुष्पछत्रक होते हैं. यह किस्म सीधी बोआई द्वारा 19 क्विंटल और पौध रोपण विधि द्वारा 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है. यह 185 दिनों में पकने वाली मोटे दानों की किस्म है.

मेथी की उन्नत व रोगरोधी किस्में

आरएमटी 1 : यह किस्म राजस्थान के लिए साल 1989 में विकसित की गई थी. इस के पौधे लंबे व शाखायुक्त होते हैं. इस के बीज सुडौल व चमकीले होते हैं. यह किस्म 140 से 150 दिनों में तैयार हो कर लगभग 14 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. यह जड़गलन की मध्यम रोधी किस्म है और इस में छाछिया रोग भी कम लगता है. इस किस्म का विकास नागौर जिले के स्थानीय बीज से चुनाव कर के किया गया है.

आरएमटी 143 : इस किस्म का विकास जोधपुर जिले के स्थानीय बीज का चुनाव कर के साल 1997 में किया गया. यह किस्म 140 से 150 दिनों में पक कर लगभग 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. यह किस्म चित्तौड़, भीलवाड़ा, झालावाड़ व जोधपुर के लिए मुफीद है.

आरएमटी 303 : यह किस्म साल 1999 में म्यूटेशन ब्रीडिंग से विकसित की गई थी. यह छाछिया रोग के प्रति मध्यम रोधी होती है. इस के बीज पीले रंग के होते हैं. यह 140 से 150 दिनों में पकती है. इस की औसत उपज 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

आरएमटी 351 : यह किस्म साल 2006 में गामा किरणों द्वारा विकसित की गई थी. इस के पौधों की ऊंचाई मध्यम होती है और शाखाएं ज्यादा होती हैं. इस की फलियों में बीजों की संख्या अधिक होती है. यह 140-150 दिनों में पक कर औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर देती है.

एफजी 1 : मध्यम ऊंचाई व चौड़ी पत्तियों वाली यह किस्म अजमेर में विकसित की गई है. यह किस्म 137 से 140 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस किस्म को विशेष रूप से पत्तियों के लिए उगाया जाता है, जिस की औसत उपज 75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई गई है. इस में 3 बार पत्तियों की कटाई की जाती है. इस के दाने बड़े मोटे और कम कड़वे होते हैं. इस की बीज की उपज 20 से 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती?है.

एफजी 2 : मध्यम ऊंचाई वाली यह किस्म भी अजमेर में विकसित की गई है. इस के बीज छोटे आकार के होते हैं. यह किस्म 138 दिनों में पकती है. इस के बीजों की उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. यह किस्म भी पत्तियों के लिए खासहै. इस की 3 बार कटाई में 72 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी पत्तियां हासिल होती हैं.

अजवायन की उन्नत व रोगरोधी किस्में

अजमेर अजवायन 1 : यह किस्म प्रतापगढ़ की स्थानीय किस्म से चयन कर के अजमेर में विकसित की गई है. यह किस्म बारानी व सिंचाई दोनों हालात में मुफीद है. यह 165 दिनों में पकती?है. इस की उपज 14.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सिंचित इलाकों में और 5.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर असिंचित इलाकों में होती है. बीज में आवश्यक तेल की मात्रा 3.4 फीसदी होती है.

अजमेर अजवायन 2 : यह किस्म भी अजमेर में विकसित की गई है. यह छाछिया रोग के प्रति रोगरोधी है. यह 147 दिनों में पकती है. इस की उपज 12.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सिंचित इलाकों में और 5.2 क्विंटल असिंचित इलाकों में है. बीज में आवश्यक तेल 3 फीसदी होता है. 

बतखपालन : जोखिम कम मुनाफा ज्यादा

बतखपालन का काम बेरोजगार युवाओं के लिए आय का अच्छा साधन साबित हो सकता है. मुरगीपालन के मुकाबले बतखपालन कम जोखिम वाला होता है. बतख के मांस और अंडों के रोग प्रतिरोधी होने के कारण मुरगी के मुकाबले बतख की मांग अधिक है. बतख का मांस और अंडे प्रोटीन से भरपूर होते हैं. बतखों में मुरगी के मुकाबले मृत्युदर बेहद कम है. इस का कारण बतखों का रोगरोधी होना भी है. अगर बतखपालन का काम बड़े पैमाने पर किया जाए तो यह बेहद लाभदायी साबित हो सकता है.

कैसे करें शुरुआत

बतखपालन शुरू करने के लिए शांत जगह बेहतर होती है. अगर यह जगह किसी तालाब के पास हो तो बहुत अच्छा होता है, क्योंकि बतखों को तालाब में तैरने के लिए जगह मिल जाती है. अगर बतखपालन की जगह पर तालाब नहीं है, तो जरूरत के मुताबिक तालाब की खुदाई करा लेना जरूरी होता है. तालाब में बतखों के साथ मछलीपालन भी किया जा सकता है. अगर तालाब की खुदाई नहीं करवाना चाहते हैं तो टीनशेड के चारों तरफ  2-3 फुट गहरी व चौड़ी नाली बनवा लेनी चाहिए, जिस में तैर कर बतखें अपना विकास कर सकती हैं. बतखपालन के लिए प्रति बतख डेढ़ वर्ग फुट जमीन की आवश्यकता पड़ती है. इस तरह 5 हजार बतखों के फार्म को शुरू करने के लिए 3750 वर्ग फुट के 2 टीनशेडों की आवश्यकता पड़ती है. इतनी ही बतखों के लिए करीब 13 हजार वर्ग फुट का तालाब होना जरूरी होता है.

प्रजाति का चयन

बतखपालन के लिए सब से अच्छी प्रजाति खाकी कैंपवेल है, जो खाकी रंग की होती है. ये बतखें पहले साल में 300 अंडे देती हैं. 2-3 सालों में भी इन की अंडा देने की कूवत अच्छी होती है. तीसरे साल के बाद इन बतखों का इस्तेमाल मांस के लिए किया जाता है. इन बतखों की खासीयत यह है कि ये बहुत शोर मचाने वाली होती हैं. शेड में किसी जंगली जानवर या चोर के घुसने पर शोर मचा कर ये मालिक का ध्यान अपनी तरफ  खींच लेती हैं. इस प्रजाति की बतखों के अंडों का वजन 65 से 70 ग्राम तक होता है, जो मुरगी के अंडों के वजन से 15-20 ग्राम ज्यादा है. बतखों केअंडे देने का समय तय होता है. ये सुबह 9 बजे तक अंडे दे देती हैं, जिस से इन्हें बेफिक्र हो कर दाना चुगने के लिए छोड़ा जा सकता है. खाकी कैंपवेल बतख की उम्र 3-4 साल तक की होती है, जो 90-120 दिनों के बाद रोजाना 1 अंडा देती है.

बतखों का आहार

बतखों के लिए प्रोटीन वाले दाने की जरूरत पड़ती है. चूजों को 22 फीसदी तक पाच्य प्रोटीन देना जरूरी होता है. जब बतखें अंडे देने की हालत में पहुंच जाएं, तो उन का प्रोटीन घटा कर 18-20 फीसदी कर देना चाहिए. बतखों के आहार पर मुरगियों के मुकाबले 1-2 फीसदी तक कम खर्च होता है. उन्हें नालोंपोखरों में ले जा कर चराया जाता है, जिस से कुदरती रूप से वे घोंघे जैसे जलीय जंतुओं को खा कर अपनी खुराक पूरी करती हैं. बतखों से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए उन्हें अलग से आहार देना जरूरी होता है. वे रेशेदार आहार भी आसानी से पचा सकती हैं. बतखों को 20 फीसदी अनाज वाले दाने, 40 फीसदी प्रोटीन युक्त दाने (जैसे सोयाकेक या सरसों की खली), 15 फीसदी चावल का कना, 10 फीसदी मछली का चूरा, 1 फीसदी, नमक व 1 फीसदी खनिजलवण के साथ 13 फीसदी चोकर दिया जाना मुनासिब होता है. हर बतख के फीडर में 100-150 ग्राम दाना डाल देना चाहिए.

इलाज व देखभाल

बतखों में रोग का असर मुरगियों के मुकाबले बहुत ही कम होता है. इन में महज डक फ्लू का प्रकोप ही देखा गया है, जिस से इन को बुखार हो जाता है और ये मरने लगती हैं. बचाव के लिए जब चूजे 1 महीने के हो जाएं, तो डक फ्लू वैक्सीन लगवाना जरूरी होता है. इस के अलावा इन के शेड की नियमित सफाई करते रहना चाहिए और 2-2 महीने के अंतराल पर शेड में कीटनाशक दवाआें का छिड़काव करते रहना चाहिए.

बतख के साथ मछलीपालन

जिस तालाब में बतखों को तैरने के लिए छोड़ा जाता है, उस में अगर मछली का पालन किया जाए तो एकसाथ दोगुना लाभ लिया जा सकता है. दरअसल बतखों की वजह से तालाब की उर्वरा शक्ति में इजाफा हो जाता है. जब बतखें तालाब के पानी में तैरती हैं, तो उन की बीट से मछलियों को प्रोटीनयुक्त आहार की आपूर्ति सीधे तौर पर हो जाती है, जिस से मछलीपालक मछलियों के आहार के खर्च में 60 फीसदी की कमी ला सकते हैं.

लागत व लाभ

कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया (बस्ती) के वरिष्ठ पशु वैज्ञानिक डा. लाल के अनुसार बतखपालन के लिए प्रति चूजा 35 रुपए का खर्च आता है. इस तरह 5 हजार चूजों की लागत 1 लाख 75 हजार रुपए आती है. टीन शेड बनवाने पर करीब 3 लाख रुपए व तालाब पर 50 हजार रुपए की लागत आती है, जो सिर्फ  1 बार ही लगती है. इस तरह 5 हजार बतखों का फार्म शुरू करने में करीब 6 लाख रुपए की जरूरत पड़ती है. 1 साल में 1 बतख के दाने व रखरखाव पर करीब 1 हजार रुपए का खर्च आता है. इस तरह 1 साल में 5 हजार चूजों पर करीब 50 लाख रुपए की लागत आती है. कुल लागत 56 लाख को निकाल कर अगर पहले साल में देखा जाए तो 5 हजार बतखों पर शुद्ध आय 15 लाख अंडों से (5 रुपए प्रति अंडा की दर से कुल 75 लाख में से घटा कर) 19 लाख रुपए होगी. दूसरे साल से तालाब व शेड पर कोई लागत नहीं आती है. इस तरह बतखपालन से काफी लाभ कमाया जा सकता है. पशु विज्ञानी डा. लाल के अनुसार बतख के अंडों के अलावा तीसरे साल लगभग डेढ़ सौ रुपए के हिसाब से बतख को मांस के लिए बेचा जा सकता है, जिस से करीब 7 लाख 50 हजार रुपए की आमदनी होगी. तीसरे साल नए चूजे खरीद कर उन से अंडे का उत्पादन लिया जा सकता है. बतख के अंडों को बेचने में किसी तरह की परेशानी नहीं होती है. इन्हें दवाएं बनाने के लिए भी खरीदा जाता है.

डा. लाल के अनुसार बतख न केवल लाभ देती है, बल्कि यह सफाई बनाए रखने में भी योगदान देती है. मात्र 5-6 बतखें ही 1 हेक्टेयर तालाब या आबादी के आसपास के मच्छरों के लारवों को खा जाती हैं. इस तरह बतखें न केवल लाभदायी होती हैं, बल्कि ये इनसानों की सेहत के लिए भी कारगर होती हैं. बतखपालन की ज्यादा जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया के पशु विज्ञानी डा.  लाल के मोबाइल नंबर 9415853028 पर संपर्क किया जा सकता है. चूजों को हासिल करने के लिए बेंगलूरू के हैसर घट्टा में स्थित ‘सेंट्रल डक ब्रीफिंग फार्म’, बरेली के इज्जत नगर में स्थित ‘केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान’ या भुवनेश्वर के ‘केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान’ से संपर्क किया जा सकता है.

अनपढ़ वनवासियों ने ईजाद की अपनी नहर

उन आदिवासियों पर लोग हंसते और कहते थे कि पथरीली जमीन पर क्यों पसीना बहा रहे हो? लेकिन वे इतने जिद्दी थे कि उन का हौसला नहीं डिगा. मजबूत इरादों और जीतोड़ मेहनत से उन्होंने ऐसा कारनाम किया, जो दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गया. यहां बात हो रही है राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के सरूपगंज पहाड़ी इलाके की. देश में एक ओर जहां नदियों व नहरों को जोड़ने के लिए इंजीनियरिंग और तकनीकी पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बेतहाशा बहाए जा रहे हैं, वहीं सरूपगंज के भाखर गांव के पहाड़ी व आदिवासी इलाके में आदिवासियों का तकनीकी जुगाड़ इंजीनियरिंग विज्ञान को चुनौती दे रहा है. जुगाड़ तकनीक की लाजवाब मिसाल पेश करते हुए यहां के आदिवासी लोगों ने ऐसी नहर तैयार की है, जिस के जरीए इस इलाके से गुजरने वाली नदी के पानी को ये पहाड़ों के बीच बने अपने ऊंचाई वाले खेतों तक ले जाते हैं. लोकल बोलचाल में इस नहर को ‘सारण’ कहा जाता?है.

तकनीकी देशी जुगाड़

ये माहिर आदिवासी नदी में बहते पानी के बराबर एक नहर की खुदाई कर के पत्थरों व लकडि़यों से पानी को रोक कर उस की दिशा बदल देते हैं. नहर बनाते समय उस के घुमाव व सरफेस लेवल का पूरा ध्यान रखा जाता है, ताकि नदी से जब पानी का रुख नहर की ओर मोड़ा जाए तो उस का दबाव इस तरह बना रहे कि वह ऊपर तक चढ़ सके.

खजूर से बनाते हैं नेट

इस इलाके में काफी मात्रा में पाए जाने वाले खजूर के पेड़ों की टहनियों का नेट बना कर उस को रस्सी के सहारे बांध कर उस में वजनदार पत्थर रखा जाता है. इस नेट को नहर में खींचते हैं, जिस से यदि कहीं कोई रुकावट या काई का जाल हो तो नेट में फंस जाए और उसे बाहर निकाल लिया जाए. नहर बनाने में चूने या सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया जाता, पत्थरों को ही अच्छे तरीके से इंटरलाक किया जाता है और साथ ही जंगली पत्तों की पाल बनाई जाती है, ताकि पानी का रिसाव न हो. सालों से चली आ रही तकनीक इलाके में पिछले रबी सीजन में ओले गिरने पर फसल बरबाद होने से किसान परेशान तो हैं, लेकिन बुलंद हौसले के साथ बनाई गई सारण यानी नहर के पानी से खेत सींचे जा रहे हैं, जल्द ही खेतों में गेहूं, चना, सौंफ व अरंडी वगैरह की फसलें लहलहाने लगेंगी. इलाके के सरपंच कन्हैयालाल ने बताया कि इस पहाड़ी इलाके में आदिवासियों की भरपूर मेहनत से बनी नहर के पानी से इलाके के किसान बारीबारी से जरूरत के अनुसार अपने खेतों की सिंचाई करते हैं. इस साल भी इलाके में तकरीबन 2 हजार हेक्टेयर एरिया इसी नहर से सींचा जाएगा.

खतरे में नागौरी नस्ल के बैल

नागौर के वीर तेजाजी परबतसर पशु मेले से बैलों की जोडि़यां खरीद कर लाए व बैल दौड़ प्रतियोगिता में अव्वल रहने पर परबतसर के उपखंड अधिकारी के हाथों सम्मान पाने वाले किसानों को नहीं पता था कि ट्रकों में बैलों को लाद कर अपने गांव लाने पर जयपुर जिले के चाकसू थाना इलाके में उन का अपमान भी किया जाएगा. चाकसू थाना पुलिस ने कई गौरक्षक संगठनों के दबाव में आ कर करौली जिले के उन लोगों को गौ तस्कर मान कर गिरफ्तार कर लिया. पशुपालक मोहनलाल, मुंशी, चिरंजीलाल, भरतलाल, मुन्ना, प्रकाश, महेश व खेमराज आदि ने बताया कि वे नागौर के परबतसर पशु मेले से 45 जोड़ी बैल खरीद कर रामदेवरा पदयात्रा के चलते पैदल चलने के बजाय किराए के ट्रक व पिकअप में बैलों को लाद कर अपने गांव सपोटरा, करौली ले जा रहे थे. जब वे चाकसू के पास पहुंचे तो अचानक 3 लग्जरी गाडि़यां आ कर रुकीं और उन में से करीबन 20 व्यक्ति उतरे व 2 लाख रुपए  की रसीद कटवाने की मांग की और कहने लगे कि रसीद कटवाने के बाद ही इलाके से जाने देंगे वरना जिंदा नहीं छोड़ेंगे. उन में से कुछ लोग एक गौरक्षक संगठन का नाम भी पुकार रहे थे. रसीद नहीं कटवाने पर उन में से कुछ लोगों ने उन्हें मारनापीटना शुरू कर दिया व 73 हजार रुपए छीन कर ले गए. जब मामले की जानकारी पुलिस थाने में देने गए तो वहां भी पुलिस के सामने ही कमला दीदी नामक गौरक्षक संगठन चलाने वाली महिला जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन से मारपीट करने लगी.

खूबसूरत कदकाठी, फुरतीलेपन और गजब की ताकत को देखते हुए उन्नत नस्ल के नागौरी बैलों का कोई सानी नहीं है. लेकिन पिछले कुछ सालों से इन बैलों की पहचान व शान सिमटती जा रही है. मेलों से खरीद कर इन्हें एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाने पर कई भगवाई गौरक्षक संगठनों के बवाल की वजह से धीरेधीरे इन बैलों की शान ही फीकी पड़ गई है. रोक की वकालत करने वाले संगठनों का तर्क है कि छोटे बछड़ों को मेलों से खरीद कर खेतीबाड़ी या पशुपालन के लिए नहीं, बल्कि बूचड़खानों में हलाल करने के लिए ले जाया जाता है. इस के चलते नागौर क्षेत्र के अलावा प्रदेश के दूसरे हिस्सों व प्रदेश से बाहर के व्यापारियों का यहां के पशु मेलों में आना कम हो गया है. बैलों की खरीदबिक्री के पेशे से जुड़े व्यापारियों का पक्ष रखते हुए मध्य प्रदेश के व्यापारी अर्जुनलाल बताते हैं कि हालांकि यह सच है कि कुछ लोग बैलों को बूचड़खानों के लिए खरीदते थे, लेकिन इस का खमियाजा हम बाकी व्यापारियों को भुगतना पड़ रहा है. दरअसल सोयाबीन, गन्ना, धान और कपास के खेत तैयार करने के लिए नागौरी बैल सब से अच्छे माने जाते हैं. मध्य प्रदेश के किसान नागौरी बैल को खासतौर पर पसंद करते हैं, क्योंकि वहां की चिकनी मिट्टी में ट्रैक्टर से बोआईजुताई करना आसान नहीं है. इस के अलावा कई जगहों पर 2 फसलों की खेती एकसाथ होती है. इस में बैलों से ही बोआई करना मुनासिब होता है, क्योंकि इस से दूसरी खड़ी फसल को नुकसान नहीं होता. मध्य प्रदेश के किसान तो इसे अपनी शान का प्रतीक तक समझते हैं.

इस बार नागौर के परबतसर पशु मेले से करीब सवा सौ बैल खरीदने वाले मध्य प्रदेश के पशुव्यापारी नंदराम जाखड़ बताते हैं, ‘नागौरी बैल तो बस नाम से ही बिक जाते हैं. दुनिया में इन से अच्छी नस्ल के बैल कहीं नहीं मिल सकते. कई बड़े लोग तो शान के लिए अपने फार्महाउस में 8-10 बैलों के जोड़े रखते हैं. बस, उन को पसंद आने चाहिए. कीमत चाहे जो भी हो.’ 5 हजार से 40 हजार रुपए तक के बैल खरीद चुके नंदलाल अब निराश हैं. वे बताते हैं, ‘पहले एक बार में मेले से 5 सौ से ज्यादा बैल खरीदते थे. अब 100 बैल खरीद पाना भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि 3 साल से बड़े बैल भी काफी महंगे आ रहे हैं और उन को गाडि़यों में ले जाना भी महंगा पड़ रहा है.’ गौरतलब है कि पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश के व्यापारी यहां नागौरी बैल खरीदने आते हैं. तकरीबन 1 दशक पहले नागौर के परबतसर में लगने वाले वीर तेजाजी पशु मेले में 1 लाख से सवा लाख तक की तादाद में नागौरी  बैल बिकने के लिए आते थे. अब यह तादाद 20 हजार के करीब ही रह गई है. प्रदेश के पशुपालन विभाग के निदेशक भागीरथ चौधरी बताते हैं, ‘अब पहले के मुकाबले एक चौथाई से भी कम बैल आ रहे हैं. इन में भी 3 साल से कम उम्र के बैलों की सही कीमत नहीं मिल पा रही है. गौरक्षक संगठनों द्वारा आए दिन किए जाने वाले बवालों की वजह से प्रदेश के बाहर के व्यापारियों ने इन बैलों से मुंह मोड़ लिया है.’

पौंजी स्कीमों का फलताफूलता कारोबार

आज हर ओर फर्जीवाड़े का मकड़जाल फैला हुआ है. फर्जी कंपनियों द्वारा चलाई गई बेशुमार पौंजी स्कीमों व धन जमा योजनाओं के जरिए हजारों करोड़ रुपयों की हेराफेरी किए जाने के कांड आम हो चले हैं. लाखों की संख्या में निवेशक इन की गिरफ्त में फंस कर अपनी गाढ़ी कमाई की रकम गंवा बैठे हैं. बावजूद इस के, पौंजी स्कीमों का कारोबार फलताफूलता जा रहा है. पौंजी स्कीम का नामकरण चार्ल्स पौंजी नामक व्यक्ति के नाम पर पड़ा. वह इटैलियन था, जिस ने वर्ष 1920 में अमेरिका में तहलका मचा दिया था. उस ने लोगों को पोस्टल कूपन के नाम पर धोखा दिया था. कथित तौर पर चार्ल्स डिकेंस की 1844 में प्रकाशित ‘मार्टिन चजिलविट’ व 1857 में प्रकाशित ‘लिटिल डोरिट’ जैसे उपन्यासों में वर्णित स्कीमों से उत्प्रेरित हो कर उस ने उन स्कीमों को हकीकत में अंजाम दे डाला. अंतर्राष्ट्रीय डाक कूपनों की योजना चलाई. जम कर पैसा बटोरा. थोड़ाबहुत तो शुरुआती निवेशकों को बांट दिया और जो बचा, सब खुद ले उड़ा.

पौंजी स्कीम से तात्पर्य है आमतौर पर निवेश से अधिक रिटर्न की पेशकश के जरिए नए निवेशकों को लुभाने की कवायदों से उन के ख्वाबों का तानाबाना बुनना या यों कहें कि बेईमानी भरी  योजनाओं में बहुत ऊंचे लाभ का लालच देते हुए लोगों से पैसा जमा कराना. शुरू में तो वैध काम शुरू होता है, क्योंकि प्रारंभिक स्थिति ऊंचे रिटर्न को बनाए रखने के लिए नए निवेशकों से पैसों के बढ़ते प्रवाह की आवश्यकता रहती है. आश्चर्य की बात है कि पौंजी स्कीम को चलाने वालों द्वारा स्वयं का उस में कोई पैसा नहीं लगाया जाता अपितु वे निवेशकों  द्वारा जमा कराई रकम का ही अन्य को रिटर्न देने में उपयोग करते रहते हैं. बाद में नए जमाकर्ताओं से प्राप्त राशि से ज्यादा चुकाने पर योजना अकसर गड़बड़ा जाती है और सपनों का किला ध्वस्त होने लगता है. पैसों के अभाव में योजना डगमगाने लगती है. मामला चौपट होने से वह स्कीम पौंजी योजना बन जाती है. देखा जाए तो लोग इन योजनाओं में फंसते हैं. इस का सब से बड़ा कारण यह भी है कि योजनाकर्ता निवेशकों को घर बैठे अपनी सेवाएं मुफ्त सुलभ कराते हैं, व्यक्तिगत संपर्क बनाए रखते हैं. इस तरह से उन का तालमेल कायम रहता है. दूसरी तरफ आलम यह है कि बैंकों में जाओ तो कागजी खानापूर्ति के अलावा लाइनों में लग कर पैसा जमा कराना पड़ता है. इस में काफी श्रम व वक्त लग जाता है.

झांसे का खेल

दिलचस्प पहलू यह है कि वाकई में यों तो इन का कोई वजूद नहीं होता लेकिन देशभर में सुदूर अंतरंग इलाकों में घुसपैठ का शगल कायम होने से इन का दबदबा बरकरार रहता है. कम समय में ज्यादा रिटर्न का लालच दे कर, सैकड़ों प्रकार की स्कीमें चला कर अनेक कंपनियां धड़ल्ले से निवेशकों को चूना लगा रही हैं. पौंजी, पिरामिड, चेन, लौटरी व चिटफंड, वित्तीय, गैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियां, क्रैडिट नैटवर्क, मल्टीलैवल मार्केटिंग, गु्रपसैल्स, प्राइज चिट्स, सैल्स व मार्केटिंग, सहकारिता, समेकित निवेश इत्यादि स्कीमें बखूबी चलाई जाती हैं. व्यापक नैटवर्क, विज्ञापनबाजी, गिफ्ट, पुरस्कार, कमीशन, ज्यादा ब्याज जैसे प्रलोभनों में आदमी बरबस आ ही जाता है. ऐसी कंपनियों के एजेंट व कारिंदे शातिराना अंदाज में किसी परिचित को साथ में ले, झांसा दे कर पैसा ऐंठने में माहिर होते हैं. काबिलेगौर हैं विदेशी निकायों द्वारा ओ बी सी मार्गों यानी आउटवार्ड बिल्स कलैक्शन चैनल्स का दुरुपयोग कर के भारी मात्रा में पैसा बटोर ले जाने की हरकतें. इसे परिभाषित करें तो विक्रेता अथवा निर्यातक द्वारा अपने बैंक, जोकि घरेलू बिक्री और निर्यात दस्तावेजों को संभाल रहे हैं, के जरिए प्रस्तुत बिलों को क्रेता बैंक के माध्यम से खरीदार से भुगतान लेने के लिए संप्रेषित किए जाते हैं. इस दौरान घोटालेबाज कंपनियों द्वारा तत्संबंधित क्रियाप्रक्रिया में गड़बड़झाला कर के हेराफेरी को अंजाम दिया जाता है.

अमेरिकी थिंकटैंक ग्लोबल फाइनैंशियल इंटिग्रिटी यानी जीएफआई की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2003 से 2012 के बीच 10 सालों में भारत में 440 अरब डौलर अर्थात 28 लाख करोड़ रुपए की राशि अवैध तरीके से लाई गई और 2012 में ही, 95 अरब डौलर यानी 6 लाख करोड़ रुपए की राशि अवैध तरीके से बाहर ले जाई गई. बहुचर्चित बड़े कांडों की कड़ी में सहारा गु्रप, सारदा चिटफंड, सत्यम ग्रुप, अर्थतत्त्व गु्रप आदि द्वारा हजारों करोड़ रुपयों की हेराफेरी के प्रकरण जगजाहिर हैं. नैशनल स्टौक एक्सचेंज में वायदा कारोबार के जरिए फाइनैंशियल इंडिया लिमिटेड द्वारा निवेशकों के पैसों का गोलमाल कर के 5,600 करोड़ रुपए की घोटालेबाजी उजागर हुई है. शेयर्स व कमोडिटी कारोबार को निवेश का प्रमुख साधन माना जाता है. कौन जानता है कि अच्छीभली लगने वाली अमुक कंपनी कब बैठ जाए? मनमाने तरीके से भावों के उतारचढ़ाव की गाज छोटे निवेशकों पर पड़ती है, बड़े दिग्गज पैसा बटोर कर रफूचक्कर हो जाते हैं. कदमकदम पर ऐसे धूर्तों का मायाजाल फैला हुआ है. लाचार जनता इन्हें हैरत से ताकती रह जाती है. उसे चाकचौबंद रहने की नसीहत दी जाती है.

पौंजी स्कीमों की कार्यविधि ही कुछ ऐसी होती है कि आम आदमी सहज ही गच्चा खा जाता है. सामान्यतया चेन- पिरामिड जैसी योजनाओं में पैसा लगाने को तरजीह दी जाती है. इस के तहत सदस्यता को आगे बढ़ाते रहना होता है. नएनए लोग जुड़ते रहते हैं. ऐसी कंपनियां दूसरी स्कीमों को भी चलाती रहती हैं. इस प्रकार से पौंजी स्कीमों का कारोबार फलताफूलता रहता है. अमूमन पौंजी स्कीमों के कर्ताधर्ताओं द्वारा समयसमय पर अपने कारिंदों व एजेंटों की मीटिंगें, संवाद, विचारविमर्श जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इस से उन्हें प्रोत्साहित करने के साथसाथ कार्यप्रणाली में पारंगत बनाया जाता है तथा उन को धंधेबाजी के नित नए गुर सिखाने का अच्छा मौका भी मिलता है. एजेंट सर्वप्रथम अपने परिचितों के पास आनाजाना शुरू करते हैं. उन के सुखद भविष्य के लिए बचत के महत्त्व से अवगत कराते हैं. फिर अनायास ही बातोंबातों में अमुक पौंजी स्कीम के बारे में जिक्र करते हैं. उस के बाद निवेशक का मानस टटोलते हुए लक्षित योजना विशेष की खूबियां बखान करते हुए उस में पैसा निवेश करा लिया जाता है. ऊंचे प्रतिफल व अधिक ब्याज के लालच में आदमी बरबस आ ही जाता है. पौंजी स्कीमों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो मिसाल के तौर पर बड़े प्रकरणों की कड़ी में सहारा गु्रप जैसे नामचीनों की कारगुजारियां कमतर नहीं लगतीं. यह 36 सालों से कार्यरत है. देश में ऐसा कोई शहर या कसबा नहीं होगा जहां सहारा गु्रप की पहुंच न हो. उस के एजेंट, कारिंदे, फ्रैंचाइजी बड़े जोरशोर के साथ लोगों से पैसा उगाहने में मशगूल हैं. गु्रप ने अनेक कंपनियां बना डाली हैं. कई प्रकार के बौंड, डिबैंचर्स वगैरा के जरिए पैसा बटोरा जा रहा है.

3 वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त, 2012 के फैसले में सहारा गु्रप द्वारा अवैध तरीके से सहारा रीयल एस्टेट कौर्पोरेशन लिमिटेड तथा सहारा हाउसिंग इन्वैस्टमैंट कौर्पोरेशन लिमिटेड नामक कंपनियों के जरिए 2 करोड़ 96 लाख निवेशकों से एकत्रित की गई 24 हजार करोड़ रुपए से भी ऊपर की राशि को लौटाया जाना आदेशित किया था. उक्त रकम को सेबी के पास जमा कराया जाना निर्देशित था. सहारा समूह द्वारा उक्त मामले में विभिन्न स्तरों पर काफी आनाकानी की जाती रही है. कई तरह के दांवपेंच, वादों, प्रस्तावों तथा भरसक प्रयासों के बावजूद मसला नहीं सुलझ पाया. उधर सेबी के साथ तनातनी के चलते काफी वक्त यों ही गुजरता चला गया. उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अवमानना की वजह से सहारा सुप्रीमो सुब्रतो राय अपने 2 सिपहसालारों संग 4 मार्च, 2014 से जेल में हैं.

चिटफंड घोटाला

रिजर्व बैंक तथा सेबी द्वारा इस संदर्भ में विज्ञप्तियों व विज्ञापनों के जरिए बारबार आगाह कराए जाने के बावजूद निवेशक आंखें मूंद कर पैसा जमा कराए जा रहे हैं. सहारा समूह द्वारा आज भी अपनी विभिन्न योजनाओं के नाम पर पैसा उगाहने का क्रम चालू है. ऐसे ही, सारदा चिटफंड कांड सुर्खियों में है. इस के सूत्रधार सुदीप्तो सेन द्वारा 3,500 करोड़ रुपए का घोटाला किया गया. कई कंपनियां बना डालीं. कई हस्तियों का प्रश्रय रहा. फरवरी 2014 में गिरफ्तार हुए. और भी गिरफ्तारियां हुई हैं. परतें खुलती जा रही हैं. 2008 से 2012 के बीच सारदा गु्रप की 4 कंपनियों ने अपनी पौलिसियां जारी कर के 2,459 करोड़ रुपए इकट्ठे किए, जबकि निवेशकों को केवल 47,657 करोड़ रुपए का पेमैंट किया गया. अवैध तरीके से बैंकिंग कारोबार करने वाली सांई प्रसाद इंटरप्राइजेज चिटफंड कंपनी के सीएमडी पुष्पेंद्र सिंह बघेल को जून माह में भोपाल पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया. इन की आधा दर्जन से भी अलगअलग नाम की फर्मों पर देशभर में करीब 2,600 करोड़ रुपए के घोटाले करने का आरोप है. इस कंपनी के कर्ताधर्ता लोगों को दोगुना रकम का लालच दे कर पैसा बटोर कर फरार हो जाते थे. देश के 6 राज्यों में इन का गोरखधंधा फैला हुआ था. उधर, पौंजी योजनाओं द्वारा लाखों निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के मामलों की अहमियत व गंभीरता को महसूस करते हुए रिजर्व बैंक ने इस के लिए नियामकीय कमी तथा निगरानीकर्ताओं एवं जांच एजेंसियों के बीच तालमेल के अभाव को जिम्मेदार ठहराया है. पौंजी योजनाओं के मामले में नियामकीय दायित्व का सरासर अभाव है. देखा जाए तो एक तरह से यह अस्पष्ट सा क्षेत्र बना हुआ लगता है.

कैसे लगे लगाम

अनेक प्रकार के म्यूचुअल फंड, एसआईपी, इक्विटी, बौंड, डिबैंचर्स व सार्वजनिक सूचीबद्ध कंपनियों की स्कीमों में निवेश की बातें भी बढ़चढ़ कर की जाती हैं. विषय विशेषज्ञ व परामर्शक भी तर्कवितर्क देते रहते हैं. मगर इन के प्रतिमान कुछ और ही होते हैं. अमूमन इन से संबंधित प्रावधानों का खुलासा व अन्य जानकारी को ठीक से जाननासमझना हरेक के बूते की बात नहीं होती. आमजन, खुदरा छोटे निवेशकों, वृद्धजन, सेवानिवृत्त लोगों के लिए बैंकों, डाकघर अथवा किसी जांचीपरखी योजना में निवेश ही मुनासिब लगता है. भारत सरकार के वित्त, विनिवेश, वाणिज्य, उद्योग व व्यापार, आर्थिक व कंपनी मामलात विभागों, रिजर्व बैंक तथा सेबी की अहम  भूमिका रहती है. पौंजी स्कीमों व चिटफंड कंपनियों के मसले की अहमियत को महसूस करते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा एक जनहित याचिका के प्रसंग में केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक, सेबी, प्रवर्तन निदेशालय तथा गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय यानी एसएफआईओ को सख्त कदम उठाने को पाबंद किया गया है. पौंजी स्कीमों पर लगाम कसने तथा छोटेछोटे निवेशकों से पैसा ले कर रातोंरात चंपत हो जाने वाली फर्जी कंपनियों पर अंकुश लगने की दृष्टि से लोकसभा द्वारा पारित प्रतिभूति कानून (संशोधन) 2014 केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित कर दिया गया है. 25 अगस्त की अधिसूचना से लागू इस अधिनियम के अंतर्गत सेबी को प्रभावी अधिकार मिल गया है. डिफौल्टरों के खिलाफ जांच व अभियोजन में तेजी लाने के लिए मामलों की सुनवाई हेतु मुंबई में विशेष अदालत का गठन किया गया है.

मुद्दे की बात यह है कि नीयत के साथ सीरत भी बदलनी होगी. सिस्टम सुधारना जरूरी है, नियमकायदे भी जरूरी हैं. और, उस से भी जरूरी है उन का कड़ाई से पालन कराना. निवेशकों के हित संरक्षण को सर्वोपरि मानते हुए हर स्थिति में फर्जीवाड़े का खात्मा करना होगा. इस के लिए त्वरित कदम उठाते हुए पुख्ता नियम बनाने होंगे, तभी सार्थक परिणाम अपेक्षित हैं.

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